शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 381–390
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३६ ९
आश्विने मासि नन्दायां तिथावानर्च भक्तितः ।
गुडौदनैः सलवणैर्हरं नत्वा निनाय तम् ॥ १४
कार्तिकस्य चतुर्दश्यामपूपैः पायसैरपि ।
समाकीर्णैः समाराध्य सस्मार परमेश्वरम् ॥ १५
मार्गशीर्षेऽसिताष्टम्यां सतिलैः सयवौदनैः ।
पूजयित्वा हरं कीलैर्निनाय दिवसान् सती ॥ १६
पौषे तु शुक्लसप्तम्यां कृत्वा जागरणं निशि ।
अपूजयच्छिवं प्रातः कृशरान्नेन सा सती ॥ १७
माघे तु पौर्णमास्यां सा कृत्वा जागरणं निशि ।
आर्द्रवस्त्रा नदीतीरेऽकरोच्छंकरपूजनम् ॥ १८
तपस्यासितभूतायां कृत्वा जागरणं निशि ।
विशेषतः समानर्च शैलूषैः सर्वयामसु ॥ १ ९
चैत्रे शुक्लचतुर्दश्यां पलाशैर्दमनैः शिवम् ।
अपूजयद्दिवारात्रौ संस्मरन् सा निनाय तम् ॥ २०
राधशुक्ल तृतीयायां तिलाहारयवौदनैः ।
पूजयित्वा सती रुद्रं गव्यैर्मासं निनाय तम् ॥ २१
ज्येष्ठस्य पूर्णिमायां वै रात्रौ संपूज्य शंकरम् ।
वसनैर्बृहतीपुष्पैर्निराहारा निनाय तम् ॥ २२
आषाढस्य चतुर्दश्यां शुक्लायां कृष्णवाससा ।
बृहतीकुसुमैः पूजा रुद्रस्याकारि वै तथा ॥ २३
श्रावणस्य सिताष्टम्यां चतुर्दश्यां च सा शिवम् ।
यज्ञोपवीतैर्वासोभिः पवित्रैरप्यपूजयत् ॥ २४
भाद्रे कृष्णत्रयोदश्यां पुष्पैर्नानाविधैः फलैः ।
संपूज्य च चतुर्दश्यां चकार जलभोजनम् ॥ २५
उन्होंने आश्विनमासकी प्रत्येक नन्दा तिथि– प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशीमें गुड़, भात तथा लवणसे भक्तिपूर्वक हरका पूजन किया, इस प्रकार उस मासको बिता दिया ॥ १४ ॥
कार्तिकमासकी चतुर्दशीको खीर तथा अपूपसे शिवजीकी आराधनाकर वे उनका स्मरण करने लगीं ॥ १५ ॥
वे मार्गशीर्षके कृष्णपक्षकी अष्टमीको यव, तिल एवं चावलसहित कीलोंसे शिवजीका पूजनकर दिन बिताने लगीं ॥ १६ ॥
वे सती पौषमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रात्रिमें जागरण करके प्रातः काल खिचड़ीसे शिवका पूजन करने लगीं ॥१७ ॥
माघकी पूर्णिमा तिथिको रात्रिमें जागरणकर प्रातः काल भीगे कपड़े पहनकर वे नदीके किनारे शिवका पूजन करने लगीं ॥१८ ॥
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशीको रात्रिमें जागरणकर सब प्रहरोंमें बिल्वपत्र तथा बिल्वफलसे शिवकी विशेष पूजा करने लगीं ॥ १ ९ ॥ चैत्र शुक्ल चतुर्दशीको वे सती पलाशपुष्प तथा दवनों [ दौनों ] -से शिवजीकी पूजा करती थीं और दिन - रात उनका स्मरण करती हुई समय व्यतीत करती थीं ॥२० ॥
वैशाख शुक्ल तृतीयाको गव्य, तिलाहार, यव एवं चावलोंसे शिवजीका पूजनकर उस मासको व्यतीत करने लगीं ॥ २१ ॥
ज्येष्ठकी पूर्णिमाके दिन निराहार रहकर रात्रिमें वस्त्र एवं भटकटैयाके पुष्पोंसे शिवजीका पूजन करके वे सती उस मासको व्यतीत करने लगीं ॥ २२ ॥
वे आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशीको काले वस्त्र एवं भटकटैयाके पुष्पोंसे शिवजीकी पूजा करने लगीं ॥ २३ ॥
वे श्रावण शुक्ल अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथिको पवित्र यज्ञोपवीत तथा वस्त्रोंसे शिवका पूजन करने लगीं ॥२४ ॥
भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशीको अनेक प्रकारके पुष्पों तथा फलोंसे शिवका पूजन करके वे चतुर्दशी तिथिमें । केवल जलका आहार करती थीं ॥ २५ ॥
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३७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ नानाविधैः फलैः पुष्पैः सस्यैस्तत्कालसंभवैः । इस प्रकार वे परिमित आहार करके जप करती चक्रे सुनियताहारा जपन्मासे शिवार्चनम् ॥ २६ हुई उन - उन कालोंमें उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके सर्वमासे सर्वदिने शिवार्चनरता सती दृढव्रताभवद्देवी स्वेच्छाधृतनराकृतिः इत्थं नंदाव्रतं कृत्स्नं समाप्य सुसमाहिता दध्यौ शिवं सती प्रेम्णा निश्चलाभूदनन्यधीः
एतस्मिन्नन्तरे देवा मुनयश्चाखिला मुने ।
विष्णुं मां च पुरस्कृत्य ययुर्द्रष्टुं सतीतपः ॥
दृष्टागत्य सती देवैर्मूर्ता सिद्धिरिवापरा ।
शिवध्यानमहामग्ना सिद्धावस्थां गता तदा ॥
चक्रुः सर्वे सुराः सत्यै मुदा साञ्जलयो नतिम् ।
मुनयश्च नतस्कंधा विष्ण्वाद्याः प्रीतमानसाः ॥
अथ सर्वे सुप्रसन्नाः विष्ण्वाद्याश्च सुरर्षयः ।
प्रशशंसुस्तपस्तस्याः सत्यास्तस्मात्सविस्मयाः ॥
ततः प्रणम्य तां देवीं पुनस्ते मुनयः सुराः ।
जग्मुर्गिरिवरं सद्यः कैलासं शिववल्लभम् ॥
सावित्रीसहितश्चाहं सह लक्ष्म्या मुदान्वितः । | फल, पुष्प तथा शस्योंद्वारा प्रत्येक महीने शिवार्चन करती थीं ॥ २६ ॥
। अपनी इच्छासे मानवरूप धारण करनेवाली वे ॥ २७ सती दृढ़ व्रतसे युक्त होकर सभी महीनोंमें तथा सभी दिनोंमें शिवपूजनमें तत्पर रहने लगीं ॥२७ ॥
। इस प्रकार नन्दाव्रतको पूर्णरूपसे समाप्त ॥ २८ करके भगवान् शिवमें अनन्य भाव रखनेवाली सती एकाग्रचित्त होकर बड़े प्रेमसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं तथा उनके ध्यानमें ही निश्चलभावसे स्थित हो गयीं ॥ २८ ॥
हे मुने! इसी समय सब देवता और ऋषि २ ९ भगवान् विष्णुको और मुझको आगे करके सतीकी तपस्या देखनेके लिये गये ॥ २ ९ ॥ वहाँ आकर देवताओंने देखा कि सती मूर्तिमती ३० दूसरी सिद्धिके समान जान पड़ती हैं । वे उस समय भगवान् शिवके ध्यानमें निमग्न थीं और सिद्धावस्थामें पहुँच गयी थीं ॥३० ॥
विष्णु आदि समस्त देवताओं तथा मुनियोंने ३१ प्रसन्नचित्त होकर दोनों हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर प्रेमपूर्वक सतीको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥
इसके बाद अति प्रसन्न श्रीविष्णु आदि सब ३२ देवता और मुनिगण आश्चर्यचकित होकर सती देवीकी तपस्याकी [ भूरि - भूरि ] प्रशंसा करने लगे ॥ ३२ ॥
तदनन्तर वे सभी देवता और ऋषिगण सती ३३ देवीको पुनः प्रणामकर भगवान् शिवजीके परमप्रिय श्रेष्ठ कैलास पर्वतपर शीघ्र ही चले गये ॥ ३३ ॥
लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु और सावित्री-वासुदेवोऽपि भगवाञ्जगामाथ हरान्तिकम् ॥ ३४ सहित मैं भी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवके समीप गया ॥ ३४ ॥
वहाँ पहुँचकर आश्चर्यचकित होकर सभी लोगोंने | प्रभुका दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ गत्वा तत्र प्रभुं दृष्ट्वा सुप्रणम्य ससंभ्रमाः । जोड़कर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे वे उनकी स्तुति तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः करौ बद्ध्वा विनम्रकाः ॥ ३५ करने लगे ॥ ३५ ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३७१ देवा ऊचुः
नमो भगवते तुभ्यं यत एतच्चराचरम् ।
पुरुषाय महेशाय परेशाय महात्मने ॥ ३६
आदिबीजाय सर्वेषां चिद्रूपाय पराय च ।
ब्रह्मणे निर्विकाराय प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ ३७
य इदं प्रतिपच्येदं येनेदं विचकास्ति हि ।
यस्मादिदं यतश्चेदं यस्येदं त्वं च यत्रतः ॥ ३८
योऽस्मात्परस्माच्च परो निर्विकारी महाप्रभुः ।
ईक्षते यः स्वात्मनीदं तं नताः स्म स्वयंभुवम् ॥ ३ ९
अविद्धदृक् परः साक्षी सर्वात्मानेकरूपधृक् ।
आत्मभूतः परब्रह्म तपन्तं शरणं गताः ॥ ४०
न यस्य देवा ऋषयः सिद्धाश्च न विदुः पदम् ।
कः पुनर्जंतुरपरो ज्ञातुमर्हति वेदितुम् ॥ ४१
दिदृक्षवो यस्य पदं मुक्तसङ्गाः सुसाधवः ।
चरन्ति सुगतिर्नस्त्वं सलोकव्रतमव्रणम् ॥ ४२
त्वज्जन्मादिविकारा नो विद्यन्ते केऽपि दुःखदाः ।
तथापि मायया त्वं हि गृह्णासि कृपया च तान् ॥ ४३
तस्मै नमः परेशाय तुभ्यमाश्चर्यकर्मणे ।
नमो गिरां विदूराय ब्रह्मणे परमात्मने ॥ ४४
अरूपायोरुरूपाय परायानन्तशक्तये ।
त्रिलोकपतये सर्वसाक्षिणे सर्वगाय च ॥ ४५
नम आत्मप्रदीपाय निर्वाणसुखसंपदे ।
ज्ञानात्मने नमस्तेऽस्तु व्यापकायेश्वराय च ॥ ४६
नैष्कर्म्येण सुलभ्याय कैवल्यपतये नमः ।
पुरुषाय परेशाय नमस्ते सर्वदाय च ॥ ४७
देवता बोले- परम पुरुष, महेश्वर, परमेश्वर और महान् आत्मावाले, सभी प्राणियोंके आदिबीज, चेतन-स्वरूप, परात्पर, ब्रह्मस्वरूप, निर्विकार और प्रकृति तथा पुरुषसे परे उन आप भगवान्को नमस्कार है, जिनसे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है ॥ ३६-३७ ॥ जो प्रपंचरूपसे स्वयं सृष्टिस्वरूप हैं तथा जिनकी सत्तासे समस्त संसार भासित हो रहा है, जिनके द्वारा यह जगत् उत्पन्न हुआ है, जिनके अधीन यह समस्त जगत् है, जिनका यह सब कुछ है ॥ ३८ ॥
जो इस जगत्के बाहर तथा भीतर व्याप्त हैं, जो निर्विकार और महाप्रभु हैं, जो अपनी आत्मामें ही इस समस्त विश्वको देखते हैं, उन स्वयम्भू परमेश्वरको हमलोग नमस्कार कर रहे हैं ॥ ३ ९ ॥ जिनकी दृष्टि कही नहीं रुकती, जो परात्पर, सभी प्राणियोंके साक्षी, सर्वात्मा, अनेक रूपोंको धारण करनेवाले, आत्मस्वरूप, परब्रह्म तथा तप करनेवाले हैं, हमलोग उनकी शरणमें आये हैं ॥ ४० ॥
देवता, ऋषि तथा सिद्ध भी जिनके पदको नहीं जानते हैं तो फिर अन्य प्राणी उनको किस प्रकार जान सकते हैं? और किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं? जिनको देखनेके लिये मुक्तसंग साधुजन ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका आचरण करते हैं, वे आप हमारी उत्तम गति हैं ॥ ४१-४२ ॥ हे प्रभो! दुःख देनेवाले जन्मादि कोई भी विकार आपमें नहीं होते, फिर भी आप अपनी मायासे कृपापूर्वक उन्हें ग्रहण करते हैं ॥४३ ॥
आश्चर्यमय कर्म करनेवाले उन आप परमात्माको नमस्कार है । वाणीसे सर्वथा परे आप परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ॥४४ ॥
बिना रूपके होते हुए भी बहुत रूपोंवाले, परात्पर, अनन्तशक्तिसे समन्वित, त्रिलोकपति, सर्वसाक्षी तथा सर्वव्यापीको नमस्कार है । स्वयं प्रकाशमान, निर्वाणसुख तथा सम्पत्तिस्वरूप, ज्ञानात्मा तथा व्यापक आप ईश्वरको नमस्कार है॥४५-४६ ॥ निष्काम कर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले कैवल्य-पतिको नमस्कार है । परम पुरुष, परमेश्वर तथा सब । कुछ देनेवाले आप प्रभुको नमस्कार है ॥४७ ॥
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३७२ क्षेत्रज्ञायात्मरूपाय सर्वप्रत्ययहेतवे सर्वाध्यक्षाय महते मूलप्रकृतये नमः पुरुषाय परेशाय नमस्ते सर्वदाय च त्रिनेत्रायेषुवक्त्राय सदाभासाय ते नमः सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे निष्कारण नमोऽस्तु ते त्रिलोककारणायाथापवर्गाय नमो नमः श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १५ ॥ ४८ क्षेत्रज्ञ, आत्मस्वरूप, सभी प्रत्ययोंके सबके पति, महान् तथा मूलप्रकृतिको नमस्कार हेतु हैं ॥ पुरुष, परेश तथा सब कुछ प्रदान करनेवाले आप ॥ ४ ९ [ परमात्मा ] -को नमस्कार है॥४८-४९ ॥ । हे कारणरहित! त्रिनेत्र, पाँच मुखवाले तथा ॥ ५० सर्वदा ज्योति: स्वरूप! आपको नमस्कार है । सभी इन्द्रियों और गुणोंको देखनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है ॥ ५० ॥
। तीनों लोकोंके कारण, मुक्तिस्वरूप, मोक्ष अपवर्गप्रदायाशु शरणागततारिणे ॥ ५१ प्रदान करनेवाले, शीघ्र ही शरणागतको तारनेवाले, सर्वाम्नायागमानां चोदधये परमेष्ठिने । आम्नाय [ वेद ] तथा आगमशास्त्रके समुद्र, परमेष्ठी परायणाय भक्तानां गुणानां च नमोऽस्तु ते ॥ ५२ तथा भक्तोंके आश्रयरूप आप प्रभुको नमस्कार है ॥५१-५२ ॥ नमो गुणारणिच्छन्नचिदूष्माय महेश्वर । हे महेश्वर! आप गुणरूपी अरणीसे मूढदुष्प्राप्तरूपाय ज्ञानद्वासिने सदा ॥५३ | आच्छन्न, चित्स्वरूप, अग्निरूप, मूर्खोके द्वारा प्राप्त
पशुपाशविमोक्षाय भक्तसन्मुक्तिदाय च ।
स्वप्रकाशाय नित्यायाव्ययायाजस्त्रसंविदे ॥
प्रत्यद्रष्ट्रे ऽविकाराय परमैश्वर्यधारिणे ।
यं भजन्ति चतुर्वर्गं कामयन्तीष्टसद्गतिम् ।
सोऽभूदकरुणस्त्वं नः प्रसन्नो भव ते नमः ॥
एकान्तिनः कञ्चनार्थं भक्ता वांछंति यस्य न ।
केवलं चरितं ते ते गायन्ति परमङ्गलम् ॥
अक्षरं परमं ब्रह्म तमव्यक्ताकृतिं विभुम् ।
अध्यात्मयोगगम्यं त्वां परिपूर्णं स्तुमो वयम् ॥
अतीन्द्रियमनाधारं सर्वाधारमहेतुकम् । अनन्तमाद्यं सूक्ष्मं त्वां प्रणमामोऽखिलेश्वर न होनेवाले, ज्ञानियोंके हृदयमें सदा निवास करनेवाले, संसारी जीवोंके बन्धनको काटनेवाले, उत्तम भक्तोंको ५४ मुक्ति प्रदान करनेवाले, स्वप्रकाशस्वरूप, नित्य, अव्यय, निरन्तर ज्ञानस्वरूप, प्रत्यक्ष द्रष्टा, अविकारी तथा परम ऐश्वर्य धारण करनेवाले हैं, आप प्रभुको नमस्कार है॥५३-५४९ / २ ॥ लोग धर्म - अर्थ - काम - मोक्षके लिये जिनका भजन ५५ करते हैं तथा जिनसे अपनी सद्गति चाहते हैं, ऐसे [ हे प्रभो! ] आप हम सभीके लिये दयारहित कैसे हो गये? हमपर प्रसन्न हों, आपको नमस्कार है ॥ ५५ ॥
आपके अनन्य भक्त आपसे किसी अन्य अर्थकी ५६ अपेक्षा नहीं करते हैं, वे तो केवल आपके मंगलस्वरूप चरित्रको ही गाया करते हैं ॥५६ ॥
अविनाशी, परब्रह्म, अव्यक्तस्वरूपवाले, व्यापक, ५७ अध्यात्म तथा योगसे जाननेयोग्य तथा परिपूर्ण आप प्रभुकी हमलोग स्तुति करते हैं ॥५७ ॥
हे अखिलेश्वर! इन्द्रियोंसे परे, स्वयं आधाररहित, ॥ ५८ सबके आश्रय, हेतुरहित, अनन्त, आद्य और सूक्ष्म आप प्रभुको हम सभी प्रणाम करते हैं ॥५८ ॥
हर्यादयोऽखिला देवास्तथा लोकाश्चराचराः आपने अपनी तुच्छ कलामात्रसे नामरूपके द्वारा नामरूपविभेदेन । । विष्णु आदि सभी देवताओं तथा इस चराचर जगत्की
फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ ५ ९ । [ अलग - अलग ] सृष्टि की है ॥५ ९ ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३७३
यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्यान्ति निर्यान्ति वासकृत् ।
गभस्तयस्तथायं वै प्रवाहो गौण उच्यते ॥
न त्वं देवोऽसुरो मर्त्यो न तिर्यङ् न द्विजः प्रभो ।
न स्त्री न षंढो न पुमान्सदसन्न च किंचन ॥
निषेधशेषः सर्वं त्वं विश्वकृद्विश्वपालकः ।
विश्वलयकृद्विश्वात्मा प्रणताः स्मः तमीश्वरम् ॥
योगरंधितकर्माणो यं प्रपश्यन्ति योगिनः ।
योगसंभाविते चित्ते योगेशं त्वां नता वयम् ॥
नमोऽस्तु तेऽसह्यवेग शक्तित्रय त्रयीमय ।
नमः प्रपन्नपालाय नमस्ते भूरिशक्तये ॥
कदिंद्रियाणां दुर्गेशानवाप्य परवर्त्मने ।
भक्तोद्धाररतायाथ नमस्ते गूढवर्चसे ॥
यच्छक्त्याहंधियात्मानं हन्त वेद न मूढधीः ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं त्वां नताः स्मो महाप्रभुम् ॥
ब्रह्मोवाच इति स्तुत्वा महादेवं सर्वे विष्ण्वादिकाः सुराः तूष्णीमासन्प्रभोरग्रे सद्भक्तिनतकंधराः जैसे अग्निकी चिनगारियाँ तथा सूर्यकी किरणें ६० बार -बार निकलती हैं और फिर उन्हींमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार सृष्टिका यह प्रवाह त्रिगुणात्मक कहा जाता है ॥६० ॥
हे प्रभो! आप न देवता हैं, न असुर हैं, न मनुष्य ६१ हैं, न पक्षी हैं, न द्विज हैं, न स्त्री हैं, न पुरुष हैं, न नपुंसक हैं; यहाँतक कि सत् - असत् कुछ भी नहीं हैं । श्रुतियोंके निषेधसे जो शेष बचता है, ६२ वही निषेध - स्वरूप आप हैं । आप विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले, विश्वके पालक, विश्वका लय करनेवाले तथा विश्वात्मा हैं, उन ईश्वरको हम सभी प्रणाम करते हैं॥६१-६२ ॥ योगसे दग्ध हुए कर्मवाले योगीलोग अपने ६३ योगासक्त चित्तमें जिन्हें देखते हैं, ऐसे आप योगेश्वरको हमलोग नमस्कार करते हैं ॥ ६३ ॥
हे तीनों शक्तियोंसे सम्पन्न असह्य वेगवाले! ६४ हे त्रयीमय! आपको नमस्कार है । अनन्त शक्तियोंसे युक्त तथा शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले आपको नमस्कार है ॥६४ ॥
हे दुर्गेश! दूषित इन्द्रियवालोंके लिये आप ६५ सर्वथा दुष्प्राप्य हैं; क्योंकि आपको प्राप्त करनेका मार्ग ही दूसरा है । सदा भक्तोंके उद्धारमें तत्पर रहनेवाले तथा गुप्त शक्तिसे सम्पन्न आप प्रभुको ६६ नमस्कार है । जिनकी मायाशक्तिके कारण अहंबुद्धिसे युक्त मूर्ख अपने स्वरूपको नहीं जान पाता है, उन दुरत्यय महिमावाले आप महाप्रभुको हम नमस्कार करते हैं ॥ ६५-६६ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके मस्तक झुकाये हुए विष्णु 1 आदि सभी देवता उत्तम भक्तिसे युक्त हो प्रभु ॥ ६७ । शिवजीके आगे चुपचाप खड़े हो गये ॥ ६७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे नंदाव्रतविधानशिवस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें नन्दाव्रतविधि तथा शिवस्तुतिवर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
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३७४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ अथ षोडशोऽध्यायः ब्रह्मा और विष्णुद्वारा शिवसे विवाहके लिये प्रार्थना करना तथा उनकी इसके लिये स्वीकृति ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- भगवान् विष्णु आदि इति स्तुतिं च हर्यादिकृतामाकर्ण्य शंकरः । देवताओंद्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर सबकी बभूवातिप्रसन्नो हि विजहास च सूतिकृत् ॥ १ उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और जोरसे हँसे ॥१ ॥
ब्रह्मविष्णू तु दृष्ट्वा तौ सस्त्रीको सङ्गतौ हरः । सपत्नीक ब्रह्माजी और भगवान् विष्णुको साथ यथोचितं समाभाष्य पप्रच्छागमनं तयोः रुद्र उवाच हे हरे हे विधे देवा मुनयश्चाद्य निर्भयाः निजागमनहेतुं हि कथयध्वं सुतत्त्वतः किमर्थमागता यूयं किं कार्यं चेह विद्यते तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि भवत्स्तुत्या प्रसन्नधीः ब्रह्मोवाच इति पृष्टे हरेणाहं सर्वलोकपितामहः । मुनेऽवोचं महादेवं विष्णुना परिचोदितः देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो । यदर्थमागतावावां तच्छृणु त्वं सुरर्षिभिः
विशेषतस्तवैवार्थमागता वृषभध्वज ।
सहार्थिनः सदा योग्यमन्यथा न जगद्भवेत् ॥
केचिद्भविष्यन्त्यसुरा मम वध्या महेश्वर ।
हरेर्वध्यास्तथा केचिद्भवतश्चापि केचन ॥
केचित्त्वद्वीर्यजातस्य तनयस्य महाप्रभो ।
मायावध्याः प्रभो केचिद्भविष्यन्त्यसुराः सदा ॥
तवैव कृपया शंभोः सुराणां सुखमुत्तमम् ।
नाशयित्वासुरान् घोराञ्जगत्स्वास्थ्यं सदाभयम् ॥
॥ २ आया हुआ देखकर महादेवजीने हमलोगोंसे यथोचित वार्तालाप करके हमारे आगमनका कारण पूछा ॥२ ॥
रुद्र बोले — हे हरे! हे विधे! हे देवताओ और । महर्षियो! आपलोग आज निर्भय होकर अपने आनेका ॥ ३ ठीक - ठीक कारण बताइये । आपलोगोंकी स्तुतिसे मैं [ बहुत ही ] प्रसन्न हूँ । आपलोग । हैं, कौन - सा कार्य आ पड़ा है, ॥ ४ चाहता हूँ॥३-४ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! प्रकार पूछनेपर सभी लोकोंका ॥ ५ भगवान् विष्णुकी आज्ञासे कहने हे देवाधिदेव! हे महादेव! किसलिये यहाँ आये वह सब मैं सुनना महादेवजीके इस पितामह मैं ब्रह्मा लगा ॥५ ॥
हे करुणासागर! हे ॥ ६ प्रभो! हम दोनों इन देवताओं और मुनियोंके साथ जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसे सुनिये ॥ ६ ॥
हे वृषभध्वज! विशेष रूपसे आपके लिये ही ७ हमलोग यहाँ आये हैं; क्योंकि हम तीनों सहायतार्थी हैं, [ सृष्टिचक्रके संचालनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये एक - दूसरेके सहायक हैं ] सहार्थीको सदा परस्पर यथायोग्य सहयोग करना चाहिये, अन्यथा यह जगत् टिक नहीं सकता ॥ ७ ॥
हे महेश्वर! कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे, जो ८ मेरे द्वारा मारे जायँगे, कुछ भगवान् विष्णुके द्वारा • और कुछ आपके द्वारा वध्य होंगे । हे महाप्रभो! कुछ आपके वीर्यसे उत्पन्न पुत्रद्वारा मारे जायँगे और कुछ असुर ९ आपकी मायाके द्वारा वधको प्राप्त होंगे ॥ ८ - ९ ॥ आप भगवान् शंकरकी कृपासे ही देवताओंको सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा । घोर असुरोंका विनाश करके आप जगत्को सदा स्वास्थ्य एवं अभय प्रदान १० करेंगे ॥ १० ॥
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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३७५
योगयुक्ते त्वयि सदा रागद्वेषविवर्जिते ।
दयामात्रैकनिरते न वध्या ह्यथवा तव ॥
आराधितेषु तेष्वीश कथं सृष्टिस्तथा स्थितिः ।
अतश्च भविता युक्तं नित्यं नित्यं वृषध्वज ॥
सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि न कार्याणि यदा तदा ।
शरीरभेदमस्माकं मायायाश्च न युज्यते ॥
एकस्वरूपा हि वयं भिन्ना: कार्यस्य भेदतः ।
कार्यभेदो न सिद्धश्चेद्रूपभेदोऽप्रयोजनः ॥
एक एव त्रिधा भिन्नः परमात्मा महेश्वरः ।
मायायाः कारणादेव स्वतंत्र लीलया प्रभुः ॥
वामाङ्गजो हरिस्तस्य दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम् ।
शिवस्य हृदयाज्जातस्त्वं हि पूर्णतनुः शिवः ॥
इत्थं वयं त्रिधा भूताः प्रभो भिन्नस्वरूपिणः ।
शिवाशिवसुतास्तत्त्वं हृदा विद्धि सनातन ॥
अहं विष्णुश्च सस्त्रीकौ सञ्जातौ कार्यहेतुतः ।
लोककार्यकरौ प्रीत्या तव शासनतः प्रभो ॥
तस्माद्विश्वहितार्थाय सुराणां सुखहेतवे ।
परिगृह्णीष्व भार्यार्थे रामामेकां सुशोभनाम् ॥
अन्यच्छृणु महेशान पूर्ववृत्तं स्मृतं मया ।
यन्नो पुरः पुरा प्रोक्तं त्वयैव शिवरूपिणा ॥
मद्रूपं परमं ब्रह्मन्नीदृशं भवदङ्गतः ।
प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्रः प्रकीर्तितः ॥
आप राग - द्वेषरहित, योगयुक्त एवं सर्वथा दयालु ११ हैं, इसलिये हो सकता है कि आप असुरोंका वध न करें । हे ईश! जब ये आराधना करके वर प्राप्त कर लेंगे, तब सृष्टिकी स्थिति किस प्रकार रहेगी? १२ इसलिये हे वृषभध्वज! उचित यही है कि आप [ इस सृष्टिकी स्थितिके लिये ] सदैव असुरोंका वध करते रहें ॥ ११-१२ ॥ यदि सृष्टि, पालन तथा संहारकर्म न करने हों, १३ तब हमारा तथा मायाका भिन्न - भिन्न शरीर धारण करना सार्थक नहीं रहेगा ॥ १३ ॥
वास्तवमें हम तीनों एक ही स्वरूपवाले हैं, किंतु १४ कार्यके भेदसे भिन्न - भिन्न शरीर धारण करके स्थित हैं । यदि कार्यभेद न सिद्ध हो, तब तो हमारे रूपभेदका कोई प्रयोजन नहीं है ॥१४ ॥
परमात्मा महेश्वर एक होते हुए भी अपनी १५ मायाके कारण ही तीन रूपोंमें विभक्त हैं, वे प्रभु अपनी लीलासे स्वतन्त्र हैं ॥ १५ ॥
श्रीहरि उनके वामांगसे उत्पन्न हुए हैं, मैं ब्रह्मा १६ उनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ हूँ और आप उन सदाशिवके हृदयसे उत्पन्न हैं, अतः आप ही शिवजीके पूर्ण रूप हैं ॥ १६ ॥
हे प्रभो! इस प्रकार भिन्न स्वरूपवाले हम तीन १७ रूपोंमें प्रकट हैं और जो [ वस्तुतः ] उन शिवाशिवके पुत्र ही हैं । हे सनातन! इस यथार्थ तत्त्वको आप हृदयसे अनुभव कीजिये ॥ १७ ॥
हे प्रभो! मैं और भगवान् विष्णु आपके आदेशसे १८ प्रसन्नतापूर्वक लोककी सृष्टि और पालनका कार्य कर रहे हैं तथा कार्यकारणवश सपत्नीक भी हो गये हैं ॥ १८ ॥
अतः आप भी विश्वहितके लिये तथा देवताओंके १ ९ सुखके लिये एक परम सुन्दरी स्त्रीको पत्नीके रूपमें ग्रहण करें ॥१ ९ ॥ हे महेश्वर! एक और बात सुनिये । मुझे पहले २० वृत्तान्तका स्मरण हो आया है, जिसे पूर्वकालमें आपने ही शिवस्वरूपसे हमारे सामने कहा था ॥ २० ॥
हे ब्रह्मन्! मेरा ऐसा उत्तम रूप आपके अंगसे २१ प्रकट होगा, जो लोकमें रुद्र नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ २१ ॥
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३७६ सृष्टिकर्ताभवद् ब्रह्मा हरिः पालनकारकः लयकारी भविष्यामि रुद्ररूपो गुणाकृतिः स्त्रियं विवाह्य लोकस्य करिष्ये कार्यमुत्तमम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ । आप ब्रह्मा सृष्टिकर्ता होंगे, श्रीहरि जगत्का ॥ २२ पालन करनेवाले होंगे तथा मैं सगुण रुद्ररूप होकर संहार करनेवाला होऊँगा ॥ २२ ॥
। मैं एक स्त्रीके साथ विवाह करके लोकका उत्तम इति संस्मृत्य स्वप्रोक्तं पूर्णं कुरु निजं पणम् ॥ २३ कार्य करूँगा, [ हे स्वामिन्! ] आप अपने द्वारा कहे गये निदेशस्तव च स्वामिन्नहं सृष्टिकरो हरिः पालको लयहेतुस्त्वमाविर्भूतः स्वयं शिवः त्वां विना न समर्थौ हि आवां च स्वस्वकर्मणि लोककार्यरतां तस्मादेकां गृह्णीष्व कामिनीम् ॥ यथा पद्मालया विष्णोः सावित्री च यथा मम । तथा सहचरीं शंभो कान्तां गृह्णीष्व संप्रति ब्रह्मोवाच इति श्रुत्वा वचो मे हि ब्रह्मणः पुरतो हरेः । स मां जगाद लोकेशः स्मेराननमुखो वचनको याद करके अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण कीजिये ॥ २३ ॥
। हे स्वामिन्! आपका आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ ॥ २४ श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहारके हेतु बनकर, प्रकट हों, सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ताके रूपमें । प्रकट हुए हैं । आपके बिना हम दोनों अपना - अपना २५ कार्य करनेमें समर्थ नहीं हैं । अतः आप लोकहितके कार्यमें तत्पर एक कामिनीको स्वीकार करें ॥ २४-२५ ॥ हे शम्भो! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुकी और ॥ २६ सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी सहचरी कान्ताको ग्रहण करें ॥ २६ ॥
ब्रह्माजी बोले – मेरी यह बात सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाले वे लोकेश हर श्रीहरिके सामने मुझसे हरः ॥ २७ कहने लगे —॥२७ ॥
ईश्वर उवाच
हे ब्रह्मन् हे हरे मे हि युवां प्रियतरौ सदा ।
दृष्ट्वा वां च ममानंदो भवत्यतितरां खलु ॥
युवां सुरविशिष्टौ हि त्रिभुवस्वामिनौ किल ।
कथनं वां गरिष्ठेति भवकार्यरतात्मनोः ॥
उचितं न सुरश्रेष्ठौ विवाहकरणं मम ।
तपोरतविरक्तस्य सदा विदितयोगिनः ॥
यो निवृत्तिसुमार्गस्थः स्वात्मारामो निरंजनः ।
अवधूततनुर्ज्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः ॥
अविकारी ह्यभोगी च सदाशुचिरमङ्गलः ।
तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं वदाधुना ॥
केवलं योगलग्नस्य ममानंदः सदास्ति वै ।
ज्ञानहीनस्तु पुरुषो मनुते बहु कामकम् ॥
विवाहकरणं लोके विज्ञेयं परबंधनम् । ईश्वर बोले - हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! आप दोनों मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हैं, आप दोनोंको देखकर २८ मुझे बड़ा आनन्द मिलता है ॥२८ ॥
आपलोग समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ और त्रिलोकीके २ ९ स्वामी हैं । लोकहितके कार्यमें मन लगाये रहनेवाले आपदोनोंका वचन अत्यन्त गौरवपूर्ण है ॥२ ९ ॥ किंतु हे सुरश्रेष्ठगण! सदा तपस्यामें संलग्न रहकर ३० संसारसे विरत रहनेवाले और योगीके रूपमें प्रसिद्ध मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं है; जो निवृत्तिके सुन्दर मार्गपर स्थित, अपनी आत्मामें ही रमण करनेवाला, ३१ निरंजन, अवधूत देहवाला, ज्ञानी, आत्मदर्शी, कामनासे | शून्य, विकाररहित, अभोगी, सदा अपवित्र और अमंगल वेशधारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है, ३२ यह इस समय मुझे बताइये ॥ ३०-३२ ॥ मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर ही ३३ आनन्द आता है, ज्ञानहीन पुरुष ही भोगको अधिक । महत्त्व देता है । संसारमें विवाह करना बहुत बड़ा । बन्धन समझना चाहिये । इसलिये मैं सत्य - सत्य कहता तस्मात्तस्य रुचिनों मे सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ३४ हॅू कि उसमें मेरी अभिरुचि नहीं है । आत्मा ही अपना
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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३७७
न स्वार्थं मे प्रवृत्तिर्हि सम्यक् स्वार्थविचिंतनात् ।
तथापि तत्करिष्यामि भवदुक्तं जगद्धितम् ॥
मत्वा वचो गरिष्ठं वा निजोक्तिपरिपूर्तये ।
करिष्यामि विवाहं वै भक्तवश्यः सदा ह्यहम् ॥
परंतु यादृशीं कांतां ग्रहीष्यामि यथापणम् ।
तच्छृणुष्व हरे ब्रह्मन् युक्तमेव वचो मम ॥
या मे तेजः समर्था हि ग्रहीतुं स्याद्विभागशः ।
तां निदेशय भार्यार्थे योगिनीं कामरूपिणीम् ॥
योगयुक्ते मयि तथा योगिन्येव भविष्यति ।
कामासक्ते मयि तथा कामिन्येव भविष्यति ॥
यमक्षरं वेदविदो निगदन्ति मनीषिणः ।
ज्योतीरूपं शिवं ते च चिंतयिष्ये सनातनम् ॥
तच्चिन्तायां यदासक्तो ब्रह्मन् गच्छामि भाविनीम् ।
तत्र या विघ्नजननी न भवित्री हतास्तु मे ॥
त्वं वा विष्णुरहं वापि शिवस्य ब्रह्मरूपिणः ।
अंशभूता महाभागा योग्यं तदनुचिंतनम् ॥
तच्चिन्तया विनोद्वाहं स्थास्यामि कमलासन ।
तस्माज्जायां प्रादिश त्वं मत्कर्मानुगतां सदा ॥
तत्राप्येकं पणं मे त्वं शृणु ब्रह्मश्च मां प्रति ।
अविश्वासो मदुक्ते चेन्मया त्यक्ता भविष्यति ॥
ब्रह्मोवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वाहं स विष्णुर्हरस्य च ।
सस्मितं मोदितमनोऽवोचं चेति विनम्रकः ॥
उत्तम अर्थ या स्वार्थ है, उसका भलीभाँति चिन्तन ३५ करनेके कारण [ लौकिक ] स्वार्थमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है, तथापि आपने जगत्के हितके लिये हितकर जो कुछ कहा है, उसे मैं करूँगा । आपके वचनको ३६ गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बातको पूर्ण करनेके लिये मैं विवाह अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं सदा अपने भक्तोंके अधीन हूँ ॥ ३३-३६ ॥ हे हरे! हे ब्रह्मन्! परंतु मैं जैसी नारीको प्रिय ३७ पत्नीके रूपमें ग्रहण करूँगा और जिस शर्तके साथ करूँगा, उसे सुनें । मेरा वचन सर्वथा उचित है । जो नारी मेरे तेजको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें समर्थ हो, ३८ उस योगिनी तथा कामरूपिणी स्त्रीको मेरी पत्नी बनानेके लिये बतायें । जब मैं योगमें तत्पर रहूँ, तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं ३ ९ कामासक्त होऊँ, तब उसे भी कामिनीके रूपमें रहना होगा ॥ ३७–३९ ॥ वेदवेत्ता विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं, ४० उन ज्योति: स्वरूप सनातन शिवतत्त्वका मैं सदा । चिन्तन करता हूँ । हे ब्रह्मन्! उन सदाशिवके चिन्तनमें जब मैं न लगा होऊँ तब उस कामिनीके साथ मैं ४१ समागम कर सकता हूँ । जो मेरे शिव - चिन्तनमें विघ्न डालेगी, वह दुर्भगा स्त्री मेरी भार्या न बने ॥ ४०-४१ ॥ आप ब्रह्मा, विष्णु और मैं तीनों ही महाभाग्यशाली ४२ ब्रह्मस्वरूप शिवजीके अंशभूत हैं, अतः हमारे लिये उनका नित्य चिन्तन करना उचित है ॥ ४२ ॥
हे कमलासन! उनके चिन्तनके लिये मैं बिना ४३ विवाहके भी रह लूँगा, किंतु उनका चिन्तन छोड़कर विवाह नहीं करूँगा । अतः आपलोग मुझे इस प्रकारकी पत्नी बताइये, जो सदा मेरे कर्मके अनुकूल चल सके ॥४३ ॥
हे ब्रह्मन्! उसमें भी मेरी एक शर्त है, उसे आप ४४ सुनें । यदि उस स्त्रीका मुझपर और मेरे वचनोंपर अविश्वास होगा, तो मैं उसे त्याग दूँगा ॥ ४४ ॥
ब्रह्माजी बोले — उन रुद्रकी बात सुनकर मैंने और श्रीविष्णुने मन्द मुसकानके साथ मन - ही - मन प्रसन्नताका अनुभव किया, फिर मैंने विनम्र होकर ४५ | यह कहा— ॥ ४५ ॥
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३७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ शृणु नाथ महेशान मार्गिता यादृशी त्वया । हे नाथ! हे महेश्वर! हे प्रभो! आपने निवेदयामि सुप्रीत्या तां स्त्रियं तादृशीं प्रभो उमा सा भिन्नरूपेण सञ्जाता कार्यसाधिनी सरस्वती तथा लक्ष्मीर्द्विधारूपा पुरा प्रभो पद्मा कांताभवद्विष्णोस्तथा मम सरस्वती जिस ॥ ४६ प्रकारकी स्त्रीका निर्देश किया है, वैसी ही स्त्रीके विषयमें मैं आपको प्रसन्नतापूर्वक बता रहा हूँ । ॥ ४६ । वे उमा जगत्की कार्यसिद्धिके लिये भिन्न ॥ ॥ ४७ रूपमें प्रकट हुई हैं । हे प्रभो! सरस्वती और - भिन्न लक्ष्मी । ये दो रूप धारण करके वे पहले ही प्रकट हो चुकी हैं ॥ ४७ ॥
। महालक्ष्मी तो विष्णुकी कान्ता तथा सरस्वती तृतीयरूपा सा नोऽभूल्लोककार्यहितैषिणी ॥ ४८ मेरी कान्ता हुई हैं । लोकहितका कार्य करनेकी दक्षस्य तनया याभूत्सती नाम्ना तु सा विभो सैवेदृशी भवेद्भार्या भवेद्धि हितकारिणी
सा तपस्यति देवेश त्वदर्थं हि दृढव्रता ।
त्वां पतिं प्राप्तुकामा वै महातेजोवती सती ॥
दातुं गच्छ वरं तस्यै कृपां कुरु महेश्वर ।
तां विवाहय सुप्रीत्या वरं दत्त्वा च तादृशम् ॥
हरेर्मम च देवानामियं वाञ्छास्ति शंकर ।
परिपूरय सद्द्दृष्ट्या पश्यामोत्सवमादरात् ॥
मङ्गलं परमं भूयात् त्रिलोकेषु सुखावहम् ।
सर्वज्वरो विनश्येद् वै सर्वेषां नात्र संशयः ॥
अथवास्मद्वचः शेषेऽवदत्तं मधुसूदनः ।
लीलाजाकृतिमीशानं भक्तवत्सलमच्युतः ॥
विष्णुरुवाच देवदेव महादेव करुणाकर शंकर । इच्छावाली वे अब हमारे लिये तीसरा रूप धारण करके प्रकट हुई हैं ॥ ४८ ॥
। हे प्रभो! वे शिवा ‘ सती ' नामसे दक्षपुत्रीके ॥ ४ ९ रूपमें अवतीर्ण हुई हैं । वे ही आपकी ऐसी भार्या हो सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी होंगी ॥ ४ ९ ॥ हे देवेश! वे दृढ़व्रतमें स्थित होकर आपके लिये ५० तप कर रही हैं । वे महातेजस्विनी सती आपको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छुक हैं ॥ ५० ॥
हे महेश्वर! [ उन सतीके ऊपर ] कृपा कीजिये, ५१ उन्हें वर प्रदान करनेके लिये जाइये और वैसा वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये ॥ ५१ ॥
हे शंकर! भगवान् विष्णुकी, मेरी तथा सभी ५२ देवताओंकी यही इच्छा है । आप अपनी शुभ दृष्टिसे हमारी इच्छाको पूर्ण कीजिये, जिससे हम इस उत्सवको आदरपूर्वक देख सकें ॥५२ ॥
ऐसा होनेसे तीनों लोकोंमें सुख देनेवाला परम ५३ मंगल होगा और सबकी समस्त चिन्ताएँ मिट जायँगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥
मेरी बात पूरी होनेपर अच्युत मधुसूदन लीलासे ५४ रूप धारण करनेवाले भक्तवत्सल ईशानसे कहने लगे - ॥ ५४ ॥
विष्णुजी बोले — हे देवाधिदेव! हे महादेव! हे करुणाकर! हे शम्भो! ब्रह्माजीने जो कुछ भी कहा यदुक्तं ब्रह्मणा सर्वं मदुक्तं तन्न संशयः ॥ ५५ है, उसे मेरे द्वारा कहा गया ही समझिये, इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥
तत्कुरुष्व महेशान कृपां कृत्वा ममोपरि । हे महेश्वर! मेरे ऊपर कृपा करके उसे कीजिये, सनाथं कुरु सद्दृष्ट्या | उन सतीसे विवाहकर इस त्रिलोकीको अपनी कृपा-त्रिलोकं सुविवाह्य ताम् ॥ ५६ दृष्टिसे सनाथ कीजिये ॥ ५६ ॥