श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 351–360

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३३ ९

विजने स्निग्धदेशे तु पर्वतेषु सरःसु च ।

यत्र यत्र प्रयातीशस्तत्र तत्रानया सह ॥

मोहय त्वं यतात्मानं वनिताविमुखं हरम् ।

त्वदृते विद्यते नान्यः कश्चिदस्य विमोहकः ॥

भूते हरे सानुरागे भवतोऽपि मनोभव ।

शापोपशांतिर्भविता तस्मादात्महितं कुरु ॥

सानुरागो वरारोहां यदीच्छति महेश्वरः ।

तदा भवोऽपि योग्यार्यस्त्वां च संतारयिष्यति ॥

तस्माज्जायाद्वितीयस्त्वं यतस्व हरमोहने ।

विश्वस्य भव केतुस्त्वं मोहयित्वा महेश्वरम् ॥

ब्रह्मोवाच

इति श्रुत्वा वचो मे हि जनकस्य जगत्प्रभोः ।

उवाच मन्मथस्तथ्यं तदा मां जगतां पतिम् ॥

मन्मथ उवाच

करिष्येऽहं तव विभो वचनाच्छंभुमोहनम् ।

किं तु योषिन्ममास्त्रं मे तत्कान्तां भगवन् सृज ॥

मया संमोहिते शंभौ यया तस्यानुमोहनम् ।

कर्तव्यमधुना धातस्तत्रोपायं परं कुरु ॥

ब्रह्मोवाच

एवंवादिनि कंदर्पे धाताहं स प्रजापतिः ।

कया संमोहिनीयोसाविति चिंतामयामहम् ॥

चिन्ताविष्टस्य मे तस्य निःश्वासो यो विनिःसृतः ।

तस्माद्वसंतः सञ्जातः पुष्पव्रातविभूषितः ॥

शोणराजीवसंकाशः फुल्लतामरसेक्षणः संध्योदिताखंडशशिप्रतिमास्यः सुनासिकः शार्ङ्गवच्चरणावर्तः श्यामकुञ्चितमूर्धजः संध्यांशुमालिसदृशः कुंडलद्वयमंडितः प्रमत्तेभगतिः पीनायतदोरुन्नतांसकः निर्जन स्थानमें, उत्तम प्रदेशमें, पर्वतपर अथवा २८ तालाबके तटपर: - - जहाँ भी शिवजी जायँ, वहीं तुम अपनी इस पत्नीके साथ जाकर इन जितेन्द्रिय तथा स्त्रीरहित शंकरजीको मोहित करो । [ इस संसारमें ] २ ९ तुम्हारे अतिरिक्त और कोई दूसरा इनको मोहमें डालनेवाला नहीं है ॥ २८-२९ ॥ हे मनोभव! शंकरजीके अनुरागयुक्त हो जानेपर ३० तुम्हारे भी शापकी शान्ति हो जायगी, अतः तुम अपना हित करो । यदि महेश्वर सानुराग होकर स्त्रीकी अभिलाषा करेंगे, तो वे श्रेष्ठ शिव तुम्हारा भी ३१ उद्धार कर देंगे ॥ ३०-३१ ॥ इसलिये तुम अपनी स्त्रीको साथ लेकर शंकरजीको ३२ मोहित करनेका प्रयत्न करो और महेश्वरको मोहित करके विश्वके केतु हो जाओ ॥३२ ॥

ब्रह्माजी बोले- संसारके प्रभु एवं अपने पिता मुझ ब्रह्माकी बात सुनकर वह कामदेव मुझ ३३ जगत्पतिसे कहने लगा —॥३३ ॥

मन्मथ बोला- हे प्रभो! मैं आपके आज्ञानुसार शिवजीको मोहित करूँगा, किंतु हे भगवन्! स्त्री ही मेरा मुख्य अस्त्र है । अतः शंकरजीके योग्य स्त्रीका ३४ निर्माण कीजिये, जो मेरे द्वारा शिवजीको मोहित करनेपर उनका पुनः मोहन कर सके । हे धाता! ३५ इसका उत्तम उपाय अब कीजिये ॥ ३४-३५ ॥ ब्रह्माजी बोले- कामदेवके इस प्रकार कहनेपर मैं प्रजापति ब्रह्मा अपने मनमें विचार करने लगा कि किस प्रकारकी स्त्रीसे शिवजीको मोहित किया ३६ जाय? ॥ ३६ ॥

इस प्रकार चिन्तामें निमग्न हुए मुझसे जो श्वास ३७ निकला, उसीसे पुष्पसमूहोंसे विभूषित वसन्त उत्पन्न हुआ । उसके शरीरकी कान्ति लालकमलके समान । थी, उसकी आँखें विकसित कमलके समान थीं, ॥ ३८ उसका मुख सन्ध्याके समय उदय हुए पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था, उसकी नासिका भी बहुत सुन्दर । थी । उसके चरणोंमें सींगके समान आवर्त थे, वह ॥३ ९ काले तथा घुँघराले केशोंसे शोभायमान हो रहा था । सन्ध्याकालीन सूर्यके सदृश दो कुण्डलोंसे वह सुशोभित । था, मतवाले हाथीके समान उसकी चाल थी, उसकी

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३४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ कंबुग्रीवः सुविस्तीर्णहृदयः पीनसन्मुखः ॥ ४० | भुजाएँ लम्बी तथा मोटी थीं, उसका कन्धा अत्यन्त सर्वांगसुन्दरः श्यामः सम्पूर्णः सर्वलक्षणैः दर्शनीयतमः सर्वमोहनः कामवर्धनः एतादृशे समुत्पन्ने वसंते कुसुमाकरे ववौ वायुः सुसुरभिः पादपा अपि पुष्पिताः पिका विनेदुः शतशः पञ्चमं मधुरस्वनाः प्रफुल्लपद्मा अभवन्सरस्यः स्वच्छपुष्कराः तमुत्पन्नमहं वीक्ष्य तदा तादृशमुत्तमम् हिरण्यगर्भो मदनमगदं मधुरं वचः ब्रह्मोवाच

एवं स मन्मथनिभः सदा सहचरोऽभवत् ।

आनुकूल्यं तव कृते सर्वं देवः करिष्यति ॥

यथाग्नेः पवनो मित्रं सर्वत्रोपकरिष्यति ।

तथायं भवतो मित्रं सदा त्वामनुयास्यति ॥

वसतेरंतहेतुत्वाद्वसंताख्यो भवत्वयम् ।

तवानुगमनं कर्म तथा लोकानुरञ्जनम् ॥

असौ वसंतशृङ्गारो वासंतो मलयानिलः ।

भवेत्तु सुहृदो भावः सदा त्वद्वशवर्तिनः ॥

विव्वोकाद्यास्तथा हावाश्चतुष्षष्टिकलास्तथा ।

रत्याः कुर्वंतु सौहृद्यं सुहृदस्ते यथा तव ॥

एभिः सहचरैः काम वसंतप्रमुखैर्भवान् ।

मोहयस्व महादेवं रत्या सह महोद्यमः ॥

अहं तां कामिनीं तात भावयिष्यामि यत्नतः ।

मनसा सुविचार्यैव या हरं मोहयिष्यति ॥

ऊँचा था । उसकी ग्रीवा शंखके समान थी उसका , | वक्षःस्थल बहुत चौड़ा था, मुखमण्डल स्थूल तथा । । सुन्दर था, उसके सभी अंग सुन्दर थे, वह श्याम ॥ ४१ वर्णका था, सभी लक्षणोंसे युक्त वह सबको मोहित करनेवाला, कामको बढ़ानेवाला तथा अत्यन्त दर्शनीय था ॥ ३७–४१ ॥ । इस प्रकार पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित हुए वसन्तके ॥ ४२ उत्पन्न होते ही सुगन्धित वायु चलने लगी, वृक्ष भी फूलोंसे लद गये ॥ ४२ ॥

। सैकड़ों कोयलें मधुर पंचम स्वरमें बोलने लगीं ॥ ४३ और बावलियाँ विकसित तथा स्वच्छ कमलोंसे युक्त हो गयीं । इस प्रकार उत्पन्न हुए उस श्रेष्ठ वसन्तको । देखकर मैं ब्रह्मा कामदेवसे मधुर शब्दोंमें कहने ॥ ४४ लगा- ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ हे पुत्र! ] कामदेवतुल्य यह वसन्त अब तुम्हारे लिये अनुकूल मित्र उत्पन्न हो गया ४५ है । अब यह तुम्हारी सब प्रकारसे सहायता करेगा ॥ ४५ ॥

जिस प्रकार पवन अग्निका मित्र बनकर सदा उसका ४६ उपकार करता रहता है, उसी प्रकार यह वसन्त भी तुम्हारा मित्र बनकर सदा तुम्हारे साथ रहेगा ॥ ४६ ॥

रमणमें हेतु होनेके कारण यह तुम्हारे साथ ४७ निवास करेगा, इसलिये इसका नाम वसन्त होगा । लोकका अनुरंजन तथा तुम्हारा अनुगमन ही इसका कार्य होगा ॥४७ ॥

वसन्तकालीन यह मलयानिल इस वसन्तका ४८ श्रृंगार बनकर इसके मित्ररूपसे बना रहेगा, जो सदा तुम्हारे अधीन रहेगा ॥ ४८ ॥

जिस प्रकार तुम्हारे मित्र रहते हैं, उसी प्रकार ४ ९ ये बिब्बोक आदि हाव तथा चौंसठ कलाएँ रतिके साथ सुहृद् होकर रहेंगी ॥ ४ ९ ॥ हे काम! तुम अपने इन वसन्त आदि ५० सहचरों तथा रतिके साथ उद्यत होकर महादेवजीको मोहित करो ॥५० ॥

हे तात! अब मैं यत्नपूर्वक अच्छी तरह मनमें | सोच - विचारकर उस कामिनीको प्राप्त करूँगा, जो ५१ भगवान् शंकरको मोहित कर लेगी ॥५१ ॥

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ब्रह्मोवाच

एवमुक्तो मया कामः सुरज्येष्ठेन हर्षितः ।

ननाम चरणौ मेऽपि स पत्नीसहितस्तदा ॥ ५२

दक्षं प्रणम्य तान् सर्वान्मानसानभिवाद्य च ।

यत्रात्मा गतवान् शंभुस्तत्स्थानं मन्मथो ययौ ॥ ५३

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां सतीचरित्रे ( सतीखण्ड ) ३४१ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार मुझ सुरश्रेष्ठ ब्रह्माके कहनेपर उस कामदेवने पत्नीसहित मेरे चरणोंमें प्रणाम किया । पुनः दक्ष एवं मेरे मानसपुत्रोंको प्रणामकर कामदेव उस स्थानपर गया, जहाँ आत्मस्वरूप शंकरजी गये थे॥५२-५३ ॥ द्वितीये सतीखण्डे वसंतस्वरूपवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें वसन्तस्वरूपवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः कामदेवद्वारा भगवान् शिवको विचलित न कर पाना, ब्रह्माजीद्वारा कामदेवके सहायक मारगणोंकी उत्पत्ति; ब्रह्माजीका उन सबको शिवके पास भेजना, उनका वहाँ विफल होना, गणोंसहित कामदेवका वापस अपने आश्रमको लौटना ब्रह्मोवाच

तस्मिन् गते सानुचरे शिवस्थानं च मन्मथे ।

चरित्रमभवच्चित्रं तच्छृणुष्व मुनीश्वर ॥

गत्वा तत्र महावीरो मन्मथो मोहकारकः ।

स्वप्रभावं ततानाशु मोहयामास प्राणिनः ॥

वसंतोऽपि प्रभावं स्वं चकार हरमोहनम् ।

सर्वे वृक्षा एकदैव प्रफुल्ला अभवन्मुने ॥

विविधान्कृतवान्यत्नान् रत्या सह मनोभवः ।

जीवाः सर्वे वशं याताः सगणेशः शिवो न हि ॥

समधोर्मदनस्यासन्प्रयासा निष्फला मुने ।

जगाम स निजस्थानं निवृत्य विमदस्तदा ॥

कृत्वा प्रणामं विधये मह्यं गद्गदया गिरा ।

उवाच मदनो मां चोदासीनो विमदो मुने ॥

काम उवाच

ब्रह्मन् शंभुर्मोहनीयो न वै योगपरायणः ।

न शक्तिर्मम नान्यस्य तस्य शंभोर्हि मोहने ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! अनुचरोंके साथ उस कामके शिवस्थानमें पहुँच जानेपर अद्भुत चरित्र १ हुआ, उसे सुनिये ॥१ ॥

सभी लोगोंको मोहित करनेवाले उस महावीर २ कामने वहाँ पहुँचकर अपना प्रभाव फैला दिया और सभी प्राणियोंको मोहित कर लिया ॥ २ ॥

हे मुने! वसन्तने भी महादेवजीको अपना मोहित ३ करनेवाला प्रभाव दिखाया, जिससे समस्त वृक्ष एक साथ ही फूलोंसे लद गये । उस समय कामने रतिके साथ [ शिवको मोहित करनेके लिये ] अनेक यत्न ४ किये, जिससे सभी जीव उसके वशीभूत हो गये, किंतु । गणोंसहित शिवजी उसके वशमें नहीं हुए ॥ ३-४ ॥ हे मुने! [ इस प्रकार चेष्टा करते हुए ] जब ५ वसन्तसहित उस कामके समस्त प्रयत्न निष्फल हो गये, तब वह अहंकाररहित हो गया और लौटकर अपने स्थानपर चला गया । हे मुने! मुझ ब्रह्माको ६ प्रणामकर उदासीन तथा अभिमानरहित वह कामदेव गद्गद वाणीसे मुझसे कहने लगा- ॥ ५-६ ॥ काम बोला- हे ब्रह्मन्! शिवको मोहित नहीं किया जा सकता; क्योंकि वे योगपरायण हैं । उन शिवको मोहित करनेकी शक्ति न मुझमें है और न ७ अन्य किसीमें है ॥ ७ ॥

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३४२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

समित्रेण मया ब्रह्मन्नुपाया विविधाः कृताः ।

रत्या सहाखिलास्ते च निष्फला अभवन् शिवे ॥ ८

शृणु ब्रह्मन्यथास्माभिः कृता हि हरमोहने ।

प्रयासान् विविधाँस्तात गदतस्तान्मुने मम ॥ ९

यदा समाधिमाश्रित्य स्थितः शंभुर्नियंत्रितः ।

तदा सुगंधिवातेन शीतलेनातिवेगिना ॥ १०

उद्वेजयामि रुद्रं स्म नित्यं मोहनकारिणा ।

प्रयत्नतो महादेवं समाधिस्थं त्रिलोचनम् ॥ ११

स्वसायकांस्तथा पञ्च समादाय शरासनम् ।

तस्याभितो भ्रमतस्तु मोहयंस्तद्गणानहम् ॥ १२

मम प्रवेशमात्रेण सुवश्याः सर्वजंतवः ।

अभवद्विकृतो नैव शंकरः सगणः प्रभुः ॥ १३

यदा हिमवतः प्रस्थं स गतः प्रमथाधिपः ।

तत्रागतस्तदैवाहं सरतिः समधुर्विधे ॥ १४

यदा मेरुं गतो रुद्रो यदा वा नागकेशरम् । कैलासं वा यदा यातस्तत्राहं गतवांस्तदा । १५

यदा त्यक्तसमाधिस्तु हरस्तस्थौ कदाचन ।

तदा तस्य पुरश्चक्रयुगं रचितवानहम् ॥ १६

तच्च भ्रूयुगलं ब्रह्मन् हावभावयुतं मुहुः ।

नानाभावानकार्षीच्च दांपत्यक्रममुत्तमम् ॥ १७

नीलकंठं महादेवं सगणं तत्पुरः स्थिताः ।

अकार्षुर्मोहितं भावं मृगाश्च पक्षिणस्तथा ॥ १८

मयूरमिथुनं तत्राकार्षीद्भावं रसोत्सुकम् ।

विविधां गतिमाश्रित्य पार्श्वे तस्य पुरस्तथा ॥ १ ९

नालभद् विवरं तस्मिन् कदाचिदपि मच्छरः ।

सत्यं ब्रवीमि लोकेश मम शक्तिर्न मोहने ॥ २० ।

मधुरप्यकरोत्कर्म युक्तं यत्तस्य मोहने ।

तच्छृणुष्व महाभाग सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ २१

९ हे ब्रह्मन्! मैंने मित्र वसन्त तथा रतिकेसाथ उन्हें मोहित करनेके अनेक उपाय किये, किंतु शिवमें वे सभी निष्फल हो गये । हे ब्रह्मन्! हमलोगोंने | शिवजीको मोहित करनेके लिये जिन उपायोंको किया, उन विविध उपायोंको मैं बता रहा हूँ, हे मुने! हे तात! आप सुनिये— ॥ ८ - ९ ॥ जब शिवजी संयमित होकर समाधि लगाकर बैठे हुए थे, तब मैं मोहित करनेवाली वेगवान्, सुगन्धयुक्त तथा शीतल वायुसे त्रिनेत्र महादेव रुद्रको विचलित करने लगा ॥ १०-११ ॥ मैं अपने धनुष तथा पाँचों पुष्पबाणोंको लेकर उनके चारों ओर छोड़ता हुआ उनके गणोंको मोहित करने लगा । [ उस प्रदेशमें ] मेरे प्रवेश करते ही समस्त प्राणी मोहित हो गये, किंतु गणोंसहित भगवान् शिव विकारयुक्त नहीं हुए ॥ १२-१३ ॥ हे विधे! जब वे प्रमथाधिपति शिव हिमालयके शिखरपर गये, तब मैं भी वसन्त और रतिके साथ वहाँ पहुँच गया ॥१४ ॥

जब वे मेरु पर्वतपर और नागकेसर पर्वतपर गये, तो मैं वहाँ भी गया । जब वे कैलास पर्वतपर गये, तब मैं भी वहाँपर गया ॥१५ ॥

जब वे किसी समय समाधिसे मुक्त हो गये, तो मैंने उनके सामने दो चक्र रचे । वे दोनों चक्र स्त्रीके हाव - भावयुक्त दोनों कटाक्ष थे । मैंने दाम्पत्यभावका अनुकरण करते हुए उन नीलकण्ठ महादेवके सामने नाना प्रकारके भाव उत्पन्न किये ॥ १६-१७ ॥ पशुओं तथा पक्षियोंने भी उनके सामने स्थित होकर गणोंसहित शिवजीको मोहित करनेके लिये मोहकारी भाव प्रदर्शित किये ॥ १८ ॥

रसोत्सुक हुए मयूरके जोड़ेने अनेक प्रकारकी गतियोंका सहारा लेकर विविध प्रकारके भाव उनके आगे-| पीछे प्रदर्शित किये, किंतु मेरे बाणोंको कभी भी अवकाश नहीं मिला, मैं यह सत्य कह रहा हूँ । हे लोकेश! शिवजीको मोहित करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है ॥ १ ९ -२० ॥ इस वसन्तने भी उन्हें मोहित करनेके लिये जो | जो उचित उपाय किये हैं, हे महाभाग! उन्हें आप सुनें, मैं सत्य -सत्य कह रहा हूँ ॥ २१ ॥

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३४३

चंपकान्केशरान्बालान्कारणान्पाटलांस्तथा ।

नागकेशरपुन्नागान्किंशुकान्केतकान् वरान् ॥

मालतीमल्लिकापर्णभारान्कुरबकांस्तथा ।

उत्फुल्लयति तत्र स्म यत्र तिष्ठति वै हरः ॥

सरांस्युत्फुल्लपद्मानि वीजयन् मलयानिलैः ।

यत्नात्सुगंधीन्यकरोदतीव गिरिशाश्रमे ॥

लताः सर्वाः सुमनसो धत्तूराङ्कुरसञ्चयाः ।

वृक्षाङ्कं चिरभावेन वेष्टयन्ति स्म तत्र च ॥

तान्वृक्षांश्च सुपुष्पौघान् तैः सुगंधिसमीरणैः ।

दृष्ट्वा कामवशं याता मुनयोऽपि परे किमु ॥

एवं सत्यपि शंभोर्न दृष्टं मोहस्य कारणम् ।

भावमात्रमकार्षीन्नो कोपो मय्यपि शंकरः ॥

इति सर्वमहं दृष्ट्वा ज्ञात्वा तस्य च भावनाम् ।

विमुखोऽहं शंभुमोहान्नियतं ते वदाम्यहम् ॥

तस्य त्यक्तसमाधेस्तु क्षणं नो दृष्टिगोचरे ।

शक्नुयामो वयं स्थातुं तं रुद्रं को विमोहयेत् ॥

ज्वलदग्निप्रकाशाक्षं जटाराशिकरालिनम् ।

शृङ्गिणं वीक्ष्य कः स्थातुं ब्रह्मन् शक्नोति तत्पुरः ॥

ब्रह्मोवाच

मनोभववचश्चेत्थं श्रुत्वाहं चतुराननः ।

विवक्षुरपि नावोचं चिंताविष्टोऽभवं तदा ॥

मोहनेऽहं समर्थो न हरस्येति मनोभवः ।

वचः श्रुत्वा महादुःखान्निरश्वसमहं मुने ॥

निःश्वासमारुता मे हि नानारूपा महाबलाः । जाता गणा लोलजिह्वा लोलाश्चातिभयंकराः इस वसन्तने श्रेष्ठ चम्पक, केसर, बाल २२ [ इलायची ], कटहल, गुलाब, नागकेसर, पुन्नाग, किंशुक, केतकी, मालती, मल्लिका, पर्णभार एवं कुरबक आदि पुष्पोंको जहाँ भी शिवजी बैठते थे, २३ वहीं विकसित कर दिया ॥ २२-२३ ॥ इस वसन्तने शिवजीके आश्रममें तालाबके सभी २४ फूले हुए कमलोंको मलय पवनोंसे यत्नपूर्वक अत्यन्त सुगन्धित कर दिया ॥ २४ ॥

सभी लताएँ फूलसे युक्त और अंकुर - समूहके २५ साथ सन्निकटके वृक्षोंमें बड़े प्रेमसे लिपट गयीं ॥ २५ ॥

सुगन्धित पवनोंसे खिले हुए फूलोंसे युक्त उन २६ वृक्षोंको देखकर मुनि भी कामके वशीभूत हो गये, फिर अन्यकी तो बात ही क्या! ॥ २६ ॥

इतना होनेपर भी मैंने शंकरजीके मोहित होनेका २७ न कोई लक्षण देखा, न तो उनमें कोई कामका भाव ही उत्पन्न हुआ । [ इतना सब कुछ करनेपर भी ] शंकरने मेरे ऊपर रंचमात्र भी क्रोध नहीं किया ॥२७ ॥

इस प्रकार सब कुछ देखकर तथा उनकी २८ भावनाको जानकर मैं शिवजीको मोहित करनेके प्रयाससे विरत हो गया, उसका कारण आपसे निवेदन कर रहा हूँ ॥२८ ॥

समाधि छोड़ देनेपर हमलोग उनकी दृष्टिके २ ९ सामने क्षणमात्र भी टिक नहीं सकते, उन रुद्रको कौन मोहित कर सकता है? ॥२ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! जलती हुई अग्निके समान प्रकाशित ३० नेत्रोंवाले तथा जटा धारण करनेसे महाविकराल उन कैलासपर्वतनिवासी शिवजीको देखकर उनके सामने कौन खड़ा रह सकता है? ॥ ३० ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कामके वचनको सुनकर मैं चतुरानन ब्रह्मा चिन्तामग्न हो गया और ३१ बोलनेकी इच्छा करते हुए भी कुछ बोल न सका ॥ ३१ ॥

मैं कामदेव शिवको मोहित करनेमें समर्थ नहीं ३२ हूँ । हे मुने! उसका यह वचन सुनकर मैं बड़े दुःखके साथ उष्ण श्वास लेने लगा ॥ ३२ ॥

उस समय मेरे निःश्वास अनेक रूपोंवाले, महाबलवान्, लपलपाती जीभवाले, चंचल तथा अत्यन्त ॥ ३३ । भयंकर गणोंके रूपमें परिणत हो गये ॥३३ ॥

पृष्ठ 356

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३४४ अवादयन्त ते सर्वे नानावाद्यानसंख्यकान् पटहादिगणास्तांस्तान् विकरालान्महारवान् अथ ते मम निःश्वाससंभवाश्च महागणाः मारयच्छेदयेत्यूचुर्ब्रह्मणो मे पुरः स्थिताः

तेषां तु वदतां तत्र मारयच्छेदयेति माम् ।

वचः श्रुत्वा विधिं कामः प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥

मुनेऽथ मां समाभाष्य तान् दृष्ट्वा मदनो गणान् । उवाच वारयन् ब्रह्मन्गणानामग्रतः स्मरः काम उवाच

हे ब्रह्मन् हे प्रजानाथ सर्वसृष्टिप्रवर्तक ।

उत्पन्नाः क इमे वीरा विकराला भयंकराः ॥

किं कर्मैते करिष्यंति कुत्र स्थास्यंति वा विधे ।

किन्नामधेया एते तद्वद तत्र नियोजय ॥

नियोज्य तान्निजे कृत्ये स्थानं दत्त्वा च नाम च ।

मामाज्ञापय देवेश कृपां कृत्वा यथोचिताम् ॥

ब्रह्मोवाच

इति तद्वाक्यमाकर्ण्य मुनेऽहं लोककारकः ।

तमवोचं ह मदनं तेषां कर्मादिकं दिशन् ॥

एत उत्पन्नमात्रा हि मारयेत्यवदन् वचः ।

मुहुर्मुहुरतोऽमीषां नाम मारेति जायताम् ॥

सदैव विघ्नं जंतूनां करिष्यन्ति गणा इमे ।

विना निजार्चनं काम नानाकामरतात्मनाम् ॥

तवानुगमनं कर्म मुख्यमेषां मनोभव । सहायिनो भविष्यन्ति श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ । उन गणोंने भेरी, मृदंग आदि अनेक प्रकारके ॥ ३४ असंख्य विकराल, महाभयंकर बाजे बजाना प्रारम्भ । किया । मेरे निःश्वाससे उत्पन्न वे महागण मुझ ब्रह्माके ॥ ३५ सामने ही मारो, काटो – ऐसा बोलने लगे ॥ ३४-३५ ॥ मारो, काटो — ऐसा बोलनेवाले उन गणोंके शब्दोंको ३६ सुनकर वह काम मुझ ब्रह्मासे कहने लगा ॥ ३६ ॥

हे मुने! हे ब्रह्मन्! इस प्रकार उस कामने मेरी आज्ञा लेकर उन सभी गणोंकी ओर देखकर उन्हें ॥ ३७ ऐसा करनेसे रोकते हुए गणोंके सामने ही मुझसे कहना प्रारम्भ किया— ॥ ३७ ॥

काम बोला- हे ब्रह्मन्! हे प्रजानाथ! हे सृष्टिके प्रवर्तक! ये कौन विकराल एवं भयंकर वीर ३८ उत्पन्न हो गये? ॥ ३८ ॥

हे विधे! ये कौन - सा कार्य करेंगे तथा कहाँ ३ ९ निवास करेंगे और इनका क्या नाम है? उन्हें आप मुझे बताइये तथा इनको कार्यमें नियुक्त कीजिये ॥ ३ ९ ॥ हे देवेश! इनको अपने कार्यमें नियुक्तकर और ४० इनके नाम रखकर तथा स्थानोंकी व्यवस्था करके यथोचित कृपा करके मुझे आज्ञा दीजिये ॥ ४० ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! उस कामकी बात सुनकर उनके कार्य आदिका निर्देश करते हुए ४१ लोककर्ता मैंने कामसे कहा— 1182 11 हे काम! उत्पन्न होते ही इन सबने बारंबार ४२ मारय मारय [ मारो मारो ] – इस प्रकारका शब्द कहा है, इसलिये इनका नाम ' मार ' होना चाहिये ॥ ४२ ॥

हे काम! अपनी पूजाके बिना ये गण अनेक ४३ प्रकारकी कामनाओंमें रत मनवाले प्राणियोंके कार्योंमें सर्वदा विघ्न किया करेंगे ॥ ४३ ॥

हे कामदेव! तुम्हारे अनुकूल रहना ही इनका सदा तव न संशयः ॥ ४४ मुख्य कार्य होगा और ये तुम्हारी सहायतामें सदा तत्पर रहेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४४ ॥

यत्र यत्र भवान् याता स्वकर्मार्थं यदा यदा । जब - जब और जहाँ - जहाँ तुम अपने कार्य गंतारस्तत्र तत्रैते सहायार्थं तदा तदा ॥ ४५ लिये जाओगे, तब - तब वहाँ - वहाँ ये तुम्हारी सहायता लिये जायँगे ॥ ४५ ॥

ये तुम्हारे अस्त्रोंसे वशवर्ती प्राणियोंके चित्तमें चित्तभ्रांतिं करिष्यति त्वदस्त्रवशवर्तिनाम् । | सदैव भ्रान्ति उत्पन्न करेंगे और ज्ञानियोंके ज्ञानमार्गमें

ज्ञानिनां ज्ञानमार्गं च विघ्नयिष्यंति सर्वथा ॥ ४६ । विघ्न डालेंगे ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 357

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचो मे हि सरतिः स मनोभवः ।

किंचित्प्रसन्नवदनो बभूव मुनिसत्तम ॥ ४७

श्रुत्वा तेऽपि गणाः सर्वे मदनं मां च सर्वतः ।

परिवार्य यथाकामं तस्थुस्तत्र निजाकृतिम् ॥ ४८

अथ ब्रह्मा स्मरं प्रीत्यागदं मे कुरु शासनम् ।

एभिः सहैव गच्छ त्वं पुनश्च हरमोहने ॥ ४ ९

मन आधाय यत्नानि कुरु मारगणैः सह ।

मोहो भवेद्यथा शंभोर्दारग्रहणहेतवे ॥ ५०

इत्याकर्ण्य वचः कामः प्रोवाच वचनं पुनः ।

देवर्षे गौरवं मत्वा प्रणम्य विनयेन माम् ॥ ५१

काम उवाच

मया सम्यक् कृतं कर्म मोहने तस्य यत्नतः ।

तन्मोहो नाभवत्तात न भविष्यति नाधुना ॥ ५२

तव वाग्गौरवं मत्वा दृष्ट्वा मारगणानपि ।

गमिष्यामि पुनस्तत्र सदारोऽहं त्वदाज्ञया ॥ ५३

मनो निश्चितमेतद्धि तन्मोहो न भविष्यति ।

भस्म कुर्यान्न मे देहमिति शंकास्ति मे विधे ॥ ५४

इत्युक्त्वा समधुः कामः सरतिः सभयस्तदा ।

ययौ मारगणैः सार्धं शिवस्थानं मुनीश्वर ॥ ५५

पूर्ववत् स्वप्रभावं च चक्रे मनसिजस्तदा ।

बहूपायं स हि मधुर्विविधां बुद्धिमावहन् ॥ ५६

उपायं स चकाराति तत्र मारगणोऽपि च ।

मोहोऽभवन्न वै शंभोरपि कश्चित्परात्मनः ॥ ५७

निवृत्य पुनरायातो मम स्थानं स्मरस्तदा ।

आसीन्मारगणोऽगर्वोऽहर्षो मेऽपि पुरस्थितः ॥ ५८

कामः प्रोवाच मां तात प्रणम्य च निरुत्सवः ।

स्थित्वा मम पुरोऽगर्वो मारैश्च मधुना तदा ॥ ५ ९

सतीखण्ड ) ३४५ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिसत्तम! मेरे इस वचनको सुनकर रति और वसन्तसहित वह कामदेव कुछ प्रसन्नमुख हो गया ॥ ४७ ॥

मेरी बातको सुनकर वे सभी गण अपने - अपने स्वरूपसे मुझे तथा कामदेवको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये । इसके बाद मुझ ब्रह्माने कामसे प्रेमपूर्वक कहा— [ हे मदन! ] मेरी बात मानो, तुम इन गणोंको साथ लेकर शिवको मोहित करनेके लिये पुनः जाओ ॥। ४८-४९ ॥ अब तुम इन मारगणोंके साथ मन लगाकर ऐसा प्रयत्न करो, जिससे स्त्री ग्रहण करनेके लिये शिवजीको मोह हो जाय । हे देवर्षे! मेरी बात सुनकर काम गौरवका ध्यान रखते हुए मुझे प्रणाम करके विनयपूर्वक मुझसे पुन: यह वचन कहने लगा- ॥ ५०-५१ ॥ काम बोला- हे तात! मैंने शिवको मोहित करनेके लिये भली - भाँति यत्नपूर्वक उपाय किये, किंतु उनको मोह नहीं हुआ, न आगे होगा और वर्तमानमें भी वे मोहित नहीं हैं ॥५२ ॥

किंतु आपकी वाणीका गौरव मानकर इन मारगणोंको देखकर आपकी आज्ञासे मैं पुनः वहाँ पत्नीसहित जाऊँगा ॥५३ ॥

हे ब्रह्मन्! मैंने मनमें यह निश्चय कर लिया है कि उन्हें मोह नहीं होगा और हे विधे! मुझे यह शंका है कि [ इस बार ] कहीं वे मेरे शरीरको भस्म न कर दें ॥ ५४ ॥

हे मुनीश्वर! ऐसा कहकर वह कामदेव वसन्त, रति तथा मारगणोंको साथ लेकर भयपूर्वक शिवजीके स्थानपर गया ॥ ५५ ॥

[ वहाँ जाकर ] कामदेवने पहलेके समान ही अपना प्रभाव दिखाया तथा वसन्तने भी अनेक प्रकारकी बुद्धिका प्रयोग करते हुए बहुत उपाय किये, मारगणोंने भी वहाँ बहुत उपाय किये, किंतु परमात्मा शंकरको कुछ भी मोह न हुआ॥५६-५७ ॥ तब वह कामदेव लौटकर पुनः मेरे पास आया । समस्त मारगण भी अभिमानरहित तथा उदास होकर मेरे सामने खड़े हो गये ॥५८ ॥

हे तात! तब उदास और गर्वरहित कामदेवने मारगणों तथा वसन्तके साथ मेरे सामने खड़े होकर प्रणाम करके मुझसे कहा —॥५ ९ ॥

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३४६ कृतं पूर्वादधिकतः कर्म तन्मोहने विधे नाभवत्तस्य मोहोऽपि कश्चिद्ध्यानरतात्मनः न दग्धा मे तनुश्चैव तत्र तेन दयालुना कारणं पूर्वपुण्यं च निर्विकारः स वै प्रभुः चेद्वरस्ते हरो भार्यां गृह्णीयादिति पद्मज परोपायं कुरु तदा विगर्व इति मे मतिः ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा सपरीवारो ययौ कामः स्वमाश्रमम् प्रणम्य मां स्मरन् शंभुं गर्वदं दीनवत्सलम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० । हे विधे! मैंने शिवजीको मोहित करनेके लिये ॥ ६० पहलेसे भी अधिक प्रयत्न किया, किंतु ध्यानरत । चित्तवाले उन शिवको कुछ भी मोह नहीं हुआ ॥ ६० ॥

। उन दयालुने मेरे शरीरको भस्म नहीं किया ॥ ६१ इसमें मेरे पूर्वजन्मका पुण्य ही कारण है । वे प्रभु, सर्वथा निर्विकार हैं । हे ब्रह्मन्! यदि आपकी ऐसी इच्छा । है कि महादेवजी दारपरिग्रह करें, तो मेरे विचारसे आप ॥ ६२ गर्वरहित होकर दूसरा उपाय कीजिये ॥ ६१-६२ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर कामदेव मुझे प्रणाम करके गर्वका खण्डन करनेवाले दीनवत्सल । शम्भुका स्मरण करता हुआ परिवारसहित अपने ॥ ६३ । आश्रमको चला गया ॥६३ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने कामप्रभावमारगणोत्पत्तिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें कामप्रभाव एवं मारगणोत्पत्तिवर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

अथ ब्रह्मा और विष्णुके नारद उवाच

ब्रह्मन् विधे महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः ।

कथितं सुचरित्रं ते शंकरस्य परात्मनः ॥

निजाश्रमे गते कामे सगणे सरतौ ततः ।

किमासीत्किमकार्षीस्त्वं तच्चरित्रं वदाधुना ॥

ब्रह्मोवाच

शृणु नारद सुप्रीत्या चरित्रं शशिमौलिनः ।

यस्य श्रवणमात्रेण निर्विकारो भवेन्नरः ॥

निजाश्रमं गते कामे परिवारसमन्विते ।

यद् बभूव तदा जातं तच्चरित्रं निबोध मे ॥

नष्टोऽभून्नारद मदो विस्मयोऽभूच्च मे हृदि ।

निरानंदस्य च मुनेऽपूर्णे निजमनोरथे ॥

अशोचं बहुधा चित्ते गृह्णीयात्स कथं स्त्रियम् ।

निर्विकारो जितात्मा स शंकरो योगतत्परः ॥

दशमोऽध्यायः संवादमें शिवमाहात्म्यका वर्णन नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग! आप धन्य हैं, जो आपकी बुद्धि शिवमें आसक्त है । १ आपने परमात्मा शंकरजीके सुन्दर चरित्रका आख्यान किया ॥१ ॥

मारगणों तथा [ अपनी स्त्री ] रतिके साथ जब २ काम अपने स्थानपर चला गया, तब क्या हुआ और आपने क्या किया? अब उस चरित्रको कहिये ॥२ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! आप अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके चरित्रको सुनिये, जिसके ३ श्रवणमात्रसे मनुष्य विकारसे मुक्त हो जाता है ॥३ ॥

कामके सपरिवार अपने आश्रममें चले जानेपर ४ उस समय जो हुआ, उस चरित्रको मुझसे सुनिये ॥४ ॥

हे नारद! मेरा घमण्ड चूर - चूर हो गया और ५ | अपने मनोरथके अपूर्ण रहनेसे मुझ आनन्दरहित हृदयमें विस्मय हुआ ॥५ ॥

मैंने मनमें अनेक प्रकारसे विचार किया कि वे | निर्विकार, जितात्मा तथा योगपरायण शिव स्त्रीको ६ किस प्रकार ग्रहण कर सकते हैं? ॥ ६ ॥

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अ ० १० ] रुद्रसंहिता (

इत्थं विचार्य बहुधा तदाहं विमदो मुने ।

हरिं तं सोऽस्मरं भक्त्या शिवात्मानं स्वदेहदम् ॥ ७

अस्तवं च शुभस्तोत्रैर्दीनवाक्यसमन्वितैः ।

तच्छ्रुत्वा भगवानाशु बभूवाविर्हि मे पुरा ॥ ८

चतुर्भुजोऽरविंदाक्षः शंखपद्मगदाधरः ।

लसत्पीतपटः श्यामतनुर्भक्तप्रियो हरिः ॥ ९

तं दृष्ट्वा तादृशमहं सुशरण्यं मुहुर्मुहुः । अस्तवं च पुनः प्रेम्णा बाष्पगद्गदया गिरा । १०

हरिराकर्ण्य तत्स्तोत्रं सुप्रसन्न उवाच माम् ।

दुःखहा निजभक्तानां ब्रह्माणं शरणं गतम् ॥ ११

हरिरुवाच

विधे ब्रह्मन् महाप्राज्ञ धन्यस्त्वं लोककारक ।

किमर्थं स्मरणं मेऽद्य कृतं च क्रियते नुतिः ॥ १२

किं जातं ते महद्दुःखं मदग्रे तद्वदाधुना ।

शमयिष्यामि तत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ १३

ब्रह्मोवाच

इति विष्णोर्वचः श्रुत्वा किंचिदुच्छ्वसिताननः ।

अवोचं वचनं विष्णुं प्रणम्य सुकृताञ्जलिः ॥ १४

देवदेव रमानाथ मद्वार्तां शृणु मानद ।

श्रुत्वा च करुणां कृत्वा हर दुःखं कमावह ॥ १५

रुद्रसंमोहनार्थं हि कामं प्रेषितवानहम् ।

परिवारयुतं विष्णो समारमधुबांधवम् ॥ १६

चक्रुस्ते विविधोपायान् निष्फला अभवंश्च ते ।

नाभवत्तस्य संमोहो योगिनः समदर्शिनः ॥ १७

इत्याकर्ण्य वचो मे स हरिर्मां प्राह विस्मितः ।

विज्ञाताखिलदो ज्ञानी शिवतत्त्वविशारदः ॥ १८

सतीखण्ड ) ३४७ हे मुने! इस प्रकार अनेक तरहसे विचार करके अहंकाररहित मैंने उस समय अपने जन्मदाता शिवस्वरूप उन विष्णुका भक्तिपूर्वक स्मरण किया और दीनतापूर्ण वाक्योंसे युक्त कल्याणकारी स्तोत्रोंसे मैं उनकी स्तुति करने लगा । उसे सुनकर चतुर्भुज, कमलनयन, शंख - पद्म - गदाधारी, पीताम्बरसे सुशोभित तथा श्यामवर्णके शरीरवाले भक्तप्रिय भगवान् विष्णु शीघ्र ही मेरे सम्मुख प्रकट हो गये ॥ ७ – ९ ॥ उस प्रकारके रूपवाले शरणागतवत्सल उन भगवान्‌को देखकर मैंने पुनः प्रेमसे गद्गद वाणीमें बार - बार उनकी स्तुति की ॥ १० ॥

अपने भक्तोंके दुःखको दूर करनेवाले भगवान् विष्णु उस स्तोत्रको सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो मुझ शरणागत ब्रह्मासे कहने लगे ॥११ ॥

विष्णुजी बोले- हे विधे! हे ब्रह्मन्! हे महाप्राज्ञ! आप धन्य हैं, हे लोककर्ता! आपने आज किसलिये मेरा स्मरण किया और किसलिये आप मेरी स्तुति कर रहे हैं? ॥ १२ ॥

आपको कौन - सा महान् दुःख हो गया है, उसे अभी बताइये । उस सम्पूर्ण दुःखका मैं नाश करूँगा, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! विष्णुके इन वचनोंको सुनकर मैंने दीर्घ श्वास लिया और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विष्णुसे यह वचन कहा —॥१४ ॥

हे देवदेव! हे रमानाथ! मेरी बात सुनिये और हे मानद! उसे सुनकर दया करके मेरा दुःख दूर कीजिये तथा मुझे सुखी कीजिये ॥ १५ ॥

हे विष्णो! मैंने रुद्रके सम्मोहनके लिये सपरिवार मारगण तथा वसन्तके साथ कामको भेजा था ॥ १६ ॥

उन्होंने शिवजीको मोहित करनेके लिये अनेक

प्रकारके उपाय किये, परंतु वे सब निष्फल हो गये ।

उन समदर्शी योगीको मोह नहीं हुआ ॥ १७ ॥

मेरा यह वचन सुनकर शिवतत्त्वके ज्ञाता, विज्ञानी तथा सब कुछ देनेवाले वे विष्णु विस्मित । होकर मुझसे कहने लगे ॥ १८ ॥

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३४८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० विष्णुरुवाच

कस्माद्धेतोरिति मतिस्तव जाता पितामह ।

सर्वं विचार्य सुधिया ब्रह्मन् सत्यं हि तद्वद ॥ १ ९

ब्रह्मोवाच

शृणु तात चरित्रं तत् तव माया विमोहिनी ।

तदधीनं जगत्सर्वं सुखदुःखादितत्परम् ॥ २०

ययैव प्रेषितश्चाहं पापं कर्तुं समुद्यतः ।

आसं तच्छृणु देवेश वदामि तव शासनात् ॥ २१

सृष्टिप्रारंभसमये दश पुत्रा हि जज्ञिरे ।

दक्षाद्यास्तनया चैका वाग्भवाप्यतिसुन्दरी ॥ २२

धर्मो वक्षःस्थलात्कामो मनसोऽन्योऽपि देहतः ।

जातास्तत्र सुतां दृष्ट्वा मम मोहोऽभवद्धरे ॥ २३

कुदृष्ट्या तां समद्राक्षं तव मायाविमोहितः ।

तत्क्षणाद्धर आगत्य मामनिन्दत्सुतानपि ॥ २४

धिक्कारं कृतवान् सर्वान् निजं मत्वा परं प्रभुम् ।

ज्ञानिनं योगिनं नाथं भोगिनं विजितेन्द्रियम् ॥ २५

पुत्रो भूत्वा मम हरेऽनिन्दन्मां च समक्षतः ।

इति दुःखं महन्मे हि तदुक्तं तव सन्निधौ ॥ २६

गृह्णीयाद्यदि पत्नीं स स्यां सुखी नष्टदुःखधीः ।

एतदर्थं समायातः शरणं तव केशव ॥ २७

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचो मे हि ब्रह्मणो मधुसूदनः ।

विहस्य मां द्रुतं प्राह हर्षयन्भवकारकम् ॥ २८

विष्णुरुवाच

विधे शृणु हि मद्वाक्यं सर्वं भ्रमनिवारणम् । ।

सर्वं वेदागमादीनां संमतं परमार्थतः ॥ २ ९

महामूढमतिश्चाद्य सञ्जातोऽसि कथं विधे ।

वेदवक्तापि निखिललोककर्ता हि दुर्मतिः ॥ ३०

विष्णुजी बोले- हे पितामह! आपकी | प्रकारकी बुद्धि किस कारणसे हो गयी है? हे ब्रह्मन् इस ! अपनी सुबुद्धिसे सब विचारकर मुझसे सत्य - सत्य उसे कहें ॥ १ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे तात! अब उस चरित्रको सुनिये । यह आपकी माया मोहनेवाली है, सुख-दुःखमय यह सारा जगत् उसीके अधीन है ॥२० ॥

उसी मायाके द्वारा प्रेरित होकर मैं [ इस प्रकारका ] पाप करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ । हे देवेश! आपकी

आज्ञासे मैं कह रहा हूँ । आप उसे सुनिये ॥२१ ॥

सृष्टिके प्रारम्भमें मेरे दक्ष आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए और मेरी वाणीसे एक परम सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई ॥२२ ॥

जिसमें धर्म मेरे वक्षःस्थलसे, काम मनसे तथा अन्य पुत्र मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए, हे हरे! कन्याको देखकर मुझे मोह हो गया ॥ २३ ॥

मैंने आपकी मायासे मोहित होकर जब उसे कुदृष्टिसे देखा, तब उसी समय महादेवजीने आकर मेरी तथा मेरे पुत्रोंकी निन्दा की ॥२४ ॥

हे नाथ! उन्होंने स्वयंको श्रेष्ठ तथा प्रभु मानकर ज्ञानी, योगी, जितेन्द्रिय, भोगरहित मुझ ब्रह्माको तथा मेरे पुत्रोंको धिक्कारा ॥ २५ ॥

हे हरे! मेरे पुत्र होकर भी शिवने सबके सामने ही मेरी निन्दा की । यही मुझे महान् दुःख है, इसे मैंने आपके सामने कह दिया ॥ २६ ॥

यदि वे पत्नी ग्रहण कर लें, तो मैं सुखी हो जाऊँगा और मेरे मनका कष्ट दूर हो जायगा । हे केशव! इसीलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ २७ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] मुझ ब्रह्माका यह् | वचन सुनकर विष्णु हँसकर मुझ सृष्टिकर्ता ब्रह्माको हर्षित करते हुए शीघ्र ही कहने लगे- ॥ २८ ॥

विष्णुजी बोले — हे विधे! सम्पूर्ण भ्रमका निवारण करनेवाले और वेद तथा आगमोंद्वारा अनुमोदित परमार्थयुक्त मेरे वचनको सुनें ॥ २ ९ ॥ हे विधे! वेदके वक्ता तथा समस्त लोकके कर्ता होकर भी आप इस प्रकार महामूर्ख तथा दुर्बुद्धियुक्त किस प्रकार हो गये? ॥ ३० ॥