शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 31–40
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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अ ० ४ ]
सर्वेषां श्रेयसां बीजं सत्कथाश्रवणं नृणाम् ।
यथावर्त्म समाराध्यं भवबन्धगदापहम् ॥
कथाश्रवणतः शम्भोर्मननाच्च ततो हृदा ।
निदिध्यासनतश्चैव चित्तशुद्धिर्भवत्यलम् ॥
अतो भक्तिर्महेशस्य पुत्राभ्यां भवति ध्रुवम् ।
तदनुग्रहतो दिव्या ततो मुक्तिर्न संशयः ॥
तद्विहीनः पशुर्ज्ञेयो मायाबन्धनसक्तधीः ।
संसारबन्धनान्नैव मुक्तो भवति स ध्रुवम् ॥
अतो हि द्विजपनि त्वं विषयेभ्यो निवृत्तधीः ।
शृणु शम्भोः कथां चैतां भक्त्या परमपावनीम् ॥
शृण्वन्त्याः सत्कथामेतां शङ्करस्य परात्मनः ।
शुद्धिमेष्यति चेतस्ते ततो मुक्तिमवाप्स्यसि ॥
ध्यायतः शिवपादाब्जं चेतसा निर्मलेन वै ।
एकेन जन्मना मुक्तिः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा स द्विजवरो वरः शैवः कृपार्द्रधीः ।
तूष्णीं बभूव शुद्धात्मा शिवध्यानपरायणः ॥
अथ बिन्दुगपत्नी सा चञ्चलाह्वा प्रसन्नधीः ।
इत्युक्ता तेन विप्रेण समासीद्बाष्पलोचना ॥
पपातारं द्विजेन्द्रस्य पादयोस्तस्य हृष्टधीः ।
चञ्चला साञ्जलिः सा च कृतार्थास्मीत्यभाषत ॥
अथ सोत्थाय सातङ्का साञ्जलिर्गद्गदाक्षरम् ।
तमुवाच महाशैवं द्विजं वैराग्ययुक् सुधीः ॥
माहात्म्य २७ इस उत्तम कथाका श्रवण समस्त मनुष्योंके लिये १५ कल्याणका बीज है । अतः यथोचित ( शास्त्रोक्त ) मार्गसे इसकी आराधना अथवा सेवा करनी चाहिये । यह कथा - श्रवण भव - बन्धनरूपी रोगका नाश करनेवाला १६ है । भगवान् शिवकी कथाको सुनकर फिर अपने हृदयमें उसका मनन एवं निदिध्यासन करनेसे पूर्णतया चित्तशुद्धि हो जाती है । चित्तशुद्धि होनेसे महेश्वरकी १७ भक्ति अपने दोनों पुत्रों ( ज्ञान और वैराग्य ) -के साथ निश्चय ही प्रकट होती है । तत्पश्चात् महेश्वरके अनुग्रहसे दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है । जो शिवभक्तिसे वंचित है, उसे पशु समझना १८ चाहिये; क्योंकि उसका चित्त मायाके बन्धनमें आसक्त है । वह निश्चय ही संसारबन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता ॥ १५–१८ ॥ हे ब्राह्मणपत्नी! इसलिये तुम विषयोंसे मनको १ ९ हटा लो और भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी इस परम पावन कथाको सुनो । परमात्मा शंकरकी इस कथाको सुननेसे तुम्हारे चित्तकी शुद्धि होगी और उससे तुम्हें २० मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी । निर्मल चित्तसे भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करनेवालेकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है — यह मैं तुमसे सत्य - सत्य २१ कहता हूँ ॥१ ९ –२१ ॥ सूतजी बोले - शौनक! इतना कहकर वे श्रेष्ठ शिवभक्त ब्राह्मण मौन हो गये । उनका हृदय करुणासे २२ आर्द्र हो गया था । वे शुद्धचित्त महात्मा भगवान् शिवके ध्यानमें मग्न हो गये ॥२२ ॥
तदनन्तर बिन्दुगकी पत्नी चंचुला मन - ही - मन २३ प्रसन्न हो उठी । ब्राह्मणका उक्त उपदेश सुनकर उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये थे । वह ब्राह्मणपत्नी चंचुला हर्षित हृदयसे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके २४ चरणोंमें गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली— ' मैं कृतार्थ हो गयी ' ॥ २३-२४ ॥ तत्पश्चात् उठकर वैराग्ययुक्त तथा उत्तम बुद्धिवाली वह स्त्री, जो अपने पापोंके कारण आतंकित थी, उन महान् शिवभक्त ब्राह्मणसे हाथ जोड़कर २५ । गद्गद वाणीमें कहने लगी ॥२५ ॥
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२८ चञ्चुलोवाच ब्रह्मन् शैववर स्वामिन् धन्यस्त्वं परमार्थदृक् परोपकारनिरतो वर्णनीयः सुसाधुषु उद्धरोद्धर मां साधो पतन्तीं नरकार्णवे श्रुत्वा यां सुकथां शैवीं पुराणार्थविजृम्भिताम् विरक्तधीरहं जाता विषयेभ्यश्च सर्वतः सुश्रद्धा महती ह्येतत्पुराणश्रवणेऽधुना सूत उवाच इत्युक्त्वा साञ्जलिः सा वै सम्प्राप्य तदनुग्रहम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ चंचुला बोली - हे ब्रह्मन्! हे शिवभक्तोंमें । श्रेष्ठ! हे स्वामिन्! आप धन्य हैं, परमार्थदर्शी हैं और ॥ २६ सदा परोपकारमें लगे रहते हैं, इसलिये आप श्रेष्ठ साधु पुरुषोंमें प्रशंसाके योग्य हैं । हे साधो! मैं नरकके । समुद्रमें गिर रही हूँ । आप मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार ॥ २७ कीजिये । पौराणिक अर्थतत्त्वसे सम्पन्न जिस सुन्दर शिवपुराणकी कथाको सुनकर मेरे मनमें सम्पूर्ण । विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न हो गया, उसी इस शिवपुराणको ॥ २८ सुननेके लिये इस समय मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा हो रही है॥२६–२८ ॥ सूतजी बोले- ऐसा कहकर हाथ जोड़ उनका अनुग्रह पाकर चंचुला उस शिवपुराणकी कथाको तत्पुराणं श्रोतुकामातिष्ठत्तत्सेवने रता ॥ २ ९ सुननेकी इच्छा मनमें लिये उन ब्राह्मणदेवताकी सेवामें
अथ शैववरो विप्रस्तस्मिन्नेव स्थले सुधीः ।
सत्कथां श्रावयामास तत्पुराणस्य तां स्त्रियम् ॥
इत्थं तस्मिन् महाक्षेत्रे तस्मादेव द्विजोत्तमात् ।
कथां शिवपुराणस्य सा शुश्राव महोत्तमाम् ॥
भक्तिज्ञानविरागाणां वर्धिनीं मुक्तिदायिनीम् ।
बभूव सुकृतार्था सा श्रुत्वा तां सत्कथां पराम् ॥
सद्गुरोस्तस्य कृपया शुद्धचित्ता च सा द्रुतम् ।
शिवानुग्रहतः शम्भोः रूपध्यानमवाप ह ॥
इत्थं सद्गुरुमाश्रित्य सा प्राप्तशिवसन्मतिः ।
दध्यौ मुहुर्मुहुः शम्भोश्चिदानन्दमयं वपुः ॥
स्नात्वा तीर्थजले नित्यं जटावल्कलधारिणी ।
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गी रुद्राक्षकृतभूषणा ॥
शिवनामजपासक्ता वाग्यता मितभोजना ।
गुरूपदिष्टमार्गेण सा शिवं समतोषयत् ॥
एवं तस्याश्चञ्चलायाः कुर्वन्त्या ध्यानमुत्तमम् ।
बहुकालो व्यतीयाय शम्भोस्तत्रैव शौनक ॥
तत्पर हो वहाँ रहने लगी ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ और शुद्ध ३० बुद्धिवाले उन ब्राह्मणदेवताने उसी स्थानपर उस स्त्रीको शिवपुराणकी उत्तम कथा सुनायी ॥ ३० ॥
इस प्रकार उस [ गोकर्ण नामक ] महाक्षेत्रमें उन्हीं ३१ श्रेष्ठ ब्राह्मणसे उसने शिवपुराणकी वह परम उत्तम कथा सुनी, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको बढ़ानेवाली तथा मुक्ति देनेवाली है । उस परम उत्तम कथाको सुनकर ३२ वह ब्राह्मणपत्नी अत्यन्त कृतार्थ हो गयी ॥ ३१-३२ ॥ उन सद्गुरुकी कृपासे उसका चित्त शीघ्र ही ३३ शुद्ध हो गया, भगवान् शिवके अनुग्रहसे उसके हदयमें शिवके सगुणरूपका चिन्तन होने लगा ॥ ३३ ॥
इस प्रकार सद्गुरुका आश्रय लेकर उसने ३४ भगवान् शिवमें लगी रहनेवाली उत्तम बुद्धि पाकर शिवके सच्चिदानन्दमय स्वरूपका बारंबार चिन्तन आरम्भ किया ॥३४ ॥
वह प्रतिदिन तीर्थके जलमें स्नान करके जटा ३५ और वल्कल धारण करने लगी तथा समूची देहमें भस्म लगाकर रुद्राक्षके आभूषण धारण करने लगी । वह भगवान् शिवके नामजपमें लगी रहती थी, ३६ संयमित वाणी और अल्पाहार करते हुए गुरुके बताये मार्गसे वह शिवजीको प्रसन्न करने लगी । हे शौनक! इस प्रकार शम्भुका उत्तम ध्यान करते हुए उस ३७ । चंचुलाका बहुत - सा समय बीत गया ॥ ३५-३७ ॥
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अ ० ४ ] माहात्म्य २ ९
अथ कालेन पूर्णेन भक्तित्रिकसमन्विता ।
समुत्ससर्ज देहं स्वमनायासेन चञ्चला ॥ ३८
विमानं द्रुतमायान्तं प्रेषितं त्रिपुरारिणा ।
दिव्यं स्वगणसंयुक्तं नानाशोभासमन्वितम् ॥ ३ ९
अथ तत्र समारूढा महेशानुचरैर्वरैः ।
नीता शिवपुरीं सद्यो ध्वस्तसर्वमला च सा ॥ ४०
दिव्यरूपधरा दिव्या दिव्यावयवशालिनी ।
चन्द्रार्धशेखरा गौरी विलसद्दिव्यभूषणा ॥ ४१
गत्वा तत्र महादेवं सा ददर्श त्रिलोचनम् ।
विष्णुब्रह्मादिभिर्देवैः सेव्यमानं सनातनम् ॥ ४२
गणेशभृङ्गिनन्दीशवीरभद्रेश्वरादिभिः उपास्यमानं सद्भक्त्या कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ ४३
नीलग्रीवं पञ्चवक्त्रं त्र्यम्बकं चन्द्रशेखरम् ।
वामाङ्गे बिभ्रतं गौरीं विद्युत्पुञ्जसमप्रभाम् ॥ ४४
कर्पूरगौरं गौरीशं सर्वालङ्कारधारिणम् ।
सितभस्मलसद्देहं सितवस्त्रं महोज्ज्वलम् ॥ ४५
दृष्ट्वैवं शङ्करं नारी सा मुमोदाति चञ्चला ।
सुसम्भ्रमान्महाप्रीता प्रणनाम पुनः पुनः ॥ ४६
साञ्जलिः सामुदा प्रेम्णा ' सन्तुष्टा च विनीतका ।
आनन्दाश्रुजलैर्युक्ता रोमहर्षसमन्विता ॥ ४७
अथ सा वै करुणया पार्वत्या शङ्करेण च ।
समानीतोपकण्ठं हि सुदृष्ट्या च विलोकिता ॥ ४८
तत्पश्चात् समयके पूर्ण होनेपर भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे युक्त हुई चंचुलाने अपने शरीरको बिना किसी कष्टके त्याग दिया ॥३८ ॥
इतनेमें ही त्रिपुरशत्रु भगवान् शिवका भेजा हुआ एक दिव्य विमान द्रुत गतिसे वहाँ पहुँचा, जो उनके अपने गणोंसे संयुक्त और भाँति - भाँतिके शोभा साधनोंसे सम्पन्न था । चंचुला उस विमानपर आरूढ़ हुई और भगवान् शिवके श्रेष्ठ पार्षदोंने उसे तत्काल शिवपुरीमें पहुँचा दिया । उसके सारे मल धुल गये थे । वह दिव्यरूपधारिणी दिव्यांगना हो गयी थी । उसके दिव्य अवयव उसकी शोभा बढ़ाते थे । मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण किये वह गौरांगी देवी शोभाशाली दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी ॥३ ९ –४१ ॥ वहाँ पहुँचकर उसने त्रिनेत्रधारी महादेवजीको देखा । ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता उन सनातन शिवकी सेवा कर रहे थे । गणेश, भृंगी, नन्दीश, वीरभद्रेश्वर आदि गण उत्तम भक्तिके साथ उनकी उपासना कर रहे थे । उनकी अंगकान्ति करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी । कण्ठमें नील चिह्न शोभा पाता था । उनके पाँच मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन - तीन नेत्र थे । मस्तकपर अर्धचन्द्राकार मुकुट शोभा देता था । उन्होंने अपने वामांगमें गौरी देवीको बिठा रखा था, जो विद्युत् - पुंजके समान प्रकाशित थीं । गौरीपति महादेवजीकी कान्ति कपूरके समान गौर थी । उन्होंने सभी अलंकार धारण कर रखे थे, उनका सारा शरीर श्वेत भस्मसे भासित था । शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे । वे अत्यन्त उज्ज्वल वर्णके थे ॥ ४२-४५ ॥ इस प्रकार परम उज्ज्वल भगवान् शंकरका दर्शन करके वह ब्राह्मणपत्नी चंचुला बहुत प्रसन्न हुई । अत्यन्त प्रीतियुक्त होकर उसने बड़ी उतावलीके साथ भगवान्को बारंबार प्रणाम किया । फिर हाथ जोड़कर वह बड़े प्रेम, आनन्द और सन्तोषसे युक्त हो विनीतभावसे खड़ी हो गयी । उसके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओंकी अविरल धारा बहने लगी तथा सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो गया । उस समय भगवती पार्वती और भगवान् शंकरने उसे बड़ी करुणाके साथ अपने पास बुलाया । और सौम्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा । पार्वतीजीने तो
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३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ पार्वत्या सा कृता प्रीत्या स्वसखी दिव्यरूपिणी । दिव्यरूपधारिणी बिन्दुगप्रिया चंचुलाको प्रेमपूर्वक दिव्यसौख्यान्विता तत्र चञ्चला बिन्दुगप्रिया ॥ ४ ९ अपनी सखी बना लिया । वह उस परमानन्दघन ज्योतिःस्वरूप सनातनधाममें अविचल निवास पाकर तस्मिँल्लोके परानन्दघनज्योतिषि शाश्वते । दिव्य सौख्यसे सम्पन्न हो अक्षय सुखका अनुभव
लब्ध्वा निवासमचलं लेभे सुखमनाहतम् ॥ ५० । करने लगी ॥ ४६–५० ॥
इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये चञ्चलासद्गतिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें चंचुलासद्गतिवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः चंचुलाके प्रयत्नसे पार्वतीजीकी आज्ञा पाकर तुम्बुरुका विन्ध्यपर्वतपर शिवपुराणकी कथा सुनाकर बिन्दुगका पिशाचयोनिसे उद्धार करना तथा उन दोनों दम्पतीका शिवधाममें सुखी होना शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः ।
श्रावितेयं कथास्माकमद्भुता भक्तिवर्धिनी ॥
तत्र गत्वा किं चकार चञ्चला प्राप्तसद्गतिः ।
तत् त्वं वद विशेषेण तत्पतेश्च महामते ॥
सूत उवाच
सा कदाचिदुमां देवीमुपगम्य प्रणम्य च ।
सुतुष्टाव करौ बद्ध्वा परमानन्दसम्प्लुता ॥
चञ्चलोवाच
गिरिजे स्कन्दमातस्त्वं सेविता सर्वदा नरैः ।
सर्वसौख्यप्रदे शम्भुप्रिये ब्रह्मस्वरूपिणि ॥
विष्णुब्रह्मादिभिस्सेव्या सगुणा निर्गुणापि च ।
त्वमाद्या प्रकृतिस्सूक्ष्मा सच्चिदानन्दरूपिणी ॥
सृष्टिस्थितिलयकरी त्रिगुणा त्रिसुरालया ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां सुप्रतिष्ठाकरा परा ॥
सूत उवाच
इति स्तुत्वा महेशीं तां चञ्चला प्राप्तसद्गतिः ।
विरराम नतस्कन्धा प्रेमपूर्णाश्रुलोचना ॥
शौनकजी बोले- हे महाभाग सूतजी! आप धन्य हैं, आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें लगी हुई है । आपने १ कृपापूर्वक यह शिवभक्तिको बढ़ानेवाली अद्भुत कथा हमें सुनायी । हे महामते! सद्गति प्राप्त करनेके बाद वहाँ जाकर चंचुलाने क्या किया और उसके पतिका क्या २ हुआ; यह सब वृत्तान्त विस्तारसे हमें बताइये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे शौनक! एक दिन परमानन्दमें निमग्न हुई चंचुलाने उमादेवीके पास जाकर प्रणाम ३ किया और दोनों हाथ जोड़कर वह उनकी स्तुति करने लगी ॥ ३ ॥
चंचुला बोली- हे गिरिराजनन्दिनी! हे स्कन्दमाता! मनुष्योंने सदा आपकी सेवा की है । समस्त ४ सुखोंको देनेवाली हे शम्भुप्रिये! हे ब्रह्मस्वरूपिणि! आप विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेव्य हैं । आप ही सगुणा और निर्गुणा भी हैं तथा आप ही सूक्ष्मा सच्चिदानन्द-५ स्वरूपिणी आद्या प्रकृति हैं । आप ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हैं । तीनों गुणोंका आश्रय भी आप ही हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर - इन तीनों ६ देवताओंका आवास - स्थान तथा उनकी उत्तम प्रतिष्ठा करनेवाली पराशक्ति आप ही हैं ॥ ४–६ ॥ सूतजी बोले- हे शौनक! जिसे सद्गति प्राप्त हो चुकी थी, वह चंचुला इस प्रकार महेश्वरपत्नी उमाकी स्तुति करके सिर झुकाये चुप हो गयी । उसके ७ नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये थे ॥७ ॥
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अ ० ५ ]
ततः सा करुणाविष्टा पार्वती शङ्करप्रिया ।
तामुवाच महाप्रीत्या चञ्चलां भक्तवत्सला ॥
पार्वत्युवाच
चञ्चले सखि सुप्रीतानया स्तुत्यास्मि सुन्दरि ।
किं याचसे वरं ब्रूहि नादेयं विद्यते तव ॥
सूत उवाच
इत्युक्ता सा गिरिजया चञ्चला सुप्रणम्य ताम् ।
पर्यपृच्छत सुप्रीत्या साञ्जलिर्नतमस्तका ॥
चञ्चुलोवाच
मम भर्ताधुना क्वास्ते नैव जानामि तद्गतिम् ।
तेन युक्ता यथाहं वै भवामि गिरिजेऽनघे ॥
तथैव कुरु कल्याणि कृपया दीनवत्सले ।
महादेवि महेशानि भर्ता मे वृषलीपतिः ।
मत्तः पूर्वं मृतः पापी न जाने कां गतिं गतः ॥
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याश्चञ्चलाया हि पार्वती ।
प्रत्युवाच सुसम्प्रीत्या गिरिजा नयवत्सला ॥
गिरिजोवाच
सुते भर्ता बिन्दुगाह्रो महापापी दुराशयः ।
वेश्याभोगी महामूढो मृत्वा स नरकं गतः ॥
भुक्त्वा नरकदुःखानि विविधान्यमिताः समाः ।
पापशेषेण पापात्मा विन्ध्ये जातः पिशाचकः ॥
इदानीं स पिशाचोऽस्ति नानाक्लेशसमन्वितः ।
तत्रैव वातभुग्दुष्टः सर्वकष्टवहः सदा ॥
सूत उवाच
इति गौर्या वचः श्रुत्वा चञ्चला सा शुभव्रता ।
पतिदुःखेन महता दुःखितासीत्तदा किल ॥
समाधाय ततश्चित्तं सुप्रणम्य महेश्वरीम् ।
पुनः पप्रच्छ सा नारी हृदयेन विदूयता ॥
माहात्म्य ३१ तब करुणासे भरी हुई शंकरप्रिया भक्तवत्सला ८ पार्वतीदेवी चंचुलाको सम्बोधित करके बड़े प्रेमसे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ ८ ॥
पार्वती बोलीं- हे सखी चंचुले! हे सुन्दरि! मैं तुम्हारी की हुई इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ । बोलो, ९ क्या वर माँगती हो? तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है॥९॥
सूतजी बोले- पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर चंचुला उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर १० नतमस्तक हो प्रेमपूर्वक पूछने लगी —॥१० ॥
चंचुला बोली - हे निष्पाप गिरिराजकुमारी! मेरे पति बिन्दुग इस समय कहाँ हैं, उनकी कैसी गति ११ हुई है - यह मैं नहीं जानती! कल्याणमयी दीनवत्सले! मैं अपने उन पतिदेवसे जिस प्रकार संयुक्त हो सकूँ, कृपा करके वैसा ही उपाय कीजिये । हे महेश्वरि! हे महादेवि! मेरे पति एक शूद्रजातीय वेश्याके प्रति १२ आसक्त थे और पापमें ही डूबे रहते थे । उनकी मृत्यु मुझसे पहले ही हो गयी थी । वे न जाने किस गतिको प्राप्त हुए हैं॥११-१२ ॥ सूतजी बोले- चंचुलाका यह वचन सुनकर नीतिवत्सला हिमालयपुत्री देवी पार्वतीने अत्यन्त प्रेमपूर्वक १३ । यह उत्तर दिया- ॥ १३ ॥
गिरिजा बोलीं- हे सुते! तुम्हारा बिन्दुग नामवाला पति बड़ा पापी था । उसका अन्त: करण १४ बड़ा ही दूषित था । वेश्याका उपभोग करनेवाला वह महामूढ़ मरनेके बाद नरकमें पड़ा; अगणित वर्षोंतक नरकमें नाना प्रकारके दुःख भोगकर वह पापात्मा १५ अपने शेष पापको भोगनेके लिये विन्ध्यपर्वतपर पिशाच हुआ है । इस समय वह पिशाचकी अवस्थामें ही है और नाना प्रकारके क्लेश उठा रहा है । वह १६ दुष्ट वहीं वायु पीकर रहता है और सदा सब प्रकारके कष्ट सहता है॥१४–१६ ॥ सूतजी बोले- हे शौनक! गौरीदेवीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह चंचुला १७ उस समय पतिके महान् दुःखसे दुखी हो गयी । फिर मनको स्थिर करके उस ब्राह्मणपत्नीने व्यथित हृदयसे १८ महेश्वरीको प्रणाम करके पुनः पूछा— ॥ १७-१८ ॥
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३२ चञ्चुलोवाच महेश्वरि महादेवि कृपां कुरु ममोपरि समुद्धर पतिं मेऽद्य दुष्टकर्मकरं खलम् केनोपायेन मे भर्ता पापात्मा स कुबुद्धिमान् सद्गतिं प्राप्नुयाद्देवि तद्वदाशु नमोऽस्तु ते सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पार्वती भक्तवत्सला ।
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा चञ्चलां स्वसखीं च ताम् ॥
पार्वत्युवाच
शृणुयाद्यदि ते भर्ता पुण्यां शिवकथां पराम् ।
निस्तीर्य दुर्गतिं सर्वां सद्गतिं प्राप्नुयादिति ॥
इति गौर्या वचः श्रुत्वामृताक्षरमथादरात् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ चंचुला बोली - हे महेश्वरि! हे महादेवि! । मुझपर कृपा कीजिये और दूषित कर्म करनेवाले मेरे ॥ १ ९ उस दुष्ट पतिका अब उद्धार कर दीजिये । हे देवि! कुत्सित बुद्धिवाले मेरे उस पापात्मा पतिको किस । उपायसे उत्तम गति प्राप्त हो सकती है, यह शीघ्र ॥ २० बताइये । आपको नमस्कार है ॥ १ ९ -२० ॥ सूतजी बोले – - उसकी यह बात सुनकर भक्तवत्सला पार्वतीजी अपनी सखी चंचुलासे प्रसन्न २१ होकर ऐसा कहने लगीं ॥ २१ ॥
पार्वतीजी बोलीं- तुम्हारा पति यदि शिवपुराणकी पुण्यमयी उत्तम कथा सुने तो सारी दुर्गतिको पार करके वह उत्तम गतिका भागी हो सकता है ॥ २२ ॥
२२ अमृतके समान मधुर अक्षरोंसे युक्त गौरीदेवीका यह वचन आदरपूर्वक सुनकर चंचुलाने हाथ जोड़कर कृताञ्जलिर्नतस्कन्धा प्रणनाम पुनः पुनः ॥ २३ मस्तक झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अपने
तत्कथाश्रवणं भर्तुः सर्वपापविशुद्धये ।
सद्गतिप्राप्तये चैव प्रार्थयामास तां तदा ॥
सूत उवाच
तया मुहुर्मुहुर्नार्या प्रार्थ्यमाना शिवप्रिया ।
गौरी कृपान्वितासीत् सा महेशी भक्तवत्सला ॥
अथ तुम्बुरुमाहूय शिवसत्कीर्तिगायकम् ।
प्रीत्या गन्धर्वराजं हि गिरिकन्येदमब्रवीत् ॥
गिरिजोवाच
हे तुम्बुरो शिवप्रीत मम मानसकारक ।
सहानया विन्ध्यशैलं भद्रं ते गच्छ सत्वरम् ॥
आस्ते तत्र महाघोरः पिशाचोऽतिभयङ्करः ।
तद्वृत्तं शृणु सुप्रीत्यादितः सर्वं ब्रवीमि ते ॥
पुराभवे पिशाचः स बिन्दुगाह्वोऽभवद् द्विजः ।
अस्या नार्याः पतिर्दुष्टो मत्सख्या वृषलीपतिः ॥
स्नानसन्ध्याक्रियाहीनोऽशौचः क्रोधविमूढधीः ।
दुर्भक्षी सज्जनद्वेषी दुष्परिग्रहकारकः ॥
पतिके समस्त पापोंकी शुद्धि तथा उत्तम गतिकी प्राप्तिके लिये पार्वतीदेवीसे यह प्रार्थना की कि मेरे पतिको २४ शिवपुराण सुनानेकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २३-२४ ॥ सूतजी बोले – उस ब्राह्मणपत्नीके बारंबार प्रार्थना करनेपर शिवप्रिया गौरीदेवीको बड़ी दया २५ आयी । उन भक्तवत्सला महेश्वरी गिरिराजकुमारीने भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका गान करनेवाले गन्धर्वराज तुम्बुरुको बुलाकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस २६ प्रकार कहा- ॥ २५-२६ ॥ गिरिजा बोलीं- मेरे मनकी बातोंको जानकर मेरे अभीष्ट कार्योंको सिद्ध करनेवाले तथा शिवमें २७ प्रीति रखनेवाले हे तुम्बुरो! [ मैं तुमसे एक बात कहती हूँ । ] तुम्हारा कल्याण हो । तुम मेरी इस सखीके साथ शीघ्र ही विन्ध्यपर्वतपर जाओ । वहाँ एक महाघोर २८ और भयंकर पिशाच रहता है । उसका वृत्तान्त तुम आरम्भसे ही सुनो । मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ बताती हूँ॥२७-२८ ॥ पूर्वजन्ममें वह पिशाच बिन्दुग नामक ब्राह्मण था । २ ९ वह मेरी इस सखी चंचुलाका पति था । परंतु वह दुष्ट वेश्यागामी हो गया । स्नान - सन्ध्या आदि नित्यकर्म छोड़कर वह अपवित्र रहने लगा । क्रोधके कारण उसकी बुद्धिपर ३० मूढ़ता छा गयी थी । वह कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं
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Impl देवताओं और मुनियोंद्वारा शिवस्तुति 2223
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जगमाथ आश्चर सतीज
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000 शंकर -गौरी गुफामें
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भगवान पार्वतीजी और सप्तर्षि