श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 421–430
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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अ ० २२ ] रुद्रसंहिता ( शाद्वलैस्तरुणैस्तुङ्गैस्तीरस्थैरुपशोभितम् ॥ ४१
नृत्यद्भिरिव शाखोटैर्वर्जयन्तं स्वसंभवम् ।
कामदेवैः सारसैश्च मत्तचक्राङ्गशोभितैः ॥ ४२
मधुराराविभिर्मोदकारिभिर्भ्रमरादिभिः शब्दायमानं च मुदा कामोद्दीपनकारकम् ॥ ४३
वासवस्य कुबेरस्य यमस्य वरुणस्य च ।
अग्नेः कोणपराजस्य मारुतस्य परस्य च ॥ ४४
पुरीभिः शोभिशिखरं मेरोरुच्चैः सुरालयम् ।
रंभाशचीमेनकादिरं भोरुगणसेवितम् ॥ ४५
किं त्वमिच्छसि सर्वेषां पर्वतानां हि भूभृताम् ।
सारभूते महारम्ये संविहर्तुं महागिरौ ॥ ४६
तत्र देवी सखियुता साप्सरोगणमंडिता ।
नित्यं करिष्यति शची तव योग्यां सहायताम् ॥ ४७
अथवा मम कैलासे पर्वतेन्द्रे सदाश्रये ।
स्थानमिच्छसि वित्तेशपुरीपरिविराजिते ॥ ४८
गङ्गाजलौघप्रयते पूर्णचन्द्रसमप्रभे ।
दरीषु सानुषु सदा ब्रह्मकन्याभ्युदीरिते ॥ ४ ९
नानामृगगणैर्युक्ते पद्माकरशतावृते ।
सर्वैर्गुणैश्च सद्वस्तुसुमेरोरपि सुंदरे ॥ ५०
स्थानेष्वेतेषु यत्रापि तवान्तःकरणे स्पृहा ।
तं द्रुतं मे समाचक्ष्व वासकर्तास्मि तत्र ते ॥ ५१
ब्रह्मोवाच
इतीरिते शंकरेण तदा दाक्षायणी शनैः ।
इदमाह महादेवं लक्षणं स्वप्रकाशनम् ॥ ५२
सत्युवाच
हिमाद्रावेव वसितुमहमिच्छे त्वया सह ।
नचिरात्कुरु संवासं तस्मिन्नेव महागिरौ ॥ ५३
सतीखण्ड ) ४० ९ | हरे भरे, ऊँचे एवं नवीन घासवाले भूमिभागसे सुशोभित है । यहाँके शाखोटके वृक्ष इस प्रकार प्रतीत हो रहे । हैं, जैसे अपनी शाखाको हिलाकर नृत्य कर रहे हों । अपनी इच्छाके अनुसार अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले देवताओं, सारसों एवं मतवाले चक्रवाकोंसे मानसरोवर सुशोभित हो रहा है ॥ ४०–४२ ॥ परम आनन्दको प्रदान करनेवाले भौंरोंके मधुर शब्दोंसे गुंजित वह मानसरोवर महान् उद्दीपन करनेवाला है ॥४३ ॥
मेरुपर्वतके ऊँचे शिखरपर इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण, अग्नि, निर्ऋति, वायु तथा ईशानकी पुरियाँ हैं, जहाँ देवताओंका निवासस्थान है । रम्भा, शची एवं मेनकादि अप्सराओंसे वह मेरुशिखर सुशोभित है ॥ ४४-४५ ॥ [ हे देवि! ] क्या तुम उन समस्त पर्वतोंके राजा तथा पृथिवीके सारभूत महारम्य सुमेरु पर्वतपर विहार करना चाहती हो? ॥ ४६ ॥
वहाँ [ निवास करनेसे ] सखियों एवं अप्सराओं-सहित शची देवी तुम्हारी उचित सहायता करेंगी ॥ ४७ ॥
अथवा तुम मेरे आश्रयभूत कैलासपर, जो पर्वतेन्द्रके नामसे विख्यात है, उसपर निवास करना चाहती हो, जहाँपर कुबेरकी अलकापुरी है । जहाँ गंगाकी जलधारा बह रही है, जो स्वयं पूर्णचन्द्रके समान समुज्ज्वल है और जिस कैलासकी कन्दराओं तथा शिखरोंपर ब्रह्मकन्याएँ मनोहर गान करती हैं ॥ ४८-४९ ॥ यह कैलास अनेक प्रकारके मृगगणोंके समूहोंसे युक्त, सैकड़ों कमलोंसे परिपूर्ण एवं सुमेरुपर्वतकी अपेक्षा समस्त गुणोंसे युक्त तथा सुन्दर है ॥ ५० ॥
[ हे देवि! ] इन स्थानोंमें जहाँ कहीं भी तुम्हारी
रहनेकी इच्छा हो, उस स्थानको शीघ्र मुझे बताओ ।
मैं वहाँपर तुम्हारे निवासस्थानका निर्माण करूँगा ॥ ५१ ॥
ब्रह्माजी बोले- शंकरके इस प्रकार कहनेपर सतीदेवी अपने निवासभूत स्थानका लक्षण इस प्रकार कहने लगीं —॥५२ ॥
सती बोलीं- हे देव! मैं आपके साथ इस पर्वतराज हिमालयपर ही निवास करना चाहती हूँ, आप इसी पर्वतपर शीघ्रतापूर्वक निवासस्थानका निर्माण कीजिये ॥ ५३ ॥
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४१० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २२ ब्रह्मोवाच
अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य हरः परममोहितः ।
हिमाद्रिशिखरं तुङ्गं दाक्षायण्या समं ययौ ॥
सिद्धाङ्गनागणयुतमगम्यं चैव पक्षिभिः ।
अगमच्छिखरं रम्यं सरसीवनराजितम् ॥
विचित्ररूपैः कमलैः शिखरं रत्नकर्बुरम् ।
बालार्कसदृशं शंभुराससाद सतीसखः ॥
स्फटिकाभ्रमये तस्मिन् शाद्वलद्रुमराजिते ।
विचित्रपुष्पावलिभिः सरसीभिश्च संयुते ॥
प्रफुल्लतरुशाखाग्रं गुंजद् भ्रमरसेवितम् ।
पङ्केरुहैः प्रफुल्लैश्च नीलोत्पलचयैस्तथा ॥
शोभितं चक्रवाकाद्यैः कादंबैर्हंससंकुलैः ।
प्रमत्तसारसैः क्रौंचैर्नीलस्कन्धैश्च शब्दितैः ॥
पुंस्कोकिलानां निनदैर्मधुरैर्गणसेवितैः ।
तुरंगवदनैः सिद्धैरप्सरोभिश्च गुह्यकैः ॥
विद्याधरीभिर्देवीभिः किन्नरीभिर्विहारितम् ।
पुरंध्रीभिः पार्वतीभिः कन्याभिरभिसङ्गतम् ॥
विपञ्चीतांत्रिकामत्तमृदङ्गपटहस्वनैः नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च कौतुकोत्थैश्च शोभितम् ॥
देविकाभिर्दीर्घिकाभिर्गंधिभिः सुसमावृतम् ।
प्रफुल्लकुसुमैर्नित्यं सुकुचैरुपशोभितम् ॥
शैलराजपुराभ्यर्णे शिखरे वृषभध्वजः ।
सह सत्या चिरं रेमे एवंभूतेषु शोभनम् ॥
तस्मिन् स्वर्गसमे स्थाने दिव्यमानेन शंकरः ।
दशवर्षसहस्राणि रेमे सत्या समं मुदा ॥
स कदाचित्ततः स्थानादन्यद्याति स्थलं हरः ।
कदाचिन्मेरुशिखरं देवीदेववृतं सदा ॥
ब्रह्माजी बोले- सतीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर | शंकरजी अत्यधिक मोहित हो गये और सतीको साथ ५४ लेकर हिमालयपर्वतके ऊँचे शिखरपर चले गये ॥ ५४ ॥
सिद्धांगनाओंसे युक्त, पक्षियोंसे सर्वथा अगम्य, अनेक छोटी - छोटी बावलियोंसे युक्त, विचित्र ५५ कमलोंसे चित्रित और प्रातः कालीन सूर्यके समान सुशोभित उस शिखरपर शिवजी सती देवीके साथ ५६ चले गये॥५५-५६ ॥ वह स्फटिकमणिके समान समुज्ज्वल, हरे - भरे ५७ वृक्षोंसे तथा घासोंसे परिपूर्ण, विचित्र पुष्पोंवाली बावलियोंसे युक्त था, उस शिखरके वृक्षोंकी शाखाओंका अग्रभाग विकसित पुष्पोंसे शोभित था, भौरे गुंजार कर ५८ रहे थे, वह नील एवं अनेक वर्णके कमलोंसे परिव्याप्त था ॥ ५७-५८ ॥ चक्रवाक, कदम्ब, हंस, शुक, सारस और ५ ९ नीली गर्दनवाले क्रौंच पक्षियोंके शब्दोंसे वह शिखर शब्दायमान हो रहा था ॥५ ९ ॥ उस शिखरपर पुंस्कोकिल मनोहर शब्द कर रहे ६० थे, वह अनेक प्रकारके गणों, किन्नरियों, सिद्धों, अप्सराओं तथा गुह्यकोंसे सेवित था ॥ ६० ॥
विद्याधरियाँ, देवियाँ तथा किन्नरियाँ वहाँ विहार ६१ कर रही थीं तथा पर्वतीय स्त्रियों एवं कन्याओंसे वह युक्त था ॥ ६१ ॥
वीणा, सितार, मृदंग एवं पटहके वाद्ययन्त्रोंपर ६२ नृत्य एवं कौतुक करती हुई अप्सराओंके समूहसे वह शिखर सुशोभित हो रहा था ॥६२ ॥
देविकाओं, दीर्घिकाओं, खिले हुए तथा सुगन्धित ६३ पुष्पों और निकुंजोंसे वह शोभायमान हो रहा था ॥ ६३ ॥
इस प्रकारकी शोभासे युक्त पर्वतराज हिमालयके ६४ शिखरपर शंकरजी सती देवीके साथ बहुत कालतक रमण करते रहे ॥ ६४ ॥
महादेवजी उस स्वर्गके समान दिव्य स्थानमें ६५ सतीके साथ देवताओंके वर्षके गणनानुसार दस हजार वर्षतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करते रहे ॥ ६५ ॥
वे कभी उस स्थानको छोड़कर सतीके साथ किसी दूसरे स्थानपर चले जाते थे और कभी देवी-६६ | देवताओंसे व्याप्त मेरु शिखरपर चले जाते थे ॥ ६६ ॥
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता
द्वीपान्नाना तथोद्यानवनानि वसुधातलम् ।
गत्वा गत्वा पुनस्तत्राभ्येत्य रेमे सतीसुखम् ॥ ६७
न यज्ञे स दिवारात्रौ न ब्रह्मणि तपस्समम् ।
सत्यां हि मनसा शंभुः प्रीतिमेव चकार ह ॥ ६८
एवं महादेवमुखं सत्यपश्यत्स्म सर्वदा ।
महादेवोऽपि सर्वत्र सदाद्राक्षीत्सतीमुखम् ॥ ६ ९
एवमन्योन्यसंसर्गादनुरागमहीरुहम् वर्धयामासतुः कालीशिवौ भावांबुसेचनैः ॥ ७० ( सतीखण्ड ) ४११ इस पृथ्वीतलके अनेक प्रकारके द्वीपों, उद्यानों एवं वनोंमें जाकर पुन: वहाँ आकर सतीके साथ रमण करने लगते थे ॥ ६७ ॥
शिवजीका मन यज्ञ, ब्रह्म तथा समाधिमें नहीं लगता था, वे शम्भु दिन - रात मनसे सतीमें ही प्रीति करते रहते थे ॥ ६८ ॥
इसी प्रकार सती भी निरन्तर महादेवजीके मुखका अवलोकन करती रहती थीं और शिवजी भी सतीके मुखको देखते रहते थे ॥६ ९ ॥ इस प्रकार वे शिव तथा सती परस्परके संयोगसे स्नेहरूपी जलद्वारा अनुरागरूपी वृक्षको सिंचितकर | बढ़ाने लगे ॥७० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे शिवाशिवविहारवर्णनं नामद्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें शिवा - शिवविहारवर्णन नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः सतीके पूछनेपर शिवद्वारा भक्तिकी ब्रह्मोवाच
एवं कृत्वा विहारं वै शंकरेण च सा सती ।
संतुष्टा साभवच्चाति विरागा समजायत ॥ १
एकस्मिन्दिवसे देवी सती रहसि सङ्गता ।
शिवं प्रणम्य सद्भक्त्या न्यस्योच्चैः सुकृताञ्जलिः ॥ २
सुप्रसन्नं प्रभुं नत्वा सा दक्षतनया सती ।
उवाच साञ्जलिर्भक्त्या विनयावनता ततः ॥ ३
सत्युवाच
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो ।
दीनोद्धर महायोगिन् कृपां कुरु ममोपरि ॥ ४
त्वं परः पुरुषः स्वामी रजःसत्त्वतमःपरः ।
निर्गुणः सगुणः साक्षी निर्विकारी महाप्रभुः ॥ ५
धन्याहं ते प्रिया जाता कामिनी सुविहारिणी ।
जातस्त्वं मे पतिः स्वामिन् भक्तवात्सल्यतो हर ॥ ६
महिमा तथा नवधा भक्तिका निरूपण ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार शंकरजीके साथ विहार करके वे सती कामसे सन्तुष्ट हो गयीं और उनके मनमें वैराग्य उत्पन्न होने लगा ॥१ ॥
एक दिनकी बात है, देवी सती एकान्तमें भगवान् शंकरसे मिलीं और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं । भगवान् शंकरको प्रसन्नचित्त जानकर विनयभावसे दक्षकुमारी सती कहने लगीं— ॥ २-३ ॥ सती बोलीं- हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणासागर! हे प्रभो! हे दीनोद्धारपरायण! हे महायोगिन्! मुझपर कृपा कीजिये ॥ ४ ॥
आप परमपुरुष हैं, इस जगत्के स्वामी हैं, रजोगुण- तमोगुण एवं सत्त्वगुणसे परे हैं, निर्गुण हैं, सगुण भी हैं, सबके साक्षी हैं, निर्विकार हैं और महाप्रभु हैं ॥५ ॥
मैं धन्य हूँ, जो आपकी कामिनी और आपके साथ सुन्दर विहार करनेवाली आपकी प्रिया हुई । हे स्वामिन्! हे हर! आप अपनी भक्तवत्सलताके कारण ही मेरे स्वामी हुए ॥६ ॥
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४१२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३
कृतो बहुसमा नाथ विहारः परमस्त्वया ।
संतुष्टाहं महेशान निवृत्तं मे मनस्ततः ॥
ज्ञातुमिच्छामि देवेश परं तत्त्वं सुखावहम् ।
येन संसारदुःखाद्वै तरेज्जीवोऽञ्जसा हर ॥
यत्कृत्वा विषयी जीवः स लभेत्परमं पदम् ।
संसारी न भवेन्नाथ तत्त्वं वद कृपां कुरु ॥
ब्रह्मोवाच
इत्यपृच्छत्स्म सद्भक्त्या शंकरं सा सती मुने ।
आदिशक्तिर्महेशानी जीवोद्धाराय केवलम् ॥
आकर्ण्य तच्छिवः स्वामी स्वेच्छयोपात्तविग्रहः ।
अवोचत्परमप्रीतः सतीं योगविरक्तधीः ॥
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि दाक्षायणि महेश्वरि ।
परं तत्त्वं तदेवानुशयी मुक्तो भवेद्यतः ॥
परतत्त्वं विजानीहि विज्ञानं परमेश्वरि ।
द्वितीयं स्मरणं यत्र नाहं ब्रह्मेति शुद्धधीः ॥
तद्दुर्लभं त्रिलोकेऽस्मिंस्तज्ज्ञाता विरलः प्रिये ।
यादृशो यः स दासोऽहं ब्रह्म साक्षात्परात्परः ॥
तन्माता मम भक्तिश्च भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ।
सुलभा मत्प्रसादाद्धि नवधा सा प्रकीर्तिता ॥
भक्तौ ज्ञाने न भेदो हि तत्कर्तुः सर्वदा सुखम् ।
विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः ॥
हे नाथ! मैंने आपके साथ बहुत दिनोंतक विहार ७ किया । हे महेशान! इससे मैं सन्तुष्ट हो गयी हूँ । अब मेरा मन उधरसे हट गया है ॥७ ॥
हे देवेश! अब में परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना ८ चाहती हूँ, जो सुख प्रदान करनेवाला है तथा हे हर! जिसको जान लेनेपर समस्त जीव संसारदुःखसे अनायास ही उद्धार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ८ ॥
हे नाथ! जिस कर्मका अनुष्ठान करके विषयी ९ जीव भी परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा पुनः संसारबन्धनमें नहीं पड़ता है, उस परमतत्त्वको आप बताइये, मुझपर कृपा कीजिये ॥ ९ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार आदिशक्ति महेश्वरी सतीने केवल जीवोंके उद्धारके लिये उत्तम १० भक्तिभावसे भगवान् शंकरसे इस प्रकार पूछा ॥१० ॥
तब इसे सुनकर स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले ११ तथा योगके द्वारा भोगसे विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवजी अत्यन्त प्रसन्न होकर सतीसे कहने लगे - ॥११ ॥
शिवजी बोले- हे देवि! हे दक्षनन्दिनि! हे महेश्वरि! सुनो, मैं उस परमतत्त्वका वर्णन करता हूँ, १२ जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो जाता है ॥१२ ॥
हे सती! तुम विज्ञानको परमतत्त्व जानो । विज्ञान १३ वह है, जिसके उदय होनेपर ' मैं ब्रह्म हूँ ', ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है । ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुका स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है ॥१३ ॥
हे प्रिये! वह विज्ञान दुर्लभ है, त्रिलोकीमें १४ उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है । वह जो और । जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है । साक्षात् परात्पर ब्रह्म है ॥१४ ॥
इस प्रकारके विज्ञानकी माता केवल मेरी भक्ति १५ है, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करती है । वह । मेरी कृपासे सुलभ होती है । वह भक्ति नौ प्रकारक कही गयी है । हे सति! भक्ति और ज्ञानमें कोई भेद नहीं है । भक्त और ज्ञानी दोनोंको ही सदा सुख प्राप्त । होता है 1 । भक्तिके विरोधीको विज्ञानकी प्राप्ति नहीं १६ | होती ॥ १५-१६ ॥
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता (
भक्ताधीः सदाहं वै तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि ।
नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशयः ॥ १७
या भक्तिर्द्विविधा देवि सगुणा निर्गुणा मता ।
वैधी स्वाभाविकी या या वरा सा त्ववरा स्मृता ॥ १८
नैष्ठिक्यनैष्ठिकी भेदाद् द्विविधे द्विविधे हि ते ।
षड्विधा नैष्ठिकी ज्ञेया द्वितीयैकविधा स्मृता ॥ १ ९
विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुर्बुधाः ।
तयोर्बहुविधत्वाच्च तत्त्वं त्वन्यत्र वर्णितम् ॥ २०
ते नवाङ्गे उभे ज्ञेये वर्णिते मुनिभिः प्रिये ।
वर्णयामि नवाङ्गानि प्रेमतः शृणु दक्षजे ॥ २१
श्रवणं कीर्तनं चैव स्मरणं सेवनं तथा ।
दास्यं तथार्चनं देवि वंदनं मम सर्वदा ॥ २२
सख्यमात्मार्पणं चेति नवाङ्गानि विदुर्बुधाः ।
उपाङ्गानि शिवे तस्या बहूनि कथितानि वै ॥ २३
शृणु देवि नवाङ्गानां लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
मम भक्तेर्मनो दत्त्वा भुक्तिमुक्तिप्रदानि हि ॥ २४
कथादेर्नित्यसम्मानं कुर्वन्देहादिभिर्मुदा ।
स्थिरासनेन तत्पानं यत्तच्छ्रवणमुच्यते ॥ २५
हृदाकाशेन संपश्यन् जन्मकर्माणि वै मम ।
प्रीत्योच्चोच्चारणं तेषामेतत्कीर्तनमुच्यते ॥ २६
व्यापकं देवि मां दृष्ट्वा नित्यं सर्वत्र सर्वदा ।
निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहृतम् ॥ २७
सतीखण्ड ) ४१३ हे देवि! मैं सदा भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्तिके प्रभावसे जातिहीन नीच मनुष्योंके घरोंमें भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥१७ ॥
हे देवि! वह भक्ति दो प्रकारकी कही गयी है, सगुण और निर्गुण । जो वैधी अर्थात् शास्त्रविधिसे प्रेरित और स्वाभाविकी भक्ति होती है, वह श्रेष्ठ है और इससे भिन्न जो कामनामूलक भक्ति है, वह निम्नकोटिकी कही गयी है । सगुण और निर्गुण भक्ति-— ये दोनों प्रकारकी भक्तियाँ नैष्ठिकी और अनैष्ठिकीके भेदसे दो प्रकारकी हो जाती हैं । नैष्ठिकी भक्ति छः प्रकारवाली जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी एक ही प्रकारकी कही गयी है ॥ १८-१९ ॥ विद्वान् पुरुष विहिता और अविहिता आदि भेदसे उसे अनेक प्रकारकी मानते हैं । इन द्विविध भक्तियोंके बहुतसे भेद - प्रभेद होनेके कारण इनके तत्त्वका अन्यत्र वर्णन किया गया है । हे प्रिये! मुनियोंने सगुण और निर्गुण दोनों भक्तियोंके नौ अंग बताये हैं । हे दक्षनन्दिनि! मैं उन नौ अंगोंका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमसे सुनो ॥ २०-२१ ॥ हे देवि! श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, सदा मेरा वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण– विद्वानोंने भक्तिके ये नौ अंग माने हैं । हे शिवे! इसके अतिरिक्त उस भक्तिके बहुत - से उपांग भी कहे गये हैं ॥ २२-२३ ॥ हे देवि! अब तुम मन लगाकर मेरी भक्तिके नौ अंगोंके पृथक् - पृथक् लक्षण सुनो, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं । जो स्थिर आसनपर बैठकर तन-मन आदिसे मेरे कथा - कीर्तन आदिका नित्य सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक [ अपने श्रवणपुटोंसे ] उसका पान किया जाता है, उसे श्रवण कहते हैं ॥ २४-२५ ॥ जो हृदयाकाशके द्वारा मेरे दिव्य जन्म एवं कर्मोंका चिन्तन करता हुआ प्रेमसे वाणीद्वारा उनका उच्च स्वरसे उच्चारण करता है, उसके इस भजनसाधनको कीर्तन कहा जाता है । हे देवि! मुझ नित्य महेश्वरको सदा और सर्वत्र व्यापक जानकर संसारमें निरन्तर निर्भय रहनेको स्मरण कहा गया है [ यह निर्गुण स्मरण भक्ति है ॥ ] ॥ २६-२७ ॥
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४१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३
अरुणोदयमारभ्य सेवाकालेऽञ्चिता हृदा ।
निर्भयत्वं सदा लोके स्मरणं तदुदाहृतम् ॥ २८
सदा सेव्यानुकूल्येन सेवनं तद्धि गोगणैः ।
हृदयामृतभोगेन प्रियं दास्यमुदाहृतम् ॥ २ ९
सदा भृत्यानुकूल्येन विधिना मे परात्मने ।
अर्पणं षोडशानां वै पाद्यादीनां तदर्चनम् ॥ ३०
मंत्रोच्चारणध्यानाभ्यां मनसा वचसा क्रमात् ।
यदष्टाङ्गेन भूस्पर्शं तद्वै वंदनमुच्यते ॥ ३१
मङ्गलामङ्गलं यद्यत्करोतीतीश्वरो हि मे ।
सर्वं तन्मङ्गलायेति विश्वासः सख्यलक्षणम् ॥ ३२
कृत्वा देहादिकं तस्य प्रीत्यै सर्वं तदर्पणम् ।
निर्वाहाय च शून्यत्वं यत्तदात्मसमर्पणम् ॥ ३३
नवाङ्गानीति मद्भक्तेर्भुक्तिमुक्तिप्रदानि च ।
मम प्रियाणि चातीव ज्ञानोत्पत्तिकराणि च ॥ ३४
उपाङ्गानि च मद्भक्तेर्बहूनि कथितानि वै ।
बिल्वादिसेवनादीनि समूह्यानि विचारतः ॥ ३५
इत्थं साङ्गोपाङ्गभक्तिर्मम सर्वोत्तमा प्रिये ।
ज्ञानवैराग्यजननी मुक्तिदासी विराजते ॥ ३६
सर्वकर्मफलोत्पत्तिः सर्वदा त्वत्समप्रिया ।
यच्चित्ते सा स्थिता नित्यं सर्वदा सोऽति मत्प्रियः ॥ ३७
* दोनों चरणों, दोनों हाथों, दोनों जानुओं, वक्षःस्थल, सिर, अंगोंसे भूमिपर दण्डकी भाँति लेटकर जो प्रणाम किया जाता है, अरुणोदयकालसे प्रारम्भकर शयनपर्यन्त तत्पर-चित्तसे निर्भय होकर भगवद्विग्रहकी सेवा करनेको स्मरण । कहा जाता है [ यह सगुण स्मरण भक्ति है । ] ॥ २८ ॥
हर समय सेव्यकी अनुकूलताका ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियोंसे जो निरन्तर सेवा की जानते है, वही सेवन नामक भक्ति है । अपनेको प्रभुका किंकर समझकर हृदयामृतके भोगसे स्वामीका सदा प्रिय - सम्पादन करना दास्य कहा गया है ॥ २ ९ ॥ अपनेको सदा सेवक समझकर शास्त्रीय विधिसे मुझ परमात्माको सदा पाद्य आदि सोलह उपचारोंका जो समर्पण करना है, उसे अर्चन कहा जाता है ॥ ३० ॥
वाणीसे मन्त्रका उच्चारण करते हुए तथा मनसे ध्यान करते हुए आठों अंगोंसे भूमिका स्पर्श करते हुए जो इष्टदेवको अष्टांग प्रणाम * किया जाता है, उसे वन्दन कहा जाता है ॥ ३१ ॥
ईश्वर मंगल - अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगलके लिये है - ऐसा दृढ़ विश्वास रखना सख्य भक्तिका लक्षण है ॥ ३२ ॥
देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जानेवाली वस्तु है, वह सब भगवान्की प्रसन्नताके लिये उन्हींको समर्पित करके अपने निर्वाहके लिये कुछ भी बचाकर न रखना अथवा निर्वाहकी चिन्तासे भी रहित हो जाना, आत्मसमर्पण कहा जाता है ॥ ३३ ॥
मेरी भक्तिके ये नौ अंग हैं, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं । इनसे ज्ञान प्रकट हो जाता है तथा ये साधन मुझे अत्यन्त प्रिय हैं । मेरी भक्तिके अनेक उपांग भी कहे गये हैं । जैसे बिल्व आदिका सेवन, इनको विचारसे समझ लेना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ हे प्रिये! इस प्रकार मेरी सांगोपांग भक्ति सबसे उत्तम है । यह ज्ञान - वैराग्यकी जननी है और मुक्ति इसकी दासी है । हे देवि! भक्ति सर्वदा सभी कर्मोंके | फलोंको देनेवाली है, यह भक्ति मुझे सदा तुम्हारे समान ही प्रिय है । जिसके चित्तमें नित्य - निरन्तर यह भक्ति निवास करती है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ ३६-३७ ॥ मन, वाणी तथा भक्तिभाव ( मतान्तरसे दृष्टिसे ) —इस प्रकार आठ वह अष्टांग प्रणाम कहलाता है— दोर्भ्यां पद्भ्यां च जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा । मनसा वचसा भक्त्या प्रणामोऽष्टाङ्ग ईरितः ॥ ( आचारेन्दुमें नरसिंहपुराणका वचन )
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता (
त्रैलोक्ये भक्तिसदृशः पंथा नास्ति सुखावहः ।
चतुर्युगेषु देवेशि कलौ तु सुविशेषतः ॥ ३८
कलौ तु ज्ञानवैराग्य वृद्धरूपाँ निरुत्सवौ ।
ग्राहकाभावतो देवि जातौ जर्जरतामति ॥ ३ ९
कलौ प्रत्यक्षफलदा भक्तिः सर्वयुगेष्वपि ।
तत्प्रभावादहं नित्यं तद्वशो नात्र संशयः ॥ ४०
यो भक्तिमान्पुमाँल्लोके सदाहं तत्सहायकृत् ।
विघ्नहर्ता रिपुस्तस्य दंड्यो नात्र च संशयः ॥ ४१
भक्तहेतोरहं देवि कालं क्रोधपरिप्लुतः ।
अदहं वह्निना नेत्रभवेन निजरक्षकः ॥ ४२
भक्तहेतोरहं देवि रव्युपर्यभवं किल ।
अतिक्रोधान्वितः शूलं गृहीत्वान्वजयं पुरा ॥ ४३
भक्तहेतोरहं देवि रावणं सगणं क्रुधा ।
त्यजामि स्म कृतो नैव पक्षपातो हि तस्य वै ॥ ४४
भक्तहेतोरहं देवि व्यासं हि कुमतिग्रहम् ।
काश्या न्यसारयं क्रोधाद्दण्डयित्वा च नंदिना ॥ ४५
किं बहूक्तेन देवेशि भक्ताधीनः सदा ह्यहम् ।
तत्कर्तुः पुरुषस्यातिवशगो नात्र संशयः ॥ ४६
ब्रह्मोवाच
इत्थमाकर्ण्य भक्तेस्तु महत्त्वं दक्षजा सती ।
जहर्षातीव मनसि प्रणनाम शिवं मुदा ॥ ४७
पुनः पप्रच्छ सद्भक्त्या तत्काण्डविषयं मुने ।
शास्त्रं सुखकरं लोके जीवोद्धारपरायणम् ॥ ४८
सयन्त्रमन्त्रशास्त्रं च तन्माहात्म्यं विशेषतः ।
अन्यानि धर्मवस्तूनि जीवोद्धारकराणि हि ॥ ४ ९
सतीखण्ड ) ४१५ हे देवेशि! तीनों लोकों और चारों युगोंमें भक्तिके समान दूसरा कोई सुखदायक मार्ग नहीं है । कलियुगमें तो यह विशेष सुखद एवं सुविधाजनक है; क्योंकि कलियुगमें प्राय: ज्ञान और वैराग्य दोनों ही ग्राहकके अभावके कारण वृद्ध, उत्साहशून्य और जर्जर हो जाते हैं ॥ ३८-३९ ॥ परंतु भक्ति कलियुगमें तथा अन्य सभी युगोंमें भी प्रत्यक्ष फल देनेवाली है । भक्तिके प्रभावसे मैं सदा भक्तके वशमें रहता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४० ॥
संसारमें जो भक्तिमान् पुरुष है, उसकी मैं सदा सहायता करता हूँ और उसके कष्टोंको दूर करता हूँ । उस भक्तका जो शत्रु होता है, वह मेरे लिये दण्डनीय है, इसमें संशय नहीं है ॥४१ ॥
हे देवि! मैं अपने भक्तोंका रक्षक हूँ, भक्तकी | रक्षाके लिये ही मैंने कुपित होकर अपने नेत्रजनित अग्निसे कालकों भी भस्म कर डाला था ॥४२ ॥
हे देवि! भक्तकी रक्षाके लिये मैं पूर्वकालमें सूर्यपर भी अत्यन्त क्रोधित हो उठा था और मैंने त्रिशूल लेकर सूर्यको भी जीत लिया था ॥४३ ॥
हे देवि! मैंने भक्तके लिये सैन्यसहित रावणको भी क्रोधपूर्वक त्याग दिया और उसके प्रति कोई पक्षपात नहीं किया । हे देवि! भक्तोंके लिये ही मैंने कुमतिसे ग्रस्त व्यासको नन्दीद्वारा दण्ड दिलाकर उन्हें काशीके बाहर निकाल दिया॥४४-४५ ॥ हे देवेशि! बहुत कहनेसे क्या लाभ, मैं सदा ही भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्ति करनेवाले पुरुषके अत्यन्त वशमें हो जाता हूँ, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले - [ नारद! ] इस प्रकार भक्तिका महत्त्व सुनकर दक्षकन्या सतीको बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शिवको मन-ही - मन प्रणाम किया ॥ ४७ ॥
हे मुने! देवी सतीने पुनः भक्तिविषयक शास्त्रके विषयमें बड़े आदरपूर्वक पूछा, जो लोकमें सुखदायक तथा जीवोंके उद्धारका साधन है ॥ ४८ ॥
हे मुने! उन्होंने यन्त्र, मन्त्रशास्त्र, उनके माहात्म्य तथा अन्य जीवोद्धारक धर्ममय साधनोंके विषयमें । विशेष रूपसे जाननेकी इच्छा प्रकट की ॥ ४ ९ ॥
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४१६ शंकरोऽपि तदाकर्ण्य सतीप्रश्नं प्रहृष्टधीः वर्णयामास सुप्रीत्या जीवोद्धाराय कृत्स्नशः तन्त्रशास्त्रं सयन्त्रं हि सपञ्चाङ्गं महेश्वरः बभाषे महिमानं च तत्तद्देववरस्य वै सेतिहासकथां तेषां भक्तमाहात्म्यमेव च सवर्णाश्रमधर्मांश्च नृपधर्मान् मुनीश्वर सुतस्त्रीधर्ममाहात्म्यं वर्णाश्रममनश्वरम् वैद्यशास्त्रं तथा ज्योतिःशास्त्रं जीवसुखावहम् सामुद्रिकं परं शास्त्रमन्यच्छास्त्राणि भूरिशः कृपां कृत्वा महेशानो वर्णयामास तत्त्वतः इत्थं त्रिलोकसुखदौ सर्वज्ञौ च सतीशिवौ लोकोपकारकरणधृतसद्गुणविग्रहौ चिक्रीडाते बहुविधं कैलासे हिमवद् गिरौ अन्यस्थलेषु च तदा परब्रह्मस्वरूपिणौ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । सतीके इस प्रश्नको सुनकर शंकरजीके मनमें ॥ ५० बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने जीवोंके उद्धारके लिये सब शास्त्रोंका प्रेमपूर्वक वर्णन किया ॥५० ॥
। महेश्वरने पाँचों अंगसहित तन्त्रशास्त्र, यन्त्रशास्त्र ॥५१ तथा भिन्न - भिन्न देवेश्वरोंकी महिमाका वर्णन किया ॥५१ ॥
। हे मुनीश्वर! महेश्वरने कृपा करके ॥ ५२ इतिहास - कथासहित उन देवताओंके भक्तोंकी । महिमा, वर्णाश्रमधर्म, राजधर्म, पुत्र और स्त्रीके ॥ ५३ धर्मकी महिमा, कभी नष्ट न होनेवाले वर्णाश्रम, । जीवोंको सुख देनेवाले वैद्यकशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र, ॥ ५४ उत्तम सामुद्रिकशास्त्र तथा अन्य भी बहुतसे शास्त्रोंका तत्त्वतः वर्णन किया ॥५२-५४ ॥ । इस प्रकार लोकोपकार करनेके लिये ॥ ५५ । सद्गुणसम्पन्न शरीर धारण करनेवाले, तीनों लोकोंको सुख देनेवाले सर्वज्ञ परब्रह्मस्वरूप शिव और सतीने । हिमालयपर्वतके कैलासशिखरपर तथा अन्यान्य ॥ ५६ स्थानोंमें अनेक प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ ॥ ५५-५६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे भक्तिप्रभाववर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें भक्तिके प्रभावका वर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः दण्डकारण्यमें शिवको रामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा रामकी परीक्षा नारद उवाच
ब्रह्मन् विधे प्रजानाथ महाप्राज्ञ कृपाकर ।
श्रावितं शंकरयशः सतीशंकरयोः शुभम् ॥ १
इदानीं ब्रूहि सत्प्रीत्या परं तद्यश उत्तमम् ।
किमका हि तत्स्थौ वै चरितं दंपती शिवौ ॥ २
ब्रह्मोवाच
सतीशिवचरित्रं च शृणु मे प्रेमतो मुने ।
लौकिकीं गतिमाश्रित्य चिक्रीडाते सदान्वहम् ॥ ३
नारदजी बोले — हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे प्रजानाथ! हे महाप्राज्ञ! हे कृपाकर! आपने भगवान् शंकर तथा देवी सतीके मंगलकारी यशका श्रवण कराया है ॥ १ ॥
अब इस समय पुनः प्रेमपूर्वक उनके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये । उन दम्पती शिवा - शिवने । वहाँ रहकर कौन - कौन - सा चरित्र किया था? ॥२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! आप मुझसे सती और । शिवके चरित्रका प्रेमपूर्वक श्रवण कीजिये । वे दोनों | दम्पती वहाँ लौकिक गतिका आश्रय ले नित्य - निरन्तर । क्रीडा करते थे ॥३ ॥
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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४१७
ततः सती महादेवी वियोगमलभन्मुने ।
स्वपतः शंकरस्येति वदन्त्येके सुबुद्धयः ॥ ४
वागर्थाविव संपृक्तौ शक्तीशौ सर्वदा चितौ ।
कथं घटेत च तयोर्वियोगस्तत्त्वतो मुने ॥ ५
लीलारुचित्वादथवा संघटेताखिलं च तत् ।
कुरुते यद्यदीशौ च सतीशौ भवरीतिगौ ॥ ६
सा त्यक्ता दक्षजा दृष्ट्वा पतिना जनकाध्वरे ।
शंभोरनादरात्तत्र देहं तत्याज सङ्गता ॥ ७
पुनर्हिमालये सैवाविर्भूता नामतः सती ।
पार्वतीति शिवं प्राप तप्त्वा भूरि विवाहतः ॥ ८
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारदः ।
पप्रच्छ च विधातारं शिवाशिवमहद्यशः ॥ ९
नारद उवाच
विष्णुशिष्य महाभाग विधे मे वद विस्तरात् ।
शिवाशिवचरित्रं तद्भवाचारपरानुगम् ॥ १०
किमर्थं शंकरो जायां तत्याज प्राणतः प्रियाम् ।
तस्मादाचक्ष्व मे तात विचित्रमिति मन्महे ॥ ११
कुतोऽध्वरेऽजः पुत्रस्यानादरोऽभूच्छिवस्य ते ।
कथं तत्याज सा देहं गत्वा तत्र पितुः क्रतौ ॥ १२
ततः किमभवत्तत्र किमकार्षीन्महेश्वरः ।
तत्सर्वं मे समाचक्ष्व श्रद्धायुक् तच्छ्रुतावहम् ॥ १३
ब्रह्मोवाच
शृणु तात परप्रीत्या मुनिभिः सह नारद ।
सुतवर्य महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः ॥ १४
नमस्कृत्य महेशानं हर्यादिसुरसेवितम् ।
परब्रह्म प्रवक्ष्यामि तच्चरित्रं महाद्भुतम् ॥ १५
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_15_1_Front हे मुने! तदनन्तर महादेवी सतीको अपने पति शंकरका वियोग प्राप्त हुआ- ऐसा कुछ श्रेष्ठ बुद्धिवाले विद्वानोंका कथन है ॥४ ॥
परंतु हे मुने! वास्तवमें उन दोनों शक्ति और शक्तिमान्का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है; क्योंकि चिन्मय वे दोनों वाणी और अर्थके समान एक - दूसरेसे सदा मिले - जुले हैं ॥ ५ ॥
फिर भी सर्वसमर्थ सती एवं शिव लीलाप्रिय होनेके कारण लोक - व्यवहारका अनुसरण करते हुए जो कुछ भी करते हैं, वह सब समीचीन ही है ॥ ६ ॥
दक्षकन्या सतीने जब देखा कि मेरे पतिने मुझे त्याग दिया है, तब वे अपने पिता दक्षके यज्ञमें गयीं और वहाँ भगवान् शंकरका अनादर देखकर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया ॥ ७ ॥
वे ही सती पुनः हिमालयके घर पार्वतीके नामसे प्रकट हुईं और कठोर तपस्या करके उन्होंने विवाहके द्वारा पुनः भगवान् शिवको प्राप्त कर लिया ॥८ ॥
सूतजी बोले- [ हे महर्षियो! ] ब्रह्माजीकी इस बातको सुनकर नारदजी ब्रह्माजीसे शिवा और शिवके महान् यशके विषयमें इस प्रकार पूछने लगे — ॥९ ॥
नारदजी बोले - हे विष्णुशिष्य! हे महाभाग! हे विधे! आप मुझे शिवाशिवके लोक- आचारसे सम्बन्ध रखनेवाले उनके चरित्रको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १० ॥
हे तात! भगवान् शंकरजीने प्राणोंसे भी प्यारी अपनी धर्मपत्नी सतीका किसलिये त्याग किया? यह घटना बड़ी विचित्र जान पड़ती है, अतः इसे आप अवश्य कहिये ॥११ ॥
आपके पुत्र दक्ष प्रजापतिने यज्ञमें भगवान् शंकरका अनादर क्यों किया और वहाँ अपने पिताके यज्ञमें जाकर सतीने अपने शरीरका त्याग क्यों किया? ॥१२ ॥
पुनः उसके बाद क्या हुआ? महेश्वरने क्या किया? ये सब बातें मुझसे कहिये । मैं इस वृत्तान्तको श्रद्धायुक्त होकर सुनना चाहता हूँ ॥१३ ॥
ब्रह्माजी बोले- मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ! हे तात! हे नारद! आप महर्षियोंके साथ बड़े प्रेमसे भगवान् चन्द्रमौलिका चरित्र सुनिये । श्रीविष्णु आदि देवताओंसे सेवित परब्रह्म परमेश्वरको नमस्कार करके मैं उनके । महान् अद्भुत चरित्रका वर्णन करता हूँ ॥ १४-१५ ॥
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४१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०२४ सर्वेयं शिवलीला हि बहुलीलाकरः प्रभुः । हे मुने! यह सब शिवकी लीला है । वे स्वतंत्रो निर्विकारी च सती सापि हि तद्विधा ॥ १६ अनेक प्रकारकी लीला करनेवाले, स्वतन्त्र और प्रभु अन्यथा कः समर्थो हि तत्कर्मकरणे मुने । निर्विकार हैं । देवी सती भी वैसी ही हैं । हे मुने! परमात्मा परब्रह्म स एव परमेश्वरः ॥ १७ अन्यथा वैसा कर्म करनेमें कौन समर्थ हो सकता है । परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं॥१६-१७ ॥ यं सदा भजते श्रीशोऽहं चापि सकलाः सुराः । जिनका भजन सदा श्रीपति विष्णु, मैं ब्रह्मा, मुनयश्च महात्मानः सिद्धाश्च सनकादयः शेषः सदा यशो यस्य मुदा गायति नित्यशः पारं न लभते तात स प्रभुः शंकरः शिवः तस्यैव लीलया सर्वोऽयमिति तत्त्वविभ्रमः तत्र दोषो न कस्यापि सर्वव्यापी स प्रेरकः एकस्मिन्समये रुद्रः सत्या त्रिभवगो भवः वृषमारुह्य पर्याटद्रसां लीलाविशारदः आगत्य दण्डकारण्यं पर्यटन् सागराम्बराम् । दर्शयन् तत्रगां शोभां सत्यै सत्यपणः प्रभुः
तत्र रामं ददर्शासौ लक्ष्मणेनान्वितं हरः ।
अन्विष्यन्तं प्रियां सीतां रावणेन हृतां छलात् ॥
हा सीतेति प्रोच्चरन्तं विरहाविष्टमानसम् ।
यतस्ततश्च पश्यन्तं रुदन्तं हि मुहुर्मुहुः ॥
समिच्छन्तं च तत्प्राप्तिं पृच्छन्तं तद्गतिं हृदा ।
कुजादिभ्यो नष्टधियमत्रपं शोकविह्वलम् ॥
सूर्यवंशोद्भवं वीरं भूपं दशरथात्मजम् ।
भरताग्रजमानंदरहितं विगतप्रभम् ॥
पूर्णकामो वराधीनं प्राणमत्स्म मुदा हरः ।
रामं भ्रमन्तं विपिने सलक्ष्मणमुदारधीः ॥
जयेत्युक्त्वान्यतोऽगच्छन्नदात्तस्मै स्वदर्शनम् ।
रामाय विपिने तस्मिन् शंकरो भक्तवत्सलः ॥
॥ १८ समस्त देवतागण, महात्मा, मुनि, सिद्ध तथा सनकादि सदैव करते रहते हैं । शेषजी प्रसन्नतापूर्वक जिनके । यशका निरन्तर गान करते रहते हैं, किंतु कभी भी ॥ १ ९ उनका पार नहीं पाते हैं, वे ही शंकर सबके प्रभु तथा ईश्वर हैं ॥ १८-१९ ॥ । यह सब तत्त्वविभ्रम उन्हींकी लीलासे हो रहा ॥ २० है । इसमें किसीका दोष नहीं है; क्योंकि वे सर्वव्यापी ही प्रेरक हैं । एक समयकी बात है तीनों लोकोंमें । विचरण करनेवाले, लीलाविशारद भगवान् रुद्र सतीके ॥ २१ साथ वृषभपर आरूढ़ हो पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे थे ॥ २०-२१ ॥ सागर और आकाशमें घूमते - घूमते दण्डकारण्यमें ॥ २२ आकर सत्य प्रतिज्ञावाले वे प्रभु सतीको वहाँकी शोभा दिखाने लगे । वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित श्रीरामको देखा, जो रावणद्वारा बलपूर्वक हरी गयी अपनी प्रिया २३ पत्नी सीताकी खोज कर रहे थे ॥ २२-२३ ॥ वे ‘ हा सीते! ' इस प्रकार उच्च स्वरसे पुकार रहे २४ थे, जहाँ - तहाँ देख रहे थे और बार - बार रो रहे थे, उनके मनमें विरहका आवेश छा गया था ॥२४ ॥
वे उनकी प्राप्तिकी इच्छा कर रहे थे, मनमें उनकी २५ दशाका विचार कर रहे थे, वृक्ष आदिसे उनके विषयमें पूछ रहे थे, उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, वे लज्जासे रहित हो गये थे और शोकसे विह्वल थे ॥ २५ ॥
वे सूर्यवंशमें उत्पन्न, वीर, भूपाल, दशरथनन्दन, २६ । भरताग्रज थे । आनन्दरहित होनेके कारण उनकी । कान्ति फीकी पड़ गयी थी । उस समय उदारचेता पूर्णकाम भगवान् शंकरने लक्ष्मणके साथ वनमें घूमते २७ हुए माता कैकेयीके वरोंके अधीन उन रामको बड़ी | प्रसन्नताके साथ प्रणाम किया और जय - जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये । उन भक्तवत्सल शंकरने उस २८ । वनमें श्रीरामको पुनः दर्शन नहीं दिया ॥ २६–२८ ॥