शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 241–250

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २२ ९

अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम् ।

तस्य ज्वालासहस्त्रेण मोहितो भगवान्हरिः ॥

मोहितं चाह मामत्र किमर्थं स्पर्धसेऽधुना ।

आगतस्तु तृतीयोऽत्र तिष्ठतां युद्धमावयोः ॥

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् ।

अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च ॥

परीक्षार्थं प्रजानाथ तस्य वै वायुवेगतः ।

भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम् ॥

ब्रह्मोवाच

एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा ।

वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान्मुने ॥

तदाप्रभृति मामाहुर्हंसहंसो विराडिति ।

हंस हंसेति यो ब्रूयात्स हंसोऽथ भविष्यति ॥

सुश्वेतो ह्यनलप्रख्यो विश्वतः पक्षसंयुतः ।

मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोर्ध्वं चोर्ध्वतः पुरा ॥

नारायणोऽपि विश्वात्मा सुश्वेतो ह्यभवत्तदा दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥ मेरुपर्वतवर्माणं गौरतीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम् कालादित्यसमाभासं दीर्घघोणं महास्वनम् ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम् वाराहाकारमास्थाय गतवांस्तदधो जवात् एवं वर्षसहस्त्रं च चरन्विष्णुरधो गतः तदाप्रभृति लोकेषु श्वेतवाराहसंज्ञकः कल्पो बभूव देवर्षे नराणां कालसंज्ञकः वह उपमारहित, अनिर्देश्य, बिना किसीके द्वारा ४ ९ उपस्थापित, अव्यक्त और विश्वसर्जक था । उस लिंगकी सहस्र ज्वालाओंके समूहको देखनेमात्र से ही भगवान् विष्णु मोहित हो उठे ॥ ४ ९ ॥ शिवकी मायासे मोहित मुझसे वे कहने लगे कि ५० इस समय मुझसे तुम इतनी स्पर्धा क्यों कर रहे हो? हम दोनोंके मध्य तो एक तीसरा भी आ गया है, इसलिये युद्ध रोक दिया जाय ॥५० ॥

हम दोनों इस अग्निसे उत्पन्न लिंगकी परीक्षा करें कि यह कहाँसे प्रकट हुआ है । मैं इस अनुपम ५१ अग्निस्तम्भके नीचे जाऊँगा और हे प्रजानाथ! आप इसकी परीक्षा करनेके लिये वायुवेगसे प्रयत्नपूर्वक ५२ शीघ्र ऊपरकी ओर जायँ ॥ ५१-५२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण किया और हे ५३ मुने! मैंने भी शीघ्र हंसका रूप बना लिया ॥५३ ॥

उसी समयसे लोग मुझे हंस - हंस और विराट् ऐसा ५४ कहने लगे । जो ‘ हंस - हंस ' यह कहकर मेरे नामका जप करता है, वह हंसस्वरूप ही हो जाता है ॥ ५४ ॥

अत्यन्त श्वेत, अग्निके समान, चारों ओरसे पंखोंसे ५५ युक्त और मन तथा वायुके वेगवाला होकर मैं ऊपरके भी ऊपर लिंगका पता लगाते हुए चला गया ॥ ५५ ॥

उसी समय विश्वात्मा नारायणने भी अत्यन्त । श्वेत स्वरूप धारण किया । दस योजन चौड़े, सौ ५६ योजन लम्बे मेरुपर्वतके समान शरीरवाले, श्वेत तथा । अत्यन्त तेज दाढ़ोंसे युक्त, प्रलयकालीन सूर्यके समान ॥ ५७ कान्तिमान्, दीर्घ नासिकासे सुशोभित, भयंकर [ घुर्र-घुर्रकी ] ध्वनि करनेवाले, छोटे - छोटे पैरोंसे युक्त, । विचित्र अंगोंवाले, विजय प्राप्त करनेकी इच्छासे ॥ ५८ परिपूर्ण, दृढ़ तथा अनुपम वाराहका स्वरूप धारण | करके वे भगवान् विष्णु भी अत्यन्त वेगसे उसके नीचे की ओर गये ॥ ५६–५८ ॥ । इस प्रकार रूप धारणकर भगवान् विष्णु एक ॥ ५ ९ हजार वर्षतक नीचेकी ओर ही चलते रहे । उसी समयसे [ पृथिवी आदि ] लोकोंमें श्वेतवाराह नामक कल्पका प्रादुर्भाव हुआ । हे देवर्षे! यह मनुष्योंकी । कालगणनाकी अवधि है ॥ ५ ९ १ / २ ॥

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२३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ बभ्राम बहुधा विष्णुः प्रभविष्णुरधोगतः ॥ ६० इधर [ अत्यन्त तीव्र गतिसे ] नीचेकी ओरसे जाते

नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः ।

तावत्कालं गतश्चोर्ध्वमहमप्यरिसूदन ॥ ६१

सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया ।

श्रान्तो न दृष्ट्वा तस्यान्तमहं कालादधोगतः ॥ ६२

तथैव भगवान्विष्णुः श्रान्तः कमललोचनः ।

सर्वदेवनिभस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः ॥ ६३

समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य भवं मुहुः ।

मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः ॥ ६४

पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव ह्यग्रतः परमेश्वरम् ।

प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति ॥ ६५

अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् ।

अलिङ्गं लिङ्गतां प्राप्तं ध्यानमार्गेऽप्यगोचरम् ॥ ६६

स्वस्थं चित्तं तदा कृत्वा नमस्कारपरायणौ ।

बभूवतुरुभावावामहं हरिरपि ध्रुवम् ॥ ६७

जानीवो न हि ते रूपं योऽसि सोऽसि महाप्रभो ।

नमोऽस्तु ते महेशान रूपं दर्शय नौ त्वरम् ॥ ६८

एवं शरच्छतान्यासन्नमस्कारं प्रकुर्वतोः ।

आवयोर्मुनिशार्दूल मदमास्थितयोस्तदा ॥ ६ ९ ।

हुए महातेजस्वी विष्णु बहुत प्रकारसे भ्रमण करते रहे, किंतु महावाराहरूपधारी विष्णु उस ज्योतिर्लिंगके मूलका अल्प भाग भी न देख सके ॥ ६०१ / २ ॥ हे अरिसूदन! तबतक मैं भी उस ज्योतिर्लिंग अन्तका पता लगानेके लिये वेगसे ऊपरकी ओर जाता रहा । यत्नपूर्वक उस ज्योतिर्लिंगके अन्तको जाननेका इच्छुक मैं अत्यन्त परिश्रमके कारण थक गया और उसका अन्त बिना देखे ही थोड़े समयमें नीचेकी ओर लौट पड़ा॥६१-६२ ॥ उसी प्रकार सर्वदेवस्वरूप, महाकाय, कमललोचन, भगवान् विष्णु भी थकानके कारण ज्योतिर्लिंगका अन्त देखे बिना ही ऊपर निकल आये ॥ ६३ ॥

शिवकी मायासे विमोहित विष्णु आकर मेरे साथ ही भगवान् शिवको बार - बार प्रणाम करके व्याकुल चित्तसे वहाँ खड़े रहे ॥ ६४ ॥

पृष्ठ प्रदेशकी ओरसे, पार्श्वोकी ओर और आगेकी ओरसे परमेश्वर शिवको मेरे साथ ही प्रणाम करके विष्णु भी सोचने लगे कि यह क्या है? ॥ ६५ ॥

वह रूप तो अनिर्देश्य, नाम तथा कर्मसे रहित, अलिंग होते हुए भी लिंगताको प्राप्त अगम्य था । तदनन्तर अपने मनको और विष्णु दोनों शिवको बार - बार लगे — हे महाप्रभो! हम आपके जानते । आप जो हैं, वही हैं, आपको है । हे महेशान! आप शीघ्र ही हमें दर्शन करायें ॥ ६६–६८ ॥ और ध्यानमार्गसे शान्त करके मैं प्रणामकर कहने स्वरूपको नहीं हमारा नमस्कार अपने स्वरूपका हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अहंकारसे आविष्ट हुए हम दोनोंको वहाँ नमस्कार करते हुए सैकड़ों वर्ष बीत गये ॥ ६ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने विष्णुब्रह्मविवादवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानका विष्णु - ब्रह्मा - विवाद - वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २३१ अथाष्टमोऽध्यायः ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन ब्रह्मोवाच

एवं तयोर्मुनिश्रेष्ठ दर्शनं काङ्क्षमाणयोः ।

विगर्वयोश्च सुरयोः सदा नौ स्थितयोर्मुने ॥

दयालुरभवच्छम्भुर्दीनानां प्रतिपालकः ।

गर्विणां गर्वहर्ता च सर्वेषां प्रभुरव्ययः ॥

तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः ।

ओमोमिति सुरश्रेष्ठात्सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः ॥

किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन्महास्वनः ।

विष्णुः सर्वसुराराध्यो निर्वैरस्तुष्टचेतसा ॥

लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तथापश्यत्सनातनम् ।

आद्यं वर्णमकाराख्यमुकारं चोत्तरे ततः ॥

मकारं मध्यतश्चैव नादमन्तेऽस्य चोमिति ।

सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे ॥

उत्तरे पावकप्रख्यमुकारमृषिसत्तम ।

शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं तस्य मध्यतः ॥

तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकसुप्रभम् ।

तुरीयातीतममलं निष्कलं निरुपद्रवम् ॥

निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम् ।

सबाह्याभ्यन्तरे चैव बाह्याभ्यन्तरसंस्थितम् ॥

आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यादिकारणम् सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्मपरायणम् ॥

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् ।

अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च ॥

ब्रह्माजी बोले- मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार हम दोनों देवता गर्वरहित हो निरन्तर प्रणाम करते रहे । हम १ दोनोंके मनमें एक ही अभिलाषा थी कि इस ज्योतिर्लिंगके रूपमें प्रकट हुए परमेश्वर प्रत्यक्ष दर्शन दें ॥ १ ॥

दीनोंके प्रतिपालक, अहंकारियोंका गर्व चूर्ण २ करनेवाले तथा सबके प्रभु अविनाशी शंकर हम दोनोंपर दयालु हो गये ॥२ ॥

उस समय वहाँ उन सुरश्रेष्ठसे ओम् - ओम् ऐसा ३ शब्दरूप नाद प्रकट हुआ, जो स्पष्टरूपसे प्लुत स्वरमें सुनायी दे रहा था ॥ ३ ॥

जोरसे प्रकट होनेवाले उस शब्दके विषयमें ४ ' यह क्या है ' - ऐसा सोचते हुए समस्त देवताओंके आराध्य भगवान् विष्णु मेरे साथ सन्तुष्टचित्तसे खड़े रहे । वे सर्वथा वैरभावसे रहित थे ॥४ ॥

उन्होंने लिंगके दक्षिण भागमें सनातन आदिवर्ण ५ अकारका दर्शन किया । तदनन्तर उत्तर भागमें उकारका, मध्यभागमें मकारका और अन्तमें ' ओम् ' इस नादका साक्षात् दर्शन किया ॥ ५१/२ ॥ ६ हे ऋषिश्रेष्ठ! दक्षिण भागमें प्रकट हुए आदिवर्ण अकारको सूर्य - मण्डलके समान तेजोमय देखकर उन्होंने उत्तर भागमें उकार वर्णको अग्निके समान ७ देखा । हे मुनिश्रेष्ठ! इसी तरह उन्होंने मध्यभागमें मकारको चन्द्रमण्डलके समान देखा ॥ ६-७ ॥ तदनन्तर उसके ऊपर शुद्ध स्फटिक मणिके ८ समान निर्मल प्रभासे निरुपद्रव, निर्द्वन्द्व, आभ्यन्तरके भेदसे ९ जगत्के भीतर और और अन्तसे रहित, परम आश्रय, सत्य, १० साक्षात्कार किया ॥ [ उस समय युक्त, तुरीयातीत, अमल, निष्कल, अद्वितीय, शून्यमय, बाह्य और रहित, बाह्याभ्यन्तर - भेदसे युक्त, बाहर स्वयं ही स्थित, आदि, मध्य आनन्दके आदिकारण तथा सबके आनन्द एवं अमृतस्वरूप परब्रह्मका ८–१० ॥ श्रीहरि यह सोचने लगे कि ] यह अग्निस्तम्भ यहाँ कहाँसे प्रकट हुआ है? हम दोनों ११ । फिर इसकी परीक्षा करें । मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भके

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२३२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ वेदशब्दोभयावेशं विश्वात्मानं व्यचिन्तयत् । नीचे जाऊँगा । ऐसा विचार करते हुए श्रीहरिने वेद तदाभवदृषिस्तत्र ऋषेः सारतमः स्मृतः तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान्परमेश्वरम् महादेवं परं ब्रह्म शब्दब्रह्मतनुं परम्

चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ।

अप्राप्य तन्निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः ॥

एकाक्षरेण तद्वाक्यमृतं

तद्वाक्यमृतं परमकारणम् ।

सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम् ॥

एकाक्षरादकाराख्याद्भगवान्बीजकोऽण्डजः ।

एकाक्षरादुकाराख्याद्धरिः परमकारणम् ॥

एकाक्षरान्मकाराख्याद्भगवान्नीललोहितः ।

सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः ॥

मकाराख्यस्तु यो नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् ।

मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीज उच्यते ॥

उकाराख्यो हरिर्योनिः प्रधानपुरुषेश्वरः ।

बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः ॥

बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः ।

अस्य लिङ्गादभूद् बीजमकारो बीजिनः प्रभोः ॥

उकारयोनौ निःक्षिप्तमवर्धत समन्ततः । ॥ १२ और शब्द दोनोंके आवेशसे युक्त विश्वात्मा शिवका चिन्तन किया । तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जो ऋषिसमूहके परम साररूप माने जाते हैं ॥ ११-१२ ॥ । उन्हीं ऋषिके द्वारा परमेश्वर श्रीविष्णुने जाना ॥ १३ कि इस शब्दब्रह्ममय शरीरवाले परम लिंगके रूपमें साक्षात् परब्रह्मस्वरूप महादेवजी ही यहाँ प्रकट हुए हैं ॥ १३ ॥

ये चिन्तारहित अथवा अचिन्त्य रुद्र हैं, जहाँ १४ | जाकर मनसहित वाणी उसे प्राप्त किये बिना ही लौट आती है, उस परब्रह्म परमात्मा शिवका वाचक एकाक्षर प्रणव ही है, वे इसके वाच्यार्थरूप हैं ॥ १४ ॥

उस परम कारण, ऋत, सत्य, आनन्द एवं १५ अमृतस्वरूप परात्पर परब्रह्मको इस एकाक्षरके द्वारा ही जाना जा सकता है ॥ १५ ॥

प्रणवके एक अक्षर अकारसे जगत्के बीजभूत १६ अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्माका बोध होता है । उसके दूसरे एक अक्षर उकारसे परमकारणरूप श्रीहरिका बोध होता है और तीसरे एक अक्षर मकारसे भगवान् १७ नीललोहित शिवका ज्ञान होता है । अकार सृष्टिकर्ता है, उकार मोहमें डालनेवाला है और मकार नित्य १८ अनुग्रह करनेवाला है । मकार - बोध्य सर्वव्यापी शिव बीजी [ बीजमात्रके स्वामी ] हैं और अकारसंज्ञक मुझ ब्रह्माको बीज कहा जाता है । उकारसंज्ञक श्रीहरि १ ९ योनि हैं । प्रधान और पुरुषके भी ईश्वर जो महेश्वर हैं, वे बीजी, बीज और योनि भी हैं । उन्हींको नाद कहा गया है॥१६–१९ ॥ बीजी अपनी इच्छासे ही अपने बीजको अनेक २० रूपोंमें विभक्त करके स्थित हैं । इन बीजी भगवान् महेश्वरके लिंगसे अकाररूप बीज प्रकट हुआ ॥ २० ॥

जो उकाररूप योनिमें स्थापित होकर सब सौवर्णमभवच्चाण्डमावेद्यं तदलक्षणम् ॥ २१ ओर बढ़ने लगा, वह सुवर्णमय अण्डके रूपमें ही बतानेयोग्य था । उसका अन्य कोई विशेष लक्षण नहीं लक्षित होता था ॥ २१ ॥

अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं वह दिव्य अण्ड अनेक वर्षोंतक जलमें ही व्यवस्थितम् । स्थित रहा । तदनन्तर एक हजार वर्षके बाद उस ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम् ॥ २२ | अण्डके दो टुकड़े हो गये । जलमें स्थित हुआ वह

पृष्ठ 245

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २३३

अण्डमप्सु स्थितं साक्षाद् व्याघातेनेश्वरेण तु ।

तथास्य सुशुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम् ॥ २३

जज्ञे सा द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा ।

तस्मादण्डाद्भवो जज्ञे ककाराख्यश्चतुर्मुखः ॥ २४

स स्स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः ।

एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः ॥ २५

यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम् ।

एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुश्चावयोस्तदा ॥ २६

ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छक्तिसम्भवैः ।

मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम् ॥ २७

एतस्मिन्नन्तरेऽन्यच्च रूपमद्भुतसुन्दरम् ।

ददर्श च मया सार्धं भगवान्विश्वपालकः ॥ २८

पञ्चवक्त्रं दशभुजं गौरकर्पूरवन्मुने ।

नानाकान्तिसमायुक्तं नानाभूषणभूषितम् ॥ २ ९

महोदारं महावीर्य

महावीर्यं महापुरुषलक्षणम् ।

तं दृष्ट्वा परमं रूपं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥ ३०

अथ प्रसन्नो भगवान्महेशः परमेश्वरः ।

दिव्यं शब्दमयं रूपमाख्याय प्रहसन्स्थितः ॥ ३१

अकारस्तस्य मूर्धा हि ललाटो दीर्घ उच्यते ।

इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम् ॥ ३२

उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाम उच्यते ।

ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः ॥ ३३

अण्ड अजन्मा ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका स्थान था और साक्षात् महेश्वरके आघातसे ही फूटकर दो भागोंमें बँट गया था । उस अवस्थामें ऊपर स्थित हुआ उसका सुवर्णमय कपाल बड़ी शोभा पाने लगा ॥ २२-२३ ॥ वही द्युलोकके रूपमें प्रकट हुआ तथा जो उसका दूसरा नीचेवाला कपाल था, वही यह पाँच लक्षणोंसे युक्त पृथिवी है । उस अण्डसे चतुर्भुज ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनकी ' क ' संज्ञा है ॥ २४ ॥

वे समस्त लोकोंके स्रष्टा हैं । इस प्रकार वे भगवान् महेश्वर ही ' अ ', ' उ ' और ' म् ’ – इन त्रिविध रूपोंमें वर्णित हुए हैं । इसी अभिप्रायसे उन ज्योतिर्लिंगस्वरूप सदाशिवने ' ओम् ', ‘ ओम्’– ऐसा कहा — यह बात यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्र कहते हैं ॥ २५ ॥

यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्रोंका यह कथन सुनकर ऋचाओं और साममन्त्रोंने भी हमसे आदरपूर्वक यह कहा — हे हरे! हे ब्रह्मन्! यह बात ऐसी ही है ॥ २६ ॥

इस तरह देवेश्वर शिवको जानकर श्रीहरिने शक्तिसम्भूत मन्त्रोंद्वारा उत्तम एवं महान् अभ्युदयसे शोभित होनेवाले उन महेश्वर देवका स्तवन किया ॥ २७ ॥

इसी बीचमें विश्वपालक भगवान् विष्णुने मेरे साथ एक और भी अद्भुत एवं सुन्दर रूपको देखा ॥ २८ ॥

हे मुने! वह रूप पाँच मुखों और दस भुजाओंसे अलंकृत था । उसकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी । वह नाना प्रकारकी छटाओंसे और भाँति - भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित था ॥२ ९ ॥ उस परम उदार, महापराक्रमी और महापुरुषके लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त उत्कृष्ट रूपका दर्शन करके मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये ॥३० ॥

तत्पश्चात् परमेश्वर भगवान् महेश प्रसन्न होकर अपने दिव्य शब्दमय रूपको प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गये ॥३१ ॥

[ ह्रस्व ] अकार उनका मस्तक और दीर्घ अकार ललाट है । इकार दाहिना नेत्र और ईकार बायाँ नेत्र है ॥ ३२ ॥

उकारको उनका दाहिना और ऊकारको बायाँ कान बताया जाता है । ऋकार उन परमेश्वरका दायाँ । कपोल है और ॠकार उनका बायाँ कपोल है ।

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२३४ वामं कपोलमॄकारो लृ लृ नासापुटे उभे एकारश्चोष्ठ ऊर्ध्वश्च ह्यैकारस्त्वधरो विभोः ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात् अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य शूलिनः

कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्च हस्ताश्च दक्षिणे ।

चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तास्तु वामतः ॥

टादिपञ्चाक्षरं पादास्तादि पञ्चाक्षरं तथा ।

पकार उदरं तस्य फकारः पार्श्व उच्यते ॥

बकारो वामपार्श्वस्तु भकारः स्कन्ध उच्यते ।

मकारो हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः ॥

यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः ।

हकारो नाभिरूपो हि क्षकारो घ्राण उच्यते ॥

एवं शब्दमयं रूपमगुणस्य गुणात्मनः ।

दृष्ट्वा तमुमया सार्धं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥

एवं दृष्ट्वा महेशानं शब्दब्रह्मतनुं शिवम् ।

प्रणम्य च मया विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः ॥

ॐकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम् ।

शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम् ॥

मेधाकारमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम् ।

गायत्रीप्रभवं मन्त्रं सहितं वश्यकारकम् ॥

चतुर्विंशतिवर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । लृ और लु — ये उनकी नासिकाके दोनों छिद्र हैं । ॥ ३४ एकार उन सर्वव्यापी प्रभुका ऊपरी ओष्ठ है और ऐकार अधर है ॥३३-३४ ॥ । ओकार तथा औकार- ये दोनों क्रमशः उनकी ॥ ३५ ऊपर और नीचेकी दो दंतपंक्तियाँ हैं । अं और अ: उन देवाधिदेव शूलधारी शिवके दोनों तालु हैं ॥ ३५ ॥

क आदि पाँच अक्षर उनके दाहिने पाँच हाथ हैं ३६ और च आदि पाँच अक्षर बायें पाँच हाथ हैं ॥ ३६ ॥

ट आदि और त आदि पाँच - पाँच अक्षर उनके पैर ३७ हैं । पकार पेट है । फकारको दाहिना पार्श्व बताया जाता है

और बकारको बायाँ पार्श्व । भकारको कंधा कहा जाता है ।

३८ मकार उन योगी महादेव शम्भुका हृदय है ॥ ३७-३८ ॥

यसे लेकर स तक [ य, र, ल, व, श, ष तथा ३ ९ स — ये सात अक्षर ] सर्वव्यापी शिवकी सात धातुएँ हैं । हकारको उनकी नाभि और क्षकारको नासिका कहा जाता है ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार निर्गुण एवं गुण - स्वरूप परमात्मा ४० शब्दमय रूपको भगवती उमासहित देखकर श्रीहरि मेरे साथ कृतार्थ हो गये ॥४० ॥

इस प्रकार शब्द ब्रह्ममय- शरीरधारी महेश्वर ४१ शिवका दर्शन पाकर मेरे साथ श्रीहरिने उन्हें प्रणाम करके पुनः ऊपरकी ओर देखा ॥४१ ॥

उस समय उन्हें पाँच कलाओंसे युक्त, ४२ ओंकारजनित, शुद्ध स्फटिक मणिके समान सुन्दर, अड़तीस अक्षरोंवाले मन्त्रका साक्षात्कार हुआ ॥ ४२ ॥

पुनः सम्पूर्ण धर्म तथा अर्थका साधक, बुद्धिस्वरूप, ४३ अत्यन्त हितकारक और सबको वशमें करनेवाला गायत्री नामक महान् मन्त्र लक्षित हुआ । वह चौबीस अक्षरों तथा चार कलाओंसे युक्त श्रेष्ठ मन्त्र है । अथ पञ्चसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम् ॥ ४४ पंचाक्षरमन्त्र ( नमः शिवाय ) आठ कलाओंसे युक्त है ॥ ४३-४४ ॥ आभिचारिकमत्यर्थं प्रायस्त्रिंशच्छुभाक्षरम् । अभिचारसिद्धिके लिये प्रयोग किया जानेवाला यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चविंशच्छुभाक्षरम् ॥ ४५ मन्त्र तीस अक्षरोंसे सम्पन्न है, किंतु यजुर्वेदमें प्रयुक्त मन्त्र पच्चीस सुन्दर अक्षरोंका ही है ॥ ४५ ॥

कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा । यह आठ कलाओंसे युक्त तथा सुश्वेत मन्त्र है, त्रयोदशकलायुक्तं जिसका प्रयोग शान्तिकर्मकी सिद्धिके लिये किया जाता बालाद्यैः सह लेहितम् ॥ ४६ | है । इस मन्त्रके अतिरिक्त तेरह कलाओंसे युक्त जो श्रेष्ठ

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता (

बभूवुरस्य चोत्पत्तिवृद्धिसंहारकारणम् ।

वर्णा एकाधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु ॥ ४७

पुनर्मृत्युञ्जयं मन्त्रं पञ्चाक्षरमतः परम् ।

चिन्तामणिं तथा मन्त्रं दक्षिणामूर्तिसंज्ञकम् ॥ ४८

ततस्तत्त्वमसीत्युक्तं महावाक्यं हरस्य च ।

पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान्हरिः ॥ ४ ९

अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम् ।

ईशानमीशमुकुटं पुरुषाख्यं पुरातनम् ॥ ५०

अघोरहृदयं हृद्यं सर्वगुह्यं सदाशिवम् ।

वामपादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम् ॥ ५१

विश्वतः पादवन्तं तं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम् ।

ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम् ॥ ५२

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः साम्बं वरदमीश्वरम् ।

मया च सहितो विष्णुर्भगवांस्तुष्टचेतसा ॥ ५३

सृष्टिखण्ड ) २३५ मन्त्र है, वह बाल, युवा और वृद्ध आदि अवस्थाओंमें आनेवाले क्रमके अनुसार उत्पत्ति, पालन तथा संहारका कारणरूप है । इसमें इकसठ वर्ण होते हैं ॥ ४६-४७ ॥ इसके पश्चात् विष्णुने मृत्युंजयमन्त्र, पंचाक्षरमन्त्र, चिन्तामणिमन्त्र ' तथा दक्षिणामूर्तिमन्त्र ' को देखा ॥ ४८ ॥

इसके बाद भगवान् विष्णुने शंकरको ‘ तत्त्वमसि— हो ' - यह महावाक्य कहा । इस प्रकार उक्त पंचमन्त्रोंको प्राप्त करके वे भगवान् श्रीहरि उनका जप करने लगे ॥ ४ ९ ॥ इसके पश्चात् ऋक्, यजुः, सामरूप वर्णोंकी कलाओंसे युक्त, ईशान, ईशोंके मुकुट, पुरातन, पुरुष, अघोरहृदय, मनोहर, सर्वगुह्य, सदाशिव, ताण्डव नृत्यादि कालोंमें वामपादपर अवस्थित रहनेवाले, महादेव, महान् सर्पराजको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, चारों ओर चरण और नेत्रवाले, कल्याणकारी, ब्रह्माके अधिपति, सृष्टि - स्थिति - संहारके कारणभूत, वरदायक साम्बमहेश्वरको देखकर भगवान् विष्णु प्रसन्न मनसे प्रिय वचनोंद्वारा मेरे । साथ उनकी स्तुति करने लगे॥५०–५३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शब्दब्रह्मतनुवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें शब्दब्रह्म - तनु - वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूपका विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों ब्रह्मोवाच

अथाकर्ण्य नुतिं विष्णुकृतां स्वस्य महेश्वरः ।

प्रादुर्बभूव सुप्रीतः सवामः करुणानिधिः ॥

पञ्चवक्त्रस्त्रिनयनो भालचन्द्रो जटाधरः ।

गौरवर्णो विशालाक्षो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

१. ‘ क्ष्म्यौं ' – यह चिन्तामणिमन्त्र है । २. ‘ ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां देवताओंकी एकताका प्रतिपादन ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] भगवान् विष्णुके द्वारा की हुई अपनी स्तुति सुनकर करुणानिधि महेश्वर १ प्रसन्न हुए और उमादेवीके साथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये ॥१ ॥

[ उस समय ] उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन - तीन नेत्र शोभा पाते थे । भालदेशमें चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था । सिरपर जटा धारण किये, गौरवर्ण, विशाल नेत्रवाले शिवने अपने सम्पूर्ण २ अंगोंमें विभूति लगा रखी थी ॥२ ॥

प्रयच्छ स्वाहा । ' ' - यह दक्षिणामूर्ति नामक मन्त्र है ।

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२३६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ दशबाहुर्नीलगल: सर्वाभरणभूषितः । उनकी दस भुजाएँ थीं । उनके कण्ठमें नीला चिह्न सर्वाङ्गसुन्दरो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥ ३ था । वे समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे । उन सर्वांगसुन्दर शिवके मस्तक भस्ममय त्रिपुण्ड्रसे अंकित थे ॥ ३ ॥

तं दृष्ट्वा तादृशं देवं सवामं परमेश्वरम् । ऐसे परमेश्वर महादेवजीको भगवती उमाके तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्विष्णुर्मया सह निगमं श्वासरूपेण ददौ तस्मै ततो हरः विष्णवे च प्रसन्नात्मा महेशः करुणाकरः

ततो ज्ञानमदात्तस्मै रहस्यं परमात्मने ।

परमात्मा पुनर्मह्यं दत्तवान्कृपया मुने ॥

सम्प्राप्य निगमं विष्णुः पप्रच्छ पुनरेव तम् ।

कृतार्थः साञ्जलिर्नत्वा मया सह महेश्वरम् ॥

विष्णुरुवाच

कथं च तुष्यसे देव मया पूज्यः कथं प्रभो ।

कथं ध्यानं प्रकर्तव्यं कथं व्रजसि वश्यताम् ॥

किं कर्तव्यं महादेव ह्यावाभ्यां तव शासनात् ।

सदा सदाज्ञापय नौ प्रीत्यर्थं कुरु शङ्कर ॥

एतत्सर्वं महाराज कृपां कृत्वावयोः प्रभो ।

कथनीयं तथान्यच्च विज्ञाय स्वानुगौ शिव ॥

ब्रह्मोवाच

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नो भगवान्हरः ।

उवाच वचनं प्रीत्या सुप्रसन्नः कृपानिधिः ॥

श्रीशिव उवाच

भक्त्या च भवतोर्नूनं प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ ।

पश्यन्तं मां महादेवं भयं सर्वं विमुञ्चताम् ॥

मम लिङ्गं सदा पूज्यं ध्येयं चैतादृशं मम । ॥ ४ साथ उपस्थित देखकर भगवान् विष्णुने मेरे साथ पुनः प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की ॥ ४ ॥

। तब करुणाकर भगवान् महेश्वर शिवने प्रसन्नचित्त ॥ होकर उन श्रीविष्णुदेवको श्वासरूपसे वेदका उपदेश दिया ॥५ ॥

हे मुने! उसके बाद शिवने परमात्मा श्रीहरिको ६ गुह्य ज्ञान प्रदान किया । फिर उन परमात्माने कृपा करके मुझे भी वह ज्ञान दिया ॥६ ॥

वेदका ज्ञान प्राप्तकर कृतार्थ हुए भगवान् ७ विष्णुने मेरे साथ हाथ जोड़कर महेश्वरको नमस्कार करके पुनः उनसे पूछा ॥७ ॥

विष्णुजी बोले- हे देव! आप कैसे प्रसन्न होते हैं? हे प्रभो! मैं आपकी पूजा किस प्रकार करूँ? ८ आपका ध्यान किस प्रकारसे किया जाय और आप किस विधिसे वशमें हो जाते हैं? ॥ ८ ॥

हे महादेव! आपकी आज्ञासे हम लोगोंको क्या ९ करना चाहिये? हे शंकर! कौन कार्य अच्छा है और कौन बुरा है, इस विवेकके लिये हम दोनोंके ऊपर कल्याणहेतु आप प्रसन्न हों और उचित बतानेकी कृपा करें ॥ ९ ॥

हे महाराज! हे प्रभो! हे शिव! हम दोनोंपर १० कृपा करके यह सब एवं अन्य जो कहनेयोग्य है, वह सब हम दोनोंको अपना अनुचर समझकर बतायें ॥ १० ॥

ब्रह्माजी बोले – [ हे मुने! ] [ श्रीहरिकी ] यह बात सुनकर प्रसन्न हुए कृपानिधान भगवान् शिव ११ प्रीतिपूर्वक यह बात कहने लगे ॥११ ॥

श्रीशिवजी बोले- हे सुरश्रेष्ठगण! मैं आप दोनोंकी भक्तिसे निश्चय ही बहुत प्रसन्न हूँ । आपलोग १२ मुझ महादेवकी ओर देखते हुए सभी भयोंको छोड़ दीजिये ॥ १२ ॥

मेरा यह लिंग सदा पूज्य है, सदा ही ध्येय है । इस समय आपलोगोंको मेरा स्वरूप जैसा दिखायी देता है, वैसे ही लिंगरूपका प्रयत्नपूर्वक इदानीं दृश्यते यद्वत्तथा कार्यं प्रयत्नतः ॥ १३ | करना चाहिये ॥ १३ ॥ पूजन - चिन्तन

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २३७

पूजितो लिङ्गरूपेण प्रसन्नो विविधं फलम् ।

दास्यामि सर्वलोकेभ्यो मनोऽभीष्टान्यनेकशः ॥ १४

यदा दुःखं भवेत्तत्र युवयोः सुरसत्तमौ ।

पूजिते मम लिङ्गे च तदा स्याद् दुःखनाशनम् ॥ १५

युवां प्रसूतौ प्रकृतेर्मदीयाया महाबलौ ।

सव्यापसव्यगात्राभ्यां मम सर्वेश्वरस्य हि ॥ १६

अयं मे दक्षिणात्पार्श्वाद् ब्रह्मा लोकपितामहः ।

वामपार्श्वाच्च विष्णुस्त्वं समुत्पन्नः परात्मनः ॥ १७

प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्यां यथेप्सितम् ।

मयि भक्तिर्दृढा भूयाद्युवयोरभ्यनुज्ञया ॥ १८

पार्थिवीं चैव मन्मूर्तिं विधाय कुरुतं युवाम् ।

सेवां च विविधां प्राज्ञौ कृत्वा सुखमवाप्स्यथः ॥ १ ९

ब्रह्मन्सृष्टिं कुरु त्वं हि मदाज्ञापरिपालकः ।

वत्स वत्स हरे त्वं च पालयैवं चराचरम् ॥ २०

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा नौ प्रभुस्ताभ्यां पूजाविधिमदाच्छुभाम् ।

येनैव पूजितः शम्भुः फलं यच्छत्यनेकशः ॥२१

इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च सहितो हरिः ।

प्रत्युवाच महेशानं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ २२

विष्णुरुवाच

यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ ।

भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी ॥ २३

त्वमप्यवतरस्वाद्य लीलया निर्गुणोऽपि हि ।

सहायं कुरु नौ तात त्वं परः परमेश्वरः ॥ २४

आवयोर्देवदेवेश विवादमपि शोभनम् ।

इहागतो भवान्यस्माद्विवादशमनाय नौ ॥ २५

लिंगरूपसे पूजा गया मैं प्रसन्न होकर सभी लोगोंको अनेक प्रकारके फल तो दूँगा ही, साथ ही मनकी अन्य अनेक अभिलाषाएँ भी पूरी करूँगा । हे देवश्रेष्ठ! जब भी आपलोगोंको कष्ट हो, तब मेरे लिंगकी पूजा करें, जिससे आपलोगोंके कष्टका नाश हो जायगा ॥ १४-१५ ॥ आप दोनों महाबली देवता मेरी स्वरूपभूत प्रकृतिसे और मुझ सर्वेश्वरके दायें और बायें अंगोंसे प्रकट हुए हैं ॥ १६ ॥

ये लोकपितामह ब्रह्मा मुझ परमात्माके दाहिने पार्श्वसे उत्पन्न हुए हैं और आप विष्णु वाम पार्श्वसे प्रकट हुए हैं ॥१७ ॥

मैं आप दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ और मनोवांछित वर दे रहा हूँ । मेरी आज्ञासे आप दोनोंकी मुझमें सुदृढ़ भक्ति हो ॥१८ ॥

हे विद्वानो! मेरी पार्थिव - मूर्ति बनाकर आप दोनों उसकी अनेक प्रकारसे पूजा करें । ऐसा करनेपर आपलोगोंको सुख प्राप्त होगा ॥१ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञाका पालन करते हुए जगत्की सृष्टि कीजिये और हे विष्णो! आप इस चराचर जगत्का पालन कीजिये ॥२० ॥

ब्रह्माजी बोले- हम दोनोंसे ऐसा कहकर भगवान् शंकरने हमें पूजाकी उत्तम विधि प्रदान की, जिसके अनुसार पूजित होनेपर शिव अनेक प्रकारके फल देते हैं ॥ २१ ॥

शम्भुकी यह बात सुनकर श्रीहरि मेरे साथ महेश्वरको हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे— ॥ २२ ॥

विष्णु बोले— [ हे प्रभो! ] यदि हमारे प्रति आपमें प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हमें वर देना चाहते हैं, तो हम यही वर माँगते हैं कि आपमें हम दोनोंकी सदा अविचल भक्ति बनी रहे ॥ २३ ॥

आप निर्गुण हैं, फिर भी अपनी लीलासे आप अवतार धारण कीजिये । हे तात! आप परमेश्वर हैं, हमलोगोंकी सहायता करें ॥ २४ ॥

हे देवदेवेश्वर! हम दोनोंका विवाद शुभदायक रहा, जिसके कारण आप हम दोनोंके विवादको शान्त करनेके लिये यहाँ प्रकट हुए ॥ २५ ॥

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२३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले— [ हे मुने! ] श्रीहरिकी यह तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम् । बात सुनकर भगवान् हरने मस्तक झुकाकर प्रणाम प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटः स्वयम् ॥ २६ करके स्थित हुए उन श्रीहरिसे पुनः कहा । वे विष्णु श्रीमहेश उवाच प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ताहं सगुणोऽगुणः परब्रह्म निर्विकारी सच्चिदानन्दलक्षणः त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलोऽहं सदा हरे स्तुतोऽहं यत्त्वया विष्णो ब्रह्मणा मेऽवतारणे । प्रार्थनां तां करिष्यामि सत्यां यद्भक्तवत्सलः

मद्रूपं परमं ब्रह्मन्नीदृशं भवदङ्गतः ।

प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्रः प्रकीर्तितः ॥

मदंशात्तस्य सामर्थ्यं न्यूनं नैव भविष्यति ।

योऽहं सोऽहं न भेदोऽस्ति पूजाविधिविधानतः ॥

यथा च ज्योतिषः सङ्गाज्जलादेः स्पर्शता न वै ।

तथा ममागुणस्यापि संयोगाद् बन्धनं न हि ॥

शिवरूपं ममैतच्च रुद्रोऽपि शिववत्तदा । न तत्र परभेदो वै कर्तव्यश्च महामुने ॥

वस्तुतो ह्येकरूपं हि द्विधा भिन्नं जगत्युत ।

अतो भेदो न विज्ञेयः शिवे रुद्रे कदाचन ॥

सुवर्णस्य यथैकस्य वस्तुत्वं नैव गच्छति ।

स्वयं हाथ जोड़कर खड़े रहे ॥ २६ ॥

श्रीमहेश बोले- मैं सृष्टि, पालन और संहारका । कर्ता, सगुण, निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानन्दलक्षणवाला ॥ २७ तथा परब्रह्म परमात्मा हूँ ॥ २७ ॥

। हे विष्णो! सृष्टि, रक्षा और प्रलयरूप गुणोंके ॥ २८ भेदसे मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रका नाम धारण करके तीन स्वरूपोंमें विभक्त हुआ हूँ । हे हरे! मैं वास्तवमें सदा निष्कल हूँ ॥ २८ ॥

हे विष्णो! आपने और ब्रह्माने मेरे अवतारके ॥ २ ९ निमित्त जो मेरी स्तुति की है, उस प्रार्थनाको मैं अवश्य सत्य करूँगा; क्योंकि मैं भक्तवत्सल हूँ ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही परम उत्कृष्ट रूप तुम्हारे ३० शरीरसे इस लोकमें प्रकट होगा, जो नामसे ' रुद्र ' कहलायेगा ॥३० ॥

मेरे अंशसे प्रकट हुए रुद्रकी सामर्थ्य मुझसे कम ३१ नहीं होगी । जो मैं हूँ, वही ये रुद्र हैं । पूजाके विधि-विधानकी दृष्टिसे भी मुझमें और उनमें कोई अन्तर नहीं है ॥३१ ॥

जैसे जल आदिके साथ ज्योतिर्मय बिम्बका ३२ ( प्रतिबिम्बके रूपमें ) सम्पर्क होनेपर भी बिम्बमें स्पर्शदोष नहीं लगता, उसी प्रकार मुझ निर्गुण परमात्माको भी किसीके संयोगसे बन्धन नहीं प्राप्त होता ॥ ३२ ॥

यह मेरा शिवरूप है । जब रुद्र प्रकट होंगे, तब ३३ वे भी शिवके ही तुल्य होंगे । हे महामुने! [ मुझमें और ] उनमें परस्पर भेद नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥

वास्तवमें एक ही रूप सब जगत्में [ व्यवहार-३४ निर्वाहके लिये ] दो रूपोंमें विभक्त हो गया है । अतः शिव और रुद्रमें कभी भी भेद नहीं मानना चाहिये ॥ ३४ ॥

[ शिव और रुद्रमें भेद वैसे ही नहीं है ] जैसे एक सुवर्णखण्डमें समरूपसे एक ही वस्तुतत्त्व विद्यमान रहता है, किंतु उसीका आभूषण बना देनेपर नामभेद आ जाता है । वस्तुतत्त्वकी दृष्टिसे उसमें भेद अलङ्कृतिकृते देव नामभेदो न वस्तुत: ॥ ३५ नहीं होता ॥ ३५ ॥