शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 41–50
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
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बरात विकट श्रीशिवजी भगवान
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BKM मयूरवाहन भगवान् कार्तिकेय
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भगवान श्रीनारायणके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्राकट्य
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पार्वती भगवती वधूवेष शिव भगवान वरवेषम
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अ ० ५ ]
हिंसकः शस्त्रधारी च सव्यहस्तेन भोजनी ।
दीनानां पीडकः क्रूरः परवेश्मप्रदीपकः ॥
चाण्डालाभिरतो नित्यं वेश्याभोगी महाखलः ।
स्वपत्नीत्यागकृत् पापी दुष्टसङ्गरतस्तदा ॥
तेन वेश्याकुसङ्गेन सुकृतं नाशितं महत् ।
वित्तलोभेन महिषी निर्भया जारिणी कृता ॥
आमृत्योः स दुराचारी कालेन निधनं गतः ।
ययौ यमपुरं घोरं भोगस्थानं हि पापिनाम् ॥
तत्र भुक्त्वा स दुष्टात्मा नरकानि बहूनि च ।
इदानीं स पिशाचोऽस्ति विन्ध्येऽद्रौ पापभुक् खलः ॥
तस्याग्रे परमां पुण्यां सर्वपापविनाशिनीम् ।
दिव्यां शिवपुराणस्य कथां कथय यत्नतः ॥
द्रुतं शिवपुराणस्य कथाश्रवणतः परात् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा हास्यति प्रेततां च सः ॥
मुक्तं च दुर्गतेस्तं वै बिन्दुगं त्वं पिशाचकम् ।
मदाज्ञया विमानेन समानय शिवान्तिकम् ॥
सूत उवाच
इत्यादिष्टो महेशान्या गन्धर्वेन्द्रश्च तुम्बुरुः ।
मुमुदेऽतीव मनसि भाग्यं निजमवर्णयत् ॥
आरुह्य सुविमानं स सत्या तत्प्रियया सह । ययौ विन्ध्याचले सोऽरं यत्रास्ते नारदप्रियः तत्रापश्यत् पिशाचं तं महाकायं महाहनुम् प्रहसन्तं रुदन्तं च वल्गन्तं विकटाकृतिम् बलाज्जग्राह तं पाशैः पिशाचं चातिभीकरम् तुम्बुरुश्शिवसत्कीर्तिगायकश्च महाबली माहात्म्य ३३ कर पाता था । अभक्ष्यभक्षण, सज्जनोंसे द्वेष और दूषित ३१ वस्तुओंका दान लेना -यही उसका स्वाभाविक कर्म बन गया था । वह अस्त्र - शस्त्र लेकर हिंसा करता, बायें हाथसे खाता, दीनोंको सताता और क्रूरतापूर्वक पराये घरोंमें आग लगा देता था । वह चाण्डालोंसे प्रेम करता और ३२ प्रतिदिन वेश्याके सम्पर्कमें रहता था । वह बड़ा दुष्ट था । उस पापीने अपनी पत्नीका परित्याग कर दिया था और वह दुष्टोंके संगमें निरत रहता था ॥ २ ९ - ३२ ॥ उसने वेश्याके कुसंगसे अपने सारे पुण्य नष्ट ३३ कर लिये और धनके लोभसे अपनी पत्नीको निर्भय करके व्यभिचारिणी बना डाला ॥ ३३ ॥
वह मृत्युपर्यन्त दुराचारमें ही फँसा रहा । फिर समय आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी । वह पापियोंके ३४ भोगस्थान घोर यमपुरमें गया और वहाँ बहुत - से नरकोंको भोगकर वह दुष्टात्मा इस समय विन्ध्यपर्वतपर ३५ पिशाच बना हुआ है । वहींपर वह दुष्ट पिशाच अपने पापोंका फल भोग रहा है ॥ ३४-३५ ॥ तुम उसके आगे यत्नपूर्वक शिवपुराणकी उस ३६ दिव्य कथाका प्रवचन करो, जो परम पुण्यमयी तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाली है । उत्तम शिवपुराणकी कथाके श्रवणसे उसका हृदय शीघ्र ही समस्त पापोंसे ३७ शुद्ध हो जायगा और वह प्रेतयोनिका परित्याग कर देगा । दुर्गतिसे मुक्त होनेपर उस बिन्दुग नामक पिशाचको मेरी आज्ञासे विमानपर बिठाकर तुम ३८ भगवान् शिवके समीप ले आओ ॥ ३६-३८ ॥ सूतजी बोले - [ हे शौनक! ] महेश्वरी उमाके इस प्रकार आदेश देनेपर गन्धर्वराज तुम्बुरु मन - ही-३ ९ मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने भाग्यकी सराहना की । तत्पश्चात् उस पिशाचकी सती - साध्वी पत्नी चंचुलाके साथ विमानपर बैठकर नारदके प्रिय ॥ ४० मित्र तुम्बुरु वेगपूर्वक विन्ध्याचल पर्वतपर गये, जहाँ वह पिशाच रहता था ॥ ३ ९ -४० ॥ । वहाँ उन्होंने उस पिशाचको देखा । उसका शरीर ॥ ४१ विशाल था और उसकी ठोढ़ी बहुत बड़ी थी । वह कभी हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था । उसकी आकृति बड़ी विकराल थी । भगवान् शिवकी उत्तम कीर्तिका । गान करनेवाले महाबली तुम्बुरुने उस अत्यन्त भयंकर ॥ ४२ । पिशाचको बलपूर्वक पाशोंद्वारा बाँध लिया ॥ ४१-४२ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_3_1_Front
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३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ अथो शिवपुराणस्य वाचनार्थं स तुम्बुरुः । तदनन्तर तुम्बुरुने शिवपुराणकी कथा बाँचनेक निश्चित्य रचनां चक्रे महोत्सवसमन्विताम् ॥ ४३ निश्चय करके महोत्सवयुक्त स्थान और मण्डप पिशाचं तारितुं देव्याः शासनात्तुम्बुरुर्गतः । आदिकी रचना की । इतनेमें ही सम्पूर्ण लोकों में बड़े | वेगसे यह प्रचार हो गया कि देवी पार्वतीकी आज्ञासे विन्ध्यं शिवपुराणं स ह्यद्रिं श्रावयितुं परम् ॥ ४४ | एक पिशाचका उद्धार करनेके उद्देश्यसे शिवपुराणकी इति कोलाहलो जातः सर्वलोकेषु वै महान् । उत्तम कथा सुनानेके लिये तुम्बुरु विन्ध्यपर्वतपर गये । तत्र तच्छ्रवणार्थाय ययुर्देवर्षयो द्रुतम् ॥ ४५ हैं । तब तो उस कथाको सुननेके लोभसे बहुत - से
समाजस्तत्र परमोऽद्भुतश्चासीच्छुभावहः ।
तेषां शिवपुराणस्यागतानां श्रोतुमादरात् ॥ ४६
पिशाचमथ तं पाशैर्बद्ध्वा समुपवेश्य च ।
तुम्बुरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम् ॥ ४७
आरभ्य संहितामाद्यां सप्तमीसंहितावधि ।
स्पष्टं शिवपुराणं हि समाहात्म्यं समावदत् ॥ ४८
श्रुत्वा शिवपुराणं तु सप्तसंहितमादरात् ।
बभूवुः सुकृतार्थास्ते सर्वे श्रोतार एव हि ॥ ४ ९
स पिशाचो महापुण्यं श्रुत्वा शिवपुराणकम् ।
विधूय कलुषं सर्वं जहौ पैशाचिकं वपुः ॥ ५०
दिव्यरूपो बभूवाशु गौरवर्णः सितांशुकः ।
सर्वालङ्कारदीप्ताङ्गस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः ॥५१
दिव्यं दिव्यवपुर्भूत्वा तया स निजकान्तया ।
जगौ स्वयमपि श्रीमांश्चरितं पार्वतीपतेः ॥ ५२
तद्वधूमिति सन्दृष्ट्वा सर्वे देवर्षयश्च ते ।
बभूवुर्विस्मिताश्चित्ते परमानन्दसंयुताः ॥५३
सुकृतार्था महेशस्य श्रुत्वा चरितमद्भुतम् ।
स्वं स्वं धाम ययुः प्रीत्या शंसन्तः शाङ्करं यशः ॥ ५४
बिन्दुगः सोऽपि दिव्यात्मा सुविमानस्थितः सुखी । स्वकान्तापार्श्वगः श्रीमाञ्छुशुभेऽतीव । खस्थितः ॥ ५५ | देवता और ऋषि भी शीघ्र ही वहाँ जा पहुँचे । आदरपूर्वक शिवपुराण सुननेके लिये आये हुए लोगोंक । उस पर्वतपर बड़ा अद्भुत और कल्याणकारी समाज जुट गया ॥ ४३–४६ ॥ तत्पश्चात् तुम्बुरुने उस पिशाचको पाशोंसे बाँधकर आसनपर बिठाया और हाथमें वीण लेकर गौरीपतिकी कथाका गान आरम्भ किया । माहात्म्यसहित पहली अर्थात् प्रथम संहितासे लेकर सातवीं संहितातक शिवपुराणकी कथाका उन्होंने स्पष्ट वर्णन किया ॥ ४७-४८ ॥ सात संहितावाले शिवपुराणका आदरपूर्वक श्रवण करके वे सभी श्रोता पूर्णतः कृतार्थ हो गये । उस परम पुण्यमय शिवपुराणको सुनकर उस पिशाचने अपने सारे पापोंको धोकर उस पैशाचिक शरीरको त्याग दिया । शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया । अंगकान्ति गौरवर्णकी हो गयी । शरीरपर श्वेत वस्त्र तथा सब प्रकारके पुरुषोचित आभूषण उसके अंगोंको उद्भासित करने लगे । वह त्रिनेत्रधारी चन्द्रशेखररूप हो गया ॥ ४ ९ –५१ ॥ इस प्रकार दिव्य देहधारी होकर श्रीमान् बिन्दुग अपनी भार्या चंचुलाके साथ स्वयं भी पार्वतीपति भगवान् शिवके दिव्य चरित्रका गुणगान करने लगा । उसकी स्त्रीको इस प्रकार दिव्य रूपसे सुशोभित देखकर वे सभी देवता और ऋषि बड़े विस्मित हुए; उनका चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया । भगवान् महेश्वरका वह अद्भुत चरित्र सुनकर वे सभी श्रोता परम कृतार्थ हो प्रेमपूर्वक श्रीशिवका यशोगान करते हुए अपने - अपने धामको चले गये ॥ ५२-५४ ॥ • दिव्यरूपधारी श्रीमान् बिन्दुग भी सुन्दर विमानपर अपनी प्रियतमाके पास बैठकर सुखपूर्वक आकाशमें स्थित हो परम शोभा पाने लगा ॥ ५५ ॥
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अ ० ६ ]
अथ गायन् महेशस्य सुगुणान् सुमनोहरान् ।
सतुम्बुरुर्जगामाशु सकान्तः शाङ्करं पदम् ॥
सुसत्कृतो महेशेन पार्वत्या च स बिन्दुगः ।
स्वगणश्च कृतः प्रीत्या साभवगिरिजासखी ॥
तस्मिँल्लोके परानन्दे घनज्योतिषि शाश्वते ।
लब्ध्वा निवासमचलं लभेते परमं सुखम् ॥
इत्येतत् कथितं पुण्यमितिहासमघापहम् ।
शिवाशिवपरानन्दं निर्मलं भक्तिवर्धनम् ॥
य इदं शृणुयाद्भक्त्या कीर्तयेद्वा समाहितः ।
स भुक्त्वा विपुलान् भोगानन्ते मुक्तिमवाप्नुयात् ॥
माहात्म्य ३५ तदनन्तर महेश्वरके सुन्दर एवं मनोहर गुणोंका ५६ गान करता हुआ वह अपनी प्रियतमा तथा तुम्बुरुके साथ शीघ्र ही शिवधाममें जा पहुँचा । वहाँ भगवान् महेश्वर तथा पार्वती देवीने प्रसन्नतापूर्वक बिन्दुगका ५७ बड़ा सत्कार किया और उसे अपना गण बना लिया । उसकी पत्नी चंचुला पार्वतीजीकी सखी हो गयी । उस घनीभूतज्योतिःस्वरूप परमानन्दमय सनातनधाममें अविचल निवास पाकर वे दोनों दम्पती परम सुखी हो ५८ गये ॥ ५६-५८ ॥ यह उत्तम इतिहास मैंने आपको सुनाया, जो ५ ९ पापोंका नाश करनेवाला, उमा - महेश्वरको आनन्द देनेवाला, अत्यन्त पवित्र तथा उनमें भक्ति बढ़ानेवाला है । जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा एकाग्रचित्त होकर इसका पाठ करता है, वह अनेक सांसारिक सुखोंको ६० । भोगकर अन्तमें मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ५ ९ -६० ॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराणे शिवपुराणमाहात्म्ये बिन्दुगसद्गतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुराणमाहात्म्यमें बिन्दुगसद्गतिवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः शिवपुराणके श्रवणकी विधि शौनक उवाच
सूत सूत महाप्राज्ञ व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते ।
धन्यस्त्वं शैववर्योऽसि वर्णनीयमहद्गुणः ॥
श्रीमच्छिवपुराणस्य श्रवणस्य विधिं वद ।
येन सर्वं लभेच्छ्रोता सम्पूर्णं फलमुत्तमम् ॥
सूत उवाच
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि सम्पूर्णफलहेतवे ।
विधिं शिवपुराणस्य शौनक श्रवणे मुने ॥
दैवज्ञं च समाहूय सन्तोष्य च जनान्वितः ।
मुहूर्तं शोधयेच्छुद्धं निर्विघ्नेन समाप्तये ॥
वार्ता प्रेष्या प्रयत्नेन देशे देशे च सा शुभा । भविष्यति कथा शैवी आगन्तव्यं शुभार्थिभिः शौनकजी बोले- हे महाप्राज्ञ! हे व्यासशिष्य! हे सूतजी! आपको नमस्कार है । आप धन्य हैं और १ शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं । आपके महान् गुण वर्णन करनेयोग्य हैं । अब आप कल्याणमय शिवपुराणके श्रवणकी विधि बतलाइये, जिससे सभी श्रोताओंको २ सम्पूर्ण उत्तम फलकी प्राप्ति हो सके ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे शौनक! हे मुने! अब मैं आपको सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये शिवपुराण ३ श्रवणकी विधि बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
[ सर्वप्रथम ] किसी ज्योतिषीको बुलाकर दान-४ मानसे सन्तुष्ट करके अपने सहयोगी लोगोंके साथ बैठकर बिना किसी विघ्न - बाधाके कथाकी समाप्ति होनेके उद्देश्यसे शुद्ध मुहूर्तका अनुसन्धान कराये । तदनन्तर प्रयत्नपूर्वक देश - देशमें— स्थान - स्थानपर यह शुभ सन्देश भेजे कि हमारे यहाँ शिवपुराणकी कथा होनेवाली है । अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको [ उसे ॥ ५ । सुननेके लिये ] अवश्य पधारना चाहिये ॥ ४-५ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_3_2_Front
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३६ दूरे हरिकथाः केचिद् दूरे शङ्करकीर्तनाः स्त्रियः शूद्रादयो ये च बोधस्तेषां भवेद्यतः देशे देशे शाम्भवा ये कीर्तनश्रवणोत्सुकाः तेषामानयनं कार्यं तत्प्रकारार्थमादरात् भविष्यति समाजोऽत्र साधूनां परमोत्सवः पारायणे पुराणस्य शैवस्य परमाद्भुतः श्रीमच्छिवपुराणाह्वरसपानाय चादरात् आयान्त्वरं भवन्तश्च कृपया प्रेमतत्पराः नावकाशो यदि प्रेम्णागन्तव्यं दिनमेककम् सर्वथागमनं कार्यं दुर्लभा च क्षणस्थितिः तेषामाह्वानमेवं हि कार्यं सविनयं मुदा । आगतानां च तेषां हि सर्वथा कार्य आदरः
शिवालये च तीर्थे वा वने वापि गृहेऽथवा ।
कार्यं शिवपुराणस्य श्रवणस्थलमुत्तमम् ॥
कार्यं संशोधनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् ।
विचित्रा रचना दिव्या महोत्सवपुरस्सरम् ॥
गृहोपस्करमुद्धृत्य निखिलं तदयोग्यकम् ।
एकान्ते गृहकोणे चादृश्ये यत्नान्निवेशयेत् ॥
कर्तव्यो मण्डपोऽत्युच्चैः कदलीस्तम्भमण्डितः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० । कुछ लोग भगवान् श्रीहरिकी कथासे बहुत ॥ ६ पड़ गये हैं । कितने ही स्त्री, शूद्र आदि भगवान दू शंकरके कथा - कीर्तनसे वंचित रहते हैं — उन सबक । भी सूचना हो जाय, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये । देश. देशमें जो भगवान् शिवके भक्त हों तथा शिव - कथा ॥ ७ कीर्तन और श्रवणके लिये उत्सुक हों, उन सबके आदरपूर्वक बुलवाना चाहिये ॥ ६-७ ॥ । [ उन्हें कहलाना चाहिये कि ] यहाँ सत्पुरुषोंको ॥ ८ आनन्द देनेवाला समाज तथा अति अद्भुत उत्सव होगा जिसमें शिवपुराणका पारायण होगा । श्रीशिवपुराणकं । रसमयी कथाका श्रवण करनेहेतु आपलोग प्रेमपूर्वक ॥ ९ शीघ्र पधारनेकी कृपा करें । यदि समयका अभाव हे तो प्रेमपूर्वक एक दिनके लिये भी आइये । आपके । निश्चय ही आना चाहिये; क्योंकि इस कथामे ॥ १० क्षणभरके लिये बैठनेका सौभाग्य भी दुर्लभ है । इस प्रकार विनय और प्रसन्नतापूर्वक श्रोताओंको निमन्त्रण देना चाहिये और आये हुए लोगोंका सब प्रकार से ॥ ११ आदर - सत्कार करना चाहिये ॥ ८ - ११ ॥ शिवमन्दिरमें, तीर्थमें, वनप्रान्तमें अथवा घरमें १२ शिवपुराणकी कथा सुननेके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करना चाहिये ॥१२ ॥
कथाभूमिको लीपकर शोधन करना चाहिये तथा १३ धातु आदिसे उस स्थानको सुशोभित करना चाहिये । महोत्सवके साथ - साथ वहाँ अद्भुत तथा सुन्दर व्यवस्था कर लेनी चाहिये । कथाके लिये अनुपयोगी घरके १४ साज - सामानको हटाकर घरके किसी एकान्त कोनेमें सुरक्षित रख देना चाहिये ॥ १३-१४ ॥ केलेके खम्भोंसे सुशोभित एक ऊँचा कथामण्डप फलपुष्पादिभिस्सम्यग्विष्वग्वैतानराजितः ॥ १५ तैयार कराये । उसे सब ओर फल - पुष्प आदिसे तथा
चतुर्द्दिक्षु ध्वजारोपस्सपताकः सुशोभनः ।
सुभक्तिः सर्वथा कार्या सर्वानन्दविधायिनी ॥
सङ्कल्प्यमासनं दिव्यं शङ्करस्य परात्मनः ।
वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं सुखसाधनम् ॥
सुन्दर चँदोवेसे अलंकृत करे और चारों ओर ध्वजा-पताका लगाकर तरह - तरहके सामानोंसे सजाकर सुन्दर शोभासम्पन्न बना दे । भगवान् शिवके प्रति सब १६ प्रकारसे उत्तम भक्ति करनी चाहिये; क्योंकि वही सब तरहसे आनन्दका विधान करनेवाली है ॥ १५-१६ ॥ परमात्मा भगवान् शंकरके लिये दिव्य आसनका निर्माण करना चाहिये तथा कथा - वाचकके लिये भी | एक ऐसा दिव्य आसन बनाना चाहिये, जो उनके १७ लिये सुखद हो सके ॥ १७ ॥
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अ ० ६ ]
श्रोतॄणां कल्पनीयानि सुस्थलानि यथार्हतः ।
अन्येषां च स्थलान्येव साधारणतया मुने ॥
विवाहे यादृशं चित्तं तादृशं कार्यमेव हि ।
अन्या चिन्ता विनिर्वार्या सर्वा शौनक लौकिकी ॥
उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता प्राग्वदनस्तथा ।
व्युत्क्रमः पादयोर्ज्ञेयो विरोधो नास्ति कश्चन ॥
अथवा पूर्वदिग्ज्ञेया पूज्यपूजकमध्यतः ।
अथवा सम्मुखे वक्तुः श्रोतॄणामाननं स्मृतम् ॥
व्यासासनसमारूढो यदा पौराणिको द्विजः ।
असमाप्तौ प्रसङ्गस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ॥
बालो युवाथ वृद्धो वा दरिद्रो वापि दुर्बलः ।
पुराणज्ञः सदा वन्द्यः पूज्यश्च सुकृतार्थिभिः ॥
नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन ।
यस्य वक्त्रोद्गता वाणी कामधेनुः शरीरिणाम् ॥
गुरवः सन्ति बहवो जन्मतो गुणतश्च वै ।
परो गुरुः पुराणज्ञस्तेषां मध्ये विशेषतः ॥
भवकोटिसहस्त्रेषु भूत्वा भूत्वावसीदताम् ।
यो ददाति परां मुक्तिं कोऽन्यस्तस्मात् परो गुरुः ॥
पुराणज्ञः शुचिर्दक्षः शान्तो विजितमत्सरः ।
साधुः कारुण्यवान् वाग्मी वदेत् पुण्यकथामिमाम् ॥
आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरान्तकम् । माहात्म्य ३७ हे मुने! [ नियमपूर्वक ] कथा सुननेवाले श्रोताओंके १८ लिये भी यथायोग्य सुन्दर स्थानोंकी व्यवस्था करनी चाहिये । अन्य लोगोंके लिये भी सामान्यरूपसे स्थान बनाने चाहिये ॥१८ ॥
हे शौनकजी! विवाहोत्सवमें जैसी उल्लासपूर्ण १ ९ मनःस्थिति होती है, वैसी ही इस कथोत्सवमें रखनी चाहिये । सब प्रकारकी दूसरी लौकिक चिन्ताओंको भूल जाना चाहिये ॥१ ९ ॥ वक्ता उत्तर दिशाकी ओर मुख करे तथा श्रोतागण २० पूर्व दिशाकी ओर मुख करके पालथी लगाकर बैठें । इस विषयमें भी कोई विरोध नहीं है कि पूज्य-पूजकके बीच पूर्व दिशा रहे अथवा वक्ताके सम्मुख २१ श्रोताओंका मुख रहे — ऐसा कहा गया है ॥ २०-२१ ॥ पौराणिक वक्ता व्यासासनपर जबतक विराजमान २२ रहें, तबतक प्रसंग- समाप्तिके पूर्व किसीको नमस्कार नहीं करना चाहिये । पुराणका विद्वान् वक्ता चाहे बालक, युवा, वृद्ध, दरिद्र अथवा दुर्बल- जैसा भी २३ हो, पुण्य चाहनेवालोंके लिये सदा वन्दनीय और पूज्य होता है॥२२-२३ ॥ जिसके मुखसे निकली हुई वाणी देहधारियोंके २४ लिये कामधेनुके समान अभीष्ट फल देनेवाली होती है, उस पुराणवेत्ता वक्ताके प्रति तुच्छबुद्धि कभी नहीं करनी चाहिये । संसारमें जन्म तथा गुणोंके कारण २५ बहुत - से गुरु होते हैं, परंतु उन सबमें पुराणोंका ज्ञाता विद्वान् ही परम गुरु माना गया है ॥ २४-२५ ॥ करोड़ों योनियोंमें जन्म ले - लेकर दुःख भोगते हुए २६ प्राणियोंको जो मुक्ति प्रदान करता है, उस [ पुराणवक्ता ] -से बड़ा दूसरा कौन गुरु हो सकता है? ॥ २६ ॥
पुराणवेत्ता पवित्र, दक्ष, शान्त, ईर्ष्यापर विजय २७ पानेवाला, साधु और दयालु होना चाहिये । ऐसा प्रवचनकुशल विद्वान् इस पुण्यमयी कथाको कहे । सूर्योदयसे आरम्भ करके साढ़े तीन पहरतक उत्तम कथा शिवपुराणस्य वाच्या सम्यक् सुधीमता ॥ २८ बुद्धिवाले विद्वान् पुरुषको शिवपुराणकी कथा सम्यक् रीतिसे बाँचनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ जो धूर्त, दुराचारी तथा दूसरेसे विवाद ये धूर्ता ये च दुर्वृत्ता ये चान्ये विजिगीषवः । करनेवाले और प्रपंची लोग हैं, उन कुटिलवृत्तिवाले तेषां कुटिलवृत्तीनामग्रे नैव वदेत् कथाम् ॥ २ ९ | लोगोंके सामने यह कथा नहीं कहनी चाहिये ।
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३८ न दुर्जनसमाकीर्णे न तु दस्युसमावृते देशे न धूर्तसदने वदेत् पुण्यकथामिमाम् ॥ कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने हि मुहूर्तकम् मलमूत्रोत्सर्जनार्थं तत्कथाकीर्तनान्नरैः वक्त्रा क्षौरं हि सङ्कार्यं दिनादर्वाग्व्रताप्तये कार्यं संक्षेपतो नित्यकर्म सर्वं प्रयत्नतः वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः । पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः
कथाविघ्नविनाशार्थं गणनाथं प्रपूजयेत् ।
कथाधीशं शिवं भक्त्या पुस्तकं च विशेषतः ॥
कथां शिवपुराणस्य शृणुयादादरात्सुधीः ।
श्रोता सुविधिना शुद्धः शुद्धचित्तः प्रसन्नधीः ॥
अनेककर्मविभ्रान्तः कामादिषड्विकारवान् ।
स्त्रैणः पाखण्डवादी च वक्ता श्रोता न पुण्यभाक् ॥
लोकचिन्तां धनागारपुत्रचिन्तां व्युदस्य च ।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत् फलमुत्तमम् ॥
श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः ।
वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः ॥
4
अभक्ता ये कथां पुण्यां शृण्वन्तीमां नराधमाः ।
तेषां श्रवणजं नास्ति फलं दुःखं भवे भवे ॥
असम्पूज्य पुराणं ये यथाशक्त्या ह्युपायनैः । शृण्वन्तीमां कथां मूढाः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । दुष्टोंसे भरे तथा डाकुओंसे घिरे प्रदेशमें और ३० व्यक्तिके घरमें इस पवित्र कथाको नहीं धूर्त चाहिये ॥ २ ९ -३० ॥ कहर | । मध्याह्नकालमें दो घड़ीतक कथा बन्द रखनी ॥ ३१ चाहिये, जिससे कथा - कीर्तनसे अवकाश पाकर लोग शौच आदिसे निवृत्त हो सकें ॥ ३१ ॥
। कथा - प्रारम्भके दिनसे एक दिन पहले व्रत ग्रहण ॥ ३२ करनेके लिये वक्ताको क्षौर करा लेना चाहिये । जिन दिनों कथा हो रही हो, उन दिनों प्रयत्नपूर्वक प्रात: कालका सारा नित्यकर्म संक्षेपसे ही कर लेना ॥ ३३ चाहिये । वक्ताके पास उसकी सहायताके लिये एक दूसरा वैसा ही विद्वान् स्थापित करना चाहिये, जो सब प्रकारके संशयोंको निवृत्त करने में समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल हो ॥ ३२-३३ ॥ कथामें आनेवाले विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये । ३४ गणेशजीका पूजन करे । कथाके स्वामी भगवान् शिवकी तथा विशेषतः शिवपुराण ग्रन्थकी भक्तिभावसे पूजा करे । तत्पश्चात् उत्तम बुद्धिवाला श्रोता विधिपूर्वक ३५ तन- मनसे शुद्ध एवं प्रसन्नचित्त हो आदरपूर्वक शिवपुराणकी कथा सुने ॥ ३४-३५ ॥ जो वक्ता और श्रोता अनेक प्रकारके कर्मोंमें ३६ भटक रहे हों, काम आदि छः विकारोंसे युक्त हों, स्त्रीमें आसक्ति रखते हों और पाखण्डपूर्ण बातें कहते हों, वे पुण्यके भागी नहीं होते । जो लौकिक चिन्ता ३७ तथा धन, गृह एवं पुत्र आदिकी चिन्ताको छोड़कर कथामें मन लगाये रहता है, उस शुद्धबुद्धि पुरुषको ३८ उत्तम फलकी प्राप्ति होती है । श्रद्धा और भक्तिसे युक्त, दूसरे कर्मोंमें मन नहीं लगानेवाले, मौन धारण करनेवाले, पवित्र एवं उद्वेगशून्य श्रोता ही पुण्यके भागी होते हैं ॥ ३६–३८ ॥ जो नराधम भक्तिरहित होकर इस पुण्यमयी ३ ९ कथाको सुनते हैं, उन्हें श्रवणका कोई फल नहीं होता और वे जन्म - जन्मान्तरमें क्लेश भोगते ही रहते हैं । | यथाशक्ति उपचारोंसे इस पुराणकी पूजा किये बिना जो मूढ़जन इस कथाको सुनते हैं, वे अपवित्र और
स्युर्दरिद्रा न पावनाः ॥ ४० । दरिद्र होते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥