शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 391–400
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३७ ९ ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा भगवान् विष्णुः तूष्णीमास मुने सुधीः ।
तथास्त्विति विहस्याह स प्रभुर्भक्तवत्सलः ॥ ५७
ततस्त्वावां च संप्राप्य चाज्ञां स मुनिभिः सुरैः ।
अगच्छाव स्वेष्टदेशं सस्त्रीकौ परहर्षितौ ॥ ५८ ।
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां विष्णुब्रह्मकृतशिवप्रार्थनावर्णनं ब्रह्माजी बोले- हे मुने! यह कहकर उत्तम बुद्धिवाले भगवान् विष्णु चुप हो गये, तब भक्तवत्सल भगवान् शिवजीने हँसकर ' तथास्तु ' कहा ॥ ५७ ॥
तत्पश्चात् उनसे आज्ञा प्राप्तकर पत्नियोंसहित हम दोनों मुनियों तथा देवताओंके साथ अपने - अपने अभीष्ट स्थानको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ चले आये ॥५८ ॥
रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे नाम षोडशोऽध्याय: ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें विष्णु और ब्रह्माद्वारा शिवकी प्रार्थनाका वर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः भगवान् शिवद्वारा सतीको वर प्राप्ति और ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सर्वदेवैश्च कृता शंभोर्नुतिः परा ।
शिवाच्च सा वरं प्राप्ता शृणु ह्यादरतो मुने ॥
अथो सती पुनः शुक्लपक्षेऽष्टम्यामुपोषिता ।
आश्विने मासि सर्वेशं पूजयामास भक्तितः ॥
इति नंदावते पूर्णे नवम्यां दिनभागतः ।
तस्यास्तु ध्यानमग्नायाः प्रत्यक्षमभवद् हरः ॥
सर्वाङ्गसुन्दरो गौरः पञ्चवक्त्रस्त्रिलोचनः ।
चंद्रभालः प्रसन्नात्मा शितिकंठश्चतुर्भुजः ॥
त्रिशूलब्रह्मकवराभयधृग्भस्मभास्वरः स्वर्धुन्या विलसच्छीर्षः सकलाङ्गमनोहरः ॥
महालावण्यधामा च कोटिचन्द्रसमाननः ।
कोटिस्मरसमा कांतिः सर्वथा स्त्रीप्रियाकृतिः ॥
शिवका ब्रह्माजीको दक्ष प्रजापतिके पास भेजना ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार मैंने सभी देवताओंके द्वारा की गयी शिवजीकी उत्तम स्तुतिको आपसे कह १ दिया । हे मुने! सतीने जिस प्रकार शिवजीसे वर प्राप्त किया, उसे अब मुझसे सुनो ॥१ ॥
सतीने आश्विनमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी २ तिथिको उपवासकर भक्तिपूर्वक सर्वेश्वर शिवजीका पूजन किया ॥२ ॥
इस प्रकार नन्दाव्रतके पूर्ण हो जानेपर नवमी तिथिका ३ कुछ भाग शेष रह गया था, उस समय ध्यानमें निमग्न उन सतीके सामने शिव प्रकट हो गये ॥ ३ ॥
वे सर्वांगसुन्दर तथा गौरवर्णके थे, उनके पाँच ४ मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन - तीन नेत्र थे । भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पा रहा था, उनका चित्त प्रसन्न था, उनका कण्ठ नीला था और उनकी चार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल - ब्रह्मकपाल - वर तथा अभय मुद्राको धारण कर रखा था, भस्ममय अंगरागसे उनका शरीर उद्भासित हो रहा था, उनके ५ मस्तकपर गंगाजी शोभा बढ़ा रही थीं तथा उनके सभी अंग मनोहर थे, वे परम सौन्दर्यके धाम थे, उनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान था, उनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंके समान थी और उनकी आकृति स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाली ६ | थी॥४–६ ॥
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३८० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ प्रत्यक्षतो हरं वीक्ष्य सती सेदृग्विधं प्रभुम् । इस प्रकारकें प्रभु महादेवजीको ववन्दे चरणौ तस्य सुलज्जावनतानना ॥ ७ देखकर सतीने लज्जासे नीचेकी ओर मुख प्रत्यक्ष अथ प्राह महादेवः सतीं सद्व्रतधारिणीम् तामिच्छन्नपि भार्यार्थं तपश्चर्याफलप्रदः महादेव उवाच
दक्षनंदिनि प्रीतोऽस्मि व्रतेनानेन सुव्रते ।
वरं वरय संदास्ये यत्तवाभिमतं भवेत् ॥
ब्रह्मोवाच
जानन्नपीह तद्भावं महादेवो जगत्पतिः ।
जगौ वरं वृणीष्वेति तद्वाक्यश्रवणेच्छया ॥
सापि त्रपावशा युक्ता वक्तुं नो हृदि यत्स्थितम् ।
शशाक सा त्वभीष्टं यत्तल्लज्जाच्छादितं पुनः ॥
प्रेममग्नाभवत्साति श्रुत्वा शिववचः प्रियम् ।
तज्ज्ञात्वा सुप्रसन्नोऽभूच्छंकरो भक्तवत्सलः ॥
वरं ब्रूहि वरं ब्रूहि प्राहेति स पुनर्द्रुतम् ।
सतीभक्तिवशः शंभुरंतर्यामी सतां गतिः ॥
अथ त्रपां स्वां संधाय यदा प्राह हरं सती ।
यथेष्टं देहि वरद वरमित्यनिवारकम् ॥
तदा वाक्यस्यावसानमनवेक्ष्य वृषध्वजः ।
भव त्वं मम भार्येति प्राह तां भक्तवत्सलः ॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य साभीष्टफलभावनम् ।
तूष्णीं तस्थौ प्रमुदिता वरं प्राप्य मनोगतम् ॥
सकामस्य हरस्याग्रे स्थिता सा चारुहासिनी । अकरोन्निजभावांश्च हावान्कामविवर्धनान् करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया । तपस्याका फल । करनेवाले महादेवजी उत्तम व्रत धारण करनेवाली प्रदान ॥ ८ सतीको पत्नीरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हुए भी उनसे कहने लगे— ॥७-८ ॥ महादेवजी बोले — हे दक्षनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस व्रतसे प्रसन्न हूँ । हे सुव्रते! जो तुम्हारा अभीष्ट वर हो, उसे माँगो, मैं उसे प्रदान करूँगा ॥९ ॥
ब्रह्माजी बोले - – [ मुने! ] जगदीश्वर महादेवने सतीकी भावनाको जानते हुए भी उनकी बात सुननेकी १० इच्छासे ' वर माँगो ' – ऐसा कहा ॥१० ॥
वे लज्जाके वशमें हो गयीं और जो उनके मनमें ११ था, उसे कह न सकीं । उनका जो अभीष्ट था, वह लज्जासे आच्छादित हो गया था । शिवजीका प्रिय १२ वचन सुनकर वे प्रेममें विभोर हो गयीं । इसे जानकर भक्तवत्सल शंकरजी अत्यन्त हर्षित हुए ॥ ११-१२ ॥ सत्पुरुषोंके शरणस्वरूप तथा अन्तर्यामी वे १३ शिवजी सतीकी भक्तिके वशीभूत होकर वर माँगो, वर माँगो - ऐसा शीघ्रतापूर्वक बार - बार कहने लगे ॥ १३ ॥
उस समय सतीने अपनी लज्जाको रोककर १४ शिवजीसे कहा- हे वरद! आप कभी भी न टलनेवाला यथेष्ट वर प्रदान करें ॥१४ ॥
शिवजीने अनुभव किया कि सती अपनी बात १५ पूरी नहीं कर पा रही हैं, एतदर्थ उन्होंने स्वयं ही कहा — हे देवि! तुम मेरी पत्नी बनो ॥ १५ ॥
अपने अभीष्ट फलको प्रकट करनेवाले शिवजीके १६ वचनको सुनकर और अपना मनोगत वर प्राप्त करके । सती प्रसन्न होकर चुपचाप खड़ी रहीं । वे सकाम शिवजीके | सामने मन्द मन्द मुसकराती हुई कामनाको बढ़ानेवाले ॥ १७ अपने हाव - भाव प्रकट करने लगीं ॥ १६-१७ ततो भावान्समादाय शृङ्गाराख्यो रसस्तदा । सतीद्वारा ॥ तयोश्चित्ते विवेशाशु अभिव्यक्त हाव - भावको स्वीकारकर कला हावा यथोदितम् ॥ १८ श्रृंगाररसने उन दोनोंके चित्तमें शीघ्रतासे प्रवेश किया ॥ १८ ॥
तत्प्रवेशात्तु हे देवर्षे! शृंगाररसके प्रवेश करते ही लोकलीला देवर्षे लोकलीलानुसारिणोः । करनेवाले शिवजी तथा सतीकी चित्रासे युक्त चन्द्रमा काप्यभिख्या तयोरासीच्चित्राचन्द्रमसोर्यथा ॥ १ ९ | समान विलक्षण कान्ति हो गयी ॥ १ ९ ॥
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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता (
रेजे सती हरं प्राप्य स्निग्धभिन्नाञ्जनप्रभा ।
चन्द्राभ्याशेऽभ्रलेखेव स्फटिकोज्ज्वलवर्ष्मणः ॥ २०
अथ सा तमुवाचेदं हरं दाक्षायणी मुहुः ।
सुप्रसन्ना करौ बद्ध्वा नतका भक्तवत्सलम् ॥ २१
सत्युवाच
देवदेव महादेव विवाहविधिना प्रभो ।
पितुर्मे गोचरीकृत्य मां गृहाण जगत्पते ॥ २२
ब्रह्मोवाच
एवं सतीवचः श्रुत्वा महेशो भक्तवत्सलः ।
तथास्त्विति वचः प्राह निरीक्ष्य प्रेमतश्च ताम् ॥ २३
दाक्षायण्यपि तं नत्वा शंभुं विज्ञाप्य भक्तितः ।
प्राप्ताज्ञा मातुरभ्याशमगान्मोहमुदान्विता ॥ २४
हरोऽपि हिमवत्प्रस्थं प्रविश्य च निजाश्रमम् ।
दाक्षायणीवियोगाद्वै कृच्छ्रं ध्यानपरोऽभवत् ॥ २५
समाधाय मनः शंभुलौकिकीं गतिमाश्रितः ।
चिंतयामास देवर्षे मनसा मां वृषध्वजः ॥ २६
ततः संचिन्त्यमानोऽहं महेशेन त्रिशूलिना ।
पुरस्तात्प्राविशत्तूर्णं हरसिद्धिप्रचोदितः ॥ २७
यत्रासौ हिमवत्प्रस्थे तद्वियोगी हरः स्थितः ।
सरस्वतीयुतस्तात तत्रैव समुपस्थितः ॥ २८
सरस्वतीयुतं मां च देवर्षे वीक्ष्य स प्रभुः ।
उत्सुकः प्रेमबद्धश्च सत्या शंभुरुवाच ह ॥ २ ९
शंभुरुवाच
अहं ब्रह्मन्स्वार्थपरः परिग्रहकृतौ च यत् ।
तदा स्वत्वमिव स्वार्थे प्रतिभाति ममाधुना ॥ ३०
अहमाराधितः सत्या दाक्षायण्याथ भक्तितः ।
तस्यै वरो मया दत्तो नंदाव्रतप्रभावतः ॥ ३१
सतीखण्ड ) ३८१ काले तथा चिकने अंजनके समान कान्तिवाली सती स्फटिकमणिके सदृश कान्तियुक्त उन शिवजीको प्राप्तकर इस प्रकार शोभित हुईं, जिस प्रकार अभ्रलेखा [ मेघघटा ] चन्द्रमाको प्राप्तकर शोभित होती है ॥ २० ॥
तदनन्तर दक्षकन्या सती अत्यन्त प्रसन्न होकर दोनों हाथोंको जोड़कर भक्तवत्सल भगवान् शिवजीसे विनम्रता - पूर्वक कहने लगीं— ॥ २१ ॥
सती बोलीं – हे देवदेव! हे महादेव! हे प्रभो! हे जगत्पते! आप मेरे पिताके समक्ष वैवाहिक विधिसे मुझे ग्रहण कीजिये ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले - – हे नारद! इस प्रकार सतीकी बात सुनकर भक्तवत्सल महादेवजीने प्रेमपूर्वक उनकी ओर देखकर यह वचन कहा— - ऐसा ही होगा ॥ २३ ॥
तब दक्षकन्या सती भी उन शिवजीको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक विदा माँगकर और पुनः उनकी आज्ञा प्राप्त करके मोह और आनन्दसे युक्त हो अपनी माताके पास चली गयीं । शिवजी भी हिमालयके शिखरपर अपने आश्रममें प्रवेश करके दक्षकन्या सतीके वियोगके कारण बड़ी कठिनाईसे ध्यानमें तत्पर हो सके ॥ २४-२५ ॥ देवर्षे! मनको एकाग्र करके लौकिक गतिका आश्रय लेकर वृषध्वज शंकरने मन - ही - मन मेरा स्मरण किया ॥ २६ ॥
तब त्रिशूलधारी महेश्वरके स्मरण करनेपर उनकी सिद्धिसे प्रेरित होकर मैं शीघ्र ही उनके समीप पहुँच गया और हे तात! हिमालयके शिखरपर जहाँ सतीके वियोगजनित दुःखका अनुभव करनेवाले महादेवजी विद्यमान थे, वहीं मैं सरस्वतीसहित उपस्थित हो गया ॥ २७-२८ ॥ हे देवर्षे! तदनन्तर सरस्वतीसहित मुझ ब्रह्माको देखकर सतीके प्रेममें बँधे हुए शिवजी उत्सुकतापूर्वक कहने लगे —॥२ ९ ॥ शम्भु बोले – हे ब्रह्मन्! मैं जबसे विवाहके कार्यमें स्वार्थबुद्धि कर बैठा हूँ, तबसे अब मुझे इस स्वार्थमें ही स्वत्व - सा प्रतीत हो रहा है ॥ ३० ॥
दक्षकन्या सतीने बड़े भक्तिभावसे मेरी आराधना की है और मैंने नन्दाव्रतके प्रभावसे उसे । [ अभीष्ट ] वर दे दिया है ॥३१ ॥
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३८२ भर्ता भवेति च तया मत्तो ब्रह्मन् वरो वृतः मम भार्या भवेत्युक्तं मया तुष्टेन सर्वथा अथावदत्तदा मां सा सती दाक्षायणी त्विति पितुमें गोचरीकृत्य मां गृहाण जगत्पते
तदप्यङ्गीकृतं ब्रह्मन्मया तद्भक्तितुष्टितः ।
सा गता भवनं मातुरहमत्रागतो विधे ॥
तस्मात्त्वं गच्छ भवनं दक्षस्य मम शासनात् ।
तां दक्षोऽपि यथा कन्यां दद्यान्मेऽरं तथा वद ॥
सतीवियोगभङ्गः स्याद्यथा मे त्वं तथा कुरु ।
समाश्वासय तं दक्षं सर्वविद्याविशारदः ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युदीर्य महादेवः सकाशे मे प्रजापतेः ।
सरस्वतीं विलोक्याशु वियोगवशगोऽभवत् ॥
तेनाहमपि चाज्ञप्तः कृतकृत्यो मुदान्वितः ।
प्रावोचं चेति जगतां नाथं तं भक्तवत्सलम् ॥
ब्रह्मोवाच
यदात्थ भगवन् शम्भो तद्विचार्य सुनिश्चितम् ।
मुख्यः स्वार्थो हि देवानां ममापि वृषभध्वज ॥
दक्षस्तुभ्यं सुतां स्वां च स्वयमेव प्रदास्यति । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ । हे ब्रह्मन्! उस सतीने मुझसे यह वर माँगा कि ॥ ३२ आप मेरे पति हो जाइये । तब सर्वथा सन्तुष्ट होकर । मैंने भी कह दिया कि तुम मेरी पत्नी हो जाओ ॥ । तदनन्तर उस सतीने मुझसे कहा- हे जगत्पते ३२ ॥ ॥ ३३ मेरे पिताको सूचित करके [ वैवाहिक विधिका! ' पालन । करते हुए ] मुझे ग्रहण कीजिये । हे ब्रह्मन्! उसकी भक्तिसे सन्तुष्ट हुए मैंने उसे भी स्वीकार कर ३४ लिया । हे विधे! [ इस प्रकारका वर प्राप्तकर ] सती अपनी माताके पास चली गयी और मैं यहाँ चला आया ॥ ३३-३४ ॥ इसलिये हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञासे दक्षके घर ३५ जाइये और वे दक्षप्रजापति जिस प्रकार मुझे शीघ्र अपनी कन्या प्रदान करें, उस प्रकार उनसे कहिये ॥ ३५ ॥
जिस प्रकार मेरा सतीवियोग भंग हो, वैसा ३६ उपाय आप कीजिये । आप सभी प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हैं, अतः [ इस बात के लिये ] दक्षप्रजापतिको समझाइये ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले- यह कहकर वे शिवजी मुझ ब्रह्माके समीप स्थित सरस्वतीको देखकर शीघ्र ही ३७ सतीके वियोगके वशीभूत हो गये ॥३७ ॥
उनकी आज्ञा पाकर मैं कृतकृत्य और प्रसन्न हो ३८ गया तथा उन भक्तवत्सल जगत्पतिसे यह कहने लगा- ॥ ३८ ॥
ब्रह्माजी बोले — भगवन्! हे शम्भो! आपने जो कुछ कहा है, उसपर भलीभाँति विचार करके ३ ९ हमलोगोंने [ पहले ही ] उसे सुनिश्चित कर दिया है । हे वृषभध्वज! इसमें देवताओंका और मेरा भी मुख्य स्वार्थ है । दक्ष प्रजापति स्वयं ही आपको अपनी पुत्री अहं चापि वदिष्यामि त्वद्वाक्यं तत्समक्षतः ॥ ४० प्रदान करेंगे और मैं भी उनके समक्ष आपका वचन ब्रह्मोवाच कह दूँगा ॥३ ९ -४० ॥ इत्युदीर्य महादेवमहं सर्वेश्वरं प्रभुम् । ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] सर्वेश्वर प्रभु अगमं दक्षनिलयं स्यंदनेनातिवेगिना | महादेवजीसे इस प्रकार कहकर मैं अत्यन्त वेगशाली ॥ ४१ रथसे दक्षके घर जा पहुँचा ॥४१ ॥
नारद उवाच नारदजी बोले - हे प्राज्ञ! हे महाभाग! हे विधे! विधे प्राज्ञ महाभाग वद नो वदतां वर । | हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! [ तपस्याके ] घर लौटकर सत्यै गृहागतायै स दक्षः किमकरोत्ततः ॥ ४२ | आयी हुई सतीके लिये दक्षने क्या पश्चात् किया? ॥ ४२ ॥
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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता ( ब्रह्मोवाच
तपस्तप्त्वा वरं प्राप्य मनोऽभिलषितं सती ।
गृहं गत्वा पितुर्मातुः प्रणाममकरोत्तदा ॥ ४३
मात्रे पित्रेऽथ तत्सर्वं समाचख्यौ महेश्वरात् ।
वरप्राप्तिः स्वसख्या वै सत्यास्तुष्टात्तु भक्तितः ॥ ४४
माता पिता च वृत्तान्तं सर्वं श्रुत्वा सखीमुखात् ।
आनन्दं परमं लेभे चक्रे च परमोत्सवम् ॥ ४५
द्रव्यं ददौ द्विजातिभ्यो यथाभीष्टमुदारधीः ।
अन्येभ्यश्चांधदीनेभ्यो वीरिणी च महामनाः ॥ ४६
वीरिणी तां समालिंग्य स्वसुतां प्रीतिवर्द्धिनीम् ।
मूर्क्युपाघ्राय मुदिता प्रशशंशुर्मुहुर्मुहुः ॥ ४७
अथ दक्षः कियत्काले व्यतीते धर्मवित्तमः ।
चिन्तयामास देयेयं स्वसुता शम्भवे कथम् ॥ ४८
आगतोऽपि महादेवः प्रसन्नः स जगाम ह ।
पुनरेव कथं सोऽपि सुतार्थेऽत्रागमिष्यति ॥ ४ ९
प्रस्थाप्योऽथ मया कश्चिच्छंभोर्निकटमञ्जसा ।
नैतद्योग्यं न गृह्णीयाद्यद्येवं विफलार्दना ॥ ५०
अथवा पूजयिष्यामि तमेव वृषभध्वजम् ।
मदीयतनया भक्त्या स्वयमेव यथा भवेत् ॥ ५१
तयैव पूजितः सोऽपि वाञ्छत्यार्यप्रयत्नतः ।
शंभुर्भवतु मद्भर्तेत्येवं दत्तवरेण तत् ॥ ५२
इति चिन्तयतस्तस्य दक्षस्य पुरतोऽन्वहम् ।
उपस्थितोऽहं सहसा सरस्वत्यन्वितस्तदा ॥ ५३
मां दृष्ट्वा पितरं दक्षः प्रणम्यावनतः स्थितः । सतीखण्ड ) ३८३ ब्रह्माजी बोले- - तपस्या करके मनोऽभिलषित वर प्राप्तकर तथा घर जाकर सतीने माता - पिताको प्रणाम किया । तत्पश्चात् सतीने अपनी सखीके द्वारा माता - पितासे वह सारा वृत्तान्त कहलवाया, जिस प्रकार उनकी भक्तिसे प्रसन्न हुए महेश्वरसे उन्हें वरकी प्राप्ति हुई थी ॥ ४३-४४ ॥ सखीके मुँहसे सारा वृत्तान्त सुनकर माता-पिताको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने महान् उत्सव मनाया ॥ ४५ ॥
उदारचित्त दक्ष और महामनस्विनी वीरिणीने ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दिया और अन्धों, दीनों तथा अन्य लोगोंको भी धन बाँटा ॥ ४६ ॥
प्रीति बढ़ानेवाली अपनी उस पुत्रीको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघकर और आनन्दविभोर होकर वीरिणीने बार - बार उसकी प्रशंसा की ॥४७ ॥
कुछ समय बीतनेपर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ दक्ष इस चिन्तामें पड़ गये कि मैं अपनी इस पुत्रीको शंकरको किस प्रकार प्रदान करूँ? ॥४८ ॥
महादेवजी प्रसन्न होकर मेरी पुत्रीको वर देनेके लिये आये थे, किंतु वे तो चले गये, अब मेरी पुत्रीके लिये वे पुनः कैसे आयेंगे? ॥ ४ ९ ॥ यदि मैं किसीको उनके पास शीघ्र भेजूँ, तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि यदि वे पुत्रीको स्वीकार न करें, तो मेरी याचना निष्फल हो जायगी ॥५० ॥
अथवा मैं स्वयं उनका पूजन - अर्चन करूँ, जिससे कि वे मेरी पुत्रीकी भक्तिसे प्रसन्न होकर स्वयं इसे ग्रहणकर इसके पति बनें ॥५१ ॥
उस सतीके द्वारा श्रेष्ठ प्रयत्नसे पूजित होकर वे भी उसको पाना चाह रहे हैं; क्योंकि वे ' मेरे पति शिवजी हों ' – सतीको यह वर दे चुके हैं ॥ ५२ ॥
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए दक्ष प्रजापतिके सामने मैं सरस्वतीके साथ एकाएक उपस्थित हुआ ॥ ५३ ॥
मुझ अपने पिताको देखकर प्रणाम करके दक्ष विनीत भावसे खड़े हुए और उन्होंने मुझ ब्रह्माको
आसनं च ददौ मह्यं स्वभवाय यथोचितम् ॥ ५४ । यथोचित आसन दिया ॥५४ ॥
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३८४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ ततो मां सर्वलोकेशं तत्रागमनकारणम् । तत्पश्चात् चिन्तासे युक्त होनेपर भी हर्षित दक्षः पप्रच्छ स क्षिप्रं चिंताविष्टोऽपि हर्षितः ॥ ५५ वे दक्ष शीघ्र ही सर्वलोकेश्वर मुझ ब्रह्मासे आगमनका हुए कारण पूछने लगे- ॥ ५५ ॥
दक्ष उवाच दक्ष बोले — हे जगद्गुरो! हे सृष्टिकर्ता! यहाँ तवात्रागमने हेतुः कः प्रवेशे स सृष्टिकृत् । | आपके आगमनका क्या कारण है, मेरे ऊपर महती ममोपरि सुप्रसादं कृत्वाचक्ष्व जगद्गुरो पुत्रस्नेहात्कार्यवशादथवा लोककारक ममाश्रमं समायातो हृष्टस्य तव दर्शनात् ब्रह्मोवाच
इति पृष्टः स्वपुत्रेण दक्षेण मुनिसत्तम ।
विहसन्नब्रुवं वाक्यं मोदयंस्तं प्रजापतिम् ॥
ब्रह्मोवाच
शृणु दक्ष यदर्थं त्वत्समीपमहमागतः ।
त्वत्तो कस्य हितं मेऽपि भवतोऽपि तदीप्सितम् ॥
तव पुत्री समाराध्य महादेवं जगत्पतिम् ।
यो वरः प्रार्थितस्तस्य समयोऽयमुपागतः ॥
शंभुना तव पुत्र्यर्थं त्वत्सकाशमहं ध्रुवम् ।
प्रस्थापितोऽस्मि यत्कृत्यं श्रेयस्तदवधारय ॥
वरं दत्त्वा गतो रुद्रस्तावत्प्रभृति शंकरः ।
त्वत्सुताया वियोगेन न शर्म लभतेऽञ्जसा ॥
अलब्धच्छिद्रमदनो जिगाय गिरिशं न यम् ।
सर्वैः पुष्पमयैर्बाणैर्यलं कृत्वापि भूरिशः ॥
स कामबाणविद्धोऽपि परित्यज्यात्मचिंतनम् ।
सतीं विचिन्तयन्नास्ते व्याकुलः प्राकृतो यथा ॥
विस्मृत्य प्रश्रुतां वाणीं गणाग्रे विप्रयोगतः ।
क्व सतीत्येवमभितो भाषते निकृतावपि ॥
मया यद्वाञ्छितं पूर्वं त्वया च मदनेन च । मरीच्याद्यैर्मुनिवरैस्तत्सिद्धमधुना ॥ ५६ कृपा करके उसे कहिये ॥ ५६ ॥
। हे लोककारक! आप मुझ पुत्रके स्नेहवश ॥ ५७ अथवा किसी कार्यवश मेरे आश्रममें पधारे हैं, आपके दर्शनसे मुझे प्रसन्नता हो रही है ॥५७ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे मुनिसत्तम! अपने पुत्र दक्षद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर मैं उन प्रजापतिको ५८ प्रसन्न करता हुआ हँसकर कहने लगा ॥५८ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे दक्ष! मैं जिस उद्देश्यसे यहाँ आपके पास आया हूँ, उसको सुनिये । जिसके ५ ९ करनेसे तुम्हारा तथा मेरा दोनोंका अभीष्ट सिद्ध होगा ॥५ ९ ॥ आपकी पुत्री सतीने जगत्पति महादेवजीकी ६० आराधना करके जो वर प्राप्त किया है, उसका समय अब उपस्थित हो चुका है ॥६० ॥
शम्भुने आपकी पुत्रीको पत्नीरूपमें प्राप्त करनेके ६१ लिये ही मुझे आपके पास भेजा है । अब [ आपके लिये ] जो कल्याणकारी कार्य है, उसे कर डालिये ॥ ६१ ॥
जबसे रुद्र वर प्रदान करके गये हैं, तभीसे ६२ आपकी पुत्रीके वियोगके कारण उन शंकरको शान्ति नहीं मिल रही है ॥ ६२ ॥
कामदेव अपने समस्त पुष्पबाणोंके द्वारा अनेक ६३ उपाय करके भी छिद्र न पा सकनेके कारण जिन्हें जीत न सका, वे ही शिवजी अब कामबाणसे विद्ध | होकर अपना आत्मचिन्तन त्यागकर सतीकी चिन्ता ६४ करते हुए सामान्य प्राणीकी भाँति व्याकुल हो रहे हैं ॥ ६३-६४ ॥ वे सुनी हुई वाणीको भी भूल जाते हैं तथा ६५ सतीके वियोगवश अपने गणोंके समक्ष ही ' सती कहाँ | है ' - इस प्रकारकी वाणी कहते हैं और किसी काम में । प्रवृत्त नहीं होते हैं । हे सुत! मैंने, आपने, कामदेव तथा मरीचि आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जो पूर्वमें चाहा था, सुत ॥ ६६ । वह इस समय सिद्ध हो चुका है ॥ ६५-६६ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३८५
त्वत्पुत्र्याराधितः शंभुः सोऽपि तस्या विचिंतनात् ।
अनुशोधयितुं प्रेप्सुर्वर्तते हिमवद्गिरौ ॥
यथा नानाविधैर्भावैः सत्त्वात्तेन व्रतेन च ।
शंभुराराधितस्तेन तथैवाराध्यते सती ॥
तस्मात्तु दक्ष तनयां शंभ्वर्थं परिकल्पिताम् ।
तस्मै देह्यविलंबेन कृता ते कृतकृत्यता ॥
अहं तमानयिष्यामि नारदेन त्वदालयम् ।
तस्मै त्वमेनां संयच्छ तदर्थे परिकल्पिताम् ॥
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा मम वचश्चेति स मे पुत्रोऽतिहर्षितः ।
एवमेवेति मां दक्ष उवाच परहर्षितः ॥
ततः सोऽहं मुने तत्रागममत्यन्तहर्षितः ।
उत्सुको लोकनिरतो गिरिशो यत्र संस्थितः ॥
गते नारद दक्षोऽपि सदारतनयो ह्यपि ।
अभवत्पूर्णकामस्तु पीयूषैरिव पूरितः ॥
आपकी पुत्रीने शम्भुकी आराधना की है, इससे वे ६७ भी उसकी चिन्ता करते हुए उसको प्राप्त करनेकी इच्छासे युक्त होकर हिमालय पर्वतपर स्थित हैं । जिस प्रकार सतीने अनेक प्रकारके भावों और सात्त्विकतापूर्वक व्रतके ६८ द्वारा शिवजीकी आराधना की थी, उसी प्रकार [ इस समय ] वे भी सतीकी आराधना कर रहे हैं ॥ ६७-६८ ॥ इसलिये हे दक्ष! शिवके लिये ही रची गयी ६ ९ अपनी पुत्रीको आप अविलम्ब उन्हें प्रदान कर दीजिये, ऐसा करनेसे आप कृतकृत्य हो जायँगे ॥ ६ ९ ॥ मैं नारदके साथ जाकर उन्हें आपके घर ७० लाऊँगा और उन्हींके लिये रची हुई इस सतीको उन्हें अर्पित कर दीजिये ॥ ७० ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! मेरी यह बात सुनकर मेरे पुत्र दक्ष परम प्रसन्न हुए और उन्होंने अत्यन्त हर्षित ७१ होकर मुझसे कहा- ठीक है, ऐसा ही होगा ॥७१ ॥
उसके बाद हे मुने! मैं अत्यन्त हर्षित हो ७२ वहाँपर गया, जहाँ लोककल्याणमें तत्पर रहनेवाले शिवजी उत्सुक होकर बैठे थे ॥७२ ॥
हे नारद! मेरे चले आनेपर स्त्री और पुत्रीसहित दक्ष भी अमृतसे परिपूर्ण हुएके समान पूर्णकाम [ सफल ७३ । मनोरथवाले ] हो गये ॥ ७३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीवरलाभो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सती - वरलाभवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार एवं सती तथा शिवका विवाह नारद उवाच
रुद्रपार्श्वे त्वयि गते किमभूच्चरितं ततः ।
का वार्ता ह्यभवत्तात किं चकार हरः स्वयम् ॥ १
ब्रह्मोवाच
अथाहं शिवमानेतुं प्रसन्नः परमेश्वरम् ।
आसदं हि महादेवं हिमवद्गिरिसंस्थितम् ॥ २
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_14_1_Front नारदजी बोले - जब आप भगवान् रुद्रके पास गये, तब क्या चरित्र हुआ, हे तात! कौन - सी बात हुई और शिवजीने स्वयं क्या किया? ॥१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! तदनन्तर मैं हिमालय पर्वतके कैलास शिखरपर रहनेवाले परमेश्वर महादेव शिवजीको लानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक उनके | समीप गया ॥२ ॥
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३८६ मां वीक्ष्य लोकस्रष्टारमायान्तं वृषभध्वजः मनसा संशयं चक्रे सतीप्राप्तौ मुहुर्मुहुः अथ प्रीत्या हरो लोके गतिमाश्रित्य लीलया सत्या भक्त्या च मां क्षिप्रमुवाच प्राकृतो यथा ईश्वर उवाच किमकार्षीत्सुरज्येष्ठ सत्यर्थे त्वत्सुतः स माम् कथयस्व यथा स्वान्तं न दीर्येन्मन्मथेन हि
धावमानो विप्रयोगो मामेव च सतीं प्रति ।
अभिहन्ति सुरज्येष्ठ त्यक्त्वान्यां प्राणधारिणीम् ॥
सतीति सततं ब्रह्मन् वद कार्यं करोम्यहम् ।
अभेदान्मम सा प्राप्या तद्विधे क्रियतां तथा ॥
ब्रह्मोवाच
इति रुद्रोक्तवचनं लोकाचारसुगर्भितम् ।
श्रुत्वाहं नारदमुने सान्त्वयन्नगदं शिवम् ॥
ब्रह्मोवाच
सत्यर्थं यन्मम सुतो वदति स्म वृषध्वज ।
तच्छृणुष्व निजासाध्यं सिद्धमित्यवधारय ॥
देया तस्मै मया पुत्री तदर्थं परिकल्पिता ।
ममाभीष्टमिदं कार्यं त्वद्वाक्यादधिकं पुनः ॥
मत्पुत्र्याराधितः शंभुरेतदर्थं स्वयं पुनः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १८ । वृषभध्वज शिवजी मुझ लोककर्ताको आते ॥ ३ देखकर अपने मनमें सतीकी प्राप्तिके विषयमें हुए बार संशय करने लगे ॥३ ॥ बार-। तत्पश्चात् शिवजी प्रीतिपूर्वक अपनी लीलासे
॥ ४ और सतीकी भक्तिसे लोकगतिका आश्रय लेकर सामान्य मनुष्यके समान मुझसे शीघ्र कहने लगे -॥४ ॥
ईश्वर बोले- हे सुरश्रेष्ठ! आपके । दक्षप्रजापतिने सतीको मुझे प्रदान करनेके विषयमें पुत्र क्या ॥ ५ किया, आप मुझसे कहिये, जिससे कामके कारण मेरा हृदय विदीर्ण न हो जाय ॥५ ॥
हे सुरश्रेष्ठ! किसी अन्य प्राणधारिणी कामिनीको ६ छोड़कर केवल सतीकी ओर दौड़ता हुआ यह वियोग मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है ॥६ ॥
हे ब्रह्मन्! मैं सदा ‘ सती - सती ' ऐसा कहता ७ हुआ कार्योंको करता हूँ, उस सतीके पास जाकर आप मेरी व्यथाको कहें । वह सती मुझसे अभिन्न है । हे विधे! अतः उसकी प्राप्तिके लिये आप यत्न कीजिये । अथवा सतीकी प्राप्तिके निमित्त उपाय बताइये, जिसे मैं शीघ्र ही करूँ ॥७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद मुने! रुद्रके द्वारा कहे गये लोकाचारयुक्त वचनको सुनकर उन्हें सान्त्वना ८ देते हुए मैं कहने लगा ॥८ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे वृषभध्वज! सतीके लिये मेरे पुत्र दक्षने जो बात कही है, उसे सुनिये और जिस ९ कार्यको आप अपने लिये असाध्य मान रहे हैं, उसे सिद्ध हुआ समझिये॥९ ॥
[ दक्षने मुझसे कहा कि हे ब्रह्मन्! ] मैं अपनी १० पुत्री भगवान् शिवके हाथोंमें ही दूँगा; क्योंकि उन्होंके । लिये यह उत्पन्न हुई है । यह कार्य मुझे स्वयं अभीष्ट है, फिर आपके भी कहनेसे इसका महत्त्व और बढ़ गया है ॥१० ॥
मेरी पुत्रीने स्वयं इसी उद्देश्यसे शिवकी सोऽप्यन्विष्यति मां यस्मात्तदा देया मया हरे ॥ ११ पूजा की थी और इस समय शिवजी भी भगवान् इसी विषय में । पूछ - ताछ कर रहे हैं । इसलिये मुझे अपनी कन्या शिवजीके हाथमें अवश्य देनी है ॥ ११ ॥
शुभे लग्ने सुमुहूर्ते समागच्छतु हे विधे! वे शंकर शुभ लग्न और सुन्दर मुहूर्त में तदा दास्यामि सोऽन्तिकम् । । मेरे यहाँ पधारें, जिससे मैं उन्हें भिक्षारूपमें अपनी
तनयां भिक्षार्थं शंभवे विधे ॥ १२ । कन्या प्रदान करूँ ॥ १२ ॥
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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३८७
इत्युवाच स मां दक्षस्तस्मात्त्वं वृषभध्वज ।
शुभे मुहूर्ते तद्वेश्म गच्छ तामानयस्व च ॥ १३
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा मम वचो लौकिकीं गतिमाश्रितः ।
उवाच विहसन् रुद्रो मुने मां भक्तवत्सलः ॥ १४
रुद्र उवाच
गमिष्ये भवता सार्धं नारदेन च तद्गृहम् ।
अहमेव जगत्स्त्रष्टस्तस्मात्त्वं नारदं स्मर ॥ १५
मरीच्यादीन् स्वपुत्रांश्च मानसानपि संस्मर ।
तैः सार्धं दक्षनिलयं गमिष्ये सगणो विधे ॥ १६
ब्रह्मोवाच
इत्याज्ञप्तोऽहमीशेन लोकाचारपरेण ह ।
संस्मरं नारदं त्वां च मरीच्यादीन्सुतांस्तथा ॥ १७
ततः समागताः सर्वे मानसास्तनयास्त्वया ।
मम स्मरणमात्रेण हृष्टास्ते द्रुतमादरात् ॥ १८
विष्णुः समागतस्तूर्णं स्मृतो रुद्रेण शैवराट् ।
स स्वसैन्यैः कमलया गरुडारूढ एव च ॥ १ ९
अथ चैत्रसिते पक्षे नक्षत्रे भगदैवते ।
त्रयोदश्यां दिने भानौ निर्गच्छत्स महेश्वरः ॥ २०
सर्वैः सुरगणैः सार्धं ब्रह्मविष्णुपुरःसरैः ।
तथा तैर्मुनिभिर्गच्छन् स बभौ पथि शंकरः ॥ २१
मार्गे समुत्सवो जातो देवादीनां च गच्छताम् ।
तथा हरगणानां च सानंदमनसामति ॥ २२
गजगोव्याघ्रसर्पाश्च जटा चंद्रकला तथा ।
जग्मुः सर्वे भूषणत्वं यथायोग्यं शिवेच्छया ॥ २३
ततः क्षणेन बलिना बलीवर्देन वेगिना ।
सविष्णुप्रमुखः प्रीत्या प्राप दक्षालयं हरः ॥ २४
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_14_2_Front हे वृषभध्वज! दक्षने मुझसे ऐसी बात कही है, अतः आप शुभ मुहूर्तमें उनके घर चलिये और सतीको ले आइये ॥ १३ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे मुने! मेरी यह बात सुनकर भक्तवत्सल भगवान् रुद्र लौकिक गतिका आश्रय लेकर हँसते हुए मुझसे कहने लगे —॥१४ ॥
रुद्र बोले — जगत्की रचना करनेवाले हे ब्रह्मन्! मैं आपके और नारदके साथ ही दक्षके घर चलूँगा, अतः आप नारदका स्मरण करें और अपने मरीचि आदि मानसपुत्रोंका भी स्मरण करें, हे विधे! मैं अपने गणोंसहित उन सबके साथ दक्षके घर चलूँगा ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] लोकाचारके निर्वाहमें लगे हुए भगवान् शिवजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने आप नारदका और मरीचि आदि पुत्रोंका स्मरण किया ॥१७ ॥
तब मेरे स्मरण करते ही आपके साथ मेरे सभी मानसपुत्र प्रसन्न होकर आदरपूर्वक शीघ्र ही वहाँ उपस्थित हो गये ॥ १८ ॥
भगवान् रुद्रके स्मरण करनेपर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ वे विष्णु भी अपने सैनिकों तथा कमला लक्ष्मीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत ही वहाँ आ गये ॥ १ ९ ॥ तदनन्तर चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशीमें रविवारको पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रमें उन महेश्वरने [ विवाहके लिये ] यात्रा की ॥ २० ॥
ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं और ऋषियोंके साथ मार्गमें चलते हुए वे शिवजी बहुत शोभा पा रहे थे ॥२१ ॥
वहाँ जाते हुए देवताओं, मुनियों तथा आनन्दमग्न मनवाले प्रमथगणोंका मार्गमें महान् उत्सव हो रहा था ॥ २२ ॥
शिवजीकी इच्छासे गज, वृषभ, व्याघ्र, सर्प, जटा और चन्द्रकला – ये सब उनके लिये यथायोग्य आभूषण बन गये ॥२३ ॥
तदनन्तर वेगसे चलनेवाले बलीवर्द ( बैल ) -पर आरूढ़ हुए महादेवजी विष्णु आदिको साथ लिये । क्षणभरमें प्रसन्नतापूर्वक दक्षके घर जा पहुँचे ॥२४ ॥
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३८८ ततो दक्षो विनीतात्मा संप्रहृष्टतनूरुहः प्रययौ सन्मुखं तस्य संयुक्तः सकलैर्निजैः सर्वे सुरगणास्तत्र स्वयं दक्षेण सत्कृताः पार्श्वे श्रेष्ठं च मुनिभिरुपविष्टा यथाक्रमम् परिवार्याखिलान्देवान्गणांश्च मुनिभिर्यथा दक्षः समानयामास गृहाभ्यंतरतः शिवम् ॥ अथ दक्षः प्रसन्नात्मा स्वयं सर्वेश्वरं हरम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८ । तब हर्षके कारण रोमांचित और विनीत चित्तवाले ॥ २५ दक्ष समस्त आत्मीय जनोंके साथ [ भगवान् शिवकी अगवानीके लिये ] उनके सामने आये ॥२५ ॥
। दक्षने वहाँ समस्त देवताओंका सत्कार किया । ॥ २६ वे सब लोग सुरश्रेष्ठ शिवजीको बिठाकर उनके पार्श्वभागमें स्वयं भी मुनियोंके साथ यथाक्रम बैठ गये ॥ २६ ॥
। इसके पश्चात् दक्ष मुनियोंसहित समस्त देवताओं २७ तथा गणोंको साथ लेकर भगवान् शिवको घरके भीतर ले गये ॥२७ ॥
उस समय दक्षने प्रसन्नचित्त होकर उत्तम समानर्च विधानेन दत्त्वासनमनुत्तमम् ॥ २८ आसन देकर स्वयं ही विधिपूर्वक सर्वेश्वर शिवजीका
ततो विष्णुं च मां विप्रान्सुरान्सर्वान्गणांस्तथा ।
पूजयामास सद्भक्त्या यथोचितविधानतः ॥
कृत्वा यथोचितां पूजां तेषां पूज्यादिभिस्तथा ।
चकार संविदं दक्षो मुनिभिर्मानसैः पुनः ॥
ततो मां पितरं प्राह दक्षः प्रीत्या हि मत्सुतः ।
प्रणिपत्य त्वया कर्म कार्यं वैवाहिकं विभो ॥
वाढमित्यहमप्युक्त्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
समुत्थाय ततोऽकार्षं तत्कार्यमखिलं तथा ॥
ततः शुभे मुहूर्ते हि लग्ने ग्रहबलान्विते ।
सतीं निजसुतां दक्षो ददौ हर्षेण शंभवे ॥
उद्वाहविधिना सोऽपि पाणिं जग्राह हर्षितः । पूजन किया । तत्पश्चात् उन्होंने विष्णुका, मेरा, ब्राह्मणोंका, देवताओंका और समस्त शिवगणोंका भी २ ९ यथोचित विधिसे उत्तम भक्तिभावके साथ पूजन किया ॥ २८-२९ ॥ इस तरह पूजनीय पुरुषों तथा अन्य लोगोंसहित ३० उनका पूजन करके दक्षने मेरे मानसपुत्र [ मरीचि आदि ] मुनियोंके साथ मन्त्रणा की ॥३० ॥
इसके बाद मेरे ` पुत्र दक्षने मुझ पिताको प्रणाम ३१ करके प्रसन्नतापूर्वक कहा -विभो! आप ही वैवाहिक कार्य करायें ॥३१ ॥
तब मैं प्रसन्न मनसे ' बहुत अच्छा ' - - ऐसा ३२ कहकर उठ करके वह समस्त कार्य कराने लगा ॥ ३२ ॥
तदनन्तर दक्षने ग्रहोंके बलसे युक्त शुभ लग्न ३३ और मुहूर्तमें हर्षपूर्वक शिवजीको अपनी पुत्री सती प्रदान कर दी ॥ ३३ ॥
उन शिवजीने भी उस समय हर्षित होकर सुन्दर दाक्षायण्या वरतनोस्तदानीं वृषभध्वजः ॥ ३४ शरीरवाली दक्षपुत्रीका वैवाहिक विधिसे पाणिग्रहण अहं हरिस्त्वदाद्या किया ॥ ३४ ॥
वै मुनयश्च सुरा गणाः । नेमुः सर्वे संस्तुतिभिः तोषयामासुरीश्वरम् उस समय मैंने, श्रीहरि विष्णुने, आपने, अन्य ॥ ३५ मुनियोंने, देवताओंने और प्रमथगणोंने भगवान् | शिवजीको प्रणाम किया और [ अनेक प्रकारकी ] स्तुतियोंद्वारा उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ३५ ॥
समुत्सवो महानासीन्नृत्यगानपुरःसरः उस समय नाच - गानेके साथ महान् उत्सव आनन्दं परमं जग्मुः । हुआ और समस्त देवता तथा मुनिगण परम आनन्दित
सर्वे मुनिगणाः सुराः ॥ ३६ । हुए ॥ ३६ ॥
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