शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 281–290
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २६ ९
पंचमं च यदा लक्षं फलं यच्छत्यसंशयम् ।
मंत्रेण दशलक्षे फलं भवेत् ॥ २४
मुक्तिकामो भवेद्यो वै दर्भैश्च पूजनं चरेत् ।
लक्षसंख्या तु सर्वत्र ज्ञातव्या ऋषिसत्तम ॥ २५
आयुःकामो भवेद्यो वै दूर्वाभिः पूजनं चरेत् ।
पुत्रकामो भवेद्यो वै धत्तूरकुसुमैश्चरेत् ॥ २६
रक्तदण्डश्च धत्तूरः पूजने शुभदः स्मृतः ।
अगस्त्यकुसुमैश्चैव पूजकस्य महद्यशः ॥ २७
भुक्तिमुक्तिफलं तस्य तुलस्या पूजयेद्यदि ।
अर्कपुष्पैः प्रतापश्च कुब्जकह्लारकैस्तथा ॥ २८
जपाकुसुमपूजा तु शत्रूणां मृत्युदा स्मृता ।
रोगोच्चाटनकानीह करवीराणि वै क्रमात् ॥ २ ९
बंधूकैर्भूषणावाप्तिर्जात्या वाहान्न संशयः ।
अतसीपुष्पकैर्देवं विष्णुवल्लभतामियात् ॥ ३०
शमीपत्रैस्तथा मुक्तिः प्राप्यते पुरुषेण च ।
मल्लिकाकुसुमैर्दत्तैः स्त्रियं शुभतरां शिवः ॥ ३१
यूथिकाकुसुमैः शस्तैर्गृहं नैव विमुच्यते ।
कर्णिकारैस्तथा वस्त्रसंपत्तिर्जायते नृणाम् ॥ ३२
निर्गुण्डीकुसुमैर्लोके मनो निर्मलतां व्रजेत् ।
विल्वपत्रैस्तथा लक्षैः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ३३
दर्शन होता है और जब पाँचवें लाखका जप पूरा होता है, तब भगवान् शिव जपका फल निःसन्देह प्रदान करते हैं । इसी मन्त्रका दस लाख जप हो जाय, तो सम्पूर्ण फलकी सिद्धि होती है ॥ २३-२४ ॥ जो मोक्षकी अभिलाषा रखता है, वह एक लाख दर्भोंद्वारा शिवका पूजन करे । मुनिश्रेष्ठ! शिवकी पूजामें सर्वत्र लाखकी ही संख्या समझनी चाहिये ॥ २५ ॥
आयुकी इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओंद्वारा पूजन करे । जिसे पुत्रकी अभिलाषा हो, वह धतूरेके एक लाख फूलोंसे पूजा करे ॥ २६ ॥
लाल डंठलवाला धतूरा पूजनमें शुभदायक माना गया है । अगस्त्यके फूलोंसे पूजा करनेवाले पुरुषको महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥२७ ॥
यदि तुलसीदलसे शिवकी पूजा करे, तो उपासकको भोग और मोक्षका फल प्राप्त होता है । लाल और सफेद मदार, अपामार्ग और कह्लारके फूलोंद्वारा पूजा करनेसे प्रतापकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥
अड़हुलके फूलोंसे की हुई पूजा शत्रुविनाशक कही गयी है । करवीरके एक लाख फूल यदि शिवपूजनके उपयोगमें लाये जायँ, तो वे यहाँ रोगोंका उच्चाटन करनेवाले होते हैं ॥ २ ९ ॥ बन्धूक [ गुलदुपहरिया ] -के फूलोंद्वारा [ पूजन करनेसे ] आभूषणकी प्राप्ति होती है । चमेलीसे शिवकी पूजा करके मनुष्य वाहनोंको उपलब्ध करता है, इसमें संशय नहीं है । अतसीके फूलोंसे महादेवजीका पूजन करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुका प्रिय हो जाता है ॥ ३० ॥
शमीपत्रोंसे [ पूजा करके ] मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है । बेलाके फूल चढ़ानेपर भगवान् शिव अत्यन्त शुभलक्षणा पत्नी प्रदान करते हैं ॥ ३१ ॥
जूहीके फूलोंसे पूजा की जाय, तो घरमें कभी अन्नकी कमी नहीं होती । कनेरके फूलोंसे पूजा करनेपर मनुष्योंको वस्त्र - सम्पदाकी प्राप्ति होती है ॥ ३२ ॥
सेंदुआरि या शेफालिकाके फूलोंसे लोकमें शिवका पूजन किया जाय, तो मन निर्मल होता है । एक लाख बिल्वपत्रोंसे पूजन करनेपर मनुष्य अपनी । सारी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥३३ ॥
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२७० शृङ्गारहारपुष्पैस्तु वर्धते सुखसम्पदा ऋतुजातानि पुष्पाणि मुक्तिदानि न संशयः राजिकाकुसुमानीह शत्रूणां मृत्युदानि च एषां लक्षं शिवे दद्याद्दद्याच्च विपुलं फलम् ॥ विद्यते कुसुमं तन्न यन्नैव शिववल्लभम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । हरसिंगारके फूलोंसे पूजा करनेपर सुख - सम्पत्तिकी ॥ ३४ वृद्धि होती है । ऋतुमें पैदा होनेवाले फूल [ यदि | शिवकी पूजामें समर्पित किये जायँ, तो वे ] मोक्ष देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३४ ॥
। राईके फूल शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी होते ३५ हैं । इन फूलोंको एक लाखकी संख्यामें शिवके ऊपर चढ़ाया जाय, तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥
। चम्पा और केवड़ेको छोड़कर अन्य कोई ऐसा चम्पकं केतकं हित्वा त्वन्यत्सर्वं समर्पयेत् ॥ ३६ फूल नहीं है, जो भगवान् शिवको प्रिय न हो, अन्य
अतः परं च धान्यानां पूजने शंकरस्य च ।
प्रमाणं च फलं सर्वं प्रीत्या शृणु च सत्तम ॥
तंदुलारोपणे नृणां लक्ष्मी वृद्धिः प्रजायते ।
अखण्डितविधौ विप्र सम्यग्भक्त्या शिवोपरि ॥
षट्केनैव तु प्रस्थानां तदर्धेन तथा पुनः ।
पलद्वयं तथा लक्षमानेन समुदाहृतम् ॥
पूजां रुद्रप्रधानेन कृत्वा वस्त्रं सुसुन्दरम् ।
शिवोपरि न्यसेत्तत्र तंदुलार्पणमुत्तमम् ॥
उपरि श्रीफलं त्वेकं गन्धपुष्पादिभिस्तथा ।
रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत् ॥
प्राजापत्यद्वयं रौप्यमाषसंख्या च दक्षिणा ।
देया तदुपदेष्ट्रे हि शक्त्या वा दक्षिणा मता ॥
आदित्यसंख्यया तत्र ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः ।
लक्षपूजा तथा जाता साङ्गं च मन्त्रपूर्वकम् ॥
शतमष्टोत्तरं तत्र मंत्रे विधिरुदाहृतः ।
तिलानां च पलं लक्षं महापातकनाशनम् ॥
एकादशपलैरेव लक्षमानमुदाहृतम् ।
पूर्ववत्पूजनं तत्र कर्तव्यं हितकाम्यया ॥
सभी पुष्पोंको समर्पित करना चाहिये ॥ ३६ ॥
हे सत्तम! अब इसके अनन्तर शंकरके पूजनमें ३७ धान्योंका प्रमाण तथा [ उनके अर्पणका ] फल- यह सब प्रेमपूर्वक सुनिये ॥३७ ॥
हे विप्र! महादेवके ऊपर परम भक्तिसे अखण्डित ३८ चावल चढ़ानेसे मनुष्योंकी लक्ष्मी बढ़ती है ॥३८ ॥
साढ़े छः प्रस्थ और दो पलभर चावल संख्यामें
३ ९ एक लाख हो जाते है । ऐसा लोगोंका कहना है ॥ ३ ९ ॥
रुद्रप्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके ४० ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसीपर चावल रखकर समर्पित करे, तो उत्तम है ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् उसके ऊपर गन्ध, पुष्प आदिके साथ ४१ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे, तो पूजाका पूरा - पूरा फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
प्रजापति देवतासे चिह्नांकित दो चाँदीके रुपये ४२ अथवा माषसंख्यासे उपदेष्टाको दक्षिणा देनी चाहिये अथवा यथाशक्ति जितनी दक्षिणा हो सके, उतनी दक्षिणा बतायी गयी है ॥ ४२ ॥
वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये । ४३ इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्षपूजा सम्पन्न होती है । जहाँ सौ मन्त्र जपनेकी विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपनेका विधान बताया गया है ॥ ४३१/२ ॥ ४४ एक लाख पल तिलोंका अर्पण पातकोंका नाश करनेवाला होता है । ग्यारह पल ( ६४ माशा ) -में एक । लाखकी संख्यामें तिल होते हैं । [ अतः इस परिमाणके अनुसार ] तिलद्वारा अपने कल्याणके लिये पूर्वकी भाँति ४५ । पूर्वोक्त विधिसे शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४४-४५ ॥
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २७१
भोज्या वै ब्राह्मणास्तस्मादत्र कार्या नरेण हि ।
महापातकजं दुःखं तत्क्षणान्नश्यति ध्रुवम् ॥ ४६
यवपूजा तथा प्रोक्ता लक्षेण परमा शिवे ।
प्रस्थानामष्टकं चैव तथा प्रस्थार्धकं पुनः ॥ ४७
पलद्वययुतं तत्र मानमेतत्पुरातनम् ।
यवपूजा च मुनिभिः स्वर्गसौख्यविवर्धिनी ॥ ४८
प्राजापत्यं ब्राह्मणानां कर्तव्यं च फलेप्सुभिः ।
गोधूमान्नैस्तथा पूजा प्रशस्ता शंकरस्य वै ॥ ४ ९
संततिर्वर्धते तस्य यदि लक्षावधिः कृता ।
द्रोणार्धेन भवेल्लक्षं विधानं विधिपूर्वकम् ॥ ५०
मुद्गानां पूजने देवः शिवो यच्छति वै सुखम् ।
प्रस्थानां सप्तकेनैव प्रस्थार्थेनाथवा पुनः ॥ ५१
पलद्वययुतेनैव लक्षमुक्तं पुरातनैः ।
ब्राह्मणाश्च तथा भोज्या रुद्रसंख्याप्रमाणतः ॥ ५२
प्रियंगुपूजनादेव धर्माध्यक्षे परात्मनि ।
धर्मार्थकामा वर्धन्ते पूजा सर्वसुखावहा ॥ ५३
प्रस्थैकेन च तस्योक्तं लक्षमेकं पुरातनैः ।
ब्रह्मभोजं तथाप्रोक्तमर्कसंख्याप्रमाणतः ॥ ५४
राजिकापूजनं शंभो: शत्रोर्मृत्युकरं स्मृतम् ।
सर्षपाणां तथा लक्षं पलैर्विंशतिसंख्यया ॥ ५५
तेषां च पूजनादेव शत्रोर्मृत्युरुदाहृतः ।
आढकीनां दलैश्चैव शोभयित्वार्चयेच्छिवम् ॥ ५६
वृता गौश्च प्रदातव्या बलीवर्दस्तथैव च ।
मरीचिसम्भवा पूजा शत्रोर्नाशकरी स्मृता ॥ ५७
इस अवसरपर मनुष्यको ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये । इससे महापातकजन्य दुःख निश्चित ही दूर हो जाता है ॥ ४६ ॥
इसी प्रकार एक लाख यवसे भी की गयी शिवकी पूजा उत्तम कही गयी है । साढ़े आठ प्रस्थ और दो पल ( साढ़े आठ सेर तेरह माशा ) यव प्राचीन परिमाणके अनुसार संख्यामें एक लाख यवके बराबर होते हैं । मुनियोंने यवके द्वारा की गयी पूजाको स्वर्गका सुख प्रदान करनेवाली बताया है ॥ ४७-४८ ॥ फलप्राप्तिके इच्छुक लोगोंको ( यवपूजा करनेके पश्चात् ) ब्राह्मणोंके लिये प्रजापति देवताके द्रव्यभूत चाँदीके रुपये भी दक्षिणारूपमें देना चाहिये । गेहूँसे भी की गयी शिवपूजा प्रशस्त है । यदि एक लाख गेहूँसे शिवकी पूजा की जाय, तो उसकी सन्ततिकी अभिवृद्धि होती है । विधानत: आधा द्रोण ( आठ सेर ) परिमाणमें गेहूँकी संख्या एक लाख होती है । शेष विधान विधिपूर्वक करने चाहिये ॥ ४ ९ -५० ॥ ( एक लाख ) मूँगसे पूजन किये जानेपर भगवान् शिव सुख देते हैं । साढ़े सात प्रस्थ और दो पल ( साढ़े सात सेर तेरह माशा भर ) मूँग संख्यामें एक लाख होती है — ऐसा प्राचीन लोगोंने कहा है । इसमें ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥ ५१-५२ ॥ प्रियंगु ( काकुन ) के द्वारा धर्माध्यक्ष परमात्मा शिवकी पूजा करनेपर धर्म, अर्थ और कामकी अभिवृद्धि होती है । वह पूजा सभी सुखोंको देनेवाली है । प्राचीन लोगोंने कहा है कि एक प्रस्थमें एक लाख प्रियंगु होते हैं । इसके अनन्तर बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना बताया गया है॥५३-५४ ॥ राईसे की गयी शिवपूजा शत्रुविनाशक कही गयी है । बीस पल ( ३० माशा ) भर सरसोंके एक लाख दाने हो जाते हैं । उन एक लाख सरसोंके दानोंसे की गयी शिवकी पूजा निश्चित ही शत्रुके लिये घातक होती है - ऐसा कहा गया है । अरहरकी पत्तियोंसे शिवजीको सुशोभित करके उनका पूजन करना चाहिये ॥ ५५-५६ ॥ शिवकी पूजा र पश्चात् एक गौ और एक बैलका दान करना चाहिये । मरीचि ( काली मिर्च ) -से की गयी शिवकी पूजा शत्रुका नाश करनेवाली बतायी
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२७२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४
आढकीनां दलैश्चैव रंजयित्वार्चयेच्छिवम् ।
नानासुखकरी ह्येषा पूजा सर्वफलप्रदा ॥ ५८
धान्यमानमिति प्रोक्तं मया ते मुनिसत्तम ।
लक्षमानं तु पुष्पाणां शृणु प्रीत्या मुनीश्वर ॥ ५ ९
प्रस्थानां च तथा चैकं शंखपुष्पसमुद्भवम् ।
प्रोक्तं व्यासेन लक्षं हि सूक्ष्ममानप्रदर्शिना ॥ ६०
प्रस्थैरेकादशैर्जातिलक्षमानं प्रकीर्तितम् ।
यूथिकायास्तथा मानं राजिकायास्तदर्धकम् ॥ ६१
प्रस्थैर्विंशतिकैश्चैव मल्लिकामानमुत्तमम् ।
तिलपुष्पैस्तथा मानं प्रस्थान्यूनं तथैव च ॥ ६२
ततश्च त्रिगुणं मानं करवीरभवे स्मृतम् ।
निर्गुडीकुसुमे मानं तथैव कथितं बुधैः ॥ ६३
कर्णिकारे तथा मानं शिरीषकुसुमे पुनः ।
बंधुजीवे तथा मानं प्रस्थानां दशकेन च ॥ ६४
इत्याद्यैर्विविधैर्मानं दृष्ट्वा कुर्याच्छिवार्चनम् ।
सर्वकामसमृद्ध्यर्थं मुक्त्यर्थं कामनोज्झितः ॥ ६५
अतः परं प्रवक्ष्यामि धारापूजाफलं महत् ।
यस्य श्रवणमात्रेण कल्याणं जायते नृणाम् ॥ ६६
विधानपूर्वकं पूजां कृत्वा भक्त्या शिवस्य वै ।
पश्चाच्च जलधारा हि कर्तव्या भक्तितत्परैः ॥ ६७
ज्वरप्रलापशांत्यर्थं जलधारा शुभावहा ।
शतरुद्रियमंत्रेण रुद्रस्यैकादशेन तु ॥ ६८
रुद्रजाप्येन वा तत्र सूक्तेन पौरुषेण वा ।
षडंगेनाथ वा तत्र महामृत्युंजयेन च ॥६ ९
गायत्र्या वा नमोऽन्तैश्च नामभिः प्रणवादिभिः ।
मंत्रैर्वाथागमोक्तैश्च जलधारादिकं तथा ॥ ७०
गयी है । अरहरकी पत्तियोंसे रँग करके शिवकी पूजा करनी चाहिये । यह पूजा नाना प्रकारके सुख एवं सभी अभीष्ट फलोंको देनेवाली है ॥ ५७-५८ ॥ हे मुनिसत्तम! [ शिवपूजामें ] इस प्रकारसे प्रयुक्त धान्योंका परिमाण तो हमने आपलोगोंको बता दिया है । हे मुनीश्वर! अब प्रेमपूर्वक एक लाख पुष्पोंका परिमाण भी सुनें ॥५ ९ ॥ सूक्ष्म मानको प्रदर्शित करनेवाले व्यासजीने एक प्रस्थमें शंखपुष्पीके पुष्पोंकी संख्या एक लाख बतायी है ॥ ६० ॥
ग्यारह प्रस्थमें चमेलीके फूलोंका मान एक लाख कहा गया है । इतना ही जूहीके फूलोंका मान है और उसका आधा राईके फूलोंका मान होता है ॥ ६१ ॥
मल्लिका [ मालती ] -के लाख फूलोंका पूर्ण मान बीस प्रस्थ है । तिलके पुष्पोंका मान मल्लिकाके मानकी अपेक्षा एक प्रस्थ कम होता है ॥ ६२ ॥
कनेरके पुष्पोंका मान तिलके पुष्पोंके मानका तिगुना कहा गया है । पण्डितोंने निर्गुण्डीके पुष्पोंका भी उतना ही मान बताया है ॥६३ ॥
केवड़ा, शिरीष तथा बन्धुजीव ( दुपहरिया ) -के एक लाख पुष्पोंका मान दस प्रस्थके बराबर होता है ॥ ६४ ॥
इस तरह अनेक प्रकारके मानको दृष्टिमें रखकर सभी कामनाओंकी सिद्धिके लिये तथा मुक्ति प्राप्त करनेके लिये कामनारहित होकर शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ ६५ ॥
अब मैं जलधारा - पूजाके महान् फलको कह रहा हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे ही मनुष्योंका कल्याण हो जाता है ॥६६ ॥
भक्तिपूर्वक सदाशिवकी विधिवत् पूजा करने पश्चात् उन्हें जलधारा समर्पित करे ॥६७ ॥
[ सन्निपातादि ] ज्वरमें होनेवाले प्रलापकी शान्तिके लिये भगवान् शिवको दी जानेवाली कल्याणकारी जलधारा शतरुद्रिय मन्त्रसे, एकादश रुद्रसे, रुद्रमन्त्रोंके जपसे, पुरुषसूक्तसे, छ: ऋचावाले रुद्रसूक्तसे, महामृत्युंजयमन्त्रसे, गायत्रीमन्त्रसे अथवा शिवके शास्त्रोक्त नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः पद जोड़कर बने हुए मन्त्रोंद्वारा अर्पित करनी चाहिये ॥ ६८–७० ॥
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २७३
सुखसन्तानवृद्ध्यर्थं धारापूजनमुत्तमम् ।
नानाद्रव्यैः शुभैर्दिव्यैः प्रीत्या सद्भस्मधारिणा ॥ ७१
घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्रकम् ।
तदा वंशस्य विस्तारो जायते नात्र संशयः ॥ ७२
एवमयुतमन्त्रेण कार्यं वै शिवपूजनम् । प्रमेहरोगशान्त्यर्थं प्राप्नुयाच्च मनेप्सितम् ।
षण्ढत्वं यदादातस्तदा घृतसुपूजनम् ।
ब्रह्मभोज्यं तथा प्रोक्तं प्राजापत्यं मुनीश्वरैः ॥ ७३
केवलं दुग्धधारा च तदा कार्या विशेषतः ।
शर्करामिश्रिता तत्र यदा बुद्धिजडो भवेत् ॥ ७४
तस्य सञ्जायते जीवसदृशी बुद्धिरुत्तमा ।
यावन्मंत्रायुतं न स्यात्तावद्धाराप्रपूजनम् ॥ ७५
यदा चोच्चाटनं देहे जायते कारणं विना ।
यत्र कुत्रापि वा प्रेम दुःखं च परिवर्धितम् ॥ ७६
स्वगृहे कलहो नित्यं यदा चैव प्रजायते ।
तद्धारायां कृतायां वै सर्वं दुःखं विलीयते ॥ ७७
शत्रूणां तापनार्थं वै तैलधारा शिवोपरि ।
कर्तव्या सुप्रयत्नेन कार्यसिद्धिर्ध्रुवं भवेत् ॥७८
वासितेनैव तैलेन भोगवृद्धिः प्रजायते ।
सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेद् ध्रुवम् ॥ ७ ९
मधुना यक्षराजो वै गच्छेच्च शिवपूजनात् । सुख और सन्तानकी वृद्धिके लिये जलधाराद्वारा पूजन उत्तम होता है । उत्तम भस्म धारण करके उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके शुभ एवं दिव्य द्रव्योंद्वारा शिवकी पूजा करनी चाहिये और शिवपर उनके सहस्रनाम मन्त्रोंसे घृतकी धारा गिरानी चाहिये । ऐसा करनेपर वंशका विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है॥७१-७२ ॥ इस प्रकार यदि दस हजार मन्त्रोंद्वारा शिवजीकी पूजा की जाय तो प्रमेह रोगकी शान्ति होती है और उपासकको मनोवांछित फलकी प्राप्ति हो जाती है । यदि कोई नपुंसकताको प्राप्त हो तो वह घीसे शिवजीकी भलीभाँति पूजा करे । इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये, साथ ही उसके लिये मुनीश्वरोंने प्राजापत्यव्रतका भी विधान किया है ॥ ७३ ॥
यदि बुद्धि जड़ हो जाय, तो उस अवस्थामें पूजकको केवल शर्करामिश्रित दुग्धकी धारा चढ़ानी चाहिये । ऐसा करनेपर उसकी बृहस्पतिके समान उत्तम बुद्धि हो जाती है । जबतक दस हजार मन्त्र न हो जायँ, तबतक दुग्धधाराद्वारा भगवान् शिवका पूजन करते रहना चाहिये ॥ ७४-७५ ॥ जब शरीरमें अकारण ही उच्चाटन होने लगे— जी उचट जाय, जहाँ कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़ जाय और अपने घरमें सदा कलह होने लगे, तब पूर्वोक्त रूपसे दूधकी धारा चढ़ानेसे सारा दुःख नष्ट हो जाता है॥७६-७७ ॥ शत्रुओंको सन्तप्त करनेके लिये पूर्ण प्रयत्नके साथ भगवान् शंकरके ऊपर तेलकी धारा अर्पित करनी चाहिये । ऐसा करनेपर निश्चित ही कर्मी सिद्धि होती है ॥७८ ॥
सुगन्धित तेलकी धारा अर्पित करनेपर भोगोंकी वृद्धि होती है । यदि मधुकी धारासे शिवकी पूजा की जाय, तो राजयक्ष्माका रोग दूर हो जाता है । शिवजीके ऊपर ईखके रसकी धारा चढ़ायी जाय, तो वह भी सम्पूर्ण धारा चेक्षुरसस्यापि सर्वानन्दकरी शिवे ॥ ८० आनन्दकी प्राप्ति करानेवाली होती है ॥ ७ ९ -८० ॥ गंगाजलकी धारा तो भोग और मोक्ष दोनों धारा गंगाजलस्यैव भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । फलोंको देनेवाली है । ये सब जो - जो धाराएँ बतायी एताः सर्वाश्च याः प्रोक्ता मृत्युंजयसमुद्भवाः ॥ ८१ | गयी हैं, इन सबको मृत्युंजय मन्त्रसे चढ़ाना चाहिये,
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२७४ तत्रायुतप्रमाणं हि कर्तव्यं तद्विधानतः कर्तव्यं ब्राह्मणानां च भोज्यं वै रुद्रसंख्यया
एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वर ।
एतद्वै सफलं लोके सर्वकामहितावहम् ॥
स्कन्दोमासहितं शंभुं संपूज्य विधिना सह ।
यत्फलं लभते भक्त्या तद्वदामि यथाश्रुतम् ॥
अत्र भुक्त्वाखिलं सौख्यं पुत्रपौत्रादिभिः शुभम् ।
ततो याति महेशस्य लोकं सर्वसुखावहम् ॥
सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सर्वकामगैः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ उसमें भी उक्त मन्त्रका विधानतः दस हजार जप ॥ ८२ करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥ ८१-८२ ॥ हे मुनीश्वर! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने ८३ आपको बता दिया । संसारमें सदाशिवकी यह पूजा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ और सफल है ॥ ८३ ॥
भक्तिपूर्वक यथाविधि स्कन्द और उमाके सहित ८४ भगवान् शम्भुकी पूजा करके भक्त जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा सुना है, वैसा ही कह रहा हूँ ॥ ८४ ॥
वह इस लोकमें पुत्र - पौत्र आदिके साथ समस्त ८५ सुखोंका उपभोग करके अन्तमें सभी सुखोंको देनेवाले शिवलोकको जाता है ॥ ८५ ॥
वह भक्त वहाँ करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान रुद्रकन्यासमाकीर्णैर्गेयवाद्यसमन्वितैः ॥८६ तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर गान - वाद्ययन्त्रोंसे युक्त रुद्रकन्याओंसे घिरकर बैठे हुए क्रीडते शिवभूतश्च यावदाभूतसंप्लवम् । शिवरूपमें प्रलयपर्यन्त क्रीड़ा करता है । तदनन्तर अविनाशी ततो मोक्षमवाप्नोति विज्ञानं प्राप्य चाव्ययम् ॥ ८७ | परम ज्ञानको प्राप्त करके मोक्षको पा लेता है ॥ ८६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शिवपूजाविधानवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें शिवपूजनवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः सृष्टिका वर्णन नारद उवाच
विधे विधे महाभाग धन्यस्त्वं सुरसत्तम ।
श्राविताद्याद्भुता शैवकथा परमपावनी ॥
तत्राद्भुता महादिव्या लिङ्गोत्पत्तिः श्रुता शुभा ।
श्रुत्वा यस्याः प्रभावं च दुःखनाशो भवेदिह ॥
अनंतरं च यज्जातं माहात्म्यं चरितं तथा ।
सृष्टेश्चैव प्रकारं च कथय त्वं विशेषतः ॥
नारदजी बोले — हे महाभाग! हे विधे! हे देवश्रेष्ठ! आप धन्य हैं । आपने आज यह शिवकी १ परमपावनी अद्भुत कथा सुनायी ॥ १ ॥
इसमें सदाशिवकी लिंगोत्पत्तिकी जो कथा २ हमने सुनी है, वह महादिव्य, कल्याणकारी और अद्भुत है; जिसके प्रभावमात्रको ही सुनकर दुःख नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥
इस कथाके पश्चात् जो हुआ, उसका माहात्म्य और उसके चरित्रका वर्णन करें । यह सृष्टि किस प्रकारसे हुई, इसका भी आप विशेष रूपसे ३ | वर्णन करें? ॥ ३ ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २७५ ब्रह्मोवाच
सम्यक् पृष्टं च भवता यज्जातं तदनंतरम् ।
कथयिष्यामि संक्षेपाद्यथा पूर्वं श्रुतं मया ॥
अंतर्हिते तदा देवे शिवरूपे सनातने ।
अहं विष्णुश्च विप्रेन्द्र अधिकं सुखमाप्तवान् ॥
मया च विष्णुना रूपं हंसवाराहयोस्तदा ।
संवृतं तु ततस्ताभ्यां लोकसर्गावनेच्छया ॥
नारद उवाच
विधे ब्रह्मन् महाप्राज्ञ संशयो हृदि मे महान् ।
कृपां कृत्वातुलां शीघ्रं तं नाशयितुमर्हसि ॥
हंसवाराहयो रूपं युवाभ्यां च धृतं कथम् ।
अन्यद्रूपं विहायैव किमत्र वद कारणम् ॥
सूत उवाच
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य महात्मनः ।
स्मृत्वा शिवपदांभोजं ब्रह्मा सादरमब्रवीत् ॥
ब्रह्मोवाच
हंसस्य चोर्ध्वगमने गतिर्भवति निश्चला ।
तत्त्वातत्त्वविवेकोऽस्ति जलदुग्धविभागवत् ॥
अज्ञानज्ञानयोस्तत्त्वं विवेचयति हंसकः ।
हंसरूपं धृतं तेन ब्रह्मणा सृष्टिकारिणा ॥
विवेको नैव लब्धश्च यतो हंसो व्यलीयत ।
शिवस्वरूपतत्त्वस्य ज्योतिरूपस्य नारद ॥
सृष्टिप्रवृत्तिकामस्य कथं ज्ञानं प्रजायते ।
यतो लब्धो विवेकोऽपि न मया हंसरूपिणा ॥
गमनेऽधो वराहस्य गतिर्भवति निश्चला । धृतं वाराहरूपं हि विष्णुना वनचारिणा ब्रह्माजी बोले- आपने यह उचित ही पूछा है । तदनन्तर जो हुआ और मैंने जैसा पहले सुना है, ४ वैसा ही मैं संक्षेपमें कहूँगा ॥४ ॥
हे विप्रेन्द्र! जब सनातनदेव शिव अपने स्वरूपमें ५ अन्तर्धान हो गये, तब मैंने और भगवान् विष्णुने महान् सुखकी अनुभूति की ॥ ५ ॥
तदनन्तर हम दोनों — ब्रह्मा और विष्णुने अपने-६ अपने हंस और वाराहरूपका परित्याग किया । सृष्टि-संरचना और उसके पालनकी इच्छासे हमदोनों उस शिवकी मायाके दोनों प्रकारोंसे घिर गये ॥ ६ ॥
नारदजी बोले – हे विधे! हे महाप्राज्ञ ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें महान् सन्देह है । अतुलनीय कृपा करके ७ शीघ्र ही उसको नष्ट करें ॥७ ॥
अन्य रूपोंको छोड़कर आप दोनोंने हंस और वाराहका ही रूप क्यों धारण किया, इसका क्या ८ कारण है? बताइये ॥ ८ ॥
सूतजी बोले- महात्मा नारदजीका यह वचन सुनकर ब्रह्माने शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके ९ आदरपूर्वक यह कहना प्रारम्भ किया॥९॥
ब्रह्माजी बोले- हंसकी निश्चल गति ऊपरकी ओर गमन करनेमें ही होती है । जल और दूधको १० पृथक् - पृथक् करनेके समान तत्त्व और अतत्त्वको भी जाननेमें वह समर्थ होता है ॥ १० ॥
अज्ञान एवं ज्ञानके तत्त्वका विवेचन हंस ही कर ११ सकता है । इसलिये सृष्टिकर्ता मुझ ब्रह्माने हंसका रूप धारण किया ॥११ ॥
हे नारद! प्रकाश - स्वरूप शिवतत्त्वका विवेक १२ वह हंसरूप प्राप्त न कर सका, अतः उसे छोड़ देना पड़ा ॥ १२ ॥
सृष्टिसंरचनाके लिये तत्पर प्रवृत्तिको ज्ञानकी १३ प्राप्ति कैसे हो सकती है? जब हंसरूपमें मैं नहीं जान सका, तो मैंने उस रूपको छोड़ दिया ॥ १३ ॥
नीचेकी ओर जानेमें वाराहकी निश्चल गति होती है, इसलिये विष्णुने उस सदाशिवके अद्भुत लिंगके मूलभागमें पहुँचनेकी इच्छासे वाराहका ही ॥ १४ । रूप धारण किया ॥ १४ ॥
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२७६ अथवा भवकल्पार्थं तद्रूपं हि प्रकल्पितम् विष्णुना च वराहस्य भुवनावनकारिणा ॥ यद्दिनं हि समारभ्य तद्रूपं धृतवान्हरिः । तद्दिनं प्रतिकल्पोऽसौ कल्पो वाराहसंज्ञकः तदिच्छा वा यदा जाता तस्य रूपस्य धारणे । तद्दिनं प्रतिकल्पोऽसौ कल्पो वाराहसंज्ञकः
इति प्रश्नोत्तरं दत्तं प्रस्तुतं शृणु नारद ।
स्मृत्वा शिवपदांभोजं वक्ष्ये सृष्टिविधिं मुने ॥
अंतर्हिते महादेवे त्वहं लोकपितामहः ।
तदीयं वचनं कर्तुमध्यायन्ध्यानतत्परः ॥
नमस्कृत्य तदा शंभुं ज्ञानं प्राप्य हरेस्तदा ।
आनंदं परमं गत्वा सृष्टिं कर्तुं मनो दधे ॥
विष्णुश्चापि तदा तत्र प्रणिपत्य सदाशिवम् ।
उपदिश्य च मां तात ह्यंतर्धानमुपागतः ॥
ब्रह्माण्डाच्च बहिर्गत्वा प्राप्य शम्भोरनुग्रहम् ।
वैकुंठनगरं गत्वा तत्रोवास हरिः सदा ॥
अहं स्मृत्वा शिवं तत्र विष्णुं वै सृष्टिकाम्यया ।
पूर्वं सृष्टं जलं यच्च तत्रांजलिमुदाक्षिपम् ॥
अतोऽण्डमभवत्तत्र चतुर्विंशतिसंज्ञकम् ।
विरारूपमभूद्विप्र जलरूपमपश्यतः ॥
ततः संशयमापन्नस्तपस्तेपे सुदारुणम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । अथवा संसारका पालन करनेवाले विष्णुने जगत्में १५ वाराहकल्पको बनानेके लिये उस रूपको किया ॥ १५ ॥ वारण
जिस दिन भगवान्ने उस रूपको धारण किया, ॥ १६ उसी दिनसे वह [ श्वेत ] वाराह - संज्ञक - कल्प प्रारम्भ हुआ था ॥१६ ॥
अथवा उन महेश्वरकी जब यह इच्छा हुई कि ॥ १७ विवादमें फँसे हम दोनोंके द्वारा हंस और वाराहका रूप धारण किया जाय, उसी दिनसे उस वाराह नामके कल्पका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥१७ ॥
हे नारद! सुनिये । मैंने इस प्रकारसे तुम्हारे १८ प्रश्नोंका उत्तर प्रस्तुत कर दिया है । हे मुने! अब सदाशिवके चरणकमलका स्मरण करके मैं सृष्टिसृजनकी विधि बता रहा हूँ ॥१८ ॥
[ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! ] जब महादेवजी अन्तर्धान १ ९ हो गये, तब मैं उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ध्यानमग्न हो कर्तव्यका विचार करने लगा ॥ १ ९ ॥ उस समय भगवान् शंकरको नमस्कार करके २० श्रीहरिसे ज्ञान पाकर, परमानन्दको प्राप्त होकर मैंने सृष्टि करनेका ही निश्चय किया । हे तात! भगवान् २१ विष्णु भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे उपदेश देकर तत्काल अदृश्य हो गये ॥ २०-२१ ॥ वे ब्रह्माण्डसे बाहर जाकर भगवान् शिवकी २२ कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाममें पहुँचकर सदा वहीं रहने लगे ॥२२ ॥
मैंने सृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और विष्णुका २३ स्मरण करके पहलेके रचे हुए जलमें अपनी अंजलि डालकर जलको ऊपरकी ओर उछाला ॥ २३ ॥
इससे वहाँ चौबीस तत्त्वोंवाला एक अण्ड प्रकट २४ हुआ । हे विप्र! उस जलरूप अण्डको मैं देख भी न सका, इतनेमें वह विराट् आकारवाला हो गया ॥ २४ ॥
[ उसमें चेतनता न देखकर ] मुझे बड़ा संशय द्वादशाब्दमहं तत्र विष्णुध्यानपरायणः ॥ २५ हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा । बारह वर्षोंतक मैं भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहा ॥ २५ ॥
तस्मिंश्च समये तात प्रादुर्भूतो हरिः हे तात! उस समयके पूर्ण होनेपर भगवान् श्रीहरि स्वयम् । स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेमसे मेरे अंगोंका स्पर्श करते मामुवाच महाप्रीत्या मदङ्गं संस्पृशन्मुदा ॥ २६ | हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे— ॥ २६ ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २७७ विष्णुरुवाच विष्णु बोले- हे ब्रह्मन्! आप वर माँगिये । मैं वरं ब्रूहि प्रसन्नोऽस्मि नादेयो विद्यते तव । प्रसन्न हूँ । मुझे आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है । ब्रह्मन् शंभुप्रसादेन सर्वं दातुं समर्थकः ॥ २७ भगवान् शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें ब्रह्मोवाच
युक्तमेतन्महाभाग दत्तोऽहं शंभुना च ते ।
तदुक्तं याचते मेऽद्य देहि विष्णो नमोऽस्तु ते ॥
विराड्रूपमिदं ह्यण्डं चतुर्विंशतिसंज्ञकम् ।
न चैतन्यं भवत्यादौ जडीभूतं प्रदृश्यते ॥
प्रादुर्भूतो भवानद्य शिवानुग्रहतो हरे ।
प्राप्तं शंकरसंभूत्या ह्यण्डं चैतन्यमावह ॥
इत्युक्ते च महाविष्णुः शंभोराज्ञापरायणः ।
अनंतरूपमास्थाय प्रविवेश तदण्डकम् ॥
सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्त्वा तदण्डं व्याप्तवानिति ॥
प्रविष्टे विष्णुना तस्मिन्नण्डे सम्यक्स्तुतेन मे ।
सचेतनमभूदण्डं चतुर्विंशतिसंज्ञकम् ॥
पातालादिसमारभ्य सत्यलोकाधिपः स्वयम् ।
राजते स्म हरिस्तत्र वैराजः पुरुषः प्रभुः ॥
कैलासनगरं रम्यं सर्वोपरिविराजितम् ।
निवासार्थं निजस्यैव पंचवक्त्रश्चकार ह ॥
ब्रह्मांडस्य तथा नाशे वैकुण्ठस्य च तस्य च कदाचिदेव देवर्षे नाशो नास्ति तयोरिह सत्यं पदमुपाश्रित्य स्थितोऽहं मुनिसत्तम सृष्टिकामोऽभवं तात महादेवाज्ञया ह्यहम् समर्थ हूँ ॥ २७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे महाभाग! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् २८ शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया था । हे विष्णो! आपको नमस्कार है, आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये ॥२८ ॥
हे प्रभो! यह विराट्रूप तथा चौबीस तत्त्वोंसे २ ९ बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, यह जड़ीभूत दिखायी देता है ॥२ ९ ॥ हे हरे! इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप ३० यहाँ प्रकट हुए हैं । अत: शंकरकी शक्तिसे सम्भूत इस अण्डमें चेतनता लाइये ॥ ३० ॥
मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आज्ञामें तत्पर रहनेवाले ३१ महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय लेकर उस अण्डमें प्रवेश किया ॥ ३१ ॥
उस समय उन परमपुरुषके सहस्रों मस्तक, ३२ सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे । उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया ॥ ३२ ॥
मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति किये जानेपर जब ३३ श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वोंवाला अण्ड सचेतन हो गया ॥ ३३ ॥
पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले ३४ उस अण्डके रूपमें वहाँ विराट् श्रीहरि ही विराज | रहे थे ॥ ३४ ॥
पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये ३५ सुरम्य कैलास - नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे ऊपर सुशोभित होता है ॥ ३५ ॥
। हे देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर ॥ ३६ भी वैकुण्ठ और कैलास - उन दोनोंका कभी नाश नहीं होता ॥३६ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर । रहता हूँ । हे तात! महादेवजीकी आज्ञासे ही मुझमें ॥ ३७ । सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है ॥३७ ॥
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२७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५
सिसृक्षोरथ मे प्रादुरभवत्पापसर्गकः ।
अविद्यापञ्चकस्तात बुद्धिपूर्वस्तमोपमः ॥ ३८
ततः प्रसन्नचित्तोऽहमसृजं स्थावराभिधम् ।
मुख्यसर्गं च निःसंगमध्यायं शंभुशासनात् ॥ ३ ९
तं दृष्ट्वा मे सिसृक्षोश्च ज्ञात्वा साधकमात्मनः ।
सर्गोऽवर्तत दुःखाढ्यस्तिर्यक्त्रोता न साधकः ॥ ४०
तं चासाधकमाज्ञाय पुनश्चिन्तयतश्च मे ।
अभवत्सात्त्विकः सर्ग ऊर्ध्वस्रोता इति द्रुतम् ॥ ४१
देवसर्गः प्रतिख्यातः सत्योऽतीव सुखावहः ।
तमप्यसाधकं मत्वाऽचिन्तयं प्रभुमात्मनः ॥ ४२
प्रादुरासीत्ततः सर्गे राजसः शंकराज्ञया ।
अर्वाक्स्रोता इति ख्यातो मानुषः परसाधकः ॥ ४३
महादेवाज्ञया सर्गस्ततो भूतादिकोऽभवत् ।
इति पंचविधा सृष्टिः प्रवृत्ता वै कृता मया ॥ ४४
त्रयः सर्गाः प्रकृत्याश्च ब्रह्मणः परिकीर्तिताः ।
तत्राद्यो महतः सर्गो द्वितीयः सूक्ष्मभौतिकः ॥ ४५
वैकारिकस्तृतीयश्च इत्येते प्राकृतास्त्रयः ।
एवं चाष्टविधाः सर्गाः प्राकृतैर्वैकृतैः सह ॥ ४६
कौमारो नवमः प्रोक्तः प्राकृतो वैकृतश्च सः ।
एषामवांतरो भेदो मया वक्तुं न शक्यते ॥ ४७
हे तात! जब मैं सृष्टिकी इच्छासे चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझसे पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्यापंचक ( पंचपर्वा अविद्या ) कहते हैं ॥ ३८ ॥
उसके पश्चात् प्रसन्नचित्त मैंने स्थावरसंज्ञक मुख्य सर्ग ( पहले सर्ग ) की संरचना की, जो सृष्टि-सामर्थ्यसे रहित था, पुनः शिवकी आज्ञासे मैंने ध्यान किया ॥ ३ ९ ॥ उस मुख्य सर्गको वैसा देखकर अपना कार्य साधनेके लिये सृष्टि करनेके इच्छुक मैंने दुःखसे परिपूर्ण तिर्यक्स्रोत [ तिरछे उड़नेवाले ] सर्ग ( दूसरे सर्ग ) -का सृजन किया, वह भी पुरुषार्थसाधक नहीं था ॥ ४० ॥
उसे भी पुरुषार्थसाधनकी शक्तिसे रहित जानकर जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही ( तीसरे ) सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे ऊर्ध्वस्रोता कहते हैं ॥४१ ॥
यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ । यह देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है । उसे भी पुरुषार्थसाधनसे रहित मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया ॥ ४२ ॥
तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अर्वाक्स्रोता ( चौथा सर्ग ) कहा गया है, जो मनुष्य - सर्ग कहलाता है, वह सर्ग पुरुषार्थसाधनका अधिकारी हुआ ॥४३ ॥
तदनन्तर महादेवजीकी आज्ञासे भूत आदिकी सृष्टि [ भूतसर्ग – पाँचवाँ सर्ग ] हुई । इस प्रकार मैंने पाँच प्रकारकी सृष्टि की ॥४४ ॥
इनके अतिरिक्त तीन प्रकारके सर्ग मुझ ब्रह्मा और प्रकृतिके सान्निध्यसे उत्पन्न हुए । इनमें पहला महत्तत्त्वका सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओंका सर्ग और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है । इस तरह ये तीन प्राकृत सर्ग हैं । प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकारके सर्गोंको मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं ॥ ४५-४६ ॥ इनके अतिरिक्त नौवाँ कौमारसर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है । इन सबके अवान्तर भेद हैं, जिनका वर्णन मैं नहीं कर सकता । उसका उपयोग बहुत थोड़ा