श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 371–380
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता (
परन्तु प्रण आधेयो मनसा ते प्रजापते ।
श्रावयिष्यामि ते तं वै सत्यं जानीहि नो मृषा ॥ ३३
यदा भवान् मयि पुनर्भवेन्मंदादरस्तदा ।
देहं त्यक्ष्ये निजं सत्यं स्वात्मन्यस्म्यथ वेतरम् ॥ ३४
एष दत्तस्तव वरः प्रतिसर्गं प्रजापते ।
अहं तव सुता भूत्वा भविष्यामि हरप्रिया ॥ ३५
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा महेशानी दक्षं मुख्यप्रजापतिम् ।
अंतर्दधे द्रुतं तत्र सम्यग् दक्षस्य पश्यतः ॥ ३६
अंतर्हितायां दुर्गायां स दक्षोऽपि निजाश्रमम् ।
जगाम च मुदं लेभे भविष्यति सुतेति सा ॥ ३७
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्ड ) ३५ ९ देवी बोलीं- हे प्रजापते! परंतु मेरी एक प्रतिज्ञा अपने मनमें सदैव रखना । मैं उस प्रतिज्ञाको तुम्हें सुना देती हूँ, उसे सत्य समझना, असत्य नहीं ॥ ३३ ॥
यदि आपने कभी मेरा अनादर किया तो मैं अपना शरीर त्याग दूँगी, यह सत्य है । मैं सर्वथा स्वतन्त्र हूँ, अतः दूसरा शरीर धारण करूँगी ॥ ३४ ॥
हे प्रजापते! मैं प्रत्येक सर्गमें आपकी कन्या बनकर शिवजीकी पत्नी बनूँगी - मैंने यह वरदान आपको दिया ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार दक्ष प्रजापतिसे कहकर वे महेश्वरी उनके देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ३६ ॥
देवीके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने घर चले गये और यह विचारकर आनन्दित हो गये कि देवी । मेरी कन्या बनकर अवतार ग्रहण करेंगी ॥ ३७ ॥
सतीखण्डे दक्षवरप्राप्तिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षवरप्राप्तिवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः ब्रह्माकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों तथा सबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे महाप्राज्ञ वद नो वदतां वर ।
दक्षे गृहं गते प्रीत्या किमभूत्तदनंतरम् ॥
ब्रह्मोवाच
दक्षः प्रजापतिर्गत्वा स्वाश्रमं हृष्टमानसः ।
सर्गं चकार बहुधा मानसं मम चाज्ञया ॥
तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्गं प्रजापतिः ।
दक्षो निवेदयामास ब्रह्मणे जनकाय मे ॥
दक्ष उवाच
ब्रह्मंस्तात प्रजानाथ वर्धन्ते न प्रजाः प्रभो ।
मया विरचिताः सर्वास्तावत्यो हि स्थिताः खलु ॥
नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाप्राज्ञ! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! दक्षप्रजापतिके घर चले जानेके १ बाद फिर क्या हुआ? यह सब [ वृत्तान्त ] प्रीतिपूर्वक कहिये ॥ १ १ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] दक्षप्रजापतिने अपने आश्रममें जाकर प्रसन्नचित्त हो मेरी आज्ञासे २ बहुत - सी मानसी सृष्टि की, किंतु उस प्रजासृष्टिको बढ़ता हुआ न देखकर दक्ष अपने पिता मुझ ब्रह्मासे ३ कहने लगे- ॥ २-३ ॥ दक्ष बोले- हे तात! हे ब्रह्मन्! हे प्रजानाथ! मेरे द्वारा बनायी गयी प्रजाएँ बढ़ नहीं रही हैं । मैंने भली प्रकारसे विचारकर देख लिया है कि मैंने जितनी ४ भी सृष्टि की है, वह उतनी ही है ॥४ ॥
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३६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३
किं करोमि प्रजानाथ वर्धेयुः कथमात्मना ।
तदुपायं समाचक्ष्व प्रजाः कुर्यां न संशयः ॥ ५
ब्रह्मोवाच
दक्ष प्रजापते तात शृणु मे परमं वचः ।
तत्कुरुष्व सुरश्रेष्ठ शिवस्ते शं करिष्यति ॥ ६
या च पञ्चजनस्याङ्गसुता रम्या प्रजापतेः ।
असिक्नी नाम पत्नीत्वे प्रजेश प्रतिगृह्यताम् ॥ ७
वामव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुनः ।
तद्विधायां च कामिन्यां भूरिशो भावयिष्यसि ॥ ८
ब्रह्मोवाच
ततः समुत्पादयितुं प्रजा मैथुनधर्मतः ।
उपयेमे वीरणस्य निदेशान्मे सुतां ततः ॥ ९
अथ तस्यां स्वपल्यां च वीरिण्यां स प्रजापतिः ।
हर्यश्वसंज्ञानयुतं दक्षः पुत्रानजीजनत् ॥ १०
अपृथग्धर्मशीलास्ते सर्व आसन् सुता मुने ।
पितृभक्तिरता नित्यं वेदमार्गपरायणाः ॥ ११
पितृप्रोक्ताः प्रजासर्गकरणार्थं ययुर्दिशम् ।
प्रतीचीं तपसे तात सर्वे दाक्षायणाः सुताः ॥ १२
तत्र नारायणसरस्तीर्थं परमपावनम् ।
सङ्गमो यत्र सञ्जातो दिव्यसिन्धुसमुद्रयोः ॥ १३
तदुपस्पर्शनादेव प्रोत्पन्नमतयोऽभवन् ।
धर्मे पारमहंसे च विनिर्धूतमलाशयाः ॥ १४
प्रजाविवृद्धये ते वै तेपिरे तत्र सत्तमाः ।
दाक्षायणा दृढात्मानः पित्रादेशसुयंत्रिताः ॥ १५
त्वं च तान् नारद ज्ञात्वा तपतः सृष्टिहेतवे ।
अगमस्तत्र भूरीणि हार्दमाज्ञाय मापतेः ॥ १६
|
अदृष्ट्वा तं भुवः सृष्टिं कथं कर्तुं समुद्यताः । ।
हर्यश्वा दक्षतनया इत्यवोचंस्तमादरात् ॥ १७
हे प्रजानाथ! मैं क्या करूँ? यह मेरी प्रजा किस प्रकार बढ़ेगी? आप कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे प्रजाओंके सृष्टिक्रमका विस्तार करूँ ॥ ५ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे दक्ष! हे प्रजापते! हे तात! मेरी उत्तम बात सुनिये और उसे कीजिये । हे सुरश्रेष्ठ! भगवान् शंकर आपका कल्याण करेंगे ॥ ६ ॥
हे प्रजेश! पंचजन प्रजापतिकी जो असिक्नी नामक सुन्दर पुत्री है, उसे आप पत्नीरूपसे ग्रहण कीजिये ॥ ७ ॥
अभीतक आप पत्नीरहित होकर धर्माचरण करते रहे हैं, किंतु इस प्रकारकी पत्नीमें मैथुनधर्मसे प्रवृत्त होकर जब आप सृष्टि करेंगे, तब प्रजा बढ़ेगी ॥ ८ ॥
ब्रह्माजी बोले – - [ हे नारद! ] तब दक्षप्रजापतिने मैथुनधर्मसे प्रजासृष्टि करनेके लिये मेरी आज्ञासे वीरणकी कन्याके साथ विवाह किया ॥९ ॥
प्रजापति दक्षने अपनी पत्नी उस वीरिणीके गर्भसे हर्यश्व नामक दस हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥१० ॥
हे मुने! वे सभी पुत्र समान धर्माचरण करनेवाले, पिताकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले और सदा वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले थे ॥ ११ ॥
हे तात! वे सभी दक्षपुत्र अपने पिताकी आज्ञा पाकर सृष्टिके उद्देश्यसे तपस्याहेतु पश्चिम दिशाकी ओर चले गये ॥१२ ॥
वहाँपर परम पवित्र नारायणसर नामक तीर्थ है, जहाँ दिव्य सिन्धु नदी तथा समुद्रका संगम हुआ है ॥ १३ ॥
उस तीर्थके स्पर्शमात्रसे उनकी बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो गयी और पापके दूर होते ही वे सभी परमहंसधर्ममें स्थित हो गये ॥१४ ॥
तत्पश्चात् दृढ़चित्तवाले तथा श्रेष्ठ वे दक्षपुत्र पिताकी आज्ञासे बँधे होनेके कारण प्रजावृद्धिके लिये तप करने लगे ॥ १५ ॥
हे नारद! सृष्टिसंवर्धनहेतु उन्हें घोर तप करते । हुए जानकर और विष्णुका मनोगत अभिप्राय । समझकर आप उनके पास गये और आदरपूर्वक आपने उनसे कहा- हे दक्षपुत्र हर्यश्वो! तुमलोग किस पृथिवीका विस्तार न जानकर सृष्टिकर्ममें प्रकार प्रवृत्त हुए हो? ॥१६-१७ ॥
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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( ब्रह्मोवाच
तं निशम्याथ हर्यश्वास्ते त्वदुक्तमतंद्रिताः ।
औत्पत्तिकधियः सर्वे स्वयं विममृशुर्भृशम् ॥ १८
सुशास्त्रजनकादेशं यो न वेद निवर्तकम् ।
स कथं गुणविश्रंभी कर्तुं सर्गमुपक्रमेत् ॥ १ ९
इति निश्चित्य ते पुत्राः सुधियश्चैकचेतसः ।
प्रणम्य तं परिक्रम्यायुर्मार्गमनिवर्तकम् ॥ २०
नारद त्वं मनः शंभोर्लोकानन्यचरो मुने ।
महेशानमनोवृत्तिकरस्तदा ॥ २१
काले गते बहुतरे मम पुत्रः प्रजापतिः ।
नाशं निशम्य पुत्राणां नारदादन्वतप्यत ॥ २२
मुहुर्मुहुरुवाचेति सुप्रजस्त्वं शुचां पदम् ।
शुशोच बहुशो दक्षः शिवमायाविमोहितः ॥ २३
अहमागत्य सुप्रीत्या सांत्वयं दक्षमात्मजम् ।
शांतिभावं प्रदश्यैव दैवं प्रबलमित्युत ॥ २४
अथ दक्षः पञ्चजन्यां मया स परिसांत्वितः ।
सबलाश्वाभिधान् पुत्रान् सहस्त्रं चाप्यजीजनत् ॥ २५
तेऽपि जग्मुस्तत्र सुताः पित्रादिष्टा दृढव्रताः ।
प्रजासर्गे यत्र सिद्धाः स्वपूर्वभ्रातरो ययुः ॥ २६
तदुपस्पर्शनादेव नष्टाघा विमलाशयाः ।
तेपुर्महत्तपस्तत्र जपन्तो ब्रह्म सुव्रताः ॥ २७
प्रजासर्गोद्यतांस्तान् वै ज्ञात्वा गत्वेति नारद ।
पूर्ववच्चागदो वाक्यं संस्मरन्नैश्वरीं गतिम् ॥ २८
सतीखण्ड ) ३६१ ब्रह्माजी बोले- वे हर्यश्वगण आपकी कही हुई बात सुनकर सृष्टिके विषयमें सावधान होकर मनमें बहुत विचार करने लगे ॥१८ ॥
जो उत्तम शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक वचनोंको नहीं जानता, वह मात्र गुणोंपर ही विश्वास रखनेवाली सृष्टिका उपक्रम किस प्रकार कर सकता है? ॥ १ ९ ॥ वे परम बुद्धिमान् दक्षपुत्र एकाग्र बुद्धिसे ऐसा विचारकर देवर्षि नारदकी परिक्रमा करके एवं उन्हें प्रणामकर निवृत्तिमार्गमें परायण हो गये ॥ २० ॥
हे नारद! हे मुने! आप शिवके मन हैं और लोकमें पर्यटन करते रहते हैं तथा निर्विकार रहकर शिवकी चित्तवृत्तिके अनुसार रहते हैं ॥ २१ ॥
बहुत काल बीतनेपर मेरे पुत्र दक्षप्रजापति नारदजीके द्वारा अपने पुत्रोंके नाशको सुनकर बहुत सन्तप्त हुए ॥२२ ॥
उस समय आपने शोक करते हुए दक्षसे बार-बार कहा कि आप अच्छी सन्तानवाले थे, [ जो कि आपके पुत्र श्रेष्ठ मार्गका अनुसरण करते हुए मुक्त हो गये ] किंतु वे दक्ष शिवकी मायासे मोहित हो बार-बार शोक करते रहे ॥ २३ ॥
तदनन्तर दक्षके पास आकर मैंने उन्हें शान्तिभावका उपदेशकर सान्त्वना देते हुए कहा [ शोक मत करो ], दैव बड़ा प्रबल होता है ॥२४ ॥
तब दक्षप्रजापतिने मेरे द्वारा धीरज बँधाये जानेपर पुन: पंचजनकी कन्या [ असिक्नी ] -के गर्भसे सबलाश्व नामक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥२५ ॥
दृढ़ व्रतवाले वे सबलाश्व भी पिताकी आज्ञासे सृष्टिसंवर्धनहेतु वहाँ गये, जहाँ उनसे पूर्व उनके भाई गये थे और सिद्ध हो गये थे ॥ २६ ॥
वे भी उस तीर्थके स्पर्शमात्रसे सर्वथा निष्पाप तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले हो गये और उत्तम व्रतमें परायण होकर ब्रह्मका जप करते हुए कठिन तप करने लगे ॥ २७ ॥
हे नारद! आपने सृष्टि करनेके लिये उन्हें तपस्यामें उद्यत देखकर उनके पास जाकर ईश्वरकी गतिका स्मरण करते हुए वही उपदेश दिया, जो पूर्वमें । उनके भाइयोंको दिया था ॥२८ ॥
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३६२ ( भ्रातृपंथानमादिश्य त्वं मुनेऽमोघदर्शनः अयाश्चोर्ध्वगतिं तेऽपि भ्रातृमार्गं ययुः सुताः उत्पातान् बहुशोऽपश्यत्तदैव स प्रजापतिः । विस्मितोऽभूत्स मे पुत्रो दक्षो मनसि दुःखितः
पूर्ववत् त्वत्कृतं दक्षः शुश्राव चकितो भृशम् ।
पुत्रनाशं शुशोचाति पुत्रशोकविमूर्च्छितः ॥
चुक्रोध तुभ्यं दक्षोऽसौ दुष्टोऽयमिति चाब्रवीत् ।
आगतस्तत्र दैवात् त्वमनुग्रहकरस्तदा ॥
शोकाविष्टः स दक्षो हि रोषविस्फुरिताधरः ।
उपलभ्य तमाहत्य धिग्धिक् प्रोच्य विगर्हयन् ॥
दक्ष उवाच
किं कृतं तेऽधमश्रेष्ठ साधूनां साधुलिङ्गतः ।
भिक्षोर्मार्गोऽर्भकानां वै दर्शितोऽसाधुकारि नः ॥
ऋणैस्त्रिभिरमुक्तानां लोकयोरुभयोः कृतः ।
विघातः श्रेयसोऽमीषां निर्दयेन शठेन ते ॥
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य यो गृहात्प्रव्रजेत्पुमान् ।
मातरं पितरं त्यक्त्वा मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥
निर्दयस्त्वं सुनिर्लज्जः शिशुधीभिद्यशोऽपहा ।
हरेः पार्षदमध्ये हि वृथा चरसि मूढधीः ॥
मुहुर्मुहुरभद्रं त्वमचरो मेऽधमाधम ।
विभवेद् भ्रमतस्तेऽतः पदं लोकेषु न स्थिरम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १३ । हे मुने! आपका दर्शन निष्फल नहीं होता ॥ २ ९ । इसलिये आपने उनको भी पूर्वके भाइयोंके मार्गका, | उपदेश किया, जिससे वे भी अपने भाइयोंके मार्गका अनुसरण करते हुए उसी मार्गपर चले गये ॥२ ९ ॥ उसी समय दक्षप्रजापतिको अनेक उत्पात दिखायी ॥ ३० पड़ने लगे । वे अपने पुत्रोंको आया न देखकर आश्चर्यचकित होकर मनमें दुखी हो गये ॥ ३० ॥
उन्होंने आपके द्वारा प्रथम पुत्रोंके नाशके समान ३१ ही इन पुत्रोंके भी नाशका जब समाचार सुना, तो वै आश्चर्यमें भरकर पुत्रशोकसे मूर्च्छित हो अत्यन्त सन्तप्त हो उठे ॥३१ ॥
वे दक्ष आपपर कुपित हो गये और कहने लगे कि ३२ यह नारद दुष्ट है । उसी समय दैवयोगसे उनके पुत्रोंपर अनुग्रह करनेवाले आप भी दक्षके पास आ गये ॥ ३२ ॥
उस समय वे प्रजापति दक्ष क्रोधमें भरकर अपने ३३ ओठोंको फड़फड़ाते हुए आपके पास आये और आपको धिक्कारते हुए निन्दापूर्वक कहने लगे- ॥ ३३ ॥
दक्ष बोले — हे अधमोंमें श्रेष्ठ! तुमने साधुका रूप धारणकर मेरे सत्पुत्रोंको यह कैसा उपदेश किया? ३४ तुमने मेरे इन पुत्रोंको इस प्रकार भिक्षुमार्गका उपदेश क्यों किया, जो उनके लिये कल्याणकारी नहीं था ॥ ३४ ॥
तुम्हारे - जैसे निर्दयी शठने देव, ऋषि तथा पितृ-३५ ऋणसे मुक्त हुए बिना ही मेरे पुत्रोंको ऐसा उपदेशकर उनके इस लोक तथा परलोकके कल्याणको नष्ट कर दिया, क्योंकि जो बिना तीनों ऋणों से मुक्त हुए ही ३६ माता - पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छा करता हुआ निवृत्तिमार्गका अनुसरण करता है, वह नरकगामी होता है॥३५-३६ ॥ तुम निर्दयी, अत्यन्त निर्लज्ज हो, बालकोंको ३७ बहकानेवाले तथा यशको नष्ट करनेवाले हो । हे मूर्ख! तुम हरिके पार्षदोंके बीचमें व्यर्थ ही विचरण करते हो ॥३७ ॥
हे अधमाधम! तुमने बार - बार मेरा अहित किया । है । इसलिये लोकमें भ्रमण करते हुए तुम्हारा पैर स्थिर ३८ | न रहे ॥ ३८ ॥
* ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेद - शास्त्रोंके स्वाध्यायसे ऋषि ऋण, यज्ञ और पूजा आदिसे देव ऋण तथा पुत्रके उत्पादनसे पितृ - ऋणका निवारण होता है ।
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३६३
शशापेति शुचा दक्षस्त्वां तदा साधुसंमतम् ।
बुबोध नेश्वरेच्छां स शिवमायाविमोहितः ॥
शापं प्रत्यग्रहीच्च त्वं स मुने निर्विकारधीः ।
एष एव ब्रह्मसाधो सहते सोऽपि च स्वयम् ॥
इस प्रकार शिवजीकी मायासे मोहित हुए दक्षने ३ ९ ईश्वरकी इच्छाको नहीं समझा और सज्जनोंके मान्य आपको शोकसन्तप्त होकर शाप दे दिया और हे मुने! निर्मल बुद्धिवाले आपने भी दक्ष प्रजापतिके इस शापको ग्रहण कर लिया, हे ब्रह्मसाधो! ऐसा साधु स्वयं इस प्रकारके के अपकारको सहन कर लेता ४० | है ॥ ३ ९ -४० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दक्षसृष्टौ नारदशापो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें दक्षकी सृष्टि [ उपाख्यान ] -में नारद- शापवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्षके यहाँ देवी शिवा ( सती ) - का प्राकट्य, सतीकी बाललीलाका वर्णन ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे देवमुने लोकपितामहः ।
तत्रागममहं प्रीत्या ज्ञात्वा तच्चरितं द्रुतम् ॥
असान्त्वयमहं दक्षं पूर्ववत्सुविचक्षणः ।
अकार्षं तेन सुस्नेहं तव सुप्रीतिमावहन् ॥
स्वात्मजं मुनिवर्यं त्वां सुप्रीत्या देववल्लभम् ।
समाश्वास्य समादाय प्रत्यपद्ये स्वधाम ह ॥
ततः प्रजापतिर्दक्षोऽनुनीतो मे निजस्त्रियाम् ।
जनयामास दुहितृः सुभगाः षष्टिसंमिताः ॥
तासां विवाहं कृतवान् धर्मादिभिरतंद्रितः ।
तदेव शृणु सुप्रीत्या प्रवदामि मुनीश्वर ॥
ददौ दश सुता दक्षो धर्माय विधिवन्मुने ।
त्रयोदश कश्यपाय मुनये त्रिनवेन्दवे ॥
भूताङ्गिरःकृशाश्वाभ्यां द्वे द्वे पुत्र्यौ प्रदत्तवान् ।
तार्क्ष्याय चापराः कन्याः प्रसूतिप्रसवैर्यतः ॥
त्रिलोकाः पूरितास्तन्नो वर्ण्यते व्यासतो भयात् ॥
केचिद्वदंति तां ज्येष्ठां मध्यमां चापरे शिवाम् ।
सर्वानन्तरजां केचित्कल्पभेदात् त्रयं च सत् ॥
ब्रह्माजी बोले- हे देवमुने! इसी समय मैं लोकपितामह ब्रह्मा भी इस चरित्रको जानकर १ प्रीतिपूर्वक शीघ्रतासे वहाँ पहुँचा ॥१ ॥
मैंने पूर्वकी भाँति दक्ष प्रजापतिको धैर्य धारण कराया, जिससे वे प्रसन्न हो आपसे पूर्ववत् स्नेह २ करने लगे ॥२ ॥
हे मुनिवर्य! मैं देवताओंके प्रिय अपने पुत्र ३ आपको प्रेमपूर्वक बहुत धीरज देकर अपने साथ लेकर आश्रमको लौट आया ॥ ३ ॥
तदनन्तर दक्षप्रजापतिने मेरी आज्ञासे अपनी ४ स्त्रीमें साठ सौभाग्यवती कन्याओंको उत्पन्न किया ॥४ ॥
दक्षने आलस्यरहित होकर उन कन्याओंका विवाह धर्मादिकोंके साथ जिस प्रकार किया, उसे प्रीतिपूर्वक ५ सुनिये । हे मुनीश्वर! उसको मैं कह रहा हूँ ॥ ५ ॥
हे मुने! दक्षने दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यप ६ मुनिको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको विधिपूर्वक दीं । दो - दो कन्याएँ अंगिरा तथा कृशाश्वको और अन्य कन्याएँ तार्क्ष्यको दीं । जिनकी प्रसूति - परम्परासे ७ यह समस्त जगत् व्याप्त है, विस्तारके भयसे मैं ८ उनका वर्णन नहीं कर रहा हूँ ॥६–८ ॥ कुछ लोग शिवाको इन कन्याओंसे ज्येष्ठ कहते हैं, कोई मध्यम कहते हैं और कोई सबसे छोटी मानते ९ हैं, किंतु कल्पभेदसे ये तीनों ही सही हैं॥९॥
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३६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
अनंतरं सुतोत्पत्तेः सपत्नीकः प्रजापतिः ।
दक्षो दधौ सुप्रीत्या तां मनसा जगदम्बिकाम् ॥ १०
अतः प्रेम्णा च तुष्टाव गिरा गद्गदया हि सः ।
भूयो भूयो नमस्कृत्य साञ्जलिर्विनयान्वितः ॥ ११
सन्तुष्टा सा तदा देवी विचारं मनसीति च ।
चक्रेऽवतारं वीरिण्यां कुर्यां पणविपूर्तये ॥ १२
अथ सोवास मनसि दक्षस्य जगदम्बिका ।
विललास तदातीव स दक्षो मुनिसत्तम ॥ १३
सुमुहूर्तेन दक्षोऽपि स्वपत्न्यां निदधे मुदा ।
दक्षपल्यास्तदा चित्ते शिवोवास दयान्विता ॥ १४
आविर्बभूव चिह्नानि दोहदस्याखिलानि वै ॥ १५
विरेजे वीरिणी तात हृष्टचित्ताधिकं च सा ।
शिवावासप्रभावात्तु महामङ्गलरूपिणी ॥ १६
कुलस्य संप्रदायैश्च श्रुतेश्चित्तसमुन्नतेः ।
व्यधत्त सुक्रिया दक्षः प्रीत्या पुंसवनादिकाः ॥ १७
उत्सवोऽतीव सञ्जातस्तदा तेषु च कर्मसु ।
वित्तं ददौ द्विजातिभ्यो यथाकामं प्रजापतिः ॥ १८
अथ तस्मिन्नवसरे सर्वे हर्यादयः सुराः ।
ज्ञात्वा गर्भगतां देवीं वीरिण्यां ते मुदं ययुः ॥ १ ९
तत्रागत्य च सर्वे ते तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम् ।
लोकोपकारकरिणीं प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ॥ २०
कृत्वा ततस्ते बहुधा प्रशंसां हृष्टमानसाः ।
दक्षप्रजापतेश्चैव वीरिण्याः स्वगृहं ययुः ॥ २१
गतेषु नवमासेषु कारयित्वा च लौकिकीम् ।
गतिं शिवा च पूर्ण सा दशमे मासि नारद ॥ २२
आविर्बभूव पुरतो मातुः सद्यस्तदा मुने । ।
मुहूर्ते सुखदे चन्द्रग्रहतारानुकूलके ॥२३ ।
तस्यां तु जातमात्रायां सुप्रीतोऽसौ प्रजापतिः ।
शैवदेवीति तां मेने दृष्ट्वा तां तेजसोल्बणाम् ॥ २४ ॥
१४ कन्याकी उत्पत्तिके अनन्तर पत्नीसहित प्रजापतिने अत्यन्त प्रेमसे अपने मनमें जगदम्बाका दक्ष ध्यान किया ॥१० ॥
उन्होंने गद्गद स्वरसे प्रेमपूर्वक विनययुक्त होकर हाथ जोड़कर बार - बार नमस्कार करके उनकी स्तुति की ॥ ११ ॥
तब वे देवी सन्तुष्ट होकर मनमें विचार करने । लगीं कि मुझे अपनी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये वीरिणीमें अवतार लेना चाहिये । इसके बाद उन जगदम्बाने दक्षके मनमें निवास किया । हे मुनिसत्तम! उस समय वे अत्यन्त शोभित होने लगे ॥ १२-१३ ॥ उन्होंने उत्तम शुभ मुहूर्तमें अपनी स्त्रीमें प्रसन्नतापूर्वक गर्भाधान किया । तब वे दयामयी शिवा दक्षपत्नीके हृदयमें निवास करने लगीं और दक्षकी स्त्रीमें गर्भके समस्त लक्षण प्रकट होने लगे ॥ १४-१५ ॥ हे तात! गर्भमें शिवाके निवासके प्रभावसे वे दक्षपत्नी वीरिणी महामंगल - स्वरूपा और [ पहलेकी अपेक्षा ] अधिक प्रसन्नचित्त हो गयीं ॥ १६ ॥
उस समय दक्षने अपने कुलके सम्प्रदायके अनुसार, वेदके अनुसार तथा अपने सम्मानके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक पुंसवनादि सभी संस्कार किये । उन पुंसवनादि कर्मोंमें महान् उत्सव हुआ । दक्ष प्रजापतिने ब्राह्मणोंको उस समय यथेष्ट धन प्रदान किया ॥ १७-१८ ॥ उस समय विष्णु आदि सभी देवगण देवीको वीरिणीके गर्भमें आयी हुई जानकर प्रसन्न हो गये और वहाँ आकर उन सबने लोकका उपकार करनेवाली उन जगदम्बाको बार - बार प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ १ ९ -२० ॥ इसके बाद प्रसन्नचित्त होकर वीरिणी तथा दक्ष प्रजापतिकी बहुत ही प्रशंसाकर वे अपने - अपने घर चले गये ॥२१ ॥
हे नारद! हे मुने! इस प्रकार नौ मास पूर्ण हो जानेपर समस्त लौकिक क्रिया कर लेनेके बाद जब दसवाँ मास पूर्ण हो गया, तब वे शिवा चन्द्र, ग्रह, तारा [ आदि ] -के अनुकूल होनेपर सुखद मुहूर्तमें शीघ्र ही माताके सामने प्रकट हो गयीं ॥ २२-२३ ॥ उनके उत्पन्न होते ही प्रजापति दक्ष बड़े प्रसन्न हुए तथा उनके प्रकृष्ट तेजको देखकर उन्होंने उन्हें वही शिवादेवी समझा ॥ २४ ॥
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता (
तदाभूत्पुष्पसद्वृष्टिर्मेघाश्च ववृषुर्जलम् ।
दिशः शांता द्रुतं तस्यां जातायां च मुनीश्वर ॥ २५
अवादयन्त त्रिदशाः शुभवाद्यानि खे गताः ।
जज्ज्वलुश्चाग्नयः शांताः सर्वमासीत्सुमङ्गलम् ॥ २६
वीरिणीसंभवां दृष्ट्वा दक्षस्तां जगदम्बिकाम् ।
नमस्कृत्य करौ बद्ध्वा बहु तुष्टाव भक्तितः ॥ २७
दक्ष उवाच
महेशानि नमस्तुभ्यं जगदम्बे सनातनि ।
कृपां कुरु महादेवि सत्ये सत्यस्वरूपिणि ॥ २८
शिवा शांता महामाया योगनिद्रा जगन्मयी ।
या प्रोच्यते वेदविद्भिर्नमामि त्वां हितावहाम् ॥ २ ९
यया धाता जगत्सृष्टौ नियुक्तस्तां पुराकरोत् ।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम् ॥ ३०
यया विष्णुर्जगत्स्थित्यै नियुक्तस्तां सदाकरोत् ।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम् ॥ ३१
यया रुद्रो जगन्नाशे नियुक्तस्तां सदाकरोत् ।
तां त्वां नमामि परमां जगद्धात्रीं महेश्वरीम् ॥ ३२
रजः सत्त्वतमोरूपां सर्वकार्यकरी सदा ।
त्रिदेवजननीं देवीं त्वां नमामि च तां शिवाम् ॥ ३३
यस्त्वां विचिंतयेद् देवि विद्याविद्यात्मिकां पराम् ।
तस्य भुक्तिश्च मुक्तिश्च सदा करतले स्थिता ॥ ३४
यस्त्वां प्रत्यक्षतो देवि शिवां पश्यति पावनीम् ।
तस्यावश्यं भवेन्मुक्तिर्विद्याविद्याप्रकाशिका ॥ ३५
ये स्तुवंति जगन्मातर्भवानीमंबिकेति च ।
जगन्मयीति दुर्गेति सर्वं तेषां भविष्यति ॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इति स्तुता जगन्माता शिवा दक्षेण धीमता ।
तथोवाच तदा दक्षं यथा माता शृणोति न ॥ ३७
सतीखण्ड ) ३६५ हे मुनीश्वर! उन देवीके उत्पन्न होते ही उस समय आकाशसे पुष्पवृष्टि होने लगी, मेघोंने जलकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और सभी दिशाएँ शान्त हो गयीं । देवता आकाशमें स्थित होकर उत्तम बाजे बजाने लगे और शान्त अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठीं । इस प्रकार [ सभी दिशाओंमें ] मंगल - ही - मंगल हो गया ॥ २५-२६ ॥ वीरिणीमें उत्पन्न हुई उन जगदम्बाको देखकर दक्ष भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार करके स्तुति करने लगे ॥ २७ ॥
दक्ष बोले – - हे महेशानि! हे सनातनि! हे जगदम्बे! आपको नमस्कार है, हे सत्ये! हे सत्यस्वरूपिणि! हे महादेवि! [ मेरे ऊपर ] दया करें ॥ २८ ॥
वेदके ज्ञाता जिन्हें शिवा, शान्ता, महामाया, | योगनिद्रा तथा जगन्मयी कहते हैं, उन आप हितकारिणी देवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२ ९ ॥ जिन्होंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीको उत्पन्नकर इस जगत्की सृष्टिके कार्यमें नियुक्त किया है, उन परमा जगन्माता आप महेश्वरीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३० ॥
जिन्होंने सदा संसारके पालनके लिये विष्णुको नियुक्त किया है, उन परमा जगन्माता आप महेश्वरीको मैं नमस्कार करता हूँ । जिन्होंने संसारके विनाशके लिये रुद्रको नियुक्त किया है, उन परमा जगन्माता आप महेश्वरीको मैं नमस्कार करता हूँ॥३१-३२ ॥ सत्त्व - रज - तमरूपोंवाली, सर्वदा समस्त कार्योंको साधनेवाली तथा तीनों देवताओंको उत्पन्न करनेवाली उन आप शिवादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३३ ॥
हे देवि! जो आपको विद्या अविद्या- इन दोनों रूपोंसे स्मरण करता है, उसके हाथमें भोग तथा मोक्ष दोनों ही स्थित हो जाते हैं ॥३४ ॥
हे देवि! जो परमपावनी शिवास्वरूपा आपका प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसे विद्या तथा अविद्याको प्रकाशित करनेवाली मुक्ति अपने - आप मिल जाती है ॥ ३५ ॥
हे जगदम्बे! जो अम्बिका, जगन्मयी एवं दुर्गा - इन नामोंसे आप भवानीका स्तवन करते हैं, उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ॥ ३६ ॥
ब्रह्मा बोले- जब इस प्रकार जगन्माता शिवाकी स्तुति दक्षप्रजापतिने की, तब वे दक्षसे इस प्रकारसे कहने लगीं, जिससे कि माता वीरिणी न सुन सकें ॥ ३७ ॥
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३६६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
सर्वं सम्मोह्य तथ्यं च तथा दक्षः शृणोतु तत् ।
नान्यस्तथा शिवा प्राह नानोतिः परमेश्वरी ॥ ३८
देव्युवाच
अहमाराधिता पूर्वं सुतार्थं ते प्रजापते ।
ईप्सितं तव सिद्धं तु तपो धारय संप्रति ॥ ३ ९
ब्रह्मोवाच
एवमुक्त्वा तदा देवी दक्षं च निजमायया ।
आस्थाय शैशवं भावं जनन्यंते रुरोद सा ॥ ४०
अथ तद् रोदनं श्रुत्वा स्त्रियो वाक्यं ससंभ्रमाः ।
आगतास्तत्र सुप्रीत्या दास्योऽपि च ससंभ्रमाः ॥ ४१
दृष्ट्वासिक्नीसुतारूपं ननन्दुः सर्वयोषितः ।
सर्वे पौरजनाश्चापि चक्रुर्जयरवं तदा ॥ ४२
उत्सवश्च महानासीद् गानवाद्यपुरःसरम् ।
दक्षोऽसिक्नी मुदं लेभे शुभं दृष्ट्वा सुताननम् ॥ ४३
दक्षः श्रुतिकुलाचारं चक्रे च विधिवत्तदा ।
दानं ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च द्रविणं तथा ॥ ४४
बभूव सर्वतो गानं नर्तनं च यथोचितम् ।
नेदुर्वाद्यानि बहुश: सुमङ्गलपुरःसरम् ॥ ४५
अथ हर्यादयो देवाः सर्वे सानुचरास्तदा ।
मुनिवृन्दैः समागत्योत्सवं चकुर्यथाविधि ॥ ४६
दृष्ट्वा दक्षसुतामम्बां जगतः परमेश्वरीम् ।
नेमुः सविनयाः सर्वे तुष्टुवुश्च शुभैः स्तवैः ॥ ४७
ऊचुः सर्वे प्रमुदिता गिरं जयजयात्मिकाम् । ।
प्रशशंसुर्मुदा दक्षं वीरिणीं च विशेषतः ॥ ४८
तदोमेति नाम चक्रे तस्या दक्षस्तदाज्ञया ।
प्रशस्तायाः सर्वगुणैः सत्त्वादपि मुदान्वितः ॥ ४ ९
नामान्यन्यानि तस्यास्तु पश्चाज्जातानि लोकतः । ।
महामङ्गलदान्येव दुःखघ्नानि विशेषतः ॥ ५०
१४ नाना प्रकारके रूपोंको धारण करनेवाली | परमेश्वरी शिवाने सबको मोहित करके इस उन सत्य कहा कि उसे केवल दक्ष हा सुन सक प्रकार कोई नहीं ॥ ३८ ॥, अन्य
देवी बोलीं- हे प्रजापते! आपने मुझे पुत्रीरूपसे प्राप्त करनेहेतु पहले मेरी आराधना की थी, वह आपका अभीष्ट पूरा हुआ, अब आप पुनः तपस्या कीजिये ॥ ३ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार दक्षसे कहकर वे देवी अपनी मायासे शिशुका रूप धारणकर माताके पास रोने लगीं ॥ ४० ॥
उस रोदनको सुनकर और उसे स्त्रीका शब्द जानकर स्त्रियाँ तथा समस्त दासियाँ भी आश्चर्यचकित हो प्रीतिपूर्वक वहाँ गयीं । असिक्नीकी सुताके रूपको देखकर सभी स्त्रियाँ परम प्रसन्न हुईं । उस समय समस्त नगरवासियोंने भी जय - जयकार किया ॥ ४१-४२ ॥ नगरमें गाने - बजानेके साथ महान् उत्सव होने लगा । पुत्रीका सुन्दर मुख देखकर असिक्नी तथा दक्ष परम प्रसन्न हुए । दक्षप्रजापतिने विधिपूर्वक वेदविहित कुलाचार किया और ब्राह्मणोंको दान दिया तथा अन्य लोगोंको भी बहुत - सा धन दिया॥४३-४४ ॥ वहाँ सभी ओर मंगलाचारपूर्वक गायन तथा नृत्य होने लगा और अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे ॥ ४५ ॥
[ शिवाके जन्मके समय ] विष्णु आदि सभी देवगण अपने - अपने अनुचरों तथा मुनियोंके साथ आकर यथाविधि अनेक उत्सव करने लगे ॥ ४६ ॥
दक्षकन्याके रूपमें [ अवतरित हुई ] उन परमेश्वरी जगदम्बाको देखकर देवताओंने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और अनेक प्रकारके उत्तम स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति की । सभी देवता प्रसन्न होकर जय-जयकार करने लगे और दक्ष तथा वीरिणीकी विशेष रूपसे प्रशंसा करने लगे ॥ ४७-४८ ॥ दक्षने प्रसन्न होकर विष्णु आदि देवताओंकी । आज्ञासे सभी गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण उस प्रशस्त अम्बिकाका उमा - यह नाम रखा । उसके बाद लोकमें । उनके अन्य नाम भी पड़े, जो मंगल करनेवाले तथा लोगोंके दुःख दूर करनेवाले थे । ४ ९ -५० ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता (
दक्षस्तदा हरिं नत्वा मां सर्वानमरानपि ।
मुनीनपि करौ बद्ध्वा स्तुत्वा चानर्च भक्तितः ॥ ५१
अथ विष्ण्वादयः सर्वे सुप्रशस्याजनंदनम् ।
प्रीत्या ययुः स्वधामानि संस्मरन् सशिवं शिवम् ॥ ५२
अतस्तां च सुतां माता सुसंस्कृत्य यथोचितम् ।
शिशुपानेन विधिना तस्यै स्तन्यादिकं ददौ ॥ ५३
पालिता साथ वीरिण्या दक्षेण च महात्मना ।
ववृधे शुक्लपक्षस्य यथा शशिकलान्वहम् ॥ ५४
तस्यां तु सद्गुणाः सर्वे विविशुर्द्विजसत्तम ।
शैशवेऽपि यथा चन्द्रे कलाः सर्वा मनोहराः ॥ ५५
आचरन्निजभावेन सखीमध्यगता यदा ।
तदा लिलेख भर्गस्य प्रतिमामन्वहं मुहुः ॥ ५६
यदा जगौ सुगीतानि शिवा बाल्योचितानि सा ।
तदा स्थाणुं हरं रुद्रं सस्मार स्मरशासनम् ॥ ५७
ववृधेऽतीव दंपत्योः प्रत्यहं करुणातुला ।
तस्या बाल्येऽपि भक्तायास्तयोर्नित्यं मुहुर्मुहुः ॥ ५८
सर्वबालगुणाक्रांतां सदा स्वालयकारिणीम् ।
तोषयामास पितरौ नित्यं नित्यं मुहुर्मुहुः ॥ ५ ९
सतीखण्ड ) ३६७ उस समय दक्षप्रजापतिने हाथ जोड़कर विष्णु, मुझ ब्रह्मा, सम्पूर्ण मुनियों तथा देवताओंकी स्तुति करके भक्तिपूर्वक सभी लोगोंका पूजन किया ॥५१ ॥
तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवगण दक्षकी प्रशंसा करके शिवा तथा शिवका स्मरण करते हुए अपने - अपने स्थानोंको चले गये ॥५२ ॥
उसके बाद माताने भी यथोचित रूपसे उस कन्याका संस्कारकर बालकोंकी स्तनपानविधिसे उसे अपना दूध पिलाया ॥ ५३ ॥
महात्मा प्रजापति दक्ष तथा वीरिणीने [ बड़ी सावधानीके साथ ] उस कन्याका लालन - पालन किया, जिससे वह शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाके समान प्रतिदिन बढ़ने लगी ॥ ५४ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! उस कन्यामें बाल्यकालमें ही सभी सद्गुण प्रविष्ट हो गये; जैसे चन्द्रमामें सभी मनोहर कलाएँ अपने - आप आ जाती हैं ॥ ५५ ॥
जब वह सखियोंके बीचमें जाकर अपने भावमें मग्न होती थी, तब प्रतिदिन शंकरजीकी प्रतिमाका बार-बार निर्माण करती थी । जब वह शिवा बालोचित गाने गाती, तो वह कामपर शासन करनेवाले हर, रुद्र तथा स्थाणुका [ गानेके बहाने ] स्मरण करती थी ॥ ५६-५७ ॥ दक्ष प्रजापति तथा वीरिणीका स्नेह दिन - प्रतिदिन उस कन्यापर बढ़ता ही गया । यद्यपि वह बालिका थी, फिर भी वह अपने माता - पितामें बड़ी भक्ति रखती थी ॥ ५८ ॥
सभी बालोचित गुणोंसे परिपूर्ण वह उमा देवी अपने घरके सभी कार्योंको निपुणतासे सम्पन्नकर । प्रतिदिन अपने माता - पिताको सन्तुष्ट करने लगी ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीजन्मबाललीलावर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीजन्म एवं बाललीलाका वर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः सतीद्वारा नन्दा - व्रतका अनुष्ठान तथा देवताओंद्वारा शिवस्तुति ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- हे मुने! एक समय आपके अथैकदा पितुः पार्श्वे तिष्ठन्तीं तां सतीमहम् । साथ जाकर मैंने त्रिलोकीकी सर्वस्वभूता उन सतीको त्वया सह मुनेऽद्राक्षं सारभूतां त्रिलोकके ॥ १ अपने पिताके पास बैठी हुई देखा ॥१ ॥
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३६८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १५
पित्रा नमस्कृतं वीक्ष्य सत्कृतं त्वां च मां सती ।
प्रणनाम मुदा भक्त्या लोकलीलानुसारिणी ॥ २
प्रणामान्ते सतीं वीक्ष्य दक्षदत्तशुभासने ।
स्थितोऽहं नारद त्वं च विनतामहमागदम् ॥ ३
त्वामेव यः कामयते यं तु कामयसे सति ।
तमाप्नुहि पतिं देवं सर्वज्ञं जगदीश्वरम् ॥ ४
यो नान्यां जगृहे नापि गृह्णाति न ग्रहीष्यति ।
जायां स ते पतिर्भूयादनन्यसदृशः शुभे ॥ ५
इत्युक्त्वा सुचिरं तां वै स्थित्वा दक्षालये पुनः ।
विसृष्टौ तेन संयातौ स्वस्थानं तौ च नारद ॥ ६
दक्षोऽभवच्च सुप्रीतस्तदाकर्ण्य गतज्वरः ।
आददे तनयां स्वां तां मत्वा हि परमेश्वरीम् ॥ ७
इत्थं विहारै रुचिरैः कौमारैर्भक्तवत्सला ।
जहाववस्थां कौमारीं स्वेच्छाधृतनराकृतिः ॥ ८
बाल्यं व्यतीत्य सा प्राप किञ्चिद्यौवनतां सती ।
अतीव तपसाङ्गेन सर्वांगेषु मनोहरा ॥ ९
दक्षस्तां वीक्ष्य लोकेशः प्रोद्भिन्नान्तर्वयः स्थिताम् ।
चिंतयामास भर्गाय कथं दास्य इमां सुताम् ॥ १०
अथ सापि स्वयं भर्गं प्राप्तुमैच्छत्तदान्वहम् ।
पितुर्मनोगतिं ज्ञात्वा मातुर्निकटमागता ॥ ॥११
११ |
पप्रच्छाज्ञां तपोहेतोः शंकरस्य विशालधीः । ।
मातुः शिवाथ वीरिण्याः सा सती परमेश्वरी ॥ १२
|
ततः सती महेशानं पतिं प्राप्तुं दृढव्रता ।
सा तमाराधयामास गृहे मातुरनुज्ञया ॥ १३ ।
पिताके द्वारा नमस्कृत तथा सत्कृत होते | हमदोनोंको देखकर लोकलीलाका अनुसरण करनेवाली हुए । उन सतीने प्रेमपूर्वक भक्तिके साथ आपको तथा मुझे प्रणाम किया ॥ २ ॥
हे नारद! प्रणाम करनेके पश्चात् दक्षके द्वारा दिये गये आसनपर हम दोनों बैठ गये, इसके बाद विनम्र सतीको देखकर मैंने कहा — हे सति! जो तुम्हें । चाहता है तथा जिसे तुम चाहती हो, उन सर्वज्ञ । जगदीश्वरको तुम पतिरूपमें प्राप्त करो । जिसने [ तुम्हारे अतिरिक्त ] दूसरी स्त्रीका पाणिग्रहण नहीं किया है, जो वर्तमानमें भी न करते हैं, न करेंगे और हे शुभे! जिनकी समता कोई और करनेवाला नहीं है, वे ही [ इस समय ] तुम्हारे पति हों ॥ ३-५ ॥ हे नारद! ऐसा कहकर कुछ दिन दक्षके घर निवासकर हमदोनों उनसे विदा लेकर अपने - अपने स्थानपर चले गये ॥६ ॥
मेरी बात सुनकर दक्ष परम प्रसन्न होकर चिन्तारहित हो गये और अपनी कन्याको परमेश्वरी जानकर उनका बड़ा सत्कार करने लगे ॥७ ॥
अपनी इच्छासे मनुष्यशरीर धारण करनेवाली, भक्तवत्सला देवीने मनोहर कौमारोचित विहार करके अपनी कौमार्यावस्था समाप्त की ॥ ८ ॥
अपनी तपस्याके प्रभावसे सर्वांगमनोहरा उन सतीने धीरे - धीरे बाल्यावस्था समाप्तकर युवावस्थाको प्राप्त किया॥९॥
लोकेश दक्षप्रजापति उस कन्याको युवावस्थाको प्राप्त हुई देखकर विचार करने लगे कि अपनी इस पुत्रीको शिवके लिये किस प्रकार प्रदान करूँ ॥ १० ॥
इधर, वे सती भी प्रतिदिन शिवको प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगीं । पिताके मनोभावको । जानकर वे माताके पास आयीं । विशाल बुद्धिवाली उन सती परमेश्वरीने शंकरको प्राप्त करनेकी इच्छासे । तप करनेके लिये अपनी माता वीरिणीसे आज्ञा माँगी । तब दृढ़ व्रतवाली वे सती माताकी आज्ञासे महेश्वरको । पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये घरमें ही तपस्या करने लगीं ॥११- १३ ॥