श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 301–310
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २८ ९
साम्प्रतं नेक्ष्यते सोऽपि भृंगारो मणिमंडित: ।
पट्टसूत्रमयी सापि त्रिपटी या मयार्पिता ॥ ५५
क्व दाक्षिणात्यं तत्कांस्यं गौडी ताम्रघटी क्व सा ।
नागदंतमयी सा क्व सुखकौतुकमंचिका ॥ ५६
क्व सा पर्वतदेशीया चन्द्रकांतिरिवाद्भुता ।
दीपकव्यग्रहस्ताग्रालंकृता शालभञ्जिका ॥ ५७
किं बहूक्तेन कुलजे तुभ्यं कुप्याम्यहं वृथा ।
तदाभ्यवहरिष्येऽहमुपयंस्याम्यहं यदा ॥ ५८
अनपत्योऽस्मि तेनाहं दुष्टेन कुलदूषिणा ।
उत्तिष्ठानय पाथस्त्वं तस्मै दद्यां तिलांजलिम् ॥ ५ ९
अपुत्रत्वं वरं नृणां कुपुत्रात्कुलपांसनात् । मणिजटित वह सोनेकी झारी भी इस समय नहीं दिखायी दे रही है और न तो वह रेशमी- त्रिपटी ( दुपट्टा ) ही दिखायी दे रही है, जिसको रखनेके लिये तुम्हें मैंने दिया था ॥ ५५ ॥
दक्षिण देशमें बननेवाला वह कांसेका पात्र और गौड़ देशमें बननेवाली वह ताँबेकी घटी कहाँ है? हाथी-दाँतसे बनी हुई वह सुख देनेवाली मचियाँ कहाँ है ॥ ५६ ॥
पर्वतीय - क्षेत्रोंमें पायी जानेवाली, चन्द्रकान्त मणिके समान अद्भुत, हाथमें दीपक लिये वह श्रृंगारयुक्त शालभंजिका कहाँ है ॥ ५७ ॥
अधिक कहनेसे लाभ ही क्या? हे कुलजे! मैं तुझपर व्यर्थ ही क्रोध कर रहा हूँ । अब तो मेरा भोजन तभी होगा, जब मैं दूसरा विवाह कर लूँगा ॥ ५८ ॥
कुलको दूषित करनेवाले उस दुष्टके रहते हुए भी अब मैं निःसन्तान हूँ । उठो और जल लाओ । मैं उसे तिलांजलि देता हूँ ॥ ५ ९ ॥ कुलको कलंकित करनेवाले कुपुत्रकी अपेक्षा त्यजेदेकं कुलस्यार्थे नीतिरेषा सनातनी ॥ ६० मनुष्यका पुत्रहीन होना श्रेयस्कर है । कुलकी भलाईके लिये एकका परित्याग कर देना चाहिये - यह सनातन नियम है ॥ ६० ॥
तदनन्तर उस दीक्षित ब्राह्मणने स्नान करके, अपनी नित्य - क्रिया सम्पन्न करके उसी दिन किसी स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तस्मिन्नेवाह्नि कस्यचित् । श्रोत्रिय ब्राह्मणकी कन्याको प्राप्त करके उसके साथ
श्रोत्रियस्य सुतां प्राप्य पाणिं जग्राह दीक्षितः ॥ ६१ । विवाह कर लिया ॥ ६१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने गुणनिधिचरित्रवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानमें गुणनिधिचरित्रवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः शिवमन्दिरमें दीपदानके प्रभावसे पापमुक्त होकर गुणनिधिका दूसरे जन्ममें कलिंगदेशका राजा बनना और फिर शिवभक्तिके कारण कुबेर पदकी प्राप्ति ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा तथा स वृत्तान्तं प्राक्तनं स्वं विनिंद्य च ।
कांचिद्दिशं समालोक्य निर्ययौ दीक्षितांगजः ॥
कियच्चिरं ततो गत्वा यज्ञदत्तात्मजः स हि ।
दुष्टो गुणनिधिस्तस्थौ गतोत्साहो विसर्जितः ॥
ब्रह्माजी बोले- उन वृत्तान्तोंको सुनकर वह दीक्षितपुत्र अपने भाग्यकी निन्दा करके किसी १ दिशाको देखकर अपने घरसे चल पड़ा । कुछ कालतक चलनेके पश्चात् वह यज्ञदत्तपुत्र दुष्ट गुणनिधि थक जानेके कारण उत्साहहीन होकर २ वहीं रुक गया॥१-२ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_11_1_Front
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२ ९ ० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ चिंतामवाप महतीं क्व यामि करवाणि किम् । वह बहुत बड़ी चिन्तामें पड़ गया कि अब मैं नाहमभ्यस्तविद्योऽस्मि न चैवातिधनोऽस्म्यहम् ॥ ३ कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? मैंने विद्याका अभ्यास भी नहीं किया और न तो मेरे पास अत्यधिक धन ही है ॥३ ॥
देशांतरे यस्य धनं स सद्यः सुखमेधते । दूसरे देशमें तत्काल सुख तो उसीको प्राप्त होता है, भयमस्ति धने चौरात्स विघ्नः सर्वतो भवः ॥ ४ जिसके पास धन रहता है । यद्यपि धन रहनेपर चोरसे भय
याजकस्य कुले जन्म कथं मे व्यसनं महत् ।
अहो बलीयान्हि विधिर्भावि कर्मानुसंधयेत् ॥ ५
भिक्षितुं नाधिगच्छामि न मे परिचितः क्वचित् ।
न च पार्श्वे धनं किञ्चित्किमत्र शरणं भवेत् ॥ ६
सदानभ्युदिते भानौ प्रसूर्ये मिष्टभोजनम् ।
दद्यादद्यात्र कं याचे न चेह जननी मम ॥ ७
ब्रह्मोवाच
इति चिंतयतस्तस्य बहुशस्तत्र नारद ।
अतिदीनं तरोर्मूले भानुरस्ताचलं गतः ॥ ८
एतस्मिन्नेव समये कश्चिन्माहेश्वरो नरः ।
सहोपहारानादाय नगराद् बहिरभ्यगात् ॥ ९
नानाविधान्महादिव्यान्स्वजनैः परिवारितः ।
समभ्यर्चितुमीशानं शिवरात्रावुपोषितः ॥ १०
शिवालयं प्रविश्याथ स भक्तः शिवसक्तधीः ।
यथोचितं सुचित्तेन पूजयामास शंकरम् ॥ ११
पक्वान्नगंधमाघ्राय यज्ञदत्तात्मजो द्विजः ।
पितृत्यक्तो मातृहीनः क्षुधितः स तमन्वगात् ॥ १२
इदमन्नं मया ग्राह्यं शिवायोपकृतं निशि ।
सुप्ते शैवजने दैवात्सर्वस्मिन्विविधं महत् ॥१३
इत्याशामवलम्ब्याथ द्वारि शम्भोरुपाविशत् ।
ददर्श च महापूजां तेन भक्तेन निर्मिताम् ॥ १४
विधाय नृत्यगीतादि भक्ताः सुप्ताः क्षणे यदा ।
नैवेद्यं स तदादातुं भर्गागारं विवेश ह ॥ १५ ।
होता है, किंतु यह विघ्न सर्वत्र उत्पन्न हो सकता है ॥ ४ ॥
अरे! याजकके कुलमें जन्म होनेपर भी मुझमें इतना बड़ा दुर्व्यसन कैसे आ गया! यह आश्चर्य है, किंतु भाग्य बड़ा बलवान् है, वही मनुष्यके भावी कर्मका अनुसन्धान करता है ॥५ ॥
मैं भिक्षा माँगनेके लिये नहीं जाता हूँ । मेरा यहाँ कोई परिचित भी नहीं है और न मेरे पास कुछ धन ही है । मेरे लिये कोई शरण तो होनी ही चाहिये ॥६ ॥
सदैव सूर्योदय होनेके पूर्व ही मेरी माता मुझे
मधुर भोजन देती थीं । आज मैं यहाँ किससे माँगूँ ।
मेरी माता भी तो यहाँ नहीं हैं ॥ ७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! इस प्रकार बहुत - सी चिन्ता करते हुए वृक्षके नीचे बैठे - बैठे वह अत्यधिक दीन-हीन हो उठा, इतनेमें सूर्य अस्ताचलको चला गया ॥८ ॥
इसी समय कोई शिवभक्त मनुष्य अनेक प्रकारकी परम दिव्य पूजा सामग्रियाँ लेकर शिवरात्रिके दिन उपवासपूर्वक महेश्वरकी पूजा करनेके लिये अपने परिवारजनोंके साथ नगरसे बाहर निकला ॥ ९ -१० ॥ शिवजीमें रत चित्तवाले उस भक्तने शिवालयमें प्रवेश करके सावधान मनसे यथोचित रूपसे शंकरकी पूजा की । [ भगवान् शिवके लिये लगाये गये नैवेद्यके ] पक्वान्नोंकी गन्धको सूँघकर पिताके द्वारा परित्यक्त, मातृहीन तथा भूखसे व्याकुल यज्ञदत्तका पुत्र वह ब्राह्मण गुणनिधि उसके पास पहुँचा ॥ ११-१२ ॥ [ उसने सोचा कि ] ये सभी शिवभक्त जब रात्रिमें सो जायँगे, तब मैं शिवपर चढ़ाये गये इस विविध नैवेद्यको भाग्यवश प्राप्त करूँगा । ऐसी आशा करके वह भगवान् शंकरके द्वारपर बैठ गया और उस भक्तके द्वारा की गयी महापूजाको देखने लगा ॥ १३-१४ ॥ भक्तलोग जिस समय [ भगवान् शिवके सामने ] नृत्य - गीत आदि करके सो गये, उसी समय वह नैवेद्यको लेनेके लिये भगवान् शिवके मन्दिरमें घुस गया ॥ १५ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २ ९ १
दीपं मन्दप्रभं दृष्ट्वा पक्वान्नवीक्षणाय सः ।
निजचैलांचलाद्वर्तिं कृत्वा दीपं प्रकाश्य च ॥
यज्ञदत्तात्मजः सोऽथ शिवनैवेद्यमादरात् ।
जग्राह सहसा प्रीत्या पक्वान्नं बहुशस्ततः ॥
ततः पक्वान्नमादाय त्वरितं गच्छतो बहिः ।
तस्य पादतलाघातात्प्रसुप्तः कोऽप्यबुध्यत ॥
कोऽयं कोऽयं त्वरापन्नो गृह्यतां गृह्यतामसौ ।
इति चुक्रोश स जनो गिरा भयमहोच्चया ॥
यावद्भयात्समागत्य तावत्स पुररक्षकैः ।
पलायमानो निहतः क्षणादंधत्वमागतः ॥
अभक्षयच्च नैवेद्यं यज्ञदत्तात्मजो मुने ।
शिवानुग्रहतो नूनं भाविपुण्यबलान्न सः ॥
मृतो बद्धः समागत्य पाशमुद्गरपाणिभिः ।
निनीषुभिः संयमनीं याम्यैः स विकटैर्भटैः ॥
तावत्पारिषदाः प्राप्ताः किंकिणीजालमालिनः ।
दिव्यं विमानमादाय तं नेतुं शूलपाणयः ॥
शिवगणा ऊचुः मुञ्चतैनं द्विजं याम्या गणाः परमधार्मिकम् दण्डयोग्यो न विप्रोऽसौ दग्धः सर्वाघसंचयः इत्याकर्ण्यवचस्ते हि यमराजगणास्ततः [ वहाँपर जल रहे ] दीपकके प्रकाशको मन्द १६ देखकर पक्वान्नोंको देखनेके लिये अपने उत्तरीय वस्त्रको [ फाड़ करके ] बत्ती बनाकर दीपकको प्रकाशितकर यज्ञदत्तके उस पुत्रने आदरपूर्वक शिवके १७ लिये लगाये गये बहुतसे पक्वान्नोंके नैवेद्यको एकाएक सहर्ष उठा लिया ॥ १६-१७ ॥ इसके बाद उस पक्वान्नको लेकर शीघ्र ही १८ बाहर जाते हुए उसके पैरके आघातसे कोई सोया हुआ व्यक्ति जग उठा ॥ १८ ॥
शीघ्रता करनेवाला यह कौन है?, कौन है? इसे १ ९ पकड़ो - इस प्रकार भययुक्त ऊँची वाणीमें वह व्यक्ति चिल्लाने लगा ॥ १ ९ ॥ भयवश वह ब्राह्मण जब भाग रहा था, उसी २० समय वहाँ पुररक्षकोंने पहुँचकर उसे मारा, जिससे वह अन्धा होकर तत्काल मर गया ॥ २० ॥
हे मुने! यज्ञदत्तके उस पुत्रने निश्चित शिवकी २१ ही कृपासे नैवेद्यको खा लिया था, न कि अपने भावी पुण्यफलके प्रभावसे ॥ २१ ॥
इसके पश्चात् उस मरे हुए ब्राह्मणको यमलोक २२ ले जानेके लिये पाश, मुद्गर हाथमें लिये हुए यमके भयंकर दूत वहाँ आकर उसे बाँधने लगे ॥ २२ ॥
इतनेमें छोटी - छोटी घण्टियोंसे युक्त आभूषण २३ धारण किये हुए और हाथमें त्रिशूलसे युक्त हो शिवके पार्षद दिव्य विमान लेकर उसे ले जानेके लिये आ गये ॥ २३ ॥
शिवगण बोले — हे यमराजके गणो! इस परम । धार्मिक ब्राह्मणको छोड़ दो । यह ब्राह्मण दण्डके योग्य ॥ २४ नहीं है । इसके समस्त पाप भस्म हो चुके हैं ॥ २४ ॥
। इसके अनन्तर शिवपार्षदोंके वचन सुनकर यमराजके गण आश्चर्यचकित हो गये और महादेवजीके महादेवगणानाहुर्बभूवुश्चकिता भृशम् ॥ २५ शंभोर्गणानथालोक्य भीतैस्तैर्यमकिंकरैः अवादि प्रणतैरित्थं दुर्वृत्तोऽयं गणा द्विजः यमगणा ऊचुः कुलाचारं प्रतीय्यैष पित्रोर्वाक्यपराङ्मुखः सत्यशौचपरिभ्रष्टः सन्ध्यास्नानविवर्जितः गणोंसे कहने लगे । शम्भुके गणोंको देखकर डरे हुए । तथा प्रणाम करते हुए यमराजके दूतोंने इस प्रकार कहा ॥ २६ कि हे गणो! यह ब्राह्मण तो दुराचारी था ॥ २५-२६ ॥ यमगण बोले — कुलकी मर्यादाका उल्लंघन करके यह माता - पिताकी आज्ञासे पराङ्मुख, सत्य-। शौचसे परिभ्रष्ट और सन्ध्या तथा स्नानसे रहित ॥ २७ | था ॥ २७ ॥
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२ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १८ आस्तां दूरेऽस्य कर्माणि शिवनिर्माल्यलंघकः । यदि इसके अन्य कर्मोंको छोड़ भी दिया प्रत्यक्षतोऽत्र वीक्षध्वमस्पृश्योऽयं भवादृशाम् ॥ २८ तो भी इसने शिवके निर्माल्य [ चढ़ाये गये नैवेद्य जाय, शिवनिर्माल्यभोक्तारः शिवनिर्माल्यलंघकाः शिवनिर्माल्यदातारः स्पर्शस्तेषां ह्यपुण्यकृत् विषमालोक्य वा पेयं श्रेयो वा स्पर्शनं परम् सेवितव्यं शिवस्वं न प्राणैः कण्ठगतैरपि
यूयं प्रमाणं धर्मेषु यथा न च तथा वयम् ।
अस्ति चेद्धर्मलेशोऽस्य गणास्तं शृणुमो वयम् ॥
इत्थं तद्वाक्यमाकर्ण्य याम्यानां शिवकिंकराः ।
स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं प्रोचुः पारिषदास्तु तान् ॥
शिवकिंकरा ऊचुः
किंकराः शिवधर्मा ये सूक्ष्मास्ते तु भवादृशैः ।
स्थूललक्ष्यैः कथं लक्ष्या लक्ष्या ये सूक्ष्मदृष्टिभिः ॥
अनेनानेनसा कर्म यत्कृतं शृणुतेह तत् ।
यज्ञदत्तात्मजेनाथ सावधानतया गणाः ॥
पतन्ती लिंगशिरसि दीपच्छाया निवारिता ।
स्वचैलाञ्चलतोऽनेन दत्त्वा दीपदशां निशि ॥
अपरोऽपि परो धर्मो जातस्तत्रास्य किंकराः । का लंघन किया है अर्थात् चोरी की है । [ इसके ] -| हेय कर्मको ] आप सब स्वयं देख लें, आप - जैसे इस । लोगोंके लिये यह स्पर्शके योग्य भी नहीं है ॥ २८ । जो शिव - निर्माल्यको खानेवाले, शिवनिर्माल्यकी ॥ ॥ २ ९ चोरी करनेवाले और शिवनिर्माल्यको देनेवाले हैं, उनका स्पर्श अवश्य ही पापकारक होता है ॥२ ९ ॥ । विषको जान - बूझकर पी लेना श्रेयस्कर है और ॥ ३० अछूतका स्पर्श कर लेना भी अति उत्तम है, किंतु कण्ठगत प्राण होनेपर भी शिवनिर्माल्यका सेवन उचित नहीं है ॥ ३० ॥
धर्मके विषयमें आप सब जिस प्रकार प्रमाण हैं, ३१ वैसे हमलोग नहीं हैं । हे शिवगण! सुनिये । यदि इसमें धर्मका लेशमात्र भी हो, तो हम सब उसे स सुनना चाहते हैं ॥३१ ॥
यमके दूतोंकी इस बातको सुनकर शिवके ३२ पार्षद भगवान् शिवके चरणकमलका स्मरण करके कहने लगे— ॥३२ ॥
शिवके सेवक बोले- हे यमकिंकरो! जो सूक्ष्म शिवधर्म हैं, जिन्हें सूक्ष्म दृष्टिवाले ही जान ३३ सकते हैं, उन्हें आपसदृश स्थूल दृष्टिवाले कैसे जान सकते हैं ॥३३ ॥
हे यमदूतो! पापरहित इस यज्ञदत्तपुत्रने यहाँपर ३४ जो पुण्य कर्म किया है, उसे सावधान होकर सुनो —॥३४ ॥
इसने शिवलिंगके शिखरपर पड़ रही दीपककी ३५ छायाको दूर किया और अपने उत्तरीय वस्त्रको फाड़कर उससे दीपककी वर्तिका बनायी और फिर उससे दीपकको पुनः जलाकर उस रात्रिमें शिवके लिये प्रकाश किया ॥ ३५ ॥
हे किंकरो! इसने [ उस कर्मके अतिरिक्त ] शृण्वतः शिवनामानि प्रसंगादपि गृह्यताम् ॥ ३६ अन्य भी पुण्यकर्म किया है । शिवपूजाके प्रसंगमें इसने | शिवके नामोंका श्रवण किया और स्वयं उनके नामोंका भक्तेन विधिना पूजा क्रियमाणा उच्चारण भी किया है । भक्तके द्वारा विधिवत् की जा उपोषितेन निरीक्षिता । रही पूजाको इसने उपवास रखकर बड़े ही मनोयोगसे
भूतायामनेन स्थिरचेतसा ॥ ३७ । देखा है ॥ ३६-३७ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २ ९ ३ शिवलोकमयं ह्यद्य गंतास्माभिः सहैव तु । [ अतः इन पुण्योंके प्रभावसे ] यह आज ही कंचित्कालं महाभोगान्करिष्यति शिवानुगः ॥ ३८ हमलोगोंके साथ शिवलोकको जायगा । वहाँ शिवका
कलिंगराजो भविता ततो निर्धूतकल्मषः ।
एष द्विजवरो नूनं शिवप्रियतरो यतः ॥
अन्यत्किंचिन्न वक्तव्यं यूयं यात यथागतम् ।
यमदूताः स्वलोकं तु सुप्रसन्नेन चेतसा ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां यमदूता मुनीश्वर ।
यथागतं ययुः सर्वे यमलोकं पराङ्मुखाः ॥
सर्वं निवेदयामासुः शमनाय गणा मुने ।
तद्वृत्तमादितः प्रोक्तं शंभुदूतैश्च धर्मतः ॥
धर्मराज उवाच
सर्वे शृणुत मद्वाक्यं सावधानतया गणाः ।
तदेव प्रीत्या कुरुत मच्छासनपुरःसरम् ॥
ये त्रिपुण्ड्रधरा लोके विभूत्या सितया गणाः ।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
उद्धूलनकरा ये हि विभूत्या सितया गणाः ।
ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥
शिववेशतया लोके येन केनापि हेतुना ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ये रुद्राक्षधरा लोके जटाधारिण एव ये ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥ उपजीवनहेतोश्च शिववेशधरा हि ये ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन अनुगामी बनकर यह कुछ समयतक उत्तम भोगोंका उपभोग करेगा ॥३८ ॥
तत्पश्चात् अपने पापरूपी मैलको धोकर यह ३ ९ कलिंग देशका राजा बनेगा; क्योंकि यह श्रेष्ठ ब्राह्मण निश्चित ही शिवका प्रिय हो गया है ॥ ३ ९ ॥ हे यमदूतो! अब इसके विषयमें कुछ ४० कहनेकी आवश्यकता नहीं है । तुमलोग जैसे आये हो, वैसे ही अतिप्रसन्न मनसे अपने लोकको चले जाओ ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! उनके वाक्यको सुनकर पराङ्मुख हुए समस्त यमदूत अपने लोकको ४१ लौट गये । हे मुने! गणोंने यमराजसे [ गुणनिधिके उस ] सम्पूर्ण वृत्तान्तका निवेदन किया और शिवदूतोंने ४२ उनसे जो कहा था, वह समाचार आरम्भसे उन्हें सुना दिया ॥ ४१-४२ ॥ धर्मराज बोले- हे गणो! तुम सब सावधान होकर मेरे इस वाक्यको सुनो । जैसा आदेश दे रहा ४३ हूँ, वैसा ही प्रेमपूर्वक तुमलोग करो ॥४३ ॥
हे गणो! इस संसारमें जो श्वेत भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, उन सभीको छोड़ देना और यहाँपर ४४ कभी मत लाना ॥ ४४ ॥
हे गणो! जो श्वेत भस्मसे शरीरमें उद्भूलन ४५ करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना ॥ ४५ ॥
। इस संसारमें जिस किसी भी कारणसे जो ॥ ४६ शिवका वेष धारण करनेवाले हैं, उन सभी लोगोंको भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना ॥ ४६ ॥
। इस जगत्में जो रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं या ४७ सिरपर जटा धारण करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना ॥४७ ॥
जिन लोगोंने जीविकाके निमित्त ही शिवका वेष । धारण किया है, उन सबको भी छोड़ देना और यहाँ ॥ ४८ । कभी मत लाना ॥ ४८ ॥
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२ ९ ४ दम्भेनापि छलेनापि शिववेशधरा हि ये ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन एवमाज्ञापयामास स यमो निजकिंकरान् मत्वा तथेति ते सर्वे तूष्णीमासञ्छुचिस्मिताः ब्रह्मोवाच पार्षदैर्यमदूतेभ्यो मोचितस्त्विति स द्विजः । शिवलोकं जगामाशु तैर्गणैः शुचिमानसः
तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्संसेव्य च शिवाशिवौ ।
अरिंदमस्य तनयः कलिंगाधिपतेरभूत् ॥
दम इत्यभिधानोऽभूच्छिवसेवापरायणः ।
बालोऽपि शिशुभिः साकं शिवभक्तिं चकार सः ॥
क्रमाद्राज्यमवापाथ पितर्युपरते युवा ।
प्रीत्या प्रवर्तयामास शिवधर्मांश्च सर्वशः ॥
नान्यं धर्मं स जानाति दुर्दमो भूपतिर्दमः ।
शिवालयेषु सर्वेषु दीपदानादृते द्विज ॥
ग्रामाधीशान्समाहूय सर्वान्स विषयस्थितान् ।
इत्थमाज्ञापयामास दीपा देयाः शिवालये ॥
अन्यथा सत्यमेवेदं स मे दण्ड्यो भविष्यति । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ । जिन्होंने दम्भ या छल - प्रपंचके कारण ही ॥ ४ ९ शिवका वेष धारण किया है, उन सबको भी तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना ॥४ ९ ॥ । इस प्रकार उन यमराजने अपने सेवकोंको आज्ञा ॥ ५० दी, [ जिसको सुनकर उन लोगोंने कहा कि जैसी आपकी आज्ञा है ] वैसा ही होगा - ऐसा कहकर वे मन्द - मन्द हँसते हुए चुप हो गये ॥ ५० ॥
ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार शिवपार्षदोंने यमदूतोंसे उस ब्राह्मणको छुड़ाया और वह पवित्र मनसे युक्त ॥ ५१ होकर शीघ्र ही उन शिवगणोंके साथ शिवलोकको चला गया ॥५१ ॥
वहाँपर सभी सुखभोगोंका उपभोग करके तथा ५२ भगवान् सदाशिव एवं पार्वतीकी सेवा करके वह [ दूसरे जन्ममें ] कलिंगदेशके राजा अरिंदमका पुत्र हुआ ॥ ५२ ॥
उस शिवसेवापरायण बालकका नाम दम हुआ । ५३ बालक होते हुए भी वह अन्य शिशुओंके साथ शिवकी भक्ति करने लगा ॥५३ ॥
क्रमशः उसने युवावस्था प्राप्त की और ५४ पिताके परलोकगमनके पश्चात् उसे राज्य भी प्राप्त हुआ । उसने प्रेमपूर्वक अनेक शिवधर्मोंको प्रारम्भ किया ॥ ५४ ॥
हे ब्रह्मन्! दुष्टोंका दमन करनेवाला वह राजा ५५ दम शिवालयोंमें दीपदानके अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं मानता था ॥५५ ॥
उसने सभी ग्राम और जनपद - प्रमुखोंको बुला ५६ करके यह आदेश दिया कि तुमलोगोंको शिवालयोंमें दीप - प्रज्वालनकी व्यवस्था करनी है ॥ ५६ ॥
यदि [ किसीके क्षेत्रमें ] ऐसा नहीं हुआ, तो यह सत्य है कि [ उस क्षेत्रका ] वह प्रधान निश्चित ही मेरे द्वारा दण्ड पायेगा । दीपदानसे | भगवान् शिव सन्तुष्ट होते हैं - ऐसा श्रुतियों में दीपदानाच्छिवस्तुष्टो भवतीति श्रुतीरितम् ॥ ५७ कहा गया है ॥५७ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २ ९ ५
यस्य यस्याभितो ग्रामं यावन्तश्च शिवालयाः ।
तत्र तत्र सदा दीपो द्योतनीयोऽविचारितम् ॥ ५८
ममाज्ञाभंगदोषेण शिरश्छेत्स्याम्यसंशयम् ।
इति तद्भयतो दीपा दीप्ताः प्रतिशिवालयम् ॥ ५ ९
अनेनैव स धर्मेण यावज्जीवं दमो नृपः ।
धर्मद्धिं महतीं प्राप्य कालधर्मवशं गतः ॥ ६०
स दीपवासनायोगाद् बहून्दीपान्प्रदीप्य वै ।
अलकायाः पतिरभूद्रत्नदीपशिखाश्रयः ॥ ६१
एवं फलति कालेन शिवेऽल्पमपि यत्कृतम् ।
इति ज्ञात्वा शिवे कार्यं भजनं सुसुखार्थिभिः ॥ ६२
क्व स दीक्षितदायादः सर्वधर्मारतिः सदा ।
शिवालये दैवयोगाद्यातश्चोरयितुं वसु ।
स्वार्थदीपदशोद्योतलिंगमौलितमोहरः ॥६३
कलिंगविषये राज्यं प्राप्तो धर्मरतिं सदा । जिसके - जिसके गाँवके चारों ओर जितने भी शिवालय हों, वहाँ - वहाँ सदैव बिना कोई विचार किये ही दीपक जलाना चाहिये ॥ ५८ ॥
अपनी आज्ञाके उल्लंघनके दोषपर मैं निश्चित ही अपराधीका सिर काट लूँगा । इस प्रकार उस राजाके भयसे प्रत्येक शिवमन्दिरमें दीपक जलाये जाने लगे ॥५ ९ ॥ इस प्रकार जीवनपर्यन्त इसी धर्माचरणके पालनसे राजा दम धर्मकी महान् समृद्धि प्राप्त करके अन्तमें कालधर्मकी गतिको प्राप्त हुआ ॥ ६० ॥
अपनी इस दीपवासनाके कारण शिवालयोंमें बहुत - से दीपक प्रज्वलित करके वह राजा [ दूसरे जन्ममें ] रत्नमय दीपकोंकी शिखाओंको आश्रय देनेवाली अलकापुरीका राजा कुबेर हुआ ॥ ६१ ॥
इस प्रकार भगवान् शंकरके लिये अल्पमात्र भी किया गया धार्मिक कृत्य समय आनेपर फल प्रदान करता है । यह जानकर उत्तम सुख चाहनेवाले लोगोंको शिवका भजन करना चाहिये ॥ ६२ ॥
कहाँ सभी धर्मोंसे सदा ही दूर रहनेवाला दीक्षितका पुत्र और कहाँ दैवयोगसे धन चुरानेके लिये शिवमन्दिरमें उसका प्रवेश एवं स्वार्थवश दीपककी वर्तिकाको जलाकर शिवलिंगके मस्तकपर छाये हुए अन्धकारको दूर करनेके लिये किया गया उसका पुण्य । [ जिसके प्रभावसे ] उसने शिवालये समुद्दीप्य दीपान्प्राग्वासनोदयात् ॥ ६४ कलिंगदेशका राज्य प्राप्त किया और सदैव धर्ममें अनुरक्त रहने लगा । पूर्वजन्मके संस्कारके उदय होनेके कारण ही शिवालयमें सम्यक् रूपसे मात्र क्वैषा दिक्पालपदवी मुनीश्वर विलोकय । दीपकको जलाकर उसने यह दिक्पाल कुबेरकी महान् मनुष्यधर्मिणानेन सांप्रतं येह भुज्यते ॥ ६५ पदवी प्राप्त कर ली । हे मुनीश्वर! देखिये यह मनुष्यधर्मा इस समय इस लोकमें रहकर इसका भोग कर रहा है ॥ ६३–६५ ॥ इस प्रकार यज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिके चरित्रका वर्णन कर दिया, जो शिवको प्रसन्न करनेवाला है इति प्रोक्तं गुणनिधेर्यज्ञदत्तात्मजस्य हि । और जिसको सुननेवालेकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो
चरितं शिवसंतोषं शृण्वतां सर्वकामदम् ॥ ६६ । जाती हैं ॥ ६६ ॥
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२ ९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ सर्वदेवशिवेनासौ सखित्वं च यथेयिवान् । गुणनिधिने सर्वदेवमय भगवान् सदाशिवसे जिस प्रकार मित्रता प्राप्त की, अब मैं उसका वर्णन आपसे कर रहा हूँ । हे तात! एकाग्रचित्त होकर आप तदप्येकमना भूत्वा शृणु तात ब्रवीमि ते ॥ ६७ । सुनें ॥ ६७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां प्रथमखण्डे सृष्ट्युपाख्याने कैलासगमनोपाख्याने गुणनिधिसद्गतिवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके प्रथम खण्डमें सृष्टि - उपाख्यानके अन्तर्गत कैलासगमन - उपाख्यानमें गुणनिधिसद्गतिवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः कुबेरका काशीपुरीमें आकर तप करना, तपस्यासे प्रसन्न उमासहित भगवान् विश्वनाथका प्रकट हो उसे दर्शन देना और अनेक ब्रह्मोवाच
पाद्मे कल्पे मम पुरा ब्रह्मणो मानसात्सुतात् ।
पुलस्त्याद्विश्रवा जज्ञे तस्य वैश्रवणः सुतः ॥
तेनेयमलका भुक्ता पुरी विश्वकृता कृता ।
आराध्य त्र्यंबकं देवमत्युग्रतपसा पुरा ॥
व्यतीते तत्र कल्पे वै प्रवृत्ते मेघवाहने ।
याज्ञदत्तिरसौ श्रीमान् तपस्तेपे सुदुःसहम् ॥
भक्तिप्रभावं विज्ञाय शंभोस्तद्दीपमात्रतः ।
पुरा पुरारेः संप्राप्य काशिकां चित्प्रकाशिकाम् ॥
शिवैकादशमुद्बोध्य चित्तरत्नप्रदीपकैः ।
अनन्यभक्तिस्नेहाढ्यस्तन्मयो ध्याननिश्चलः ॥
शिवैक्यं सुमहापात्रं तपोऽग्निपरिबृंहितम् ।
कामक्रोधमहाविघ्नपतंगाघातवर्जितम् ॥
प्राणसंरोधनिर्वातं निर्मलं निर्मलेक्षणात् ।
संस्थाप्य शांभवं लिंगं सद्भावकुसुमार्चितम् ॥
तावत्तताप स तपस्त्वगस्थिपरिशेषितम् ।
यावद् बभूव तद्वर्ष्म वर्षाणामयुतं शतम् ॥
वर प्रदान करना, कुबेरद्वारा शिवमैत्री प्राप्त करना ब्रह्माजी बोले- पहले के पाद्मकल्पकी बात है, मुझ ब्रह्माके मानसपुत्र पुलस्त्यसे विश्रवाका जन्म १ हुआ और विश्रवाके पुत्र वैश्रवण कुबेर हुए ॥१ ॥
उन्होंने पूर्वकालमें अत्यन्त उग्र तपस्याके द्वारा त्रिनेत्रधारी महादेवकी आराधना करके विश्वकर्माकी २ बनायी हुई इस अलकापुरीका उपभोग किया ॥२ ॥
उस कल्पके व्यतीत हो जानेपर मेघवाहनकल्प ३ आरम्भ हुआ, उस समय वह यज्ञदत्तका पुत्र [ कुबेरके रूपमें ] अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगा ॥३ ॥
दीपदानमात्रसे मिलनेवाली शिवभक्तिके प्रभावको ४ जानकर शिवकी चित्प्रकाशिका काशिकापुरीमें जाकर अपने चित्तरूपी रत्नमय दीपकोंसे ग्यारह रुद्रोंको उद्बोधित करके अनन्य भक्ति एवं स्नेहसे सम्पन्न हो ५ वह तन्मयतापूर्वक शिवके ध्यानमें मग्न होकर निश्चलभावसे बैठ गया॥४-५ ॥ जो शिवसे एकताका महान् पात्र है, तपरूपी ६ अग्निसे बढ़ा हुआ है, काम - क्रोधादि महाविघ्नरूपी पतंगोंके आघातसे शून्य है, प्राणनिरोधरूपी वायुशून्य स्थानमें निश्चलभावसे प्रकाशित है, निर्मल दृष्टिके कारण स्वरूपसे भी निर्मल है तथा सद्भावरूपी पुष्पोंसे ७ पूजित है - ऐसे शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करके वह तबतक तपस्यामें लगा रहा, जबतक उसके शरीरमें केवल अस्थि और चर्ममात्र ही अवशिष्ट नहीं रह गये । इस प्रकार ८ । उसने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की॥६–८ ॥
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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( सृष्टिखण्ड ) २ ९ ७
ततः सह विशालाक्ष्या देवो विश्वेश्वरः स्वयम् ।
अलकापतिमालोक्य प्रसन्नेनान्तरात्मना ॥
लिंगे मनः समाधाय स्थितं स्थाणुस्वरूपिणम् ।
उवाच वरदोऽस्मीति तदाचक्ष्वालकापते ॥
उन्मील्य नयने यावत्स पश्यति तपोधनः ।
तावदुद्यत्सहस्त्रांशुसहस्राधिकतेजसम् ॥
पुरो ददर्श श्रीकंठं चन्द्रचूडमुमाधवम् ।
तत्तेजःपरिभूताक्षितेजाः संमील्य लोचने ॥
उवाच देवदेवेशं मनोरथपदातिगम् ।
निजाङ्घ्रिदर्शने नाथ दृक्सामर्थ्यं प्रयच्छ मे ॥
अयमेव वरो नाथ यत्त्वं साक्षान्निरीक्ष्यसे ।
किमन्येन वरेणेश नमस्ते शशिशेखर ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा देवदेव उमापतिः ।
ददौ दर्शनसामर्थ्यं स्पृष्ट्वा पाणितलेन तम् ॥
प्रसार्य नयने पूर्वमुमामेव व्यलोकयत् ।
ततोऽसौ याज्ञदत्तिस्तु तत्सामर्थ्यमवाप्य च ॥
शंभो: समीपे का योषिदेषा सर्वांगसुन्दरी अनया किं तपस्तप्तं ममापि तपसोऽधिकम् ॥ अहो रूपमहो प्रेम सौभाग्यं श्रीरहो भृशम् इत्यवादीदसौ पुत्रो मुहुर्मुहुरतीव हि यावत्पुनः पुनरिदं वदन् तदनन्तर विशालाक्षी पार्वतीदेवीके साथ भगवान् ९ विश्वनाथ स्वयं प्रसन्नमनसे अलकापुरीके स्वामीको देखकर, जो शिवलिंगमें मनको एकाग्र करके ठूंठे वृक्षकी भाँति स्थिरभावसे बैठे थे, बोले- हे अलकापते! १० मैं वर देनेके लिये उद्यत हूँ, तुम अपने मनकी बात कहो— ॥ ९ -१० ॥ उन तपोनिधिने जब अपने नेत्रोंको खोलकर ११ देखा, तो उन्हें उदित हो रहे हजार किरणोंवाले हजार | सूर्योंसे भी अधिक तेजस्वी श्रीकण्ठ उमावल्लभ भगवान् चन्द्रशेखर अपने सामने दिखायी दिये । उनके १२ तेजसे प्रतिहत हुए तेजवाले कुबेर चौंधिया गये और अपनी आँखोंको बन्द करके वे मनके लिये अगोचर देवेश्वर भगवान् शंकरसे कहने लगे कि हे नाथ! १३ अपने चरणोंको देखनेके लिये मुझे दृष्टिसामर्थ्य प्रदान करें । हे नाथ! यही वर चाहता हूँ कि मैं आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकूँ । हे ईश! अन्य वरसे क्या लाभ १४ है? हे शशिशेखर! आपको प्रणाम है ॥ ११–१४ ॥ उनकी यह बात सुनकर देवाधिदेव उमापतिने १५ अपनी हथेलीसे उनका स्पर्श करके उन्हें अपने दर्शनकी शक्ति प्रदान की ॥ १५ ॥
देखनेकी शक्ति मिल जानेपर यज्ञदत्तके उस १६ पुत्रने आँखें खोलकर पहले उमाकी ओर ही देखना आरम्भ किया ॥१६ ॥
वह मन - ही - मन सोचने लगा, भगवान् शंकरके । १७ समीप यह सर्वांगसुन्दरी स्त्री कौन है? इसने मेरे तपसे भी अधिक कौन - सा तप किया है ॥ १७ ॥
। यह रूप, यह प्रेम, यह सौभाग्य और यह ॥ १८ असीम शोभा - सभी अद्भुत हैं, वह ब्राह्मणकुमार बार - बार यही कहने लगा ॥१८ ॥
। बार - बार यही कहता हुआ जब वह क्रूरदृष्टिसे क्रूरदृग्वीक्षते तन्नेत्रं वामं वामाविलोकनात् ॥ १ ९ उनकी ओर देखने लगा, तब पार्वतीके अवलोकनसे तावत्पुस्फोट उसकी बाँयीं आँख फूट गयी ॥१ ९ ॥ तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेवजीसे कहा-[ हे प्रभो! ] यह दुष्ट तपस्वी बार - बार मेरी ओर अथ देव्यब्रवीद्देवं किमसौ दुष्टतापसः । देखकर क्या बोल रहा है? आप मेरी तपस्याके
असकृद्वीक्ष्य मां वक्ति वद त्वं मे तपः प्रभाम् ॥ २० । तेजको प्रकट कीजिये ॥ २० ॥
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२ ९ ८ असकृद्दक्षिणेनाक्ष्णा पुनर्मामेव पश्यति असूयमानो मे रूपप्रेमसौभाग्यसंपदः इति देवीगिरं श्रुत्वा प्रहस्य प्राह तां प्रभुः उमे त्वदीयः पुत्रोऽयं न च क्रूरेण चक्षुषा सम्पश्यति तपोलक्ष्मीं तव किं त्वधिवर्णयेत् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ । यह पुनः अपने दाहिने नेत्रसे बार - बार मुझे देख ॥ २१ रहा है, निश्चित ही यह मेरे रूप, प्रेम और सौन्दर्यकी सम्पदासे ईर्ष्या करनेवाला है ॥ २१ ॥
। देवीकी यह बात सुनकर भगवान् शिवने हँसते ॥ २२ हुए उनसे कहा- हे उमे! यह तुम्हारा पुत्र है, यह तुम्हें क्रूरदृष्टिसे नहीं देख रहा है, अपितु तुम्हारी तप: सम्पत्तिका वर्णन कर रहा है ॥ २२ ॥
। देवीसे ऐसा कहकर भगवान् शिव पुनः उस इति देवीं समाभाष्य तमीशः पुनरब्रवीत् ॥ २३ [ ब्राह्मणकुमार ] -से बोले - हे वत्स! मैं तुम्हारी इस वरान्ददामि ते वत्स तपसानेन तोषितः निधीनामथ नाथस्त्वं गुह्यकानां भवेश्वरः यक्षाणां किन्नराणां च राज्ञां राजा च सुव्रत पतिः पुण्यजनानां च सर्वेषां धनदो भव ॥
मया सख्यं च ते नित्यं वत्स्यामि च तवान्तिके ।
अलकां निकषा मित्र तव प्रीतिविवृद्धये ॥
आगच्छ पादयोरस्याः पत ते जननी त्वियम् ।
याज्ञदत्ते महाभक्त सुप्रसन्नेन चेतसा ॥
ब्रह्मोवाच
इति दत्त्वा वरान्देवः पुनराह शिवां शिवः ।
प्रसादं कुरु देवेशि तपस्विन्यंगजेऽत्र वै ॥
इत्याकर्ण्य वचः शंभो: पार्वती जगदम्बिका ।
अब्रवीद्याज्ञदत्तिं तं सुप्रसन्नेन चेतसा ॥
देव्युवाच
वत्स ते निर्मला भक्तिर्भवे भवतु सर्वदा ।
भवैकपिंगो नेत्रेण वामेन स्फुटितेन ह ॥
देवेन दत्ता ये तुभ्यं वराः सन्तु तथैव ते ।
कुबेरो भव नाम्ना त्वं मम रूपेर्ष्यया सुत ॥
इति दत्त्वा वरान्देवो देव्या सह महेश्वरः ।
धनदायाविवेशाथ धाम वैश्वेश्वराभिधम् ॥
। तपस्यासे सन्तुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूँ । तुम निधियोंके ॥ २४ स्वामी और गुह्यकोंके राजा हो जाओ ॥ २३-२४ ॥ । हे सुव्रत! तुम यक्षों, किन्नरों और राजाओंके भी २५ राजा, पुण्यजनोंके पालक और सबके लिये धनके दाता हो जाओ ॥ २५ ॥
मेरे साथ सदा तुम्हारी मैत्री बनी रहेगी और २६ हे मित्र! तुम्हारी प्रीति बढ़ानेके लिये मैं अलकाके पास ही रहूँगा । नित्य तुम्हारे निकट निवास करूँगा । हे महाभक्त यज्ञदत्त - कुमार! आओ, इन उमादेवीके २७ चरणोंमें प्रसन्न मनसे प्रणाम करो, ये तुम्हारी माता हैं ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] इस प्रकार वर देकर भगवान् शिवने देवी पार्वतीसे पुन: कहा — हे २८ देवेश्वरि! तपस्विनि! पुत्रपर कृपा करो । यह तुम्हारा पुत्र है ॥ २८ ॥
भगवान् शंकरका यह कथन सुनकर जगदम्बा २ ९ पार्वती अति प्रसन्नचित्तसे उस यज्ञदत्तकुमारसे कहने लगीं— ॥ २ ९ ॥ देवी बोलीं – हे वत्स! भगवान् शिवमें तुम्हारी सदा निर्मल भक्ति बनी रहे । तुम्हारी बायीं ३० आँख तो फूट ही गयी । इसलिये एक ही पिंगल नेत्रसे युक्त रहो । महादेवजीने तुम्हें जो वर दिये हैं, वे सब उसी रूपमें तुम्हें सुलभ हों । हे पुत्र! मेरे रूपके प्रति ३१ ईर्ष्या करनेके कारण तुम कुबेर नामसे प्रसिद्ध होओ ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकार कुबेरको वर देकर भगवान् महेश्वर | पार्वती देवीके साथ अपने वैश्वेश्वर नामक धाममें ३२ चले गये ॥३२ ॥