शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 331–340

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३१ ९

अहं विष्णुस्तथा शम्भुः सर्वे त्वच्छरगोचराः ।

इति यद्भवता प्रोक्तं तन्मयापि परीक्षितम् ॥

नापराधो ममाप्यत्र ब्रह्मन् मयि निरागसि ।

दारुणः समयश्चैष शापो देव जगत्पते ॥

ब्रह्मोवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्माहं जगतां पतिः ।

प्रत्यवोचं यतात्मानं मदनं दमयन्मुहुः ॥

ब्रह्मोवाच

आत्मजा मम संध्येयं यस्मादेतत्सकामतः ।

लक्ष्यीकृतोऽहं भवता ततः शापो मया कृतः ॥

अधुना शान्तरोषोऽहं त्वां वदामि मनोभव ।

शृणुष्व गतसन्देहः सुखी भव भयं त्यज ॥

त्वं भस्म भूत्वा मदन भर्गलोचनवह्निना ।

तथैवाशु समं पश्चाच्छरीरं प्रापयिष्यसि ॥

यदा करिष्यति हरोऽञ्जसा दारपरिग्रहम् ।

तदा स एव भवतः शरीरं प्रापयिष्यति ॥

एवमुक्त्वाथ मदनमहं लोकपितामहः ।

अन्तर्गतो मुनीन्द्राणां मानसानां प्रपश्यताम् ॥

इत्येवं मे वचः श्रुत्वा मदनस्तेऽपि मानसाः । सम्बभूवुः सुताः सर्वे सुखिनोऽरं गृहं गताः इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके [ हे ब्रह्मन्! ] मैं [ ब्रह्मा ], विष्णु तथा शिव-७० ये सब भी तुम्हारे बाणोंके वशीभूत होकर रहेंगे— ऐसा जो आपने कहा था, उसीके अनुसार ही मैंने

परीक्षा ली थी । ७० ॥

अत: हे ब्रह्मन्! इसमें मेरा अपराध नहीं है । हे ७१ देव! हे जगत्पते! यदि आपने मुझ निरपराधको यह दारुण शाप दे ही दिया, तो इसका कोई समय भी निश्चित कर दीजिये ॥ ७१ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] तब मैं जगत्पति ब्रह्मा उसकी यह बात सुनकर चित्तको वशमें करनेवाले कामको ७२ बार - बार डाँटता हुआ इस प्रकार बोला— ॥ ७२ ॥।

[ हे काम! ] यह सन्ध्या मेरी कन्या है, तुमने इसकी ओर सकाम करनेके लिये मुझे [ अपने कामका ] ७३ लक्ष्य बनाया । इसलिये मैंने तुम्हें शाप दिया ॥ ७३ ॥

हे मनोभव! अब मेरा क्रोध शान्त हो गया है, ७४ अतः मैं तुमसे कह रहा हूँ, उसे सुनो । तुम सन्देहरहित होकर सुखी हो जाओ और भय छोड़ो ॥७४ ॥

हे मदन! तुम महादेवजीकी नेत्राग्निसे भस्म होकर ७५ बादमें शीघ्र ही इसीके समान शरीर प्राप्त करोगे ॥ ७५ ॥

जब शंकरजी विवाह करेंगे, तब वे अनायास ही ७६ तुम्हें शरीर प्रदान करेंगे ॥७६ ॥

[ हे नारद! ] कामसे इस प्रकार कहकर मैं ७७ लोकपितामह उन मानसपुत्र मुनिवरोंके देखते - देखते ही अन्तर्धान हो गया ॥७७ ॥

इस प्रकार मेरे वचनको सुनकर कामदेव तथा मेरे वे सभी मानसपुत्र प्रसन्न हो गये और शीघ्रतासे ॥ ७८ । अपने - अपने घरोंको चले गये ॥७८ ॥

द्वितीये सतीखण्डे कामशापानुग्रहो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें कामशापानुग्रहवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः कामदेवके विवाहका वर्णन नारद उवाच नारदजी बोले - हे विष्णुशिष्य! हे महाप्राज्ञ! हे विष्णुशिष्य महाप्राज्ञ विधे लोककर प्रभो । विधे! संसारकी रचना करनेवाले हे प्रभो! आपने शिवजीकी अद्भुतेयं कथा प्रोक्ता शिवलीलामृतान्विता ॥ १ लीलारूपी अमृतसे युक्त यह अद्भुत कथा कही ॥१ ॥

पृष्ठ 332

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३२० ततः किमभवत्तात चरितं तद् वदाधुना अहं श्रद्धान्वितः श्रोतुं यदि शम्भुकथाश्रयम् ॥ ब्रह्मोवाच

शम्भौ गते निजस्थाने वेधस्यन्तर्हिते मयि ।

दक्षः प्राहाथ कंदर्पं संस्मरन् मम तद्वचः ॥

दक्ष उवाच मद्देहजेयं कंदर्प सद्रूपगुणसंयुता । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । हे तात! इसके बाद क्या हुआ? यदि मैं २ शम्भुकी कथापर आश्रित उनके चरित्रको सुननेमें श्रद्धावान् होऊँ, तो उसे कहिये ॥२ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार शिवजीके अपने स्थानको चले जाने तथा मुझ ब्रह्माके अन्तर्धान हो ३ जानेपर दक्षप्रजापति मेरी बातका स्मरण करते हुए कामदेवसे कहने लगे -॥३ ॥

दक्ष बोले- हे काम! सुन्दर रूप एवं गुणोंसे युक्त यह कन्या मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई है, अत: तुम एनां गृह्णीष्व भार्यार्थं भवतः सदृशीं गुणैः ॥ ४ अपनी पत्नी बनानेके लिये इसे ग्रहण करो, यह गुणोंमें

एषा तव महातेजाः सर्वदा सहचारिणी ।

भविष्यति यथाकामं धर्मतो वशवर्तिनी ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देहस्वेदाम्बुसम्भवाम् ।

कन्दर्पायाग्रतः कृत्वा नाम कृत्वा रतीति ताम् ॥

विवाह्य तां स्मरः सोऽपि मुमोदातीव नारद ।

दक्षजां तनयां रम्यां मुनीनामपि मोहिनीम् ॥

अथ तां वीक्ष्य मदनो रत्याख्यां स्वस्त्रियं शुभाम् ।

आत्मागुणेन विद्धोऽसौ मुमोह रतिरंजितः ॥

क्षणप्रदाभवत्कान्ता गौरी मृगदृशी मुदा ।

लोलापांग्यथ तस्यैव भार्या च सदृशी रतौ ॥

तस्या भ्रूयुगलं वीक्ष्य संशयं मदनोऽकरोत् ।

उत्सादनं मत्कोदण्डं विधात्रास्यां निवेशितम् ॥

गतिं दृष्ट्वा कटाक्षाणामाशु तस्या द्विजोत्तम ।

आशु गन्तुं निजास्त्राणां श्रद्दधे न च चारुताम् ॥

तस्याः स्वभावसौरम्यं धीरश्वासानिलं तथा ।

आघ्राय मदनः श्रद्धां त्यक्तवान् मलयानिले ॥

तुम्हारे ही समान है ॥४ ॥

हे महातेजस्विन्! यह कन्या सदा तुम्हारे साथ ५ रहेगी और धर्मके अनुरूप तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हारे वशमें रहेगी ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] यह कहकर दक्षने अपने स्वेदसे उत्पन्न हुई कन्याका नाम रति ६ रखकर और उसे अपने आगेकर कामदेवको दे दिया ॥६ ॥

हे नारद! वह कामदेव मुनियोंको भी मोहित ७ करनेवाली उस परम सुन्दर दक्षकन्यासे विवाह करके बड़ा प्रसन्न हुआ ॥७ ॥

प्रेमासक्त कामदेव भी परम कल्याणकारिणी रति ८ नामक अपनी स्त्रीको देखकर उसके गुणोंसे आकृष्ट होकर उसपर अत्यन्त मोहित हो गया ॥८ ॥

गौरवर्णवाली, हरिणाक्षी ९ वह रति भी कामके सदृश आह्लाद प्रदान करने लगी ॥ उसकी चपल भौंहोंको १० पड़ जाता था कि विधाताने मेरे धनुषको इसके नेत्रोंमें क्या? ॥१० ॥

तथा चंचल नेत्रप्रान्तवाली होनेके कारण उसे परम ९ ॥ देखकर कामदेव संशयमें सबको वशमें करनेवाले सन्निविष्ट कर दिया है हे द्विजश्रेष्ठ! उस रतिके कटाक्षोंकी शीघ्र गति ११ तथा उसकी सुन्दरताको देखकर कामदेवको अपने । अस्त्रोंकी शीघ्र गतिपर विश्वास नहीं रह गया ॥ ११ ॥

उसके स्वाभाविक रूपसे सुगन्धित तथा मन्द | श्वासवायुको सूँघकर कामदेवने मलय - पवनके प्रति १२ । अपनी श्रद्धाका त्याग कर दिया ॥१२ ॥

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३२१

पूर्णेन्दुसदृशं वक्त्रं दृष्ट्वा लक्ष्मसुलक्षितम् ।

न निश्चिकाय मदनो भेदं तन्मुखचन्द्रयोः ॥ १३

सुवर्णपद्मकलिकातुल्यं तस्याः कुचद्वयम् ।

रेजे चूचुकयुग्मेन भ्रमरेणेव वेष्टितम् ॥ १४

दृढपीनोन्नतं तस्याः स्तनमध्यं विलंबिनीम् ।

आनाभिलम्बिनीं मालां तन्वीं चन्द्रायितां शुभाम् ॥ १५

ज्यां पुष्पधनुषः कामः षट्पदावलिसंभ्रमाम् ।

विसस्मार च यस्मात्तां विसृज्यैनां निरीक्षते ॥ १६

गम्भीरनाभिरन्ध्रान्तश्चतुः पार्श्वत्वगावृतम् ।

आननाब्जे क्षणद्वंद्वमारक्तकमलं यथा ॥१७ ।

क्षीणमध्येन वपुषा निसर्गाष्टापदप्रभा ।

रुक्मवेदीव ददृशे कामेन रमणी हि सा ॥ १८

रंभास्तंभायतं स्निग्धं यदूरुयुगलं मृदु ।

निजशक्तिसमं कामो वीक्षाञ्चक्रे मनोहरम् ॥ १ ९

आरक्तपाणिपादाग्रं प्रांतभागं पदद्वयम् ।

अनुरागमिवानेन मित्रं तस्या मनोभवः ॥ २०

तस्याः करयुगं रक्तं नखरैः किंशुकोपमैः ।

वृत्ताभिरंगुलीभिश्च सूक्ष्माग्राभिर्मनोहरम् ॥ २१

तद् बाहुयुगलं कांतं मृणालयुगलायतम् ।

मृदु स्निग्धं चिरं राजत्कांतिलोहप्रवालवत् ॥ २२

नीलनीरदसंकाशः केशपाशो मनोहरः ।

चमरीबालभरवद्विभाति स्म स्मरप्रिया ॥ २३

एतादृशीं रतिं नाम्नीं प्रालेयाद्रिसमुद्भवाम् । सुन्दर लक्षणोंसे युक्त तथा पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान उसके मुखमण्डलको देखकर कामदेव उसके मुख और चन्द्रमाका भेद करनेमें असमर्थ हो गया ॥ १३ ॥

सुवर्णकमलकी कलीके समान उसका वक्ष: स्थल भ्रमरसे वेष्टित कमलकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥१४ ॥

उसका कठोर, स्थूल एवं उन्नत वक्षःस्थलका मध्यभाग नाभिपर्यन्त लटकनेवाली, लम्बी, पतली तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ माला धारण किये हुए था । वह कामदेव भ्रमरकी पंक्तियोंसे घिरी अपने पुष्पधनुषकी प्रत्यंचाको भी भूल गया और उसे देखना छोड़कर बार - बार उसी रतिकी ओर एकटक देखने लगा ॥ १५-१६ ॥ चारों ओर त्वचासे परिवेष्टित उसकी नाभिका रन्ध्र अत्यन्त गम्भीर था । उसके मुखकमलपर दोनों नेत्र लाल कमलके समान प्रतीत हो रहे थे ॥१७ ॥

उस कामदेवने कृश कटिप्रदेशवाले शरीरसे सुशोभित, स्वभावतः सुवर्णकी आभावाली उस रमणीको सुवर्णवेदीके समान देखा ॥१८ ॥

कदलीस्तम्भके सदृश विस्तृत, स्निग्ध, कोमल तथा मनोहर उसकी जंघाओंको कामदेवने अपनी शक्तिके समान देखा ॥ १ ९ ॥ लाल - लाल पादाग्र तथा प्रान्तभागवाले उसके दोनों पैर रँगे हुए - से थे, इससे कामदेव अनुरक्त होकर उसका मित्र बन गया । पलाशपुष्पके समान लाल नखोंसे युक्त, सूक्ष्म अग्रभागवाले तथा गोलाकार अँगुलियोंसे युक्त उसके दोनों हाथ अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहे थे । उसकी दोनों भुजाएँ कान्तिमय, मृणालके समान लम्बी, कोमल, स्निग्ध और कान्तियुक्त लाल मूँगेके समान शोभित हो रही थीं । उसका मनोहर केशपाश काले - काले बादलोंके समान शोभा पा रहा था, इससे वह कामप्रिया चमरीके बालोंको धारण करनेवाले चँवरकी भाँति सुशोभित हो रही थी । [ सौन्दर्ययुक्त ] ऐसी रतिको हर्षित नेत्रोंवाले कामदेवने उसी प्रकार ग्रहण किया, जिस प्रकार हिमालयसे उत्पन्न गंगाको महादेवजीने ग्रहण किया गङ्गामिव महादेवो जग्राहोत्फुल्ललोचनः ॥ २४ । था॥२०–२४ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_12_1_Front

पृष्ठ 334

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३२२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४

चक्रपद्मां चारुबाहुं मृणालशकलान्विताम् ।

भ्रूयुग्मविभ्रमव्राततनूर्मिपरिराजिताम् ॥ २५

कटाक्षपाततुङ्गौघां स्वीयनेत्रोत्पलान्विताम् ।

तनुलोमांबुशैवालां मनोद्रुमविलासिनीम् ॥ २६

निम्ननाभिहृदां क्षामां सर्वांगरमणीयिकाम् ।

सर्वलावण्यसदनां शोभमानां रमामिव ॥ २७

द्वादशाभरणैर्युक्तां शृङ्गारैः षोडशैर्युताम् ।

मोहिनीं सर्वलोकानां भासयन्तीं दिशो दश ॥ २८

इति तां मदनो वीक्ष्य रतिं जग्राह सोत्सुकः ।

रागादुपस्थितां लक्ष्मीं हृषीकेश इवोत्तमाम् ॥ २ ९

नोवाच च तदा दक्षं कामो मोदभवात्ततः ।

विस्मृत्य दारुणं शापं विधिदत्तं विमोहितः ॥ ३०

तदा महोत्सवस्तात बभूव सुखवर्धनः ।

दक्षः प्रीततरश्चासीन्मुमुदे तनया मम ॥३१

कामोऽतीव सुखं प्राप्य सर्वदुःखक्षयं गतः ।

दक्षजापि रतिः कामं प्राप्य चापि जहर्ष ह ॥ ३२

रराज च तया सार्धं भिन्नश्चारुवचाः स्मरः । ।

जीमूत इव सन्ध्यायां सौदामन्या मनोज्ञया ॥ ३३ ।

चक्र तथा पद्मके चिह्नोंसे युक्त, मृणालखण्डके | समान मनोहर हाथोंसे युक्त वह रति गंगा नदीके समान प्रतीत हो रही थी । उस रतिकी दोनों भौंहोंकी चेष्टाएँ नदीकी सूक्ष्म लहरोंके समान प्रतीत हो रही थीं ॥ २५ ॥

उसके कटाक्षपात ही नदीकी वेगवती धारा थे और विशाल नेत्र कमलके समान प्रतीत हो रहे थे । उसकी सूक्ष्म रोमावली शैवाल थी और वह अपने मनरूपी वृक्षोंसे विलास कर रही थी ॥ २६ ॥

उसकी गम्भीर नाभि ह्रदके समान शोभा पा रही थी । वह कृशगात्रा रति अपने सर्वांगकी रमणीयता तथा लावण्यमयी शोभासे बारह आभूषणोंसे युक्त तथा सोलह श्रृंगारोंसे शोभायमान होकर सम्पूर्ण लोकोंको मोहनेवाली और अपनी कान्तिसे दसों दिशाओंको प्रज्वलित करती हुई महालक्ष्मी -जैसी प्रतीत हो रही थी ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार परम सुन्दरी रतिको देखकर कामदेवने इसे बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण किया, जिस प्रकार कि स्वयं रागसे उपस्थित हुई महालक्ष्मीको भगवान् नारायणने ग्रहण किया था ॥२ ९ ॥ उस समय कामदेवने आनन्द होनेके कारण विमोहित होकर ब्रह्माजीके द्वारा दिये गये दारुण शापको भूलकर दक्षसे कुछ नहीं कहा ॥ ३० ॥

हे तात! उस समय [ सबके ] सुखको बढ़ानेवाला महान् उत्सव हुआ । दक्ष प्रजापति अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और कन्या रति भी परम प्रसन्न हो गयी ॥३१ ॥

अत्यधिक सुख पाकर कामका समस्त दु: ख विनष्ट हो गया और इधर दक्षतनया रति भी कामको पतिरूपमें प्राप्तकर परम हर्षित हुई ॥ ३२ ॥

रतिसे मोहित हुआ गद्गद कण्ठवाला वह मधुरभाषी काम सायंकालमें मनोहर बिजलीसे युक्त मेघके समान दक्षकन्या रतिके साथ शोभा पाने लगा ॥ ३३ ॥

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पृष्ठ 335

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( इति रतिपतिरुच्चैर्मोहयुक्तो रतिं तां हृदुपरि जगृहे वै योगदर्शीव विद्याम् । रतिरपि पतिमग्रयं प्राप्य सा चापि रेजे हरिमिव कमला वै पूर्णचन्द्रोपमास्या ॥ ३४ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्ड ) ३२३ इस प्रकार रतिपति कामने अत्यन्त मोहित होकर उस रतिको इस प्रकार अपने हृदयमें ग्रहण किया, जिस प्रकार योगी ब्रह्मविद्याको ग्रहण करता है और वह रति भी श्रेष्ठ कामको प्राप्तकर इस प्रकार प्रसन्न हुई, जिस प्रकार पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली महालक्ष्मी । विष्णुको पतिरूपमें प्राप्तकर प्रसन्न हुई थीं ॥३४ ॥

सतीखण्डे कामविवाहवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें कामविवाहवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः ब्रह्माकी मानसपुत्री सूत उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणो मुनिसत्तमः ।

स मुदोवाच संस्मृत्य शंकरं प्रीतमानसः ॥

नारद उवाच

ब्रह्मन् विधे महाभाग विष्णुशिष्य महामते ।

अद्भुता कथिता लीला त्वया च शशिमौलिनः ॥

गृहीतदारे मदने हृष्टे हि स्वगृहं गते ।

दक्षे च स्वगृहं याते तथा हि त्वयि कर्तरि ॥

मानसेषु च पुत्रेषु गतेषु स्वस्वधामसु ।

सन्ध्या कुत्र गता सा च ब्रह्मपुत्री पितृप्रसूः ॥

किं चकार च केनैव पुरुषेण विवाहिता ।

एतत्सर्वं विशेषेण संध्यायाश्चरितं वद ॥

सूत उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मपुत्रस्य धीमतः ।

संस्मृत्य शंकरं भक्त्या ब्रह्मा प्रोवाच तत्त्ववित् ॥

ब्रह्मोवाच

शृणु त्वं च मुने सर्वं संध्यायाश्चरितं शुभम् ।

यच्छ्रुत्वा सर्वकामिन्यः साध्व्यः स्युः सर्वदा मुने ॥

सा च संध्या सुता मे हि मनोजाता पुराभवत् ।

तपस्तप्त्वा तनुं त्यक्त्वा सैव जाता त्वरुन्धती ॥

कुमारी सन्ध्याका आख्यान सूतजी बोले- हे महर्षियो! ब्रह्माजीके इस वचनको सुनकर मुनिश्रेष्ठ [ नारद ] प्रसन्नचित्त १ होकर शंकरजीका स्मरण करके आनन्दपूर्वक कहने लगे— ॥ १ ॥

नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे विष्णुशिष्य! हे महाभाग! हे महामते! आपने शिवजीकी अद्भुत २ लीलाका वर्णन किया ॥२ ॥

जब कामदेव अपनी पत्नीको प्राप्तकर प्रसन्न ३ होकर अपने घर चला गया तथा प्रजापति दक्ष भी अपने घर चले गये, सृष्टिकर्ता आप ब्रह्मा तथा आपके मानसपुत्र भी अपने - अपने घर चले गये, तब पितरोंकी ४ जन्मदात्री वह ब्रह्मपुत्री सन्ध्या कहाँ गयी? ॥३-४ ॥ उसने क्या किया और उसका विवाह किस ५ पुरुषके साथ हुआ? इन सब बातोंको और सन्ध्याके चरित्रको विशेष रूपसे कहिये ॥ ५ ॥

सूतजी बोले- तत्त्ववेत्ता ब्रह्मदेव परम बुद्धिमान् देवर्षि नारदके इस वचनको सुनकर भक्तिपूर्वक शंकरजीका स्मरण करके कहने लगे- ॥६ ॥

६ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! सन्ध्याका सम्पूर्ण शुभ चरित्र सुनिये, जिसे सुनकर हे मुने! सभी स्त्रियाँ पतिव्रता होती हैं ॥ ७ ॥

७ वह सन्ध्या, जो पूर्वकालमें मेरे मनसे उत्पन्न हुई थी, वही तपस्याकर शरीर छोड़नेके बाद अरुन्धती ८ | हुई ॥ ८ ॥

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पृष्ठ 336

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३२४ मेधातिथेः सुता भूत्वा मुनिश्रेष्ठस्य धीमती ब्रह्मविष्णुमहेशानवचनाच्चरितव्रता वव्रे पतिं महात्मानं वसिष्ठं शंसितव्रतम् पतिव्रता च मुख्याभूद्वंद्या पूज्या त्वभीषणा ॥ नारद उवाच कथं तया तपस्तप्तं किमर्थं कुत्र संध्यया कथं शरीरं सा त्यक्त्वाभवन्मेधातिथेः सुता

कथं वा विहितं देवैर्ब्रह्मविष्णुशिवैः पतिम् ।

वसिष्ठं तु महात्मानं संवव्रे शंसितव्रतम् ॥

एतन्मे श्रोष्यमाणाय विस्तरेण पितामह ।

कौतूहलमरुन्धत्याश्चरितं ब्रूहि तत्त्वतः ॥

ब्रह्मोवाच

अहं स्वतनयां संध्यां दृष्ट्वा पूर्वमथात्मनः ।

कामायाशु मनोऽकार्षं त्यक्ता शिवभयाच्च सा ॥

संध्यायाश्चलितं चित्तं कामबाणविलोडितम् ।

ऋषीणामपि संरुद्धमानसानां महात्मनाम् ॥

भर्गस्य वचनं श्रुत्वा सोपहासं च मां प्रति ।

आत्मनश्चलितत्वं वै ह्यमर्यादमृषीन्प्रति ॥

कामस्य तादृशं भावं मुनिमोहकरं मुहुः ।

दृष्ट्वा सन्ध्या स्वयं तत्रोपयमायातिदुःखिता ॥

ततस्तु ब्रह्मणा शप्ते मदने च मया मुने ।

अन्तर्भूते मयि शिवे गते चापि निजास्पदे ॥

आमर्षवशमापन्ना सा संध्या मुनिसत्तम ।

मम पुत्री विचार्यैवं तदा ध्यानपराभवत् ॥

ध्यायन्ती क्षणमेवाशु पूर्वं वृत्तं मनस्विनी ।

इदं विममृशे सन्ध्या तस्मिन्काले यथोचितम् ॥

सन्ध्योवाच उत्पन्नमात्रां मां दृष्ट्वा युवतीं मदनेरितः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ । उस बुद्धिमती तथा उत्तम व्रत करनेवाली सन्ध्याने ॥ ९ । मुनिश्रेष्ठ मेधातिथिकी कन्याके रूपमें जन्म ग्रहणकर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरके वचनोंसे महात्मा वसिष्ठका । • अपने पतिरूपमें वरण किया । वह श्रेष्ठ पतिव्रता १० वन्दनीय, पूजनीय तथा दयाकी प्रतिमूर्ति थी ॥ ९ -१० ॥, नारदजी बोले — हे ब्रह्मन्! उस सन्ध्याने क्यों, । कहाँ तथा किस उद्देश्यसे तप किया, किस प्रकार वह ॥ ११ अपना शरीर त्याग करके मेधातिथिकी कन्या हुई और उसने किस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके द्वारा बताये गये उत्तम व्रतवाले महात्मा वसिष्ठको अपना १२ पति स्वीकार किया? ॥ ११-१२ ॥ हे पितामह! इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता १३ है, अतः सुननेकी इच्छावाले मुझसे अरुन्धतीके चरित्रका विस्तारपूर्वक ठीक - ठीक वर्णन कीजिये ॥ १३ ॥

ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] पहले अपनी पुत्री सन्ध्याको देखकर मेरा मन कामसे आकृष्ट हो गया, १४ किंतु बादमें शिवके भयसे मैंने उसे छोड़ दिया ॥ १४ ॥

कामबाणसे घायल होकर उस सन्ध्याका तथा १५ मनको वशमें रखनेवाले महात्मा ऋषियोंका भी चित्त चलायमान हो गया था ॥१५ ॥

उस समय मेरे प्रति कहे गये शिवजीके उपहासयुक्त १६ वचनको सुनकर और ऋषियोंके प्रति अपने चित्तको मर्यादा छोड़कर चलायमान देखकर तथा बार - बार मुनियोंको मोहित करनेवाले उस प्रकारके भावको १७ देखकर वह सन्ध्या विवाहके लिये स्वयं अत्यन्त दुःखी हुई॥१६-१७ ॥ हे मुने! कामदेवको शाप देकर जब मैं अन्तर्धान १८ हो गया एवं शिवजी अपने स्थान कैलासको चले गये, उस समय हे मुनिसत्तम! वह मेरी पुत्री सन्ध्या क्षुब्ध होकर १ ९ कुछ विचार करके ध्यानमग्न हो गयी ॥ १८-१९ ॥ वह मनस्विनी सन्ध्या कुछ देरतक अपने पूर्व २० वृत्तका स्मरण करती हुई उस समय यथोचित रूपसे यह विचार करने लगी— ॥२० ॥

सन्ध्या बोली- मेरे पिताने उत्पन्न होते ही मुझ युवतीको देखकर कामसे प्रेरित होकर अनुरागपूर्वक

अकार्षीत्सानुरागोऽयमभिलाषं पिता मम ॥ २१ । मुझे प्राप्त करनेकी अभिलाषा की ॥२१ ॥

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पृष्ठ 337

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३२५

पश्यतां मानसानां च मुनीनां भावितात्मनाम् ।

दृष्ट्वैव माममर्यादं ' सकाममभवन्मनः ॥

मापि मथितं चित्तं मदनेन दुरात्मना ।

येन दृष्ट्वा मुनीन्सर्वांश्चलितं मन्मनो भृशम् ॥

फलमेतस्य पापस्य मदनः स्वयमाप्तवान् ।

यस्तं शशाप कुपितः शम्भोरग्रे पितामहः ॥

प्राप्नुयां फलमेतस्य पापस्य स्वघकारिणी ।

तच्छोधनफलमहमाशु चेच्छामि साधनम् ॥

यन्मां पिता भ्रातरश्च सकामामपरोक्षत: ।

दृष्ट्वा चक्रुः स्पृहां तस्मान्न मत्तः पापकृत्परा ॥

ममापि कामभावोऽभूदमर्यादं समीक्ष्य तान् ।

पत्या इव स्वके ताते सर्वेषु सहजेष्वपि ॥

करिष्याम्यस्य पापस्य प्रायश्चित्तमहं स्वयम् ।

आत्मानमग्नौ होष्यामि वेदमार्गानुसारतः ॥

किं त्वेकां स्थापयिष्यामि मर्यादामिह भूतले ।

उत्पन्नमात्रा न यथा सकामाः स्युः शरीरिणः ॥

एतदर्थमहं कृत्वा तपः परमदारुणम् ।

मर्यादां स्थापयिष्यामि पश्चात्त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥

यस्मिन् शरीरे पित्रा मे ह्यभिलाषः स्वयं कृतः ।

भ्रातृभिस्तेन कायेन किंचिन्नास्ति प्रयोजनम् ॥

मया येन शरीरेण तातेषु सहजेषु च ।

उद्भावितः कामभावो न तत्सुकृतसाधनम् ॥

इति संचिन्त्य मनसा संध्या शैलवरं ततः । जगाम चन्द्रभागाख्यं चन्द्रभागापगा यतः अथ तत्र गतां ज्ञात्वा संध्यां गिरिवरं प्रति तपसे नियतात्मानं ब्रह्मावोचमहं सुतम् वसिष्ठं संयतात्मानं सर्वज्ञं ज्ञानयोगिनम् । समीपे स्वे समासीनं वेदवेदाङ्गपारगम् इसी प्रकार आत्मतत्त्वज्ञ ब्रह्मदेवके मानसपुत्रोंने २२ भी मुझे देखकर अपना मन मर्यादासे रहितकर कामाभिलाषसे युक्त कर लिया ॥२२ ॥

इस दुरात्मा कामदेवने मेरे भी चित्तको मथ २३ डाला, जिससे सभी मुनियोंको देखकर मेरा मन बहुत चंचल हो गया ॥२३ ॥

इस पापका फल कामदेवने स्वयं पाया कि २४ शंकरजीके सामने कुपित होकर ब्रह्माजीने उसे शाप दे दिया ॥२४ ॥

मैं पापिनी भी इस पापका फल पाऊँगी, अतः २५ उस पापसे शुद्ध होनेके लिये मैं भी कोई साधन करना चाहती हूँ; क्योंकि मुझे देखकर मेरे पिता तथा सभी भाई प्रत्यक्ष रूपसे कामभावपूर्वक मेरी अभिलाषा २६ करने लगे । अतः मुझसे बढ़कर कोई पापिनी नहीं है ॥ २५-२६ ॥ उन सबको देखकर मुझमें भी अमर्यादित रूपसे २७ कामभाव उत्पन्न हो गया और मैं भी अपने पिता तथा सभी भाइयोंमें पतिके समान भावना करने लगी ॥ २७ ॥

अब मैं इस पापका प्रायश्चित्त करूँगी और वेदमार्गके २८ अनुसार अपने शरीरको अग्निमें हवन कर दूँगी । मैं इस भूतलपर एक मर्यादा स्थापित करूँगी, जिससे कि शरीरधारी २ ९ । उत्पन्न होते ही कामभावसे युक्त न हों ॥ २८-२९ ॥ इसके लिये मैं परम कठोर तप करके उस मर्यादाको स्थापित करूँगी और बादमें अपना शरीर ३० छोडूंगी ॥ ३० ॥

मेरे जिस शरीरमें मेरे पिता एवं भाइयोंने कामाभिलाष ३१ किया, उस शरीरसे अब कोई प्रयोजन नहीं है ॥ ३१ ॥

मैंने भी जिस शरीरसे अपने पिता तथा भाइयोंमें ३२ कामभाव उत्पन्न किया, अब वह शरीर पुण्यकार्यका साधन नहीं हो सकता ॥ ३२ ॥

वह सन्ध्या अपने मनमें ऐसा विचारकर चन्द्रभाग ॥ ३३ नामक श्रेष्ठ पर्वतपर गयी, जहाँसे चन्द्रभागा नदी निकली हुई है ॥३३ ॥

। इसके बाद सन्ध्याको उस श्रेष्ठ पर्वतपर तपस्याके ॥ ३४ लिये गयी हुई जानकर मैंने अपने पासमें बैठे हुए, मनको वशमें रखनेवाले, सर्वज्ञ, ज्ञानयोग तथा वेदवेदांगके ॥ ३५ पारगामी अपने पुत्र वसिष्ठसे कहा — ॥३४-३५ ॥

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३२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ ब्रह्मोवाच

वसिष्ठ पुत्र गच्छ त्वं संध्यां जातां मनस्विनीम् ।

तपसे धृतकामां च दीक्षस्वैनां यथाविधि ॥ ३६

मंदाक्षमभवत्तस्याः पुरा दृष्ट्वैव कामुकान् ।

युष्मान्मां च तथात्मानं सकामां मुनिसत्तम ॥ ३७

अनुक्तमूर्त्तं तत्कर्म पूर्वमृत्युं विमृश्य सा ।

युष्माकमात्मनश्चापि प्राणान्संत्यक्तुमिच्छति ॥ ३८

अमर्यादेषु मर्यादां तपसा स्थापयिष्यति ।

तपः कर्तुं गता साध्वी चन्द्रभागाख्यभूधरे ॥ ३ ९

न भावं तपसस्तात सानुजानाति कंचन ।

तस्माद्यथोपदेशात्सा प्राप्नोत्विष्टं तथा कुरु ॥ ४०

इदं रूपं परित्यज्य निजं रूपान्तरं मुने ।

परिगृह्यांतिके तस्याः तपश्चर्यां निदर्शय ॥ ४१

इदं स्वरूपं भवतो दृष्ट्वा पूर्वं यथात्र वाम् ।

नाप्नुयात्साथ किंचिद्वै ततो रूपान्तरं कुरु ॥ ४२

ब्रह्मोवाच

नारदेत्थं वसिष्ठो मे समाज्ञप्तो दयायुतः ।

तथास्त्विति च मां प्रोच्य ययौ संध्यान्तिकं मुनिः ॥ ४३

तत्र देवसरः पूर्ण गुणैर्मानससंमितम् ।

ददर्श स वसिष्ठोऽथ संध्यां तत्तीरगामपि ॥ ४४

तीरस्थया तया रेजे तत्सरः कमलोज्ज्वलम् ।

उद्यदिन्दुसुनक्षत्रं प्रदोषे गगनं यथा ॥ ४५

मुनिर्दृष्ट्वाथ तां तत्र सुसंभावां स कौतुकी ।

वीक्षाञ्चक्रे सरस्तत्र बृहल्लोहितसंज्ञकम् ॥ ४६

चन्द्रभागा नदी तस्मात्प्राकाराद्दक्षिणाम्बुधिम् ।

यान्ती सा चैव ददृशे तेन सानुगिरेर्महत् ॥ ४७

ब्रह्माजी बोले – हे पुत्र वसिष्ठ! तपस्याका | विचार करके गयी हुई मनस्विनी पुत्री सन्ध्याके पास जाओ और इसे विधिपूर्वक दीक्षा प्रदान करो ॥ ३६ ॥

हे मुनिसत्तम! प्रथम यह तुमलोगोंको, मुझको तथा अपनेको कामाभिलाषसे युक्त देख रही थी, परंतु अब इसके नेत्रोंकी चपलता दूर हो गयी है ॥ ३७ ॥

यह तुमलोगोंको तथा अपने अभूतपूर्व दुष्कर्मको समझकर ' मृत्यु ही अच्छी है ' – ऐसा विचारकर प्राण छोड़नेकी इच्छा करती है ॥ ३८ ॥

अब यह तपस्याके द्वारा अमर्यादित प्राणियोंमें मर्यादा स्थापित करेगी, इसलिये तपस्या करनेके लिये वह साध्वी चन्द्रभाग नामक पर्वतपर गयी है ॥ ३ ९ ॥ हे तात! वह तपस्याकी किसी भी क्रियाको नहीं जानती है, अतः जिस प्रकारके उपदेशसे वह अपने अभीष्टको प्राप्त करे, वैसा करो ॥ ४० ॥

हे मुने! तुम अपने इस रूपको छोड़कर दूसरा शरीर धारणकर उसके समीपमें स्थित होकर तपश्चर्याकी क्रियाओंको प्रदर्शित करो ॥ ४१ ॥

उसने यहाँपर मेरे तथा तुम्हारे रूपको पहले देख लिया है, इस रूपद्वारा वह कुछ भी शिक्षा ग्रहण नहीं करेगी, इसलिये दूसरा रूप धारण करो ॥ ४२ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! इस प्रकार दयालु मुनि वसिष्ठजीने मुझसे आज्ञा प्राप्त की और तथास्तु — ऐसा कहकर वे सन्ध्याके समीप गये ॥ ४३ ॥

वसिष्ठजीने वहाँ मानससरोवरके समान गुणोंसे परिपूर्ण देवसरको तथा उसके तटपर गयी हुई उस सन्ध्याको भी देखा ॥ ४४ ॥

उज्ज्वल कमलोंसे युक्त वह देवसर तटपर स्थित सन्ध्याद्वारा इस प्रकार शोभित हो रहा था, मानो प्रदोषकालमें उदित चन्द्रमा तथा नक्षत्रोंसे युक्त आकाश रात्रिमें सुशोभित हो रहा हो ॥४५ ॥

कौतूहलयुक्त वसिष्ठजी सुन्दर भावोंवाली उस सन्ध्याको देखकर बृहल्लोहित नामक उस तालाबकी ओर देखने लगे ॥ ४६ ॥

उन्होंने उसी चन्द्रभाग पर्वतके शिखरोंसे दक्षिण समुद्रकी ओर जानेवाली चन्द्रभागा नदीको देखा । वह

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३२७

निर्भिद्य पश्चिमं सा तु चन्द्रभागस्य सा नदी ।

यथा हिमवतो गङ्गा तथा गच्छति सागरम् ॥ ४८

तस्मिन् गिरौ चन्द्रभागे बृहल्लोहिततीरगाम् ।

संध्यां दृष्ट्वाथ पप्रच्छ वसिष्ठः सादरं तदा ॥ ४ ९

वसिष्ठ उवाच

किमर्थमागता भद्रे निर्जनं त्वं महीधरम् ।

कस्य वा तनया किं वा भवत्यापि चिकीर्षितम् ॥ ५०

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं वद गुह्यं न चेद्भवेत् ।

वदनं पूर्णचन्द्राभं निष्चेष्टं वा कथं तव ॥ ५१

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।

दृष्ट्वा च तं महात्मानं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ ५२

शरीरधृग्ब्रह्मचर्यं विलसन्तं जटाधरम् ।

सादरं प्रणिपत्याथ संध्योवाच तपोधनम् ॥५३

संध्योवाच

यदर्थमागता शैलं सिद्धं तन्मे निबोध ह ।

तव दर्शनमात्रेण यन्मे सेत्स्यति वै विभो ॥ ५४

तपश्चर्तुमहं ब्रह्मन्निर्जनं शैलमागता ।

ब्रह्मणोऽहं सुता ' जाता नाम्ना संध्येति विश्रुता ॥ ५५

यदि ते युज्यते सह्यं मां त्वं समुपदेशय ।

एतच्चिकीर्षितं गुह्यं नान्यं किंचन विद्यते ॥ ५६

अज्ञात्वा तपसो भावं तपोवनमुपाश्रिता ।

चिंतया परिशुष्येऽहं वेपते हि मनो मम ॥ ५७

ब्रह्मोवाच

आकर्ण्य तस्या वचनं वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ।

स्वयं च सर्वकृत्यज्ञो नान्यत्किंचन पृष्टवान् ॥ ५८

अथ तां नियतात्मानं तपसेति धृतोद्यमाम् ।

प्रोवाच मनसा स्मृत्वा शंकरं भक्तवत्सलम् ॥ ५ ९

वसिष्ठ उवाच

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।

परमः परमाराध्यः शम्भुर्मनसि धार्यताम् ॥ ६०

नदी चन्द्रभाग पर्वतके विशाल पश्चिमीभागको तोड़कर समुद्रकी ओर उसी प्रकार जा रही थी, जैसे हिमालयसे गंगा समुद्रमें जाती है ॥ ४७-४८ ॥ उस चन्द्रभाग पर्वतपर बृहल्लोहित सरोवरके तटपर स्थित सन्ध्याको देखकर वसिष्ठजी आदरपूर्वक उससे पूछने लगे— ॥ ४ ९ ॥ वसिष्ठजी बोले- हे भद्रे! इस निर्जन पर्वतपर तुम किसलिये आयी हो, तुम किसकी कन्या हो और यहाँ क्या करना चाहती हो? पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो गया है? यदि कोई गोपनीय बात न हो, तो बताओ, मुझे सुननेकी इच्छा है ॥ ५०-५१ ॥ ब्रह्माजी बोले- - उन महात्मा वसिष्ठकी बात सुनकर उन्हें महात्मा, प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी, ब्रह्मचारी तथा जटाधारी देखकर और आदरपूर्वक प्रणामकर सन्ध्या उन तपोधन वसिष्ठसे कहने लगी-॥ ५२-५३ ॥ सन्ध्या बोली - हे विभो! मैं जिस उद्देश्यसे इस सिद्धपर्वतपर आयी हूँ, वह तो आपके दर्शनमात्रसे ही पूर्ण हो जायगा ॥५४ ॥

हे ब्रह्मन्! मैं तप करनेके लिये इस निर्जन पर्वतपर आयी हूँ, मैं ब्रह्माकी पुत्री हूँ और सन्ध्या नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥५५ ॥

यदि आपको उचित जान पड़े, तो मुझे उपदेश कीजिये । मैं तपस्या करना चाहती हूँ, अन्य कुछ भी गोपनीय नहीं है ॥५६ ॥

मैं तपस्याकी कोई विधि बिना जाने ही तपोवनमें आ गयी हूँ । इसी चिन्तासे मैं सूखती जा रही हूँ तथा मेरा हृदय काँप रहा है ॥५७ ॥

ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मज्ञानी वसिष्ठजीने उसकी बात सुनकर पुनः सन्ध्यासे कुछ नहीं पूछा; क्योंकि वे सभी बातें जानते थे । इसके बाद वे मनमें भक्तवत्सल शंकरजीका स्मरणकर तपस्याके लिये उद्यम करनेवाली तथा मनको वशमें रखनेवाली उस सन्ध्यासे कहने लगे- ॥ ५८-५९ ॥ वसिष्ठजी बोले – [ हे देवि! ] जो महान् तेज: स्वरूप, महान् तप तथा परम आराध्य हैं, उन शम्भुका मनमें ध्यान करो ॥६० ॥

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३२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ धर्मार्थकाममोक्षाणां य एकस्त्वादिकारणम् । जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आदिकारण तमेकं जगतामाद्यं भजस्व पुरुषोत्तमम् ॥ ६१ तथा अद्वैतस्वरूप हैं, उन्हीं संसारके एकमात्र आदिकारण मंत्रेणानेन देवेशं शम्भुं भज शुभानने तेन ते सकलावाप्तिर्भविष्यति न संशयः ॐ नमः शंकरायेति ओमित्यन्तेन सन्ततम् मौनं तपः समारम्भं तन्मे निगदतः शृणु ॥ स्नानं मौनेन कर्तव्यं मौनेन हरपूजनम् द्वयोः पूर्णजलाहारं प्रथमं षष्ठकालयोः

तृतीये षष्ठकाले तु ह्युपवासपरो भवेत् ।

एवं तपःसमाप्तौ वा षष्ठे काले क्रिया भवेत् ॥

एवं मौनतपस्याख्या ब्रह्मचर्यफलप्रदा । सर्वाभीष्टप्रदा देवि सत्यं सत्यं न संशयः

एवं चित्ते समुद्दिश्य कामं चिंतय शंकरम् ।

स ते प्रसन्न इष्टार्थमचिरादेव दास्यति ॥

ब्रह्मोवाच

उपविश्य वसिष्ठोऽथ संध्यायै तपसः क्रियाम् ।

तामाभाष्य यथान्यायं तत्रैवान्तर्दधे मुनिः ॥

पुरुषोत्तमका भजन करो ॥६१ ॥

। हे शुभानने! तुम इस मन्त्रसे देवेश्वर शम्भुका ॥ ६२ भजन करो, उससे तुम्हें समस्त पदार्थोंकी प्राप्ति हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६२ ॥

। ' ॐ नमः शंकराय ॐ ' इस मन्त्रसे मौन ६३ होकर इस प्रकार तपस्याका प्रारम्भ करो, [ विशेष विधि ] तुमको बता रहा हूँ, सुनो ॥६३ ॥

। मौन होकर स्नान तथा मौन होकर सदाशिवकी ॥ ६४ पूजा करनी चाहिये । प्रथम दोनों षष्ठकालोंमें जलका आहारकर तीसरे षष्ठकालमें उपवास करे । इस प्रकार षष्ठकालिक क्रिया तपस्याकी समाप्तिपर्यन्त करनी ६५ चाहिये ॥ ६४-६५ ॥ हे देवि! इसका नाम मौन तपस्या है । इसे ॥ ६६ करनेसे यह ब्रह्मचर्यका फल प्रदान करनेवाली तथा सभी अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है, यह सत्य है, सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६६ ॥

इस प्रकार चित्तमें विचार करके सदाशिवका ६७ गहन चिन्तन करो, [ ऐसा करनेसे ] वे तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर शीघ्र ही अभीष्ट फल प्रदान करेंगे ॥ ६७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार मुनि वसिष्ठ वहाँ बैठकर सन्ध्याको तपस्याकी यथोचित विधि बताकर ६८ । अन्तर्धान हो गये ॥ ६८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे संध्याचरित्रवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सन्ध्याचरित्रवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः सन्ध्याद्वारा तपस्या करना, प्रसन्न हो भगवान् शिवका उसे दर्शन देना, सन्ध्याद्वारा की गयी शिवस्तुति, सन्ध्याको अनेक वरोंकी प्राप्ति तथा महर्षि मेधातिथिके यज्ञमें जानेका आदेश प्राप्त होना ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले – हे पुत्रवर! हे महाप्राज्ञ! सुतवर्य महाप्राज्ञ शृणु संध्यातपो महत् । अब सन्ध्याके द्वारा किये गये महान् तपको सुनिये । | जिसके सुननेसे पापसमूह उसी क्षण निश्चय ही यच्छ्रुत्वा नश्य पापसमूहस्तत्क्षणाद् ध्रुवम् ॥ १ नष्ट हो जाता है ॥१ ॥