श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 271–280

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २५ ९

ईदृशो विरलो लोके गृहाश्रमविवर्जितः ।

यदि लोके भवत्यस्मिन्दर्शनात्पापहारकः ॥

तीर्थानि श्लाघयन्तीह तादृशं ज्ञानवित्तमम् ।

देवाश्च मुनयः सर्वे परब्रह्मात्मकं शिवम् ॥

तादृशानि न तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।

ते पुनन्त्युरुकालेन विज्ञानी दर्शनादपि ॥

यावद्गृहाश्रमे तिष्ठेत्तावदाकारपूजनम् ।

कुर्याच्छ्रेष्ठस्य सुप्रीत्या सुरेषु खलु पंचसु ॥

अथवा च शिवः पूज्यो मूलमेकं विशिष्यते ।

मूले सिक्ते तथा शाखा: तृप्ताः सन्त्यखिलाः सुराः ॥

शाखासु च सुतृप्तासु मूलं तृप्तं न कर्हिचित् । एवं सर्वेषु तृप्तेषु सुरेषु मुनिसत्तमाः सर्वथा शिवतृप्तिर्नो विज्ञेया सूक्ष्मबुद्धिभिः । शिवे च पूजिते देवाः पूजिताः सर्व एव हि तस्माच्च पूजयेद्देवं शंकरं लोकशंकरम् सर्वकामफलावाप्त्यै सर्वभूतहिते रतः इस संसारमें ऐसा गृहस्थाश्रमरहित प्राणी ७ ९ विरला ही होता है । यदि लोकमें कोई हो, तो उसके दर्शनमात्रसे ही पाप नष्ट हो जाते हैं । सभी तीर्थ, देवता और मुनि भी उस प्रकारके परब्रह्ममय शिवस्वरूप परमज्ञानीकी प्रशंसा करते रहते हैं । ७ ९ -८० ॥ ८० वैसे न तो तीर्थ हैं, न मिट्टी और पत्थरसे बने देवता ही हैं, वे तो बहुत समयके बाद पवित्र करते हैं, किंतु विज्ञानी दर्शनमात्रसे पवित्र कर देता है ॥ ८१ ॥

८१ जबतक मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे, तबतक प्रेमपूर्वक उसे पाँच देवताओं ( गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव तथा देवी ) -की और उनमें भी सर्वश्रेष्ठ भगवान् सदाशिवकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये अथवा ८२ मात्र सदाशिवकी ही पूजा करनी चाहिये; एकमात्र वे ही सबके मूल कहे गये हैं । हे देवो! जैसे मूल ( जड़ ) -के सींचे जानेपर सभी शाखाएँ स्वतः तृप्त हो जाती हैं, वैसे ही सर्वदेवमय सदाशिवके ही पूजनसे ८३ सभी देवताओंका पूजन हो जाता है और वे प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ८२-८३ ॥ जैसे वृक्षकी शाखाओंके तृप्त होनेपर अर्थात् ॥ ८४ उन्हें सींचनेपर कभी भी मूलकी तृप्ति नहीं होती, वैसे ही हे मुनिश्रेष्ठो! सभी देवताओंके तृप्त होनेपर शिवकी भी तृप्ति नहीं होती है - ऐसा सूक्ष्म बुद्धिवाले लोगोंको जानना चाहिये । शिवके पूजित ॥ ८५ हो जानेपर सभी देवताओंका पूजन स्वतः ही हो जाता है ॥ ८४-८५ ॥ अतः सभी प्राणियोंके कल्याणमें लगे हुए मनुष्यको चाहिये कि वह सभी कामनाओंकी । फलप्राप्तिके लिये संसारका कल्याण करनेवाले ॥ ८६ । भगवान् सदाशिवकी पूजा करे ॥ ८६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने पूजाविधिवर्णने सारासारविचारवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें पूजा - विधि-वर्णन - क्रममें सारासार - विचारवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

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पृष्ठ 272

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२६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ अथ त्रयोदशोऽध्यायः शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- अब मैं पूजाकी सर्वोत्तम अतः परं प्रवक्ष्यामि पूजाविधिमनुत्तमम् । विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट सुखोंको सुलभ श्रूयतामृषयो देवाः सर्वकामसुखावहम् ॥ १ करानेवाली है । हे देवताओ तथा ऋषियो! आपलोग

ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय संस्मरेत्साम्बकं शिवम् ।

कुर्यात्तत्प्रार्थनां भक्त्या सांजलिर्नतमस्तकः ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश उत्तिष्ठ हृदयेशय ।

उत्तिष्ठ त्वमुमास्वामिन्ब्रह्माण्डे मङ्गलं कुरु ॥

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति-र्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः । त्वया महादेव हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥

इत्युक्त्वा वचनं भक्त्या स्मृत्वा च गुरुपादके ।

बहिर्गच्छेद्दक्षिणाशां त्यागार्थं मलमूत्रयोः ॥

देहशुद्धिं ततः कृत्वा स मृज्जलविशोधनैः ।

हस्तौ पादौ च प्रक्षाल्य दंतधावनमाचरेत् ॥

दिवानाथे त्वनुदिते कृत्वा वै दन्तधावनम् ।

मुखं षोडशवारं तु प्रक्षाल्यांजलिभिस्तथा ॥

षष्ठ्याद्यामाश्च तिथयो नवम्यर्कदिने तथा ।

वर्ज्याः सुरर्षयो यत्नाद्भक्तेन रदधावने ॥

यथावकाशं सुस्नायान्नद्यादिष्वथवा गृहे ।

देशकालाविरुद्धं च स्नानं कार्यं नरेण च ॥

खेर्दिने तथा श्राद्धे संक्रान्तौ ग्रहणे तथा ।

महादाने तथा तीर्थे ह्युपवासदिने तथा ॥

अशौचेऽप्यथवा प्राप्ते न स्नायादुष्णवारिणा ।

यथा साभिमुखं स्नायात्तीर्थादौ भक्तिमान्नरः ॥

ध्यान देकर सुनें ॥१ ॥

उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्म मुहूर्तमें २ उठकर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे - ॥२ ॥

हे देवेश्वर! उठिये, उठिये । मेरे हृदयमें शयन ३ करनेवाले देवता! उठिये । हे उमाकान्त! उठिये और ब्रह्माण्डमें सबका मंगल कीजिये । मैं धर्मको जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती, मैं अधर्मको जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता । हे महादेव! आप मेरे हृदयमें स्थित होकर मुझे जैसी ४ प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ ॥ ३-४ ॥ भक्तिपूर्वक यह वचन कहकर और गुरुके ५ चरणोंका स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिण दिशामें मलमूत्रका त्याग करनेके लिये जाय ॥५ ॥

इसके बाद मिट्टी और जलसे शरीरकी शुद्धि ६ करके दोनों हाथों और पैरोंको धोकर दन्तधावन करे ॥ ६ ॥

सूर्योदय होनेसे पहले ही दातौन करके मुँहको ७ सोलह बार जलकी अँजलियोंसे धोये । हे देवताओ तथा ऋषियो! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावास्या और नवमी तिथियों तथा रविवारके दिन शिवभक्तको यत्नपूर्वक ८ दातौनको त्याग देना चाहिये ॥ ७-८ ॥ अवकाशके अनुसार नदी आदिमें जाकर अथवा ९ घरमें ही भलीभाँति स्नान करे । मनुष्यको देश और कालके विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये ॥९ ॥

रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, १० उपवासदिवस अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्य गर्म जलसे स्नान न करे । शिवभक्तिसे युक्त मनुष्य तीर्थ ११ । आदिमें प्रवाहके सम्मुख होकर स्नान करे ॥ १०-११ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_10_2_Back

पृष्ठ 273

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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २६१

तैलाभ्यंगं च कुर्वीत वारान्दृष्ट्वा क्रमेण च ।

नित्यमभ्यंगके चैव वासितं वा न दूषितम् ॥

श्राद्धे च ग्रहणे चैवोपवासे प्रतिपद्दिने ।

अथवा सार्षपं तैलं न दुष्येद् ग्रहणं विना ॥

देशं कालं विचाय्यैवं स्नानं कुर्याद्यथाविधि ।

उत्तराभिमुखश्चैव प्राङ्मुखोऽप्यथवा पुनः ॥

उच्छिष्टेनैव वस्त्रेण न स्नायात्स कदाचन ।

शुद्धवस्त्रेण स स्नायात्तद्देवस्मृतिपूर्वकम् ॥

परधार्य्यं च नोच्छिष्टं रात्रौ च विधृतं च यत् ।

तेन स्नानं तथा कार्यं क्षालितं च परित्यजेत् ॥

तर्पणं च ततः कार्यं देवर्षिपितृतृप्तिदम् ।

धौतवस्त्रं ततो धार्यं पुनराचमनं चरेत् ॥

शुचौ देशे ततो गत्वा गोमयाद्यपमार्जिते ।

आसनं च शुभं तत्र रचनीयं द्विजोत्तमाः ॥

शुद्धकाष्ठसमुत्पन्नं पूर्णं स्तरितमेव वा ।

चित्रासनं तथा कुर्यात्सर्वकामफलप्रदम् ॥

यथायोग्यं पुनर्ग्राह्यं मृगचर्मादिकं च यत् ।

तत्रोपविश्य कुर्वीत त्रिपुण्ड्रं भस्मना सुधीः ॥

जपस्तपस्तथा दानं त्रिपुण्ड्रात्सफलं भवेत् ।

अभावे भस्मनस्तत्र जलस्यादि प्रकीर्तितम् ॥

एवं कृत्वा त्रिपुण्ड्रं च रुद्राक्षान्धारयेन्नरः ।

सम्पाद्य च स्वकं कर्म पुनराराधयेच्छिवम् ॥

जो नहानेके पहले तेल लगाना चाहे, उसे १२ विहित एवं निषिद्ध दिनोंका विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिये । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल लगाता हो, उसके लिये किसी भी दिन तैलाभ्यंग करना दोषपूर्ण नहीं है अथवा जो तेल इत्र आदिसे वासित हो, उसका लगाना किसी भी दिन दूषित नहीं है ॥१२ ॥

श्राद्ध, ग्रहण, उपवास और प्रतिपदाके दिन तेल १३ नहीं लगाना चाहिये । सरसोंका तेल ग्रहणको छोड़कर किसी भी दिन दूषित नहीं होता ॥१३ ॥

इस तरह देश - कालका विचार करके ही १४ विधिपूर्वक स्नान करे । स्नानके समय अपने मुखको उत्तर अथवा पूर्वकी ओर रखना चाहिये ॥ १४ ॥

उच्छिष्ट वस्त्र धारण करके स्नान कभी न करे । १५ शुद्ध वस्त्र धारण करके इष्टदेवका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये ॥ १५ ॥

जिस वस्त्रको दूसरेने धारण किया हो तथा जिसे १६ स्वयं रातमें धारण किया गया हो, उससे तभी स्नान किया जा सकता है, जब उसे धो लिया गया हो ॥ १६ ॥

इसके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको १७ तृप्ति देनेवाला तर्पण करना चाहिये । उसके बाद धुला हुआ वस्त्र पहने और आचमन करे ॥ १७ ॥

हे श्रेष्ठ द्विजो! तदनन्तर गोबर आदिसे लीप-१८ पोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध स्थानमें जाकर वहाँ सुन्दर आसनकी व्यवस्था करे । वह आसन विशुद्ध काष्ठका बना हुआ, पूरा फैला हुआ तथा चित्रमय १ ९ होना चाहिये । ऐसा आसन सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है॥१८-१९ ॥ उसके ऊपर बिछानेके लिये यथायोग्य मृगचर्म २० आदि ग्रहण करे । शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष उस आसनपर बैठकर भस्मसे त्रिपुण्ड्र लगाये ॥ २० ॥

त्रिपुण्ड्रसे जप, तप तथा दान सफल होते २१ हैं । भस्मके अभावमें त्रिपुण्ड्रका साधन जल आदि बताया गया है ॥ २१ ॥

इस तरह त्रिपुण्ड्र करके मनुष्य रुद्राक्ष धारण करे और अपने ( सन्ध्योपासना आदि ) नित्यकर्मका २२ । सम्पादन करके पुनः शिवकी आराधना करे ॥२२ ॥

पृष्ठ 274

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२६२ पुनराचमनं कृत्वा त्रिवारं मंत्रपूर्वकम् । एकं वाथ प्रकुर्याच्च गंगाबिन्दुरिति ब्रुवन्

अन्नोदकं तथा तत्र शिवपूजार्थमाहरेत् ।

अन्यद्वस्तु च यत्किंचिद्यथाशक्ति समीपगम् ॥

कृत्वा स्थेयं च तत्रैव धैर्यमास्थाय वै पुनः ।

अर्घपात्रं तथा चैकं जलगंधाक्षतैर्युतम् ॥

दक्षिणांसे तथा स्थाप्यमुपचारस्य क्लृप्तये ।

गुरोश्च स्मरणं कृत्वा तदनुज्ञामवाप्य च ॥

संकल्पं विधिवत्कृत्वा कामनां च नियुज्य वै ।

पूजयेत्परया भक्त्या शिवं सपरिवारकम् ॥

मुद्रामेकां प्रदश्यैव पूजयेद्विघ्नहारकम् ।

सिंदूरादिपदार्थैश्च सिद्धिबुद्धिसमन्वितम् ॥

लक्षलाभयुतं तत्र पूजयित्वा नमेत्पुनः ।

चतुर्थ्यन्तैर्नामपदैर्नमोऽन्तैः प्रणवादिभिः ॥

क्षमाप्यैनं तदा देवं भ्रात्रा चैव समन्वितम् ।

पूजयेत्परया भक्त्या नमस्कुर्यात्पुनः पुनः ॥

द्वारपालं सदा द्वारि तिष्ठन्तं च महोदरम् ।

पूजयित्वा ततः पश्चात्पूजयेद्गिरिजां सतीम् ॥

चंदनैः कुंकुमैश्चैव

कुंकुमैश्चैव धूपैर्दीपैरनेकशः ।

नैवेद्यैर्विविधैश्चैव पूजयित्वा ततः शिवम् ॥

नमस्कृत्य पुनस्तत्र गच्छेच्च शिवसन्निधौ ।

यदि गेहे पार्थिवीं वा हैमीं वा राजतीं तथा ॥

धातुजन्यां तथैवान्यां पारदां वा प्रकल्पयेत् ।

नमस्कृत्य पुनस्तां च पूजयेद्भक्तितत्परः ॥

तस्यां तु पूजितायां वै सर्वे स्युः पूजितास्तथा ।

स्थापयेच्च मृदा लिंगं विधाय विधिपूर्वकम् ॥

कर्तव्यं सर्वथा तत्र नियमाः स्वगृहे स्थितैः ।

प्राणप्रतिष्ठां कुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ तत्पश्चात् तीन बार मन्त्रपूर्वक आचमन करे ॥ २३ अथवा ‘ गंगाबिन्दुः ’ – ऐसा उच्चारण करते हुए एक बार आचमन करे ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् वहाँ शिवकी पूजाके लिये अन्न और २४ जल लाकर रखे । दूसरी कोई भी जो वस्तु आवश्यक हो, उसे यथाशक्ति जुटाकर अपने पास रखे ॥ २४ ॥

इस प्रकार पूजन - सामग्रीका संग्रह करके वहाँ २५ धैर्य धारण करके जल, गन्ध और अक्षतसे युक्त एक अर्घ्यपात्र लेकर उसे दाहिने भागमें रखे, उससे २६ उपचारकी सिद्धि होती है । फिर गुरुका स्मरण करके उनकी आज्ञा लेकर विधिवत् सकाम संकल्प करके २७ पराभक्तिसे सपरिवार शिवका पूजन करे ॥ २५-२७ ॥ एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारोंद्वारा २८ सिद्धिबुद्धिसहित विघ्नहारी गणेशका पूजन करे । लक्ष और लाभसे युक्त गणेशजीका पूजन करके उनके नामके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः जोड़कर २ ९ | नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए नमस्कार करे । यथा - ॐ गणपतये नमः अथवा ॐ लक्षलाभयुताय सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर उनसे क्षमाप्रार्थना करके पुनः भाई ३० कार्तिकेयसहित गणेशजीका पराभक्तिसे पूजन र उन्हें बारंबार नमस्कार करे ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् सदा द्वारपर खड़े रहनेवाले ३१ महोदरका पूजन करके सती - साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमाकी पूजा करे ॥ ३१ ॥

चन्दन, कुंकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों ३२ तथा नाना प्रकारके नैवेद्योंसे शिवाका पूजन कर नमस्कार करनेके पश्चात् साधक शिवजीके समीप जाय । ३३ यथासम्भव अपने घरमें मिट्टी, सोना, चाँदी, धातु या अन्य [ द्रव्य ] पारे आदिकी शिवप्रतिमा बनाये और उसे नमस्कार ३४ करके भक्तिपरायण होकर पूजा करे । उसकी पूजा जानेपर सभी देवता पूजित हो जाते हैं ॥ ३२-३४९ / २ ॥ ३५ मिट्टीका शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करे । अपने घरमें रहनेवाले लोगोंको स्थापना-सम्बन्धी सभी नियमोंका सर्वथा पालन करना चाहिये । ३६ । भूतशुद्धि करके प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ ३५-३६ ॥

पृष्ठ 275

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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २६३

दिक्पालान्पूजयेत्तत्र स्थापयित्वा शिवालये ।

गृहे शिवः सदा पूज्यो मूलमन्त्राभियोगतः ॥

तत्र तु द्वारपालानां नियमो नास्ति सर्वथा ।

गृहे लिंगं च यत्पूज्यं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

पूजाकाले च सांगं वै परिवारेण संयुतम् ।

आवाह्य पूजयेद्देवं नियमो ऽत्र न विद्यते ॥

शिवस्य सन्निधिं कृत्वा स्वासनं परिकल्पयेत् ।

उदङ्मुखस्तदा स्थित्वा पुनराचमनं चरेत् ॥

प्रक्षाल्य हस्तौ पश्चाद्वै प्राणायामं प्रकल्पयेत् । मूलमंत्रेण तत्रैव तत्रैव दशावर्तं दशावर्तं नयेन्नरः ॥

पंचमुद्रा: प्रकर्तव्याः पूजावश्यं करे स्थिता ।

एता मुद्रा: प्रदश्यैव चरेत्पूजाविधिं नरः ॥

दीपं कृत्वा तदा तत्र नमस्कारं गुरोरथ ।

बध्वा पद्मासनं तत्र भद्रासनमथापि वा ॥

उत्तानासनकं कृत्वा पर्यंकासनकं तथा ।

यथासुखं तथा स्थित्वा प्रयोगं पुनरेव च ॥

कृत्वा पूजां पुरा जातां वट्टकेनैव तारयेत् ।

यदि वा स्वयमेवेह गृहे न नियमोऽस्ति च ॥

पश्चाच्चैवार्घपात्रेण क्षालयेल्लिंगमुत्तमम् । अनन्यमानसो भूत्वा पूजाद्रव्यं निधाय च पश्चाच्चावाहयेद्देवं मंत्रेणानेन वै नरः । कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम् यथोक्तरूपिणं शंभुं निर्गुणं गुणरूपिणम् । पंचवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम् कर्पूरगौरं दिव्यांगं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम् शिवालयमें दिक्पालोंकी भी स्थापना करके ३७ उनकी पूजा करे । घरमें सदा मूलमन्त्रका प्रयोग करके शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥३७ ॥

घरमें द्वारपालोंके पूजनका सर्वथा नियम नहीं है; ३८ क्योंकि घरमें जिस शिवलिंगकी पूजा की जाती है, उसमें सभी देवता प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ३८ ॥

घरपर होनेवाली शिवकी पूजाके समय अंगोंसहित ३ ९ तथा सपरिवार उन सदाशिवका आवाहन करके पूजन किया जाय, ऐसा कोई नियम नहीं है ॥ ३ ९ ॥ भगवान् शिवके समीप ही अपने लिये ४० आसनकी व्यवस्था करे । उस समय उत्तराभिमुख बैठकर आचमन करे ॥ ४० ॥

उसके बाद दोनों हाथोंका प्रक्षालन करके ४ ९ प्राणायाम करे । प्राणायामकालमें मनुष्यको मूलमन्त्रकी दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये ॥ ४१ ॥

हाथोंसे पाँच मुद्राएँ दिखाये । यह पूजाका ४२ आवश्यक अंग है । इन मुद्राओंका प्रदर्शन करके ही मनुष्य पूजाविधिका अनुसरण करे ॥ ४२ ॥

तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरुको नमस्कार ४३ करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे अथवा उत्तानासन या पर्यंकासनका आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे और पुन: पूजनका प्रयोग करे । पुराने समयमें तो ४४ पत्थरकी बटियाकी ही श्रद्धापूर्वक पूजा करके लोग भवसागरसे पार हो जाते थे । यदि वे शुद्ध रूपमें स्वयमेव घरमें विद्यमान हैं, तो उसके लिये कोई ४५ नियमकी आवश्यकता नहीं है॥४३–४५ ॥ तत्पश्चात् अर्घ्यपात्रसे उत्तम शिवलिंगका प्रक्षालन करे । मनको भगवान् शिवसे अन्यत्र न ले जाकर ॥ ४६ पूजा - सामग्रीको अपने पास रखकर निम्नांकित मन्त्रसमूहसे महादेवजीका आवाहन करे ॥ ४६१/२ ॥ ॥ ४७ जो कैलासके शिखरपर निवास करते हैं, पार्वतीदेवीके पति हैं, समस्त देवताओंसे उत्तम हैं, जिनके स्वरूपका शास्त्रोंमें यथावत् वर्णन किया गया है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच ॥ ४८ मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन - तीन नेत्र हैं, जिनकी ध्वजापर वृषभ चिह्न अंकित है, । जिनके अंगकी कान्ति कर्पूरके समान गौर है, जो

पृष्ठ 276

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२६४ व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम्

वासुक्यादिपरीतांगं पिनाकाद्यायुधान्वितम् ।

सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीह निरंतरम् ॥

जयजयेति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुञ्जकैः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ ॥ ४ ९ । दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुटसे सुशोभित तथा | सिरपर जटाजूट धारण करनेवाले हैं, जो हाथीकी खाल पहनते हैं और व्याघ्रचर्म ओढ़ते हैं, जिनका ५० स्वरूप शुभ है, जिनके अंगोंमें वासुकि आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, भक्तसमुदाय जय - जयकार करते हुए जिनकी तेजसा दुःसहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम् ॥५१

शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपंकजम् ।

वेदैः शास्त्रैर्यथागीतं विष्णुब्रह्मनुतं सदा ॥

भक्तवत्सलमानंदं शिवमावाहयाम्यहम् ।

एवं ध्यात्वा शिवं साम्बमासनं परिकल्पयेत् ॥

चतुर्थ्यन्तपदेनैव सर्वं कुर्याद्यथाक्रमम् ।

ततः पाद्यं प्रदद्याद्वै ततोऽर्घ्यं शंकराय च ॥

ततश्चाचमनं कृत्वा शम्भवे परमात्मने ।

पश्चाच्च पंचभिर्द्रव्यैः स्नापयेच्छंकरं मुदा ॥

वेदमन्त्रैर्यथायोग्यं नामभिर्वा समन्त्रकैः ।

चतुर्थ्यन्तपदैर्भक्त्या द्रव्याण्येवार्पयेत्तदा ॥

तथाभिलषितं द्रव्यमर्पयेच्छङ्करोपरि ।

ततश्च वारुणं स्नानं करणीयं शिवाय वै ॥

सुगंधं चंदनं दद्यादन्यलेपानि यत्नतः ।

ससुगंधजलेनैव जलधारां प्रकल्पयेत् ॥

वेदमंत्रैः षडङ्गैर्वा नामभी रुद्रसंख्यया ।

यथावकाशं तां दत्वा वस्त्रेण मार्जयेत्ततः ॥

पश्चादाचमनं दद्यात्ततो वस्त्रं समर्पयेत् ।

तिलाश्चैव यवा वापि गोधूमा मुद्गमाषकाः ॥

अर्पणीयाः शिवायैवं मंत्रैर्नानाविधैरपि ।

ततः पुष्पाणि देयानि पंचास्याय महात्मने ॥

सेवामें लगे रहते हैं, दुस्सह तेजके कारण जिनकी ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओंसे सेवित हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, जिनका ५२ मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ है, वेदों और शास्त्रोंने जिनकी महिमाका यथावत् गान किया है, विष्णु और ब्रह्मा भी सदा जिनकी स्तुति करते हैं तथा ५३ जो भक्तवत्सल हैं, उन परमानन्दस्वरूप शिवका मैं आवाहन करता हूँ । इस प्रकार साम्बशिवका ध्यान करके उनके लिये आसन दे ॥ ४७-५३ ॥ चतुर्थ्यन्त पदसे ही क्रमशः सब कुछ अर्पित ५४ करे । [ यथा - साम्बाय सदाशिवाय नमः आसनं समर्पयामि इत्यादि । ] तत्पश्चात् भगवान् शंकरको पाद्य और अर्घ्य दे । तदनन्तर परमात्मा शम्भुको ५५ आचमन कराकर पंचामृतसम्बन्धी द्रव्योंद्वारा प्रसन्नता-पूर्वक शंकरको स्नान कराये॥५४-५५ ॥ वेदमन्त्रों अथवा समन्त्रक चतुर्थ्यन्त नामपदोंका ५६ उच्चारण करके भक्तिपूर्वक यथायोग्य समस्त द्रव्य भगवान्को अर्पित करे । अभीष्ट द्रव्यको शंकरके ऊपर चढ़ाये । फिर भगवान् शिवको जलधारासे स्नान ५७ कराये ॥ ५६-५७ ॥ स्नान पश्चात् उनके श्रीअंगोंमें सुगन्धित चन्दन ५८ तथा अन्य द्रव्योंका यत्नपूर्वक लेप करे । तत्पश्चात् सुगन्धित जलसे ही उनके ऊपर जलधारा गिराकर अभिषेक करे । वेदमन्त्रों, षडंगों अथवा शिवके ५ ९ ग्यारह नामोंद्वारा यथावकाश जलधारा चढ़ाकर वस्त्रसे शिवलिंगको अच्छी तरह पोछे ॥ ५८-५९ ॥ तदनन्तर आचमन प्रदान करे और वस्त्र समर्पित ६० करे । नाना प्रकारके मन्त्रोंद्वारा भगवान् शिवको तिल, जौ, गेहूँ, मूँग और उड़द अर्पित करे । फिर पाँच ६१ । मुखवाले परमात्मा शिवको पुष्प चढ़ाये ॥ ६०-६१ ॥

पृष्ठ 277

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 277 का मूल पृष्ठ
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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २६५

प्रतिवक्त्रं यथाध्यानं यथायोग्याभिलाषतः ।

कमलैः शतपत्रैश्च शंखपुष्पैः परैस्तथा ॥ ६२

कुशपुष्पैश्च धत्तूरैर्मन्दारैर्द्रोणसंभवैः ।

तथा च तुलसीपत्रैर्बिल्वपत्रैर्विशेषतः ॥ ६३

पूजयेत्परया भक्त्या शंकरं भक्तवत्सलम् ।

सर्वाभावे बिल्वपत्रमर्पणीयं शिवाय वै ॥ ६४

बिल्वपत्रार्पणेनैव सर्वपूजा प्रसिध्यति ।

ततः सुगंधचूर्णं वै वासितं तैलमुत्तमम् ॥ ६५

अर्पणीयं च विविधं शिवाय परया मुदा ।

ततो धूपः प्रकर्तव्यो गुग्गुलागुरुभिर्मुदा ॥ ६६

दीपो देयस्ततस्तस्मै शंकराय घृताप्लुतः ।

अर्धं दद्यात्पुनस्तस्मै मंत्रेणानेन भक्तितः ॥ ६७

कारयेद्भावतो भक्त्या वस्त्रेण मुखमार्जनम् ।

रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर ॥ ६८

भुक्तिमुक्तिफलं देहि गृहीत्वार्धं नमोऽस्तु ते ।

ततो देयं शिवायैव नैवेद्यं विविधं शुभम् ॥६ ९

तत आचमनं प्रीत्या कारयेद्वाविलम्बतः ।

ततः शिवाय ताम्बूलं सांगोपाङ्गं विधाय च ॥ ७०

कुर्यादारार्तिकं पञ्चवर्तिकामानुसंख्यया ।

पादयोश्च चतुर्वारं द्विःकृत्वो नाभिमण्डले ॥७१

एककृत्वो मुखे सप्तकृत्वः सर्वाङ्ग एव हि ।

ततो ध्यानं यथोक्तं वै कृत्वा मंत्रमुदीरयेत् ॥ ७२

यथासङ्ख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मन्त्रविधिं नरः ।

गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मन्त्रजपं सुधीः ॥ ७३

गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मन्त्रमुदीरयेत् ।

यथासंख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मन्त्रविधिं नरः ॥७४

स्तोत्रैर्नानाविधैः प्रीत्या स्तुवीत वृषभध्वजम् ।

ततः प्रदक्षिणां कुर्याच्छिवस्य च शनैः शनैः ॥ ७५

प्रत्येक मुखपर ध्यानके अनुसार यथोचित अभिलाषा करके कमल, शतपत्र, शंखपुष्प, कुशपुष्प, धतूर, मन्दार, द्रोणपुष्प, तुलसीदल तथा बिल्वपत्रके द्वारा पराभक्तिके साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी विशेष पूजा करे । अन्य सब वस्तुओंका अभाव होनेपर शिवको केवल बिल्वपत्र ही अर्पित करे ॥ ६२–६४ ॥ बिल्वपत्र समर्पित होनेसे ही शिवकी पूजा सफल होती है । तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा सुवासित उत्तम तैल, इत्र आदि विविध वस्तुएँ बड़े हर्षके साथ भगवान् शिवको अर्पित करे । तदनन्तर प्रसन्नतापूर्वक गुग्गुल और अगुरु आदि धूप निवेदित करे ॥ ६५-६६ ॥ तदनन्तर शंकरजीको घृतपूर्ण दीपक दे । इसके बाद निम्न मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुनः अर्घ्य दे और भक्तिभावसे वस्त्रद्वारा उनके मुखका मार्जन करे — ' हे शंकर! आपको नमस्कार है । आप इस अर्घ्यको स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, सुख दीजिये तथा भोग और मोक्षका फल प्रदान कीजिये । ' इसके बाद भगवान् शिवको भाँति - भाँतिके उत्तम नैवेद्य अर्पित करे ॥ ६७–६९ ॥ इसके पश्चात् प्रेमपूर्वक शीघ्र आचमन कराये । तदनन्तर सांगोपांग ताम्बूल बनाकर शिवको समर्पित करे । इसके अनन्तर पाँच बत्तीकी आरती बनाकर भगवान्को दिखाये । पैरोंमें चार बार, नाभिमण्डलके सामने दो बार, मुखके समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण अंगोंमें सात बार आरती दिखाये । तत्पश्चात् यथोक्त ध्यान करके मन्त्रका उच्चारण करे ॥ ७०–७२ ॥ बुद्धिमान् मनुष्यको गुरुके द्वारा बताये गये नियमके अनुसार ही मन्त्रका जप करना चाहिये । अथवा अपने ज्ञानके अनुसार जितनी संख्यामें हो सके, उतनी संख्यामें ही मन्त्रोंका विधिवत् उच्चारण करे ॥ ७३-७४ ॥ प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे वृषभध्वज शंकरकी स्तुति करे । तत्पश्चात् धीरे - धीरे शिवकी परिक्रमा करे ॥ ७५ ॥

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२६६ नमस्कारांस्ततः कुर्यात्साष्टांगं विधिवत्पुमान् ततः पुष्पांजलिर्देयो मंत्रेणानेन भक्तितः

शंकराय परेशाय शिवसन्तोषहेतवे ।

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद्यद्यत्पूजादिकं मया ॥

कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर ।

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ॥

इति विज्ञाय गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे ।

भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलंबनम् ॥

त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो ।

इत्यादि बहुविज्ञप्तिं कृत्वा सम्यग्विधानतः ॥

पुष्पांजलिं समप्यैव पुनः कुर्यान्नतिं मुहुः ।

स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो ॥

पूजाकाले पुनर्नाथ त्वयागन्तव्यमादरात् ।

इति संप्रार्थ्य बहुशः शंकरं भक्तवत्सलम् ॥

विसर्जयेत्स्वहृदये तदपो मूर्ध्नि विन्यसेत् ।

इति प्रोक्तमशेषेण मुनयः शिवपूजनम् ।

भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव किमन्यच्छ्रोतुमर्हथ ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । इसके बाद भक्त पुरुष साष्टांग प्रणाम करे और ॥ ७६ शिवकी प्रसन्नताके लिये उन परमेश्वर शंकरको इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि दे - हे शंकर! मैंने अज्ञानसे या जान - बूझकर जो - जो पूजन आदि किया ७७ है, वह आपकी कृपासे सफल हो । हे मृड! मैं आपका हूँ, मेरे प्राण सदा आपमें लगे हुए हैं, मेरा चित्त सदा ७८ आपका ही चिन्तन करता है - ऐसा जानकर हे गौरीनाथ! हे भूतनाथ! आप मुझपर प्रसन्न होइये । हे प्रभो! धरतीपर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके ७ ९ लिये भूमि ही सहारा है, उसी प्रकार जिन्होंने आपके प्रति अपराध किये हैं, उनके लिये भी आप ही शरणदाता हैं॥७६–७९ १ / २ ॥ ८० इस प्रकार बहुविध प्रार्थना करके उत्तम विधिसे पुष्पांजलि अर्पित करनेके पश्चात् पुनः भगवान्को बार - बार नमस्कार करे । [ तत्पश्चात् यह बोलकर ८१ विसर्जन करना चाहिये ] हे देवेश! हे प्रभो! अब आप परिवारसहित अपने स्थानको जायँ । नाथ! जब पूजाका समय हो, तब पुनः आप आदरपूर्वक पधारें ॥ ८०-८११ / २ ॥ ८२ इस प्रकार भक्तवत्सल शंकरकी बारम्बार प्रार्थना करके उनका विसर्जन करे और उस जलको अपने हृदयमें लगाये तथा मस्तकपर चढ़ाये ॥ ८२१/२ ॥ हे ऋषियो! इस तरह मैंने शिवपूजनकी सारी

विधि बता दी, जो भोग और मोक्षको देनेवाली है ।

८३ । अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं? ॥८३ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने शिवपूजनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम सृष्टिखण्डमें सृष्टि-उपाख्यानमें शिवपूजनवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले- हे महाभाग! हे व्यासशिष्य! व्यासशिष्य महाभाग कथय त्वं प्रमाणतः । आप सप्रमाण हमें यह बतायें कि किन - किन पुष्पोंसे पूजन करनेपर भगवान् सदाशिव कौन - कौन - सा फल

कैः पुष्पैः पूजितः शम्भुः किं किं यच्छति वै फलम् ॥ १ । प्रदान करते हैं? ॥१ ॥

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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २६७ सूत उवाच

शौनकाद्याश्च ऋषयः शृणुतादरतोऽखिलम् ।

कथयाम्यद्य सुप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

एष एव विधिः पृष्टो नारदेन महर्षिणा ।

प्रोवाच परमप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

ब्रह्मोवाच

कमलैर्बिल्वपत्रैश्च शतपत्रैस्तथा पुनः ।

शंखपुष्पैस्तथा देवं लक्ष्मीकामोऽर्चयेच्छिवम् ॥

एतैश्च लक्षसङ्ख्याकैः पूजितश्चेद्भवेच्छिवः ।

पापहानिस्तथा विप्र लक्ष्मीः स्यान्नात्र संशयः ॥

विंशतिः कमलानां तु प्रस्थमेकमुदाहृतम् ।

बिल्वो दलसहस्त्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् ॥

शतपत्रसहस्त्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् ।

पलैः षोडशभिः प्रस्थः पलं टंकदशस्मृतः ॥

अनेनैव तु मानेन तुलामारोपयेद्यदा ।

सर्वान्कामानवाप्नोति निष्कामश्चेच्छिवो भवेत् ॥

राज्यस्य कामुको यो वै पार्थिवानां च पूजया ।

तोषयेच्छंकरं देवं दशकोट्या मुनीश्वराः ॥

लिंगं शिवं तथा पुष्पमखण्डं तण्डुलं तथा ।

चर्चितं चंदनेनैव जलधारां तथा पुनः ॥

प्रतिरूपं तथा मंत्रं बिल्वीदलमनुत्तमम् ।

अथवा शतपत्रं च कमलं वा तथा पुनः ॥

शंखपुष्पैस्तथा प्रोक्तं विशेषेण पुरातनैः ।

सर्वकामफलं दिव्यं परत्रेहापि सर्वथा ॥

धूपं दीपं च नैवेद्यमर्घं चारार्तिकं तथा ।

प्रदक्षिणां नमस्कारं क्षमापनविसर्जने ॥

कृत्वा साङ्गं तथा भोज्यं कृतं येन भवेदिह ।

तस्य वै सर्वथा राज्यं शंकरः प्रददाति च ॥

सूतजी बोले- हे शौनकादि ऋषियो! आप आदरपूर्वक सब सुनें । मैं बड़े प्रेमसे पुष्पार्पणकी विधि २ बता रहा 11 3 11 देवर्षि नारदने भी इसी विधिको विधाता ३ ब्रह्माजीसे पूछा था । तब उन्होंने बड़े ही प्रेमसे शिव-पुष्पार्पणकी विधि बतायी थी ॥३ ॥

ब्रह्माजी बोले – हे नारद! लक्ष्मीप्राप्तिक इच्छावालेको कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्पसे ४ भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये । हे विप्र! यदि एक लाखकी संख्यामें इन पुष्पोंद्वारा भगवान् शिवकी पूजा की जाय, तो सारे पापोंका नाश होता है और लक्ष्मीकी ५ भी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४-५ ॥ बीस कमलोंका एक प्रस्थ बताया गया है और ६ एक सहस्र बिल्वपत्रोंका आधा प्रस्थ कहा गया है ॥ ६ ॥

एक सहस्र शतपत्रसे आधे प्रस्थकी परिभाषा की ७ गयी है । सोलह पलोंका एक प्रस्थ होता है और दस टंकोंका एक पल । जब इसी मानसे [ पत्र, पुष्प आदिको ] तुलापर रखे, तो वह सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता ८ है और यदि निष्कामभावनासे युक्त है, तो वह [ इस पूजनसे ] शिवस्वरूप हो जाता है ॥ ७-८ ॥ हे मुनीश्वरो! जो राज्य प्राप्त करनेका इच्छुक ९ है, उसको दस करोड़ पार्थिव शिवलिंगोंकी पूजाके द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न करना चाहिये॥९ ॥

प्रत्येक पार्थिव - लिंगपर मन्त्रसहित पुष्प, खण्डरहित १० धानके अक्षत और सुगन्धित चन्दन चढ़ाकर अखण्ड जलधारासे अभिषेक करना चाहिये । तदनन्तर प्रत्येक पार्थिव लिंगपर मन्त्रसहित अच्छे - अच्छे बिल्वपत्र ११ अथवा शतपत्र और कमलपुष्प समर्पित करना चाहिये । प्राचीन ऋषियोंने कहा है कि यदि शिवलिंगपर शंखपुष्पीके फूल चढ़ाये जायँ, तो इस लोक और १२ परलोकमें सभी कामनाओंका दिव्य फल प्राप्त होता है॥१०–१२ ॥ धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य, आरती, प्रदक्षिणा, १३ नमस्कार, क्षमाप्रार्थना और विसर्जन करके जिसने ब्राह्मणभोजन करा दिया, उसे भगवान् शंकर अवश्य ही राज्य प्रदान करते हैं । जो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बननेका १४ | इच्छुक है, वह [ उपर्युक्त कही गयी विधिके अनुसार ]

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२६८ प्राधान्यकामुको यो वै तदर्धेनार्चयेत्पुमान् कारागृहगतो यो वै लक्षेनैवार्चयेद्धरम् रोगग्रस्तो यदा स्याद्वै तदर्धेनार्चयेच्छिवम् कन्याकामो भवेद्यो वै तदर्धेन शिवं पुनः

विद्याकामस्तथा यः स्यात्तदर्धेनार्चयेच्छिवम् ।

वाणीकामो भवेद्यो वै घृतेनैवार्चयेच्छिवम् ॥

उच्चाटनार्थं शत्रूणां तन्मितेनैव पूजनम् ।

मारणे वै तु लक्षण मोहने तु तदर्धतः ॥

सामन्तानां जये चैव कोटिपूजा प्रशस्यते । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । उसके आधे अर्थात् पाँच करोड़ पार्थिव शिवलिंगोंका ॥ १५ यथाविधि पूजन करे । कारागारमें पड़े मनुष्यको एक लाख पार्थिवलिंगोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करनी चाहिये ॥ १३–१५ ॥ । यदि रोगग्रस्त हो, तो उसे उस संख्याके आधे ॥ १६ अर्थात् पचास हजार पार्थिव लिंगोंसे शिवका पूजन करना चाहिये । कन्या चाहनेवाले मनुष्यको उसके आधे अर्थात् पच्चीस हजार पार्थिव लिंगोंसे शिवका पूजन करना चाहिये ॥ १६ ॥

जो विद्या प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है, उसे १७ चाहिये कि वह उसके भी आधे पार्थिव लिंगोंसे शिवकी अर्चना करे । जो वाणीका अभिलाषी हो, उसे घीसे शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥१७ ॥

अभिचारादि कर्मोंमें कमलपुष्पोंसे शिवपूजनका १८ विधान है । सामन्त राजाओंपर विजय प्राप्त करनेके लिये एक करोड़ कमलपुष्पोंसे शिवका पूजन करना प्रशस्त माना गया है । राजाओंको अपने अनुकूल राज्ञामयुतसंख्यं च वशीकरणकर्मणि ॥१ ९ करनेके लिये दस लाख कमलपुष्पोंसे पूजन करनेका

यशसे च तथा संख्या वाहनाद्यैः सहस्रिका ।

मुक्तिकामोऽर्चयेच्छंभुं पंचकोट्या सुभक्तितः ॥

ज्ञानार्थी पूजयेत्कोट्या शंकरं लोकशंकरम् ।

शिवदर्शनकामो वै तदर्धेन प्रपूजयेत् ॥

तथा मृत्युंजयो जाप्यः कामनाफलरूपतः ।

पंचलक्षो जपो यर्हि प्रत्यक्षं तु भवेच्छिवः ॥

लक्षेण भजते कश्चिद् द्वितीये जातिसंभवः ।

तृतीये कामनालाभश्चतुर्थे तं प्रपश्यति ॥

विधान है ॥ १८-१९ ॥

यश प्राप्त करनेके लिये उतनी ही संख्या २० कही गयी है और वाहन आदिकी प्राप्तिके लिये एक हजार पार्थिव लिंगोंकी पूजा करनी चाहिये । मोक्ष चाहनेवालेको पाँच करोड़ कमलपुष्पोंसे उत्तम भक्तिके साथ शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ २० ॥

ज्ञान चाहनेवाला एक करोड़ कमलपुष्पसे लोक-२१ कल्याणकारी शिवका पूजन करे और शिवका दर्शन प्राप्त करनेका इच्छुक उसके आधे कमलपुष्पसे उनकी पूजा करे । कामनाओंकी पूर्तिके लिये महामृत्युंजय मन्त्रका जप भी करना चाहिये । पाँच २२ लाख महामृत्युंजय मन्त्रका जप करनेपर भगवान् सदाशिव निश्चित ही प्रत्यक्ष हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ एक लाखके जपसे शरीरकी शुद्धि होती है, दूसरे लाखके जपसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, तीसरे लाखके जपसे सम्पूर्ण काम्य वस्तुएँ प्राप्त २३ होती हैं । चौथे लाखका जप होनेपर भगवान् शिवका