श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 221–230
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २० ९
गतयोर्गणयोः शम्भोः स्वयमात्मेच्छया विभोः ।
किञ्चकार मुनिः क्रुद्धो नारदः स्मरविह्वलः ॥
सूत उवाच
विमोहितो मुनिर्दत्त्वा तयोः शापं यथोचितम् ।
जले मुखं निरीक्ष्याथ स्वरूपं गिरिशेच्छया ॥
शिवेच्छया न प्रबुद्धः स्मृत्वा हरिकृतच्छलम् ।
क्रोधं दुर्विषहं कृत्वा विष्णुलोकं जगाम ह ॥
उवाच वचनं क्रुद्धः समिद्ध इव पावकः ।
दुरुक्तिगर्भितं व्यङ्गं नष्टज्ञानः शिवेच्छया ॥
नारद उवाच
हे हरे त्वं महादुष्टः कपटी विश्वमोहनः ।
परोत्साहं न सहसे मायावी मलिनाशयः ॥
मोहिनीरूपमादाय कपटं कृतवान्पुरा ।
असुरेभ्योऽपाययस्त्वं वारुणीममृतं न हि ॥
चेत्पिबेन्न विषं रुद्रो दयां कृत्वा महेश्वरः ।
भवेन्नष्टाखिला माया तव व्याजरते हरे ॥
गतिः सकपटा तेऽतिप्रिया विष्णो विशेषतः ।
साधुस्वभावो न भवान्स्वतन्त्रः प्रभुणा कृतः ॥
कृतं समुचितं नैव शिवेन परमात्मना ।
तत्प्रभावबलं ध्यात्वा स्वतन्त्रकृतिकारकः ॥
त्वद्गतिं सुसमाज्ञाय पश्चात्तापमवाप सः ।
विप्रं सर्वोपरि प्राह स्वोक्तवेदप्रमाणकृत् ॥
तज्ज्ञात्वाहं हरे त्वाद्य शिक्षयिष्यामि तद्बलात् ।
यथा न कुर्याः कुत्रापीदृशं कर्म कदाचन ॥
भगवान् शंकरके वे दोनों गण जब अपनी २ इच्छासे [ कहीं अन्यत्र ] चले गये, तब कामविह्वल और [ अपमानसे ] क्रुद्ध मुनि नारदने क्या किया? ॥२ ॥
सूतजी बोले- शिवकी इच्छासे विमोहित [ उस राजकुमारीके प्रति विशेष आसक्ति होनेके कारण ३ अन्य अर्थ - अनर्थके ज्ञानसे रहित ] मुनिने उन दोनोंको यथोचित शाप देकर जलमें अपना मुख और स्वरूप देखा ॥३ ॥
शिव - इच्छाके कारण उन्हें ज्ञान नहीं हुआ और ४ विष्णुके द्वारा किये गये छलका स्मरण करके दुःसह क्रोधमें आकर वे उसी समय विष्णुलोकमें जा पहुँचे । शिवकी इच्छासे ज्ञान - शून्य तथा समिधायुक्त जल रही ५ अग्निके समान क्रुद्ध वे [ नारद ] विष्णुसे अत्यन्त अप्रिय व्यंग्य वचन कहने लगे — ॥४-५ ॥ नारदजी बोले — हे हरे! तुम बड़े दुष्ट हो, कपटी हो और समस्त विश्वको मोहमें डाले रहते हो । दूसरोंका उत्साह तुमसे सहा नहीं जाता । तुम मायावी ६ हो और तुम्हारा अन्त: करण मलिन है ॥६ ॥
पूर्वकालमें तुमने मोहिनीरूप धारण करके कपट ७ किया, असुरोंको वारुणी मदिरा पिलायी और उन्हें अमृत नहीं पीने दिया ॥७ ॥
छल - कपटमें ही रत रहनेवाले हे हरे! यदि ८ महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते, तो तुम्हारी सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती ॥ ८ ॥
हे विष्णो! कपटपूर्ण चाल तुम्हें अधिक प्रिय ९ है । तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है, भगवान् शंकरने तुम्हें स्वतन्त्र बना दिया है॥९॥
परमात्मा शंकरके द्वारा ऐसा करके अच्छा नहीं १० किया गया और तुम उनके प्रभावबलको जानकर स्वतन्त्र होकर कार्य करते रहते हो । तुम्हारी इस चाल - ढालको समझकर अब वे ( भगवान् शिव ) भी पश्चात्ताप करते होंगे ॥ १०१/२ ॥ ११ अपनी वाणीरूप वेदकी प्रामाणिकता स्थापित करनेवाले महादेवजीने ब्राह्मणको सर्वोपरि बताया है । हे हरे! इस बातको जानकर आज मैं बलपूर्वक तुम्हें ऐसी सीख दूँगा, जिससे तुम फिर कभी कहीं भी ऐसा १२ | कर्म नहीं कर सकोगे ॥ ११-१२ ॥
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२१० अद्यापि निर्भयस्त्वं हि सङ्गं नापस्तरस्विना इदानीं लप्स्यसे विष्णो फलं स्वकृतकर्मणः इत्थमुक्त्वा हरि सोऽथ मुनिर्मायाविमोहितः शशाप क्रोधनिर्विण्णो ब्रह्मतेजः प्रदर्शयन्
स्त्रीकृते व्याकुलं विष्णो मामकार्षीर्विमोहकः ।
अन्वकार्षीः स्वरूपेण येन कापट्यकार्यकृत् ॥
तद्रूपेण मनुष्यस्त्वं भव तद्दुःखभुग्घरे ।
यन्मुखं कृतवान्मे त्वं ते भवन्तु सहायिनः ॥
त्वं स्त्रीवियोगजं दुःखं लभस्व परदुःखदः ।
मनुष्यगतिकः प्रायो भवाज्ञानविमोहितः ॥
इति शप्त्वा हरि मोहान्नारदोऽज्ञानमोहितः ।
विष्णुर्जग्राह तं शापं प्रशंसन् शाम्भवीमजाम् ॥
अथ शम्भुर्महालीलो निश्चकर्ष विमोहिनीम् ।
स्वमायां मोहितो ज्ञानी नारदोऽप्यभवद्यया ॥
अन्तर्हितायां मायायां पूर्ववन्मतिमानभूत् ।
नारदो विस्मितमनाः प्राप्तबोधो निराकुलः ॥
पश्चात्तापमवाप्याति निनिन्द स्वं मुहुर्मुहुः ।
प्रशशंस तदा मायां शाम्भवीं ज्ञानिमोहिनीम् ॥
अथ ज्ञात्वा मुनिः सर्वं मायाविभ्रममात्मनः ।
अपतत्पादयोर्विष्णोर्नारदो वैष्णवोत्तमः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । अबतक किसी तेजस्वी पुरुषसे तुम्हारा पाला ॥ १३ नहीं पड़ा था, इसलिये आजतक तुम निडर बने हुए हो, परंतु हे विष्णो! अब तुम्हें अपने द्वारा किये गये कर्मका फल मिलेगा ॥ १३ ॥
। भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर मायामोहित नारद ॥ १४ मुनि अपने ब्रह्मतेजका प्रदर्शन करते हुए क्रोधसे खिन्न हो उठे और शाप देते हुए बोले- ॥१४ ॥
हे विष्णो! तुमने स्त्रीके लिये मुझे व्याकुल १५ किया है । तुम इसी तरह सबको मोहमें डालते रहते हो । यह कपटपूर्ण कार्य करते हुए तुमने जिस स्वरूपसे मुझे संयुक्त किया था, उसी स्वरूपसे हे हरे! तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्रीके लिये दूसरोंको दुःख १६ देनेवाले तुम भी स्त्रीके वियोगका दुःख भोगो । तुमने जिन वानरोंके समान मेरा मुँह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों । तुम दूसरोंको [ स्त्री-विरहका ] दुःख देनेवाले हो, अतः स्वयं भी तुम्हें १७ स्त्रीके वियोगका दुःख प्राप्त हो और अज्ञानसे मोहित मनुष्योंके समान तुम्हारी स्थिति हो ॥ १५ - १७ ॥ अज्ञानसे मोहित हुए नारदजीने मोहवश श्रीहरिको १८ जब इस तरह शाप दिया, तब उन विष्णुने शम्भुकी मायाकी प्रशंसा करते हुए उस शापको स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥
तदनन्तर महालीला करनेवाले शम्भुने अपनी १ ९ उस विश्वमोहिनी मायाको, जिसके कारण ज्ञानी नारदमुनि भी मोहित हो गये थे, खींच लिया ॥१ ९ ॥ उस मायाके तिरोहित होते ही नारदजी पूर्ववत् २० शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो गये । उन्हें पूर्ववत् ज्ञान प्राप्त
हो गया और उनकी सारी व्याकुलता जाती रही ।
इससे उनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ ॥ २० ॥
वे पश्चात्ताप करके बार - बार अपनी निन्दा करने २१ लगे । उस समय उन्होंने ज्ञानीको भी मोहमें डालनेवाली भगवान् शम्भुकी मायाकी सराहना की ॥ २१ ॥
तदनन्तर यह जानकर कि मायाके कारण ही मैं भ्रममें पड़ गया था, वैष्णवशिरोमणि नारदजी भगवान् २२ । विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े ॥ २२ ॥
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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २११
हर्युपस्थापितः प्राह वचनं नष्टदुर्मतिः ।
मया दुरुक्तयः प्रोक्ता मोहितेन कुबुद्धिना ॥ २३
दत्तः शापोऽपि ते नाथ वितथं कुरु तं प्रभो ।
महत्पापमकार्षं हि यास्यामि निरयं ध्रुवम् ॥ २४
कमुपायं हरे कुर्यां दासोऽहं ते तमादिश ।
येन पापकुलं नश्येन्निरयो न भवेन्मम ॥ २५
इत्युक्त्वा स पुनर्विष्णोः पादयोर्मुनिसत्तमः ।
पपात सुमतिर्भक्त्या पश्चात्तापमुपागतः ॥ २६
अथ विष्णुस्तमुत्थाप्य बभाषे सूनृतं वचः । विष्णुरुवाच न खेदं कुरु मे भक्तवरस्त्वं नात्र संशयः ॥ २७
शृणु तात प्रवक्ष्यामि सुहितं तव निश्चयात् ।
निरयस्ते न भविता शिवः शं ते विधास्यति ॥ २८
यदकार्षीः शिववचो वितथं मदमोहितः ।
स दत्तवानीदृशं ते फलं कर्मफलप्रदः ॥ २ ९
शिवेच्छयाखिलं जातं कुर्वित्थं निश्चितां मतिम् ।
गर्वापहर्ता स स्वामी शङ्करः परमेश्वरः ॥ ३०
परं ब्रह्म परात्मा स सच्चिदानन्दबोधनः ।
निर्गुणो निर्विकारी च रजः सत्त्वतमः परः ॥ ३१
स एवादाय मायां स्वां त्रिधा भवति रूपतः ।
ब्रह्मविष्णुमहेशात्मा निर्गुणोऽनिर्गुणोऽपि सः ॥ ३२
निर्गुणत्वे शिवाह्वो हि परमात्मा महेश्वरः ।
परं ब्रह्माव्ययोऽनन्तो महादेवेति गीयते ॥ ३३
तत्सेवया विधिः स्रष्टा पालको जगतामहम् । भगवान् श्रीहरिने उन्हें उठाकर खड़ा कर दिया । उस समय अपनी दुर्बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण वे बोले— मायासे मोहित होनेके कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी, इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत दुर्वचन कहे हैं । हे नाथ! मैंने आपको शाप तक दे डाला है । हे प्रभो! उस शापको आप मिथ्या कर दीजिये । हाय! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, अब मैं निश्चय ही नरकमें पढुँगा । हे हरे! मैं आपका दास हूँ । अतः बताइये, मैं क्या उपाय— कौन - सा प्रायश्चित्त करूँ, जिससे मेरा पाप - समूह नष्ट हो जाय और मुझे नरकमें न गिरना पड़े ॥ २३–२५ ॥ ऐसा कहकर शुद्ध बुद्धिवाले मुनिशिरोमणि नारदजी पुनः भक्तिभावसे भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े । उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था । तब श्रीविष्णु उन्हें उठाकर मधुर वाणीमें कहने लगे- ॥ २६१/२ ॥ विष्णु बोले - हे तात! खेद मत कीजिये । आप मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं, इसमें संशय नहीं है । मैं आपको एक बात बताता हूँ, सुनिये । उससे निश्चय ही आपका परम हित होगा, आपको नरकमें नहीं जाना पड़ेगा । भगवान् शिव आपका कल्याण करेंगे ॥ २७-२८ ॥ आपने मदसे मोहित होकर जो भगवान् शिवकी बात नहीं मानी थी – उसकी अवहेलना कर दी थी, उसी अपराधका ऐसा फल भगवान् शिवने आपको दिया है, क्योंकि वे ही कर्मफलके दाता हैं ॥ २ ९ ॥ आप अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लीजिये कि भगवान् शिवकी इच्छासे ही यह सब कुछ हुआ है । सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्वको दूर करनेवाले हैं ॥ ३० ॥
वे ही परब्रह्म हैं, परमात्मा हैं, उन्हींका सच्चिदानन्द-रूपसे बोध होता है, वे निर्गुण हैं, निर्विकार हैं और सत्त्व, रज तथा तम — इन तीनों गुणोंसे परे हैं ॥ ३१ ॥
वे ही अपनी मायाको लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश- इन तीन रूपोंमें प्रकट होते हैं । निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं ॥ ३२ ॥
निर्गुण अवस्थामें उन्हींका नाम शिव है । वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त और महादेव आदि नामोंसे कहे जाते हैं ॥ ३३ ॥
उन्हींकी सेवासे ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा हुए हैं, मैं तीनों लोकोंका पालन करता हूँ और वे स्वयं ही स्वयं सर्वस्य संहारी रुद्ररूपेण सर्वदा ॥ ३४ | रुद्ररूपसे सदा सबका संहार करते हैं ॥३४ ॥
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२१२ साक्षी शिवस्वरूपेण मायाभिन्नः स निर्गुणः स्वेच्छाचारी संविहारी भक्तानुग्रहकारकः शृणु त्वं नारद मुने सदुपायं सुखप्रदम् सर्वपापापहर्तारं भुक्तिमुक्तिप्रदं सदा त्यक्त्वा स्वसंशयं सर्वं गायन् शङ्करसद्यशः शतनामशिवस्तोत्रं सदानन्यमतिर्जप
यज्जपित्वा द्रुतं सर्वं तव पापं विनश्यति ।
इत्युक्त्वा नारदं विष्णुः पुनः प्राह दयान्वितः ॥
मुने न कुरु शोकं त्वं त्वया किञ्चित्कृतं न हि ।
स्वेच्छया कृतवान्शम्भुरिदं सर्वं न संशयः ॥
अहार्षीत्त्वन्मतिं दिव्यां कामक्लेशमदात्स ते ।
त्वन्मुखाद्दापयाञ्चक्रे शापं मे स महेश्वरः ॥
इत्थं स्वचरितं लोके प्रकटीकृतवान् स्वयम् ।
मृत्युञ्जयः कालकालो भक्तोद्धारपरायणः ॥
न मे शिवसमानोऽस्ति प्रियः स्वामी सुखप्रदः ।
सर्वशक्तिप्रदो मेऽस्ति स एव परमेश्वरः ॥
तस्योपास्यां कुरु मुने तमेव सततं भज ।
तद्यशः शृणु गाय त्वं कुरु नित्यं तदर्चनम् ॥
कायेन मनसा वाचा यः शङ्करमुपैति भोः ।
स पण्डित इति ज्ञेयः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥
शिवेति नामदावाग्नेर्महापातकपर्वताः ।
भस्मीभवन्त्यनायासात्सत्यं सत्यं न संशयः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । वे शिवस्वरूपसे सबके साक्षी हैं, मायासे भिन्न ॥ ३५ और निर्गुण हैं । स्वतन्त्र होनेके कारण वे अपनी । इच्छाके अनुसार चलते हैं । उनका विहार - आचार | व्यवहार उत्तम है और वे भक्तोंपर दया करनेवाले, हैं ॥ ३५ ॥
। हे नारद मुने! मैं आपको एक सुन्दर उपाय बताता ॥ ३६ हूँ, जो सुखद, समस्त पापोंका नाश करनेवाला और सदा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है, आप उसे सुनिये ॥ ३६ ॥
। अपने समस्त संशयोंको त्यागकर आप भगवान् ॥ ३७ शंकर सुयशका गान कीजिये और सदा अनन्यभावसे शिवके शतनामस्तोत्रका पाठ कीजिये । जिसका पाठ करनेसे आपके समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे ॥ ३७१/२ ॥ ३८ इस प्रकार नारदसे कहकर दयालु भगवान् विष्णुने उनसे पुन: कहा — हे मुने! आप शोक न करें । आपने तो कुछ किया ही नहीं है । यह सब तो भगवान् शंकरने अपनी
३ ९ इच्छासे किया है । इसमें शंका नहीं है ॥ ३८-३९ ॥
उन्होंने ही आपकी दिव्य बुद्धिका हरण कर ४० लिया था । उन्होंने ही आपको कामका कष्ट भी दिया और उन्हीं भगवान् शंकरने आपके मुखसे मुझे यह शाप भी दिलाया है ॥ ४० ॥
इस प्रकार उन्होंने संसारमें अपने चरित्रको स्वयं ४१ प्रकट किया है [ इसमें अन्य किसीका दोष नहीं है ] । वे मृत्युको जीतनेवाले, कालके भी काल और भक्तोंका उद्धार करनेमें तत्पर रहनेवाले हैं ॥ ४१ ॥
मुझे शिवके समान अन्य कोई प्रिय नहीं है । वे ४२ ही मेरे स्वामी हैं, सुख और शक्ति देनेवाले हैं । वे महेश्वर ही मेरे सब कुछ हैं ॥४२ ॥
हे मुने! आप उन्हींकी उपासना करें, सदैव ४३ उन्हींका भजन करें, उन्हींके यशका श्रवण और गान करें तथा नित्य उन्हींकी अर्चना करें ॥ ४३ ॥
हे मुने! जो शरीर, मन तथा वाणीसे शंकरको ४४ प्राप्त कर लेता है, वही पण्डित है - ऐसा जानना चाहिये और वही जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ ४४ ॥
शिव - नामरूपी इस दावाग्निसे महापातकरूपी | पर्वत अनायास ही जलकर भस्म हो जाते हैं, यह ४५ पूर्णतया सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४५ ॥
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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २१३
पापमूलानि दुःखानि विविधान्यपि तान्यतः ।
शिवार्चनैकनश्यानि नान्यनश्यानि सर्वथा ॥ ४६
स वैदिकः स पुण्यात्मा स धन्यः स बुधो मुने ।
यः सदा कायवाक् चित्तैः शरणं याति शङ्करम् ॥ ४७
भवन्ति विविधा धर्मा येषां सद्यः फलोन्मुखाः ।
तेषां भवति विश्वासस्त्रिपुरान्तकपूजने ॥ ४८
पातकानि विनश्यन्ति यावन्ति शिवपूजया ।
भुवि तावन्ति पापानि न सन्त्येव महामुने ॥ ४ ९
ब्रह्महत्यादिपापानां राशयोऽप्यमिता मुने ।
शिवस्मृत्या विनश्यन्ति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ५०
शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ते ।
संसारमूलपापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम् ॥ ५१
निया संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने ॥ शिवनामकुठारेण विनाशो जायते ध्रुवम् ॥५२
शिवनामामृतं पेयं पापदावानलार्दितैः ।
पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि ॥ ५३
शिवेति नामपीयूषवर्षधारापरिप्लुताः ।
संसारदवमध्येऽपि न शोचन्ति न संशयः ॥ ५४
न भक्तिः शङ्करे पुंसां रागद्वेषरतात्मनाम् ।
तद्विरुद्धजनानां हि मुक्तिर्भवति सर्वथा ॥ ५५
अनन्तजन्मभिर्येन तपस्तप्तं भविष्यति ।
तस्यैव भक्तिर्भवति भवानीप्राणवल्लभे ॥ ५६
भक्तिरन्यसाधारणी वृथा । संसारमें पापोंके मूलभूत जितने भी प्रकारके दुःख
हैं, वे सर्वथा मात्र शिवपूजनसे ही नष्ट हो जाते हैं ।
अन्य उपायोंसे [ उनका ] नाश सम्भव नहीं है ॥। ४६ ॥
हेमुने! वही वैदिक है, वही पुण्यात्मा है, वही धन्य है और वही बुद्धिमान् है, जो सदा शरीर, वाणी और मनसे भगवान् शंकरकी शरणमें चला जाता है ॥ ४७ ॥
जिनके विविध प्रकारके धर्मकृत्य तत्काल फलोन्मुख ( फल देनेवाले ) होते हैं, उनका पूर्ण विश्वास त्रिपुरके विनाशक शिवमें होता है ॥ ४८ ॥
महामुने! शिवकी पूजासे जितने पाप नष्ट हो जाते हैं, उतने पाप तो पृथ्वीमें हैं ही नहीं ॥ ४ ९ ॥ हे मुने! ब्रह्महत्यादि पापोंकी अपरिमित राशियाँ भी शिवका स्मरण करनेसे नष्ट हो जाती हैं, यह मैं पूर्ण सत्य कह रहा हूँ ॥ ५० ॥
शिव - नामका कीर्तन करनेवाले लोग ही शिवनामकी नौकासे संसाररूपी सागरको पार कर जाते हैं । संसारका मूल पाप - समूह है, उसका नाश नामकीर्तनसे निश्चित ही हो जाता है ॥५१ ॥
हे महामुने! शिवनामरूपी कुठारसे संसारके मूलभूत पापोंका नाश अवश्य हो जाता है ॥५२ ॥
पापरूपी दावानलसे दग्ध हुए लोगोंको शिव-नामरूपी अमृत पीना चाहिये, पापकी दावाग्निसे तपे हुए लोगोंको उसके बिना शान्ति देनेका कोई अन्य उपाय नहीं मिल सकता ॥ ५३ ॥
शिव - इस नामकी अमृतमयी वर्षाकी धारासे नहाये हुए लोग संसारके पापोंकी दावाग्निके मध्य रहते हुए भी शोक नहीं करते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥५४ ॥
राग - द्वेषमें निरन्तर लगे रहनेवाले लोगोंकी शिवके प्रति भक्ति नहीं होती है, किंतु इसके विपरीत अर्थात् पापोंसे विरत रहनेवाले लोगोंकी मुक्ति तो निश्चित ही होती है ॥५५ ॥
जिसने अनन्त जन्मोंमें अपनी तपस्यासे शरीरको जलाया होगा, उसीकी भक्ति भवानीप्राणवल्लभ शिवके लिये सम्भव है ॥५६ ॥
भगवान् शिवके प्रति अनन्यतापूर्वक की गयी ' शिव - नाम - भक्ति ' के अतिरिक्त अन्य साधारण भक्ति जातापि शङ्करे शिवभक्तिरपेक्षिता ॥ ५७ व्यर्थ ही हो जाती है ॥ ५७ ॥
परं त्वव्यभिचारेण
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२१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४
यस्यासाधारणी शम्भौ भक्तिरव्यभिचारिणी ।
तस्यैव मोक्षः सुलभो नान्यस्येति मतिर्मम ॥ ५८
कृत्वाप्यनन्तपापानि यदि भक्तिर्महेश्वरे ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवत्येव न संशयः ॥ ५ ९
भवन्ति भस्मसाद् वृक्षा दवदग्धा यथा वने ।
तथा भवन्ति दग्धानि शाङ्कराणामघान्यपि ॥ ६०
यो नित्यं भस्मपूताङ्गो शिवपूजोन्मुखो भवेत् ।
स तरत्येव संसारमपारमतिदारुणम् ॥ ६१
ब्रह्मस्वहरणं कृत्वा हत्वापि ब्राह्मणान्बहून् ।
न लिप्यते नरः पापैर्विरूपाक्षस्य सेवकः ॥ ६२
विलोक्य वेदानखिलान् शिवस्यैवार्चनं परम् ।
संसारनाशनोपाय इति पूर्वैर्विनिश्चितम् ॥६३
अद्यप्रभृति यत्नेन सावधानो यथाविधि ।
साम्बं सदाशिवं भक्त्या भज नित्यं महेश्वरम् ॥ ६४
आपादमस्तकं सम्यग्भस्मनोद्धूल्य सादरम् ।
सर्वश्रुतिश्रुतं शैवं मन्त्रं जप षडक्षरम् ॥ ६५
सर्वाङ्गेषु प्रयत्नेन रुद्राक्षान् शिववल्लभान् ।
धारयस्वातिसद्भक्त्या समन्त्रं विधिपूर्वकम् ॥ ६६
शृणु शैवीं कथां नित्यं वद शैवीं कथां सदा ।
पूजयस्वातियत्नेन शिवभक्तान्पुनः पुनः ॥ ६७
अप्रमादेन सततं शिवैकशरणो भव । ।
शिवार्चनेन सततमानन्दः प्राप्यते यतः ॥ ६८ ।
भगवान् शिवके प्रति जिसकी भक्ति एकनिष्ठ तथा असाधारण होती है, उसको ही मोक्ष प्राप्त होता है । अन्यके लिये वह सुलभ नहीं है - ऐसा मेरा विश्वास है ॥५८ ॥
अनन्त पाप करनेके पश्चात् भी यदि प्राणी भगवान् शंकरमें भक्ति करने लगता है, तो वह सभी पापोंसे निर्मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥५ ९ ॥ जिस प्रकार वनमें दावाग्निसे वृक्ष [ जलकर ] भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार शिव - भक्तोंके पाप भी [ शिव - भक्तिके प्रभावसे ] नष्ट हो जाते हैं ॥ ६० ॥
जो मनुष्य नित्य अपने शरीरको भस्मसे पवित्रकर शिवकी पूजामें लगा रहता है, वह महान् कष्ट देनेवाले संसाररूपी अपार सागरको निश्चित ही पार कर जाता है ॥६१ ॥
ब्राह्मणोंका धन हरण करके और बहुतसे ब्राह्मणोंकी हत्या करके भी जो मनुष्य विरूपाक्ष भगवान् शंकरकी सेवामें लग जाता है, उसे उन पापोंसे लिप्त नहीं होना पड़ता ॥६२ ॥
सम्पूर्ण वेदोंका अवलोकन करके पूर्ववर्ती विद्वानोंने यही निश्चय किया है कि भगवान् शिवकी पूजा ही संसार - बन्धनके नाशका उपाय है ॥ ६३ ॥
[ हे मुने! ] आजसे यत्नपूर्वक सावधान रहकर विधि - विधानके साथ भक्तिभावसे नित्य जगदम्बा पार्वतीसहित महेश्वर सदाशिवका भजन कीजिये ॥ ६४ ॥
पैरसे लेकर सिरतक भस्मका लेपन करके सम्यक् रूपसे आदरपूर्वक सभी श्रुतियोंसे सुने गये षडक्षर शैव - मन्त्र ( ॐ नमः शिवाय ) -का जप कीजिये ॥ ६५ ॥
प्रयत्नपूर्वक [ बताये गये नियमानुसार ] भगवान् शिवके प्रिय रुद्राक्षको धारण करके अत्यन्त सद्भक्तिसे ही सविधि मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ ६६ ॥
नित्य शिवकी ही कथा सुनिये और कहिये । अत्यन्त यत्न करके बारम्बार शिव - भक्तोंका पूजन किया कीजिये ॥ ६७ ॥
प्रमादसे रहित होकर सदा एकमात्र शिवकी शरणमें रहिये, क्योंकि शिवके पूजनसे ही निरन्तर आनन्द प्राप्त होता रहता है ॥६८ ॥
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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २१५
उरस्याधाय विशदे शिवस्य चरणाम्बुजौ ।
शिवतीर्थानि विचर प्रथमं मुनिसत्तम ॥
पश्यन्माहात्म्यमतुलं शङ्करस्य परात्मनः ।
गच्छानन्दवनं पश्चाच्छम्भुप्रियतमं मुने ॥
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा पूजनं कुरु भक्तितः ।
नत्वा स्तुत्वा विशेषेण निर्विकल्पो भविष्यसि ॥
ततश्च भवता नूनं विधेयं गमनं मुने ।
ब्रह्मलोके स्वकामार्थं शासनान्मम भक्तितः ॥
नत्वा स्तुत्वा विशेषेण विधिं स्वजनकं मुने ।
प्रष्टव्यं शिवमाहात्म्यं बहुशः प्रीतचेतसा ॥
स शैवप्रवरो ब्रह्मा माहात्म्यं शङ्करस्य ते । हे मुनिश्रेष्ठ! अपने हृदयमें भगवान् शिवके ६ ९ उज्वल चरणारविन्दोंकी स्थापना करके पहले शिवके तीर्थोंमें विचरण कीजिये ॥ ६ ९ ॥ हे मुने! इस प्रकार परमात्मा शंकरके अनुपम ७० माहात्म्यका दर्शन करते हुए अन्तमें आनन्दवन ( काशी ) जाइये, वह स्थान भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है ॥ ७० ॥
वहाँ विश्वनाथजीका दर्शन करके भक्तिपूर्वक ७१ उनकी पूजा कीजिये । विशेषतः उनकी स्तुति - वन्दना करके आप निर्विकल्प ( संशयरहित ) हो जायँगे ॥ ७१ ॥
हे मुने! इसके बाद आपको मेरी आज्ञासे ७२ भक्तिपूर्वक अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये निश्चय ही ब्रह्मलोकमें जाना चाहिये ॥७२ ॥
हे मुने! वहाँ अपने पिता ब्रह्माजीकी विशेषरूपसे ७३ स्तुति - वन्दना करके आपको प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे बारम्बार शिव - महिमाके विषयमें प्रश्न करना चाहिये ॥ ७३ ॥
ब्रह्माजी शिव - भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं, वे आपको श्रावयिष्यति सुप्रीत्या शतनामस्तवं च हि ॥ ७४ अत्यन्त प्रसन्नताके साथ भगवान् शंकरका माहात्म्य अद्यतस्त्वं भव मुने शैवः शिवपरायणः । मुक्तिभागी विशेषेण शिवस्ते शं विधास्यति इत्थं विष्णुर्मुनिं प्रीत्या ह्युपदिश्य प्रसन्नधीः स्मृत्वा नुत्वा शिवं स्तुत्वा ततस्त्वन्तरधीयत इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां और शतनाम - स्तोत्र सुनायेंगे ॥ ७४ ॥
हे मुने! आजसे आप शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले ॥ ७५ शिवभक्त हो जाइये और विशेषरूपसे मोक्षके भागी बनिये । भगवान् शिव आपका कल्याण करेंगे ॥ ७५ ॥
इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए भगवान् विष्णु । नारदमुनिको प्रेमपूर्वक उपदेश देकर शिवजीका स्मरण, ॥ ७६ । वन्दन और स्तवन करके वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ७६ ॥
रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदाय विष्णूपदेशवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें नारद - विष्णु - उपदेश - वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः नारदजीका शिवतीर्थोंमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमें प्रश्न करना उवाच सूतजी बोले — महर्षियो! भगवान् श्रीहरिके सूत अन्तर्हिते हरौ विप्रा नारदो मुनिसत्तमः । अन्तर्धान हो जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारद शिवलिंगोंका विचचार महीं पश्यन् शिवलिङ्गानि भक्तितः ॥ १ भक्तिपूर्वक दर्शन करते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ १ ॥
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२१६ पृथिव्या अटनं कृत्वा शिवरूपाण्यनेकशः ददर्श प्रीतितो विप्रा भुक्तिमुक्तिप्रदानि सः अथ तं विचरन्तं कौ नारदं दिव्यदर्शनम् ज्ञात्वा शम्भुगणौ तौ तु सुचित्तमुपजग्मतुः
शिरसा सुप्रणम्याशु गणावूचतुरादरात् ।
गृहीत्वा चरणौ तस्य शापोद्धारेच्छया च तौ ॥
शिवगणावूचतुः
ब्रह्मपुत्र सुरर्षे हि शृणु प्रीत्यावयोर्वचः ।
तवापराधकर्तारावावां विप्रौ न वस्तुतः ॥
आवां हरगणौ विप्र तवागस्कारिणौ मुने । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ । ब्राह्मणो! भूमण्डलपर घूम - फिरकर उन्होंने भोग ॥ २ और मोक्ष देनेवाले बहुतसे शिवलिंगोंका प्रेमपूर्वक दर्शन किया ॥२ ॥
। दिव्यदर्शी नारदजी भूतलके तीर्थोंमें विचर रहे हैं ॥ ३ और इस समय उनका चित्त शुद्ध है - यह जानकर वे दोनों शिवगण उनके पास गये ॥३ ॥
वे दोनों शिवगण शापसे उद्धारकी इच्छासे ४ आदरपूर्वक मस्तक झुकाकर भलीभाँति प्रणाम करके मुनिके दोनों पैर पकड़कर आदरपूर्वक उनसे कहने लगे —॥४ ॥
शिवगण बोले — हे ब्रह्मपुत्र देवर्षे! प्रेमपूर्वक हम दोनोंकी बातोंको सुनिये । वास्तवमें हम दोनों ही ५ आपका अपराध करनेवाले हैं, ब्राह्मण नहीं हैं ॥५ ॥
हे मुने! हे विप्र! आपका अपराध करनेवाले हम स्वयम्वरे राजपुत्र्या मायामोहितचेतसा ॥ ६ दोनों शिवके गण हैं । राजकुमारी श्रीमतीके स्वयंवरमें
त्वया दत्तश्च नौ शापः परेशप्रेरितेन ह ।
ज्ञात्वा कुसमयं तत्र मौनमेव हि जीवनम् ॥
स्वकर्मणः फलं प्राप्तं कस्यापि न हि दूषणम् ।
सुप्रसन्नो भव विभो कुर्वनुग्रहमद्य नौ ॥
सूत उवाच
वच आकर्ण्य गणयोरिति भक्त्युक्तमादरात् ।
प्रत्युवाच मुनिः प्रीत्या पश्चात्तापमवाप्य सः ॥
नारद उवाच
शृणुतं मे महादेवगणौ मान्यतमौ सताम् ।
वचनं सुखदं मोहनिर्मुक्तं च यथार्थकम् ॥
पुरा मम मतिभ्रंष्टासीच्छिवेच्छावशाद् ध्रुवम् ।
सर्वथा मोहमापन्नः शप्तवान्वां कुशेमुषिः ॥
यदुक्तं तत्तथा भावि तथापि शृणुतां गणौ ।
शापोद्धारमहं वच्मि क्षमेथामघमद्य मे ॥
आपका चित्त मायासे मोहित हो रहा था । उस समय परमेश्वरकी प्रेरणासे आपने हम दोनोंको शाप दे ७ दिया । वहाँ कुसमय जानकर हमने चुप रह जाना ही अपनी जीवन - रक्षाका उपाय समझा ॥ ६-७ ॥ इसमें किसीका दोष नहीं है । हमें अपने कर्मका ८ ही फल प्राप्त हुआ है । प्रभो! अब आप प्रसन्न होइये और हम दोनोंपर अनुग्रह कीजिये ॥ ८ ॥
सूतजी बोले — उन दोनों गणोंके द्वारा भक्तिपूर्वक कहे गये वचनोंको सुनकर पश्चात्ताप करते हुए देवर्षि ९ नारद प्रेमपूर्वक कहने लगे॥९॥
नारदजी बोले — आप दोनों महादेवके गण हैं और सत्पुरुषोंके लिये परम सम्माननीय हैं, अत: मेरे १० मोहरहित एवं सुखदायक यथार्थ वचनको सुनिये ॥१० ॥
पहले निश्चय ही शिवेच्छावश मेरी बुद्धि भ्रष्ट ११ हो गयी थी और मैं सर्वथा मोहके वशीभूत हो गया । था । इसीलिये आप दोनोंको कुबुद्धिवाले मैंने शाप दे दिया ॥ ११ ॥
हे शिवगणो! मैंने जो कुछ कहा है, वह वैसा ही होगा, फिर भी मेरी बात सुनें । मैं आपके लिये । शापोद्धारकी बात बता रहा हूँ । आपलोग आज मेरे १२ अपराधको क्षमा कर दें ॥१२ ॥
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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २१७
वीर्यान्मुनिवरस्याप्त्वा राक्षसेशत्वमादिशम् ।
स्यातां विभवसंयुक्तौ बलिनौ सुप्रतापिनौ ॥ १३
सर्वब्रह्माण्डराजानौ शिवभक्तौ जितेन्द्रियौ ।
शिवापरतनोर्मृत्युं प्राप्य स्वं पदमाप्स्यथः ॥ १४
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य मुनेर्वाक्यं नारदस्य महात्मनः ।
उभौ हरगणौ प्रीतौ स्वं पदं जग्मतुर्मुदा ॥ १५
नारदोऽपि परं प्रीतो ध्यायन् शिवमनन्यधीः ।
विचचार महीं पश्यन् शिवतीर्थान्यभीक्ष्णशः ॥ १६ ।
काशीं प्राप्याथ स मुनिः सर्वोपरिविराजिताम् ।
शिवप्रियां शम्भुसुखप्रदां शम्भुस्वरूपिणीम् ॥ १७
दृष्ट्वा काशीं कृतार्थोऽभूत्काशीनाथं ददर्श ह ।
आर्च परमप्रीत्या परमानन्दसंयुतः ॥ १८
समुदः सेव्य तां काशीं कृतार्थो मुनिसत्तमः ।
नमन्संवर्णयन्भक्त्या संस्मरन्प्रेमविह्वलः ॥ १ ९
ब्रह्मलोकं जगामाथ शिवस्मरणसन्मतिः ।
शिवतत्त्वं विशेषेण ज्ञातुमिच्छुः स नारदः ॥ २०
नत्वा तत्र विधिं भक्त्या स्तुत्वा च विविधैस्तवैः ।
पप्रच्छ शिवसत्तत्त्वं शिवसंयुक्तमानसः ॥ २१
नारद उवाच
ब्रह्मन्ब्रह्मस्वरूपज्ञ पितामह जगत्प्रभो ।
त्वत्प्रसादान्मया सर्वं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥ २२
भक्तिमार्गं ज्ञानमार्गं तपोमार्गं सुदुस्तरम् ।
दानमार्गं च तीर्थानां मार्गं च श्रुतवानहम् ॥ २३
मुनिवर विश्रवाके वीर्यसे जन्म ग्रहण करके आप सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रसिद्ध [ कुम्भकर्ण - रावण ] राक्षसराजका शरीर प्राप्त करेंगे और बलवान्, वैभवसे युक्त तथा परम प्रतापी होंगे ॥१३ ॥
समस्त ब्रह्माण्डके राजा होकर शिवभक्त एवं जितेन्द्रिय होंगे और शिवके ही दूसरे स्वरूप श्रीविष्णुके हाथों मृत्यु पाकर फिर आप दोनों अपने पदपर प्रतिष्ठित हो जायँगे ॥ १४ ॥
सूतजी बोले — हे महर्षियो! महात्मा नारदमुनिकी यह बात सुनकर वे दोनों शिवगण प्रसन्न होकर सानन्द अपने स्थानको लौट गये ॥१५ ॥
नारदजी भी अत्यन्त आनन्दित हो अनन्य भावसे भगवान् शिवका ध्यान तथा शिवतीर्थोंका दर्शन करते हुए बारम्बार भूमण्डलमें विचरने लगे ॥१६ ॥
अन्तमें वे सबके ऊपर विराजमान काशीपुरीमें गये, जो शिवजीकी प्रिय, शिवस्वरूपिणी एवं शिवको सुख देनेवाली है ॥ १७ ॥
काशीपुरीका दर्शन करके नारदजी कृतार्थ हो गये । उन्होंने भगवान् काशीनाथका दर्शन किया और परम प्रीति एवं परमानन्दसे युक्त हो उनकी पूजा की ॥ १८ ॥
काशीका सानन्द सेवन करके वे मुनिश्रेष्ठ कृतार्थताका अनुभव करने लगे और प्रेमसे विह्वल हो उसका नमन, वर्णन तथा स्मरण करते हुए ब्रह्मलोकको गये । निरन्तर शिवका स्मरण करनेसे शुद्ध - बुद्धिको प्राप्त देवर्षि नारदने वहाँ पहुँचकर विशेषरूपसे शिवतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछा । उस समय नारदजीका हृदय भगवान् शंकरके प्रति भक्तिभावनासे परिपूर्ण था ॥ १ ९ –२१ ॥ नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको जाननेवाले हे पितामह! हे जगत्प्रभो! आपके कृपाप्रसादसे मैंने भगवान् विष्णुके उत्तम माहात्म्यका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त किया है ॥ २२ ॥
भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, अत्यन्त दुस्तर तपोमार्ग, दानमार्ग तथा तीर्थमार्गका भी वर्णन सुना है, परंतु । शिवतत्त्वका ज्ञान मुझे अभीतक नहीं हुआ है । मैं भगवान्
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२१८ न ज्ञातं शिवतत्त्वं च पूजाविधिमतः क्रमात् चरित्रं विविधं तस्य निवेदय मम प्रभो निर्गुणोऽपि शिवस्तात सगुणः शङ्करः कथम् शिवतत्त्वं न जानामि मोहितः शिवमायया ॥
सृष्टेः पूर्वं कथं शम्भुः स्वरूपेण प्रतिष्ठितः ।
सृष्टिमध्ये स हि कथं क्रीडन्संवर्तते प्रभुः ॥
तदन्ते च कथं देवः स तिष्ठति महेश्वरः ।
कथं प्रसन्नतां याति शङ्करो लोकशङ्करः ॥
सन्तुष्टश्च स्वभक्तेभ्यः परेभ्यश्च महेश्वरः ।
किं फलं यच्छति विधे तत्सर्वं कथयस्व मे ॥
सद्यः प्रसन्नो भगवान्भवतीत्यनुसंश्रुतम् ।
भक्तप्रयासं स महान्न पश्यति दयापरः ॥
ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च त्रयो देवाः शिवांशजाः ।
महेशस्तत्र पूर्णांशः स्वयमेव शिवः परः ॥
तस्याविर्भावमाख्याहि चरितानि विशेषतः ।
उमाविर्भावमाख्याहि तद्विवाहं तथा विभो ॥
तद्गार्हस्थ्यं विशेषेण तथा लीलाः परा अपि ।
एतत्सर्वं तथान्यच्च कथनीयं त्वयानघ ॥
तदुत्पत्तिं विवाहं च शिवायास्तु विशेषतः ।
प्रब्रूहि मे प्रजानाथ गुहजन्म तथैव च ॥
बहुभ्यश्च श्रुतं पूर्वं न तृप्तोऽस्मि जगत्प्रभो ।
अतस्त्वां शरणं प्राप्तः कृपां कुरु ममोपरि ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्याङ्गजस्य हि । उवाच वचनं तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ । । शंकरकी पूजा - विधिको भी नहीं जानता । अतः हे प्रभो ॥ २४ । आप क्रमश: इन विषयोंको तथा भगवान् शिवके विविध! । चरित्रोंको मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २३-२४ ॥ । हे तात! शिव तो निर्गुण होते हुए भी सगुण २५ यह कैसे सम्भव है । शिवकी मायासे मोहित होनेके हैं । ' कारण मैं शिवके तत्त्वको नहीं जान पा रहा हूँ ॥ २५ ॥
सृष्टिके पूर्व भगवान् शंकर किस स्वरूपसे अवस्थित २६ रहते हैं और सृष्टिके मध्यमें कैसी क्रीडा करते हुए स्थित रहते हैं । सृष्टिके अन्तमें वे देव महेश्वर किस प्रकारसे रहते हैं और संसारका कल्याण करनेवाले वे २७ सदाशिव किस प्रकार प्रसन्न रहते हैं ॥ २६-२७ ॥ हे विधाता! वे सन्तुष्ट होकर अपने भक्तों और अन्य २८ लोगोंको कैसा फल देते हैं, वह सब हमें बतायें । मैंने सुना है कि वे भगवान् तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं । परमदयालु २ ९ वे भक्तके कष्टको नहीं देख पाते हैं ॥ २८-२९ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश- ये तीनों देव शिवके ३० ही अंश हैं । महेश उनमें पूर्ण अंश हैं और स्वयंमें वे परात्पर शिव है ॥ ३० ॥
आप उन महेश्वर शिवके आविर्भाव एवं उनके ३१ चरित्रको विशेष रूपसे कहें । हे प्रभो! [ इस कथाके साथ ही ] उमा ( पार्वती ) -के आविर्भाव और उनके विवाहकी भी चर्चा करें ॥३१ ॥
उनके गृहस्थ आश्रम और उस आश्रममें की ३२ गयी विशिष्ट लीलाओंका वर्णन करें । हे निष्पाप! इन सब [ कथाओं ] -के साथ अन्य जो कहनेयोग्य बातें हैं, उनका भी वर्णन करें ॥ ३२ ॥
हे प्रजानाथ! उन ( शिव ) और शिवाके आविर्भाव ३३ एवं विवाहका प्रसंग विशेष रूपसे कहें तथा कार्तिकेयके जन्मकी कथा भी मुझे सुनायें ॥ ३३ ॥
हे जगत्प्रभो! पहले बहुत लोगोंसे मैंने ये बातें ३४ सुनी हैं, किंतु तृप्त नहीं हो सका हूँ, इसीलिये आपकी
शरणमें आया हूँ । आप मुझपर कृपा करें ॥३४ ॥
अपने पुत्र नारदकी यह बात सुनकर लोकपितामह ३५ । ब्रह्मा वहाँ इस प्रकार कहने लगे- ॥ ३५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने नारदप्रश्नवर्णनं ॥ ५ ॥
नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानका नारद - प्रश्न - वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥