शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 201–210
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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अ ० २५ ] विद्येश्वरसंहिता १८ ९
दिवा बिभ्रद्रात्रिकृतै रात्रौ बिभ्रद्दिवाकृतैः ।
प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने मुच्यते सर्वपातकैः ॥
ये त्रिपुण्ड्रधरा लोके जटाधारिण एव ये ।
ये रुद्राक्षधरास्ते वै यमलोकं प्रयान्ति न ॥
रुद्राक्षमेकं शिरसा बिभर्ति तथा त्रिपुण्ड्रं च ललाटमध्ये । पञ्चाक्षरं ये हि जपन्ति मन्त्रं पूज्या भवद्भिः खलु ते हि साधवः ॥
यस्याङ्गे नास्ति रुद्राक्षस्त्रिपुण्ड्रं भालपट्टके ।
मुखे पञ्चाक्षरं नास्ति तमानय यमालयम् ॥
ज्ञात्वा ज्ञात्वा तत्प्रभावं भस्मरुद्राक्षधारिणः ।
ते पूज्याः सर्वदास्माकं नो नेतव्याः कदाचन ॥
एवमाज्ञापयामास कालोऽपि निजकिङ्करान् ।
तथेति मत्वा ते सर्वे तूष्णीमासन्सुविस्मिताः ॥
अत एव महादेवि रुद्राक्षोऽप्यघनाशनः ।
तद्धरो मत्प्रियः शुद्धोऽत्यघवानपि पार्वति ॥
हस्ते बाहौ तथा मूनि रुद्राक्षं धारयेत्तु यः ।
अवध्यः सर्वभूतानां रुद्ररूपी चरेद्भुवि ॥
सुरासुराणां सर्वेषां वन्दनीयः सदा स वै ।
पूजनीयो हि दृष्टस्य पापहा च यथा शिवः ॥
ध्यानज्ञानावमुक्तोऽपि रुद्राक्षं धारयेत्तु यः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥
रुद्राक्षेण जपन्मन्त्रं पुण्यं कोटिगुणं भवेत् दशकोटिगुणं पुण्यं धारणाल्लभते नरः मनुष्य दिनमें [ रुद्राक्ष धारण करनेसे ] रात्रिमें ४८ किये गये पापोंसे और रात्रिमें [ रुद्राक्ष धारण करनेसे ] दिनमें किये गये पापोंसे; प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल [ रुद्राक्ष धारण करनेसे ] किये गये समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥
संसारमें जितने भी त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले हैं, ४ ९ जटाधारी हैं और रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं, वे यमलोकको नहीं जाते हैं ॥४ ९ ॥ जिनके ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगा हो और सभी अंग रुद्राक्षसे विभूषित हों तथा जो पंचाक्षरमन्त्रका जप कर रहे हों, वे आप - सदृश पुरुषोंके पूज्य हैं; वे ५० वस्तुतः साधु हैं ॥ ५० ॥
[ यम अपने गणोंको आदेश करते हैं कि ] जिसके ५१ शरीरपर रुद्राक्ष नहीं है, मस्तकपर त्रिपुण्ड्र नहीं है और मुखमें ' ॐ नमः शिवाय ' यह पंचाक्षर मन्त्र नहीं है, उसको यमलोक लाया जाय । [ भस्म एवं रुद्राक्षके ] ५२ उस प्रभावको जानकर या न जानकर जो भस्म और रुद्राक्षको धारण करनेवाले हैं, वे सर्वदा हमारे लिये पूज्य हैं; उन्हें यमलोक नहीं लाना चाहिये ॥ ५१-५२ ॥ कालने भी इस प्रकारसे अपने गणोंको आदेश ५३ दिया, तब ' वैसा ही होगा ' – ऐसा कहकर आश्चर्यचकित सभी गण चुप हो गये ॥ ५३ ॥
इसलिये हे महादेवि! रुद्राक्ष भी पापोंका नाशक ५४ है । हे पार्वति! उसको धारण करनेवाला मनुष्य पापी होनेपर भी मेरे लिये प्रिय है और शुद्ध है ॥ ५४ ॥
हाथमें, भुजाओंमें और सिरपर जो रुद्राक्ष धारण ५५ करता है, वह समस्त प्राणियोंसे अवध्य है और पृथ्वीपर रुद्ररूप होकर विचरण करता है ॥ ५५ ॥
सभी देवों और असुरोंके लिये वह सदैव वन्दनीय ५६ एवं पूजनीय है । वह दर्शन करनेवाले प्राणीके पापोंका शिवके समान ही नाश करनेवाला है ॥ ५६ ॥
ध्यान और ज्ञानसे रहित होनेपर भी जो रुद्राक्ष ५७ धारण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त होता है ॥५७ ॥
मणि आदिकी अपेक्षा रुद्राक्षके द्वारा मन्त्रजप करनेसे । करोड़ गुना पुण्य प्राप्त होता है और उसको धारण ॥ ५८ करनेसे तो दस करोड़ गुना पुण्यलाभ होता है ॥ ५८ ॥
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१ ९ ० यावत्कालं हि जीवस्य शरीरस्थो भवेत्स वै तावत्कालं स्वल्पमृत्युर्न तं देवि विबाधते
त्रिपुण्ड्रेण च संयुक्तं रुद्राक्षाविलसाङ्गकम् ।
मृत्युञ्जयं जपन्तं च दृष्ट्वा रुद्रफलं लभेत् ॥
पञ्चदेवप्रियश्चैव सर्वदेवप्रियस्तथा ।
सर्वमन्त्राञ्जपेद्भक्तो रुद्राक्षमालया प्रिये ॥
विष्ण्वादिदेवभक्ताश्च धारयेयुर्न संशयः ।
रुद्रभक्तो विशेषेण रुद्राक्षान्धारयेत्सदा ॥
रुद्राक्षा विविधाः प्रोक्तास्तेषां भेदान् वदाम्यहम् ।
शृणु पार्वति सद्भक्त्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदान् ॥
एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ।
तस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥
यत्र सम्पूजितस्तत्र लक्ष्मीर्दूरतरा न हि ।
नश्यन्त्युपद्रवाः सर्वे सर्वकामा भवन्ति हि ॥
द्विवक्त्रो देवदेवेशः सर्वकामफलप्रदः ।
विशेषतः स रुद्राक्षो गोवधं नाशयेद् द्रुतम् ॥
त्रिवक्त्रो यो हि रुद्राक्षः साक्षात्साधनदः सदा ।
तत्प्रभावाद्भवेयुवै विद्याः सर्वाः प्रतिष्ठिताः ॥
चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति ।
दर्शनात् स्पर्शनात् सद्यश्चतुर्वर्गफलप्रदः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ । हे देवि! यह रुद्राक्ष, प्राणीके शरीरपर जबतक ॥ ५ ९ रहता है, तबतक स्वल्पमृत्यु उसे बाधा नहीं पहुँचाती है ॥ ५ ९ ॥ त्रिपुण्ड्रको धारणकर तथा रुद्राक्षसे सुशोभित ६० अंगवाला होकर मृत्युंजयका जप कर रहे उस [ पुण्यवान् मनुष्य ] -को देखकर ही रुद्रदर्शनका फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६० ॥
हे प्रिये! पंचदेवप्रिय [ अर्थात् स्मार्त और वैष्णव ] ६१ तथा सर्वदेवप्रिय सभी लोग रुद्राक्षकी मालासे समस्त मन्त्रोंका जप कर सकते हैं ॥ ६१ ॥
विष्णु आदि देवताओंके भक्तोंको भी निस्सन्देह ६२ इसे धारण करना चाहिये । रुद्रभक्तोंके लिये तो विशेष रूपसे रुद्राक्ष धारण करना आवश्यक है ॥ ६२ ॥
हे पार्वति! रुद्राक्ष अनेक प्रकारके बताये गये हैं । ६३ मैं उनके भेदोंका वर्णन करता हूँ । वे भेद भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले हैं । तुम उत्तम भक्तिभावसे उनका परिचय सुनो ॥ ६३ ॥
एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिवका स्वरूप ६४ है । वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है । उसके दर्शनमात्रसे ही ब्रह्महत्याका पाप नष्ट हो जाता है ॥६४ ॥
जहाँ रुद्राक्षकी पूजा होती है, वहाँसे लक्ष्मी दूर ६५ नहीं जातीं, उस स्थानके सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥ ६५ ॥
दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है । ६६ वह सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाला है । वह विशेष रूपसे गोहत्याका पाप नष्ट करता है ॥ ६६ ॥
तीन मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधनका ६७ फल देनेवाला है, उसके प्रभावसे सारी विद्याएँ प्रतिष्ठित हो जाती हैं ॥ ६७ ॥
चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्माका रूप है । और ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति देनेवाला है । उस दर्शन और स्पर्शसे शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और ६८ । मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति होती है ॥ ६८ ॥
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अ ० २५ ] विद्येश्वरसंहिता १ ९ १
पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नामतः प्रभुः ।
सर्वमुक्तिप्रदश्चैव सर्वकामफलप्रदः ॥ ६ ९ ।
अगम्यागमनं पापमभक्ष्यस्य च भक्षणम् ।
इत्यादिसर्वपापानि पञ्चवक्त्रो व्यपोहति ॥ ७०
षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु धारणाद् दक्षिणे भुजे ।
ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७१
सप्तवक्त्रो महेशानि ह्यनङ्गो नाम नामतः ।
धारणात्तस्य देवेशि दरिद्रोऽपीश्वरो भवेत् ॥ ७२
रुद्राक्षश्चाष्टवक्त्रश्च वसुमूर्तिश्च भैरवः ।
धारणात्तस्य पूर्णायुर्मृतो भवति शूलभृत् ॥ ७३
भैरवो नववक्त्रश्च कपिलश्च मुनिः स्मृतः ।
दुर्गा वा तदधिष्ठात्री नवरूपा महेश्वरी ॥ ७४
तं धारयेद्वामहस्ते रुद्राक्षं भक्तितत्परः ।
सर्वेश्वरो भवेन्नूनं मम तुल्यो न संशयः ॥ ७५
दशवक्त्रो महेशानि स्वयं देवो जनार्दनः ।
धारणात्तस्य देवेशि सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७६
एकादशमुखो यस्तु रुद्राक्षः परमेश्वरि ।
स रुद्रो धारणात्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७७
द्वादशास्यं तु रुद्राक्षं धारयेत् केशदेशके ।
आदित्याश्चैव ते सर्वे द्वादशैव स्थितास्तथा ॥ ७८
पाँच मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्निरुद्ररूप है । वह सब कुछ करनेमें समर्थ, सबको मुक्ति देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है । वह पंचमुख रुद्राक्ष अगम्या स्त्रीके साथ गमन और पापान्न - भक्षणसे उत्पन्न समस्त पापोंको दूर कर देता है ॥६ ९ -७० ॥ छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिकेयका स्वरूप है । यदि दाहिनी बाँहमें उसे धारण किया जाय, तो धारण करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ७१ ॥
हे महेश्वरि! सात मुखवाला रुद्राक्ष अनंग नामसे प्रसिद्ध है । हे देवेशि! उसको धारण करनेसे दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है ॥ ७२ ॥
आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरवरूप है । उसको धारण करनेसे मनुष्य पूर्णायु होता है और मृत्युके पश्चात् शूलधारी शंकर हो जाता है ॥ ७३ ॥
नौ मुखवाले रुद्राक्षको भैरव तथा कपिलमुनिका प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करनेवाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री देवी मानी गयी हैं ॥ ७४ ॥
जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर अपने बायें हाथमें नवमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ७५ ॥
हे महेश्वरि! दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् भगवान् विष्णुका रूप है । हे देवेशि! उसको धारण करनेसे मनुष्यकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ७६ ॥
हे परमेश्वरि! ग्यारह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह रुद्ररूप है; उसको धारण करनेसे मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है ॥ ७७ ॥
बारह मुखवाले रुद्राक्षको केशप्रदेशमें धारण करे I । उसको धारण करनेसे मानो मस्तकपर बारहों । आदित्य विराजमान हो जाते हैं ॥ ७८ ॥
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१ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५
त्रयोदशमुखो विश्वेदेवस्तद्धारणान्नरः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति सौभाग्यं मङ्गलं लभेत् ॥ ७ ९
चतुर्दशमुखो यो हि रुद्राक्षः परमः शिवः ।
धारयेन्मूर्धिन तं भक्त्या सर्वपापं प्रणश्यति ॥ ८०
इति रुद्राक्षभेदा हि प्रोक्ता वै मुखभेदतः ।
तत्तन्मन्त्राञ्छृणु प्रीत्या क्रमाच्छैलेश्वरात्मजे ॥ ८१
ॐ ह्रीं नमः १ ॐ नमः २ ॐ क्लीं नमः ३ ॐ ह्रीं नमः ४ ॐ ह्रीं नमः ५ ॐ ह्रीं हुं नमः ६ ॐ हुं नमः ७ ॐ हुं नमः ८ ॐ ह्रीं हुं नमः ९ ॐ ह्रीं नमः १० ॐ ह्रीं हुं नमः ११ ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः १२ ॐ ह्रीं नमः १३ ॐ नमः १४
भक्तिश्रद्धायुतश्चैव सर्वकामार्थसिद्धये ।
रुद्राक्षान्धारयेन्मन्त्रैर्देवि आलस्यवर्जितः ॥ ८२
विना मन्त्रेण यो धत्ते रुद्राक्षं भुवि मानवः ।
स याति नरकं घोरं यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ८३
रुद्राक्षमालिनं दृष्ट्वा भूतप्रेतपिशाचकाः ।
डाकिनी शाकिनी चैव ये चान्ये द्रोहकारकाः ॥ ८४
कृत्रिमं चैव यत्किञ्चिदभिचारादिकं च यत् ।
तत्सर्वं दूरतो याति दृष्ट्वा शङ्कितविग्रहम् ॥ ८५
रुद्राक्षमालिनं दृष्ट्वा शिवो विष्णुः प्रसीदति । ।
देवी गणपतिः सूर्यः सुराश्चान्येऽपि पार्वति ॥ ८६ ।
तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्वेदेवोंका स्वरूप है । उसको धारण करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्टों को | प्राप्त करता है तथा सौभाग्य और मंगललाभ करता है ॥ ७ ९ ॥ चौदह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह परमशिवरूप है । उसे भक्तिपूर्वक मस्तकपर धारण करे, इससे समस्त पापोंका नाश हो जाता है ॥ ८० ॥
हे गिरिराजकुमारी! इस प्रकार मुखोंके भेदसे रुद्राक्षके [ चौदह ] भेद बताये गये । अब तुम क्रमशः उन रुद्राक्षोंके धारण करनेके मन्त्रोंको प्रसन्नतापूर्वक सुनो-१ - ॐ ह्रीं नमः । २- ॐ नमः । ३ - क्लीं नमः । ४ - ॐ ह्रीं नमः । ५ - ॐ ह्रीं नमः । ६ ॐ ह्रीं हुं नमः । ७ - ॐ हुं नमः । ८ - ॐ हुं नमः । ९ - ॐ ह्रीं हुं नमः । १० - ॐ ह्रीं नमः । ११ - ॐ ह्रीं हुं नमः । १२ - ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः । १३ - ॐ ह्रीं नमः । १४- ॐ नमः [ – इन चौदह मन्त्रोंद्वारा क्रमशः एकसे लेकर चौदह मुखवाले रुद्राक्षोंको धारण करनेका विधान है । ] साधकको चाहिये कि वह निद्रा और आलस्यका त्याग करके श्रद्धाभक्तिसे सम्पन्न होकर सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिके लिये उक्त मन्त्रोंद्वारा उन - उन रुद्राक्षोंको धारण करे ॥ ८१-८२ ॥ इस पृथ्वीपर जो मनुष्य मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किये बिना ही रुद्राक्ष धारण करता है, वह क्रमशः चौदह इन्द्रोंके कालपर्यन्त घोर नरकको जाता है ॥ ८३ ॥
रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले पुरुषको देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा जो अन्य द्रोहकारी राक्षस आदि हैं, वे सब - के - सब दूर भाग जाते हैं । जो कृत्रिम अभिचार आदि कर्म प्रयुक्त होते हैं, वे सब रुद्राक्षधारीको देखकर सशंक हो दूर चले जाते हैं ॥ ८४-८५ ॥ हे पार्वति! रुद्राक्षमालाधारी पुरुषको देखकर मैं शिव, भगवान् विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं ॥८६ ॥
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अ ० २५ ] विद्येश्वरसंहिता १ ९ ३
एवं ज्ञात्वा तु माहात्म्यं रुद्राक्षस्य महेश्वरि ।
सम्यग्धार्याः समन्त्राश्च भक्त्या धर्मविवृद्धये ॥
इत्युक्तं गिरिजाग्रे हि शिवेन परमात्मना ।
भस्मरुद्राक्षमाहात्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥
शिवस्यातिप्रियो ज्ञेयौ भस्मरुद्राक्षधारिणौ ।
तद्धारणप्रभावाद्धि भुक्तिर्मुक्तिर्न संशयः ॥
भस्मरुद्राक्षधारी यः शिवभक्तः स उच्यते ।
पञ्चाक्षरजपासक्तः परिपूर्णश्च सन्मुखे ॥
विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया ।
पूजितोऽपि महादेवो नाभीष्टफलदायकः ॥
तत्सर्वं च समाख्यातं यत्पृष्टं हि मुनीश्वर ।
भस्मरुद्राक्षमाहात्म्यं सर्वकामसमृद्धिदम् ॥
एतद्यः शृणुयान्नित्यं माहात्म्यं परमं शुभम् ।
रुद्राक्षभस्मनोर्भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
इह सर्वसुखं भुक्त्वा पुत्रपौत्रादिसंयुतः । लभेत्परत्र सन्मोक्षं शिवस्यातिप्रियो भवेत् विद्येश्वरसंहितेयं कथिता वो मुनीश्वराः सर्वसिद्धिप्रदा नित्यं मुक्तिदा शिवशासनात् हे महेश्वरि! इस प्रकार रुद्राक्षकी महिमाको ८७ जानकर धर्मकी वृद्धिके लिये भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त मन्त्रोंद्वारा विधिवत् उसे धारण करना चाहिये ॥ ८७ ॥
[ हे मुनीश्वरो! ] इस प्रकार परमात्मा शिवने ८८ भगवती पार्वतीके सामने भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करनेवाले भस्म तथा रुद्राक्षके माहात्म्यका वर्णन किया था ॥ ८८ ॥
भस्म और रुद्राक्षको धारण करनेवाले मनुष्य ८ ९ भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय हैं । उसको धारण करनेके प्रभावसे ही भुक्ति - मुक्ति दोनों प्राप्त हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८ ९ ॥ भस्म और रुद्राक्ष धारण करनेवाला मनुष्य ९ ० शिवभक्त कहा जाता है । भस्म एवं रुद्राक्षसे युक्त होकर जो मनुष्य [ शिवप्रतिमाके सामने स्थित होकर ] ' ॐ नमः शिवाय ' - इस पंचाक्षर मन्त्रका जप करता है, वह पूर्ण भक्त कहलाता है॥९ ० ॥ बिना भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण किये और ९ १ बिना रुद्राक्ष माला लिये जो महादेवकी पूजा करता है, उससे पूजित होनेपर भी महादेव अभीष्ट फल प्रदान नहीं करते हैं॥९ १ ॥ हे मुनीश्वर! सभी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले ९ २ भस्म और रुद्राक्षके माहात्म्यको मैंने सुनाया । जो इस रुद्राक्ष और भस्मके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । वह पुत्र - पौत्र ९ ३ आदिके साथ इस लोकमें सभी प्रकारके सुख भोगकर अन्तमें मोक्षको प्राप्त होता है और भगवान् शिवका ॥ ९ ४ अतिप्रिय हो जाता है॥९ २ – ९ ४ ॥ हे मुनीश्वरो! इस प्रकार मैंने शिवकी आज्ञाके । अनुसार उत्तम मुक्ति देनेवाली विद्येश्वरसंहिता आपके ॥ ९ ५ | समक्ष कही ॥ ९ ५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां साध्यसाधनखण्डे रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके प्रथम विद्येश्वरसंहिताके साध्यसाधनखण्डमें रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
॥ समाप्तेयं प्रथमा विद्येश्वरसंहिता ॥ १ ॥
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पञ्चमुख भगवान् शिव 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_8_1_Back
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमः सृष्टिखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतजीद्वारा नारद - ब्रह्म - संवादकी अवतारणा विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं गौरीपतिं विदिततत्त्वमनन्तकीर्तिम् । मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यरूपं बोधस्वरूपममलं हि शिवं नमामि ॥ १ वन्दे शिवं तं प्रकृतेरनादिं प्रशान्तमेकं पुरुषोत्तमं स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा नभोवदन्तर्बहिरास्थितो वन्देऽन्तरस्थं निजगूढरूपं शिवं स्वतः स्रष्टुमिदं जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति
हि ।
यः ॥ २
विचष्टे ।
यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवत्तम् ॥ ३
व्यास उवाच
जगतः पितरं शम्भुं जगतो मातरं शिवाम् ।
तत्पुत्रञ्च गणाधीशं नत्वैतद्वर्णयामहे ॥ ४
एकदा मुनयः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः ।
पप्रच्छुर्वरया भक्त्या सूतं ते शौनकादयः ॥ ५
ऋषय ऊचुः
विद्येश्वरसंहितायाः श्रुता सा सत्कथा शुभा ।
साध्यसाधनखण्डाख्या रम्याद्या भक्तवत्सला ॥ ६
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_8_2_Front जो विश्वकी उत्पत्ति - स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, गिरिराजकुमारी उमाके पति हैं, तत्त्वज्ञ हैं, जिनकी कीर्तिका कहीं अन्त नहीं है, जो मायाके आश्रय होकर भी उससे अत्यन्त दूर हैं, जिनका स्वरूप अचिन्त्य है, जो बोधस्वरूप हैं तथा निर्विकार हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १ ॥
मैं स्वभावसे ही उन अनादि, शान्तस्वरूप, पुरुषोत्तम शिवकी वन्दना करता हूँ, जो अपनी मायासे इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करके आकाशकी भाँति इसके भीतर और बाहर भी स्थित हैं ॥२ ॥
जैसे लोहा चुम्बकसे आकृष्ट होकर उसके पास ही लटका रहता है, उसी प्रकार ये सारे जगत् सदा सब ओर जिसके आस - पास ही भ्रमण करते हैं, जिन्होंने अपनेसे ही इस प्रपंचको रचनेकी विधि बतायी थी, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हैं तथा जिनका अपना स्वरूप अत्यन्त गूढ़ है, उन भगवान् शिवकी मैं सादर वन्दना करता हूँ ॥ ३ ॥
व्यासजी बोले — जगत्के पिता भगवान् शिव, जगन्माता कल्याणमयी पार्वती तथा उनके पुत्र गणेशजीको नमस्कार करके हम इस पुराणका वर्णन करते हैं ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले शौनक आदि सभी मुनियोंने उत्तम भक्तिभावके साथ सूतजीसे पूछा —॥५ ॥
ऋषिगण बोले - [ हे सूतजी! ] विद्येश्वर-संहिताकी जो साध्य - साधन - खण्ड नामवाली शुभ तथा उत्तम कथा है, उसे हमलोगोंने सुन लिया । उसका आदिभाग बहुत ही रमणीय है तथा वह शिवभक्तोंपर भगवान् । शिवका वात्सल्य - स्नेह प्रकट करनेवाली है ॥६ ॥
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१ ९ ६ सूत सूत महाभाग चिरञ्जीव सुखी भव यच्छ्रावयसि नस्तात शाङ्करीं परमां कथाम्
पिबन्तस्त्वन्मुखाम्भोजच्युतं ज्ञानामृतं वयम् ।
अवितृप्ताः पुनः किञ्चित्प्रष्टुमिच्छामहे ऽनघ ॥
व्यासप्रसादात्सर्वज्ञो प्राप्तोऽसि कृतकृत्यताम् ।
नाज्ञातं विद्यते किञ्चिद्भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥
गुरोर्व्यासस्य सद्भक्त्या समासाद्य कृपां पराम् ।
सर्वं ज्ञातं विशेषेण सर्वं सार्थं कृतं जनुः ॥
इदानीं कथय प्राज्ञ शिवरूपमनुत्तमम् ।
दिव्यानि वै चरित्राणि शिवयोरप्यशेषतः ॥
अगुणो गुणतां याति कथं लोके महेश्वरः ।
शिवतत्त्वं वयं सर्वे न जानीमो विचारतः ॥
सृष्टेः पूर्वं कथं शम्भुः स्वरूपेणावतिष्ठते ।
सृष्टिमध्ये स हि कथं क्रीडन्संवर्तते प्रभुः ॥
तदन्ते च कथं देवः स तिष्ठति महेश्वरः ।
कथं प्रसन्नतां याति शङ्करो लोकशङ्करः ॥
स प्रसन्नो महेशानः किं प्रयच्छति सत्फलम् ।
स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च तत्सर्वं कथयस्व नः ॥
सद्यः प्रसन्नो भगवान्भवतीत्यनुशुश्रुम । भक्तप्रयासं स महान्न पश्यति दयापरः । ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवाङ्गजाः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । हे महाभाग! हे सूतजी! हे तात! आप हमलोगोंको ॥ ७ सदाशिव भगवान् शंकरकी उत्तम कथाका श्रवण करा रहे हैं, अतएव आप चिरकालतक जीवित रहें और सदा सुखी रहें । आपके मुखकमलसे निकल रहे ८ ज्ञानामृतका पूर्ण रूपसे पान करते हुए भी हमलोग तृप्त नहीं हो पा रहे हैं, इसलिये हे अनघ ( पुण्यात्मा )! हम सब पुन: कुछ पूछना चाहते हैं ॥ ७-८ ॥ भगवान् व्यासकी कृपासे आप सर्वज्ञ एवं कृतकृत्य ९ हैं । आपके लिये भूत - भविष्य और वर्तमानका कुछ भी अज्ञात नहीं है अर्थात् सब कुछ आपको ज्ञात है ॥९ ॥
अपनी सद्भक्तिके द्वारा गुरु व्यासजीसे परमकृपाको १० प्राप्तकर आप विशेष रूपसे सब कुछ जान गये हैं और अपने सम्पूर्ण जीवनको भी कृतार्थ कर लिया है ॥ १० ॥
हे विद्वन्! अब आप भगवान् शिवके परम उत्तम ११ स्वरूपका वर्णन कीजिये । साथ ही शिव और पार्वतीके दिव्य चरित्रोंका पूर्णरूपसे श्रवण कराइये ॥ ११ ॥
निर्गुण महेश्वर लोकमें सगुणरूप कैसे धारण १२ करते हैं? हम सबलोग विचार करनेपर भी शिवके तत्त्वको नहीं समझ पाते ॥१२ ॥
सृष्टिके पूर्वमें भगवान् शिव किस प्रकार अपने १३ स्वरूपसे स्थित होते हैं, पुनः सृष्टिके मध्यकालमें वे भगवान् किस तरह क्रीड़ा करते हुए सम्यक् व्यवहार करते हैं । सृष्टिकल्पका अन्त होनेपर वे महेश्वरदेव १४ किस रूपमें स्थित रहते हैं? लोककल्याणकारी शंकर कैसे प्रसन्न होते हैं ॥ १३-१४ ॥ प्रसन्न हुए महेश्वर अपने भक्तों तथा दूसरोंको १५ कौन - सा उत्तम फल प्रदान करते हैं? यह सब हमसे कहिये । हमने सुना है कि भगवान् शिव शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं । वे महान् दयालु हैं, इसलिये वे अपने १६ भक्तोंका कष्ट नहीं देख सकते ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश — ये तीनों देवता शिवके महेशस्तत्र पूर्णांशः स्वयमेव शिवोऽपरः ॥ १७ ही अंगसे उत्पन्न हुए हैं । इनमें महेश तो पूर्णांश हैं, वे तस्याविर्भावमाख्याहि । स्वयं ही दूसरे शिव हैं । आप उनके प्राकट्यकी कथा चरितानि विशेषतः । तथा उनके विशेष चरित्रोंका वर्णन कीजिये । हे प्रभो! उमाविर्भावमाख्याहि तद्विवाहं तथा प्रभो ॥ १८ आप उमाके आविर्भाव और उनके विवाहकी भी कथा तद्गार्हस्थ्यं कहिये । विशेषतः उनके गार्हस्थ्यधर्मका और अन्य विशेषेण तथा लीलाः परा अपि । । लीलाओंका भी वर्णन कीजिये । हे निष्पाप सूतजी! ये एतत्सर्वं तदन्यच्च कथनीयं त्वयानघ ॥ १ ९ सब तथा अन्य बातें भी आप बतायें ॥ १७–१९ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_8_2_Back
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अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) १ ९ ७ व्यास उवाच
इति पृष्टस्तदा तैस्तु सूतो हर्षसमन्वितः ।
स्मृत्वा शम्भुपदाम्भोजं प्रत्युवाच मुनीश्वरान् ॥ २०
सूत उवाच
सम्यक् पृष्टं भवद्भिश्च धन्या यूयं मुनीश्वराः ।
सदाशिवकथायां वो यज्जाता नैष्ठिकी मतिः ॥ २१
सदाशिवकथाप्रश्नः पुरुषांस्त्रीन्पुनाति हि ।
वक्तारं पृच्छकं श्रोतॄञ्जाह्नवीसलिलं यथा ॥ २२
शम्भोर्गुणानुवादात्को विरज्येत पुमान्द्विजाः ।
विना पशुघ्नं त्रिविधजनानन्दकरात्सदा ॥ २३
गीयमानो वितृष्णैश्च भवरोगौषधोऽपि हि ।
मनःश्रोत्राभिरामश्च यतः सर्वार्थदः स वै ॥ २४
कथयामि यथाबुद्धि भवत्प्रश्नानुसारतः ।
शिवलीलां प्रयत्नेन द्विजास्तां शृणुतादरात् ॥ २५
भवद्भिः पृच्छ्यते यद्वत्तत्तथा नारदेन वै ।
पृष्टं पित्रे प्रेरितेन हरिणा शिवरूपिणा ॥ २६
ब्रह्मा श्रुत्वा सुतवचः शिवभक्तः प्रसन्नधीः ।
जगौ शिवयशः प्रीत्या हर्षयन्मुनिसत्तमम् ॥ २७
व्यास उवाच
सूतोक्तमिति तद्वाक्यमाकर्ण्य द्विजसत्तमाः ।
पप्रच्छुस्तत्सुसंवादं कुतूहलसमन्विताः ॥ २८
ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग शैवोत्तम महामते ।
श्रुत्वा तव वचो रम्यं चेतो नः सकुतूहलम् ॥ २ ९
कदा बभूव सुखकृद्विधिनारदयोर्महान् ।
संवादो यत्र गिरिशसुलीला भवमोचनी ॥ ३०
विधिनारदसंवादपूर्वकं शाङ्करं यशः ।
ब्रूहि नस्तात तत्प्रीत्या तत्तत्प्रश्नानुसारतः ॥ ३१
व्यासजी बोले — उनके ऐसा पूछनेपर सूतजी प्रसन्न हो उठे और भगवान् शंकरके चरणकमलोंका स्मरण करके मुनीश्वरोंसे कहने लगे —॥२० ॥
सूतजी बोले- हे मुनीश्वरो! आपलोगोंने बड़ी उत्तम बात पूछी है । आपलोग धन्य हैं, जो कि भगवान् सदाशिवकी कथामें आपलोगोंकी आन्तरिक निष्ठा हुई है, सदाशिवसे सम्बन्धित कथा वक्ता, पूछनेवाले और सुननेवाले - इन तीनों प्रकारके पुरुषोंको गंगाजीके समान पवित्र करती है॥२१-२२ ॥ हे द्विजो! पशुओंकी हिंसा करनेवाले निष्ठुर कसाईके सिवा दूसरा कौन पुरुष तीनों प्रकारके लोगोंको सदा आनन्द देनेवाले शिव - गुणानुवादको सुननेसे ऊब सकता है । जिनके मनमें कोई तृष्णा नहीं है, ऐसे महात्मा पुरुष भगवान् शिवके उन गुणोंका गान करते हैं; क्योंकि वह संसाररूपी रोगकी दवा है, मन तथा कानोंको प्रिय लगनेवाला है और सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है ॥ २३-२४ ॥ हे ब्राह्मणो! आपलोगोंके प्रश्नके अनुसार मैं यथाबुद्धि प्रयत्नपूर्वक शिवलीलाका वर्णन करता हूँ, आपलोग आदरपूर्वक सुनें ॥ २५ ॥
जैसे आपलोग पूछ रहे हैं, उसी प्रकार नारदजीने शिवरूपी भगवान् विष्णुसे प्रेरित होकर अपने पिता ब्रह्माजीसे पूछा था । अपने पुत्र नारदका प्रश्न सुनकर शिवभक्त ब्रह्माजीका चित्त प्रसन्न हो गया और वे उन मुनिश्रेष्ठको हर्ष प्रदान करते हुए प्रेमपूर्वक भगवान् शिवके यशका गान करने लगे॥२६-२७ ॥ व्यासजी बोले- सूतजीके द्वारा कथित उस वचनको सुनकर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण आश्चर्यचकित हो उठे और उन लोगोंने उस विषयको उनसे पूछा- ॥ २८ ॥
ऋषिगण बोले- हे सूतजी! हे महाभाग! हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! हे महामते! आपके सुन्दर वचनको सुनकर हमारे हृदयमें कौतूहल हो रहा है ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मा और नारदका यह महान् सुख देनेवाला संवाद कब हुआ था, जिसमें संसारसे मुक्ति प्रदान करनेवाली शिवलीला वर्णित है ॥ ३० ॥
हे तात! प्रेमपूर्वक नारदके द्वारा पूछे गये उन-उन प्रश्नोंके अनुसार भगवान् शंकरके यशका गुणानुवाद । करनेवाले ब्रह्मा और नारदके संवादका वर्णन करें ॥ ३१ ॥
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१ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ इत्याकर्ण्य वचस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् । आत्मज्ञानी उन मुनियोंके ऐसे वचनको सुनकर सूतः प्रोवाच सुप्रीतस्तत्संवादानुसारतः ॥ ३२ प्रसन्न हुए सूतजी उस ब्रह्मा - नारद - संवादके अनुसार [ कही गयी शिवकथाको ] कहने लगे ॥ ३२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने मुनिप्रश्नवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें मुनि - प्रश्न - वर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः नारद मुनिकी तपस्या, इन्द्रद्वारा तपस्यामें विघ्न उपस्थित करना, नारदका कामपर विजय पाना और अहंकारसे युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रसे अपने तपका कथन सूत उवाच एकस्मिन्समये विप्रा नारदो मुनिसत्तमः ब्रह्मपुत्रो विनीतात्मा तपोऽर्थं मन आदधे हिमशैलगुहा काचिदेका परमशोभना यत्समीपे सुरनदी सदा वहति वेगतः तत्राश्रमो महादिव्यो नानाशोभासमन्वितः । तपोऽर्थं स ययौ तत्र नारदो दिव्यदर्शनः
तां दृष्ट्वा मुनिशार्दूलस्तेपे स सुचिरं तपः ।
बध्वासनं दृढं मौनी प्राणानायम्य शुद्धधीः ॥
चक्रे मुनिः समाधिं तमहम्ब्रह्मेति यत्र ह ।
विज्ञानं भवति ब्रह्मसाक्षात्कारकरं द्विजाः ॥
इत्थं तपति तस्मिन्वै नारदे मुनिसत्तमे ।
चकम्पेऽथ शुनासीरो मनस्सन्तापविह्वलः ॥
मनसीति विचिन्त्यासौ मुनिर्मे राज्यमिच्छति ।
तद्विघ्नकरणार्थं हि हरिर्यलमियेष सः ॥
सस्मार स स्मरं शक्रश्चेतसा देवनायकः ।
आजगाम द्रुतं कामः समधीर्महिषीयुतः ॥
सूतजी बोले - [ हे मुनियो! ] एक समयकी । बात है, ब्रह्माजीके पुत्र, मुनिशिरोमणि, विनीतचित्त ॥ १ नारदजीने तपस्याके लिये मनमें विचार किया ॥१ ॥
। हिमालय पर्वतमें कोई एक परम शोभा सम्पन्न ॥ २ गुफा थी, जिसके निकट देवनदी गंगा निरन्तर वेगपूर्वक बहती थीं ॥२ ॥
वहाँ एक महान् दिव्य आश्रम था, जो नाना ॥ ३ प्रकारकी शोभासे सुशोभित था । वे दिव्यदर्शी नारदजी तपस्या करनेके लिये वहाँ गये ॥३ ॥
उस गुफाको देखकर मुनिवर नारदजी बड़े प्रसन्न ४ हुए और सुदीर्घकालतक वहाँ तपस्या करते रहे । उनका अन्तःकरण शुद्ध था । वे दृढ़तापूर्वक आसन बाँधकर मौन हो प्राणायामपूर्वक समाधिमें स्थित हो गये ॥४ ॥
हे ब्राह्मणो! उन्होंने वह समाधि लगायी, जिसमें ५ ब्रह्मका साक्षात्कार करानेवाला ‘ अहं ब्रह्मास्मि ' [ मैं ब्रह्म हूँ ] —यह विज्ञान प्रकट होता है ॥५ ॥
मुनिवर नारदजी जब इस प्रकार तपस्या करने ६ लगे, तब देवराज इन्द्र काँप उठे और मानसिक सन्तापसे व्याकुल हो गये ॥ ६ ॥
‘ वे नारद मुनि मेरा राज्य लेना चाहते हैं ' – मन-७ ही - मन ऐसा सोचकर इन्द्रने उनकी तपस्यामें विघ्न । डालनेके लिये प्रयत्न करनेकी इच्छा की । उस समय । देवनायक इन्द्रने मनसे कामदेवका स्मरण किया । [ [ स्मरण करते ही ] समान बुद्धिवाले कामदेव अपनी ८ । पत्नी रतिके साथ आ गये॥७-८ ॥