श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 401–410

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३८ ९ कन्यां दत्त्वा कृतार्थोऽभूत्तदा दक्षो हि मत्सुतः । इस प्रकार मेरे पुत्र दक्ष [ शिवजीको ] पुत्री प्रदान करके कृतार्थ हो गये । शिवा और शिव प्रसन्न

शिवाशिवौ प्रसन्नौ च निखिलं मङ्गलालयम् ॥ ३७ । हुए तथा सब कुछ मंगलमय हो गया ॥३७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे कन्यादानवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें कन्यादानवर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

अथैकोनविंशोऽध्यायः शिवका सतीके साथ विवाह, विवाहके समय शम्भुकी मायासे ब्रह्माका मोहित होना और विष्णुद्वारा शिवतत्त्वका निरूपण ब्रह्मोवाच

कृत्वा दक्षः सुतादानं यौतकं विविधं ददौ ।

हराय सुप्रसन्नश्च द्विजेभ्यो विविधं धनम् ॥

अथ शंभुमुपागत्य समुत्थाय कृताञ्जलिः । सार्धं कमलया चेदमुवाच गरुडध्वजः विष्णुरुवाच देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो त्वं पिता जगतां तात सती माताखिलस्य च

युवां लीलावतारौ वै सतां क्षेमाय सर्वदा ।

खलानां निग्रहार्थाय श्रुतिरेषा सनातनी ॥

स्निग्धनीलाञ्जनश्यामशोभया शोभसे हर दाक्षायण्या यथा चाहं प्रतिलोमेन पद्मया देवानां वा नृणां रक्षां कुरु सत्यानया सताम् संसारसारिणां शम्भो मङ्गलं सर्वदा तथा य एनां साभिलाषो वै दृष्ट्वा श्रुत्वाथवा भवेत् तं हन्याः सर्वभूतेश विज्ञप्तिरिति मे प्रभो ब्रह्मोवाच इति वचो विष्णोर्विहस्य परमेश्वरः ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] इस प्रकार कन्यादानकर दक्षने भगवान् शंकरको अनेक प्रकारके १ उपहार दिये और ब्राह्मणोंको भी बहुत - सा धन दिया ॥ १ ॥

उसके बाद लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु शम्भुके पास जाकर हाथ जोड़कर खड़े होकर यह कहने ॥ २ लगे- –॥२ ॥

विष्णु बोले – हे देवदेव! हे महादेव! हे । करुणासागर! हे प्रभो! हे तात! आप सम्पूर्ण जगत्के ॥ ३ पिता हैं और ये सती अखिल संसारकी माता हैं ॥ ३ ॥

आप दोनों सत्पुरुषोंके कल्याण तथा दुष्टोंके ४ दमनके लिये सदा लीलापूर्वक अवतार ग्रहण करते हैं - यह सनातन श्रुति है ॥ ४ ॥

। हे हर! आप चिकने नीले अंजनके समान ॥ ५ शोभावाली सतीके साथ उसी प्रकार शोभा पा रहे हैं, जैसे मैं उसके विपरीत लक्ष्मीके साथ शोभा पा रहा हूँ । सती नीलवर्णा और आप गौरवर्ण हैं, उसके विपरीत मैं नीलवर्ण और लक्ष्मी गौरवर्ण हैं ॥ ५ ॥

। हे शम्भो! आप इन सतीके साथ रहकर ॥ ६ देवताओंकी और सज्जन मनुष्योंकी रक्षा कीजिये, जिससे संसारी जनोंका सदा कल्याण होता रहे ॥ ६ ॥

। हे सर्वभूतेश! हे प्रभो! इन सतीको देखकर ॥ ७ अथवा [ इनके विषयमें ] सुनकर जो कामनायुक्त हो, उसका आप वध कीजिये, यह मेरी प्रार्थना है ॥७ ॥

ब्रह्माजी बोले- भगवान् विष्णुका यह वचन । सुनकर सर्वज्ञ परमेश्वरने मधुसूदनसे हँसकर कहा-एवमस्त्विति सर्वज्ञः प्रोवाच मधुसूदनम् ॥ ८ ऐसा ही होगा ॥८ ॥

पृष्ठ 402

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३ ९ ० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ स्वस्थानं हरिरागत्य स्थित आसीन्मुनीश्वर । हे मुनीश्वर! उसके बाद विष्णु अपने स्थानपर उत्सवं कारयामास जुगोप चरितं च तत् ॥ ९ आकर स्थित हो गये 1 । उन्होंने उत्सव कराया और उस चरित्रको गुप्त ही रखा ॥ ९ ॥

अहं देवीं समागत्य गृह्येोक्तविधिनाखिलम् । तत्पश्चात् मैं देवी सतीके पास आकर गृह्यसूत्रमें अग्निकार्यं यथोद्दिष्टमकार्षं च सुविस्तरम् ॥ १० वर्णित विधिके अनुसार सारा अग्निकार्य विधानके साथ विस्तारपूर्वक करने लगा ॥१० ॥

ततः शिवा शिवश्चैव यथाविधि प्रहृष्टवत् । इसके बाद शिवा और शिवने प्रसन्न होकर मुझ अग्नेः प्रदक्षिणं चक्रे मदाचार्यद्विजाज्ञया ॥ ११ आचार्य और द्विजोंकी आज्ञासे विधिपूर्वक अग्निकी प्रदक्षिणा की ॥ ११ ॥

तदा महोत्सवस्तत्राद्भुतोऽभूद् द्विजसत्तम । हे द्विजसत्तम! उस समय वहाँ बड़ा अद्भुत सर्वेषां सुखदं वाद्यं गीतनृत्यपुरःसरम् ॥ १२ उत्सव मनाया गया और गीत एवं नृत्यके साथ वाद्य

तदानीमद्भुतं तत्र चरितं समभूदति ।

सुविस्मयकरं तात तच्छृणु त्वं वदामि ते ॥

दुर्ज्ञेया शांभवी माया तया सम्मोहितं जगत् ।

सचराचरमत्यन्तं सदेवासुरमानुषम् ॥

योऽहं शंभुं मोहयितुं पुरैच्छं कपटेन ह ।

मां च तं शंकरस्तात मोहयामास लीलया ॥

इच्छेत्परापकारं यः स तस्यैव भवेद् ध्रुवम् ।

इति मत्वापकारं नो कुर्यादन्यस्य पूरुषः ॥

प्रदक्षिणां प्रकुर्वन्त्या वह्नेः सत्याः पदद्वयम् ।

बजाया गया, जो सबके लिये सुखद था ॥ १२ ॥

हे तात! उस समय [ सबको ] आश्चर्यचकित १३ करनेवाला एक अद्भुत चरित्र वहाँ हुआ, उसे आपसे मैं कह रहा हूँ, आप सुनिये ॥ १३ ॥

शिवजीकी माया दुर्ज्ञेय है, उसने देव, असुर १४ तथा मनुष्योंसहित इस चराचर जगत्‌को पूर्णरूपसे मोहित कर रखा है ॥ १४ ॥

हे तात! पूर्वकालमें मैंने जिन शिवको कपटपूर्वक १५ मोहमें डालना चाहा था, उन्हीं शिवने अपनी लीलासे मुझे मोहित कर लिया ॥ १५ ॥

जो दूसरेका अपकार करना चाहता है, निश्चय १६ ही पहले उसीका अपकार हो जाता है । ऐसा समझकर कोई भी व्यक्ति किसी दूसरेका अपकार न करे ॥ १६ ॥

हे मुने! जिस समय सती अग्निकी प्रदक्षिणा कर आविर्बभूव वसनात्तदद्राक्षमहं मुने ॥ १७ रही थीं, उस समय उनके दोनों चरण वस्त्रसे बाहर मदनाविष्टचेताश्च भूत्वाङ्गानि व्यलोकयम् निकल आये थे, मैंने उन्हें देख लिया ॥ १७ ॥

अहं सत्या द्विजश्रेष्ठ शिवमायाविमोहितः । हे द्विजश्रेष्ठ! शिवजीकी मायासे मोहित हुआ ॥ १८ मैं कामसे व्याप्त चित्तवाला होकर सतीके दूसरे यथा यथाहं रम्याणि व्यैक्षमङ्गानि अंगोंको देखने लगा ॥ १८ ॥

सत्या बभूव संहृष्टः कौतुकात् । मैं जैसे - जैसे सतीके अंगोंको उत्सुकतापूर्वक कामार्तो हि तथा तथा ॥ १ ९ देख रहा था, वैसे - वैसे प्रसन्न हो कामार्त हो रहा था ॥ १ ९ ॥ अहमेवं तथा दृष्ट्वा दक्षजां च पतिव्रताम् हे मुने! इस प्रकार पतिव्रता दक्षपुत्रीको देखकर स्मराविष्टमना वक्त्रं द्रष्टुकामोऽभवं । | कामाविष्ट मनवाला मैं उनके मुखको देखनेका

मुने ॥ २० । इच्छुक हो गया ॥ २० ॥

पृष्ठ 403

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३ ९ १

न शंभोर्लज्जया वक्त्रं प्रत्यक्षं च विलोकितम् ।

न च सा लज्जयाविष्टा करोति प्रकटं मुखम् ॥ २१

ततस्तद्दर्शनार्थाय सदुपायं विचारयन् ।

धूम्रघोरेण कामार्तोऽकार्षं तच्च ततः परम् ॥ २२

आर्द्रेन्धनानि भूरीणि क्षिप्त्वा तत्र विभावसौ ।

स्वल्पाज्याहुतिविन्यासादार्द्रद्रव्योद्भवस्तथा ॥ २३

प्रादुर्भूतस्ततो धूमो भूयांस्तत्र समन्ततः ।

तादृग् येन तमोभूतं वेदीभूमिविनिर्मितम् ॥२४

ततो धूमाकुले नेत्रे महेशः परमेश्वरः ।

हस्ताभ्यां छादयामास बहुलीलाकरः प्रभुः ॥ २५

ततो वस्त्रं समुत्क्षिप्य सतीवक्त्रमहं मुने ।

अवेक्षं किल कामार्तः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ २६

मुहुर्मुहुरहं तात पश्यामि स्म सतीमुखम् ।

अथेन्द्रियविकारं च प्राप्तवानस्मि सोऽवशः ॥ २७

मम रेतः प्रचस्कंद ततस्तद्वीक्षणाद् द्रुतम् ।

चतुर्बिन्दुमितं भूमौ तुषारचयसंनिभम् ॥ २८

ततोऽहं शंकितो मौनी तत्क्षणं विस्मितो मुने ।

आच्छादये स्म तद्रेतो यथा कश्चिद् बुबोध न ॥ २ ९

अथ तद्भगवान् शंभुर्ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा ।

रेतोऽवस्कन्दनात्तस्य कोपादेतदुवाच ह ॥ ३०

रुद्र उवाच

किमेतद्विहितं पाप त्वया कर्म विगर्हितम् ।

विवाहे मम कान्ताया वक्त्रं दृष्टं नु रागतः ॥ ३१

त्वं वेत्सि शंकरेणैतत्कर्म ज्ञातं न किंचन ।

त्रैलोक्येऽपि न मेऽज्ञातं गूढं तस्मात्कथं विधे ॥ ३२

यत्किंचित् त्रिषु लोकेषु जङ्गमं स्थावरं तथा ।

तस्याहं मध्यगो मूढ तैलं यद्वत्तिलांतिगम् ॥ ३३

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा प्रियविष्णुर्मां तदा विष्णुवचः स्मरन् ।

इयेष हन्तुं ब्रह्माणं शूलमुद्यम्य शंकरः ॥ ३४

किंतु शिवजीके सामने लज्जाके कारण मैं प्रत्यक्ष सतीका मुख नहीं देख सका और वे भी लज्जासे युक्त होनेके कारण अपना मुख प्रकट नहीं कर रही थीं ॥ २१ ॥

तब सतीका मुख देखनेके लिये एक अत्यन्त सुन्दर उपाय सोचते हुए कामपीड़ित मैंने अग्निमें बहुत - सी गीली लकड़ी डालकर घोर धुआँ उत्पन्न कर दिया और उस धूमयुक्त अग्निमें घृतकी थोड़ी-थोड़ी आहुति देने लगा । तब गीली लकड़ीके संयोगसे चारों दिशाओंमें घोर धुआँ फैल गया । इस प्रकार धूमाधिक्य होनेके फलस्वरूप वेदीके चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार हो गया ॥ २२ – २४ ॥ तब अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले प्रभु महेश्वरके नेत्र भी धूमसे व्याकुल हो उठे और उन्होंने दोनों हाथोंसे अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् कामसे पीड़ित मैंने प्रसन्न मनसे वस्त्र हटाकर सतीके मुखको देख लिया ॥ २६ ॥

हे पुत्र! मैं सतीके मुखको बार - बार देखने लगा, इस प्रकार अवश होकर मैं इन्द्रियविकारसे युक्त हो गया । अपनेको असंयमित देख सशंकित हो मैं आश्चर्यसे चकित होकर मौन हो गया । भगवान् शिव अपनी दिव्य दृष्टिसे इसे जानकर क्रोधित होकर कहने लगे - ॥ २७ – ३० ॥ रुद्र बोले — हे पाप! आपने ऐसा कुत्सित कर्म क्यों किया, जो कि विवाहमें रागपूर्वक मेरी स्त्रीका मुख देखा? ॥३१ ॥

आप समझते हैं कि शंकर इस कुत्सित कर्मको नहीं जान सकेंगे । हे विधे! इस त्रिलोकीमें कोई भी बात मुझसे अज्ञात नहीं रह सकती, तो यह बात कैसे छिपी रहेगी? ॥३२ ॥

हे मूढ़! जिस प्रकार तिलके सभी अवयवोंमें तेल रहता है, उसी प्रकार तीनों लोकोंमें जो कुछ भी स्थावर - जंगम पदार्थ हैं, उनमें मैं रहता हूँ ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी बोले- तत्पश्चात् विष्णुके लिये प्रिय शंकरजीने मुझसे यह कहकर [ पूर्वमें कहे गये ] विष्णुके वचनका स्मरणकर शूल लेकर मुझ ब्रह्माको मारना चाहा ॥३४ ॥

पृष्ठ 404

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३ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ शंभुनोद्यमिते शूले मां च हन्तुं द्विजोत्तम । हे द्विजोत्तम! मुझे मारनेके लिये शिवके द्वारा मरीचिप्रमुखास्ते वै हाहाकारं च चक्रिरे ॥ ३५ त्रिशूल उठाये जानेपर [ वहाँ उपस्थित ] मरीचि आदि ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्चाखिलास्तथा तुष्टुवुः शंकरं तत्र प्रज्वलन्तं भयातुराः देवा ऊचुः देवदेव महादेव शरणागतवत्सल ब्रह्माणं रक्ष रक्षेश कृपां कुरु महेश्वर ॥ जगत्पिता महेश त्वं जगन्माता सती मता हरिब्रह्मादयः सर्वे तव दासाः सुरप्रभो

अद्भुताकृतिलीलस्त्वं तव मायाद्भुता प्रभो ।

तया विमोहितं सर्वं विना त्वद्भक्तिमीश्वर ॥

ब्रह्मोवाच

इत्थं बहुतरं दीना निर्जरा मुनयश्च ते ।

तुष्टुवुर्देवदेवेशं क्रोधाविष्टं महेश्वरम् ॥

दक्षो मैवं मैवमिति पाणिमुद्यम्य शंकितः ।

वारयामास भूतेशं क्षिप्रमेत्य पुरोगतः ॥

अथाग्रे सङ्गतं वीक्ष्य तदा दक्षं महेश्वरः ।

प्रत्युवाचाप्रियमिदं संस्मरन्प्रार्थनां हरेः ॥

महेश्वर उवाच

विष्णुना मेऽतिभक्तेन यदिदानीमुदीरितम् ।

मयाप्यङ्गीकृतं कर्तुं तदिहैव प्रजापते ॥

सतीं यः साभिलाषः सन् वीक्षेत वध तं प्रभो ।

ऋषि हाहाकार करने लगे ॥ ३५ ॥

। उस समय सभी देवता तथा मुनि भयभीत होकर ॥ ३६ क्रोधसे जलते हुए शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥

देवगण बोले — हे देवदेव! हे महादेव! हे

। शरणागतवत्सल! हे ईश! आप ब्रह्माकी रक्षा कीजिये ।

३७ हे महेश्वर! कृपा कीजिये ॥ ३७ ॥

। हे महेश! आप इस संसारके पिता हैं तथा देवी ॥ ३८ सती जगत्की माता कही गयी हैं । हे सुरप्रभो! विष्णु, ब्रह्मा आदि सभी [ देवगण ] आपके दास हैं ॥ ३८ ॥

आपकी आकृति तथा लीला अद्भुत है । हे प्रभो! ३ ९ आपकी माया भी अद्भुत है । हे ईश्वर! उसने आपकी भक्तिसे रहित सभीको मोहित कर लिया है ॥ ३ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार दु: खित देवता तथा मुनि क्रोधमें भरे हुए देवाधिदेव महादेवकी स्तुति ४० करने लगे ॥४० ॥

दक्ष प्रजापतिने शंकित होकर वहाँ पहुँचकर ४१ दोनों हाथ उठाकर ऐसा मत कीजिये, ऐसा मत कीजिये — ऐसा कहते हुए शिवजीके आगे जाकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका ॥ ४१ ॥

तब शिवजी अपने आगे दक्षको आया हुआ ४२ देखकर भगवान् विष्णुकी प्रार्थनाका स्मरण करते हुए इस प्रकारका अप्रिय वचन कहने लगे -॥४२ ॥

महेश्वर बोले — हे प्रजापते! मेरे महान् भक्त विष्णुने उस समय जैसा कहा था, मैंने वही करना ४३ स्वीकार भी किया था ॥ ४३ ॥

[ विष्णुने कहा था कि ] हे प्रभो! जो वासनायुक्त इति विष्णुवचः सत्यं विधिं हत्वा करोम्यहम् ॥ ४४ होकर सतीको देखे, उसका वध कीजिये । अब मैं ब्रह्माका वध करके विष्णुके वचनको सत्य करता साभिलाषः हूँ ॥ ४४ ॥

कथं ब्रह्मा सतीं समवलोकयत् । अभवत् त्यक्तरेतास्तु ब्रह्माने कामनायुक्त होकर सतीको क्यों देखा? ततो हन्मि कृतागसम् ॥ ४५ इन्होंने अत्यन्त गर्हित कर्म किया है, इसलिये अपराधी ब्रह्मोवाच ब्रह्माका वध मैं अवश्य करूँगा ॥४५ ॥

इत्युक्तवति देवेशे महेशे क्रोधसंकुले । ब्रह्माजी बोले- उस समय क्रोधाविष्ट देवेश्वर चकंपिरे जनाः सर्वे सदेवमुनिमानुषाः | महेशके ऐसा कहनेपर देवता, मुनि तथा मनुष्यों सहित ॥ ४६ । सभी लोग काँपने लगे ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 405

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३ ९ ३ हाहाकारो महानासीदौदासीन्यं च सर्वशः । चारों दिशाओंमें हाहाकार मच गया और चारों अभूवं विकलोऽतीव तदाहं तद्विमोहितः ॥ ४७ ओर उदासी छा गयी । उनके द्वारा विमोहित किया

अथ विष्णुर्महेशातिप्रियः कार्यविचक्षणः ।

तमेवंवादिनं रुद्रं तुष्टाव प्रणतः सुधीः ॥

स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैः शंकरं भक्तवत्सलम् ।

इदमूचे वारयंस्तं क्षिप्रं भूत्वा पुरःसरः ॥

विष्णुरुवाच

विधिं न जहि भूतेश स्रष्टारं जगतां प्रभुम् ।

अयं शरणगस्तेऽद्य शरणागतवत्सलः ॥

अहं तेऽतिप्रियो भक्तो भक्तराज इतीरितः ।

विज्ञप्तिं हृदि मे मत्वा कृपां कुरु ममोपरि ॥

अन्यच्च शृणु मे नाथ वचनं हेतुगर्भितम् ।

तन्मनुष्व महेशान कृपां कृत्वा ममोपरि ॥

प्रजाः स्रष्टुमयं शंभो प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः ।

अस्मिन् हते प्रजास्रष्टा नास्त्यन्यः प्राकृतोऽधुना ॥

सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि करिष्यामः पुनः पुनः ।

त्रयो देवा वयं नाथ शिवरूप त्वदाज्ञया ॥

एतस्मिन्निहते शम्भो कस्त्वत्कर्म करिष्यति ।

तस्मान्न वध्यो भवता सृष्टिकृल्लयकृद्विभो ॥

अनेनैव सती कन्या दक्षस्य च शिवा विभो । सदुपायेन वै भार्या भवदर्थे प्रकल्पिता ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य महेशस्तु विज्ञप्तिं विष्णुना कृताम् प्रत्युवाचाखिलांस्तांश्च श्रावयंश्च दृढव्रतः महेश उवाच देवदेव रमेशान विष्णो मत्प्राणवल्लभ न निवारय मां तात वधादस्य खलस्त्वयम् गया मैं उस समय अत्यन्त व्याकुल हो उठा ॥ ४७ ॥

तब महेशके अतिप्रिय, कार्य सिद्ध करनेमें ४८ प्रवीण तथा बुद्धिमान् भगवान् विष्णुने ऐसा कहनेवाले उन शिवजीकी स्तुति की ॥ ४८ ॥

अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे भक्तवत्सल शिवजीकी ४ ९ स्तुतिकर उन्हें [ ब्रह्माका वध करनेसे ] रोकते हुए आगे जाकर उन्होंने इस प्रकार कहा- ॥४ ९ ॥ विष्णुजी बोले - हे भूतेश! आप उत्पन्न करनेवाले प्रभु इन ब्रह्माका वध न ५० आपकी शरणमें आये हैं और आप शरणमें लोगोंसे स्नेह करनेवाले हैं ॥५० ॥

मैं आपका परम प्रिय हूँ, इसीलिये मुझे ५१ कहा गया है । मेरे इस निवेदनको हृदयमें । करके मेरे ऊपर कृपा कीजिये ॥ ५१ ॥

जगत्‌को करें । ये आये हुए भक्तराज स्वीकार [ इसके अतिरिक्त ] हे नाथ! हेतुयुक्त मेरी दूसरी ५२ प्रार्थना भी सुनिये और हे महेश्वर! मेरे ऊपर कृपा करके उसे मानिये ॥ ५२ ॥

हे शम्भो! ये चतुरानन ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि ५३ करनेके लिये उत्पन्न हुए हैं । इनके मारे जानेपर प्रजाकी सृष्टि करनेवाला कोई दूसरा नहीं है ॥ ५३ ॥

हे नाथ! हे शिवस्वरूप! आपकी आज्ञासे ही ५४ हम तीनों देवता सृष्टि, स्थिति और संहारका कार्य बार - बार करेंगे ॥५४ ॥

हे शम्भो! उनका वध कर देनेपर आपका कार्य ५५ कौन सम्पन्न करेगा? इसलिये हे लयकर्ता विभो! आप इन सृष्टिकर्ताका वध न करें ॥ ५५ ॥

हे विभो! इन्होंने ही आपकी भार्या होनेके लिये ॥ ५६ शिवाको दक्षकन्या सतीके रूपमें सत्प्रयत्नसे अवतरित किया है ॥५६ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] विष्णुके द्वारा । की गयी इस प्रार्थनाको सुनकर दृढव्रत शंकरजी ॥५७ [ वहाँ उपस्थित ] सभी लोगोंको सुनाते हुए [ भगवान् विष्णुसे ] इस प्रकार कहने लगे -॥५७ ॥

महेश बोले- हे देवदेव! हे रमेश! हे विष्णो! । हे मेरे प्राणप्रिय! हे तात! मुझको इसका वध करनेसे ॥ ५८ मत रोकिये; क्योंकि यह दुष्ट है ॥५८ ॥

पृष्ठ 406

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३ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ पूरयिष्यामि विज्ञप्तिं पूर्वान्तेऽङ्गीकृतां मया । आपकी पूर्व प्रार्थनाको, जिसे मैंने स्वीकार महापापकरं दुष्टं हन्म्येनं चतुराननम् ॥५ ९ किया था, उसे पूर्ण करूँगा । इस महापापी तथा दुष्ट अहमेव प्रजाः स्रक्ष्ये सर्वाः स्थिरचरा अपि अन्यं स्त्रक्ष्ये सृष्टिकरमथवाहं स्वतेजसा

हत्वैनं विधिमेवाहं स्वपणं पूरयन् कृतम् ।

स्स्रष्टारमेकं स्त्रक्ष्यामि न निवारय मेश माम् ॥

ब्रह्मोवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा गिरीशस्याह चाच्युतः ।

स्मितप्रभिन्नहृदयः पुनमैवमितीरयन् ॥

अच्युत उवाच

प्रतिज्ञापूरणं योग्यं परस्मिन्पुरुषेऽस्ति वै ।

विचारयस्व वध्येश भवत्यात्मनि न प्रभो ॥

त्रयो देवा वयं शंभो त्वदात्मानः परा नहि ।

एकरूपा न भिन्नाश्च तत्त्वतः सुविचारय ॥

ततस्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णोः स्वातिप्रियस्य सः ।

शंभुरूचे पुनस्तं वै ख्यापयन्नात्मनो गतिम् ॥

शम्भुरुवाच

हे विष्णो सर्वभक्तेश कथमात्मा विधिर्मम ।

लक्ष्यते भिन्न एवायं प्रत्यक्षेणाग्रतः स्थितः ॥

ब्रह्मोवाच इत्याज्ञप्तो महेशेन सर्वेषां पुरतस्तदा । इदमूचे महादेवं चतुर्मुख ब्रह्माका वध मैं [ अवश्य ] करूँगा ॥५ ९ ॥ । मैं स्वयं ही सभी चराचर प्रजाओंकी सृष्टि ॥ ६० करूँगा । अथवा अपने तेजसे किसी दूसरे सृष्टिकर्ताको उत्पन्न करूँगा । मैं अपनी की गयी प्रतिज्ञाको पूरा करते हुए इस ब्रह्माका वध करके अन्य सृष्टिकर्ताको ६१ उत्पन्न करूँगा, अतः हे लक्ष्मीपते! [ इसका वध करनेसे ] मुझे मत रोकिये ॥ ६०-६१ ॥ ब्रह्माजी बोले- शिवजीका यह वचन सुनकर मन्द - मन्द मुसकराते हुए ' ऐसा मत कीजिये'-६२ इस प्रकार बोलते हुए भगवान् विष्णु पुनः कहने लगे- ॥ ६२ ॥

अच्युत बोले- हे प्रभो! प्रतिज्ञाकी पूर्ति तो दूसरे पुरुषमें की जाती है । हे विनाशके ईश! आप ६३ स्वयं विचार करें, वह अपने ऊपर नहीं की जाती ॥६३ ॥

हे शम्भो! हम तीनों देवता आपकी ही आत्मा ६४ हैं, दूसरे नहीं । हमलोग एकरूप हैं, भिन्न नहीं हैं, इस बातको आप यथार्थ रूपसे विचार कीजिये ॥ ६४ ॥

तब अपने अत्यन्त प्रिय विष्णुका वह वचन ६५ सुनकर शिवजी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए उनसे कहने लगे —॥६५ ॥

शम्भु बोले- हे विष्णो! हे सम्पूर्ण भक्तोंके ईश! ब्रह्मा किस प्रकार मेरी आत्मा हो सकते हैं; ६६ क्योंकि ये तो प्रत्यक्ष रूपसे आगे बैठे हुए मुझसे भिन्न दिखायी दे रहे हैं? ॥ ६६ ॥

ब्रह्माजी बोले- जब सबके आगे महेश्वरने ऐसा कहा, तब उन महादेवको सन्तुष्ट करते हुए तोषयन् गरुडध्वजः ॥ ६७ विष्णु कहने लगे - ॥६७ ॥

विष्णुरुवाच विष्णु बोले — हे सदाशिव! न ब्रह्मा आपसे न ब्रह्मा भवतो भिन्नो न त्वं तस्मात्सदाशिव । भिन्न हैं और न तो आप ही उनसे भिन्न हैं । हे न वाहं भवतो भिन्नो न मत् त्वं परमेश्वर ॥ ६८ परमेश्वर! न मैं ही आपसे भिन्न हूँ और न तो आप ही मुझसे भिन्न हैं ॥ ६८ ॥

सर्वं जानासि सर्वज्ञ परमेश हे सर्वज्ञ! हे परमेश! हे सदाशिव! आप सब मन्मुखादखिलान्सर्वं सदाशिव । कुछ जानते हैं, किंतु आप मेरे मुखसे सारी बात सभी

संश्रावयितुमिच्छसि ॥ ६ ९ । लोगोंको सुनवाना चाहते हैं ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 407

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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३ ९ ५

त्वदाज्ञया वदामीश शृण्वंतु निखिलाः सुराः ।

मुनयश्चापरे शं शैवं तत्त्वं संधार्य स्वं मनः ॥

प्रधानस्याप्रधानस्य भागाभागस्य रूपिणः ।

ज्योतिर्मयस्य भागास्ते वयं देवाः प्रभोस्त्रयः ॥

कस्त्वं कोऽहं च को ब्रह्मा तवैव परमात्मनः ।

अंशत्रयमिदं भिन्नं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥

चिन्तयस्वात्मनात्मानं स्वलीलाधृतविग्रहः ।

एकस्त्वं ब्रह्म सगुणो ह्यंशभूता वयं त्रयः ॥

शिरोग्रीवादिभेदेन यथैकस्यैव वर्ष्मणः ।

अङ्गानि ते तथेशस्य तस्य भागत्रयं हर ॥

यज्ज्योतिरभ्रं स्वपुरं पुराणं कूटस्थमव्यक्तमनन्तरूपम् नित्यं च दीर्घादिविशेषणाद्यै-र्हीनं शिवस्त्वं तत एव सर्वम् ॥ ब्रह्मोवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महादेवो मुनीश्वर ।

बभूव सुप्रसन्नश्च न जघान स मां ततः ॥

हे ईश! मैं आपकी आज्ञासे शिवतत्त्वका वर्णन ७० कर रहा हूँ, समस्त देवता, मुनिगण तथा अन्य लोग अपने मनको एकाग्र करके सुनें ॥ ७० ॥

हम तीनों देवता प्रधान- अप्रधान तथा भाग-७१ अभागरूपवाले और ज्योतिर्मयस्वरूप आप परमेश्वरके ही अंश हैं ॥७१ ॥

आप कौन हैं, मैं कौन हूँ और ब्रह्मा कौन ७२ हैं । आप परमात्माके ही ये तीन अंश हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण एक - दूसरेसे भिन्न प्रतीत होते हैं ॥७२ ॥

आप स्वयं अपने स्वरूपका चिन्तन कीजिये । ७३ आपने अपनी लीलासे ही शरीर धारण किया है । आप एक, सगुण ब्रह्म हैं और हम [ ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र ] तीनों आपके अंश हैं ॥ ७३ ॥

हे हर! जैसे मस्तक, ग्रीवा आदिके भेदसे एक ७४ ही शरीरके [ भिन्न - भिन्न ] अवयव होते हैं, उसी प्रकार हम तीनों उन्हीं आप परमेश्वरके अंग हैं ॥ ७४ ॥

जो ज्योतिर्मय, आकाशस्वरूप, स्वयं ही अपना धाम, पुराण, कूटस्थ, अव्यक्त, अनन्तरूपवाला, नित्य तथा दीर्घ आदि विशेषणोंसे रहित ब्रह्म है, वह आप ७५ शिव ही हैं । आपसे ही सब कुछ प्रकट हुआ है ॥ ७५ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! तत्पश्चात् उनकी यह बात सुनकर महादेवजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये ७६ । और उन्होंने मेरा वध नहीं किया ॥७६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सतीविवाहशिवलीलावर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीविवाह और शिवलीलावर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः ब्रह्माजीका ' रुद्रशिर ' नाम पड़नेका कारण, सती एवं शिवका विवाहोत्सव, विवाहके अनन्तर शिव और सतीका वृषभारूढ़ हो कैलासके लिये प्रस्थान उवाच नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे विधे! नारद हे महाभाग! हे शिवभक्त! हे श्रेष्ठ प्रभो! हे विधे! ब्रह्मन् विधे महाभाग शिवभक्त वरप्रभो । आपने भगवान् शिवके परम मंगलदायक तथा अद्भुत चरितं शंभोरद्भुतं मङ्गलायनम् ॥ १ चरित्रको सुनाया ॥१ ॥

श्रावितं

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३ ९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० ततः किमभवत्तात कथ्यतां शशिमौलिनः । हे तात! उसके बाद क्या हुआ, चन्द्रमाको सत्याश्च चरितं दिव्यं सर्वाघौघविनाशनम् ॥ २ सिरपर धारण करनेवाले शिवजी एवं सतीके दिव्य ब्रह्मोवाच निवृत्ते शंकरे चास्मद्वधाद्भक्तानुकम्पिनि अभवन्निर्भयाः सर्वे सुखिनः सुप्रसन्नकाः नतस्कंधाः साञ्जलयः प्रणेमुर्निखिलाश्च ते तुष्टुवुः शंकरं भक्त्या चक्रुर्जयरवं मुदा एतस्मिन्नेव कालेऽहं प्रसन्नो निर्भयो मुने अस्तवं शंकरं भक्त्या विविधैश्च शुभस्तवैः

ततस्तुष्टमनाः शंभुर्बहुलीलाकरः प्रभुः ।

मुने मां समुवाचेदं सर्वेषां शृण्वतां तदा ॥

रुद्र उवाच

ब्रह्मन् तात प्रसन्नोऽहं निर्भयस्त्वं भवाधुना ।

स्वशीर्षं स्पृश हस्तेन मदाज्ञां कुर्वसंशयम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्बहुलीलाकृतः प्रभोः ।

स्पृशन् स्वं कं तथा भूत्वा प्राणमं वृषभध्वजम् ॥

यावदेवमहं स्वं कं स्पृशामि निजपाणिना ।

तावत्तत्र स्थितं सद्यस्तद्रूपवृषवाहनम् ॥

ततो लज्जापरीताङ्गः स्थितश्चाहमधोमुखः ।

इन्द्राद्यैरमरैः सर्वैः सुदृष्टः सर्वतः स्थितैः ॥

अथाहं लज्जयाविष्टः प्रणिपत्य महेश्वरम् ।

प्रावोचं संस्तुतिं कृत्वा क्षम्यतां क्षम्यतामिति ॥

अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं वद प्रभो ।

निग्रहं च तथा न्यायं येन पापं प्रयातु मे ॥

इत्युक्तस्तु मया शंभुरुवाच प्रणतं हि माम् । सुप्रसन्नतरो भूत्वा सर्वेशो | तथा सम्पूर्ण पापराशिका नाश करनेवाले चरित्रका वर्णन कीजिये ॥२ ॥

ब्रह्माजी बोले- भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले । शिवजी जब मेरा वध करनेसे विरत हो गये, तब सभी ॥ ३ लोग निर्भय, सुखी और प्रसन्न हो गये ॥ ३ ॥

। सभी लोगोंने हाथ जोड़कर नतमस्तक हो ॥ ४ शंकरजीको प्रणाम किया, भक्तिपूर्वक स्तुति की और प्रसन्नतापूर्वक जय - जयकार किया ॥४ ॥

। हे मुने! उसी समय मैंने प्रसन्न तथा निर्भय ॥ ५ होकर अनेक प्रकारके उत्तम स्तोत्रोंद्वारा शंकरकी स्तुति की ॥ ५ ॥

हे मुने! तत्पश्चात् अनेक प्रकारकी लीला ६ करनेवाले भगवान् शिव प्रसन्नचित्त होकर सभीको सुनाते हुए मुझसे इस प्रकार कहने लगे - ॥ ६ ॥

रुद्र बोले — हे ब्रह्मन्! हे तात! मैं प्रसन्न हूँ । अब आप निर्भय हो जाइये । आप अपने हाथसे ७ सिरका स्पर्श करें और संशयरहित होकर मेरी आज्ञाका पालन करें ॥ ७ ॥

ब्रह्माजी बोले- अनेक लीलाएँ करनेवाले भगवान् शिवजीकी इस बातको सुनकर मैंने अपने सिरका ८ स्पर्श करते हुए उन वृषध्वजको प्रणाम किया ॥ ८ ॥

मैंने जैसे ही अपने हाथसे अपने सिरका स्पर्श ९ किया, उसी क्षण वहाँ उसीके रूपमें वृषवाहन स्थित दिखायी पड़े । तब लज्जायुक्त शरीरवाला मैं नीचेकी १० ओर मुख करके खड़ा रहा । उस समय वहाँ स्थित इन्द्र आदि देवताओंने मुझे देखा॥९ -१० ॥ उसके पश्चात् लज्जासे युक्त होकर मैं शिवजीको ११ प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति करके क्षमा कीजिये-क्षमा कीजिये - ऐसा कहने लगा ॥११ ॥

हे प्रभो! इस पापकी शुद्धिके लिये कोई १२ प्रायश्चित्त और उचित दण्ड कीजिये, जिससे मेरा पाप दूर हो जाय ॥ १२ ॥

इस प्रकार मेरे कहनेपर भक्तवत्सल सर्वेश | शम्भु अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझ विनम्र ब्रह्मासे कहने

भक्तवत्सलः ॥ १३ । लगे ॥ १३ ॥

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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ३ ९ ७ शंभुवाच

अनेनैव स्वरूपेण मदधिष्ठितकेन हि ।

तपः कुरु प्रसन्नात्मा मदाराधनतत्परः ॥ १४

ख्यातिं यास्यसि सर्वत्र नाम्ना रुद्रशिरः क्षितौ ।

साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजां द्विजन्मनाम् ॥ १५

मनुष्याणामिदं कृत्यं यस्माद्वीर्यं त्वयाधुना ।

तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले ॥ १६

यस्त्वां चानेन रूपेण दृष्ट्वा कौ विचरिष्यति ।

किमेतद् ब्रह्मणो मूर्ध्नि वदन्निति पुरान्तकः ॥ १७

ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्छ्रोष्यतीति यः ।

परदारकृतात्त्यागान्मुक्तिं सद्यः स यास्यति ॥ १८

यथा यथा जनश्चैतत्कृत्यं ते कीर्तयिष्यति ।

तथा तथा विशुद्धिस्ते पापस्यास्य भविष्यति ॥ १ ९

एतदेव हि ते ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं मयेरितम् ।

जनहास्यकरं लोके तव गर्हाकरं परम् ॥ २०

एतच्च तव वीर्यं हि पतितं वेदिमध्यगम् ।

कामार्तस्य मया दृष्टं नैतद्धार्यं भविष्यति ॥ २१

चतुर्बिन्दुमितं रेतः पतितं यत्क्षितौ तव ।

तन्मितास्तोयदा व्योम्नि भवेयुः प्रलयंकराः ॥ २२

एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवर्षीणां पुरो द्रुतम् ।

तद्रेतसः समभवंस्तन्मिताश्च बलाहकाः ॥ २३

संवर्तकस्तथावर्तः पुष्करो द्रोण एव च ।

एते चतुर्विधास्तात महामेघा लयंकराः ॥२४

गर्जन्तश्चाथ मुञ्चन्तस्तोयानीषच्छिवेच्छया ।

फेलुर्व्योम्नि मुनिश्रेष्ठ तोयदास्ते कदारवाः ॥ २५

तैस्तु संछादिते व्योम्नि सुगर्जद्भिश्च शंकरः ।

प्रशान् दाक्षायणी देवी भृशं शांतोऽभवद् द्रुतम् ॥ २६

अथ चाहं वीतभयः शंकरस्याज्ञया तदा ।

शेषं वैवाहिकं कर्म समाप्तिमनयं मुने ॥ २७

शम्भु बोले – - [ हे ब्रह्मन्! ] मुझसे अधिष्ठित इसी रूपसे आप प्रसन्नचित्त होकर आराधनामें संलग्न रहते हुए तप करें ॥ १४ ॥

इसीसे पृथ्वीपर सर्वत्र ' रुद्रशिर ' नामसे आपकी प्रसिद्धि होगी और आप तेजस्वी ब्राह्मणोंके सभी कार्योंको सिद्ध करनेवाले होंगे । आपने [ कामके वशीभूत होकर ] जो वीर्यपात किया है, वह कृत्य मनुष्योंका है, इसलिये आप मनुष्य होकर पृथ्वीपर विचरण करें ॥ १५-१६ ॥ जो तुम्हें इस रूपसे देखकर यह क्या! ब्रह्माके सिरपर शिवजी कैसे हो गये- ऐसा कहता हुआ पृथ्वीपर विचरण करेगा और फिर जो कौतुकवश आपके सम्पूर्ण कृत्यको सुनेगा, वह परायी स्त्रीके निमित्त किये गये त्यागसे शीघ्र ही मुक्त हो जायगा ॥ १७-१८ ॥ लोग जैसे - जैसे आपके इस कुकृत्यका वर्णन करेंगे, वैसे - वैसे आपके इस पापकी शुद्धि होती जायगी ॥ १ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! संसारमें मनुष्योंके द्वारा आपका उपहास करानेवाला तथा आपकी निन्दा करानेवाला यह प्रायश्चित्त मैंने आपसे कह दिया ॥ २० ॥

कामपीड़ित आपका जो तेज वेदीके मध्यमें गिरा तथा जिसे मैंने देख लिया, वह किसीके भी धारण करनेयोग्य नहीं होगा ॥ २१ ॥

तुम्हारा जो तेज पृथ्वीपर गिरा, उससे आकाशमें प्रलयंकर मेघ होंगे । उसी समय वहाँ देवर्षियोंके सामने शीघ्र ही उस तेजसे हे तात! संवर्त, आवर्त, पुष्कर तथा द्रोण - नामक ये चार प्रकारके प्रलयंकारी महामेघ हो गये॥२२–२४ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! ये मेघ शिवकी इच्छासे गरजते हुए, जलकी थोड़ी - सी वर्षा करते हुए तथा भयानक शब्द करते हुए आकाशमें फैल गये ॥२५ ॥

उस समय घोर गर्जन करते हुए उन मेघोंके द्वारा आकाशके आच्छादित हो जानेपर शीघ्र ही शंकरजी और सती देवी शान्त हो गये । हे मुने! उसके बाद मैं निर्भय हो गया और शिवजीकी आज्ञासे मैंने विवाहके शेष कृत्योंको यथाविधि पूर्ण किया ॥ २६-२७ ॥

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३ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० पपात पुष्पवृष्टिश्च शिवाशिवशिरस्कयोः । हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय देवताओंने प्रसन्न सर्वत्र च मुनिश्रेष्ठ मुदा देवगणोज्झिता ॥ २८ होकर शिवाशिवके मस्तकपर चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा की ॥२८ ॥

वाद्यमानेषु वाद्येषु गायमानेषु तेषु च । उस समय बाजे बजने लगे, गीत गाये जाने लगे । पठत्सु विप्रवर्गेषु वेदान् भक्त्यान्वितेषु च ॥ २ ९ ब्राह्मणगण भक्तिसे परिपूर्ण हो वेदपाठ करने लगे ॥ २ ९ ॥ रंभादिषु पुरंध्रीषु नृत्यमानासु सादरम् । रम्भा आदि अप्सराएँ प्रेमपूर्वक नृत्य करने महोत्सवो महानासीद्देवपत्नीषु महानासीद्देवपत्नीषु नारद ॥ ३० लगीं — इस प्रकार हे नारद! देवताओंकी स्त्रियोंके

अथ कर्मवितानेशः प्रसन्नः परमेश्वरः ।

प्राह मां प्राञ्जलिं प्रीत्या लौकिकीं गतिमाश्रितः ॥ ३१

ईश्वर उवाच

हे ब्रह्मन् सुकृतं कर्म सर्वं वैवाहिकं च यत् ।

प्रसन्नोऽस्मि त्वमाचार्यो दद्यां ते दक्षिणां च काम् ॥ ३२

याचस्व तां सुरज्येष्ठ यद्यपि स्यात्सुदुर्लभा ।

ब्रूहि शीघ्रं महाभाग नादेयं विद्यते मम ॥ ३३

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचः सोऽहं शंकरस्य कृताञ्जलिः ।

मुनेऽवोचं विनीतात्मा प्रणम्येशं मुहुर्मुहुः ॥ ३४

यदि प्रसन्नो देवेश वरयोग्योऽस्म्यहं यदि ।

तत्कुरु त्वं महेशान सुप्रीत्या यद्वदाम्यहम् ॥ ३५

अनेनैव तु रूपेण वेद्यामस्यां महेश्वर ।

त्वया स्थेयं सदैवात्र नृणां पापविशुद्धये ॥ ३६

येनास्य संनिधौ कृत्वा स्वाश्रमं शशिशेखर ।

तपः कुर्यां विनाशाय स्वपापस्यास्य शंकर ॥ ३७

चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां नक्षत्रे भगदैवते ।

सूर्यवारे च यो भक्त्या वीक्षेत भुवि मानवः ॥ ३८

तदैव तस्य पापानि प्रयान्तु हर संक्षयम् ।

वर्धते विपुलं पुण्यं रोगा नश्यन्तु सर्वशः ॥ ३ ९

|

या नारी दुर्भगा वंध्या काणा रूपविवर्जिता । ।

सापि त्वद्दर्शनादेव निर्दोषा संभवेद् ध्रुवम् ॥ ४० ।

बीच महान् उत्सव हुआ ॥३० ॥

तदनन्तर यज्ञकर्मका फल देनेवाले भगवान् परमेश्वर शिव प्रसन्न होकर लौकिक गतिका आश्रय ले हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक मुझ ब्रह्मासे कहने लगे - ॥ ३१ ॥

ईश्वर बोले - हे ब्रह्मन्! जो भी वैवाहिक कार्य था, उसे आपने उत्तम रीति से सम्पन्न किया है, अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ, आप [ इस वैवाहिक कृत्यके ] आचार्य हैं, मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ? ॥ ३२ ॥

हे सुरश्रेष्ठ! आप उसे माँगिये । वह दुर्लभ ही क्यों न हो, उसको शीघ्र कहिये । हे महाभाग! आपके लिये मेरे द्वारा कुछ भी अदेय नहीं है ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! शंकरका यह वचन सुनकर मैंने हाथ जोड़कर विनीत भावसे उन्हें बार-बार प्रणामकर कहा —॥३४ ॥

हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मैं वर प्राप्त करनेयोग्य हूँ, तो हे महेशान! जो मैं कह रहा हूँ, उसे आप अत्यन्त प्रसन्नताके साथ कीजिये ॥ ३५ ॥

हे महेश्वर! आप मनुष्योंके पापकी शुद्धिके लिये इसी रूपमें इस वेदीपर सदा विराजमान रहिये ॥ ३६ ॥

हे चन्द्रशेखर! हे शंकर! जिससे आपके सान्निध्यमें अपना आश्रम बनाकर अपने इस पापकी शुद्धिके लिये मैं तपस्या करूँ ॥ ३७ ॥

चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें रविवारके दिन इस भूतलपर | जो मनुष्य आपका भक्तिपूर्वक दर्शन करेगा, हे हर! उसके सारे पाप नष्ट हो जायँ, विपुल पुण्यकी वृद्धि हो और उसके समस्त रोगोंका सर्वथा नाश हो जाय । जो स्त्री दुर्भगा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीन हो, वह भी आपके दर्शनमात्रसे निश्चित रूपसे निर्दोष हो जाय ॥ ३८-४० ॥