शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 251–260

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २३ ९

यथैकस्या मृदो भेदो नानापात्रे न वस्तुत: ।

कारणस्यैव कार्ये न सन्निधानं निदर्शनम् ॥

ज्ञातव्यं बुधवर्यैश्च निर्मलज्ञानिभिः सुरौ ।

एवं ज्ञात्वा भवद्भ्यां तु न दृश्यं भेदकारणम् ॥

वस्तुवत् सर्वदृश्यं च शिवरूपं मतं मम ।

अहं भवानजश्चैव रुद्रो योऽयं भविष्यति ॥

एकरूपा न भेदस्तु भेदे वै बन्धनं भवेत् ।

तथापि च मदीयं हि शिवरूपं सनातनम् ॥

मूलीभूतं सदोक्तं च सत्यज्ञानमनन्तकम् ।

एवं ज्ञात्वा सदा ध्येयं मनसा चैव तत्त्वतः ॥

श्रूयतां चैव भो ब्रह्मन् यद्गोप्यं कथ्यते मया ।

भवन्तौ प्रकृतेर्यातौ नायं वै प्रकृतेः पुनः ॥

मदाज्ञा जायते तत्र ब्रह्मणो भ्रुकुटेरहम् ।

गुणेष्वपि यथा प्रोक्तस्तामसः प्रकृतो हरः ॥

वैकारिकश्च विज्ञेयो योऽहङ्कार उदाहृतः ।

नामतो वस्तुतो नैव तामसः परिचक्ष्यते ॥

एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मन्करणीयमिदं त्वया ।

सृष्टिकर्ता भव ब्रह्मन्सृष्टेश्च पालको हरिः ॥

मदीयश्च तथांशो यो लयकर्ता भविष्यति ।

इयं या प्रकृतिर्देवी ह्युमाख्या परमेश्वरी ॥

तस्यास्तु शक्तिर्वाग्देवी ब्रह्माणं सा भजिष्यति ।

अन्या शक्तिः पुनस्तत्र प्रकृतेः सम्भविष्यति ॥

समाश्रयिष्यते विष्णुं लक्ष्मीरूपेण सा तदा ।

पुनश्च काली नाम्ना सा मदंशं प्राप्स्यति ध्रुवम् ॥

जिस प्रकार एक ही मिट्टीसे बने हुए नाना ३६ प्रकारके पात्रोंमें नाम और रूपका तो भेद आ जाता है, किंतु मिट्टीका भेद नहीं होता; क्योंकि कार्यमें कारणकी ही विद्यमानता दिखायी देती है । हे देवो! ३७ निर्मल ज्ञानवाले श्रेष्ठ विद्वानोंको यह जान लेना चाहिये । ऐसा समझकर आपलोग भी शिव और रुद्रमें भेदबुद्धिवाली दृष्टिसे न देखें ॥ ३६-३७ ॥ वास्तवमें सारा दृश्य ही मेरा शिवरूप है — ऐसा ३८ मेरा मत है । मैं, आप, ब्रह्मा तथा जो ये रुद्र प्रकट होंगे, वे सब - के - सब एकरूप हैं, इनमें भेद नहीं है । भेद माननेपर अवश्य ही बन्धन होगा । तथापि मेरे ३ ९ शिवरूपको ही सर्वदा सनातन, मूलकारण, सत्यज्ञानमय तथा अनन्त कहा गया है - ऐसा जानकर आपलोगोंको सदा मनसे मेरे यथार्थ स्वरूपका ध्यान करना ४० चाहिये ॥ ३८–४० ॥ हे ब्रह्मन्! सुनिये, मैं आपको एक गोपनीय बात ४१ बता रहा हूँ । आप दोनों प्रकृतिसे उत्पन्न हुए हैं, किंतु ये रुद्र प्रकृतिसे उत्पन्न नहीं हैं ॥४१ ॥

मैं अपनी इच्छासे स्वयं ब्रह्माजीकी भ्रुकुटिसे प्रकट ४२ हुआ हूँ । गुणोंमें भी मेरा प्राकट्य कहा गया है । जैसा कि लोगोंने कहा है कि हर तामस प्रकृतिके हैं । वास्तवमें उस रूपमें अहंकारका वर्णन हुआ है । उस अहंकारको ४३ | केवल तामस ही नहीं, वैकारिक [ सात्त्विक ] भी समझना चाहिये; [ सात्त्विक देवगण वैकारिक अहंकारकी ही सृष्टि हैं । ] यह तामस और सात्त्विक आदि भेद केवल नाममात्रका है, वस्तुतः नहीं है । वास्तवमें हरको तामस नहीं कहा जा सकता ॥ ४२-४३ ॥ हे ब्रह्मन्! इस कारणसे आपको ऐसा करना ४४ चाहिये । हे ब्रह्मन्! आप इस सृष्टिके निर्माता बनें और श्रीहरि इसका पालन करनेवाले हों ॥४४ ॥

मेरे अंशसे प्रकट होनेवाले जो रुद्र हैं, वे इसका प्रलय करनेवाले होंगे । ये जो उमा नामसे विख्यात परमेश्वरी ४५ प्रकृति देवी हैं, इन्हींकी शक्तिभूता वाग्देवी ब्रह्माजीका सेवन करेंगी । पुनः इन प्रकृति देवीसे वहाँ जो दूसरी ४६ शक्ति प्रकट होंगी, वे लक्ष्मीरूपसे भगवान् विष्णुका आश्रय लेंगी । तदनन्तर पुनः काली नामसे जो तीसरी ४७ शक्ति प्रकट होंगी, वे निश्चय ही मेरे अंशभूत रुद्रदेवको

पृष्ठ 252

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२४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९

ज्योतीरूपेण सा तत्र कार्यार्थे सम्भविष्यति ।

एवं देव्यास्तथा प्रोक्ताः शक्तयः परमाः शुभाः ॥ ४८

सृष्टिस्थितिलयानां हि कार्यं तासां क्रमाद् ध्रुवम् ।

एतस्याः प्रकृतेरंशा मत्प्रियायाः सुरोत्तम ॥ ४ ९

त्वं च लक्ष्मीमुपाश्रित्य कार्यं कर्तुमिहार्हसि ।

ब्रह्मंस्त्वं च गिरां देवीं प्रकृत्यंशामवाप्य च ॥ ५०

सृष्टिकार्यं हृदा कर्तुं मन्निर्देशादिहार्हसि ।

अहं कालीं समाश्रित्य मत्प्रियांशां परात्पराम् ॥ ५१

रुद्ररूपेण प्रलयं करिष्ये कार्यमुत्तमम् ।

चतुर्वर्णमयं लोकं तत्सर्वैराश्रमैर्ध्रुवम् ॥५२

तदन्यैर्विविधैः कार्यैः कृत्वा सुखमवाप्स्यथः ।

ज्ञानविज्ञानसंयुक्तो लोकानां हितकारकः ॥ ५३

मुक्तिदोऽत्र भवानद्य भव लोके मदाज्ञया ।

मद्दर्शने फलं यद्वत्तदेव तव दर्शने ॥ ५४

इति दत्तो वरस्तेऽद्य सत्यं सत्यं न संशयः ।

ममैव हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये ह्यहम् ॥ ५५

उभयोरन्तरं यो वै न जानाति मनो मम ।

वामाङ्गजो मम हरिर्दक्षिणाङ्गोद्भवो विधि: ॥ ५६

महाप्रलयकृद् रुद्रो विश्वात्मा हृदयोद्भवः ।

त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया ॥ ५७

सर्गरक्षालयकरस्त्रिगुणै रज आदिभिः ।

गुणभिन्नः शिवः साक्षात्प्रकृतेः पुरुषात्परः ॥ ५८

परं ब्रह्माद्वयो नित्योऽनन्तः पूर्णो निरञ्जनः ।

अन्तस्तमो बहिःसत्त्वस्त्रिजगत्पालको हरिः ॥ ५ ९

अन्तः सत्त्वस्तमोबाह्यस्त्रिजगल्लयकृद्धरः ॥ ६०

प्राप्त होंगी । वे कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ ज्योतिरूपसे प्रकट होंगी । इस प्रकार मैंने देवीकी शुभस्वरूपा पराशक्तियोंको बता दिया ॥ ४५–४८ ॥ उनका कार्य क्रमशः सृष्टि, पालन और संहारका सम्पादन ही है । हे सुरश्रेष्ठ! ये सब - की - सब मेरी प्रिया प्रकृति देवीकी अंशभूता हैं ॥४ ९ ॥ हे हरे! आप लक्ष्मीका सहारा लेकर कार्य कीजिये । हे ब्रह्मन्! आप प्रकृतिकी अंशभूता वाग्देवीको प्राप्तकर मेरी आज्ञाके अनुसार मनसे सृष्टिकार्यका संचालन करें और मैं अपनी प्रियाकी अंशभूता परात्पर कालीका आश्रय लेकर रुद्ररूपसे प्रलयसम्बन्धी उत्तम कार्य करूँगा । आप सब लोग अवश्य ही सम्पूर्ण आश्रमों तथा उनसे भिन्न अन्य विविध कार्योंद्वारा चारों वर्णोंसे भरे हुए लोककी सृष्टि एवं रक्षा आदि करके सुख पायेंगे॥५०–५२१ / २ ॥ [ हे हरे! ] आप ज्ञान - विज्ञानसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी हैं । अतः अब आप मेरी आज्ञासे जगत्में [ सब लोगोंके लिये ] मुक्तिदाता बनें । मेरा दर्शन होनेपर जो फल प्राप्त होता है, वही फल आपका दर्शन होनेपर भी प्राप्त होगा । मैंने आज आपको यह वर दे दिया, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है । मेरे हृदयमें विष्णु हैं और विष्णुके हृदयमें मैं हूँ॥५३–५५ ॥ जो इन दोनोंमें अन्तर नहीं समझता, वही मेरा मन है अर्थात् वही मुझे प्रिय है । श्रीहरि मेरे बायें अंगसे प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए हैं और महाप्रलयकारी विश्वात्मा रुद्र मेरे हृदयसे प्रादुर्भूत हुए हैं । हे विष्णो! मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और भव नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हो गया हूँ । मैं रज आदि तीनों गुणोंके द्वारा सृष्टि, पालन तथा संहार करता हूँ॥५६-५७१ / २ ॥ शिव गुणोंसे भिन्न हैं और वे साक्षात् प्रकृति तथा पुरुषसे भी परे हैं । वे अद्वितीय, नित्य, अनन्त, पूर्ण एवं निरंजन परब्रह्म हैं । तीनों लोकोंका पालन करनेवाले श्रीहरि भीतर तमोगुण और बाहर सत्त्वगुण धारण करते हैं । त्रिलोकीका संहार करनेवाले रुद्रदेव भीतर सत्त्वगुण और बाहर तमोगुण धारण करते हैं

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अ ० १० ] रुद्रसंहिता (

अन्तर्बहीरजचैव त्रिजगत्सृष्टिकृद्विधिः ।

एवं गुणास्त्रिदेवेषु गुणभिन्नः शिवः स्मृतः ॥ ६१

विष्णो सृष्टिकरं प्रीत्या पालयैनं पितामहम् ।

सम्पूज्यस्त्रिषु लोकेषु भविष्यसि मदाज्ञया ॥६२

तव सेव्यो विधेश्चापि रुद्र एव भविष्यति ।

शिवपूर्णावतारो हि त्रिजगल्लयकारकः ॥ ६३

पाद्मे भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः ।

तदा द्रक्ष्यसि मां चैव सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मजः ॥ ६४

एवमुक्त्वा महेशानः कृपां कृत्वातुलां हरः ।

पुनः प्रोवाच सुप्रीत्या विष्णुं सर्वेश्वरः प्रभुः ॥ ६५

सृष्टिखण्ड ) २४१ तथा त्रिभुवनकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी बाहर और भीतरसे भी रजोगुणी ही हैं । इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र इन तीनों देवताओंमें गुण हैं, परंतु शिव गुणातीत माने गये हैं॥५८–६११ / २ ॥ हे विष्णो! आप मेरी आज्ञासे इन सृष्टिकर्ता पितामहका प्रसन्नतापूर्वक पालन कीजिये । ऐसा करनेसे आप तीनों लोकोंमें पूजनीय होंगे ॥६२ ॥

ये रुद्र आपके और ब्रह्माके सेव्य होंगे; क्योंकि त्रैलोक्यके लयकर्ता ये रुद्र शिवके पूर्णावतार हैं ॥ ६३ ॥

पाद्मकल्पमें पितामह आपके पुत्र होंगे । उस समय आप मुझे देखेंगे और वे ब्रह्मा भी मुझे देखेंगे ॥ ६४ ॥

ऐसा कहकर महेश, हर, सर्वेश्वर, प्रभु अतुलनीय । कृपाकर पुन: प्रेमपूर्वक विष्णुसे कहने लगे- ॥ ६५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शिवतत्त्ववर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डके सृष्टि - उपाख्यानमें शिवतत्त्ववर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः श्रीहरिको सृष्टिकी रक्षाका देकर भगवान् परमेश्वर उवाच

अन्यच्छृणु हरे विष्णो शासनं मम सुव्रत ।

सदा सर्वेषु लोकेषु मान्यः पूज्यो भविष्यसि ॥

ब्रह्मणा निर्मिते लोके यदा दुःखं प्रजायते ।

तदा त्वं सर्वदुःखानां नाशाय तत्परो भव ॥

सहायं ते करिष्यामि सर्वकार्ये च दुःसहे ।

तव शत्रून्हनिष्यामि दुःसाध्यान्परमोत्कटान् ॥

विविधानवतारांश्च गृहीत्वा कीर्तिमुत्तमाम् ।

विस्तारय हरे लोके तारणाय परो भव ॥

गुणरूपो ह्यहं रुद्रो ह्यनेन वपुषा सदा ।

कार्यं करिष्ये लोकानां तवाशक्यं न संशयः ॥

भार एवं भोग- मोक्ष - दानका अधिकार शिवका अन्तर्धान होना परमेश्वर शिवजी बोले- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हे हरे! हे विष्णो! अब आप मेरी दूसरी १ आज्ञा सुनें । उसका पालन करनेसे आप सदा समस्त लोकोंमें माननीय और पूजनीय होंगे ॥१ ॥

ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये लोकमें जब कोई संकट २ उत्पन्न हो, तब आप उन सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेके लिये सदा तत्पर रहना ॥२ ॥

मैं सम्पूर्ण दुस्सह कार्योंमें आपकी सहायता ३ करूँगा । आपके दुर्जेय और अत्यन्त उत्कट शत्रुओंको मैं मार गिराऊँगा ॥३ ॥

हे हरे! आप नाना प्रकारके अवतार धारण करके ४ लोकमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार कीजिये और संसारमें प्राणियोंके उद्धारके लिये तत्पर रहिये ॥४ ॥

गुणरूप धारणकर मैं रुद्र निश्चित ही अपने इस शरीरसे संसारके उन कार्योंको करूँगा, जो आपसे ५ सम्भव नहीं हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५ ॥

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२४२ रुद्रध्येयो भवांश्चैव भवद्ध्येयो हरस्तथा युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किञ्चन वस्तुतश्चापि चैकत्वं वरतोऽपि तथैव च लीलयापि महाविष्णो सत्यं सत्यं न संशयः रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव निन्दां करिष्यति तस्य पुण्यं च निखिलं द्रुतं भस्म भविष्यति नरके पतनं तस्य त्वद्द्द्वेषात्पुरुषोत्तम मदाज्ञया भवेद्विष्णो सत्यं सत्यं न संशयः

लोकेऽस्मिन्मुक्तिदो नृणां भुक्तिदश्च विशेषतः ।

ध्येयः पूज्यश्च भक्तानां निग्रहानुग्रहौ कुरु ॥

इत्युक्त्वा मां च धातारं हस्ते धृत्वा स्वयं हरिम् ।

कथयामास दुःखेषु सहायो भव सर्वदा ॥

सर्वाध्यक्षश्च सर्वेषु भक्तिमुक्तिप्रदायकः ।

भव त्वं सर्वदा श्रेष्ठः सर्वकामप्रसाधकः ॥

सर्वेषां प्राणरूपश्च भव त्वं च ममाज्ञया ।

सङ्कटे भजनीयो हि स रुद्रो मत्तनुर्हरे ॥

त्वां यः समाश्रितो नूनं मामेव स समाश्रितः ।

अन्तरं यश्च जानाति निरये पतति ध्रुवम् ॥

आयुर्बलं शृणुष्वाद्य त्रिदेवानां विशेषतः ।

सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ब्रह्मविष्णुहरात्मनाम् ॥

चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते ।

रात्रिश्च तावती तस्य मानमेतत्क्रमेण ह ॥

तेषां त्रिंशद्दिनैर्मासो द्वादशैस्तैश्च वत्सरः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० । आप रुद्रके ध्येय हैं और रुद्र आपके ध्येय हैं । ॥ ६ आप दोनोंमें और आप तथा रुद्रमें कुछ भी अन्तर नहीं है ॥ ६ ॥

। हे महाविष्णो! लीलासे भेद होनेपर भी वस्तुतः ॥ ७ आपलोग एक ही तत्त्व हैं । यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥७ ॥

। जो मनुष्य रुद्रका भक्त होकर आपकी निन्दा ॥ ८ करेगा, उसका सारा पुण्य तत्काल भस्म हो जायगा ॥८ ॥

। हे पुरुषोत्तम विष्णो! आपसे द्वेष करनेके कारण ॥ ९ मेरी आज्ञासे उसको नरकमें गिरना पड़ेगा । यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

आप इस लोकमें मनुष्योंके लिये विशेषत: १० भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले और भक्तोंके ध्येय तथा पूज्य होकर प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह कीजिये ॥१० ॥

ऐसा कहकर भगवान् शिवने मेरा हाथ पकड़ ११ लिया और श्रीविष्णुको सौंपकर उनसे कहा — आप संकटके समय सदा इनकी सहायता करते रहें ॥ ११ ॥

सबके अध्यक्ष होकर आप सभीको भक्ति और १२ मुक्ति प्रदान करें तथा सर्वदा समस्त कामनाओंके साधक एवं सर्वश्रेष्ठ बने रहें ॥ १२ ॥

हे हरे! यह मेरी आज्ञा है कि आप सबके १३ प्राणस्वरूप होइये और संकटकाल आनेपर निश्चय ही मेरे शरीररूप उस रुद्रका भजन कीजिये ॥ १३ ॥

जो आपकी शरणमें आ गया, वह निश्चय ही १४ मेरी शरणमें आ गया । जो मुझमें और आपमें अन्तर समझता है, वह अवश्य ही नरकमें गिरता है ॥ १४ ॥

अब आप तीनों देवताओंके आयुबलको १५ विशेषरूपसे सुनिये । ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी एकतामें [ किसी प्रकारका ] सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

एक हजार चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन कहा १६ जाता है और उतनी ही उनकी रात्रि होती है । इस प्रकार क्रमसे यह ब्रह्माके एक दिन और एक रात्रिका परिमाण है ॥ १६ ॥

इस प्रकारके तीस दिनोंका एक मास और बारह मासोंका एक वर्ष होता है । सौ वर्षके परिमाणको

शतवर्षप्रमाणेन ब्रह्मायुः परिकीर्तितम् ॥ १७ । ब्रह्माकी आयु कहा गया है ॥१७ ॥

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अ ० १० ] रुद्रसंहिता (

ब्रह्मणो वर्षमात्रेण दिनं वैष्णवमुच्यते ।

सोऽपि वर्षशतं यावदात्ममानेन जीवति ॥ १८

वैष्णवेन तु वर्षेण दिनं रौद्रं भवेद् ध्रुवम् ।

हरो वर्षशते याते नररूपेण संस्थितः ॥ १ ९

यावदुच्छ्वसितं वक्त्रे सदाशिवसमुद्भवम् ।

पश्चाच्छक्तिं समभ्येति यावन्निःश्वसितं भवेत् ॥ २०

निःश्वासोच्छ्वसितानां च सर्वेषामेव देहिनाम् ।

ब्रह्मविष्णुहराणां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ॥ २१

एकविंशसहस्राणि शतैः षड्भिः शतानि च ।

अहोरात्राणि चोक्तानि प्रमाणं सुरसत्तमौ ॥ २२

षड्भिरुच्छ्वासनिःश्वासैः पलमेकं प्रवर्तितम् ।

घटी षष्टिपला प्रोक्ता सा षष्ट्या च दिनं निशा ॥ २३

निःश्वासोच्छ्वासितानां च परिसङ्ख्या न विद्यते ।

सदाशिवसमुत्थानमेतस्मात्सोऽक्षयः स्मृतः ॥ २४

इत्थं रूपं त्वया तावद्रक्षणीयं ममाज्ञया ।

तावत्सृष्टेश्च कार्यं वै कर्तव्यं विविधैर्गुणैः ॥ २५

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च भगवान्हरिः ।

प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी ॥ २६

विष्णुरुवाच

शङ्कर श्रूयतामेतत्कृपासिन्धो जगत्पते ।

सर्वमेतत्करिष्यामि भवदाज्ञावशानुगः ॥ २७

मम ध्येयः सदा त्वं च भविष्यसि न चान्यथा ।

भवतः सर्वसामर्थ्यं लब्धं चैव पुरा मया ॥ २८

क्षणमात्रमपि स्वामिंस्तव ध्यानं परं मम ।

चेतसो दूरतो नैव सङ्गच्छतु कदाचन ॥ २ ९

मम भक्तश्च यः स्वामिंस्तव निन्दां करिष्यति ।

तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं ध्रुवम् ॥ ३०

सृष्टिखण्ड ) २४३ ब्रह्माके एक वर्षके बराबर विष्णुका एक दिन कहा जाता है । वे विष्णु भी अपने सौ वर्षके प्रमाणतक जीवित रहते हैं ॥१८ ॥

विष्णुके एक वर्षके बराबर रुद्रका एक दिन होता है । भगवान् रुद्र भी उस मानके अनुसार नररूपमें सौ वर्षतक स्थित रहते हैं ॥ १ ९ ॥ तदनन्तर शिवके मुखसे एक श्वास निकलता है और जबतक वह निकलता रहता है, तबतक वह शक्तिको प्राप्तकर पुनः जब निःश्वास लेते हैं, तबतक ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गन्धर्व, नाग और राक्षस आदि सभी देहधारियोंके नि: श्वास और उच्छ्वासको बाहर और भीतर ले जानेके क्रमकी संख्या हे सुरसत्तम! दिन - रातमें मिलाकर इक्कीस हजारका सौ गुना एवं छ: सौ अर्थात् इक्कीस लाख छः सौ कही गयी है ॥ २०–२२ ॥ छ: उच्छ्वास और छ: नि: श्वासका एक पल होता है । साठ पलोंकी एक घटी और साठ घटी-प्रमाणको एक दिन और रात्रि कहते हैं ॥ २३ ॥

सदाशिवके निःश्वासों और उच्छ्वासोंकी गणना नहीं की जा सकती है । अत: शिवजी सदैव प्रबुद्ध और अक्षय हैं ॥ २४ ॥

मेरी आज्ञासे तुम्हें अपने विविध गुणोंके द्वारा सृष्टिके इस प्रकारके होनेवाले कार्योंकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २५ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे देवर्षे! भगवान् शिवका यह वचन सुनकर सबको वशमें करनेवाले भगवान् विष्णु मेरे साथ विश्वनाथको प्रणाम करके मन्द स्वरमें उनसे कहने लगे -॥२६ ॥

विष्णुजी बोले- हे शंकर! हे करुणासिन्धो! हे जगत्पते! मेरी यह बात सुनिये । मैं आपकी आज्ञाके अधीन रहकर यह सब कुछ करूँगा ॥ २७ ॥

आप ही मेरे सदा ध्येय होंगे, इसमें अन्यथा नहीं है । मैंने पूर्वकालमें भी आपसे समस्त सामर्थ्य प्राप्त किया था ॥२८ ॥

हे स्वामिन्! क्षणमात्र भी आपका श्रेष्ठ ध्यान मेरे चित्तसे कभी दूर न हो ॥ २ ९ ॥ हे स्वामिन्! मेरा जो भक्त आपकी निन्दा करे, । उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें ॥ ३० ॥

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२४४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० त्वद्भक्तो यो भवेत् स्वामिन्मम प्रियतरो हि सः । हे नाथ! जो आपका भक्त है, वह मुझे अत्यन्त एवं वै यो विजानाति तस्य मुक्तिर्न दुर्लभा ॥ ३१ प्रिय है । जो ऐसा जानता है, उसके लिये मोक्ष दुर्लभ नहीं है ॥३१ ॥

महिमा च मदीयोऽद्य वर्धितो भवता ध्रुवम् । आज आपने निश्चय ही मेरी महिमा बढ़ा दी कदाचिदगुणश्चैव जायते क्षम्यतामिति ब्रह्मोवाच तदा शम्भुस्तदीयं हि श्रुत्वा वचनमुत्तमम् उवाच विष्णुं सुप्रीत्या क्षम्या तेऽगुणता मया एवमुक्त्वा हरि नौ स कराभ्यां परमेश्वरः । पस्पर्श सकलाङ्गेषु कृपया तु कृपानिधिः

आदिश्य विविधान्धर्मान्सर्वदुःखहरो हरः ।

ददौ वराननेकांश्चावयोर्हितचिकीर्षया ॥

ततः स भगवान् शम्भुः कृपया भक्तवत्सलः ।

दृष्ट्या सम्पश्यतोः शीघ्रं तत्रैवान्तरधीयत ॥

तदाप्रभृति लोकेऽस्मिल्लिङ्गपूजाविधिः स्मृतः ।

लिङ्गे प्रतिष्ठितः शम्भुर्भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥

लिङ्गवेदिर्महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः ।

लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं जगत् ॥

यस्तु लैङ्गं पठेन्नित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ ।

षण्मासाच्छिवरूपो वै नात्र कार्या विचारणा ॥

यस्तु लिङ्गसमीपे तु कार्यं किञ्चित्करोति च ।

तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्नोमि महामुने ॥

॥ ३२ है, यदि कभी कोई अवगुण आ जाय, तो उसे क्षमा करें ॥ ३२ ॥

ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर विष्णुके द्वारा कहे । गये श्रेष्ठ वचनको सुनकर शिवजीने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक ॥ ३३ विष्णुसे कहा कि मैंने आपके अवगुणोंको क्षमा कर दिया है ॥३३ ॥

विष्णुसे ऐसा कहकर उन कृपानिधि परमेश्वरने ॥ ३४ कृपापूर्वक अपने हाथोंसे हम दोनोंके सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श किया ॥३४ ॥

सर्वदुःखहारी सदाशिवने नाना प्रकारके धर्मोंका ३५ उपदेशकर हम दोनोंके हितकी इच्छासे अनेक प्रकारके वर दिये ॥ ३५ ॥

इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शम्भु कृपापूर्वक ३६ हमारी ओर देखकर हम दोनोंके देखते - देखते शीघ्र वहीं अन्तर्धान हो गये ॥३६ ॥

तभीसे इस लोकमें लिंगपूजाका विधान प्रचलित ३७ हुआ है । लिंगमें प्रतिष्ठित भगवान् शिव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं ॥ ३७ ॥

शिवलिंगकी वेदी महादेवीका स्वरूप है और ३८ लिंग साक्षात् महेश्वर है । लयकारक होनेके कारण ही इसे लिंग कहा गया है; इसीमें सम्पूर्ण जगत् ं स्थित रहता है ॥३८ ॥

जो शिवलिंगके समीप स्थिर होकर नित्य इस ३ ९ लिंगके आख्यानको पढ़ता है, वह छ: मासमें ही शिवरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥३ ९ ॥ हे महामुने! जो शिवलिंगके समीप कोई भी कार्य करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन करनेमें मैं ४० । समर्थ नहीं हूँ ॥ ४० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने परमशिवतत्त्ववर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें परमशिवतत्त्ववर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

पृष्ठ 257

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २४५ अथैकादशोऽध्यायः शिवपूजनकी ऋषय ऊचुः

सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते ।

श्राविताद्याद्भुता शैवी कथा परमपावनी ॥

तत्राद्भुता महादिव्या लिङ्गोत्पत्तिः श्रुता शुभा ।

श्रुत्वा यस्याः प्रभावं च दुःखनाशो भवेदिह ॥

ब्रह्मनारदसंवादमनुसृत्य दयानिधे ।

शिवार्चनविधिं ब्रूहि येन तुष्टो भवेच्छिवः ॥

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैर्वा पूज्यते शिव: ।

कथं कार्यं च तद् ब्रूहि यथा व्यासमुखाच्छुतम् ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां शर्मदं श्रुतिसम्मतम् ।

उवाच सकलं प्रीत्या मुनिप्रश्नानुसारतः ॥

सूत उवाच

साधु पृष्टं भवद्भिश्च तद्रहस्यं मुनीश्वराः ।

तदहं कथयाम्यद्य यथाबुद्धि यथाश्रुतम् ॥

भवद्भिः पृच्छ्यते यद्वत्तथा व्यासेन वै पुरा ।

पृष्टं सनत्कुमाराय तच्छ्रुतं ह्युपमन्युना ॥

ततो व्यासेन वै श्रुत्वा शिवपूजादिकं च यत् ।

मह्यं च पाठितं तेन लोकानां हितकाम्यया ॥

तच्छ्रुतं चैव कृष्णेन ह्युपमन्योर्महात्मनः ।

तदहं कथयिष्यामि यथा ब्रह्मावदत्पुरा ॥

ब्रह्मोवाच

शृणु नारद वक्ष्यामि सङ्क्षेपाल्लिङ्गपूजनम् ।

वक्तुं वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरान्मुने ॥

एवं तु शांकरं रूपं सुखं स्वच्छं सनातनम् ।

पूजयेत्परया भक्त्या सर्वकामफलाप्तये ॥

विधि तथा उसका फल ऋषि बोले — हे व्यासशिष्य महाभाग सूतजी! आपको नमस्कार है, आज आपने भगवान् शिवकी १ अद्भुत एवं परम पवित्र कथा सुनायी है ॥१ ॥

उसमें अद्भुत, महादिव्य तथा कल्याणकारिणी २ लिंगोत्पत्ति हमलोगोंने सुनी, जिसके प्रभावको सुननेसे इस लोकमें दुःखोंका नाश हो जाता है ॥२ ॥

हे दयानिधे! ब्रह्मा और नारदजीके संवादके ३ अनुसार आप हमें शिवपूजनकी वह विधि बताइये, जिससे भगवान् शिव सन्तुष्ट होते हैं ॥३ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - सभी शिवकी ४ पूजा करते हैं । वह पूजन कैसे करना चाहिये? आपने व्यासजीके मुखसे इस विषयको जिस प्रकार सुना हो, वह बताइये ॥ ४ ॥

महर्षियोंका वह कल्याणप्रद एवं श्रुतिसम्मत ५ वचन सुनकर सूतजी उन मुनियोंके प्रश्नके अनुसार सब बातें प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे ॥५ ॥

सूतजी बोले — मुनीश्वरो! आपलोगोंने बहुत अच्छी बात पूछी है, परंतु वह रहस्यकी बात है । मैंने ६ इस विषयको जैसा सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसके अनुसार आज कह रहा हूँ ॥६ ॥

जैसे आपलोग पूछ रहे हैं, उसी तरह पूर्वकालमें ७ व्यासजीने सनत्कुमारजीसे पूछा था । फिर उसे उपमन्युजीने भी सुना था ॥७ ॥

तब व्यासजीने शिवपूजन आदि जो भी था, उसे ८ सुनकर लोकहितकी कामनासे मुझे पढ़ा दिया था ॥८ ॥

इसी विषयको भगवान् श्रीकृष्णने महात्मा उपमन्युसे ९ सुना था । पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नारदजीसे इस विषयमें जो कुछ कहा था, वही इस समय मैं कहूँगा ॥ ९ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! मैं संक्षेपमें लिंगपूजनकी विधि बता रहा हूँ, सुनिये । हे मुने! इसका वर्णन सौ १० वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है । जो भगवान् शंकरका सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है, सभी मनोवांछित फलोंकी प्राप्तिके लिये उसका उत्तम ११ । भक्तिभावसे पूजन करे ॥ १०-११ ॥

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२४६ दारिद्र्यं रोगदुःखं च पीडनं शत्रुसम्भवम् पापं चतुर्विधं तावद्यावन्नार्चयते शिवम् ॥ सम्पूजिते शिवे देवे सर्वदुःखं विलीयते । सम्पद्यते सुखं सर्वं पश्चान्मुक्तिरवाप्यते

यो वै मानुष्यमाश्रित्य मुख्यं सन्तानतः सुखम् ।

तेन पूज्यो महादेवः सर्वकार्यार्थसाधकः ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च विधिवत्क्रमात् ।

शङ्करार्चां प्रकुर्वन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥

प्रातःकाले समुत्थाय मुहूर्ते ब्रह्मसंज्ञके ।

गुरोश्च स्मरणं कृत्वा शंभोश्चैव तथा पुनः ॥

तीर्थानां स्मरणं कृत्वा ध्यानं चैव हरेरपि ।

ममापि निर्जराणां वै मुन्यादीनां तथा मुने ॥

ततः स्तोत्रं शंभुनाम गृह्णीयाद्विधिपूर्वकम् ।

ततोत्थाय मलोत्सर्गं दक्षिणस्यां चरेद्दिशि ॥

एकान्ते तु विधिं कुर्यान्मलोत्सर्गस्य यच्छ्रुतम् ।

तदेव कथयाम्यद्य शृण्वाधाय मनो मुने ॥

शुद्धां मृदं द्विजो लिप्यात्पंचवारं विशुद्धये ।

क्षत्रियश्च चतुर्वारं वैश्यो वारत्रयं तथा ॥

शूद्रो द्विवारं च मृदं गृह्णीयाद्विधिशुद्धये ।

गुदे वाथ सकृल्लिंगे वारमेकं प्रयत्नतः ॥

दशवारं वामहस्ते सप्तवारं द्वयोस्तथा ।

प्रत्येकं पादयोस्तात त्रिवारं करयोः पुनः ॥

स्त्रीभिश्च शूद्रवत्कार्यं मृदाग्रहणमुत्तमम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ । दरिद्रता, रोग, दुःख तथा शत्रुजनित पीड़ा — ये १२ चार प्रकारके पाप - कष्ट तभीतक रहते हैं, जबतक मनुष्य भगवान् शिवका पूजन नहीं करता है ॥ १२ ॥

भगवान् शिवकी पूजा होते ही सारे दुःख ॥ १३ विलीन हो जाते हैं और समस्त सुखोंकी प्राप्ति हो जाती है । तत्पश्चात् [ समय आनेपर उपासककी ] मुक्ति भी हो जाती है ॥१३ ॥

जो मानवशरीरका आश्रय लेकर मुख्यतया १४ सन्तानसुखकी कामना करता है, उसे चाहिये कि सम्पूर्ण कार्यों और मनोरथोंके साधक महादेवजीकी पूजा करे ॥१४ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी सम्पूर्ण १५ कामनाओं तथा प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये क्रमसे विधिके अनुसार भगवान् शंकरकी पूजा करें ॥ १५ ॥

प्रात: काल ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर गुरु तथा १६ शिवका स्मरण करके पुनः तीर्थोंका चिन्तन करके भगवान् विष्णुका ध्यान करे । हे मुने! इसके बाद मेरा, देवताओंका और मुनि आदिका भी स्मरण- चिन्तन १७ करके स्तोत्र - पाठपूर्वक शंकरजीका विधिपूर्वक नाम ले ॥ १६-१७१ / २ ॥ १८ उसके बाद शय्यासे उठकर निवासस्थानसे दक्षिण दिशामें जाकर मलत्याग करे । हे मुने! एकान्तमें मलोत्सर्ग करना चाहिये । उससे शुद्ध होनेके १ ९ लिये जो विधि मैंने सुन रखी है, आप लोगोंसे उसीको आज कहता हूँ, मनको एकाग्र करके सुनें ॥ १८-१९ ॥ ब्राह्मण [ गुदाकी ] शुद्धिके लिये पाँच बार २० मिट्टीका लेप करे और धोये । क्षत्रिय चार बार, वैश्य तीन बार और शूद्र दो बार विधिपूर्वक गुदाकी शुद्धिके लिये उसमें मिट्टी लगाये । लिंगमें भी एक बार २१ प्रयत्नपूर्वक मिट्टी लगानी चाहिये ॥ २०-२१ ॥ तत्पश्चात् बायें हाथमें दस बार और दोनों २२ हाथोंमें सात बार मिट्टी लगाये । हे तात! प्रत्येक पैरमें तीन - तीन बार मिट्टी लगाये, फिर दोनों हाथोंमें भी तीन बार मिट्टी लगाकर धोये ॥२२ ॥

स्त्रियोंको शूद्रकी भाँति अच्छी तरह मिट्टी लगानी चाहिये । हाथ - पैर धोकर पूर्ववत् शुद्ध मिट्टीका

हस्तौ पादौ च प्रक्षाल्य पूर्ववन्मृदमाहरेत् ॥ २३ । संग्रह करना चाहिये ॥ २३ ॥

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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता ( दन्तकाष्ठं ततः कुर्यात्स्ववर्णक्रमतो नरः ॥ २४

विप्रः कुर्याद्दन्तकाष्ठं द्वादशांगुलमानतः ।

एकादशांगुलं राजा वैश्यः कुर्याद्दशांगुलम् ॥ २५

शूद्रो नवांगुलं कुर्यादिति मानमिदं स्मृतम् ।

कालदोषं विचार्यैव मनुदृष्टं विवर्जयेत् ॥ २६

षष्ट्याद्यामाश्च नवमी व्रतमस्तं रवेर्दिनम् ।

तथा श्राद्धदिनं तात निषिद्धं रदधावने ॥ २७

स्नानं तु विधिवत्कार्यं तीर्थादिषु क्रमेण तु ।

देशकालविशेषेण स्नानं कार्यं समन्त्रकम् ॥ २८

आचम्य प्रथमं तत्र धौतवस्त्राणि धारयेत् ।

एकान्ते सुस्थले स्थित्वा संध्याविधिमथाचरेत् ॥ २ ९

यथायोग्यं विधिं कृत्वा पूजाविधिमथारभेत् ।

मनस्तु सुस्थिरं कृत्वा पूजागारं प्रविश्य च ॥ ३०

पूजाविधिं समादाय स्वासने ह्युपविश्य वै ।

न्यासादिकं विधायादौ पूजयेत् क्रमशो हरम् ॥ ३१

प्रथमं च गणाधीशं द्वारपालांस्तथैव च ।

दिक्पालांश्च सुसंपूज्य पश्चात्पीठं प्रकल्पयेत् ॥ ३२

अथवाष्टदलं कृत्वा पूजाद्रव्यं समीपतः ।

उपविश्य ततस्तत्र उपवेश्य शिवम् प्रभुम् ॥ ३३

आचमनत्रयं कृत्वा प्रक्षाल्य च पुनः करौ ।

प्राणायामत्रयं कृत्वा मध्ये ध्यायेच्च त्र्यम्बकम् ॥ ३४

पंचवक्त्रं दशभुजं शुद्धस्फटिकसन्निभम् ।

सर्वाभरणसंयुक्तं व्याघ्रचर्मोत्तरीयकम् ॥ ३५

तस्य सारूप्यतां स्मृत्वा दहेत्पापं नरः सदा ।

शिवं ततः समुत्थाप्य पूजयेत्परमेश्वरम् ॥ ३६

सृष्टिखण्ड ) २४७ इसके बाद मनुष्यको अपने वर्णके अनुसार दातौन करना चाहिये । ब्राह्मणको बारह अँगुलकी दातौन करनी चाहिये । क्षत्रिय ग्यारह अँगुल, वैश्य दस अँगुल और शूद्र नौ अँगुलकी दातौन करे । दातौनका यह मान बताया गया है । मनुस्मृतिके अनुसार कालदोषका विचार करके ही दातौन करे या त्याग दे॥२४–२६ ॥ हे तात! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, व्रतका दिन, सूर्यास्तका समय, रविवार तथा श्राद्धदिवस — ये दन्तधावनके लिये वर्जित हैं ॥ २७ ॥

[ दन्तधावनके पश्चात् ] तीर्थ आदिमें विधिपूर्वक स्नान करना चाहिये, विशेष देश - काल आनेपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करना चाहिये ॥२८ ॥

[ स्नानके पश्चात् ] पहले आचमन करके धुला हुआ वस्त्र धारण करे । फिर सुन्दर एकान्त स्थलमें बैठकर सन्ध्याविधिका अनुष्ठान करे ॥ २ ९ ॥ यथायोग्य सन्ध्याविधि करके पूजाका कार्य आरम्भ करे । मनको सुस्थिर करके पूजागृहमें प्रवेशकर वहाँ पूजन - सामग्री लेकर सुन्दर आसनपर बैठे । पहले न्यास आदि करके क्रमशः महादेवजीकी पूजा करे ॥ ३०-३१ ॥ [ शिवकी पूजासे ] पहले गणेशजीकी, द्वारपालोंकी और दिक्पालोंकी भलीभाँति पूजा करके बादमें देवताके । लिये पीठकी स्थापना करे ॥ ३२ ॥

अथवा अष्टदलकमल बनाकर पूजाद्रव्यके समीप बैठकर उस कमलपर ही भगवान् शिवको समासीन करे । तत्पश्चात् तीन बार आचमन करके पुनः दोनों हाथ धोकर तीन प्राणायाम करके मध्यम प्राणायाम अर्थात् कुम्भक करते समय त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवका इस प्रकार ध्यान करे - उनके पाँच मुख हैं, दस भुजाएँ हैं, शुद्ध स्फटिकके समान उनकी कान्ति है, वे सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं तथा वे व्याघ्रचर्मका उत्तरीय ओढ़े हुए हैं । उनके सारूप्यकी भावना करके मनुष्य सदाके लिये अपने पापको भस्म कर डाले । [ इस प्रकारकी भावनासे युक्त होकर ] वहाँपर शिवको प्रतिष्ठापितकर उन परमेश्वरकी पूजा | करे ॥ ३३–३६ ॥

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२४८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११

देहशुद्धिं ततः कृत्वा मूलमन्त्रं न्यसेत्क्रमात् ।

सर्वत्र प्रणवेनैव षडंगन्यासमाचरेत् ॥ ३७

कृत्वा हृदि प्रयोगं च ततः पूजां समारभेत् ।

पाद्यार्घाचमनार्थं च पात्राणि च प्रकल्पयेत् ॥ ३८

स्थापयेद्विविधान्कुम्भान्नव धीमान्यथाविधि ।

दर्भैराच्छाद्य तैरेव संस्थाप्याभ्युक्ष्य वारिणा ॥ ३ ९

तेषु तेषु च सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम् ।

प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्धिमान् ॥ ४०

उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत् ।

जातीकंकोलकर्पूरवटमूलतमालकम् ॥ ४१

चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके ।

एतत्सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्चन्दनान्वितम् ॥ ४२

पार्श्वयोर्देवदेवस्य नंदीशं तु समर्चयेत् ।

गंधैर्धूपैस्तथा दीपैर्विविधैः पूजयेच्छिवम् ॥ ४३

लिंगशुद्धिं ततः कृत्वा मुदा युक्तो नरस्तदा ।

यथोचितं तु मंत्रौघैः प्रणवादिनमोऽन्तकैः 5: ॥ ४४

कल्पयेदासनं स्वस्तिपद्मादि प्रणवेन तु ।

तस्मात्पूर्वदिशं साक्षादणिमामयमक्षरम् ॥ ४५

लघिमा दक्षिणं चैव महिमा पश्चिमं तथा ।

प्राप्तिश्चैवोत्तरं पत्रं प्राकाम्यं पावकस्य च ॥ ४६

ईशित्वं नैर्ऋतं पत्रं वशित्वं वायुगोचरे ।

सर्वज्ञत्वं तथैशान्यं कर्णिका सोम उच्यते ॥ ४७

सोमस्याधस्तथा सूर्यस्तस्याधः पावकस्त्वयम् ।

धर्मादीनपि तस्याधो भवतः कल्पयेत् क्रमात् ॥ ४८

अव्यक्तादि चतुर्दिक्षु सोमस्यान्ते गुणत्रयम् ।

सद्योजातं प्रपद्यामीत्यावाह्य परमेश्वरम् ॥ ४ ९

वामदेवेन मंत्रेण तिष्ठेच्चैवासनोपरि । शरीरशुद्धि करके मूलमन्त्रका क्रमशः न्यास करे अथवा सर्वत्र प्रणवसे ही षडंगन्यास करे ॥ ३७ ॥

इस प्रकार हृदयादि न्यास करके पूजा आरम्भ करे । पाद्य, अर्घ्य और आचमनके लिये पात्रोंको तैयार करके रखे ॥३८ ॥

बुद्धिमान् पुरुष विधिपूर्वक भिन्न - भिन्न प्रकारके नौ कलश स्थापित करे । उन्हें कुशाओंसे ढककर कुशाओंसे ही जल लेकर उन सबका प्रोक्षण करे । उन-उन सभी पात्रोंमें शीतल जल डाले । तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष देख - भालकर प्रणवमन्त्रके द्वारा उनमें इन द्रव्योंको डाले । खस और चन्दनको पाद्यपात्रमें रखे । चमेलीके फूल, शीतलचीनी, कपूर, बड़की जड़ तथा तमाल— इन सबको यथोचितरूपसे [ कूट - पीसकर ] चूर्ण बनाकर आचमनीय पात्र ( पंचपात्र ) - में डाले । यह सब चन्दनसहित सभी पात्रोंमें डालना चाहिये ॥ ३ ९ -४२ ॥ देवाधिदेव महादेवजीके पार्श्वभागमें नन्दीश्वरका पूजन करे । गन्ध, धूप, दीप आदि विविध उपचारोंसे शिवकी पूजा करे ॥ ४३ ॥

फिर प्रसन्नतापूर्वक लिंगशुद्धि करके मनुष्य उचित रूपसे मन्त्रसमूहोंके आदिमें ' प्रणव ' तथा अन्तमें ‘ नम: ' पद जोड़कर उनके द्वारा [ इष्टदेवके लिये ] अथवा प्रणवका उच्चारण करके स्वस्ति, पद्म आदि आसनकी कल्पना करे । पुनः यह भावना करे कि इस कमलका पूर्वदल साक्षात् अणिमा नामक ऐश्वर्यरूप तथा अविनाशी है । दक्षिणदल लघिमा है । पश्चिमदल महिमा है । उत्तरदल प्राप्ति है । अग्निकोणका दल प्राकाम्य है । नैर्ऋत्यकोणका दल ईशित्व है । वायव्यकोणका दल वशित्व है । ईशानकोणका दल सर्वज्ञत्व है और उस कमलकी कर्णिकाको सोम कहा जाता है॥४४–४७ ॥ इस सोमके नीचे सूर्य है, सूर्यके नीचे यह अग्नि है और अग्निके भी नीचे धर्म आदिकी क्रमशः कल्पना करे । इसके पश्चात् चारों दिशाओंमें अव्यक्त आदिकी तथा सोमके नीचे तीनों गुणोंकी कल्पना करे । इसके बाद ' ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि ' इत्यादि मन्त्रसे परमेश्वर शिवका आवाहन करके ‘ ॐ वामदेवाय नमः ' इत्यादि वामदेवमन्त्रसे उन्हें आसनपर विराजमान करे । फिर