शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 341–350
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३२ ९
उपदिश्य तपोभावं वसिष्ठे स्वगृहं गते ।
संध्यापि तपसो भावं ज्ञात्वा मोदमवाप ह ॥
ततः सानंदमनसो वेषं कृत्वा तु यादृशम् ।
तपश्चर्तुं समारेभे बृहल्लोहिततीरगा ॥
यथोक्तं तु वसिष्ठेन मंत्रं तपसि साधनम् ।
मंत्रेण तेन सद्भक्त्या पूजयामास शंकरम् ॥
एकान्तमनसस्तस्याः कुर्वन्त्याः सुमहत्तपः ।
शंभौ विन्यस्तचित्ताया गतमेकं चतुर्युगम् ॥
प्रसन्नोऽभूत्तदा शंभुस्तपसा तेन तोषितः ।
अंतर्बहिस्तथाकाशे दर्शयित्वा निजं वपुः ॥
यद्रूपं चिंतयंती सा तेन प्रत्यक्षतां गतः ॥
अथ सा पुरतो दृष्ट्वा मनसा चिंतितं प्रभुम् ।
प्रसन्नवदनं शांतं मुमोदातीव शंकरम् ॥
ससाध्वसमहं वक्ष्ये किं कथं स्तौमि वा हरम् ।
इति चिंतापरा भूत्वा न्यमीलयत चक्षुषी ॥
निमीलिताक्ष्यास्तस्यास्तु प्रविश्य हृदयं हरः ।
दिव्यं ज्ञानं ददौ तस्यै वाचं दिव्ये च चक्षुषी ॥
दिव्यज्ञानं दिव्यचक्षुर्दिव्यां वाचमवाप सा ।
प्रत्यक्षं वीक्ष्य दुर्गेशं तुष्टाव जगतां पतिम् ॥
संध्योवाच निराकारं ज्ञानगम्यं परं य-न्नैव स्थूलं नापि सूक्ष्मं न चोच्चम् । अंतश्चिन्त्यं योगिभिस्तस्य रूपं तस्मै तुभ्यं लोककर्त्रे नमोऽस्तु ॥ सर्वं शांतं निर्मलं निर्विकारं
ज्ञानागम्यं स्वप्रकाशेऽविकारम् ।
खाध्वप्रख्यं ध्वांतमार्गात्परस्ताद्-रूपं यस्य त्वां नमामि प्रसन्नम् ॥
तपस्याका उपदेशकर वसिष्ठजीके अपने घर २ चले जानेपर सन्ध्या भी तपस्याकी विधिको जानकर अत्यन्त हर्षित हो गयी ॥ २ ॥
वह बृहल्लोहितसरके सन्निकट प्रसन्नचित्त होकर ३ अनुकूल वेष धारण करके तपस्या करने लगी ॥३ ॥
वसिष्ठजीने तपस्याके साधनभूत जिस मन्त्रको ४ बताया था, उस मन्त्रसे वह शंकरजीका पूजन करने लगी ॥४ ॥
इस प्रकार सदाशिवमें चित्त लगाकर एकाग्र ५ मनसे घोर तपस्या करती हुई उस सन्ध्याका एक चतुर्युग बीत गया ॥ ५ ॥
उसके पश्चात् उस तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवजी उसके ऊपर प्रसन्न हो गये और बाहर - भीतर तथा आकाशमें उसे अपना विग्रह दिखाकर, वह ७ [ शिवजीके ] जिस रूपका ध्यान करती थी, उसी रूपसे उसके समक्ष प्रकट हो गये ॥ ६-७ ॥ सन्ध्या अपने मनमें चिन्तित, प्रसन्नमुख तथा ८ शान्तस्वरूप भगवान् शिवको सामने देखकर बहुत प्रसन्न हुई ॥८ ॥
मैं शिवजीसे क्या कहूँ तथा किस प्रकार इनकी ९ स्तुति करूँ - इस प्रकार चिन्तित होकर सन्ध्याने भयपूर्वक अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया । तब नेत्र बन्द की हुई उस सन्ध्याके हृदयमें प्रविष्ट होकर शिवजीने १० उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य वाणी और दिव्य चक्षु प्रदान किये॥९ -१० ॥ इस प्रकार उसने दिव्य ज्ञान, दिव्य चक्षु, ११ दिव्य वाणी प्राप्त की और जगत्पति दुर्गेशको प्रत्यक्ष खड़ा देखकर वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगी - ॥ ११ ॥
सन्ध्या बोली - जिनका रूप निराकार, ज्ञानगम्य तथा पर है; जो न स्थूल, न सूक्ष्म, न उच्च ही है तथा जो योगियोंके द्वारा अन्तःकरणसे चिन्त्य है, ऐसे १२ रूपवाले लोककर्ता आपको नमस्कार है ॥१२ ॥
जिनका रूप सर्वस्वरूप, शान्त, निर्मल, निर्विकार, ज्ञानसे परे, अपने प्रकाशमें स्थित, विकाररहित, आकाशमार्गस्वरूप एवं अन्धकारमार्गसे परे तथा प्रसन्न १३ रहनेवाला है, ऐसे आपको नमस्कार है । जिनका रूप
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३३० एकं शुद्धं दीप्यमानं विनाजां चिदानंद सहजं चाविकारि नित्यानंद सत्यभूतिप्रसन्नं यस्य श्रीदं रूपमस्मै नमस्ते विद्याकारोद्भावनीयं प्रभिन्नं सत्त्वच्छंदं ध्येयमात्मस्वरूपम् । सारं पारं पावनानां पवित्रं तस्मै रूपं यस्य चैवं नमस्ते यत्त्वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञं रत्नाकल्पं स्वच्छकर्पूरगौरम् । इष्टाभीती शूलमुंड दधानं हस्तैर्नमो योगयुक्ताय तुभ्यम् ॥
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च ।
पुनः कालश्च रूपाणि यस्य तुभ्यं नमोऽस्तु ते ॥
प्रधानपुरुषौ यस्य कायत्वेन विनिर्गतौ । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ | एक ( अद्वितीय ), शुद्ध, देदीप्यमान, मायारहित, चिदानन्द । । सहज, विकाररहित, नित्यानन्दस्वरूप, सत्य और विभूतिसे, युक्त, प्रसन्न रहनेवाला तथा समस्त श्रीको प्रदान करनेवाला ॥ १४ है, उन आपको नमस्कार है ॥ १३-१४ ॥ जिनका रूप महाविद्याके द्वारा ध्यान करनेयोग्य, सबसे सर्वथा भिन्न, परम सात्त्विक, ध्येयस्वरूप, आत्मस्वरूप, सारस्वरूप, संसारसागरसे पार करनेवाला है और पवित्रको भी पवित्र करनेवाला है, उन आपको ॥ १५ नमस्कार है ॥१५ ॥
जिनका आकार शुद्धरूप, मनोज्ञ, रत्नके समान, स्वच्छ, कर्पूरके समान गौरवर्ण और हाथोंमें वर-अभयमुद्रा, शूल - मुण्डको धारण करनेवाला है, उन १६ आप योगयुक्त [ सदाशिव ] -को नमस्कार है ॥१६ ॥
आकाश, पृथिवी, दिशाएँ, जल, ज्योति और काल १७ जिनके स्वरूप हैं, ऐसे आपको नमस्कार है ॥ १७ ॥
जिनके शरीरसे प्रधान एवं पुरुषकी उत्पत्ति तस्मादव्यक्तरूपाय शंकराय नमो नमः ॥ १८ हुई है, उन अव्यक्तस्वरूप आप शंकरको बार - बार
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णुः कुरुते स्थितिम् ।
संहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः ॥
नमो नमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय समस्तलोकांतरभूतिदाय प्रकाशरूपाय परात्पराय ॥ यस्यापरं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिर्दिशः सूर्य इंदुर्मनोजः । बहिर्मुखा नाभितश्चान्तरिक्षं तस्मै तुभ्यं शंभवे मे नमोऽस्तु ॥
त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः ।
सद्ब्रह्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः ॥
यस्य नादिर्न मध्यं च नान्तमस्ति जगद्यतः ।
कथं स्तोष्यामि तं देवं वाङ्मनोऽगोचरं हरम् ॥
नमस्कार है ॥१८ ॥
जो ब्रह्मारूप होकर [ इस जगत्की ] सृष्टि करते १ ९ हैं, विष्णुरूप होकर पालन करते हैं तथा रुद्ररूप होकर संहार करते हैं, उन आपको बार - बार नमस्कार है ॥ १ ९ ॥ कारणोंके कारण, दिव्य अमृतस्वरूप ज्ञानसम्पदा देनेवाले, समस्त लोकोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, प्रकाशस्वरूप २० नमस्कार है ॥ जिनके जिनके पैरसे तथा बहिर्मुख २१ उत्पन्न हुआ है, हे हर! | विविध विद्या २२ हैं ॥ २२ ॥
जिनका तथा परात्पर [ शंकर ] -को बार - बार २० ॥ अतिरिक्त यह जगत् और कुछ नहीं है । पृथिवी, दिशाएँ, सूर्य, चन्द्रमा, कामदेव ( अन्य देवता ) और नाभिसे अन्तरिक्ष उन आप शम्भुको मेरा नमस्कार है ॥ २१ ॥
आप सर्वश्रेष्ठ तथा परमात्मा हैं, आप है, सद्ब्रह्म, परब्रह्म तथा ज्ञानपरायण न आदि है, न मध्य है तथा न अन्त | है और जिनसे यह समस्त संसार उत्पन्न हुआ है, | वाणी, तथा मनसे अगोचर उन सदाशिवकी स्तुति २३ । किस प्रकार करूँ? ॥ २३ ॥
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३३१
यस्य ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः ।
न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीयः कथं स मे ॥
स्त्रिया मया ते किं ज्ञेया निर्गुणस्य गुणाः प्रभो ।
नैव जानन्ति यद्रूपं सेन्द्रा अपि सुरासुराः ॥
नमस्तुभ्यं महेशान नमस्तुभ्यं तपोमय ।
प्रसीद शंभो देवेश भूयो भूयो नमोऽस्तु ते ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः संस्तुतः परमेश्वरः ।
सुप्रसन्नतरश्चाभूच्छंकरो भक्तवत्सलः ॥
अथ तस्याः शरीरं तु वल्कलाजिनसंयुतम् ।
परिच्छन्नं जटाव्रातैः पवित्रे मूर्ध्नि राजितैः ॥
हिमानीतर्जिताम्भोजसदृशं वदनं
वदनं तदा ।
निरीक्ष्य कृपयाविष्टो हरः प्रोवाच तामिदम् ॥
महेश्वर उवाच
प्रीतोऽस्मि तपसा भद्रे भवत्याः परमेण वै ।
स्तवेन च शुभप्राज्ञे वरं वरय सांप्रतम् ॥
येन ते विद्यते कार्यं वरेणास्मिन्मनोगतम् ।
तत्करिष्ये च भद्रं ते प्रसन्नोऽहं तव व्रतैः ॥
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा महेशस्य प्रसन्नमनसस्तदा ।
संध्योवाच सुप्रसन्ना प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ॥
सन्ध्योवाच
यदि देयो वरः प्रीत्या वरयोग्यास्म्यहं यदि ।
यदि शुद्धास्म्यहं जाता तस्मात्पापान्महेश्वर ॥
यदि देव प्रसन्नोऽसि तपसा मम साम्प्रतम् ।
वृतस्तदायं प्रथमं वरो मम विधीयताम् ॥
उत्पन्नमात्रा देवेश प्राणिनोऽस्मिन् भुवस्थले । न भवन्तु समेनैव सकामाः संभवन्तु वै यद्धि वृत्ता हि लोकेषु त्रिष्वपि प्रथिता यथा भविष्यामि तथा नान्या वर एको वृतो मया ब्रह्मा आदि देवगण तथा तपोधन महर्षि भी २४ जिनके रूपोंका वर्णन नहीं कर पाते हैं, उनका वर्णन मैं किस प्रकार कर सकती हूँ? ॥२४ ॥
हे प्रभो! इन्द्रसहित समस्त देवगण तथा २५ सभी असुर भी जब आपके रूपको नहीं जानते, तो आप - जैसे निर्गुणके गुणोंको मेरे जैसी स्त्री किस प्रकार जान सकती है ॥ २५ ॥
हे महेशान! आपको नमस्कार है । हे तपोमय! २६ आपको नमस्कार है । हे शम्भो! हे देवेश! आपको बार-बार नमस्कार है, आप [ मेरे ऊपर ] प्रसन्न होइये ॥ २६ ॥
ब्रह्माजी बोले- सन्ध्याके द्वारा स्तुत भक्तवत्सल परमेश्वर सदाशिव उसके वचनको सुनकर परम २७ प्रसन्न हो गये ॥ २७ ॥
वे शिव वल्कल तथा कृष्णमृगचर्मयुक्त उसके शरीरको, जटासे आच्छन्न एवं पवित्री धारण किये २८ हुए उसके सिरको तथा तुषारपातसे मुरझाये हुए कमलके समान उसके मुखको देखकर दयामय होकर २ ९ उससे इस प्रकार कहने लगे— ॥ २८-२९ ॥ महेश्वर बोले - हे भद्रे! तुम्हारी इस उत्कृष्ट
तपस्यासे तथा तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।
३० हे शुभप्राज्ञे! अब तुम वर माँगो ॥३० ॥
जो भी तुम्हारा अभीष्ट हो तथा जिससे तुम्हारा ३१ कार्य पूर्ण हो, वह सब मैं करूँगा । हे भद्रे! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ ॥३१ ॥
ब्रह्माजी बोले- महेश्वरका वचन सुनकर सन्ध्या बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें बार - बार प्रणामकर इस ३२ प्रकार कहने लगी —॥३२ ॥
सन्ध्या बोली— हे महेश्वर! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक वर देना चाहते हैं, यदि मैं आपसे वर ३३ प्राप्त करनेयोग्य हूँ तथा यदि मैं उस पापसे सर्वथा विशुद्ध हो गयी हूँ और हे देव! यदि आप इस समय मेरे तपसे प्रसन्न हैं, तो पहले मैं यह वर माँगती हूँ, ३४ उसे दीजिये । हे देवाधिदेव! इस आकाश तथा पृथिवीमें उत्पन्न होते ही कोई भी प्राणी सद्यः ॥ ३५ कामयुक्त न हो । हे प्रभो! मैं अपने आचरणसे तीनों । लोकोंमें इस प्रकार प्रसिद्ध होऊँ, जैसी और कोई ॥ ३६ । दूसरी स्त्री न हो, एक और वर माँगती हूँ । मेरे द्वारा
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३३२ सकामा मम सृष्टिस्तु कुत्रचिन्न पतिष्यति यो मे पतिर्भवेन्नाथ सोऽपि मेऽतिसुहृच्च वै यो द्रक्ष्यति सकामो मां पुरुषस्तस्य पौरुषम् गमिष्यति तदा नाशं स च क्लीबो भविष्यति ब्रह्मोवाच इति श्रुत्वा वचस्तस्याः शंकरो भक्तवत्सलः । उवाच सुप्रसन्नात्मा निष्पापायास्तयेरिते महेश्वर उवाच शृणु देवि च संध्ये त्वं त्वत्पापं भस्मतां गतम् त्वयि त्यक्तो मया क्रोधः शुद्धा जाता तपः करात् ॥
यद्यद्वृतं त्वया भद्रे दत्तं तदखिलं मया ।
सुप्रसन्नेन तपसा तव संध्ये वरेण हि ॥
प्रथमं शैशवो भावः कौमाराख्यो द्वितीयकः ।
तृतीयो यौवनो भावश्चतुर्थो वार्धकस्तथा ॥
तृतीये त्वथ संप्राप्ते वयोभागे शरीरिणः ।
सकामाः स्युर्द्वितीयान्ते भविष्यति क्वचित् क्वचित् ॥
तपसा तव मर्यादा जगति स्थापिता मया ।
उत्पन्नमात्रा न यथा सकामाः स्युः शरीरिणः ॥
त्वं च लोके सतीभावं तादृशं समवाप्नुहि ।
त्रिषु लोकेषु नान्यस्या यादृशं संभविष्यति ॥
यः पश्यति सकामस्त्वां पाणिग्राहमृते तव ।
स सद्यः क्लीबतां प्राप्य दुर्बलत्वं गमिष्यति ॥
पतिस्तव महाभागस्तपोरूपसमन्वितः ।
सप्तकल्पांतजीवी च भविष्यति सह त्वया ॥
इति ते ये वरा मत्तः प्रार्थितास्ते कृता मया ।
अन्यच्च ते वदिष्यामि पूर्वजन्मनि संस्थितम् ॥
अग्नौ शरीरत्यागस्ते पूर्वमेव प्रतिश्रुतः ।
तदुपायं वदामि त्वां तत्कुरुष्व न संशयः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । । उत्पन्न की गयी कोई भी सन्तति सकाम होकर पतित ॥ ३७ न हो और हे नाथ! जो मेरा पति हो, वह भी मेरा अत्यन्त सुहृद् बना रहे । [ मेरे पतिके अतिरिक्त ] जो । कोई भी पुरुष मुझे सकाम दृष्टिसे देखे, उसका पौरुष ॥ ३८ नष्ट हो जाय और वह नपुंसक हो जाय ॥ ३३ - ३८ ॥ ब्रह्माजी बोले – निष्पाप सन्ध्याके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर तथा उससे प्रेरित होकर ॥ ३ ९ भक्तवत्सल भूतभावन शंकर प्रसन्नचित्त होकर कहने लगे —॥३ ९ ॥ महेश्वर बोले - – हे देवि! हे सन्ध्ये! मेरी बात । सुनो । तुम्हारा पाप नष्ट हो गया, अब मेरा क्रोध ४० तुम्हारे ऊपर नहीं है और तुम तप करनेसे शुद्ध हो चुकी हो । हे भद्रे! हे सन्ध्ये! तुमने जो - जो वरदान माँगा है, तुम्हारी श्रेष्ठ तपस्यासे परम प्रसन्न होकर ४१ मैंने वह सब तुम्हें प्रदान कर दिया ॥ ४०-४१ ॥ अब प्राणियोंका प्रथम शैशव ( बाल ) - भाव, ४२ दूसरा कौमार भाव, तीसरा यौवन भाव तथा चौथा वार्धक्य भाव होगा ॥ ४२ ॥
शरीरधारी तीसरी अवस्था आनेपर सकाम होंगे और ४३ कोई - कोई प्राणी दूसरीके अन्ततक सकाम होंगे ॥ ४३ ॥
मैंने तुम्हारी तपस्यासे संसारमें यह मर्यादा ४४ स्थापित कर दी कि शरीरधारी उत्पन्न होते ही सकाम नहीं होंगे ॥४४ ॥
तुम इस लोकमें ऐसा सतीभाव प्राप्त करोगी, ४५ जैसा तीनों लोकोंमें किसी अन्य स्त्रीका नहीं होगा ॥ ४५ ॥
तुम्हारे पतिके अतिरिक्त जो तुमको सकाम ४६ दृष्टिसे देखेगा, वह तत्काल नपुंसक होकर दुर्बल हो जायगा ॥ ४६ ॥
तुम्हारा पति महान् भाग्यशाली, तपस्वी तथा ४७ रूपवान् होगा । वह तुम्हारे साथ सात कल्पोंतक जीवित रहेगा ॥४७ ॥।
इस प्रकार तुमने जो - जो वर मुझसे माँगा, उन ४८ सभी वरोंको मैंने प्रदान किया । अब मैं तुम्हारे जन्मान्तरकी कुछ बातें कहूँगा ॥४८ ॥
तुम अग्निमें अपने शरीरत्याग करनेकी प्रतिज्ञा पहले ही कर चुकी हो, अत: उसका उपाय मैं तुमको ४ ९ बता रहा हूँ, उसे निश्चित रूपसे करो ॥४ ९ ॥
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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३३३
स च मेधातिथेर्यज्ञे मुनेर्द्वादशवार्षिके ।
कृत्स्नप्रज्वलिते वह्नावचिरात् क्रियतां त्वया ॥ ५०
एतच्छैलोपत्यकायां चन्द्रभागानदीतटे ।
मेधातिथिर्महायज्ञं कुरुते तापसाश्रमे ॥५१
तत्र गत्वा स्वयं छंदं मुनिभिर्नोपलक्षिता ।
मत्प्रसादाद्वह्निजाता तस्य पुत्री भविष्यति ॥ ५२
|
यस्ते वरो वाञ्छनीयः स्वामी मनसि कश्चन ।
तं निधाय निजस्वान्ते त्यज वह्नौ वपुः स्वकम् ॥ ५३
यदा त्वं दारुणं संध्ये तपश्चरसि पर्वते ।
यावच्चतुर्युगं तस्य व्यतीते तु कृते युगे ॥ ५४
त्रेतायाः प्रथमे भागे जाता दक्षस्य कन्यकाः ।
यास्ताः शीलसमापन्ना यथायोग्यं विवाहिताः ॥ ५५
तन्मध्ये स ददौ कन्या विधवे सप्तविंशतिः ।
चन्द्रोऽन्याः सम्परित्यज्य रोहिण्यां प्रीतिमानभूत् ॥ ५६
तद्धेतोर्हि यदा चन्द्रः शप्तो दक्षेण कोपिना ।
तदा भवत्या निकटे सर्वे देवाः समागताः ॥ ५७
न दृष्टाश्च त्वया संध्ये ते देवा ब्रह्मणा सह ।
मयि विन्यस्तमनसा खं च दृष्ट्वा लभेत्पुनः ॥ ५८
चंद्रस्य शापमोक्षार्थं जाता चंद्रनदी तदा ।
सृष्टा धात्रा तदैवात्र मेधातिथिरुपस्थितः ॥ ५ ९
तपसा तत्समो नास्ति न भूतो न भविष्यति ।
येन यज्ञः समारब्धो ज्योतिष्टोमो महाविधिः ॥ ६०
तत्र प्रज्वलितो वह्निस्तस्मिन्त्यज वपुः स्वकम् ।
इदानीं सुपवित्रा त्वं संपूर्णोऽस्तु पणस्तव ॥ ६१
वह उपाय यही है कि तुम महर्षि मेधातिथिके बारह वर्षतक चलनेवाले यज्ञमें प्रचण्डरूपसे जलती हुई अग्निमें शीघ्रतासे प्रवेश करो ॥५० ॥
इस समय मेधातिथि इसी पर्वतकी तलहटीमें चन्द्रभागा नदीके तटपर तपस्वियोंके आश्रममें महान् यज्ञ कर रहे हैं ॥ ५१ ॥
वहाँ तुम अपनी इच्छासे जाकर मेरे प्रसादसे मुनियोंसे अलक्षित रहती हुई अग्निमें प्रवेश कर जाओ, फिर तुम यज्ञाग्निसे प्रकट होकर मेधातिथिकी पुत्री बनोगी ॥ ५२ ॥
तुम्हारे मनमें जो कोई भी श्रेष्ठ पतिके रूपमें वांछनीय हो, उसे अपने अन्तःकरणमें रखकर अग्निमें अपना शरीर छोड़ना ॥ ५३ ॥
हे सन्ध्ये! तुम इस पर्वतपर चारयुगसे घोर तपस्या कर रही हो, कृतयुगके बीत जानेपर और त्रेताका प्रथम भाग आनेपर दक्षकी जो शीलसम्पन्न कन्याएँ उत्पन्न हुईं, वे यथायोग्य विवाहित हुईं, उनमेंसे उन्होंने सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको [ विवाह-विधिद्वारा ] प्रदान कीं, किंतु चन्द्रमा उन सभीको छोड़कर रोहिणीमें प्रीति करने लगा॥५४–५६ ॥ इस कारण जब दक्षने क्रोधसे चन्द्रमाको शाप दे दिया, तब सभी देवता तुम्हारे पास आये थे ॥५७ ॥
हे सन्ध्ये! उस समय तुम मेरा ध्यान कर रही थी, इसलिये वे देवगण जो ब्रह्माजीके साथ आये हुए थे, तुमने उनकी तरफ देखा नहीं; क्योंकि तुम आकाशकी ओर देख रही थी, अब तुमने मेरा दर्शन प्राप्त कर लिया है ॥ ५८ ॥
तब ब्रह्माजीने चन्द्रमाके शापको दूर करनेके लिये इस चन्द्रभागा नदीका निर्माण किया है, उसी समय यहाँ मेधातिथि उपस्थित हुए थे ॥ ५ ९ ॥ तपस्यामें उनके समान न तो कोई है, न कोई होनेवाला है और न कोई हुआ है । उन्होंने ही इस चन्द्रभागा नदीके तटपर विधिपूर्वक ज्योतिष्टोम यज्ञका आरम्भ किया है ॥ ६० ॥
वहाँ अग्नि प्रज्वलित हो रही है, उसीमें अपने शरीरको छोड़ो । इस समय तुम अत्यन्त पवित्र हो, । तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो ॥६१ ॥
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३३४ एतन्मया स्थापितं स्वकार्यार्थं भो तपस्विनि तत्कुरुष्व महाभागे याहि यज्ञे महामुनेः कृत्वा हितं च देवेशस्तत्रैवान्तरधीयत इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ । हे तपस्विनि! अपने कार्यकी सिद्धिके लिये मैंने । यह विधि बतायी है । अतः हे महाभागे! तुम यहाँ । मुनिके यज्ञमें जाओ और इसे करो । इस प्रकार वे । ६२ । देवेश उसका हित करके वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ६२ ॥
द्वितीये सतीखण्डे संध्याचरित्रवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सन्ध्याचरित्रवर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः महर्षि मेधातिथिकी यज्ञाग्निमें सन्ध्याद्वारा शरीरत्याग, पुनः अरुन्धतीके रूपमें यज्ञाग्निसे उत्पत्ति एवं ब्रह्मोवाच वरं दत्त्वा मुने तस्मिन् शंभावन्तर्हिते तदा संध्याप्यगच्छत्तत्रैव यत्र मेधातिथिर्मुनिः तत्र शंभोः प्रसादेन न केनाप्युपलक्षिता सस्मार वर्णिनं तं वै स्वोपदेशकरं तपः वसिष्ठेन पुरा सा तु वर्णीभूत्वा महामुने । उपदिष्टा तपश्चर्तुं वचनात्परमेष्ठिनः
तमेव कृत्वा मनसा तपश्चर्योपदेशकम् ।
पतित्वेन तदा संध्या ब्राह्मणं ब्रह्मचारिणम् ॥
समिद्धेऽग्नौ महायज्ञे मुनिभिर्नोपलक्षिता ।
हृष्टा शंभुप्रसादेन सा विवेश विधेः सुता ॥
तस्याः पुरोडाशमयं शरीरं तत्क्षणात्ततः ।
दग्धं हव्यमयं गन्धं तस्तार यदलक्षितम् ॥
वह्निस्तस्याः शरीरं तु दग्ध्वा सूर्यस्य मंडलम् ।
शुद्धं प्रवेशयामास शंभोरेवाज्ञया पुनः ॥
सूर्यो द्व्यर्थं विभज्याथ तच्छरीरं तदा रथे ।
स्वके संस्थापयामास प्रीतये पितृदेवयोः ॥
तदूर्ध्वभागस्तस्यास्तु शरीरस्य मुनीश्वर ।
प्रातःसंध्याभवत्सा तु अहोरात्रादिमध्यगा ॥
वसिष्ठमुनिके साथ उसका विवाह ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार भगवान् सदाशिव । जब सन्ध्याको वर प्रदानकर अन्तर्धान हो गये, तब ॥ १ सन्ध्या वहाँ गयी, जहाँ महर्षि मेधातिथि थे ॥१ ॥
। वहाँपर भगवान् सदाशिवकी कृपासे उसे किसीने ॥ २ नहीं देखा । उसने उस समय तपस्याके विषयमें । उपदेश करनेवाले उन ब्रह्मचारीका स्मरण किया ॥२ ॥
हे महामुने! वे ब्रह्मचारी वसिष्ठ मुनि ही थे, जो ॥ ३ ब्रह्माजीकी आज्ञासे ब्रह्मचारीका रूप धारणकर सन्ध्याको तपस्याके सम्बन्धमें उपदेश करने आये थे ॥३ ॥
तपश्चर्याका उपदेश करनेवाले उन्हीं ब्रह्मचारी ४ ब्राह्मण [ वसिष्ठ ] -का पतिरूपसे स्मरण करके वह ब्रह्मपुत्री सन्ध्या प्रसन्नमनसे सदाशिवकी कृपासे मुनियोंद्वारा अलक्षित हो उस महायज्ञकी प्रज्वलित ५ अग्निमें प्रवेश कर गयी॥४-५ ॥ उसका समस्त शरीर पुरोडाशके समान तत्क्षण ६ ही जलकर राख हो गया, जिससे अलक्षित रूपसे पुरोडाशका गन्ध चारों ओर फैल गया ॥६ ॥
पुनः सदाशिवकी आज्ञासे अग्निने उसके शुद्ध ७ शरीरको भस्मकर सूर्यमण्डलमें प्रविष्ट करा दिया ॥७ ॥
तदनन्तर सूर्यने उसके शरीरको दो भागों में ८ विभक्तकर पितरों एवं देवताओंकी प्रसन्नताके लिये अपने रथमें स्थापित कर लिया ॥ ८ ॥
हे मुनीश्वर! उसके शरीरका जो ऊपरका | भाग था, वही रात्रि तथा दिनके बीचमें होनेवाली ९ प्रातः सन्ध्या हुई ॥ ९ ॥
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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३३५
तच्छेषभागस्तस्यास्तु अहोरात्रान्तमध्यगा ।
सा सायमभवत्संध्या पितृप्रीतिप्रदा सदा ॥ १०
सूर्योदयात्तु प्रथमं यदा स्यादरुणोदयः ।
प्रातः संध्या तदोदेति देवानां प्रीतिकारिणी ॥। ११
|
अस्तं गते ततः सूर्ये शोणपद्मनिभे सदा ।
उदेति सायंसंध्यापि पितॄणां मोदकारिणी ॥ १२
तस्याः प्राणास्तु मनसा शंभुनाथ दयालुना ।
दिव्येन तु शरीरेण चक्रिरे हि शरीरिणः ॥ १३
मुनेर्यज्ञावसाने तु संप्राप्ते मुनिना तु सा ।
प्राप्ता पुत्री वह्निमध्ये तप्तकाञ्चनसुप्रभा ॥ १४
तां जग्राह तदा पुत्रीं मुनिरामोदसंयुतः ।
यज्ञार्थं तां तु संस्नाप्य निजक्रोडे दधौ मुने ॥ १५
अरुन्धतीति तस्यास्तु नाम चक्रे महामुनिः ।
शिष्यैः परिवृतस्तत्र महामोदमवाप ह ॥ १६
न रुणद्धि यतो धर्मं सा कस्मादपि कारणात् ।
अतस्त्रिलोके विदितं नाम संप्राप तत्स्वयम् ॥ १७
यज्ञं समाप्य स मुनिः कृतकृत्यभाव-मासाद्य सम्मदयुतस्तनयाप्रलंभात् ।
तस्मिन्निजाश्रमपदे सह शिष्यवर्गै-स्तामेव संततमसौ दयते सुरर्षे ॥ १८
अथ सा ववृधे देवी तस्मिन्मुनिवराश्रमे ।
चन्द्रभागानदीतीरे तापसारण्यसंज्ञके ॥ १ ९
संप्राप्ते पञ्चमे वर्षे चन्द्रभागां तदा गुणैः ।
तापसारण्यमपि सा पवित्रमकरोत्सती ॥ २०
विवाहं कारयामासुस्तस्या ब्रह्मसुतेन वै ।
वसिष्ठेन ह्यरुन्धत्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ २१
जो उसके शरीरका शेष भाग था, वही दिन तथा रात्रिके बीचमें होनेवाली सायंसन्ध्या हुई, जो सदैव ही पितरोंकी प्रसन्नताका कारण होती है ॥ १० ॥
सूर्योदयके पहले जब अरुणोदय होता है, तब देवताओंको प्रसन्न करनेवाली प्रातःसन्ध्याका उदय होता है ॥११ ॥
जब लाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाता है, तब पितरोंको प्रसन्न करनेवाली सायंसन्ध्याका उदय होता है ॥१२ ॥।
उसके मनसहित प्राणको परम दयालु शिवने शरीरधारियोंके दिव्य शरीरसे निर्मित किया था ॥ १३ ॥
जब मेधातिथिका यज्ञ समाप्त हो रहा था, तब उन्हें देदीप्यमान सुवर्णके समान कान्तिवाली वह कन्या यज्ञाग्निमें प्राप्त हुई ॥१४ ॥
हे मुने! महामुनि मेधातिथिने यज्ञसे प्राप्त हुई उस कन्याको बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण किया और उसे स्नान कराकर अपनी गोदमें बिठाया ॥ १५ ॥
उन्होंने उसका नाम अरुन्धती रखा । [ उस कन्याको प्राप्तकर ] वे शिष्योंके साथ बड़े ही हर्षित हुए ॥ १६ ॥
उसने किसी भी कारणके उपस्थित होनेपर अपने पातिव्रत्यधर्मका परित्याग नहीं किया, इसलिये त्रिलोकीमें उसने स्वयं यह प्रसिद्ध [ अरुन्धती ] नाम धारण किया ॥१७ ॥
[ ब्रह्माजी बोले- ] हे सुरर्षे! यज्ञ समाप्त करनेके उपरान्त वे मुनि कन्यारूप सम्पत्तिसे युक्त हो अपने शिष्योंसहित अत्यन्त कृतकृत्य होकर अपने उस आश्रममें उसका लालन - पालन करने लगे ॥१८ ॥
उसके बाद वह कन्या चन्द्रभागा नदीके तटपर श्रेष्ठ मुनिके तापसारण्य नामक आश्रममें बढ़ने लगी ॥ १ ९ ॥ वह सती पाँच वर्षकी अवस्थामें अपने गुणोंसे चन्द्रभागा नदी तथा तापसारण्यको पवित्र करने लगी ॥ २० ॥
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशने ब्रह्मपुत्र वसिष्ठके । साथ उस अरुन्धतीका विवाह करवाया ॥२१ ॥
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३३६ तद्विवाहे महोत्साहो बभूव सुखवर्धनः सर्वे सुराश्च मुनयः सुखमापुः परं मुने ब्रह्मविष्णुमहेशानां करनिस्सृततोयतः सप्तनद्यः समुत्पन्नाः शिप्राद्याः सुपवित्रकाः
अरुन्धती महासाध्वी साध्वीनां प्रवरोत्तमा ।
वसिष्ठं प्राप्य संरेजे मेधातिथिसुता मुने ॥
यस्याः पुत्राः समुत्पन्नाः श्रेष्ठाः शक्त्यादयः शुभाः ।
वसिष्ठं प्राप्य तं कान्तं संरेजे मुनिसत्तम ॥
एवं संध्याचरित्रं ते कथितं मुनिसत्तम ।
पवित्रं परमं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥
य इदं शृणुयान्नारी पुरुषो वा शुभव्रतः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत वसिष्ठके विवाहका वर्णन श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । हे मुने! उसके विवाहमें सुखदायक ॥ २२ उत्सव हुआ, जिससे सभी देवता तथा मुनिगण महान् अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २२ ॥
। [ उस विवाहमें ] ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरके ॥ २३ हाथसे गिरे हुए जलसे शिप्रा आदि सात पवित्र नदियाँ उत्पन्न हुईं ॥२३ ॥
हे मुने! साध्वी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ महासाध्वी २४ वह मेधातिथिकी कन्या अरुन्धती वसिष्ठको [ पतिरूपमें ] प्राप्तकर अत्यन्त शोभित हुई ॥ २४ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! उससे शक्ति आदि श्रेष्ठ तथा २५ सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए । इस प्रकार वसिष्ठको पतिरूपमें प्राप्तकर वह शोभा पाने लगी ॥ २५ ॥
हे मुनिसत्तम! इस प्रकार मैंने सन्ध्याका चरित्र २६ कहा, जो अत्यन्त पवित्र, दिव्य तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाला है ॥ २६ ॥
जो शुभ व्रतवाला पुरुष अथवा नारी इस चरित्रको सुनता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते २७ । हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥२७ ॥
सतीखण्डे अरुन्धतीवसिष्ठविवाहवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें अरुन्धती तथा नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः कामदेवके सहचर सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणो हि प्रजापतेः ।
प्रसन्नमानसो भूत्वा तं प्रोवाच स नारदः ॥
नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाभाग विष्णुशिष्य महामते ।
धन्यस्त्वं शिवभक्तो हि परतत्त्वप्रदर्शकः ॥
श्राविता सुकथा दिव्या शिवभक्तिविवर्धिनी ।
अरुन्धत्यास्तथा तस्याः स्वरूपायाः परे भवे ॥
इदानीं ब्रूहि धर्मज्ञ पवित्रं चरितं परम् ।
शिवस्य परपापघ्नं मङ्गलप्रदमुत्तमम् ॥
वसन्तके आविर्भावका वर्णन सूतजी वचन सुनकर १ लगे -॥१ ॥
नारदजी हे विष्णुशिष्य! २ शिवभक्त आप हे धर्मज्ञ बोले- प्रजापति ब्रह्माजीका यह प्रसन्नचित्त हो नारदजी उनसे कहने बोले — हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग! हे महामते! परतत्त्वके प्रकाशक तथा धन्य हैं ॥२ ॥
! आपने अरुन्धतीकी तथा पूर्वजन्ममें ३ उसकी स्वरूपभूता सन्ध्याकी बड़ी उत्तम दिव्य । कथा सुनायी, जो शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाली है । | अब आप शिवका परम चरित्र जो सम्पूर्ण पापोंका | विनाशक है तथा मंगलको प्रदान करनेवाला है, उसे ४ | सुनाइये ॥ ३-४ ॥
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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३३७
गृहीतदारे कामे च हृष्टे तेषु गतेषु च ।
संध्यायां किं तपस्तप्तुं गतायामभवत्ततः ॥
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ऋषे भावितात्मनः ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥
ब्रह्मोवाच
शृणु नारद विप्रेन्द्र तदेव चरितं शुभम् ।
शिवलीलान्वितं भक्त्या धन्यस्त्वं शिवसेवकः ॥
अहं विमोहितस्तात यदैवान्तर्हितः पुरा ।
अचिन्तयं सदाहं तच्छंभुवाक्यविषार्दितः ॥
चिन्तयित्वा चिरं चित्ते शिवमायाविमोहितः ।
शिवे चेर्ष्यामकार्षं हि तच्छृणुष्व वदामि ते ॥
अथाहमगमं तत्र यत्र दक्षादयः स्थिताः ।
सरतिं मदनं दृष्ट्वा समदोऽहं हि किञ्चन ॥
दक्षमाभाष्य सुप्रीत्या परान्पुत्रांश्च नारद ।
अवोचं वचनं सोऽहं शिवमायाविमोहितः ॥
ब्रह्मोवाच
हे दक्ष हे मरीच्याद्याः सुताः शृणुत मद्वचः ।
श्रुत्वोपायं विधेयं हि मम कष्टापनुत्तये ॥
कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्वा शम्भुरगर्हयत् ।
मां च युष्मान्महायोगी धिक्कारं कृतवान्बहु ॥
तेन दुःखाभितप्तोऽहं लभेऽहं शर्म न क्वचित् ।
यथा गृह्णातु कांतां स स यत्नः कार्य एव हि ॥
यथा गृह्णातु कांतां स सुखी स्यां दुःखवर्जितः ।
दुर्लभः स तु कामो मे परं मन्ये विचारतः ॥
कांताभिलाषमात्रं मे दृष्ट्वा शंभुरगर्हयत् ।
मुनीनां पुरतः कस्मात्स कांतां सङ्ग्रहीष्यति ॥
जब कामने प्रसन्न होकर रतिको प्राप्त कर लिया ५ और ब्रह्मा तथा उनके मानसपुत्र चले गये तथा सन्ध्या तप करने चली गयी, उसके बाद क्या हुआ? ॥ ५ ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञ देवर्षि नारदका वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो ब्रह्माजी यह ६ बात कहने लगे —॥६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! हे विप्रेन्द्र! शिवलीलासे परिपूर्ण अब उस महान् कल्याणकारी ७ शिव - चरित्रको सुनें । आप धन्य हैं; क्योंकि आप शिवजीके भक्त हैं ॥ ७ ॥
हे तात! पहले जब मैं शिवमायासे मोहित होकर ८ अन्तर्धान हो गया, तब शिवके वाक्यरूपी विषसे दुखी हो [ अपने मनमें ] विचार करने लगा ॥८ ॥
शिवमायासे मोहित हुआ मैं बहुत देरतक अपने ९ चित्तमें विचार करके उनसे जिस प्रकार ईर्ष्या करने लगा, उसे आपसे बताता हूँ, सुनिये ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् मैं वहाँ पहुँचा, जहाँ दक्ष आदि स्थित १० थे और वहाँ रतिसहित कामदेवको देखकर मैं कुछ मदमत्त हो गया ॥१० ॥
हे नारद! दक्ष तथा अपने अन्य मानसपुत्रोंसे ११ प्रीतिपूर्वक बातचीत करके शिवमायासे विमोहित मैं इस प्रकार उनसे कहने लगा —॥११ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे दक्ष! हे मरीचि आदि पुत्रो! मेरी बात सुनो और उसे सुनकर मेरे कष्टको १२ दूर करनेका उपाय करो ॥ १२ ॥
स्त्रीके प्रति मेरी अभिलाषा देखकर महायोगी १३ शिवने मेरी निन्दा की और उन्होंने मुझे तथा तुमलोगोंको बहुत फटकारा ॥ १३ ॥
उसके कारण मैं दुःखसे सन्तप्त हूँ और कहीं १४ भी मुझे चैन नहीं मिलता, अत: जिस प्रकार वे भी स्त्रीको ग्रहण करें, वह यत्न करो ॥ १४ ॥
जब वे स्त्रीको स्वीकार करेंगे, तभी हमारा वह १५ दुःख दूर होगा, किंतु विचार करनेपर मैं समझता हूँ कि यह कार्य बड़ा ही कठिन है ॥१५ ॥
जब उन्होंने मुनियोंके समक्ष ही मेरे कान्ता-परिग्रहकी अभिलाषामात्रसे मुझे धिक्कारा, तो वे १६ । स्वयं किस प्रकार स्त्री ग्रहण करेंगे? ॥१६ ॥
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३३८ का वा नारी त्रिलोकेऽस्मिन् या भवेत्तन्मनःस्थिता योगमार्गमवज्ञाय तस्य मोहं करिष्यति मन्मथोऽपि समर्थो नो भविष्यत्यस्य मोहने नितांतयोगी रामाणां नामापि सहते न सः परिग्रहं विना चैव हरेण कथयादिना मध्यमा च भवेत्सृष्टिस्तद्वाचा नान्यवारिता भुवि केचिद्भविष्यन्ति मम वध्या महासुराः वध्याः केचिद्धरेर्नूनं केचिच्छंभोरुपायतः
संसारविमुखे शंभौ तथैकान्तविरागिणि ।
अस्मादृते न कर्मान्यत् करिष्यति न संशयः ॥
इत्युक्त्वा तनयांश्चाहं दक्षादीन् सुनिरीक्ष्य च । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । इस त्रिलोकमें कौन - सी ऐसी स्त्री है, जो उनके ॥ १७ मनमें विराजमान होकर, उन्हें योगमार्गस हटाकर मोहमें डाल सकती है? ॥ १७ ॥
। कामदेव भी इन्हें मोहित करनेमें समर्थ नहीं है; ॥ १८ क्योंकि वे परमयोगी हैं और स्त्रियोंके नामको भी सहन नहीं कर सकते हैं ॥१८ ॥
। जो प्रसंगके द्वारा भी स्त्रीका नाम कदापि नहीं ॥ १ ९ सहन कर सकता तो भला वह वाणीसे स्त्री ग्रहणकर किस प्रकार सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त हो सकता है? ॥ १ ९ ॥ । इस पृथिवीमें बड़े - बड़े देवता भी मायाके ॥ २० बन्धनमें पड़े हुए हैं । जो बचे हुए हैं, वे विष्णुके बन्धनमें बँधे हैं और कुछ देवगण शम्भुके उपायोंसे आबद्ध हैं ॥२० ॥
संसारसे विमुख तथा एकान्तविरागी सदाशिवके २१ अतिरिक्त और कौन है, जो ऐसा दुष्कर कार्य कर सकता है? ॥२१ ॥
इस प्रकार दक्षादि पुत्रोंसे कहकर रतिसहित सरतिं मदनं तत्र सानंदमगदं ततः ॥ २२ कामदेवको वहाँ देखकर मैं आनन्दपूर्वक उनसे कहने ब्रह्मोवाच
मत्पुत्रवर काम त्वं सर्वथा सुखदायकः ।
मद्वचः शृणु सुप्रीत्या स्वपत्न्या पितृवत्सल ॥
अनया सहचारिण्या राजसे त्वं मनोभव ।
एषा च भवता पत्या युक्ता संशोभते भृशम् ॥
यथा स्त्रिया हृषीकेशो हरिणा सा यथा रमा ।
क्षणदा विधुना युक्ता तया युक्तो यथा विधुः ॥
तथैव युवयोः शोभा दांपत्यं च पुरस्कृतम् । अतस्त्वं जगतः केतुर्विश्वकेतुर्भविष्यसि ॥
जगद्धिताय वत्स त्वं मोहयस्व पिनाकिनम् ।
यथाशु सुमनः शंभुः कुर्याद्दारप्रतिग्रहम् ॥
लगा— ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी - मेरे श्रेष्ठ पुत्र हे कामदेव! तुम सभी प्रकारसे सबको सुख देनेवाले हो । हे २३ पितृवत्सल! तुम अपनी पत्नीसहित प्रसन्नतापूर्वक मेरी बात सुनो ॥२३ ॥
हे मनोभव! तुम [ अपनी ] इस सहचारिणी २४ स्त्रीके साथ जिस प्रकार शोभा पा रहे हो और यह भी [ वैसे ही ] तुम्हें पतिरूपमें प्राप्तकर अति शोभित हो रही है ॥२४ ॥
जिस प्रकार महालक्ष्मीसे भगवान् विष्णु तथा २५ विष्णुसे महालक्ष्मी एवं जिस प्रकार रात्रिसे चन्द्रमा एवं चन्द्रमासे रात्रि सुशोभित होती है, उसी प्रकार तुम दोनोंकी शोभा है और तुम्हारा दाम्पत्य भी अलंकृत २६ है । इसलिये तुम इस जगत्को जीतनेवाले विश्वकेतु होओगे ॥ २५-२६ ॥ हे वत्स! तुम संसारके हितके लिये महादेवको | मोहित करो, जिससे प्रसन्न मनवाले शंकर शीघ्र २७ विवाह करें ॥ २७ ॥