शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 231–240
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २१ ९ अथ षष्ठोऽध्यायः महाप्रलयकालमें केवल सद्ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन, उस निर्गुण - निराकार ब्रह्मसे ईश्वरमूर्ति ( सदाशिव ) - का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूत शक्ति ( अम्बिका ) -का प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र ( काशी या आनन्दवन ) - का प्रादुर्भाव, शिवके वामांगसे परम पुरुष ( विष्णु ) - का आविर्भाव तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन ब्रह्मोवाच
भो ब्रह्मन्साधु पृष्टोऽहं त्वया विबुधसत्तम ।
लोकोपकारिणा नित्यं लोकानां हितकाम्यया ॥
यच्छ्रुत्वा सर्वलोकानां सर्वपापक्षयो भवेत् ।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शिवतत्त्वमनामयम् ॥
शिवतत्त्वं मया नैव विष्णुनापि यथार्थतः ।
ज्ञातं च परमं रूपमद्भुतं च परेण न ॥
महाप्रलयकाले च नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
आसीत्तमोमयं सर्वमनर्कग्रहतारकम् ॥
अचन्द्रमनहोरात्रमनग्न्यनिलभूजलम् अप्रधानं वियच्छून्यमन्यतेजोविवर्जितम् ॥
अदृष्टत्वादिरहितं शब्दस्पर्शसमुज्झितम् ।
अव्यक्तगन्धरूपं च रसत्यक्तमदिङ्मुखम् ॥
इत्थं सत्यन्धतमसे सूचीभेद्ये निरन्तरे ।
तत्सद्ब्रह्मेति यच्छ्रुत्वा सदेकं प्रतिपद्यते ॥
इतीदृशं यदा नासीद्यत्तत्सदसदात्मकम् ।
योगिनोऽन्तर्हिताकाशे यत्पश्यन्ति निरन्तरम् ॥
ब्रह्माजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे देवशिरोमणे! आप सदा समस्त जगत्के उपकारमें ही लगे रहते हैं १ आपने लोगोंके हितकी कामनासे यह बहुत उत्तम बात पूछी है ॥ १ ॥
जिसके सुननेसे सम्पूर्ण लोकोंके समस्त पापोंका २ क्षय हो जाता है, उस अनामय शिव - तत्त्वका मैं आपसे वर्णन करता हूँ ॥२ ॥
शिवतत्त्वका स्वरूप बड़ा ही उत्कृष्ट और अद्भुत ३ है, जिसे यथार्थरूपसे न मैं जान पाया हूँ, न विष्णु ही जान पाये और न अन्य कोई दूसरा ही जान पाया है ॥ ३ ॥
जिस समय यह प्रलयकाल हुआ, उस समय समस्त ४ चराचर जगत् नष्ट हो गया, सर्वत्र केवल अन्धकार-ही - अन्धकार था । न सूर्य ही दिखायी देते थे और अन्यान्य ग्रहों तथा नक्षत्रोंका भी पता नहीं था ॥ ४ ॥
न चन्द्र था, न दिन होता था, न रात ही थी; अग्नि, ५ पृथ्वी, वायु और जलकी भी सत्ता नहीं थी । [ उस समय ] प्रधान तत्त्व ( अव्याकृत प्रकृति ) -से रहित सूना आकाशमात्र शेष था, दूसरे किसी तेजकी उपलब्धि नहीं होती थी ॥५ ॥
अदृष्ट आदिका भी अस्तित्व नहीं था, शब्द और ६ स्पर्श भी साथ छोड़ चुके थे, गन्ध और रूपकी भी अभिव्यक्ति नहीं होती थी । रसका भी अभाव हो गया था और दिशाओंका भी भान नहीं होता था ॥६ ॥
इस प्रकार सब ओर निरन्तर सूचीभेद्य घोर अन्धकार ७ फैला हुआ था । उस समय ' तत्सद्ब्रह्म ' – इस श्रुतिमें जो ' सत् ' सुना जाता है, एकमात्र वही शेष था ॥७ ॥
जब ' यह ', ' वह ', ' ऐसा ', ' जो ' इत्यादि रूपसे निर्दिष्ट होनेवाला भावाभावात्मक जगत् नहीं था, उस समय एकमात्र वह ‘ सत् ' ही शेष था, जिसे योगीजन ८ अपने हृदयाकाशके भीतर निरन्तर देखते हैं ॥ ८ ॥
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२२० श्रीशिवमहापुरा [ अ ० ६ अमनोगोचरं वाचां विषयं न कदाचन । वह सत्तत्त्व मनका विषय नहीं है 1 । वाणीकी भी अनामरूपवर्णं च न च स्थूलं न यत्कृशम् ॥ ९ वहाँतक कभी पहुँच नहीं होती । वह नाम तथा रूप-अह्रस्वदीर्घमलघु गुरुत्वपरिवर्जितम् । न यत्रोपचयः कश्चित्तथा नोपचयोऽपि च ॥
अभिधत्ते सचकितं यदस्तीति श्रुतिः पुनः ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं महः ॥
अप्रमेयमनाधारमविकारमनाकृति निर्गुणं योगिगम्यं च सर्वव्याप्येककारकम् ॥
निर्विकल्पं निरारम्भं निर्मायं निरुपद्रवम् ।
अद्वितीयमनाद्यन्तमविकाशं चिदात्मकम् ॥
यस्येत्थं संविकल्पन्ते संज्ञासंज्ञोक्तितः स्म वै ।
कियता चैव कालेन द्वितीयेच्छाऽभवत्किल ॥
अमूर्तेन स्वमूर्तिश्च तेनाकल्पि स्वलीलया ।
सर्वैश्वर्यगुणोपेता सर्वज्ञानमयी शुभा ॥
सर्वगा सर्वरूपा च सर्वदृक्सर्वकारिणी ।
सर्वैकवन्द्या सर्वाद्या सर्वदा सर्वसंस्कृतिः ॥
परिकल्प्येति तां मूर्तिमैश्वरीं शुद्धरूपिणीम् ।
अद्वितीयमनाद्यन्तं सर्वाभासं चिदात्मकम् ।
अन्तर्दधे पराख्यं यद् ब्रह्म सर्वगमव्ययम् ॥
अमूर्ते यत्पराख्यं वै तस्य मूर्तिः सदाशिवः ।
अर्वाचीनाः पराचीना ईश्वरं तं जगुर्बुधाः ॥
शक्तिस्तदैकलेनापि स्वैरं विहरता तनुः ।
स्वविग्रहात्स्वयं सृष्टा स्वशरीरानपायिनी ॥
प्रधानं प्रकृतिं तां च मायां गुणवतीं पराम् ।
बुद्धितत्त्वस्य जननीमाहुर्विकृतिवर्जिताम् ॥
रंगसे भी शून्य है । वह न स्थूल है, न कृश है, न ह्रस्व । है, न दीर्घ है, न लघु है और न गुरु ही है । उसमें न १० कभी वृद्धि होती है और न ह्रास ही होता है ॥ ९ -१० ॥ श्रुति भी उसके विषयमें चकितभावसे ' है'– ११ इतना ही कहती है [ अर्थात् उसकी सत्तामात्रका ही निरूपण कर पाती है, उसका कोई विशेष विवरण देनेमें असमर्थ हो जाती है ] । वह सत्य, ज्ञानस्वरूप, १२ अनन्त, परमानन्दमय, परम ज्योतिःस्वरूप, अप्रमेय, आधाररहित, निर्विकार, निराकार, निर्गुण, योगिगम्य, सर्वव्यापी, सबका एकमात्र कारण, निर्विकल्प, निरारम्भ, १३ मायाशून्य, उपद्रवरहित, अद्वितीय, अनादि, अनन्त, संकोच - विकाससे शून्य तथा चिन्मय है ॥ ११-१३ ॥ जिस परब्रह्मके विषयमें ज्ञान और अज्ञानसे पूर्ण १४ उक्तियोंद्वारा इस प्रकार [ ऊपर बताये अनुसार ] विकल्प किये जाते हैं, उसने कुछ कालके बाद [ सृष्टिका समय आनेपर ] द्वितीय होनेकी इच्छा प्रकट की— उसके भीतर एकसे अनेक होनेका संकल्प उदित हुआ ॥ १४ ॥
तब उस निराकार परमात्माने अपनी लीलाशक्तिसे १५ अपने लिये मूर्ति ( आकार ) - की कल्पना की । वह मूर्ति सम्पूर्ण ऐश्वर्यगुणोंसे सम्पन्न, सर्वज्ञानमयी, शुभस्वरूपा, सर्वव्यापिनी, सर्वरूपा, सर्वदर्शिनी, सर्वकारिणी, सबकी १६ एकमात्र वन्दनीया, सर्वाद्या, सब कुछ देनेवाली और सम्पूर्ण संस्कृतियोंका केन्द्र थी ॥ १५-१६ ॥ उस शुद्धरूपिणी ईश्वरमूर्तिकी कल्पना करके वह अद्वितीय, अनादि, अनन्त, सर्वप्रकाशक, चिन्मय, सर्वव्यापी १७ और अविनाशी परब्रह्म अन्तर्हित हो गया ॥१७ ॥
जो मूर्तिरहित परमब्रह्म है, उसीकी मूर्ति ( चिन्मय १८ आकार ) भगवान् सदाशिव हैं । अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान् उन्हींको ईश्वर कहते हैं ॥१८ ॥
उस समय एकाकी रहकर स्वेच्छानुसार विहार १ ९ करनेवाले उन सदाशिवने अपने विग्रहसे स्वयं ही एक | स्वरूपभूता शक्तिकी सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंगसे कभी अलग होनेवाली नहीं थी ॥१ ९ ॥ उस पराशक्तिको प्रधान, प्रकृति, गुणवती, माया, २० बुद्धितत्त्वकी जननी तथा विकाररहित बताया गया है ॥ २० ॥
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २२१
सा शक्तिरम्बिका प्रोक्ता प्रकृतिः सकलेश्वरी ।
त्रिदेवजननी नित्या मूलकारणमित्युत ॥२१
अस्या अष्टौ भुजाश्चासन्विचित्रवदना शुभा ।
राकाचन्द्रसहस्त्रस्य वदने भाश्च नित्यशः ॥ २२
नानाभरणसंयुक्ता नानागतिसमन्विता ।
नानायुधधरा देवी फुल्लपङ्कजलोचना ॥ २३
अचिन्त्यतेजसा युक्ता सर्वयोनिः समुद्यता ।
एकाकिनी यदा माया संयोगाच्चाप्यनेकिका ॥ २४
परः पुमानीश्वरः स शिवः शम्भुरनीश्वरः ।
शीर्षे मन्दाकिनीधारी भालचन्द्रस्त्रिलोचनः ॥ २५
पञ्चवक्त्रः प्रसन्नात्मा दशबाहुस्त्रिशूलधृक् कर्पूरगौरसि भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥ २६
युगपच्च तया शक्त्या साकं कालस्वरूपिणा ।
शिवलोकाभिधं क्षेत्रं निर्मितं तेन ब्रह्मणा ॥ २७
तदेव काशिकेत्येतत्प्रोच्यते क्षेत्रमुत्तमम् ।
परं निर्वाणसङ्ख्यानं सर्वोपरि विराजितम् ॥ २८
ताभ्यां च रममाणाभ्यां तस्मिन्क्षेत्रे मनोरमे ।
परमानन्दरूपाभ्यां परमानन्दरूपिणम् ॥ २ ९
मुने प्रलयकालेऽपि न तत्क्षेत्रं कदाचन ।
विमुक्तं हि शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः ॥ ३०
वह शक्ति अम्बिका कही गयी है । उसीको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी, नित्या और मूलकारण भी कहते हैं ॥२१ ॥
सदाशिवद्वारा प्रकट की गयी उस शक्तिकी आठ भुजाएँ हैं । उस [ शुभलक्षणा देवी ] -के मुखकी शोभा विचित्र है । वह अकेली ही अपने मुखमण्डलमें सदा पूर्णिमाके एक सहस्र चन्द्रमाओंकी कान्ति धारण करती है ॥२२ ॥
नाना प्रकारके आभूषण उसके श्रीअंगोंकी शोभा बढ़ाते हैं । वह देवी नाना प्रकारकी गतियोंसे सम्पन्न है
और अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण करती है ।
उसके नेत्र खिले हुए कमलके समान जान पड़ते हैं ॥ २३ ॥
वह अचिन्त्य तेजसे जगमगाती रहती है । वह सबकी योनि है और सदा उद्यमशील रहती है । एकाकिनी होनेपर भी वह माया संयोगवशात् अनेक हो जाती है ॥२४ ॥
वे जो सदाशिव हैं, उन्हें परमपुरुष, ईश्वर, शिव, शम्भु और अनीश्वर कहते हैं । वे अपने मस्तकपर आकाश - गंगाको धारण करते हैं । उनके भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पाते हैं । उनके [ पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमें ] तीन नेत्र हैं ॥ २५ ॥
[ पाँच मुख होनेके कारण ] वे पंचमुख कहलाते हैं । उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है । वे दस भुजाओंसे युक्त और त्रिशूलधारी हैं । उनके श्रीअंगोंकी प्रभा कर्पूरके समान श्वेत- गौर है । वे अपने सारे अंगोंमें भस्म रमाये रहते हैं ॥ २६ ॥
उन कालरूपी ब्रह्मने एक ही समय शक्तिके साथ ‘ शिवलोक ' नामक क्षेत्रका निर्माण किया था ॥२७ ॥
उस उत्तम क्षेत्रको ही काशी कहते हैं । वह परम निर्वाण या मोक्षका स्थान है, जो सबके ऊपर विराजमान है ॥२८ ॥
ये प्रिया - प्रियतमरूप शक्ति और शिव, जो परमानन्दस्वरूप हैं, उस मनोरम क्षेत्रमें नित्य निवास करते हैं । वह [ काशीपुरी ] परमानन्दरूपिणी है ॥ २ ९ ॥ मुने! शिव और शिवाने प्रलयकालमें भी कभी उस क्षेत्रको अपने सांनिध्यसे मुक्त नहीं किया है । इसलिये विद्वान् पुरुष उसे ' अविमुक्त क्षेत्र ' भी कहते हैं ॥ ३० ॥
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२२२ अस्यानन्दवनं नाम पुराकारि पिनाकिना क्षेत्रस्यानन्दहेतुत्वादविमुक्तमनन्तरम् अथानन्दवने तस्मिन् शिवयो रममाणयोः इच्छेत्यभूत्सुरर्षे हि सृज्यः कोऽप्यपरः किल यस्मिन् न्यस्य महाभारमावां स्वस्वैरचारिणौ । निर्वाणधारणं कुर्वः केवलं काशिशायिनौ
स एव सर्वं कुरुतां स एव परिपातु च ।
स एव संवृणोत्वन्ते मदनुग्रहतः सदा ॥
चेतः समुद्रमाकुञ्च्य चिन्ताकल्लोललोलितम् ।
सत्त्वरत्नं तमोग्राहं रजोविद्रुमवल्लितम् ॥
यस्य प्रसादात्तिष्ठावः सुखमानन्दकानने ।
परिक्षिप्तमनोवृत्तौ बहिश्चिन्तातुरे सुखम् ॥
सम्प्रधार्येति स विभुस्तया शक्त्या परेश्वरः ।
सव्ये व्यापारयाञ्चक्रे दशमेऽङ्गे सुधासवम् ॥
ततः पुमानाविरासीदेकस्त्रैलोक्यसुन्दरः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । वह क्षेत्र आनन्दका हेतु है, इसलिये पिनाकधारी ॥३१ शिवने पहले उसका नाम ' आनन्दवन ' रखा था । उसके । बाद वह ' अविमुक्त ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३१ । हे देवर्षे! एक समय उस आनन्दवनमें ॥ रमण ॥ ३२ करते हुए शिवा और शिवके मनमें यह इच्छा हुई कि किसी दूसरे पुरुषकी भी सृष्टि करनी चाहिये, जिसपर सृष्टि - संचालनका महान् भार रखकर हम दोनों केवल ॥ ३३ काशीमें रहकर इच्छानुसार विचरण करें और निर्वाण धारण करें ॥ ३२-३३ ॥ वही पुरुष हमारे अनुग्रहसे सदा सबकी सृष्टि ३४ करे, वही पालन करे और अन्तमें वही सबका संहार भी करे ॥ ३४ ॥
यह चित्त एक समुद्रके समान है । इसमें चिन्ताकी ३५ उत्ताल तरंगें उठ उठकर इसे चंचल बनाये रहती हैं । इसमें सत्त्वगुणरूपी रत्न, तमोगुणरूपी ग्राह और रजोगुणरूपी मूँगे भरे हुए हैं । इस विशाल चित्त-३६ समुद्रको संकुचित करके हम दोनों उस पुरुषके प्रसादसे आनन्दकानन ( काशी ) -में सुखपूर्वक निवास करें, [ यह आनन्दवन वह स्थान है ] जहाँ हमारी मनोवृत्ति सब ओरसे सिमटकर इसीमें लगी हुई है तथा जिसके बाहरका जगत् चिन्तासे आतुर प्रतीत होता है ॥ ३५-३६ ॥ ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित सर्वव्यापी ३७ परमेश्वर शिवने अपने वामभागके दसवें अंगपर अमृतका सिंचन किया ॥ ३७ ॥
वहाँ उसी समय एक पुरुष प्रकट हुआ, जो शान्तः सत्त्वगुणोद्रिक्तो गाम्भीर्यामितसागरः ॥ ३८ तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर था । वह शान्त
तथा च क्षमया युक्तो मुनेऽलब्धोपमोऽभवत् ।
इन्द्रनीलद्युतिः श्रीमान्पुण्डरीकोत्तमेक्षणः ॥
सुवर्णकान्तिभृच्छ्रेष्ठदुकूलयुगलावृतः लसत्प्रचण्डदोर्दण्डयुगलो ह्यपराजितः ॥ था । उसमें सत्त्वगुणकी अधिकता थी तथा वह गम्भीरताका अथाह सागर था ॥३८ ॥
मुने! क्षमा गुणसे युक्त उस पुरुषके लिये ३ ९ ढूँढ़नेपर भी कहीं कोई उपमा नहीं मिलती थी । उसकी कान्ति इन्द्रनील मणिके समान श्याम थी । उसके | अंग - अंगसे दिव्य शोभा छिटक रही थी और नेत्र । प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पा रहे थे ॥३ ९ ॥ उसके श्रीअंगोंपर सुवर्णसदृश कान्तिवाले दो । सुन्दर रेशमी पीताम्बर शोभा दे रहे थे । किसीसे भी | पराजित न होनेवाला वह वीर पुरुष अपने प्रचण्ड ४० भुजदण्डोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ४० ॥
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २२३
ततः स पुरुषः शम्भुं प्रणम्य परमेश्वरम् ।
नामानि कुरु मे स्वामिन्वद कर्म जगावति ॥ ४१
तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह शङ्करः प्रहसन्प्रभुः ।
पुरुषं तं महेशानो वाचा मेघगभीरया ॥ ४२
शिव उवाच
विष्णिवति व्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं भविष्यति ।
बहून्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणि ह ॥ ४३
तपः कुरु दृढो भूत्वा परमं कार्यसाधनम् ।
इत्युक्त्वा श्वासमार्गेण ददौ च निगमं ततः ॥ ४४
ततोऽच्युतः शिवं नत्वा चकार विपुलं तपः ।
अन्तर्धानं गतः शक्त्या सलोकः परमेश्वरः ॥ ४५
दिव्यं द्वादशसाहस्त्रं वर्षं तप्त्वापि चाच्युतः ।
न प्राप स्वाभिलषितं सर्वदं शम्भुदर्शनम् ॥ ४६
ततः संशयमापन्नश्चिन्तितं हृदि सादरम् ।
मयाद्य किं प्रकर्तव्यमिति विष्णुः शिवं स्मरन् ॥ ४७
एतस्मिन्नन्तरे वाणी समुत्पन्ना शिवाच्छुभा ।
तपः पुनः प्रकर्तव्यं संशयस्यापनुत्तये ॥ ४८
ततस्तेन च तच्छ्रुत्वा तपस्तप्तं सुदारुणम् ।
बहुकालं तदा ब्रह्मध्यानमार्गपरेण हि ॥ ४ ९
ततः स पुरुषो विष्णुः प्रबुद्धो ध्यानमार्गतः ।
सुप्रीतो विस्मयं प्राप्तः किं यत्तत्त्वमहो इति ॥ ५०
परिश्रमवतस्तस्य विष्णोः स्वाङ्गेभ्य एव च ।
जलधारा हि संयाता विविधाः शिवमायया ॥ ५१
अभिव्याप्तं च सकलं शून्यं यत्तन्महामुने ।
ब्रह्मरूपं जलमभूत्स्पर्शनात्पापनाशनम् ॥ ५२
तदनन्तर उस पुरुषने परमेश्वर शिवको प्रणाम करके कहा- हे स्वामिन्! मेरे नाम निश्चित कीजिये और काम बताइये ॥ ४१ ॥
उस पुरुषकी यह बात सुनकर महेश्वर भगवान् शंकर हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे कहने लगे— ॥४२ ॥
शिवजी बोले- हे वत्स! व्यापक होनेके कारण तुम्हारा ' विष्णु ' नाम विख्यात होगा । इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे नाम होंगे, जो भक्तोंको सुख देनेवाले होंगे ॥ ४३ ॥
तुम सुस्थिर होकर उत्तम तप करो, क्योंकि वही समस्त कार्योंका साधन है । ऐसा कहकर भगवान् शिवने श्वासमार्गसे श्रीविष्णुको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया ॥ ४४ ॥
तदनन्तर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीहरि भगवान् शिवको प्रणाम करके बहुत बड़ी तपस्या करने लगे और शक्तिसहित परमेश्वर शिव भी पार्षदगणोंके साथ वहाँसे अदृश्य हो गये । ४५ ॥ बारह हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करनेके पश्चात् भी विष्णु अपने अभीष्ट फलस्वरूप, सर्वस्व देनेवाले भगवान् शिवका दर्शन प्राप्त न कर सके ॥ ४६ ॥
तब विष्णुको बड़ा सन्देह हुआ । उन्होंने हृदयमें शिवका स्मरण करते हुए सोचा कि अब मुझे क्या करना चाहिये । इसी बीच शिवकी मंगलमयी [ आकाश ] वाणी हुई कि सन्देह दूर करनेके लिये पुनः तपस्या करनी चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ [ शिवकी ] उस [ वाणी ] -को सुनकर विष्णुने ब्रह्ममें ध्यानको अवस्थितकर [ पुनः ] दीर्घकालतक अत्यन्त कठिन तपस्या की ॥४ ९ ॥ तदनन्तर ब्रह्मकी ध्यानावस्थामें ही विष्णुको बोध हो आया और वे प्रसन्न होकर यह सोचने लगे कि अरे! वह महान् तत्त्व है क्या? ॥५० ॥
उस समय शिवकी इच्छासे तपस्याके परिश्रममें निरत विष्णुके अंगोंसे अनेक प्रकारकी जलधाराएँ निकलने लगीं ॥५१ ॥
हे महामुने! उस जलसे सारा सूना आकाश व्याप्त हो गया । वह ब्रह्मरूप जल अपने स्पर्शमात्रसे । सब पापोंका नाश करनेवाला सिद्ध हुआ ॥५२ ॥
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तदा श्रान्तश्च पुरुषो विष्णुस्तस्मिञ्जले स्वयम् ।
सुष्वाप परमप्रीतो बहुकालं विमोहितः ॥
नारायणेति नामापि तस्यासीच्छ्रुतिसम्मतम् ।
नान्यत्किञ्चित्तदा ह्यासीत्प्राकृतं पुरुषं विना ॥
एतस्मिन्नन्तरे काले तत्त्वान्यासन्महात्मनः ।
तत्प्रकारं शृणु प्राज्ञ गदतो मे महामते ॥
प्रकृतेश्च महानासीन्महतश्च गुणास्त्रयः अहङ्कारस्ततो जातस्त्रिविधो गुणभेदतः ॥
तन्मात्रश्च ततो जाताः पञ्च भूतानि वै ततः ।
तदैव तानीन्द्रियाणि ज्ञानकर्ममयानि च ॥
तत्त्वानामिति सङ्ख्यानमुक्तं ते ऋषिसत्तम ।
जडात्मकं च तत्सर्वं प्रकृतेः पुरुषं विना ॥
तत्तदैकीकृतं तत्त्वं चतुर्विंशतिसङ्ख्यकम् ।
शिवेच्छया गृहीत्वा स सुष्वाप ब्रह्मरूपके ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ उस समय थके हुए परम पुरुष विष्णु मोहित ५३ | होकर दीर्घकालतक बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें सोते रहे ॥ ५३ ॥
नार अर्थात् जलमें शयन करनेके कारण ही ५४ उनका ' नारायण ' – यह श्रुतिसम्मत नाम प्रसिद्ध हुआ । उस समय उन परम पुरुष नारायणके अतिरिक्त दूसरी कोई प्राकृत वस्तु नहीं थी ॥ ५४ ॥
उसके बाद ही उन महात्मा नारायणदेवसे यथासमय ५५ सभी तत्त्व प्रकट हुए । हे महामते! हे विद्वन्! मैं उन तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बता रहा हूँ, सुनिये ॥ ५५ ॥
प्रकृतिसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ और महत्तत्त्वसे सत्त्वादि ५६ तीनों गुण । इन गुणोंके भेदसे ही त्रिविध अहंकारकी उत्पत्ति हुई । अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ हुईं और उन ५७ तन्मात्राओंसे पाँच भूत प्रकट हुए । उसी समय ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥ ५६-५७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने आपको तत्त्वोंकी ५८ संख्या बतायी है । इनमेंसे पुरुषको छोड़कर शेष सारे तत्त्व प्रकृतिसे प्रकट हुए हैं, इसलिये सब - के - सब जड़ हैं ॥ ५८ ॥
तत्त्वोंकी संख्या चौबीस है । उस समय एकाकार हुए चौबीस तत्त्वोंको ग्रहण करके वे परम पुरुष नारायण भगवान् शिवकी इच्छासे ब्रह्मरूप जलमें सो ५ ९ | गये ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने विष्णूत्पत्तिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानका विष्णु - उत्पत्ति - वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, शिवेच्छासे ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमलनालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा - विष्णुके बीचमें अग्निस्तम्भका प्रकट होना तथा उसके ओर - छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- हे देवर्षे! जब नारायणदेव सुप्ते नारायणे देवे नाभौ पङ्कजमुत्तमम् । | जलमें शयन करने लगे, उस समय उनकी नाभिसे | भगवान् शंकरकी इच्छासे सहसा एक विशाल तथा आविर्बभूव सहसा बृहद्वै शङ्करेच्छया ॥ १ उत्तम कमल प्रकट हुआ ॥ १ ॥
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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २२५
अनन्तयष्टिकायुक्तं कर्णिकारसमप्रभम् ।
अनन्तयोजनायाममनन्तोच्छ्रायसंयुतम् ॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं सुन्दरं तत्त्वसंयुतम् ।
अत्यद्भुतं महारम्यं दर्शनीयमनुत्तमम् ॥
कृत्वा यत्नं पूर्ववत्स शङ्करः परमेश्वरः ।
दक्षिणाङ्गान्निजान्मां वै साम्बः शम्भुरजीजनत् ॥
स मायामोहितं कृत्वा मां महेशो द्रुतं मुने ।
तन्नाभिपङ्कजादाविर्भावयामास लीलया ॥
एवं पद्मात्ततो जज्ञे पुत्रोऽहं हेमगर्भकः ।
चतुर्मुखो रक्तवर्णस्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥
तन्मायामोहितश्चाहं नाविदं कमलं विना ।
स्वदेहजनकं तात पितरं ज्ञानदुर्बलः ॥
कोऽहं वा कुत आयातः किं कार्यं तु मदीयकम् ।
कस्य पुत्रोऽहमुत्पन्नः केनैव निर्मितोऽधुना ॥
इति संशयमापन्नं बुद्धिर्मां समपद्यत ।
किमर्थं मोहमायामि तज्ज्ञानं सुकरं खलु ॥
एतत्कमलपुष्पस्य पत्रारोहस्थलं ह्यधः ।
मत्कर्ता च स वै तत्र भविष्यति न संशयः ॥
इति बुद्धिं समास्थाय कमलादवरोहयम् ।
ले नाले गतस्तत्र वर्षाणां शतकं मुने ॥
न लब्धं तु मया तत्र कमलस्थानमुत्तमम् संशयं च पुनः प्राप्तः कमले गन्तुमुत्सुकः आरुरोहाथ कमलं नालमार्गेण वै मुने कुड्मलं कमलस्याथ लब्धवान्न विमोहितः उसमें असंख्य नालदण्ड थे, उसकी कान्ति २ कनेरके फूलके समान पीले रंगकी थी तथा उसकी लम्बाई और ऊँचाई भी अनन्त योजन थी । वह कमल करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित, सुन्दर, सम्पूर्ण ३ तत्त्वोंसे युक्त, अत्यन्त अद्भुत, परम रमणीय, दर्शनके योग्य तथा सबसे उत्तम था ॥ २-३ ॥ तत्पश्चात् कल्याणकारी परमेश्वर साम्बसदाशिवने ४ पूर्ववत् प्रयत्न करके मुझे अपने दाहिने अंगसे उत्पन्न किया ॥४ ॥
हे मुने! उन महेश्वरने मुझे तुरंत ही अपनी मायासे ५ मोहित करके नारायणदेवके नाभिकमलमें डाल दिया और लीलापूर्वक मुझे वहाँसे प्रकट किया ॥ ५ ॥
इस प्रकार उस कमलसे पुत्रके रूपमें मुझ हिरण्य-६ गर्भका जन्म हुआ ॥ मेरे चार मुख हुए और शरीरकी कान्ति लाल हुई । मेरे मस्तक त्रिपुण्ड्रकी रेखासे अंकित थे ॥६ ॥
हे तात! भगवान् शिवकी मायासे मोहित होनेके ७ कारण मेरी ज्ञानशक्ति इतनी दुर्बल हो रही थी कि मैंने उस कमलके अतिरिक्त दूसरे किसीको अपने शरीरका जनक या पिता नहीं जाना ॥७ ॥
मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, मेरा कार्य क्या है, ८ मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है - इस प्रकार संशयमें पड़े हुए मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ - मैं किसलिये ९ मोहमें पड़ा हुआ हूँ? जिसने मुझे उत्पन्न किया है, उसका पता लगाना तो बहुत सरल है ॥ ८ - ९ ॥ इस कमलपुष्पका जो पत्रयुक्त नाल है, उसका १० उद्गमस्थान इस जलके भीतर नीचेकी ओर है । जिसने मुझे उत्पन्न किया है, वह पुरुष भी वहीं होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
ऐसा निश्चय करके मैंने अपनेको कमलसे नीचे ११ उतारा । हे मुने! उस कमलकी एक - एक नालमें गया और सैकड़ों वर्षोंतक वहाँ भ्रमण करता रहा ॥ ११ ॥
कहीं भी उस कमलके उद्गमका उत्तम स्थान मुझे । ॥ १२ नहीं मिला । तब पुनः संशयमें पड़कर मैं उस कमलपुष्पपर जानेके लिये उत्सुक हुआ और हे मुने! नालके मार्गसे उस कमलपर चढ़ने लगा । इस तरह बहुत ऊपर जानेपर । भी मैं उस कमलके कोशको न पा सका । उस दशामें ॥ १३ । मैं और भी मोहित हो उठा ॥ १२-१३ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_9_1_Front
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२२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ नालमार्गेण भ्रमतो गतं वर्षशतं पुनः । मुझे नालमार्गसे भ्रमण करते हुए पुन: सैकड़ों क्षणमात्रं तदा तत्र ततस्तिष्ठन्विमोहितः तदा वाणी समुत्पन्ना तपेति परमा शुभा शिवेच्छया परा व्योम्नो मोहविध्वंसिनी मुने तच्छ्रुत्वा व्योमवचनं द्वादशाब्दं प्रयत्नतः पुनस्तप्तं तपो घोरं द्रष्टुं स्वजनकं तदा
तदा हि भगवान्विष्णुश्चतुर्बाहुः सुलोचनः ।
मय्येवानुग्रहं कर्तुं द्रुतमाविर्बभूव ह ॥
शङ्खचक्रायुधकरो गदापद्मधरः परः ।
घनश्यामलसर्वाङ्गः पीताम्बरधरः परः ॥
मुकुटादिमहाभूषः प्रसन्नमुखपङ्कजः ।
कोटिकन्दर्पसङ्काशः सन्दृष्टो मोहितेन सः ॥
तद् दृष्ट्वा सुन्दरं रूपं विस्मयं परमं गतः ।
कालाभं काञ्चनाभं च सर्वात्मानं चतुर्भुजम् ॥
तथाभूतमहं दृष्ट्वा सदसन्मयमात्मना ।
नारायणं महाबाहुं हर्षितो ह्यभवं तदा ॥
मायया मोहितः शम्भोस्तदा लीलात्मनः प्रभोः ।
अविज्ञाय स्वजनकं तमवोचं प्रहर्षितः ॥
ब्रह्मोवाच
कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम् ।
तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण सुदृढेन तु ॥
प्रबुद्धयोत्थाय शयनात्समासीनः क्षणं वशी । ददर्श निद्राविक्लिन्न नीरजामललोचनः ॥ १४ वर्ष व्यतीत हो गये, [ किंतु उसका कोई पता न सका ] तब मैं मोहित ( किंकर्तव्यविमूढ़ ) होकर एक चल क्षण वहीं रुक गया ॥१४ ॥
। हे मुने! उस समय भगवान् शिवकी इच्छा ॥ १५ परम मंगलमयी तथा उत्तम आकाशवाणी प्रकट हुई, जो मेरे मोहका विध्वंस करनेवाली थी, उस वाणीने कहा — ' तप ' तपस्या करो ॥ १५ ॥
। उस आकाशवाणीको सुनकर मैंने अपने जन्मदाता ॥ १६ पिताका दर्शन करनेके लिये उस समय पुनः प्रयत्नपूर्वक बारह वर्षोंतक घोर तपस्या की ॥ १६ ॥
तब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही चार भुजाओं १७ और सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित भगवान् विष्णु वहाँ सहसा प्रकट हो गये । उन परम पुरुषने अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे । उनके सारे अंग सजल १८ जलधरके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित थे । उन परम प्रभुने सुन्दर पीताम्बर पहन रखा था । उनके मस्तक आदि अंगोंमें मुकुट आदि महामूल्यवान् आभूषण शोभा पा १ ९ रहे थे । उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था । मैं उनकी छविपर मोहित हो रहा था । वे मुझे करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर दिखायी दिये ॥ १७–१९ ॥ उन चतुर्भुज भगवान् विष्णुका वह अत्यन्त सुन्दर २० रूप देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । वे साँवली और सुनहरी आभासे उद्भासित हो रहे थे ॥ २० ॥
उस समय उन सदसत्स्वरूप, सर्वात्मा, महाबाहु २१ नारायणदेवको वहाँ उस रूपमें अपने साथ देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ ॥ २१ ॥
मैं उस समय प्रभु शम्भुकी लीलासे मोहित हो २२ रहा था, इसलिये मैं अपने उत्पन्न करनेवालेको न जानकर अति हर्षित होकर उनसे कहने लगा- ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले- मैंने उन सनातन पुरुषको हाथसे | उठाकर कहा कि आप कौन हैं, उस समय हाथके तीव्र २३ तथा सुदृढ़ प्रहारसे क्षणमात्रमें ही वे जितेन्द्रिय जाग । करके शय्यासे उठकर बैठ गये । तदनन्तर अविकल मामत्र संस्थितं भासाध्यासितो ॥ २४ रूपसे निद्रारहित होकर उन राजीवलोचन भगवान् विष्णु चोत्थाय भगवान्हरिः । मुझको वहाँपर अवस्थित देखा और हँसते हुए बार-आह ब्रह्माणं हसन्मां मधुरं सकृत् ॥ २५ | बार मधुर वाणीमें [ वे ] कहने लगे- ॥ २३–२५ ॥ Back
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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २२७ विष्णुरुवाच विष्णुजी बोले- हे वत्स! आपका स्वागत स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते । है । हे महाद्युतिमान् पितामह! आपका स्वागत है । निर्भयो भव दास्येऽहं सर्वान्कामान्न संशयः ॥ २६ निर्भय होकर रहिये । मैं आपकी सभी कामनाओंको
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभः ।
रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम् ॥ २७
ब्रह्मोवाच
भाषसे वत्स वत्सेति सर्वसंहारकारणम् ।
मामिहाति स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ ॥ २८
कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम् ।
सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विष्णुसम्भवम् ॥ २ ९
विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम् ।
किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम् ॥ ३०
वेदो मां वक्ति नियमात्स्वयंभुवमजं विभुम् ।
पितामहं स्वराजं च परमेष्ठिनमुत्तमम् ॥ ३१
इत्याकर्ण्य हरिर्वाक्यं मम क्रुद्धो रमापतिः ।
सोऽपि मामाह जाने त्वां कर्तारमिति लोकतः ॥ ३२
विष्णुरुवाच
कर्तुं धर्तुं भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात् ।
विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम् ॥ ३३
पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ।
विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम् ॥ ३४
नारायणं महाबाहुं सर्वव्यापकमीश्वरम् ।
मन्नाभिपद्मतस्त्वं हि प्रसूतो नात्र संशयः ॥ ३५
तवापराधो नास्त्यत्र त्वयि मायाकृतं मम ।
शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम् ॥३६
च भर्ता च न मयास्ति समो विभुः ।
पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥२६ ॥
[ हे देवर्षे! ] उनके मन्दहासयुक्त उस वचनको सुनकर रजोगुणके कारण शत्रुता मान बैठा देवश्रेष्ठ मैं उन जनार्दन भगवान् विष्णुसे कहने लगा- ॥ २७ ॥
ब्रह्माजी बोले – हे निष्पाप! समस्त संहारके कारणभूत मुझे आप हँसते हुए जो हे वत्स! हे वत्स! कह रहे हैं, वह तो वैसे ही लग रहा है, जैसे कोई गुरु अपने शिष्यको हे वत्स! हे वत्स! कह रहा हो ॥ २८ ॥
मैं ही संसारका साक्षात् कर्ता, प्रकृतिका प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, विष्णु, ब्रह्मा, विष्णुको उत्पन्न करनेवाला विश्वात्मा, विधाता, धाता और पुण्डरीकाक्ष हूँ । आप अज्ञानवश मुझे हे वत्स! हे वत्स! ऐसा क्यों कह रहे हैं? इसका कारण शीघ्र बताइये ॥ २ ९ -३० ॥ नियमत: वेद भी मुझे स्वयम्भू, अज, विभु, पितामह, स्वराज, सर्वोत्तम और परमेष्ठी कहते हैं ॥ ३१ ॥
मेरे इस वचनको सुनकर लक्ष्मीपति भगवान् हरि क्रुद्ध हो उठे और कहने लगे कि मैं जानता हूँ-संसार आपको जगत्का कर्ता मानता है ॥ ३२ ॥
विष्णुजी बोले- आप संसारकी सृष्टि करने और पालन करनेके लिये मुझ अव्ययके अंगसे अवतीर्ण हुए हैं, फिर भी आप मुझ जगन्नाथ, नारायण, पुरुष, परमात्मा, निर्विकार, पुरुहूत, पुरुष्टुत्, विष्णु, अच्युत, ईशान, संसारके उत्पत्ति - स्थानरूप, नारायण, महाबाहु और सर्वव्यापकको भूल गये हैं । मेरे ही नाभिकमलसे आप उत्पन्न हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥३३–३५ ॥ इस विषयमें आपका अपराध भी नहीं है, आपके ऊपर तो मेरी माया है । हे चतुर्मुख! सुनिये, यह सत्य है कि मैं ही सभी देवोंका ईश्वर हूँ ॥ ३६ ॥
मैं ही कर्ता, हर्ता और भर्ता हूँ । मेरे समान अन्य कर्ता हर्ता पितामह ॥ ३७ शक्तिशाली कोई देव नहीं है । हे पितामह! मैं ही अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं परब्रह्म तथा परम तत्त्व हूँ ॥३७ ॥
मैं ही परमज्योति और वह परमात्मा विभु हूँ, अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः । इस जगत्में आज जो यह सब चराचर दिखायी दे रहा दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिञ्चराचरम् ॥ ३८ | है और सुनायी पड़ रहा है, हे चतुर्मुख! यह जो कुछ अद्य 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_9_2_Front
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२२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमित्यथ । भी है, वह मुझमें व्याप्त है - ऐसा आप जान लें । मैंने मया सृष्टं पुराव्यक्तं चतुर्विंशतितत्त्वकम् ॥ ३ ९ ही सृष्टिके पहले जगत्के चौबीस अव्यक्त तत्त्वोंकी नित्यं तेष्वणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधभयादयः प्रभावाच्च भवानङ्गान्यनेकानीह लीलया सृष्टा बुद्धिर्मया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः तन्मात्रं पञ्चकं तस्मान्मनो देहेन्द्रियाणि च ॥
आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया ।
इति बुद्ध्वा प्रजानाथ शरणं व्रज मे विधे ॥
अहं त्वां सर्वदुःखेभ्यो रक्षिष्यामि न संशयः । ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मा क्रोधसमन्वितः ।
को वा त्वमिति सम्भर्त्याब्रुवं मायाविमोहितः ॥
किमर्थं भाषसे भूरि बह्वनर्थकरं वचः ।
नेश्वरस्त्वं परं ब्रह्म कश्चित्कर्ता भवेत्तव ॥
मायया मोहितश्चाहं युद्धं चक्रे सुदारुणम् ।
हरिणा तेन वै सार्धं शङ्करस्य महाप्रभोः ॥
एवं मम हरेश्चासीत्सङ्गरो रोमहर्षणः ।
प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः ॥
एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः ।
रचना की है॥३८-३९ ॥
। उन्हीं तत्त्वोंसे प्राणियोंके शरीरधारक अणुओंका ॥ ४० निर्माण होता है और क्रोध, भय आदि षड्गुणोंकी सृष्टि हुई है । मेरे प्रभाव और मेरी लीलासे ही आपके अनेक अंग हैं ॥ ४० ॥
। मैंने ही बुद्धितत्त्वकी सृष्टि की है और उसमें ४१ तीन प्रकारके अहंकार उत्पन्न किये हैं । तदनन्तर उससे रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श - इन पंचतन्मात्राओं, मन एवं चक्षु, जिह्वा, घ्राण, श्रोत्र तथा त्वचा –इन ४२ पाँच ज्ञानेन्द्रियों और वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ— इन पाँच कर्मेन्द्रियों, क्षिति, जल, पावक, गगन और वायु — इन पंच महाभूतों तथा अन्य सभी भौतिक पदार्थोंकी रचना लीलासे ही की है । हे प्रजापते! हे ब्रह्मन्! ऐसा जानकर आप मेरी शरणमें आ जाइये, मैं सभी दुःखोंसे आपकी रक्षा करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ४१-४२१ / २ ॥ ब्रह्माजी बोले- विष्णुका यह वचन सुनकर मुझ ब्रह्माको क्रोध आ गया और मायाके वशीभूत ४३ हुआ मैं उनको डाँटते हुए पूछने लगा कि आप कौन हैं और किसलिये इतना अधिक निरर्थक बोल रहे हैं? ४४ आप न ईश्वर हैं, न परब्रह्म हैं । आपका कोई कर्ता अवश्य है॥४३-४४ ॥ महाप्रभु शंकरकी मायासे विमोहित मैं उन ४५ भगवान् विष्णुके साथ भयंकर युद्ध करने लगा ॥ ४५ ॥
उस प्रलयकालीन महासमुद्रके मध्य रजोगुणके ४६ कारण परस्पर बढ़ी शत्रुतासे हमारा और विष्णुका रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ ४६ ॥
इसी बीच हम दोनोंके छिड़े विवादको शान्त विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं तथावयोः ॥ ४७ करनेके लिये और ज्ञान प्रदान करनेके लिये हम दोनोंके सामने ही एक लिंग प्रकट हुआ ॥ ४७ ॥
वह लिंग अग्निकी प्रचण्ड हजार ज्वालाओंसे ज्वालामालासहस्राढ्यं भी अधिक ज्वालासमूहोंवाला, सैकड़ों कालाग्नियोंके कालानलशतोपमम् । क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् समान कान्तिमान्, क्षय एवं वृद्धिसे रहित, आदि - मध्य ॥ ४८ और अन्तसे विहीन था ॥ ४८ ॥
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