शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 211–220
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) १ ९९
अथागतं स्मरं दृष्ट्वा सम्बोध्य सुरराट् प्रभुः ।
उवाच तं प्रपश्याशु स्वार्थे कुटिलशेमुषिः ॥
इन्द्र उवाच
मित्रवर्य महावीर सर्वदा हितकारक ।
शृणु प्रीत्या वचो मे त्वं कुरु साहाय्यमात्मना ॥
त्वद्बलान्मे बहूनाञ्च तपोगर्वो विनाशितः ।
मद्राज्यस्थिरता मित्र त्वदनुग्रहतः सदा ॥
हिमशैलगुहायां हि मुनिस्तपति नारदः ।
मनसोद्दिश्य विश्वेशं महासंयमवान्दृढः ॥
याचेन्न विधितो राज्यं स ममेति विशङ्कितः ।
अद्यैव गच्छ तत्र त्वं तत्तपोविघ्नमाचर ॥
इत्याज्ञप्तो महेन्द्रेण स कामः समधुप्रियः ।
जगाम तत्स्थलं गर्वादुपायं स्वं चकार ह ॥
रचयामास तत्राशु स्वकलाः सकला अपि ।
वसन्तोऽपि स्वप्रभावं चकार विविधं मदात् ॥
न बभूव मुनेश्चेतो विकृतं मुनिसत्तमाः । भ्रष्टो बभूव तद्गर्वो महेशानुग्रहेण ह शृणुतादरतस्तत्र कारणं शौनकादयः ईश्वरानुग्रहेणात्र न प्रभावः स्मरस्य हि अत्रैव शम्भुनाकारि सुतपश्च स्मरारिणा अत्रैव दग्धस्तेनाशु कामो मुनितपोपहः कामजीवनहेतोर्हि रत्या सम्प्रार्थितैः सुरैः सम्प्रार्थित उवाचेदं शङ्करो लोकशङ्करः कञ्चित्समयमासाद्य जीविष्यति सुराः स्मरः आये हुए कामदेवको देखकर कपटबुद्धि देवराज ९ इन्द्र शीघ्र ही स्वार्थके लिये उनको सम्बोधित करते हुए कहने लगे - ॥ ९ ॥
इन्द्र बोले- मित्रोंमें श्रेष्ठ! हे महावीर! हे सर्वदा हितकारक! तुम प्रेमपूर्वक मेरे वचनोंको सुनो १० और मेरी सहायता करो ॥ १० ॥
हे मित्र! तुम्हारे बलसे मैंने बहुत लोगोंकी ११ तपस्याका गर्व नष्ट किया है । तुम्हारी कृपासे ही मेरा यह राज्य स्थिर है ॥ ११ ॥
पूर्णरूपसे संयमित होकर दृढ़निश्चयी देवर्षि १२ नारद मनसे विश्वेश्वर भगवान् शंकरकी प्राप्तिका लक्ष्य बनाकर हिमालयकी गुफामें तपस्या कर रहे हैं ॥ १२ ॥
मुझे यह शंका है कि [ तपस्यासे प्रसन्न ] ब्रह्मासे वे मेरा राज्य ही न माँग लें । आज ही तुम वहाँ चले १३ जाओ और उनकी तपस्यामें विघ्न डालो ॥ १३ ॥
इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर वे कामदेव वसन्तको १४ साथ लेकर बड़े गर्वसे उस स्थानपर गये और अपना उपाय करने लगे ॥१४ ॥
उन्होंने वहाँ शीघ्र ही अपनी सारी कलाएँ रच १५ डालीं । वसन्तने भी मदमत्त होकर अनेक प्रकारसे अपना प्रभाव प्रकट किया ॥ १५ ॥
हे मुनिवरो! [ कामदेव और वसन्तके अथक ॥ १६ प्रयत्न करनेपर भी ] नारदमुनिके चित्तमें विकार नहीं उत्पन्न हुआ । महादेवजीके अनुग्रहसे उन दोनोंका गर्व चूर्ण हो गया ॥१६ ॥
। हे शौनक आदि महर्षियो! ऐसा होनेमें जो कारण ॥ १७ था, उसे आदरपूर्वक सुनिये । महादेवजीकी कृपासे ही [ नारदमुनिपर ] कामदेवका कोई प्रभाव नहीं पड़ा ॥ १७ ॥
। पहले उसी आश्रममें कामशत्रु भगवान् शिवने ॥ १८ उत्तम तपस्या की थी और वहींपर उन्होंने मुनियोंकी तपस्याका नाश करनेवाले कामदेवको शीघ्र ही भस्म कर डाला था ॥ १८ ॥
। उस समय रतिने कामदेवको पुनः जीवित करनेके ॥ १ ९ लिये देवताओंसे प्रार्थना की । तब देवताओंने समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरसे याचना की । इसपर वे बोले — हे देवताओ! कुछ समय व्यतीत । होनेके बाद कामदेव जीवित तो हो जायँगे, परंतु यहाँ परन्त्विह स्मरोपायश्चलिष्यति न कश्चन ॥ २० | उनका कोई उपाय नहीं चल सकेगा ॥ १ ९ -२० ॥
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२०० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ इह यावद्दृश्यते भूर्जनैः स्थित्वामराः सदा । हे अमरगण! यहाँ खड़े होकर लोग चारों ओर कामबाणप्रभावोऽत्र न चलिष्यत्यसंशयम् ॥ २१ जितनी दूरतककी भूमिको नेत्रोंसे देख पाते हैं, इति शम्भूक्तितः कामो मिथ्यात्मगतिकस्तदा नारदे स जगामाशु दिवमिन्द्रसमीपतः आचख्यौ सर्ववृत्तान्तं प्रभावं च मुनेः स्मरः तदाज्ञया ययौ स्थानं स्वकीयं समधुप्रियः
विस्मितोऽभूत्सुराधीशः प्रशशंसाथ नारदम् ।
तद्वृत्तान्तानभिज्ञो हि मोहितः शिवमायया ॥
दुर्ज्ञेया शाम्भवी माया सर्वेषां प्राणिनामिह ।
भक्तं विनार्पितात्मानं तया सम्मोह्यते जगत् ॥
नारदोऽपि चिरं तस्थौ तत्रेशानुग्रहेण ह ।
पूर्णं मत्वा तपस्तत्स्वं विरराम ततो मुनिः ॥
कामाज्जयं निजं मत्वा गर्वितोऽभून्मुनीश्वरः ।
वृथैव विगतज्ञानः शिवमायाविमोहितः ॥
धन्या धन्या महामाया शाम्भवी मुनिसत्तमाः ।
तद्गतिं न हि पश्यन्ति विष्णुब्रह्मादयोऽपि हि ॥
तया सम्मोहितोऽतीव नारदो मुनिसत्तमः ।
कैलासं प्रययौ शीघ्रं स्ववृत्तं गदितुं मदी ॥
रुद्रं नत्वाब्रवीत्सर्वं स्ववृत्तं गर्ववान्मुनिः ।
मत्त्वात्मानं महात्मानं स्वप्रभुञ्च स्मरञ्जयम् ॥
तच्छ्रुत्वा शङ्करः प्राह नारदं भक्तवत्सलः ।
स्वमायामोहितं हेत्वनभिज्ञं भ्रष्टचेतसम् ॥
| वहाँतक कामदेवके बाणोंका प्रभाव नहीं चल सकेगा इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥,
। भगवान् शंकरकी इस उक्तिके अनुसार उस ॥ २२ समय वहाँ नारदजीके प्रति कामदेवका अपना प्रभाव मिथ्या सिद्ध हुआ । वे शीघ्र ही स्वर्गलोकमें इन्द्रके पास लौट गये ॥ २२ ॥
। वहाँ कामदेवने अपना सारा वृत्तान्त और मुनिका ॥ २३ प्रभाव कह दिया । तत्पश्चात् इन्द्रकी आज्ञासे वे वसन्तके साथ अपने स्थानको लौट गये ॥ २३ ॥
उस समय देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ । २४ उन्होंने नारदजीकी भूरि - भूरि प्रशंसा की । परंतु शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण वे उस पूर्ववृत्तान्तका स्मरण न कर सके ॥ २४ ॥
वास्तवमें इस संसारमें सभी प्राणियोंके लिये शम्भुकी २५ मायाको जानना अत्यन्त कठिन है । जिसने अपने - आपको शिवको समर्पित कर दिया है, उस भक्तको छोड़कर शेष सम्पूर्ण जगत् उनकी मायासे मोहित हो जाता है ॥ २५ ॥
नारदजी भी भगवान् शंकरकी कृपासे वहाँ चिर-२६ कालतक तपस्यामें लगे रहे । अन्तमें अपनी तपस्याको पूर्ण हुआ जानकर वे मुनि उससे विरत हो गये ॥ २६ ॥
कामदेवपर अपनी विजय मानकर उन मुनीश्वरको २७ व्यर्थ ही गर्व हो गया । भगवान् शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण उन्हें यथार्थ बातका ज्ञान नहीं रहा ॥ २७ ॥
हे मुनिश्रेष्ठो! भगवान् शम्भुकी महामाया धन्य २८ है, धन्य है । ब्रह्मा, विष्णु आदि देव भी उसकी गतिको नहीं देख पाते हैं ॥ २८ ॥
उस मायासे अत्यन्त मोहित मुनिशिरोमणि नारद २ ९ गर्वयुक्त होकर अपना [ कामविजय - सम्बन्धी ] वृत्तान्त बतानेके लिये तुरंत ही कैलास पर्वतपर गये ॥२ ९ ॥ वहाँ रुद्रदेवको नमस्कार करके गर्वसे भरे हुए ३० मुनिने अपने आपको महात्मा, प्रभु तथा कामजेता मानकर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा ॥ ३० ॥
यह सुनकर भक्तवत्सल शंकरजी अपनी मायासे | मोहित, वास्तविक कारणसे अनभिज्ञ तथा भ्रष्टचित्त ३१ नारदसे कहने लगे —॥३१ ॥
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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २०१ रुद्र उवाच
हे तात नारद प्राज्ञ धन्यस्त्वं शृणु मद्वचः ।
वाच्यमेवं न कुत्रापि हरेरग्रे विशेषतः ॥
पृच्छमानोऽपि न ब्रूयाः स्ववृत्तं मे यदुक्तवान् ।
गोप्यं गोप्यं सर्वथा हि नैव वाच्यं कदाचन ॥
शास्म्यहं त्वां विशेषेण मम प्रियतमो भवान् ।
विष्णुभक्तो यतस्त्वं हि तद्भक्तोऽतीव मेऽनुगः ॥
शास्ति स्मेत्थञ्च बहुशो रुद्रः सूतिकरः प्रभुः ।
नारदो न हितं मेने शिवमायाविमोहितः ॥
प्रबला भाविनी कर्मगतिज्ञेया विचक्षणैः ।
न निवार्या जनैः कैश्चिदपीच्छा सैव शाङ्करी ॥
ततः स मुनिवर्यो हि ब्रह्मलोकं जगाम ह ।
विधिं नत्वाब्रवीत्कामजयं स्वस्य तपोबलात् ॥
तदाकर्ण्य विधिः सोऽथ स्मृत्वा शम्भुपदाम्बुजम् विज्ञाय कारणं सर्वं निषिषेध सुतं तदा मेने हितं न विध्युक्तं नारदो ज्ञानिसत्तमः शिवमायामोहितश्च रूढचित्तमदाङ्कुरः शिवेच्छा यादृशी लोके भवत्येव हि सा तदा तदधीनं जगत्सर्वं वचस्तन्त्यां स्थितं यतः नारदोऽथ ययौ शीघ्रं विष्णुलोकं विनष्टधीः मदाङ्कुरमना वृत्तं गदितुं स्वं तदग्रतः रुद्र बोले- हे तात! हे नारद! हे प्राज्ञ! तुम धन्य हो । मेरी बात सुनो, अबसे फिर कभी ऐसी बात ३२ कहीं भी न कहना और विशेषतः भगवान् सामने तो इसकी चर्चा कदापि न करना ॥ तुमने मुझसे अपना जो वृत्तान्त बताया ३३ पूछनेपर भी दूसरोंके सामने न कहना । यह सम्बन्धी ] वृत्तान्त सर्वथा गुप्त रखनेयोग्य कभी किसीसे प्रकट नहीं करना चाहिये ॥ तुम मुझे विशेष प्रिय हो, इसीलिये विष्णुके ३२ ॥ है, उसे [ सिद्धि-है, इसे ३३ ॥ [ अधिक ३४ जोर देकर ] मैं तुम्हें यह शिक्षा देता हूँ; क्योंकि तुम भगवान् विष्णुके भक्त हो और उनके भक्त होते हुए मेरे अत्यन्त अनुगामी हो ॥३४ ॥
इस प्रकार बहुत कुछ कहकर संसारकी सृष्टि ३५ करनेवाले भगवान् रुद्रने नारदजीको शिक्षा दी, परंतु शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण नारदजीने उनकी दी हुई शिक्षाको अपने लिये हितकर नहीं माना । भावी ३६ कर्मगति अत्यन्त बलवान् होती है, उसे बुद्धिमान् लोग ही जान सकते हैं । भगवान् शिवकी इच्छाको कोई भी मनुष्य नहीं टाल सकता ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर मुनिशिरोमणि नारद ब्रह्मलोकमें गये । ३७ वहाँ ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपने तपोबलसे कामदेवको जीत लेनेकी बात कही ॥ ३७ ॥
। उनकी वह बात सुनकर ब्रह्माजीने भगवान् ॥ ३८ शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके और समस्त कारण जानकर अपने पुत्रको यह सब कहनेसे मना किया ॥ ३८ ॥
। नारदजी शिवकी मायासे मोहित थे, अतएव ॥ ३ ९ उनके चित्तमें मदका अंकुर जम गया था । इसलिये ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ नारदजीने ब्रह्माजीकी बातको अपने लिये हितकर नहीं समझा ॥ ३ ९ ॥ । इस लोकमें शिवकी जैसी इच्छा होती है, वैसा ॥ ४० ही होता है । समस्त विश्व उन्हींकी इच्छाके अधीन है और उन्हींकी वाणीरूपी तन्त्रीसे बँधा हुआ है ॥ ४० ॥
तब नष्ट बुद्धिवाले नारदजी अपना सारा वृत्तान्त । गर्वपूर्वक भगवान् विष्णुके सामने कहनेके लिये ॥ ४१ । वहाँसे शीघ्र ही विष्णुलोकमें गये ॥४१ ॥
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२०२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २
आगच्छन्तं मुनिं दृष्ट्वा नारदं विष्णुरादरात् ।
उत्थित्वाग्रे गतोऽरं तं शिश्लेष ज्ञातहेतुकः ॥ ४२
स्वासने समुपावेश्य स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ।
हरिः प्राह वचस्तथ्यं नारदं मदनाशनम् ॥ ४३
विष्णुरुवाच
कुत आगम्यते तात किमर्थमिह चागतः ।
धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल तीर्थोऽहं तु तवागमात् ॥ ४४
विष्णुवाक्यमिति श्रुत्वा नारदो गर्वितो मुनिः ।
स्ववृत्तं सर्वमाचष्ट समदं मदमोहितः ॥ ४५
श्रुत्वा मुनिवचो विष्णुः समदं कारणं ततः ।
ज्ञातवानखिलं स्मृत्वा शिवपादाम्बुजं हृदि ॥ ४६
तुष्टाव गिरिशं भक्त्या शिवात्मा शैवराड्ढरिः ।
साञ्जलिर्विसुधीर्नम्रमस्तकः परमेश्वरम् ॥ ४७
विष्णुरुवाच
देव देव महादेव प्रसीद परमेश्वर ।
धन्यस्त्वं शिव धन्या ते माया सर्वविमोहिनी ॥ ४८
इत्यादि स स्तुतिं कृत्वा शिवस्य परमात्मनः ।
निमील्य नयने ध्यात्वा विरराम पदाम्बुजम् ॥ ४ ९
यत्कर्तव्यं शङ्करस्य स ज्ञात्वा विश्वपालकः ।
शिवशासनतः प्राह हृदाथ मुनिसत्तमम् ॥ ५०
विष्णुरुवाच
धन्यस्त्वं मुनिशार्दूल तपोनिधिरुदारधीः ।
भक्तित्रिकं न यस्यास्ति काममोहादयो मुने ॥ ५१
|
विकारास्तस्य सद्यो वै भवन्त्यखिलदुःखदाः । ।
नैष्ठिको ब्रह्मचारी त्वं ज्ञानवैराग्यवान्सदा ॥ ५२
नारद मुनिको आते देखकर भगवान् विष्णु बड़े आदरसे उठकर शीघ्र ही आगे बढ़े और उन्होंने मुनिको । हृदयसे लगा लिया । उन्हें मुनिके आगमनके हेतुका ज्ञान । पहलेसे ही था । नारदजीको अपने आसनपर बैठाकर भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके श्रीहरि उनसे यथार्थ तथा गर्वनाशक वचन कहने लगे- ॥ ४२-४३ ॥ विष्णु बोले— हे तात! आप कहाँसे आ रहे हैं? यहाँ किसलिये आपका आगमन हुआ है? हे मुनिश्रेष्ठ! आप धन्य हैं । आपके शुभागमनसे मैं पवित्र हो गया ॥ ४४ ॥
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर गर्वसे भरे हुए नारद मुनिने मदसे मोहित होकर अपना सारा वृत्तान्त बड़े अभिमानके साथ बताया ॥ ४५ ॥
नारद मुनिका वह अहंकारयुक्त वचन सुनकर मन - ही - मन शिवके चरणारविन्दोंका स्मरणकर भगवान् विष्णुने उनके कामविजयके समस्त यथार्थ कारणको पूर्णरूपसे जान लिया ॥ ४६ ॥
उसके पश्चात् शिवके आत्मस्वरूप, परम शैव, सुबुद्ध भगवान् विष्णु भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर हाथ जोड़कर परमेश्वर कैलासपति शंकरकी स्तुति करने लगे ॥४७ ॥
विष्णु बोले- हे देवेश्वर! हे महादेव! हे परमेश्वर! आप प्रसन्न हों । हे शिव! आप धन्य हैं और सबको विमोहित करनेवाली आपकी माया भी धन्य है ॥ ४८ ॥
इस प्रकार परमात्मा शिवकी स्तुति करके हरि अपने नेत्रोंको बन्दकर उनके चरणकमलोंमें ध्यानस्थित होकर चुप हो गये ॥४ ९ ॥ विश्वपालक हरि शिवके द्वारा जो होना था, उसे हृदयसे जानकर शिवके आज्ञानुसार मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे कहने लगे— ॥५० ॥
विष्णु बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! आप धन्य हैं, आप तपस्याके भण्डार हैं और आपका हृदय भी बड़ा उदार है । हे मुने! जिसके भीतर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य नहीं होते, उसीके मनमें समस्त दुःखोंको देनेवाले काम, मोह आदि विकार शीघ्र उत्पन्न होते हैं । आप तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं और सदा ज्ञान - वैराग्यसे युक्त रहते हैं, फिर आपमें कामविकार कैसे आ सकता है । आप तो जन्मसे निर्विकार तथा शुद्ध बुद्धिवाले हैं ॥ ५१-५२ ॥
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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता (
कथं कामविकारी स्याज्जन्मनाविकृतः सुधीः ।
इत्याद्युक्तं वचो भूरि श्रुत्वा स मुनिसत्तमः ॥ ५३
विजहास हृदा नत्वा प्रत्युवाच वचो हरिम् । नारद उवाच किंप्रभावः स्मरः स्वामिन्कृपा यद्यस्ति ते मयि ॥ ५४ इत्युक्त्वा हरिमानम्य ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥ ५५ सृष्टिखण्ड ) २०३ श्रीहरिकी कही हुई बहुत - सी बातें सुनकर मुनिशिरोमणि नारदजी जोर - जोर से हँसने लगे और मन - ही - मन भगवान्को प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे - ॥ ५३१/२ ॥ नारदजी बोले – हे स्वामिन्! यदि मुझपर आपकी कृपा है, तब कामदेवका मेरे ऊपर क्या प्रभाव हो सकता है । ऐसा कहकर भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाकर इच्छानुसार विचरनेवाले नारदमुनि । वहाँसे चले गये॥५४-५५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदतपोवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें नारदतपोवर्णन नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित हुए नारदजीका भगवान् विष्णुसे उनका रूप माँगना, भगवान्का अपने रूपके साथ वानरका - सा मुँह देना, कन्याका भगवान्को वरण करना और कुपित हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते ।
अद्भुतेयं कथा तात वर्णिता कृपया हि नः ॥ १
मुनौ गते हरिस्तात किञ्चकार ततः परम् ।
नारदोऽपि गतः कुत्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सूतः पौराणिकोत्तमः ।
प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा नानासूतिकरं बुधः ॥ ३
सूत उवाच
मुनौ यदृच्छया विष्णुर्गते तस्मिन्हि नारदे ।
शिवेच्छया चकाराशु मायां मायाविशारदः ॥ ४
मुनिमार्गस्य मध्ये तु विरेचे नगरं महत् ।
शतयोजनविस्तारमद्भुतं सुमनोहरम् ॥
ऋषिगण बोले- हे सूत! हे सूत! हे महाभाग! हे व्यासशिष्य! आपको नमस्कार है । हे तात! कृपापूर्वक आपने हम सभीको जो कथा सुनायी है, यह निश्चित ही आश्चर्यजनक है ॥१ ॥
हे तात! मुनिके चले जानेके पश्चात् भगवान् विष्णुने क्या किया और नारदजी कहाँ गये? वह सब आप हमलोगोंको बतायें ॥२ ॥
व्यासजी बोले- उन ऋषियोंकी बात सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ तथा बुद्धिमान् सूतजी नाना प्रकारकी सृष्टि करनेवाले शिवका स्मरण करके कहने लगे— ॥ ३ ॥
सूतजी बोले – [ हे महर्षियो! ] उन नारदमुनिके इच्छानुसार वहाँसे चले जानेपर भगवान् शिवकी इच्छासे मायाविशारद श्रीहरिने तत्काल अपनी माया प्रकट की ॥४ ॥
उन्होंने मुनिके मार्गमें एक विशाल, सौ योजन विस्तारवाले, अद्भुत तथा अत्यन्त मनोहर नगरकी रचना की ॥५ ॥
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२०४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ स्वलोकादधिकं रम्यं नानावस्तुविराजितम् । भगवान्ने उसे अपने वैकुण्ठलोकसे भी नरनारीविहाराढ्यं चतुर्वर्णाकुलं परम् ॥ ६ अधिक रमणीय बनाया था । नाना प्रकारकी वस्तुएँ
तत्र राजा शीलनिधिर्नामैश्वर्यसमन्वितः ।
सुतास्वयम्वरोद्युक्तो महोत्सवसमन्वितः ॥
चतुर्दिग्भ्यः समायातैः संयुतं नृपनन्दनैः । नानावेषैः सुशोभैश्च तत्कन्यावरणोत्सुकैः
एतादृशं पुरं दृष्ट्वा मोहं प्राप्तोऽथ नारदः ।
कौतुकी तन्नृपद्वारं जगाम मदनैधितः ॥
आगतं मुनिवर्यं तं दृष्ट्वा शीलनिधिर्नृपः ।
उपवेश्यार्चयाञ्चक्रे रत्नसिंहासने वरे रे ॥ ।
अथ राजा स्वतनयां नामतः श्रीमतीं वराम् ।
नारदस्य समानीय पादयोः समपातयत् ॥
तत्कन्यां प्रेक्ष्य स मुनिर्नारदः प्राह विस्मितः ।
केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा प्राह कृताञ्जलिः ।
दुहितेयं मम मुने श्रीमती नाम नामतः ॥
प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषती शुभम् ।
सा स्वयम्वरसम्प्राप्ता सर्वलक्षणलक्षिता ॥
अस्या भाग्यं वद मुने सर्वं जातकमादरात् ।
कीदृशं तनयेयं मे वरमाप्स्यति तद्वद ॥
इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामिच्छुः कामविह्वलः । उस नगरकी शोभा बढ़ाती थीं । वहाँ स्त्रियों और पुरुषोंके लिये बहुत - से विहारस्थल थे । वह नगर चारों वर्णोंके लोगोंसे युक्त था ॥६ ॥
वहाँ शीलनिधि नामक ऐश्वर्यशाली राजा राज्य ७ करते थे । वे अपनी पुत्रीका स्वयंवर करनेके लिये उद्यत थे । अतः उन्होंने महान् उत्सवका आयोजन किया था । उनकी कन्याका वरण करनेके लिये ॥ ८ उत्सुक हो चारों दिशाओंसे बहुत - से राजकुमार आये थे, जो नाना प्रकारकी वेशभूषा तथा सुन्दर शोभासे प्रकाशित हो रहे थे । उन राजकुमारोंसे वह नगर भरा-पूरा दिखायी देता था ॥ ७-८ ॥ ऐसे राजनगरको देख नारदजी मोहित हो गये । ९ वे कौतुकी कामासक्त नारद राजा शीलनिधिके द्वारपर गये ॥ ९ ॥
मुनिश्रेष्ठ नारदको आया देखकर राजा १० शीलनिधिने उन्हें श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बिठाकर उनका पूजन किया ॥ १० ॥
तत्पश्चात् राजाने श्रीमती नामक ११ कन्याको बुलवाकर उससे नारदजीके करवाया ॥ ११ ॥
उस कन्याको देखकर नारदमुनि १२ और बोले — हे राजन्! यह देवकन्याके तथा महाभाग्यशालिनी कन्या कौन है उनकी यह बात सुनकर अपनी सुन्दरी चरणोंमें प्रणाम चकित हो गये समान सुन्दरी ? ॥ १२ ॥
राजाने हाथ १३ जोड़कर कहा - हे मुने! यह मेरी पुत्री है, इसका नाम श्रीमती है ॥ १३ ॥
अब इसके विवाहका समय आ गया है । यह १४ अपने लिये सुन्दर वर चुननेके निमित्त स्वयंवरमें जानेवाली । है । इसमें सब प्रकारके शुभ लक्षण लक्षित होते हैं ॥ १४ ॥
हे महर्षे! आप जन्मस्थ जातक ग्रहोंके अनुसार १५ इसका सम्पूर्ण भाग्य बतायें और यह मेरी पुत्री कैसा वर प्राप्त करेगी, यह भी कहें ॥ १५ ॥
राजाके इस प्रकार पूछनेपर कामसे विह्वल हुए मुनिश्रेष्ठ नारद उस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छा मनमें समाभाष्य स राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥ १६ लिये राजाको सम्बोधित करके यह वाक्य बोले- ॥ १६ ॥
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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २०५
सुतेयं तव भूपाल सर्वलक्षणलक्षिता ।
महाभाग्यवती धन्या लक्ष्मीरिव गुणालया ॥
सर्वेश्वरोऽजितो वीरो गिरीशसदृशो विभुः ।
अस्याः पतिर्ध्रुवं भावी कामजित्सुरसत्तमः ॥
इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य ययौ यादृच्छिको मुनिः ।
बभूव कामविवश: शिवमायाविमोहितः ॥
चित्ते विचिन्त्य स मुनिराप्नुयां कन्यकां कथम् ।
स्वयम्वरे नृपालानामेकं मां वृणुयात्कथम् ॥
सौन्दर्यं सर्वनारीणां प्रियं भवति सर्वथा ।
तद् दृष्ट्वैव प्रसन्ना सा स्ववशा नात्र संशयः ॥
विधायेत्थं विष्णुरूपं ग्रहीतुं मुनिसत्तमः ।
विष्णुलोकं जगामाशु नारदः स्मरविह्वलः ॥
प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह । हे भूपाल! आपकी यह पुत्री समस्त शुभ लक्षणोंसे १७ सम्पन्न, परम सौभाग्यवती, धन्य और साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति समस्त गुणोंकी आगार है । इसका पति निश्चय ही भगवान् शंकरके समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसीसे १८ पराजित न होनेवाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ होगा ॥ १७-१८ ॥ ऐसा कहकर राजासे विदा लेकर इच्छानुसार १ ९ विचरनेवाले नारदमुनि वहाँसे चल दिये । वे कामके वशीभूत हो गये थे । शिवकी मायाने उन्हें विशेष मोहमें डाल दिया था ॥१ ९ ॥ वे मुनि मन - ही - मन सोचने लगे कि मैं इस २० राजकुमारीको कैसे प्राप्त करूँ! स्वयंवरमें आये हुए नरेशोंमेंसे सबको छोड़कर यह एकमात्र मेरा ही वरण कैसे करे! ॥ २० ॥
समस्त नारियोंको सौन्दर्य सर्वथा प्रिय होता है । २१ सौन्दर्यको देखकर ही वह प्रसन्नतापूर्वक मेरे अधीन हो सकती है, इसमें संशय नहीं है । ऐसा विचारकर कामसे विह्वल हुए मुनिवर नारद भगवान् विष्णुका रूप ग्रहण करनेके २२ लिये तत्काल उनके लोकमें जा पहुँचे ॥ २१-२२ ॥ वहाँ भगवान् विष्णुको प्रणाम करके वे यह त्वां प्रवक्ष्यामि स्ववृत्तान्तमशेषतः ॥ २३ वचन बोले – [ हे भगवन्! ] मैं एकान्तमें आपसे रहसि
तथेत्युक्ते तथाभूते शिवेच्छाकार्यकर्तरि ।
ब्रूहीत्युक्तवति श्रीशे मुनिराह च केशवम् ॥
नारद उवाच त्वदीयो भूपतिः शीलनिधिः स वृषतत्परः । तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती वरवर्णिनी जगन्मोहिन्यभिख्याता त्रैलोक्येऽप्यतिसुन्दरी । परिणेतुमहं विष्णो तामिच्छाम्यद्य मा चिरम् स्वयम्वरं चकारासौ भूपतिस्तनयेच्छया चतुर्दिग्भ्यः समायाता राजपुत्राः सहस्रशः यदि दास्यसि रूपं मे तदा तां प्राप्नुयां ध्रुवम् त्वद्रूपं सा विना कण्ठे जयमालां न धास्यति अपना सारा वृत्तान्त कहूँगा ॥२३ ॥
तब ‘ बहुत अच्छा’– यह कहकर शिव - इच्छित २४ कर्म करनेवाले लक्ष्मीपति श्रीहरि नारदजीके साथ एकान्तमें जा बैठे और बोले- हे मुने! अब आप अपनी बात कहिये, तब केशवसे मुनि नारदजीने कहा ॥ २४ ॥
नारदजी बोले - हे भगवन्! आपके भक्त जो राजा शीलनिधि हैं, वे सदा धर्मपालनमें तत्पर रहते ॥ २५ हैं । उनकी एक विशाललोचना कन्या है, जो बहुत
ही सुन्दरी है । उसका नाम श्रीमती है ॥ २५ ॥
वह जगन्मोहिनीके रूपमें विख्यात है और तीनों ॥ २६ लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दरी है । हे विष्णो! आज मैं शीघ्र ही उस कन्यासे विवाह करना चाहता हूँ ॥ २६ ॥
। राजा शीलनिधिने अपनी पुत्रीकी इच्छासे स्वयंवर ॥ २७ रचाया है, इसलिये चारों दिशाओंसे वहाँ हजारों राजकुमार आये हुए हैं । यदि आप अपना रूप मुझे दे दें, तो मैं उसे । निश्चित ही प्राप्त कर लूँगा । आपके रूपके बिना वह ॥ २८ । मेरे कण्ठमें जयमाला नहीं डालेगी ॥ २७-२८ ॥
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२०६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३
स्वरूपं देहि मे नाथ सेवकोऽहं प्रियस्तव ।
वृणुयान्मां यथा सा वै श्रीमती क्षितिपात्मजा ॥ २ ९
सूत उवाच
वचः श्रुत्वा मुनेरित्थं विहस्य मधुसूदनः ।
शाङ्करीं प्रभुतां बुध्वा प्रत्युवाच दयापरः ॥ ३०
विष्णुरुवाच
स्वेष्टदेशं मुने गच्छ करिष्यामि हितं तव ।
भिषग्वरो यथार्तस्य यतः प्रियतरोऽसि मे ॥ ३१
इत्युक्त्वा मुनये तस्मै ददौ विष्णुर्मुखं हरेः ।
स्वरूपमनुगृह्यास्य तिरोधानं जगाम सः ॥ ३२
एवमुक्तो मुनिर्हृष्टः स्वरूपं प्राप्य वै हरेः ।
मेने कृतार्थमात्मानं तद्यत्नं न बुबोध स: ॥ ३३
अथ तत्र गतः शीघ्रं नारदो मुनिसत्तमः ।
चक्रे स्वयम्वरं यत्र राजपुत्रैः समाकुलम् ॥ ३४
स्वयम्वरसभा दिव्या राजपुत्रसमावृता ।
शुशुभेऽतीव विप्रेन्द्रा यथा शक्रसभापरा ॥ ३५
तस्यां नृपसभायां वै नारदः समुपाविशत् ।
स्थित्वा तत्र विचिन्त्येति प्रीतियुक्तेन चेतसा ॥ ३६
मां वरिष्यति नान्यं सा विष्णुरूपधरं ध्रुवम् ।
आननस्य कुरूपत्वं न वेद मुनिसत्तमः ॥ ३७
पूर्वरूपं मुनिं सर्वे ददृशुस्तत्र मानवाः ।
तद्भेदं बुबुधुस्ते न राजपुत्रादयो द्विजाः ॥ ३८
तत्र रुद्रगणौ द्वौ तद्रक्षणार्थं समागतौ ।
विप्ररूपधरौ गूढौ तद्भेदं जज्ञतुः परम् ॥ ३ ९
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मूढं मत्वा मुनिं तौ तन्निकटं जग्मतुर्गणौ ।
कुरुतस्तत्प्रहासं वै भाषमाणौ परस्परम् ॥ ४०
हे नाथ! मैं आपका प्रिय सेवक हूँ, अतः आप मुझे अपना स्वरूप दे दीजिये, जिससे वह राजकुमारी श्रीमती निश्चय ही मुझे वरण कर ले ॥ २ ९ ॥ सूतजी बोले – हे महर्षियो! नारदमुनिकी ऐसी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और शंकरके प्रभावका अनुभव करके उन दयालु प्रभुने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ३० ॥
विष्णु बोले - हे मुने! आप अपने अभीष्ट स्थानको जाइये, मैं उसी तरह आपका हितसाधन करूँगा, जैसे श्रेष्ठ वैद्य [ अत्यन्त ] पीड़ित रोगीका हित करता है; क्योंकि आप मुझे विशेष प्रिय हैं ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने नारदमुनिको मुख तो वानरका दे दिया और शेष अंगोंमें अपने - जैसा स्वरूप देकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ३२ ॥
भगवान्की पूर्वोक्त बात सुनकर और उनका मनोहर रूप प्राप्त हो गया - समझकर नारद मुनिको बड़ा हर्ष हुआ । वे अपनेको कृतकृत्य मानने लगे, किंतु भगवान्के प्रयत्नको वे समझ न सके ॥ ३३ ॥
तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ राजा शीलनिधिने राजकुमारोंसे भरी हुई स्वयंवरसभाका आयोजन किया था ॥ ३४ ॥
हे विप्रवरो! राजपुत्रोंसे घिरी हुई वह दिव्य स्वयंवरसभा दूसरी इन्द्रसभाके समान अत्यन्त शोभा पा रही थी ॥ ३५ ॥
नारदजी उस राजसभामें जा बैठे और वहाँ बैठकर प्रसन्न मनसे बार - बार यही सोचने लगे । मैं भगवान् विष्णुके समान रूप धारण किये हूँ, अत: वह राजकुमारी अवश्य मेरा ही वरण करेगी, दूसरेका नहीं । मुनिश्रेष्ठ नारदको यह ज्ञात नहीं था कि मेरा मुँह कुरूप है ॥ ३६-३७ ॥ हे विप्रो! उस सभा में बैठे हुए सभी मनुष्योंने मुनिको उनके पूर्वरूपमें ही देखा । राजकुमार आदि कोई भी उनके रूपपरिवर्तनके रहस्यको न जान सके ॥ ३८ ॥
वहाँ नारदजीकी रक्षाके लिये भगवान् रुद्रके दो गण आये थे, जो ब्राह्मणका रूप धारण करके गूढ़ भावसे वहाँ बैठे थे । वे ही नारदजीके रूपपरिवर्तनके उत्तम भेदको जानते थे । मुनिको कामावेशसे मूढ़ हुआ जानकर वे दोनों गण उनके निकट गये और आपस में बातचीत करते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे ॥ ३ ९ -४० ॥
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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २०७
पश्य नारदरूपं हि विष्णोरिव महोत्तमम् ।
मुखं तु वानरस्येव विकटं च भयङ्करम् ॥ ४१
इच्छत्ययं नृपसुतां वृथैव स्मरमोहितः ।
इत्युक्त्वा सच्छलं वाक्यमुपहासं प्रचक्रतुः ॥ ४२
न शुश्राव यथार्थं तु तद्वाक्यं स्मरविह्वलः ।
पर्यैक्षच्छ्रीमतीं तां वै तल्लिप्सुर्मोहितो मुनिः ॥ ४३
एतस्मिन्नन्तरे भूपकन्या चान्तःपुरात्तु सा ।
स्त्रीभिः समावृता तत्राजगाम वरवर्णिनी ॥ ४४
मालां हिरण्मयीं रम्यामादाय शुभलक्षणा ।
तत्र स्वयम्वरे रेजे स्थिता मध्ये रमेव सा ॥ ४५
बभ्राम सा सभां सर्वां मालामादाय सुव्रता ।
वरमन्वेषती तत्र स्वात्माभीष्टं नृपात्मजा ॥ ४६
वानरास्यं विष्णुतनुं मुनिं दृष्ट्वा चुकोप सा ।
दृष्टिं निवार्य च ततः प्रस्थिता प्रीतमानसा ॥ ४७
न दृष्ट्वा स्ववरं तत्र त्रस्तासीन्मनेप्सितम् ।
अन्तःसभास्थिता कस्मिन्नर्पयामास न स्रजम् ॥ ४८
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुराजगाम नृपाकृतिः ।
न दृष्टः कैश्चिदपरैः केवलं सा ददर्श हि ॥ ४ ९
अथ सा तं समालोक्य प्रसन्नवदनाम्बुजा ।
अर्पयामास तत्कण्ठे तां मालां वरवर्णिनी ॥५०
तामादाय ततो विष्णू राजरूपधरः प्रभुः ।
अन्तर्धानमगात्सद्यः स्वस्थानं प्रययौ किल ॥ ५१
सर्वे राजकुमाराश्च निराशाः श्रीमतीं प्रति । देखो, नारदका रूप तो निश्चित ही भगवान् विष्णुके समान श्रेष्ठ है, किंतु मुख वानरके समान विकट और महाभयंकर । काममोहित ये व्यर्थमें ही राजपुत्रीको प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहे हैं । इस प्रकारकी कपटपूर्ण बातें कहकर वे नारदका उपहास करने लगे ॥ ४१-४२ ॥ मुनि तो कामसे विह्वल थे, अतः उन्होंने उनकी यथार्थ बात भी अनसुनी कर दी । वे मोहित हो उस ' श्रीमती ' को प्राप्त करनेकी इच्छासे उसके आगमन की प्रतीक्षा करने लगे ॥ ४३ ॥
इसी बीच स्त्रियोंसे घिरी हुई वह सुन्दरी राजकन्या अन्तःपुरसे वहाँ आयी । अपने हाथमें सोनेकी सुन्दर माला लिये हुए वह शुभलक्षणा राजकुमारी स्वयंवरके मध्यभागमें लक्ष्मीके समान खड़ी हुई अपूर्व शोभा पा रही थी ॥ ४४-४५ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह भूपकन्या हाथमें माला लेकर अपने मनके अनुरूप वरका अन्वेषण करती हुई सारी सभामें भ्रमण करने लगी ॥ ४६ ॥
नारदमुनिका भगवान् विष्णुके समान शरीर और वानर - जैसा मुँह देखकर वह कुपित हो गयी और उनकी ओरसे दृष्टि हटाकर प्रसन्न मनसे दूसरी ओर चली गयी ॥४७ ॥
स्वयंवरसभामें अपने मनोवांछित वरको न देखकर वह दुःखित हो गयी । राजकुमारी उस सभाके भीतर चुपचाप खड़ी रह गयी और उसने किसीके गलेमें जयमाला नहीं डाली ॥ ४८ ॥
इतनेमें राजाके समान वेशभूषा धारण किये हुए भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे । किन्हीं दूसरे लोगोंने उनको वहाँ नहीं देखा, केवल उस कन्याने ही उन्हें देखा ॥ ४ ९ ॥ भगवान्को देखते ही उस परमसुन्दरी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा । उसने तत्काल ही उनके कण्ठमें वह माला पहना दी ॥५० ॥
राजाका रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु उस राजकुमारीको साथ लेकर तुरंत अदृश्य हो गये और अपने धाममें जा पहुँचे ॥५१ ॥
इधर, सब राजकुमार श्रीमतीकी ओरसे निराश हो गये । नारदमुनि तो कामवेदनासे आतुर हो रहे थे,
मुनिस्तु विह्वलोऽतीव बभूव मदनातुरः ॥ ५२ । इसलिये वे अत्यन्त विह्वल हो उठे ॥५२ ॥
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२०८ तदा तावूचतुः सद्यो नारदं स्मरविह्वलम् विप्ररूपधरौ रुद्रगणौ ज्ञानविशारदौ ॥ गणावूचतुः हे नारद मुने त्वं हि वृथा मदनमोहितः तल्लिप्सुः स्वमुखं पश्य वानरस्येव गर्हितम् ॥ सूत उवाच
इत्याकर्ण्य तयोर्वाक्यं नारदो विस्मितोऽभवत् ।
मुखं ददर्श मुकुरे शिवमायाविमोहितः ॥
स्वमुखं वानरस्येव दृष्ट्वा चुक्रोध सत्वरम् ।
शापं ददौ तयोस्तत्र गणयोर्मोहितो मुनिः ॥
युवां ममोपहासं वै चक्रतुर्ब्राह्मणस्य हि ।
भवेतां राक्षसौ विप्रवीर्यजौ वै तदाकृती ॥
श्रुत्वा हरगणावित्थं स्वशापं ज्ञानिसत्तमौ ।
न किञ्चिदूचतुस्तौ हि मुनिमाज्ञाय मोहितम् ॥
स्वस्थानं जग्मतुर्विप्रा उदासीनौ शिवस्तुतिम् ।
चक्रतुर्मन्यमानौ वै शिवेच्छां सकलां सदा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । तब वे दोनों विप्ररूपधारी ज्ञानविशारद रुद्रगण ५३ कामविह्वल नारदजीसे कहने लगे -॥५३ ॥
गण बोले- हे नारद! हे मुने! आप व्यर्थ ही । । कामसे मोहित हो रहे हैं और [ सौन्दर्यके बलसे ] ५४ राजकुमारीको पाना चाहते हैं । वानरके समान अपना घृणित मुँह तो देख लीजिये ॥ ५४ ॥
सूतजी बोले – हे महर्षियो! उन रुद्रगणोंका यह वचन सुनकर नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ । वे ५५ शिवकी मायासे मोहित थे । उन्होंने दर्पणमें अपना मुँह देखा ॥ ५५ ॥
वानरके समान अपना मुँह देखकर वे तुरंत ५६ ही कुपित हो उठे और मायासे मोहित होनेके कारण उन दोनों शिवगणोंको वहाँ यह शाप दे दिया - तुम दोनोंने मुझ ब्राह्मणका उपहास किया है, अतः तुम ५७ दोनों ब्राह्मणके वीर्यसे उत्पन्न राक्षस हो जाओ । [ ब्राह्मणकी सन्तान होनेपर भी ] तुम्हारे आकार राक्षसके समान ही होंगे॥५६-५७ ॥ इस प्रकार अपने लिये शाप सुनकर ज्ञानियोंमें ५८ श्रेष्ठ वे दोनों शिवगण मुनिको मोहित जानकर कुछ नहीं बोले ॥ ५८ ॥
हे ब्राह्मणो! वे सदा सब घटनाओंमें भगवान् शिवकी इच्छा मानते थे, अतः उदासीन भावसे अपने स्थानको चले गये और भगवान् शिवकी स्तुति करने ५ ९ | लगे ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदमोहवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके सृष्टिखण्डमें नारदमोहवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना, फिर मायाके दूर जानेपर पश्चात्तापपूर्वक भगवान्के चरणोंमें गिरना और शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका उन्हें समझा - बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और शिवके भजनका उपदेश देना ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले- हे महाप्राज्ञ! हे सूत! आपने सूत सूत महाप्राज्ञ वर्णिता ह्यद्भुता कथा । बड़ी अद्भुत कथाका वर्णन किया है । भगवान् शंकरकी धन्या तु शाम्भवी माया तदधीनं चराचरम् ॥ १ माया धन्य है । यह चराचर जगत् उसीके अधीन है ॥ १ ॥