शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 311–320
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
पृष्ठ 311
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २ ९९ इत्थं सखित्वं श्रीशंभोः प्रापैष धनदः पुरम् । इस तरह कुबेरने भगवान् शंकरकी मैत्री प्राप्त की और अलकापुरीके पास जो कैलास पर्वत है, वह
अलकान्निकषा चासीत्कैलासः शंकरालयः ॥ ३३ । भगवान् शंकरका निवास हो गया ॥३३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे कैलासगमनोपाख्याने कुबेरस्य शिवमित्रत्ववर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें कैलासगमनोपाख्यानमें कुबेरकी शिवमैत्रीका वर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा सृष्टिखण्डका उपसंहार ब्रह्मोवाच
नारद त्वं शृणु मुने शिवागमनमुत्तमम् ।
कैलासे पर्वतश्रेष्ठे कुबेरस्य तपोबलात् ॥
निधिपत्ववरं दत्त्वा गत्वा स्वस्थानमुत्तमम् ।
विचिन्त्य हृदि विश्वेशः कुबेरवरदायकः ॥
विध्यङ्गजस्स्वरूपो मे पूर्णः प्रलयकार्यकृत् ।
तद्रूपेण गमिष्यामि कैलासं गुह्यकालयम् ॥
रुद्रो हृदयजो मे हि पूर्णांशो ब्रह्म निष्कलः ।
हरिब्रह्मादिभिः सेव्यो मदभिन्नो निरञ्जनः ॥
तत्स्वरूपेण तत्रैव सुहृद्भूत्वा विलास्यहम् ।
कुबेरस्य च वत्स्यामि करिष्यामि तपो महत् ॥
इति सञ्चिन्त्य रुद्रोऽसौ शिवेच्छां गन्तुमुत्सुकः ।
ननाद तत्र ढक्कां स्वां सुगतिं नादरूपिणीम् ॥
त्रैलोक्यामानशे तस्या ध्वनिरुत्साहकारकः ।
आह्वानगतिसंयुक्तो विचित्रः सान्द्रशब्दकः ॥
तच्छ्रुत्वा विष्णुब्रह्माद्याः सुराश्च मुनयस्तथा ।
आगमा निगमा मूर्ताः सिद्धा जग्मुश्च तत्र वै ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! हे मुने! कुबेरके तपोबलसे भगवान् शिवका जिस प्रकार पर्वतश्रेष्ठ १ कैलासपर शुभागमन हुआ, वह प्रसंग सुनिये ॥ १ ॥
कुबेरको वर देनेवाले विश्वेश्वर शिव जब उन्हें निधिपति होनेका वर देकर अपने उत्तम स्थानको चले २ गये, तब उन्होंने मन - ही - मन इस प्रकार विचार किया ॥२ ॥
ब्रह्माजीके ललाटसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है ३ तथा जो प्रलयका कार्य सँभालते हैं, वे रुद्र मेरे पूर्ण स्वरूप हैं । अत: उन्हींके रूपमें मैं गुह्यकोंके निवासस्थान कैलास पर्वतपर जाऊँगा रुद्र मेरे हृदयसे ही ४ निष्कल, निरंजन, ब्रह्म हैं ब्रह्मा आदि देव उनकी उन्हींके रूपमें मैं ५ पर्वतपर विलासपूर्वक करूँगा ॥५ ॥
॥३ ॥
प्रकट हुए हैं । वे पूर्णावतार और मुझसे अभिन्न हैं । हरि, सेवा किया करते हैं ॥४ ॥
कुबेरका मित्र बनकर उसी रहूँगा और महान् तपस्या शिवकी इस इच्छाका चिन्तन करके उन रुद्रदेवने ६ कैलास जानेके लिये उत्सुक हो उत्तम गति देनेवाले नादस्वरूप अपने डमरूको बजाया ॥ ६ ॥
उसकी उत्साहवर्धक ध्वनि तीनों लोकोंमें व्याप्त ७ हो गयी । उसका विचित्र एवं गम्भीर शब्द आह्वानकी गतिसे युक्त था अर्थात् सुननेवालोंको अपने पास आनेके लिये प्रेरणा दे रहा था ॥७ ॥
उस ध्वनिको सुनकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता, ऋषि, मूर्तिमान् आगम, निगम तथा सिद्ध वहाँ ८ आ पहुँचे ॥८ ॥
पृष्ठ 312
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०० सुरासुराद्याः सकलास्तत्र जग्मुश्च सोत्सवाः सर्वेऽपि प्रमथा जग्मुर्यत्र कुत्रापि संस्थिताः गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः तेषां सङ्ख्यामहं वच्मि सावधानतया शृणु अभ्ययाच्छङ्खकर्णश्च गणकोट्या गणेश्वरः दशभिः केकराक्षश्च विकृतोऽष्टाभिरेव च
चतुःषष्ट्या विशाखश्च नवभिः पारियात्रकः ।
षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान्दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च ॥
जालंको हि द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुंगवः । सप्तभिः समदः श्रीमाँस्तथैव विकृताननः
पंचभिश्च कपाली हि षड्भिः सन्दारकः शुभः ।
कोटिकोटिभिरेवेह कण्डुकः कुण्डकस्तथा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । देवता और असुर सब लोग बड़े उत्साहमें ॥ ९ भरकर वहाँ आये । भगवान् शिवके समस्त पार्षद जहाँ - कहीं भी थे, वहाँसे उस स्थानपर पहुँचे ॥ ९ ॥
। सर्वलोकवन्दित महाभाग समस्त गणपाल भी ॥ १० उस स्थानपर जानेके लिये उद्यत हो गये । उनकी मैं संख्या बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ १० ॥
। शङ्खकर्ण नामका गणेश्वर एक करोड़ गणोंके ॥ ११ साथ, केकराक्ष दस करोड़ और विकृत आठ करोड़ गणोंके साथ जानेके लिये एकत्रित हुआ ॥ ११ ॥
विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारियात्रक १२ नौ करोड़ गणोंके साथ, सर्वान्तक छ: करोड़ गणोंके साथ और श्रीमान् दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ वहाँ चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १२ ॥
गणश्रेष्ठ जालंक बारह करोड़ गणोंके साथ, ॥ १३ समद सात करोड़ गणोंके साथ और श्रीमान् विकृतानन भी उतने गणोंके साथ जानेके लिये तैयार हुए ॥ १३ ॥
कपाली पाँच करोड़ गणोंके साथ, मंगलकारी १४ सन्दार अपने छ: करोड़ गणोंके साथ और कण्डुक तथा कुण्डक नामके गणेश्वर भी एक - एक करोड़ गणोंके साथ गये ॥ १४ ॥
विष्टंभोऽष्टाभिरगमदष्टभिश्चन्द्रतापनः ॥१५ विष्टम्भ और चन्द्रतापन नामक गणाध्यक्ष भी महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः ॥ कुण्डी द्वादशभिर्वाहस्तथा पर्वतकः शुभः । कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै ।
अग्निकः शतकोट्या वै कोट्याभिमुख एव च ।
आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः ॥
सन्नाहश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा ।
अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमन्त्रकः ॥
काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः । अपने - अपने आठ - आठ करोड़ गणोंके साथ कैलास चलनेके लिये वहाँपर आ गये ॥ १५ ॥
१६ एक हजार करोड़ गणोंसे घिरा हुआ महाकेश नामक गणपति भी वहाँ आ पहुँचा ॥१६ ॥
कुण्डी बारह करोड़ गणोंके साथ और वाह, श्रीमान् १७ पर्वतक, काल, कालक एवं महाकाल नामके गणेश्वर सौ करोड़ गणोंके साथ वहाँ पहुँचे ॥१७ ॥
अग्निक सौ करोड़, अभिमुख एक करोड़, १८ आदित्यमूर्धा तथा धनावह भी एक - एक करोड़ गणोंके साथ वहाँ आये ॥१८ ॥
सन्नाह तथा कुमुद सौ - सौ करोड़ गणोंके साथ १ ९ और अमोघ, कोकिल एवं सुमन्त्रक एक - एक करोड़ गणोंके साथ आ गये ॥१ ९ ॥ काकपाद नामका एक दूसरा गण साठ करोड़ और सन्तानक नामका गणेश्वर भी साठ करोड़ गणोंको साथ लेकर चलनेके लिये वहाँ आया ।
पृष्ठ 313
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) ३०१ महाबलश्च नवभिर्मधुपिंगश्च पिंगलः ॥
नीलो नवत्या देवेशं पूर्णभद्रस्तथैव च ।
कोटीनां चैव सप्तानां चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥
कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृतः ।
तत्राजगाम सर्वेशः कैलासगमनाय वै ॥
काष्ठागूढश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा ।
कोटिभिः सप्तभिश्चैत्रो नकुलीशस्स्वयं प्रभुः ॥
लोकान्तकश्च दीप्तात्मा तथा दैत्यान्तकः प्रभुः ।
देवो भृंगी रिटिः श्रीमान्देवदेवप्रियस्तथा ॥
अशनिर्भानुकश्चैव चतुःषष्ट्या सनातनः ।
नन्दीश्वरो गणाधीशः शतकोट्या महाबलः ॥
एते चान्ये च गणपा असंख्याता महाबलाः ।
सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः ॥
सर्वे चन्द्रावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः । हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलंकृताः ब्रह्मेन्द्रविष्णुसंकाशा अणिमादिगणैर्वृताः । सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजग्मुर्गणेश्वराः एते गणाधिपाश्चान्ये महात्मानोऽमलप्रभाः जग्मुस्तत्र महाप्रीत्या शिवदर्शनलालसाः २० | महाबल, मधुपिंग तथा पिंगल नामक गणेश्वर नौ - नौ करोड़ गणोंके सहित वहाँ उपस्थित हुए ॥ २० ॥
नील एवं पूर्णभद्र नामक गणेश्वर भी नब्बे - नब्बे २१ करोड़ गणोंके साथ वहाँ आये । महाशक्तिशाली | चतुर्वक्त्र नामका गणेश्वर सात करोड़ गणोंसे घिरा हुआ कैलास जानेके लिये वहाँ आ पहुँचा ॥ २१ ॥
एक सौ बीस हजार करोड़ गणोंसे आवृत होकर २२ सर्वेश नामका गणेश्वर भी कैलास चलनेके लिये वहाँ आया ॥ २२ ॥
काष्ठागूढ, सुकेश तथा वृषभ नामक गणपति २३ चौंसठ करोड़, चैत्र और स्वामी नकुलीश स्वयं सात करोड़ गणोंके साथ कैलासगमनके लिये आये ॥ २३ ॥
लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक, प्रभु, देव, २४ भृंगी, श्रीमान् देवदेवप्रिय, रिटि, अशनि, भानुक तथा सनातन नामके गणपति चौंसठ- चौंसठ करोड़ गणोंके साथ वहाँपर उपस्थित हुए । नन्दीश्वर नामके महाबलवान् २५ गणाधीश सौ करोड़ गणोंके सहित कैलास चलनेके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ २४-२५ ॥ इन गणाधिपोंके अतिरिक्त अन्य बहुत - से असंख्य २६ शक्तिशाली गणेश्वर वहाँ कैलास चलनेके लिये आये । वे सब हजार भुजाओंवाले थे तथा जटा, मुकुट धारण किये हुए थे ॥ २६ ॥
सभी गण चन्द्रमाके आभूषणसे शोभायमान थे, ॥ २७ सभीके कण्ठ नीलवर्णके थे और वे तीन - तीन नेत्रोंसे युक्त थे । सभी हार, कुण्डल, केयूर तथा मुकुट आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे ॥२७ ॥
ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णुके समान अणिमादि अष्ट ॥ २८ महासिद्धियोंसे युक्त, करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान सभी गणेश्वर वहाँपर आ गये ॥२८ ॥
। इन गणाध्यक्षोंके अतिरिक्त निर्मल प्रभामण्डलसे ॥ २ ९ युक्त, महान् आत्मावाले तथा भगवान् शिवके दर्शनकी लालसासे परिपूर्ण अन्य अनेक गणाधिप अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वहाँपर जा पहुँचे ॥२ ९ ॥ विष्णु आदि प्रमुख समस्त देवता वहाँ जाकर गत्वा तत्र शिवं दृष्ट्वा नत्वा चक्रुः परां नुतिम् । भगवान् सदाशिवको देखकर हाथ जोड़कर नतमस्तक सर्वे साञ्जलयो विष्णुप्रमुखा नतमस्तकाः ॥ ३० होकर उनकी उत्तम स्तुति करने लगे ॥३० ॥
पृष्ठ 314
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २०
इति विष्ण्वादिभिः सार्धं महेशः परमेश्वरः ।
कैलासमगमत्प्रीत्या कुबेरस्य महात्मनः ॥ ३१
कुबेरोऽप्यागतं शंभुं पूजयामास सादरम् ।
भक्त्या नानोपहारैश्च परिवारसमन्वितः ॥ ३२
ततो विष्ण्वादिकान्देवान्गणांश्चान्यानपि ध्रुवम् ।
शिवानुगान्समानर्च शिवतोषणहेतवे ॥ ३३
अथ शम्भुः समालिंग्य कुबेरं प्रीतमानसः ।
मूर्ध्नि चाघ्राय संतस्थावलकां निकषाखिलैः ॥ ३४
शशास विश्वकर्माणं निर्माणार्थं गिरौ प्रभुः ।
नानाभक्तनिवासाय स्वपरेषां यथोचितम् ॥ ३५
विश्वकर्मा ततो गत्वा तत्र नानाविधां मुने ।
रचनां रचयामास द्रुतं शम्भोरनुज्ञया ॥ ३६
अथ शम्भुः प्रमुदितो हरिप्रार्थनया तदा ॥ ३७
कुबेरानुग्रहं कृत्वा ययौ कैलासपर्वतम् ।
सुमुहूर्ते प्रविश्यासौ स्वस्थानं परमेश्वरः ॥ ३८
अकरोदखिलान्प्रीत्या सनाथान्भक्तवत्सलः ।
अथ सर्वे प्रमुदिता विष्णुप्रभृतयः सुराः ।
मुनयश्चापरे सिद्धा अभ्यषिञ्चन्मुदा शिवम् ॥ ३ ९
समानर्चुः क्रमात्सर्वे नानोपायनपाणयः ।
नीराजनं समाकार्षुर्महोत्सवपुरःसरम् ॥ ४०
तदासीत्सुमनोवृष्टिर्मंगलायतना मुने ।
सुप्रीता ननृतुस्तत्राप्सरसो गानतत्पराः ॥ ४१
जयशब्दो नमः शब्दस्तत्रासीत्सर्वसंस्कृतः ।
तदोत्साहो महानासीत्सर्वेषां सुखवर्धनः ॥ ४२
स्थित्वा सिंहासने शंभुर्विरराजाधिकं तदा । ।
सर्वैः संसेवितोऽभीक्ष्णं विष्ण्वाद्यैश्च यथोचितम् ॥ ४३ ।
इस प्रकार विष्णु आदि देवताओंके साथ परमेश्वर भगवान् महेश महात्मा कुबेरके प्रेमसे वशीभूत हो कैलासको चले गये ॥ ३१ ॥
कुबेरने भी सपरिवार भक्तिपूर्वक नाना प्रकारके उपहारोंसे वहाँ आये हुए भगवान् शम्भुकी सादर पूजा की ॥३२ ॥
तत्पश्चात् उसने शिवको सन्तुष्ट करनेके लिये उनका अनुगमन करनेवाले विष्णु आदि देवताओं और अन्यान्य गणेश्वरोंका भी विधिवत् पूजन किया ॥ ३३ ॥
[ इसके बाद उसकी सेवाको देखकर ] अति प्रसन्नचित्त भगवान् शम्भु कुबेरका आलिंगनकर और उसका सिर सूँघकर अलकापुरीके अति निकट ही अपने समस्त अनुगामियोंके साथ ठहर गये ॥ ३४ ॥
तदनन्तर भगवान् शिवने विश्वकर्माको अपने तथा दूसरे देवताओंके भक्तोंके लिये उस पर्वतपर निवासहेतु यथोचित निर्माणकार्य करनेकी आज्ञा दी ॥ ३५ ॥
हे मुने! विश्वकर्माने शिवकी आज्ञासे वहाँ जाकर यथाशीघ्र ही नाना प्रकारकी रचना की ॥ ३६ ॥
उस समय विष्णुकी प्रार्थनासे शिव प्रसन्न हो उठे और कुबेरपर अनुग्रह करके वे कैलासपर्वतपर चले गये । शुभ मुहूर्तमें अपने निवासस्थानमें प्रवेशकर भक्तवत्सल उन परमेश्वरने अपने प्रेमसे सबको सनाथ कर दिया । सभी प्रमुदित विष्णु आदि देवता, मुनिगण और अन्य सिद्धजनोंने मिलकर प्रेमपूर्वक सदाशिवका अभिषेक किया ॥ ३७–३९ ॥ हाथोंमें नाना प्रकारके उपहार लेकर सबने क्रमशः उनका पूजन किया और बहुत महोत्सवके साथ [ सामने खड़े होकर ] उनकी आरती उतारी ॥ ४० ॥
हे मुने! उस समय [ आकाशसे ] मंगलसूचक पुष्पवृष्टि होने लगी और अत्यन्त प्रसन्न होकर गान करती हुई अप्सराएँ नाचने लगीं ॥४१ ॥
सब ओर जय - जयकार और नमस्कारके सुसंस्कृत शब्द गूँजने लगे । उस समय चारों ओर एक महान् उत्साह व्याप्त था, जो सबके सुखको बढ़ा रहा था ॥ ४२ ॥
उस समय सिंहासनपर बैठकर भगवान् सदाशिव अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे और विष्णु आदि सभी लोग बार - बार उनकी यथोचित सेवा कर रहे थे ॥ ४३ ॥
पृष्ठ 315
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) ३०३
अथ सर्वे सुराद्याश्च तुष्टुवुस्तं पृथक्पृथक् ।
अर्थ्याभिर्वाग्भिरिष्टाभिः शंकरं लोकशंकरम् ॥
प्रसन्नात्मा स्तुतिं श्रुत्वा तेषां कामान्ददौ शिवः ।
मनोभिलषितान्प्रीत्या वरान्सर्वेश्वरः प्रभुः ॥
शिवाज्ञयाथ ते सर्वे स्वं स्वं धाम ययुर्मुने ।
प्राप्तकामाः प्रमुदिता अहं च विष्णुना सह ॥
उपवेश्यासने विष्णुं मां च शम्भुरुवाच ह ।
बहु सम्बोध्य सुप्रीत्यानुगृह्य परमेश्वरः ॥
शिव उवाच
हे हरे हे विधे तातौ युवां प्रियतरौ मम ।
सुरोत्तमौ त्रिजगतोऽवनसर्गकरौ सदा ॥
गच्छतं निर्भयं नित्यं स्वस्थानं च मदाज्ञया ।
सुखप्रदाताहं वै वां विशेषात्प्रेक्षकः सदा ॥
इत्याकर्ण्य वचः शम्भोः सुप्रणम्य तदाज्ञया । अहं हरिश्च स्वं धामागमाव प्रीतमानसौ तदानीमेव सुप्रीतः शंकरो निधिपं मुदा उपवेश्य गृहीत्वा तं कर आह शुभं वचः तव प्रेम्णा वशीभूतो मित्रतामगमं सखे स्वस्थानं गच्छ विभयः सहायोऽहं सदानघ इत्याकर्ण्य वचः शम्भोः कुबेरः प्रीतमानसः तदाज्ञया स्वकं धाम जगाम प्रमुदान्वितः सभी देवताओंने पृथक् - पृथक् रूपमें अर्थभरी ४४ वाणी और अभीष्ट वस्तुओंसे लोकमंगलकारी भगवान् शंकरका स्तवन - वन्दन किया ॥ ४४ ॥
प्रसन्नचित्त सर्वेश्वर स्वामी सदाशिवने उनकी ४५ स्तुतिको सुनकर प्रेमपूर्वक उन्हें मनोवांछित वर दिये ॥ ४५ ॥
[ हे मुने! ] अभीष्ट कामनाओंसे परिपूर्ण, ४६ प्रसन्नचित्त वे सभी [ देव, मुनि और सिद्धजन ] भगवान् शिवकी आज्ञासे अपने - अपने धामको चले गये । मैं भी विष्णुके साथ प्रसन्नतापूर्वक चलनेके लिये उद्यत हुआ ॥४६ ॥
तब श्रीविष्णु और मुझको आसनपर बैठाकर ४७ परमेश्वर शम्भु बड़े प्रेमसे बहुत समझाकर अनुग्रह करके कहने लगे -॥४७ ॥
शिवजी बोले- हे हरे! हे विधे! हे तात! सदैव तीनों लोकोंका सृजन और संरक्षण करनेवाले हे ४८ सुरश्रेष्ठ! आप दोनों मुझे अत्यन्त प्रिय हैं ॥४८ ॥
अब आप दोनों भी निर्भय होकर मेरी आज्ञासे ४ ९ । अपने - अपने स्थानको जायँ । मैं सदा आप दोनोंको सुख प्रदान करनेवाला हूँ और विशेष रूपसे आप दोनोंके सुख - दुःखको देखता ही रहता हूँ ॥ ४ ९ ॥ भगवान् सदाशिवके वचनको सुनकर मैं और ॥ ५० विष्णु दोनों प्रेमपूर्वक प्रणाम करके प्रसन्नचित्त होकर उनकी आज्ञासे अपने - अपने धामको लौट आये ॥ ५० ॥
। उसी समय प्रसन्नचित्त भगवान् शंकर निधिपति ॥ ५१ कुबेरका भी हाथ पकड़कर उन्हें अपने पास बैठाकर यह शुभ वाक्य कहने लगे —॥५१ ॥
। हे मित्र! तुम्हारे प्रेमके वशीभूत होकर मैं ॥ ५२ तुम्हारा मित्र बन गया हूँ । हे पुण्यात्मन्! भयरहित होकर तुम अपने स्थानको जाओ; मैं सदा तुम्हारा सहायक हूँ ॥५२ ॥
। भगवान् शम्भुके इस वचनको सुनकर प्रसन्नचित्त ॥ ५३ कुबेर उनकी आज्ञासे प्रसन्नतापूर्वक अपने धामको चले गये ॥५३ ॥
योगपरायण, सब प्रकारसे स्वच्छन्द तथा सदा स उवास गिरौ कैलासे पर्वतोत्तमे । ध्यानमग्न रहनेवाले भगवान् शिव अपने गणोंके साथ शम्भुः
स्वच्छन्दो ध्यानतत्परः ॥ ५४ । उस पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर निवास करने लगे ॥५४ ॥
सगणो योगनिरतः
पृष्ठ 316
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०४ क्वचिद्दध्यौ स्वमात्मानं क्वचिद्योगरतोऽभवत् इतिहासं गणान्प्रीत्यावादीत्स्वच्छन्दमानसः
क्वचित्कैलासकुधरसुस्थानेषु महेश्वरः ।
विजहार गणैः प्रीत्या विविधेषु विहारवित् ॥
इत्थं रुद्रस्वरूपोऽसौ शंकरः परमेश्वरः ।
अकार्षीत्स्वगिरौ लीला नाना योगिवरोऽपि यः ॥
नीत्वा कालं कियन्तं सोऽपत्नीकः परमेश्वरः ।
पश्चादवाप स्वां पत्नीं दक्षपत्नीसमुद्भवाम् ॥
विजहार तया सत्या दक्षपुत्र्या महेश्वरः ।
सुखी बभूव देवर्षे लोकाचारपरायणः ॥
इत्थं रुद्रावतारस्ते वर्णितोऽयं मुनीश्वर ।
कैलासागमनं चास्य सखित्वं निधिपस्य हि ॥
तदन्तर्गतलीलापि वर्णिता ज्ञानवर्धिनी ।
इहामुत्र च या नित्यं सर्वकामफलप्रदा ॥
इमां कथां पठेद्यस्तु शृणुयाद्वा समाहितः ।
इह भुक्तिं समासाद्य लभेन्मुक्तिं परत्र सः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । कभी वे अपने ही आत्मस्वरूप ब्रह्मका चिन्तन ॥ ५५ करते थे । कभी योगमें तल्लीन रहते थे, कभी | स्वच्छन्द मनसे प्रेमपूर्वक अपने गणोंको इतिहास सुनाते थे और कभी विहार करनेमें चतुर भगवान् ५६ महेश्वर अपने गणोंके साथ कैलास पर्वतकी टेढ़ी मेढ़ी, ऊबड़ - खाबड़ गुफाओं तथा कन्दराओंमें और अनेक सुरम्य स्थानोंपर प्रसन्नचित्त होकर विचरण करते थे॥५५-५६ ॥ इस प्रकार रुद्र - स्वरूप परमेश्वर भगवान् शंकर ५७ जो नाना प्रकारके योगियोंमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं, उन्होंने अपने उस पर्वतपर अनेक लीलाएँ कीं ॥ ५७ ॥
इस प्रकार बिना पत्नीके रहते हुए परमेश्वर ५८ सदाशिवने अपना कुछ समय व्यतीत करके बादमें दक्षपत्नीसे उत्पन्न सतीको पत्नीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ५८ ॥
तदनन्तर हे देवर्षे! वे महेश्वर उन दक्षपुत्री ५ ९ सतीके साथ विहार करने लगे । इस प्रकार [ सतीके साथ पतिरूपमें ] लोकाचारपरायण रहते हुए वे बहुत ही सुखी थे ॥५ ९ ॥ हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने आपको रुद्रके ६० अवतारका वर्णन कर दिया है । मैंने उनके कैलास-आगमन और कुबेरके साथ उनकी मित्रताका प्रसंग भी कह दिया है । कैलासके अन्तर्गत होनेवाली ६१ उनकी ज्ञानवर्धिनी लीलाका भी वर्णन कर दिया है, जो इस लोक और परलोकमें सदैव सभी मनोवांछित फलोंको प्रदान करनेवाली है ॥ ६०-६१ ॥ जो एकाग्रचित्त होकर इस कथाको सम्यक् रूपसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह इस लोकमें सुख ६२ । भोगकर परलोकमें मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ६२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने कैलासोपाख्याने शिवस्य कैलासगमनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानके कैलासोपाख्यानमें शिवकैलासगमन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां प्रथमः सृष्टिखण्डः समाप्तः ॥
पृष्ठ 317
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीयः सतीखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः सतीचरित्रवर्णन, दक्षयज्ञविध्वंसका संक्षिप्त वृत्तान्त तथा सतीका पार्वतीरूपमें हिमालयके यहाँ जन्म लेना नारद उवाच
विधे सर्वं विजानासि कृपया शङ्करस्य च ।
त्वयाद्भुता हि कथिताः कथा मे शिवयोः शुभाः ॥
त्वन्मुखाम्भोजसंवृत्तां श्रुत्वा शिवकथां पराम् ।
अतृप्तो हि पुनस्तां वै श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
पूर्णांशः शङ्करस्यैव यो रुद्रो वर्णितः पुरा ।
विधे त्वया महेशान: कैलासनिलयो वशी ॥
स योगी सर्वविष्ण्वादिसुरसेव्यः सतां गतिः ।
निर्द्वन्द्वः क्रीडति सदा निर्विकारो महाप्रभुः ॥
सोऽभूत्पुनर्गृहस्थश्च विवाह्य परमां स्त्रियम् ।
हरिप्रार्थनया प्रीत्या मङ्गलां सुतपस्विनीम् ॥
प्रथमं दक्षपुत्री सा पश्चात्सा पर्वतात्मजा ।
कथमेकशरीरेण द्वयोरप्यात्मजा मता ॥
कथं सती पार्वती सा पुनः शिवमुपागता ।
एतत्सर्वं तथान्यच्च ब्रह्मन् गदितुमर्हसि ॥
सूत उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरर्षेः शंकरात्मनः प्रसन्नमानसो भूत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ नारदजी बोले — हे विधे! भगवान् शंकरकी कृपासे आप सब कुछ जानते हैं । आपने शिव और १ पार्वतीकी बहुत ही अद्भुत तथा मंगलकारी कथाएँ कही हैं ॥१ ॥
आपके मुखारविन्दसे निकली हुई शम्भुकी श्रेष्ठ २ | कथाको सुनकर मैं अतृप्त ही हूँ, हे प्रभो! मैं उसे पुनः सुनना चाहता हूँ ॥२ ॥
हे विधे! पहले आपने शंकरके पूर्णांश ३ महेशान, कैलासवासी तथा जितेन्द्रिय जिन रुद्रका वर्णन किया, वे योगी जितेन्द्रिय विष्णु आदि सभी देवताओंसे सेवाके योग्य, संतोंकी परम गति, ४ निर्विकार महाप्रभु निर्द्वन्द्व होकर सदैव रहते थे॥३-४ ॥ विष्णुकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर ५ परमतपस्विनी तथा श्रेष्ठ स्त्रीसे विवाह बन गये ॥५ ॥
सर्वप्रथम वे [ शिवा ] दक्षपुत्री हुईं ६ पर्वतराज हिमालयकी कन्या पार्वतीके क्रीड़ा करते वे मंगलमयी करके गृहस्थ और तत्पश्चात् रूपमें उन्होंने जन्म लिया । एक ही शरीरसे वे दोनोंकी कन्या किस प्रकारसे मानी गयीं? ॥ ६ ॥
वे सती पुन: पार्वती होकर शिवको कैसे प्राप्त ७ हुईं? हे ब्रह्मन्! यह सब तथा अन्य बातोंको भी आप कृपा करके बतायें ॥ ७ ॥
सूतजी बोले- शिवभक्त देवर्षि नारदके इस । वचनको सुनकर मनसे [ अत्यन्त ] प्रसन्न होकर ८ ब्रह्माजी कहने लगे -॥८ ॥
पृष्ठ 318
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०६ ब्रह्मोवाच शृणु तात मुनिश्रेष्ठ कथयामि कथां शुभाम् यां श्रुत्वा सफलं जन्म भविष्यति न संशयः पुराहं स्वसुतां दृष्ट्वा सन्ध्याह्वां तनयैः सह । अभवं विकृतस्तात कामबाणप्रपीडितः
धर्मः स्मृतस्तदा रुद्रो महायोगी परः प्रभुः ।
धिक्कृत्य मां सुतैस्तात स्वस्थानं गतवानयम् ॥
यन्मायामोहितश्चाहं वेदवक्ता च मूढधीः ।
तेनाकार्षं सहाकार्यं परमेशेन शंभुना ॥
तदीर्षयाहमाकार्षं बहूपायान्सुतैः सह ।
कर्तुं तन्मोहनं मूढः शिवमायाविमोहितः ॥
अभवंस्तेऽथ वै सर्वे तस्मिन् शंभौ परप्रभौ ।
उपाया निष्फलास्तेषां मम चापि मुनीश्वर ॥
तदास्मरं रमेशानं व्यर्थोपायः सुतैः सह ।
अबोधयत्स आगत्य शिवभक्तिरतः सुधीः ॥
प्रबोधितो रमेशेन शिवतत्त्वप्रदर्शिना ।
तदीर्षामत्यजं सोऽहं तं हठं न विमोहितः ॥
शक्तिं संसेव्य तत्प्रीत्योत्पादयामास तां तदा ।
दक्षादसिक्न्यां वीरिण्यां स्वपुत्राद्धरमोहने ॥
सोमा भूत्वा दक्षसुता तपः कृत्वा तु दुःसहम् ।
रुद्रपल्यभवद्भक्त्या स्वभक्तहितकारिणी ॥
सोमो रुद्रो गृही भूत्वाकार्षील्लीलां परां प्रभुः ।
मोहयित्वाथ मां तत्र स्वविवाहेऽविकारधीः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ब्रह्माजी बोले — हे तात! हे मुनिश्रेष्ठ! सुनिये, । अब मैं शिवकी मंगलकारिणी कथा कह रहा हूँ, ॥ ९ जिसको सुनकर जन्म सफल हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥९॥
हे तात! पुराने समयकी बात है — अपनी सन्ध्या ॥ १० नामक पुत्रीको देखकर पुत्रोंसहित मैं कामदेवके बाणोंसे पीड़ित होकर विकारग्रस्त हो गया ॥ १० ॥
हे तात! उस समय धर्मके द्वारा स्मरण किये गये ११ महायोगी और महाप्रभु रुद्र पुत्रोंसहित मुझे धिक्कारकर अपने घर चले गये ॥११ ॥
जिनकी मायासे मोहित हुआ मैं वेदवक्ता होनेपर १२ भी मूढ़ बुद्धिवाला हो गया, उन्हीं परमेश्वर शंकरके साथ मैं अकरणीय कार्य करने लगा ॥ १२ ॥
शिवकी मायासे मोहित हुआ मैं मूढ़ अपने १३ पुत्रोंके सहित ईर्ष्यावश उन्हींको मोहित करनेके लिये अनेक उपाय करने लगा ॥१३ ॥
हे मुनीश्वर! उन परमेश्वर शिवके ऊपर किये १४ गये मेरे तथा मेरे उन पुत्रोंके सभी उपाय निष्फल हो गये ॥१४ ॥
तब अपने पुत्रोंसहित उपायोंको करनेमें विफल १५ हुए मैंने लक्ष्मीपति विष्णुका स्मरण किया । शिवभक्तिपरायण तथा श्रेष्ठ बुद्धिवाले भगवान् विष्णुने आकर मुझे समझाया ॥ १५ ॥
शिवतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले भगवान् १६ रमापतिके द्वारा समझाये जानेपर भी विमोहित मैं अपनी ईर्ष्या और हठको नहीं छोड़ सका ॥ १६ ॥
तब मैंने शक्तिकी सेवाकर उन्हें प्रसन्न किया । १७ उनकी ही कृपासे शिवको मोहित करनेके लिये अपने पुत्र दक्षसे वीरणकी कन्या असिक्नीके गर्भसे कन्याको उत्पन्न कराया ॥१७ ॥
अपने भक्तोंका हित करनेवाली वही उमा १८ दक्षपुत्री नामसे प्रसिद्ध होकर दुःसह तप करके अपनी दृढ़भक्तिसे रुद्रकी पत्नी हो गयीं ॥१८ ॥
विकाररहित बुद्धिवाले वे प्रभु रुद्र अपने विवाहकालमें मुझे मोहितकर उमाके साथ गृहस्थ १ ९ होकर उत्तम लीला करने लगे ॥१ ९ ॥
पृष्ठ 319
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३०७
विवाह्य तां स आगत्य स्वगिरौ सूतिकृत्तया ।
रेमे बहुविमोहो हि स्वतंत्रः स्वात्तविग्रहः ॥
तया विहरतस्तस्य व्यतीयाय महान् मुने ।
कालः सुखकरः शंभोर्निर्विकारस्य सद्रतेः ॥
ततो रुद्रस्य दक्षेण स्पर्धा जाता निजेच्छया ।
महामूढस्य तन्मायामोहितस्य सुगर्विणः ॥
तत्प्रभावाद्धरं दक्षो महागर्वी विमूढधीः ।
महाशांतं निर्विकारं निनिन्द बहुमोहितः ॥
ततो दक्षः स्वयं यज्ञं कृतवान्गर्वितोऽहरम् ।
सर्वानाहूय देवादीन् विष्णुं मां चाखिलाधिपः ॥
नाजुहाव तथाभूतो रुद्रं रोषसमाकुलः ।
तथा तत्र सतीं नाम्नीं स्वपुत्रीं विधिमोहितः ॥
यदा नाकारिता पित्रा मायामोहितचेतसा ।
लीलां चकार सुज्ञाना महासाध्वी शिवा तदा ॥
अथागता सती तत्र शिवाज्ञामधिगम्य सा ।
अनाहूतापि दक्षेण गर्विणा स्वपितुर्गृहम् ॥
विलोक्य रुद्रभागं नो प्राप्यावज्ञां च ताततः ।
विनिन्द्य तत्र तान्सर्वान्देहत्यागमथाकरोत् ॥
तच्छ्रुत्वा देवदेवेशः क्रोधं कृत्वा तु दुःसहम् ।
जटामुत्कृत्य महतीं वीरभद्रमजीजनत् ॥
सगणं तं समुत्पाद्य किं कुर्यामिति वादिनम् । सर्वापमानपूर्वं हि यज्ञध्वंसं दिदेश ह उमाके साथ विवाहकर सन्तान उत्पन्न करनेकी २० इच्छासे अपने कैलास पर्वतपर आकर स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले तथा सदा स्वतन्त्र रहनेवाले सदाशिव अत्यन्त विमोहित होकर उनके साथ रमण करने लगे ॥२० ॥
हेमुने! उनके साथ विहार करते हुए निर्विकार २१ शिवका वह सुखकारी बहुत - सा समय बीत गया । तदनन्तर किसी निजी इच्छाके कारण रुद्रकी दक्षसे स्पर्धा हो गयी । उस समय शिवकी मायासे दक्ष मोहसे ग्रस्त, २२ महामूढ़ और अहंकारसे युक्त हो गया ॥ २१-२२ ॥ उनके ही प्रभावसे महान् अहंकारी, मूढबुद्धि २३ और अत्यन्त विमोहित हुआ वह दक्ष उन्हीं महाशान्त तथा निर्विकार भगवान् हरकी निन्दा करने लगा ॥ २३ ॥
तदनन्तर गर्वमें भरे हुए सर्वाधिप दक्षने मुझे, २४ विष्णुको तथा सभी देवताओंको बुलाकर, किंतु शिवजीको बिना बुलाये ही स्वयं यज्ञ कर डाला ॥ २४ ॥
[ किसी कारणवश ] रुद्रपर असन्तुष्ट, क्रोधसे २५ भरे हुए उस दक्ष प्रजापतिने उन्हें उस यज्ञमें नहीं बुलाया और दुर्भाग्यवश न तो उसने अपनी पुत्रीको ही उस यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आहूत किया ॥ २५ ॥
जब मायासे मोहित चित्तवाले दक्ष प्रजापतिने शिवाको [ यज्ञमें ] आमन्त्रित नहीं किया, तो ज्ञानस्वरूपा २६ उन महासाध्वीने अपनी लीला प्रारम्भ की । वे शिवजीकी आज्ञा प्राप्तकर गर्वयुक्त दक्षके द्वारा २७ आमन्त्रित न होनेपर भी अपने पिता दक्षके घर पहुँच गयीं ॥ २६-२७ ॥ उन देवीने यज्ञमें रुद्रके भागको न देखकर और अपने पितासे अपमानित होकर वहाँ [ उपस्थित ] २८ सभीकी निन्दा करके [ योगाग्निसे ] अपने शरीरको त्याग दिया ॥ २८ ॥
यह सुनकर देवदेवेश्वर रुद्रने दुःसह क्रोध करके २ ९ अपनी महान् जटा उखाड़कर वीरभद्रको उत्पन्न किया ॥२ ९ ॥ गणोंसहित उसे उत्पन्न करके ' मैं क्या करूँ'-ऐसा कहते हुए उस वीरभद्रको शिवजीने आज्ञा दी कि [ हे वीरभद्र! दक्षके यज्ञमें आये हुए ] सभीका ॥ ३० अपमान करते हुए तुम यज्ञका विध्वंस करो ॥३० ॥
पृष्ठ 320
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०८ गणाधीशस्तदाज्ञां स प्राप्य बहुबलान्वितः गतोऽरं तत्र सहसा महाबलपराक्रमः महोपद्रवमाचेरुर्गणास्तत्र तदाज्ञया सर्वान्स दण्डयामास न कश्चिदवशेषितः विष्णुं संजित्य यत्नेन सामरं गणसत्तमः चक्रे दक्षशिरश्छेदं तच्छिरोऽग्नौ जुहाव च यज्ञध्वंसं चकाराशु महोपद्रवमाचरन् ततो जगाम स्वगिरिं प्रणनाम प्रभुं शिवम् यज्ञध्वंसोऽभवच्चेत्थं देवलोके हि पश्यति रुद्रस्यानुचरैस्तत्र वीरभद्रादिभिः कृतः मुने नीतिरियं ज्ञेया श्रुतिस्मृतिषु सम्मता रुद्रे रुष्टे कथं लोके सुखं भवति सुप्रभौ ततो रुद्रः प्रसन्नोऽभूत्स्तुतिमाकर्ण्य तां पराम् विज्ञप्तिं सफलां चक्रे सर्वेषां दीनवत्सलः
पूर्ववच्च कृतं तेन कृपालुत्वं महात्मना ।
शंकरेण महेशेन नानालीलाविहारिणा ॥
जीवितस्तेन दक्षो हि तत्र सर्वे हि सत्कृताः ।
पुनः स कारितो यज्ञः शंकरेण कृपालुना ॥
रुद्रश्च पूजितस्तत्र सर्वैर्देवैर्विशेषतः ।
यज्ञे विष्ण्वादिभिर्भक्त्या सुप्रसन्नात्मभिर्मुने ॥
सतीदेहसमुत्पन्ना ज्वाला लोकसुखावहा ।
पतिता पर्वते तत्र पूजिता सुखदायिनी ॥
ज्वालामुखीति विख्याता सर्वकामफलप्रदा ।
बभूव परमा देवी दर्शनात्पापहारिणी ॥
इदानीं पूज्यते लोके सर्वकामफलाप्तये ।
संविधाभिरनेकाभिर्महोत्सवपुरःसरम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ । शिवजीकी इस आज्ञाको पाकर महाबलवान् तथा ॥ ३१ पराक्रमी वह गणेश्वर वीरभद्र अपनी बहुत - सी सेना । लेकर [ यज्ञविध्वंसके लिये ] वहाँ शीघ्र ही पहुँचा ॥ ३१ ॥
। उसकी आज्ञासे उन गणोंने वहाँ महान् उपद्रव ॥ ३२ प्रारम्भ किया । उस वीरभद्रने सबको दण्डित किया. [ दण्ड पानेसे ] कोई भी न बचा ॥ ३२ ॥
। वीरभद्रने देवताओंके साथ विष्णुको भी जीतकर ॥ ३३ दक्षका सिर काट लिया और उस सिरको अग्निमें हवन कर दिया । इस प्रकार महान् उपद्रव करते हुए उसने । यज्ञको विनष्ट कर दिया । तत्पश्चात् वह कैलासपर ॥ ३४ गया और उसने शिवको प्रणाम किया॥३३-३४ ॥ । इस प्रकार यज्ञका विध्वंस हो गया, देवताओंके ॥३५ देखते - देखते रुद्रके अनुचर वीरभद्र आदिने यज्ञको विनष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥
। हेमुने! श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे प्रतिपादित यह ॥ ३६ नीति जान लेनी चाहिये कि श्रेष्ठ प्रभु रुद्रके रुष्ट हो जानेपर लोकमें सुख कैसे हो सकता है! ॥ ३६ ॥
। [ उसके बाद सभी देवताओंने यज्ञकी पूर्णताके ॥ ३७ लिये भगवान् रुद्रकी स्तुति की ] उस उत्तम स्तुतिको सुनकर रुद्र प्रसन्न हो गये । उन दीनवत्सल [ भगवान् रुद्र ] -ने सबकी प्रार्थनाको सफल बना दिया ॥ ३७ ॥
अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले महात्मा ३८ शंकर महेशने पूर्ववत् कृपालुता की । उन्होंने दक्षप्रजापतिको जीवित कर दिया और सभी लोगोंका सत्कार किया, तदुपरान्त कृपालु शंकरने [ दक्षसे ] ३ ९ पुनः यज्ञ करवाया ॥ ३८-३९ ॥ हे मुने! उस यज्ञमें विष्णु आदि सभी देवताओंने ४० बड़े प्रसन्नमनसे भक्तिके साथ रुद्रका विशेष रूपसे पूजन किया ॥४० ॥
सतीके शरीरसे उत्पन्न तथा सभी लोगोंको सुख ४१ देनेवाली वह ज्वाला पर्वतपर गिरी, वह लोगोंके द्वारा पूजित होनेपर सुख प्रदान करती है ॥४१ ॥
ज्वालामुखीके नामसे प्रसिद्ध वे परमा देवी ४२ कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा दर्शनसे समस्त । पापोंको विनष्ट करनेवाली हैं । सम्पूर्ण कामनाओंके फलकी प्राप्तिहेतु लोग इस समय अनेकों विधि - विधानोंसे ४३ । महोत्सवपूर्वक उनकी पूजा करते हैं ॥ ४२-४३ ॥