शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 431–440

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४१ ९

इतीदृशीं सती दृष्ट्वा शिवलीलां विमोहनीम् ।

सुविस्मिता शिवं प्राह शिवमायाविमोहिता ॥ २ ९

सत्युवाच

देवदेव परब्रह्म सर्वेश परमेश्वर ।

सेवन्ते त्वां सदा सर्वे हरिब्रह्मादयः सुराः ॥ ३०

त्वं प्रणम्यो हि सर्वेषां सेव्यो ध्येयश्च सर्वदा ।

वेदांतवेद्यो यत्नेन निर्विकारी परप्रभुः ॥ ३१

काविमौ पुरुषौ नाथ विरहव्याकुलाकृती ।

विचरन्तौ वने क्लिष्टौ दीनौ वीरौ धनुर्धरौ ॥ ३२

तयोर्ज्येष्ठं कञ्जश्यामं दृष्ट्वा वै केन हेतुना ।

मुदितः सुप्रसन्नात्माभवो भक्त इवाधुना ॥ ३३

इति मे संशयं स्वामिन् शंकर छेत्तुमर्हसि ।

सेव्यस्य सेवके नैव घटते प्रणतिः प्रभो ॥ ३४

ब्रह्मोवाच

आदिशक्तिः सती देवी शिवा सा परमेश्वरी ।

शिवमायावशी भूत्वा पप्रच्छेत्थं शिवं प्रभुम् ॥ ३५

तदाकर्ण्य वचः सत्याः शंकरः परमेश्वरः ।

तदा विहस्य स प्राह सतीं लीलाविशारदः ॥ ३६

परमेश्वर उवाच

शृणु देवि सति प्रीत्या यथार्थं वच्मि नच्छलम् ।

वरदानप्रभावात्तु प्रणामं चैवमादरात् ॥ ३७

रामलक्ष्मणनामानौ भ्रातरौ वीरसम्मतौ ।

सूर्यवंशोद्भवौ देवि प्राज्ञौ दशरथात्मजौ ॥ ३८

गौरवर्णो लघुर्बन्धुः शेषेशो लक्ष्मणाभिधः ।

ज्येष्ठो रामाभिधो विष्णुः पूर्णांशो निरुपद्रवः ॥ ३ ९

अवतीर्णः क्षितौ साधुरक्षणाय भवाय नः ।

इत्युक्त्वा विररामासौ शंभुः सूतिकरः प्रभुः ॥ ४०

2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_15_2_Front मोहमें डालनेवाली भगवान् शिवकी ऐसी लीलाको देखकर सतीको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे उनकी मायासे मोहित हो उनसे इस प्रकार कहने लगीं- ॥ २ ९ ॥ सती बोलीं- हे देवदेव! हे परब्रह्म! हे सर्वेश! हे परमेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सेवा सदा करते रहते हैं । आप ही सबके द्वारा प्रणाम करनेयोग्य हैं । सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान करना चाहिये । वेदान्तशास्त्रके द्वारा यत्नपूर्वक जानने-योग्य निर्विकार तथा परमप्रभु आप ही हैं ॥ ३०-३१ ॥ हे नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं, इनकी आकृति विरह व्यथासे व्याकुल दिखायी पड़ रही है । ये दोनों धनुर्धर वीर वनमें विचरण करते हुए दुःखके भागी और दीन हो रहे हैं । उन दोनोंमें नीलकमलके समान ज्येष्ठ पुरुषको देखकर किस कारणसे आप आनन्दविभोर हो उठे और भक्तकी भाँति अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये? ॥ ३२-३३ ॥ हे स्वामिन्! हे शंकर! आप मेरे संशयको दूर कीजिये । हे प्रभो! सेव्य [ स्वामी ] अपने सेवकको प्रणाम करे - यह उचित नहीं जान पड़ता ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] कल्याणमयी परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवीने शिवकी मायाके वशीभूत होकर जब भगवान् शिवसे इस प्रकार पूछा । तब सतीकी यह बात सुनकर लीला करनेमें प्रवीण परमेश्वर शंकरजी हँसकर सतीसे कहने लगे- ॥ ३५-३६ ॥ परमेश्वर बोले — हे देवि! हे सति! सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक सत्य बात कह रहा हूँ । इसमें किसी प्रकारका छल नहीं है । वरदानके प्रभावसे ही मैंने इन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया है ॥ ३७ ॥

हे देवि! ये दोनों भाई वीरोंद्वारा सम्मानित हैं, इनके नाम श्रीराम और लक्ष्मण हैं, ये सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए हैं, परम बुद्धिमान् हैं और राजा दशरथके पुत्र हैं ॥ ३८ ॥

इनमें जो गौरवर्णके छोटे भाई हैं, वे शेषके अंश हैं, उनका नाम लक्ष्मण है । इनमें ज्येष्ठ भाईका नाम श्रीराम है । ये भगवान् विष्णुके पूर्ण अंश तथा उपद्रवरहित हैं । ये साधुपुरुषोंकी रक्षा और हमलोगोंके कल्याणके लिये इस पृथिवीपर अवतरित हुए हैं । इतना कहकर सृष्टि करनेवाले भगवान् शम्भु चुप हो गये ॥ ३ ९ -४० ॥

पृष्ठ 432

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४२० श्रुत्वापीत्थं वचः शम्भोर्न विशश्वास तन्मनः शिवमाया बलवती सैव त्रैलोक्यमोहिनी अविश्वस्तं मनो ज्ञात्वा तस्याः शंभुः सनातनः अवोचद्वचनं चेति प्रभुर्लीलाविशारदः शिव उवाच शृणु मद्वचनं देवि न विश्वसिति चेन्मनः स्वयं रामपरीक्षां हि कुरु तत्र स्वया धिया

विनश्यति यथा मोहस्तत्कुरु त्वं सति प्रिये ।

गत्वा तत्र स्थितस्तावद् वटे भव परीक्षिका ॥

ब्रह्मोवाच

शिवाज्ञया सती तत्र गत्वाचिन्तयदीश्वरी ।

कुर्यां परीक्षां च कथं रामस्य वनचारिणः ॥

सीतारूपमहं धृत्वा गच्छेयं रामसन्निधौ ।

यदि राम्रो हरिः सर्वं विज्ञास्यति न चान्यथा ॥

इत्थं विचार्य सीता सा भूत्वा रामसमीपतः ।

अगमत्तत्परीक्षार्थं सती मोहपरायणा ॥

सीतारूपां सतीं दृष्ट्वा जपन्नाम शिवेति च ।

विहस्य तत्प्रविज्ञाय नत्वावोचद् रघूद्वहः ॥

श्रीराम उवाच प्रेमतस्त्वं सति ब्रूहि क्व शंभुस्ते नमो गतः । एकाकी विपिने कस्मादागता [ अ ० २४ । इस प्रकार शिवका वचन सुनकर भी उनके मनको ॥ ४१ विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि शिवकी माया बलवती है, वही तीनों लोकोंको मोहित किये रहती है ॥ ४१ ॥

। सतीके मनमें मेरी बातपर विश्वास नहीं हुआ है, ॥ ४२ ऐसा जानकर लीलाविशारद सनातन प्रभु शम्भु यह वचन कहने लगे -॥४२ ॥

शिवजी बोले — हे देवि! मेरी बात सुनो, यदि । तुम्हारे मनको [ मेरे कथनपर ] विश्वास नहीं होता है, ॥ ४३ तो तुम वहाँ [ जाकर ] अपनी ही बुद्धिसे श्रीरामकी परीक्षा स्वयं कर लो । हे सति! हे प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा भ्रम दूर हो, वैसा ही तुम करो । तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो, ४४ तबतक मैं इस वटवृक्षके नीचे बैठा हूँ ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] भगवान् शिवकी आज्ञासे ईश्वरी सती वहाँ जाकर सोचने लगीं कि ४५ मैं वनचारी रामकी कैसे परीक्षा करूँ । मैं सीताका रूप धारण करके रामके पास चलूँ । यदि राम [ साक्षात् ] ४६ विष्णु हैं, तो सब कुछ जान लेंगे, अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे ॥ ४५-४६ ॥ इस प्रकार विचार करके मोहमें पड़ी हुई वे सती ४७ सीताका रूप धारणकर श्रीरामके पास उनकी परीक्षा लेनेके लिये गयीं । सतीको सीताके रूपमें देखकर शिव-नामका जप करते हुए रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम सब कुछ ४८ जानकर उन्हें प्रणाम करके हँसकर कहने लगे-॥ ४७-४८ ॥ श्रीराम बोले — हे सति! आपको नमस्कार है, आप प्रेमपूर्वक बताइये कि शिवजी कहाँ गये हैं, आप पतिना विना ॥ ४ ९ पतिके बिना अकेली ही इस वनमें क्यों आयी हैं? ॥ ४ ९ ॥ त्यक्त्वा स्वरूपं कस्मात्ते धृतं रूपमिदं सति । हे सति! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये ब्रूहि तत्कारणं देवि कृपां कृत्वा ममोपरि ॥ ५० यह रूप धारण किया है? हे देवि! मुझपर कृपा ब्रह्मोवाच करके इसका कारण बताइये? ॥ ५० ॥

इति रामवचः श्रुत्वा चकितासीत्सती ब्रह्माजी बोले - – रामजीकी यह बात सुनकर स्मृत्वा शिवोक्तं तदा । । सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं । वे शिवजीकी मत्वा चावितथं लज्जिता भृशम् ॥ ५१ कही हुई बातका स्मरण करके और उसे सत्य समझकर बहुत लज्जित हुईं । श्रीरामको साक्षात् विष्णु रामं विज्ञाय विष्णुं तं स्वरूपं संविधाय | जानकर अपना रूप धारण करके मन - ही - मन शिवके च । । चरणोंका चिन्तनकर प्रसन्नचित्त हुई सतीने उनसे इस

स्मृत्वा शिवपदं चित्ते सत्युवाच प्रसन्नधीः ॥ ५२ । प्रकार कहा- ॥ ५१-५२ ॥

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पृष्ठ 433

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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२१

शिवो मया गणैश्चैव पर्यटन् वसुधां प्रभुः ।

इहागच्छच्च विपिने स्वतंत्रः परमेश्वरः ॥ ५३

अपश्यदत्र स त्वां हि सीतान्वेषणतत्परम् ।

सलक्ष्मणं विरहिणं सीतया क्लिष्टमानसम् ॥ ५४

नत्वा त्वां स गतो मूले वटस्य स्थित एव हि ।

प्रशंसन् महिमानं ते वैष्णवं परमं मुदा ॥ ५५

चतुर्भुजं हरिं त्वां नो दृष्ट्वैव मुदितोऽभवत् ।

यथेदं रूपममलं पश्यन्नानंदमाप्तवान् ॥ ५६

तच्छ्रुत्वा वचनं शंभोर्भ्रममानीय चेतसि ।

तदाज्ञया परीक्षां ते कृतवत्यस्मि राघव ॥ ५७

ज्ञातं मे राम विष्णुस्त्वं दृष्टा ते प्रभुताखिला ।

निःसंशया तदापि तच्छृणु त्वं च महामते ॥ ५८

कथं प्रणम्यस्त्वं तस्य सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ।

कुरु निःसंशयां त्वं मां शमलं प्राप्नुहि द्रुतम् ॥ ५ ९

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्या रामश्चोत्फुल्ललोचनः ।

अस्मरत्स्वं प्रभुं शंभुं प्रेमाभूद् हृदि चाधिकम् ॥ ६०

सत्या विनाज्ञया शंभुसमीपं नागमन्मुने ।

संवर्ण्य महिमानं च प्रावोचद्राघवः सतीम् ॥ ६१

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये [ हे रघुनन्दन! ] स्वतन्त्र परमेश्वर प्रभु शिव मेरे तथा अपने पार्षदोंके साथ पृथिवीपर भ्रमण करते हुए इस वनमें आये हुए हैं ॥५३ ॥

यहाँ उन्होंने सीताकी खोजमें लगे हुए, उनके विरहसे युक्त और दुखी चित्तवाले आपको लक्ष्मणसहित देखा । वे आपको प्रणाम करके चले गये और आपकी वैष्णवी महिमाकी प्रशंसा करते हुए अत्यन्त आनन्दके साथ वटवृक्षके नीचे बैठे हैं ॥ ५४-५५ ॥ वे आपके चतुर्भुज विष्णुरूपको देखे बिना ही आनन्दविभोर हो गये । इस निर्मल रूपको देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । शम्भुके वचनको सुनकर मेरे मनमें भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी । अतः हे राघव! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है ॥ ५६-५७ ॥ हे श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप [ साक्षात् ] विष्णु हैं । मैंने आपकी सम्पूर्ण प्रभुता देख ली है । अब मेरा संशय दूर हो गया है, तो भी महामते! आप मेरी बात सुनें ॥ ५८ ॥

मेरे सामने यह सच सच बतायें कि आप उन शिवके वन्दनीय कैसे हो गये? आप मुझे संशयरहित कीजिये और शीघ्र ही मुझे शान्ति प्रदान कीजिये ॥ ५ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] उनकी यह बात सुनकर श्रीरामके नेत्र प्रफुल्लित हो उठे । उन्होंने अपने प्रभु शिवका स्मरण किया । इससे उनके हृदयमें अत्यधिक प्रेम उत्पन्न हो गया । हे मुने! शिवकी आज्ञाके बिना वे राघव सतीके साथ भगवान् शिवके समीप नहीं गये तथा [ मन - ही - मन ] उनकी महिमाका । वर्णन करके सतीसे कहने लगे ॥ ६०-६१ ॥ सतीखण्डे रामपरीक्षावर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें रामपरीक्षा - वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक, श्रीरामद्वारा सतीके मनका सन्देह दूर करना, शिवद्वारा सतीका मानसिक रूपसे परित्याग श्रीराम बोले – देवि! प्राचीन कालमें एक श्रीराम उवाच एकदा हि पुरा देवि शंभुः परमसूतिकृत् । समय परम स्रष्टा भगवान् शम्भुने अपने परम धाममें विश्वकर्माणमाहूय स्वलोके परतः परे ॥ १ विश्वकर्माको बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशालामें

पृष्ठ 434

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४२२ तेन स्वधेनुशालायां कारयामास विस्तृतं रम्यं च भवनं सम्यक् तत्र सिंहासनं वरम् तत्र च्छत्रं महादिव्यं सर्वदाद्भुतमुत्तमम् कारयामास विघ्नार्थं शंकरो विश्वकर्मणा शक्रादीनां जुहावाशु समस्तान् देवतागणान् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ । एक विस्तृत तथा रमणीय भवन बनवाया और उसमें ॥ २ एक श्रेष्ठ सिंहासनका भी निर्माण कराया ॥ १-२ ॥ । उस सिंहासनपर भगवान् शंकरने विघ्ननिवारणार्थ ॥ ३ विश्वकर्माद्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदाके लिये अद्भुत और परम उत्तम था ॥ ३ ॥

। उसके बाद उन्होंने इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, सिद्धगंधर्वनागादीनुपदेवांश्च कृत्स्नशः ॥ ४ गन्धर्वों, नागों तथा सम्पूर्ण उपदेवोंको भी शीघ्र वहाँ वेदान् सर्वानागमांश्च विधिपुत्रान् मुनीनपि । देवीः सर्वा अप्सरोभिर्नानावस्तुसमन्विताः

देवानां च तथर्षीणां सिद्धानां फणिनामपि ।

आनयन् मङ्गलकराः कन्याः षोडश षोडश ॥

वीणामृदङ्गप्रमुखवाद्यान्नानाविधान् मुने ।

उत्सवं कारयामास वादयित्वा सुगायनैः ॥

राजाभिषेकयोग्यानि द्रव्याणि सकलौषधैः ।

प्रत्यक्षतीर्थपाथोभिः पञ्चकुंभांश्च पूरितान् ॥

तथान्याः संविधा दिव्या आनयत्स्वगणैस्तदा ।

ब्रह्मघोषं महारावं कारयामास शंकरः ॥

अथो हरिं समाहूय वैकुंठात्प्रीतमानसः ।

तद्भक्त्या पूर्णया देवि मोदति स्म महेश्वरः ॥

सुमुहूर्ते महादेवस्तत्र सिंहासने वरे ।

उपवेश्य हरिं प्रीत्या भूषयामास सर्वशः ॥

आबद्धरम्यमुकुटं कृतकौतुकमङ्गलम् ।

अभ्यषिञ्चन्महेशस्तु स्वयं ब्रह्मांडमंडपे ॥

दत्तवान्निखिलैश्वर्यं यन्नैजं नान्यगामि यत् ।

ततस्तुष्टाव तं शंभुः स्वतन्त्रो भक्तवत्सलः ॥

ब्रह्माणं लोककर्तारमवोचद्वचनं त्विदम् । बुलवाया । समस्त वेदों, आगमों, ब्रह्माजीके पुत्रों, मुनियों तथा अप्सराओंसहित अनेक प्रकारकी वस्तुओंसे ॥ ५ युक्त समस्त देवियोंको भी आमन्त्रित किया ॥ ४-५ ॥ [ इनके अतिरिक्त ] देवताओं, ऋषियों, सिद्धों ६ और नागोंकी मंगलकारिणी सोलह - सोलह कन्याओंको भी बुलवाया । हे मुने! उन्होंने वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकारके वाद्योंको बजवाकर सुन्दर गीतोंद्वारा महान् ७ उत्सव कराया ॥ ६-७ ॥ सम्पूर्ण औषधियोंके साथ राज्याभिषेकके योग्य ८ द्रव्य, प्रत्यक्ष तीर्थोंके जलोंसे भरे हुए पाँच कलश तथा बहुत - सी दिव्य सामग्रियोंको भगवान् शंकरने अपने पार्षदोंद्वारा मँगवाया और वहाँ उच्च स्वरसे ९ वेदमन्त्रोंका घोष करवाया ॥ ८ - ९ ॥ हे देवि! भगवान् विष्णुकी पूर्ण भक्तिसे महेश्वरदेव १० सदा प्रसन्न रहते हैं । इसलिये प्रसन्नचित्त होकर वैकुण्ठधामसे श्रीहरिको बुलाकर शुभ मुहूर्तमें उन्हें श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठाकर महादेवजीने स्वयं ही ११ प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया॥१०-११ ॥ उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट बाँधकर और १२ उत्सव - मंगलाचार करके महेश्वरने स्वयं ब्रह्माण्डमण्डपमें श्रीहरिका अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो वे दूसरोंको नहीं देते थे । १३ तदनन्तर भक्तवत्सल स्वतन्त्र शम्भुने श्रीहरिका स्तवन किया । तत्पश्चात् अपनी पराधीनता ( भक्तपरवशता ) -व्यापयन्स्वं वराधीनं स्वतन्त्रं भक्तवत्सलः ॥ १४ | को सर्वत्र प्रसिद्ध करते हुए लोककर्ता ब्रह्माजीसे महेश उवाच कहा- 1 ॥१२–१४ ॥ महेश्वर बोले — लोकेश! आजसे मेरी आज्ञाके अतः प्रभृति लोकेश मन्निदेशादयं हरिः । मम वंद्यः स्वयं विष्णुर्जातः अनुसार ये विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये, इस सर्वः शृणोति हि ॥ १५ । बातको सभी सुन लें । हे तात! आप सम्पूर्ण देवता

पृष्ठ 435

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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२३

सर्वैर्देवादिभिस्तात प्रणम त्वममुं हरिम् ।

वर्णयन्तु हरिं वेदा ममैते मामिवाज्ञया ॥ १६

श्रीराम उवाच

इत्युक्त्वाथ स्वयं रुद्रोऽनमद्वै गरुडध्वजम् ।

विष्णुभक्तिप्रसन्नात्मा वरदो भक्तवत्सलः ॥ १७

ततो ब्रह्मादिभिर्देवैः सर्वरूपसुरैस्तथा ।

मुनिसिद्धादिभिश्चैव वंदितोऽभूद्धरिस्तदा ॥ १८

ततो महेशो हरयेऽशंसद्दिविषदां पुरः ।

महावरान् सुप्रसन्नो दत्तवान् भक्तवत्सलः ॥ १ ९

महेश उवाच

त्वं कर्ता सर्वलोकानां भर्ता हर्ता मदाज्ञया ।

दाता धर्मार्थकामानां शास्ता दुर्णयकारिणाम् ॥ २०

जगदीशो जगत्पूज्यो महाबलपराक्रमः ।

अजेयस्त्वं रणे क्वापि ममापि हि भविष्यसि ॥ २१

शक्तित्रयं गृहाण त्वमिच्छादि प्रापितं मया ।

नानालीलाप्रभावत्वं स्वतन्त्रत्वं भवत्रये ॥ २२

त्वद्वेष्टारो हरे नूनं मया शास्याः प्रयत्नतः ।

त्वद्भक्तानां मया विष्णो देयं निर्वाणमुत्तमम् ॥ २३

मायां चापि गृहाणेमां दुःप्रणोद्यां सुरादिभिः ।

यया संमोहितं विश्वमचिद्रूपं भविष्यति ॥ २४

मम बाहुर्मदीयस्त्वं दक्षिणोऽसौ विधिर्हरे ।

अस्यापि हि विधेः पाता जनितापि भविष्यसि ॥ २५

हृदयं मम यो रुद्रः स एवाहं न संशयः ।

पूज्यस्तव सदा सोऽपि ब्रह्मादीनामपि ध्रुवम् ॥ २६

अत्र स्थित्वा जगत्सर्वं पालय त्वं विशेषतः ।

नानावतारभेदैश्च सदा नानोतिकर्तृभिः ॥ २७

मम लोके तवेदं वै स्थानं च परमर्द्धिमत् ।

गोलोक इति विख्यातं भविष्यति महोज्ज्वलम् ॥ २८

आदिके साथ इन श्रीहरिको प्रणाम कीजिये और ये वेद मेरी आज्ञासे मेरी ही तरह इन श्रीहरिका वर्णन करें ॥ १५-१६ ॥ श्रीराम बोले- विष्णुकी भक्तिसे प्रसन्नचित्त हुए वरदायक भक्तवत्सल रुद्रदेवने ऐसा कहकर स्वयं ही गरुडध्वज श्रीहरिको प्रणाम किया । तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, अन्य सभी देवों, मुनियों और सिद्धों आदिने भी उस समय श्रीहरिकी वन्दना की ॥ १७-१८ ॥ इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न हुए भक्तवत्सल महेश्वरने देवताओंके समक्ष श्रीहरिको महान् वर प्रदान किये ॥१ ९ ॥ महेश्वर बोले – - [ हे हरे! ] आप मेरी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पालक, संहारक, धर्म - अर्थ - कामके दाता तथा अन्याय करनेवालोंको दण्ड देनेवाले होंगे । आप महान् बल - पराक्रमसे सम्पन्न, जगत्पूज्य, जगदीश्वर होंगे और कहीं - कहीं मुझसे भी अजेय होंगे ॥ २०-२१ ॥ आप मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकारकी ये शक्तियाँ ग्रहण करें — इच्छा आदिकी सिद्धि, अनेक प्रकारकी लीलाओंको प्रकट करनेकी शक्ति और तीनों लोकोंमें नित्य स्वतन्त्र रहनेकी शक्ति ॥ २२ ॥

हे हरे! आपसे द्वेष करनेवाले निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्नपूर्वक दण्डनीय होंगे । हे विष्णो! मैं आपके भक्तोंको उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा ॥२३ ॥

आप इस मायाको भी ग्रहण करें, जिसका निवारण करना देवता आदिके लिये भी कठिन है और जिससे मोहित होनेपर यह विश्व जड़रूप हो जायगा ॥ २४ ॥

हरे! आप मेरी बायीं भुजा हैं और विधाता दाहिनी भुजा हैं । आप इन विधाताके भी उत्पादक और पालक होंगे ॥ २५ ॥

मेरे हृदयरूप जो रुद्र हैं, वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है । वे रुद्र आपके और ब्रह्मा आदि देवताओंके भी निश्चय ही पूज्य हैं । आप यहाँ रहकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले अपने विभिन्न अवतारोंद्वारा विशेषरूपसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करें ॥ २६-२७ ॥ मेरे लोकमें आपका यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान गोलोक नामसे विख्यात | होगा ॥ २८ ॥

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४२४ भविष्यंति हरे ये तेऽवतारा भुवि रक्षकाः मद्भक्तास्तान् ध्रुवं द्रक्ष्ये प्रीतानथ निजाद् वरात् श्रीराम उवाच अखंडैश्वर्यमासाद्य हरेरित्थं हरः स्वयम् कैलासे स्वगणैस्तस्मिन् स्वैरं क्रीडत्युमापतिः तदाप्रभृति लक्ष्मीशो गोपवेषोऽभवत्तथा अयासीत्तत्र सुप्रीत्या गोपगोपीगवां पतिः सोऽपि विष्णुः प्रसन्नात्मा जुगोप निखिलं जगत् नानावतारसंधर्तावनकर्ता शिवाज्ञया ॥

इदानीं स चतुर्द्धात्रावातरच्छंकराज्ञया ।

रामोऽहं तत्र भरतो लक्ष्मणः शत्रुहेति च ॥

अथ पित्राज्ञया देवि ससीतालक्ष्मणः सति ।

आगतोऽहं वने चाद्य दुःखितो दैवतोऽभवम् ॥

निशाचरेण मे जाया हृता सीतेति केनचित् ।

अन्वेष्यामि प्रियां चात्र विरही बंधुना वने ॥

दर्शनं ते यदि प्राप्तं सर्वथा कुशलं मम ।

भविष्यति न संदेहो मातस्ते कृपया सति ॥

सीताप्राप्तिवरं देवि भविष्यति न संशयः ।

तं हत्वा दुःखदं पापं राक्षसं त्वदनुग्रहात् ॥

महद्भाग्यं ममाद्यैव यद्यका कृपां युवाम् ।

यस्मिन् सकरुणौ स्यातां स धन्यः पुरुषो वरः ॥

इत्थमाभाष्य बहुधा सुप्रणम्य सतीं शिवाम् ।

तदाज्ञया वने तस्मिन् विचचार रघूद्वहः ॥

अथाकर्ण्य सती वाक्यं रामस्य प्रयतात्मनः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ । हे हरे! भूतलपर जो आपके अवतार होंगे , वे ॥ २ ९ सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे । मैं उनका दर्शन करूँगा । वे मेरे वरसे सदा प्रसन्न रहेंगे ॥ २ ९ ॥ श्रीरामजी बोले- इस प्रकार श्रीहरिको अपना । अखण्ड ऐश्वर्य प्रदानकर उमापति भगवान् हर स्वयं ॥ ३० कैलासपर्वतपर रहते हुए अपने पार्षदोंके साथ स्वच्छन्द । क्रीड़ा करने लगे । तभीसे भगवान् लक्ष्मीपतिने गोपवेश धारण कर लिया और वे गोप - गोपी तथा गौओंके अधिपति ॥ ३१ होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ३०-३१ ॥ । वे विष्णु भी प्रसन्नचित्त होकर समस्त जगत्की ३२ रक्षा करने लगे । वे शिवजीकी आज्ञासे नाना प्रकारके अवतार धारण करके जगत्का पालन करने लगे ॥ ३२ ॥

इस समय वे श्रीहरि भगवान् शंकरकी आज्ञासे ३३ चार रूपोंमें अवतीर्ण हुए हैं । उनमें एक मैं राम हूँ और भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं ॥ ३३ ॥

हे देवि! हे सति! मैं पिताकी आज्ञासे सीता और ३४ लक्ष्मणके साथ वनमें आया हूँ और भाग्यवश इस समय मैं दुखी हूँ । यहाँ किसी निशाचरने मेरी पत्नीका हरण कर लिया है और मैं विरही होकर भाईके साथ ३५ वनमें अपनी प्रियाकी खोज कर रहा हूँ ॥ ३४-३५ ॥ हे सति! हे मातः! जब आपका दर्शन प्राप्त हो ३६ गया, तब आपकी कृपासे सर्वथा मेरा कुशल ही होगा, इसमें सन्देह नहीं है । हे देवि! आपका दर्शन मेरे लिये सीता - प्राप्तिका वरस्वरूप होगा, आपकी कृपासे उस ३७ दुःख देनेवाले पापी राक्षसको मारकर मैं सीताको प्राप्त कर लूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥ आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो आप दोनोंने ३८ मुझपर कृपा की । जिसपर आप दोनों दयार्द्र हो जायँ, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है ॥३८ ॥

इस प्रकार बहुत - सी बातें कहकर कल्याणमयी ३ ९ सती देवीको प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम । उनकी आज्ञासे उस वनमें विचरने लगे । पवित्र हृदयवाले हृष्टाभूत्सा प्रशंसन्तं शिवभक्तिरतं हृदि ॥ ४० रामकी शिव - भक्तिपरायण तथा शिवप्रशंसापरक बात । सुनकर सती मन - ही - मन बहुत प्रसन्न हुईं ॥ ३ ९ -४० ॥ स्मृत्वा स्वकर्म मनसाकार्षीच्छोकं सुविस्तरम् । [ तदनन्तर ] अपने कर्मको याद करके उनके मनमें प्रत्यागच्छदुदासीना बड़ा शोक हुआ । उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी

विवर्णा शिवसन्निधौ ॥ ४१ । और वे उदास होकर शिवजीके पास लौट आयीं ॥। ४१ ॥

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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२५

पथि साचिन्तयद् देवी सञ्चलंती पुनः पुनः ।

नाङ्गीकृतं शिवोक्तं मे रामं प्रति कुधीः कृता ॥

किमुत्तरमहं दास्ये गत्वा शंकरसन्निधौ ।

इति संचिन्त्य बहुधा पश्चात्तापोऽभवत्तदा ॥

गत्वा शंभुसमीपं च प्रणनाम शिवं हृदा ।

विषण्णवदना शोकव्याकुला विगतप्रभा ॥

अथ तां दुःखितां दृष्ट्वा पप्रच्छ कुशलं हरः ।

प्रोवाच वचनं प्रीत्या तत्परीक्षा कृता कथम् ॥

श्रुत्वा शिववचो नाहं किमपि प्रणतानना ।

सती शोकविषण्णा सा तस्थौ तत्र समीपतः ॥

अथ ध्यात्वा महेशस्तु बुबोध चरितं हृदा ।

दक्षजाया महायोगी नानालीलाविशारदः ॥

सस्मार स्वपणं पूर्वं यत्कृतं हरिकोपतः ।

तत्प्रार्थितोऽथ रुद्रोऽसौ मर्यादाप्रतिपालकः ॥

विषादोऽभूत्प्रभोस्तत्र मनस्येवमुवाच ह ।

धर्मवक्ता धर्मकर्ता धर्मावनकरः सदा ॥

शिव उवाच कुर्यां चेद्दक्षजायां हि स्नेहं पूर्वं यथा महान् । नश्येन्मम पणः शुद्धो लोकलीलानुसारिणः ब्रह्मोवाच इत्थं विचार्य बहुधा हृदा तामत्यजत्सतीम् मार्गमें जाती हुई देवी सती बारम्बार चिन्ता करने ४२ लगीं कि मैंने भगवान् शिवकी बात नहीं मानी और श्रीरामके प्रति कुत्सित बुद्धि कर ली । अब शंकरजीके पास जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगी, इस प्रकारके विचार ४३ करनेपर उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ ॥ ४२-४३ ॥ शिवजीके पास जाकर उन सतीने उन्हें हृदयसे ४४ प्रणाम किया । उनके मुखपर विषाद छा गया । वे शोकसे व्याकुल और निस्तेज हो गयी थीं ॥४४ ॥

सतीको दुखी देखकर भगवान् हरने उनका ४५ कुशल - क्षेम पूछा और प्रेमपूर्वक कहा- - तुमने किस प्रकार उनकी परीक्षा ली? शिवजीकी यह बात सुनकर मैंने कोई परीक्षा नहीं ली – ऐसा कहकर वे सती सिर झुकाये ४६ शोकाकुल होकर उनके पास खड़ी हो गयीं ॥ ४५-४६ ॥ इसके बाद महायोगी तथा अनेकविध लीला ४७ करनेमें प्रवीण भगवान् महेश्वरने मनमें ध्यान लगाकर दक्षपुत्री सतीका सारा चरित्र जान लिया ॥ ४७ ॥

उन्हें अपनी उस प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया, जिसे हरिके विशेष आग्रह करनेपर मर्यादाप्रतिपालक ४८ उन रुद्रने विवाहके लिये देवताओंके द्वारा निवेदन किये जानेपर पूर्वमें किया था । उन महाप्रभुके मनमें विषाद उत्पन्न हो गया । तब धर्मवक्ता, धर्मकर्ता तथा ४ ९ धर्मरक्षक प्रभुने अपने मनमें कहा- ॥ ४८-४९ ॥ शिवजी बोले- यदि मैं सतीसे अब पूर्ववत् स्नेह करूँ, तो लोकलीलाका अनुसरण करनेवाले मुझ ॥ ५० शिवकी महान् प्रतिज्ञा ही नष्ट हो जायगी ॥५० ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार मनमें अनेक तरहसे विचारकर वेद और धर्मके प्रतिपालक शंकरजीने । सतीका त्याग कर दिया, किंतु अपनी प्रतिज्ञाको पणं न नाशयामास वेदधर्मप्रपालकः ॥ ५१ हृदयसे नष्ट नहीं किया । तत्पश्चात् परमेश्वर शिवजी मनसे ततो विहाय मनसा सतीं तां परमेश्वरः जगाम स्वगिरिं भेदं जगावद्धा स हि प्रभुः चलन्तं पथि तं व्योमवाण्युवाच महेश्वरम् सर्वान् संश्रावयंस्तत्र दक्षजां च विशेषतः व्योमवाण्युवाच धन्यस्त्वं परमेशान त्वत्समोऽद्य तथा पणः । सतीको त्यागकर अपने कैलासपर्वतकी ओर चल ॥ ५२ दिये । उन प्रभुने अपने निश्चयको किसीके सामने प्रकट नहीं किया ॥ ५१-५२ ॥ । मार्गमें जाते हुए महेश्वरको, अन्य सबको तथा ॥ ५३ विशेषकर सतीको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई ॥५३ ॥

आकाशवाणी बोली – हे परमेश्वर! आप धन्य हैं, इस त्रिलोकीमें आपके समान कोई भी नहीं । है, जिसने आजतक ऐसी प्रतिज्ञा की हो, आप न कोऽप्यन्यस्त्रिलोकेऽस्मिन् महायोगी महाप्रभुः ॥ ५४ | महायोगी तथा महाप्रभु हैं ॥५४ ॥

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४२६ ब्रह्मोवाच श्रुत्वा व्योमवचो देवी शिवं पप्रच्छ विप्रभा कं पणं कृतवान्नाथ ब्रूहि मे परमेश्वर इति पृष्टोऽपि गिरिशः सत्या हितकरः प्रभुः नोद्वाहं स्वं पणं तस्यै यत् हर्यग्रेऽकरोत्पुरा श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ ब्रह्माजी बोले- यह आकाशवाणी सुनकर कान्तिसे । हीन देवी सतीने शिवसे पूछा- हे नाथ! आपने कौन-॥ ५५ सी प्रतिज्ञा की है? हे परमेश्वर! मुझे बताइये ॥ ५५ ॥

। सतीके इस प्रकार पूछनेपर भी सबका हित करनेवाले प्रभुने पहले अपने विवाहके विषयमें भगवान् विष्णुके ॥ ५६ सामने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे नहीं बताया ॥५६ ॥

तदा सती शिवं ध्यात्वा स्वपतिं प्राणवल्लभम् सर्वं बुबोध हेतुं तं प्रियत्यागमयं मुने ततोऽतीव शुशोचाशु बुध्वा सा त्यागमात्मनः शंभुना दक्षजा तस्मान्निःश्वसंती मुहुर्मुहुः

शिवस्तस्याः समाज्ञाय गुप्तं चक्रे मनोभवम् ।

सत्यै पणं स्वकीयं हि कथा बह्वीर्वदन् प्रभुः ॥

सत्या प्राप स कैलासं कथयन् विविधाः कथाः ।

वरे स्थित्वा निजं रूपं दधौ योगी समाधिभृत् ॥

तत्र तस्थौ सती धाम्नि महाव्याकुलमानसा ।

न बुबोध चरित्रं तत्कश्चिच्च शिवयोर्मुने ॥

महान्कालो व्यतीयाय तयोरित्थं महामुने ।

स्वोपात्तदेहयोः प्रभ्वोर्लोकलीलानुसारिणोः ॥

ध्यानं तत्याज गिरिशस्ततः स परमोतिकृत् ॥ हे मुने! उस समय सती अपने प्राणवल्लभ पति ॥ ५७ भगवान् शिवका ध्यान करके प्रियतमके द्वारा अपने त्याग - सम्बन्धी समस्त कारणको जान गयीं ॥ ५७ ॥

। शम्भुने मेरा त्याग किया है — इस बातको जानकर ॥ ५८ दक्षकन्या सती बार - बार श्वास भरती हुईं शीघ्र ही अत्यन्त शोकमें डूब गयीं, बारम्बार सिसकने लगीं ॥ ५८ ॥

सतीके मनोभावको जानकर प्रभु शिवने उनके ५ ९ लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे गुप्त ही रखा और वे दूसरी बहुत - सी कथाएँ कहने लगे ॥५ ९ ॥ इस प्रकार नाना प्रकारकी कथाएँ कहते हुए वे ६० सतीके साथ कैलासपर जा पहुँचे और श्रेष्ठ आसनपर स्थित हो समाधि लगाकर अपने स्वरूपका ध्यान करने लगे । सती अत्यन्त व्याकुलचित्त होकर ६१ । अपने धाममें रहने लगीं । हे मुने! शिवा और शिवके उस चरित्रको किसीने नहीं जाना । हे महामुने! इस प्रकार स्वेच्छासे शरीर धारण करके लोकलीलाका ६२ अनुसरण करनेवाले उन दोनों प्रभुओंका बहुत काल व्यतीत हो गया ॥ ६०–६२ ॥ तत्पश्चात् उत्तम लीला करनेवाले महादेवजीने तज्ज्ञात्वा जगदंबा हि सती तत्राजगाम सा ॥६३ ध्यान तोड़ा - यह जानकर जगदम्बा सती वहाँ आयीं ननामाथ शिवं देवी हृदयेन विदूयता । और उन्होंने व्यथित हृदयसे शिवको प्रणाम किया । आसनं दत्तवान् शंभुः स्वसम्मुख उदारधीः ॥ ६४ उदार चित्तवाले शम्भुने उन्हें अपने सामने [ बैठनेके कथयामास सुप्रीत्या कथा वह्वीर्मनोरमाः । लिये ] आसन दिया और वे बड़े प्रेमसे बहुत - सी मनोरम निःशोकां कृतवान् सद्यो लीलां कथाएँ कहने लगे । उन्होंने वैसी ही लीला करके सतीके कृत्वा च तादृशीम् ॥ ६५ शोकको तत्काल दूर कर दिया॥६३–६५ पूर्ववत्सा सुखं लेभे तत्याज स्वपणं न सः । वे पूर्ववत् सुखी हो गयीं, फिर भी ॥ शिवजीने नेत्याश्चर्यं शिवे तात मन्तव्यं परमेश्वरे ॥ ६६ अपनी प्रतिज्ञाको नहीं तोड़ा । हे तात! परमेश्वर शिवजीके | विषयमें यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये । हे मुने! मुनि लोग शिव और शिवाकी ऐसी ही इत्थं शिवाशिवकथां वदन्ति मुनयो मुने । कथा कहते हैं । कुछ मूर्ख लोग उन दोनोंमें वियोग मानते किल केचिदविद्वांसो वियोगश्च कथं तयोः ॥ ६७ | हैं, परंतु उनमें वियोग कैसे सम्भव है! ॥ ६६-६७ ॥

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अ ० २६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४२७

शिवाशिवचरित्रं को जानाति परमार्थतः ।

स्वेच्छया क्रीडतस्तौ हि चरितं कुरुतः सदा ॥

वागर्थाविव संपृक्तौ सदा खलु सतीशिवौ । तयोर्वियोगोऽसंभाव्यः संभवेदिच्छया तयोः इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके शिवा और शिवके वास्तविक चरित्रको कौन ६८ जान सकता है? वे दोनों सदा अपनी इच्छासे क्रीड़ा करते और [ भाँति - भाँतिकी ] लीलाएँ करते हैं । सती और शिव वाणी और अर्थकी भाँति एक - दूसरेसे नित्य संयुक्त हैं । उन दोनोंमें वियोग होना असम्भव है, उनकी ॥ ६ ९ । इच्छासे ही लीलामें वियोग हो सकता है ॥ ६८-६९ ॥ द्वितीये सतीखण्डे सतीवियोगो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सतीवियोगवर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः सतीके उपाख्यानमें शिवके ब्रह्मोवाच

पुराभवच्च सर्वेषामध्वरो विधिना महान् ।

प्रयागे समवेतानां मुनीनां च महात्मनाम् ॥ १

तत्र सिद्धाः समायाताः सनकाद्याः सुरर्षयः ।

सप्रजापतयो देवा ज्ञानिनो ब्रह्मदर्शिनः ॥ २

अहं समागतस्तत्र परिवारसमन्वितः ।

निगमैरागमैर्युक्तो मूर्तिमद्भिर्महाप्रभैः ॥ ३

समाजोऽभूद्विचित्रो हि तेषामुत्सवसंयुतः ।

ज्ञानवादोऽभवत्तत्र नानाशास्त्रसमुद्भवः ॥ ४

तस्मिन्नवसरे रुद्रः सभवानीगणः प्रभुः ।

त्रिलोकहितकृत्स्वामी तत्रागात्सूतिकृन्मुने ॥ ५

दृष्ट्वा शिवं सुराः सर्वे सिद्धाश्च मुनयस्तथा ।

अनमंस्तं प्रभुं भक्त्या तुष्टुवुश्च तथा ह्यहम् ॥ ६

तस्थुः शिवाज्ञया सर्वे यथास्थानं मुदान्विताः ।

प्रभुदर्शनसंतुष्टाः वर्णयन्तो निजं विधिम् ॥ ७

तस्मिन्नवसरे दक्षः प्रजापतिपतिः प्रभुः ।

आगमत्तत्र सुप्रीतः सुवर्चस्वी यदृच्छया ॥ ८

मां प्रणम्य स दक्षो हि न्युष्टस्तत्र मदाज्ञया । साथ दक्षका विरोधवर्णन ब्रह्माजी बोले – हे नारद! पूर्वकालमें प्रयागमें एकत्रित हुए समस्त मुनियों तथा महात्माओंका विधि-विधानसे एक बहुत बड़ा यज्ञ हुआ ॥१ ॥

उस यज्ञमें सिद्धगण, सनक आदि, देवर्षि, प्रजापति, देवता तथा ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले ज्ञानी आये ॥२ ॥

मैं भी मूर्तिमान् महातेजस्वी निगमों और आगमोंसे युक्त हो सपरिवार वहाँ गया था ॥३ ॥

अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ वहाँ उनका विचित्र समाज जुटा था । वहाँ अनेक शास्त्रोंसे सम्बन्धित ज्ञानचर्चा होने लगी ॥ ४ ॥

हे मुने! उसी समय सती और पार्षदोंके साथ त्रिलोकहितकारी, सृष्टिकर्ता एवं सबके स्वामी भगवान् रुद्र भी वहाँ पहुँचे ॥५ ॥

शिवको देखकर सम्पूर्ण देवताओं, सिद्धों, मुनियों और मैंने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की ॥६ ॥

तत्पश्चात् शिवजीकी आज्ञा पाकर सब लोग प्रसन्नतापूर्वक यथास्थान बैठ गये । भगवान्के दर्शनसे सन्तुष्ट होकर सब लोग अपने भाग्यकी सराहना करने लगे ॥७ ॥

उसी समय प्रजापतियोंके स्वामी महातेजस्वी प्रभु दक्षप्रजापति घूमते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ अकस्मात् आये । वे मुझे प्रणामकर मेरी आज्ञासे वहाँ बैठ गये ।

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४२८ ब्रह्माण्डाधिपतिर्मान्यो मानी तत्त्वबहिर्मुखः स्तुतिभिः प्रणिपातैश्च दक्षः सर्वैः सुरर्षिभिः पूजितो वरतेजस्वी करौ वध्वा विनम्रकैः

नानाविहारकृन्नाथः स्वतंत्रः परमोतिकृत् ।

नानमत्तं तदा दक्षं स्वासनस्थो महेश्वरः ॥

दृष्ट्वानतं हरं तत्र स मे पुत्रोऽप्रसन्नधीः ।

अकुप्यत्सहसा रुद्रे तदा दक्षः प्रजापतिः ॥

क्रूरदृष्ट्या महागर्वौ दृष्ट्वा रुद्रं महाप्रभुम् ।

सर्वान्संश्रावयन्नुच्चैरवोचज्ज्ञानवर्जितः ॥

दक्ष उवाच एते हि सर्वे च सुरासुरा भृशं नमन्ति मां विप्रवरास्तथर्षयः । कथं ह्यसौ दुर्जनवन्महामना त्वभूत्तु यः प्रेतपिशाचसंवृतः ॥ श्मशानवासी निरपत्रपो ह्ययं कथं प्रणामं न करोति मेऽधुना । लुप्तक्रियो भूतपिशाचसेवितो मत्तोऽविधो नीतिविदूषकः सदा ॥ पाखंडिनो दुर्जनपापशीला

दृष्ट्वा द्विजं प्रोद्धतनिंदकाश्च ।

वध्वां सदासक्तरतिप्रवीण-स्तस्मादमुं शप्तमहं प्रवृत्तः ॥

ब्रह्मोवाच इत्येवमुक्त्वा स स महाखलस्तदा रुषान्वितो रुद्रमिदं ह्यवोचत् । शृण्वन्त्वमी विप्रवरास्तथा सुरा वध्यं हि मे चार्हथ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ ॥ ९ वे दक्ष ब्रह्माण्डके अधिपति और सबके मान्य थे अहंकारी तथा तत्त्वज्ञानसे शून्य थे ॥ ८ - ९ ॥, परंतु । उस समय समस्त देवर्षियोंने नतमस्तक हो ॥ १० स्तुति और प्रणामद्वारा दोनों हाथ जोड़कर उत्तम तेजयुक्त दक्षका आदर - सत्कार किया ॥ १० ॥

किंतु नाना प्रकारके लीलाविहार करनेवाले ११ सबके स्वामी और परम रक्षक महेश्वरने उस समय दक्षको प्रणाम नहीं किया । वे अपने आसनपर बैठे ही रह गये ॥११ ॥

महादेवजीको वहाँ मस्तक न झुकाते देख मेरे १२ पुत्र दक्ष मन - ही - मन अप्रसन्न हो गये । दक्ष प्रजापति रुद्रपर कुपित हो गये ॥१२ ॥

ज्ञानशून्य तथा महान् अहंकारी दक्ष महाप्रभु १३ रुद्रको क्रूर दृष्टिसे देखकर सबको सुनाते हुए उच्च स्वरमें कहने लगे -॥१३ ॥

दक्ष बोले — ये सब देवता, असुर, श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा ऋषि मुझे विशेष रूपसे मस्तक झुकाते हैं, परंतु वह जो प्रेतों और पिशाचोंसे घिरा हुआ महामनस्वी १४ है, वह दुष्ट मनुष्यके समान कैसे हो गया? ॥ १४ ॥

श्मशानमें निवास करनेवाला निर्लज्ज मुझे इस समय प्रणाम क्यों नहीं करता? इसके [ वेदोक्त ] कर्म लुप्त हो गये हैं, यह भूतों और पिशाचोंसे सेवित हो १५ मतवाला बना रहता है, शास्त्रीय विधिसे रहित है तथा नीतिमार्गको सदा कलंकित करता है ॥ १५ ॥

इसके साथ रहनेवाले या इसका अनुसरण करनेवाले लोग पाखण्डी, दुष्ट, पापाचारी तथा ब्राह्मणको देखकर १६ । उद्दण्डतापूर्वक उसकी निन्दा करनेवाले होते हैं । यह स्वयं ही स्त्रीमें आसक्त रहनेवाला तथा रतिकर्ममें ही दक्ष है । अत: मैं इसे शाप देनेके लिये उद्यत हूँ ॥ १६ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर वे महादुष्ट दक्ष कुपित होकर रुद्रके प्रति कहने लगे । हे ब्राह्मणो कर्तुमेतम् ॥ १७ एवं देवताओ! यह रुद्र मेरे तथा आप सभीके द्वारा दक्ष उवाच वध्य है ॥१७ ॥

रुद्रो ह्ययं यज्ञबहिष्कृतो मे वर्णेष्वतीतोऽथ विवर्णरूपः दक्ष बोले — मैं इस रुद्रको यज्ञसे बहिष्कृत देवैर्न भागं लभतां सहैव । करता हूँ । यह चारों वर्णोंसे बाहर, श्मशानमें निवास

। करनेवाला तथा उत्तम कुल और जन्मसे हीन है ।

श्मशानवासी कुलजन्महीनः ॥ १८ । इसलिये यह देवताओंके साथ यज्ञमें भाग न पाये ॥ १८ ॥