शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 471–480
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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अ ० ३४ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५ ९ अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः दक्ष तथा देवताओंका अनेक अपशकुनों एवं उत्पातसूचक लक्षणोंको देखकर भयभीत होना ब्रह्मोवाच
एवं प्रचलिते चास्मिन् वीरभद्रे गणान्विते ।
दुष्टचिह्नानि दक्षेण दृष्टानि विबुधैरपि ॥
उत्पाता विविधाश्चासन् वीरभद्रे गणान्विते ।
त्रिविधा अपि देवर्षे यज्ञविध्वंससूचकाः ॥
दक्षवामाक्षिबाहूरुविस्पंदः समजायत नानाकष्टप्रदस्तात सर्वथाशुभसूचकः ॥
भूकंप: समभूत्तत्र दक्षयागस्थले तदा ।
दक्षोऽपश्यच्च मध्याह्ने नक्षत्राण्यद्भुतानि च ॥
दिशश्चासन्सुमलिनाः कर्बुरोऽभूद्दिवाकरः ।
परिवेषसहस्त्रेण संक्रांतश्च भयंकरः ॥
नक्षत्राणि पतन्ति स्म विद्युदग्निप्रभाणि च ।
नक्षत्राणामभूद्वक्रा गतिश्चाधोमुखी तदा ॥
गृध्रा दक्षशिरः स्पृष्ट्वा समुद्भूताः सहस्रशः ।
आसीद् गृध्रपक्षच्छायैः सच्छायो यागमंडपः ॥
ववाशिरे यागभूमौ क्रोष्टारो नेत्रकस्तदा ।
उल्कावृष्टिरभूत्तत्र श्वेतवृश्चिकसंभवा ॥
खरा वाता ववुस्तत्र पांशुवृष्टिसमन्विताः ।
शलभाश्च समुद्भूता विवर्तानिलकंपिताः ॥
नीतश्च पवनैरूर्ध्वं स दक्षाध्वरमंडपः ।
देवान्वितेन दक्षेण यः कृतो नूतनोऽद्भुतः ॥
वेमुर्दक्षादयः सर्वे तदा शोणितमद्भुतम् ।
वेमुश्च मांसखण्डानि सशल्यानि मुहुर्मुहुः ॥
सकम्पाश्च बभूवुस्ते दीपा वातहता इव ।
दुःखिताश्चाभवन्सर्वे शस्त्रधाराहता इव ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार गणोंसहित वीरभद्रके प्रस्थान करनेपर दक्ष तथा देवताओंको अनेक प्रकारके १ अशुभ लक्षण दिखायी पड़ने लगे ॥१ ॥
गणोंसहित वीरभद्रके चल देनेपर वहाँ अनेक २ प्रकारके उत्पात होने लगे और हे देवर्षे! यज्ञविध्वंसकी सूचना देनेवाले तीनों प्रकार ( आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक ) -के अपशकुन होने लगे ॥ २ ॥
हे तात! दक्षकी बाँयीं आँख, बाँयीं भुजा और ३ बाँयी जाँघ फड़कने लगी, जो अनेक प्रकारके कष्ट देनेवाली तथा सर्वथा अशुभकी सूचक थी ॥ ३ ॥
उस समय दक्षके यज्ञस्थलमें भूकम्प उत्पन्न हो ४ गया । दक्षको दोपहरमें अनेक अद्भुत नक्षत्र दीखने लगे । दिशाएँ मलिन हो गयीं, सूर्य चितकबरा हो गया । सूर्यपर हजारों घेरे पड़ गये, जिससे वह भयंकर ५ दिखायी पड़ने लगा॥४-५ ॥ बिजली तथा अग्निके समान दीप्तिमान् तारे ६ टूटकर गिरने लगे । नक्षत्रोंकी गति टेढ़ी और नीचेकी ओर हो गयी । हजारों गीध दक्षके सिरको छूकर उड़ने लगे और उन गीधोंके पंखोंकी छायासे यज्ञमण्डप ७ ढँक गया॥६-७ ॥ यज्ञभूमिमें सियार तथा उल्लू शब्द करने लगे । ८ [ आकाशमण्डलसे ] श्वेत बिच्छुओंकी उल्कावृष्टि होने लगी । धूलिकी वर्षाके साथ तेज हवाएँ चलने लगीं और विवर्त [ घूमती हुई ] वायुसे कम्पित होकर ९ टिड्डियाँ सब जगह उड़ने लगीं ॥८ - ९ ॥ दक्षने देवताओंके साथ जिस नवीन तथा अद्भुत १० यज्ञमण्डपका निर्माण किया था, उसे वायुने ऊपरकी ओर उड़ा दिया । दक्ष आदि सभी लोग अद्भुत प्रकारसे रक्तका वमन करने लगे और हड्डीसे समन्वित मांसखण्ड ११ बार - बार उगलने लगे ॥ १०-११ ॥ वे सभी लोग वायुके झोंकेसे हिलते हुए दीपकके समान काँपने लगे और शस्त्रोंसे आहत हुए १२ प्राणियोंके समान दुःखित हो गये । जिस प्रकार वनमें
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४६० तदा निनादजातानि बाष्पवर्षाणि तत्क्षणे प्रातस्तुषारवर्षीणि पद्मानीव वनान्तरे दक्षाद्यक्षीणि जातानि ह्यकस्माद्विशदान्यपि निशायां कमलाश्चैव कुमुदानीव सङ्गवे असृग्ववर्ष देवश्च तिमिरेणावृता दिशः दिग्दाहोऽभूद्विशेषेण त्रासयन् सकलाञ्जनान् एवंविधान्यरिष्टानि ददृशुर्विबुधादयः भयमापेदिरेऽत्यन्तं मुने विष्ण्वादिकास्तदा भुवि ते मूर्छिताः पेतुर्हा हताः स्म इतीरयन् तरवस्तीरसञ्जाता नदीवेगहता इव ॥
पतित्वा ते स्थिता भूमौ क्रूराः सर्पा हता इव ।
कंदुका इव ते भूयः पतिताः पुनरुत्थिताः ॥
ततस्ते तापसंतप्ता रुरुदुः कुररी इव ।
रोदनध्वनिसंक्रान्तोरुक्तिप्रत्युक्तिका इव ॥
सवैकुंठास्ततः सर्वे तदा कुंठितशक्तयः ।
स्वस्वोपकंठमाकंठं लुलुठुः कमठा इव ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सञ्जाता चाशरीरवाक् ।
श्रावयत्यखिलान् देवान् दक्षं चैव विशेषतः ॥
आकाशवाण्युवाच धिग् जन्म तव दक्षाद्य महामूढोऽसि पापधीः । भविष्यति महद्दुः दुःखमनिवार्यं र हरोद्भवम् ॥
सहायिनोऽत्र ये मूढास्तव देवादयः स्थिताः ।
तेषामपि महद्दुःखं भविष्यति न संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
तच्छ्रुत्वाकाशवचनं दृष्ट्वारिष्टानि तानि च ।
दक्षः प्रापद्भयं चाति परे देवादयोऽपि ह ॥
वेपमानस्तदा दक्षो विकलश्चाति चेतसि । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३४ । । प्रात: कालके समय कमलपुष्पोंपर तुषार ( ओस ॥ १३ वर्षा हुई हो, उसी प्रकार शब्द करते हुए वाष्पकी ) की वर्षा होने लगी॥१२-१३ ॥ । जिस प्रकार रात्रिमें कमल तथा दिनम ॥ १४ बन्द हो जाते हैं, उसी प्रकार दक्ष आदिकी विशाल कुमुद आँखें भी अचानक बन्द हो गयीं ॥१४ ॥
। आकाशसे रक्तकी वर्षा होने लगी, दिशाएँ ॥ १५ अन्धकारसे ढँक गयीं तथा सभी प्राणियोंको सन्त्रस्त करता हुआ दिग्दाह होने लगा ॥ १५ ॥
। हे मुने! जब विष्णु आदि देवताओंने इस प्रकारके ॥ १६ उत्पात देखे, तब वे अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥ १६ ॥
। हाय, अब हमलोग मारे गये - इस प्रकार कहते १७ | हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर इस प्रकार गिर पड़े, जैसे नदीके वेगसे किनारेपर वृक्ष गिर जाते हैं ॥ १७ ॥
वे पृथिवीपर इस प्रकार गिरकर अचेत हो जाते १८ थे जैसे काटनेके बाद विषैला सर्प अचेत हो जाता है और कभी गेंदके समान पृथिवीपर गिरकर पुन: उठ जाते थे । तदनन्तर वे तापसे व्याकुल होकर कुररी १ ९ पक्षीकी भाँति विलाप करते थे एवं उक्ति तथा प्रत्युक्तिका शब्द करते हुए रो रहे थे ॥ १८-१९ ॥ उस समय विष्णुसहित सभी लोगोंकी शक्ति २० | कुण्ठित हो गयी और वे आपसमें एक - दूसरेके समीप कण्ठपर्यन्त कछुएके समान लोटने लगे ॥२० ॥
इसी बीच वहाँ समस्त देवताओं और विशेषकर २१ दक्षको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई ॥२१ ॥
आकाशवाणी बोली — हे दक्ष! तुम्हारे जन्मको धिक्कार है । तुम महामूढ़ और पापात्मा हो । शिवजी २२ कारण आज तुम्हें महान् दुःख प्राप्त होगा, जिसका निवारण नहीं हो सकता ॥ २२ ॥
यहाँ जो तुम्हारे सहायक मूर्ख देवता उपस्थित हैं, २३ उन्हें भी महान् दुःख होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे मुने! ] उस आकाशवाणीको | सुनकर और उन उपद्रवोंको देखकर दक्ष तथा अन्य २४ देवता आदि भी अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥२४ ॥
उस समय दक्ष मन - ही - मन अत्यन्त व्याकुल | हो काँपने लगे और अपने लक्ष्मीपति भगवान् अगच्छच्छरणं विष्णोः स्वप्रभोरिन्दिरापतेः ॥ २५ । विष्णुकी शरणमें गये ॥२५ ॥ प्रभु
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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६१ सुप्रणम्य भयाविष्टः संस्तूय च विचेतनः । भयभीत तथा बेसुध वे दक्ष उन स्वजनवत्सल देवाधिदेव विष्णुको प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति
अवोचद्देवदेवं तं विष्णुं स्वजनवत्सलम् ॥ २६ । करके कहने लगे —॥२६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे दुःशकुनदर्शनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें अपशकुन - दर्शन नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः दक्षद्वारा यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन दक्ष उवाच
देवदेव हरे विष्णो दीनबंधो कृपानिधे ।
मम रक्षा विधातव्या भवता साध्वरस्य च ॥ १
रक्षकस्त्वं मखस्यैव मखकर्मा मखात्मकः ।
कृपा विधेया यज्ञस्य भङ्गो भवतु न प्रभो ॥ २
ब्रह्मोवाच
इत्थं बहुविधां दक्षः कृत्वा विज्ञप्तिमादरात् ।
पपात पादयोस्तस्य भयव्याकुलमानसः ॥ ३
उत्थाप्य तं ततो विष्णुर्दक्षं विक्लिन्नमानसम् ।
श्रुत्वा च तस्य तद्वाक्यं कुमतेरस्मरच्छिवम् ॥ ४
स्मृत्वा शिवं महेशानं स्वप्रभुं परमेश्वरम् ।
अवदच्छिवतत्त्वज्ञो दक्षं संबोधयन्हरिः ॥
हरिरुवाच
शृणु दक्ष प्रवक्ष्यामि तत्त्वतः शृणु मे वचः ।
सर्वथा ते हितकरं महामंत्रसुखप्रदम् ॥ ६
अवज्ञा हि कृता दक्ष त्वया तत्त्वमजानता ।
सकलाधीश्वरस्यैव शंकरस्य परात्मनः ॥ ७
ईश्वरावज्ञया सर्वं कार्यं भवति सर्वथा ।
विफलं केवलं नैव विपत्तिश्च पदे पदे ॥ ८
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते ।
त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्र्यं मरणं भयम् ॥ ९
दक्ष बोले- हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो! हे दीनबन्धो! हे कृपानिधे! आपको मेरी और मेरे यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये । आप ही यज्ञके रक्षक, यज्ञ करनेवाले और यज्ञस्वरूप हैं । हे प्रभो! आपको ऐसी कृपा करनी चाहिये, जिससे यज्ञका विनाश न हो॥१-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! इस प्रकार आदरपूर्वक प्रार्थना करके भयसे व्याकुल चित्तवाले दक्ष उनके चरणोंमें गिर पड़े । तब दुखी मनवाले दक्षको उठाकर और उन दुर्बुद्धिकी बातको सुनकर विष्णुने शिवका स्मरण किया॥३-४ ॥ अपने प्रभु एवं महान् ऐश्वर्यसे युक्त परमेश्वर शिवका स्मरण करके शिवतत्त्वके ज्ञाता श्रीहरि दक्षको सम्बोधित करते हुए कहने लगे - ॥५ ॥
हरि बोले - हे दक्ष! मैं आपको यथार्थ बात बता रहा हूँ, मेरी बात सुनिये, यह आपके लिये सर्वथा हितकर तथा महामन्त्रकी तरह सुखदायक है ॥ ६ ॥
हे दक्ष! शिवतत्त्वको न जाननेके कारण आपने सबके अधिपति परमात्मा शंकरकी अवहेलना की है ॥७ ॥
ईश्वरकी अवहेलनासे सारा कार्य न केवल सर्वथा निष्फल हो जाता है, अपितु पग - पगपर विपत्ति भी आती है । जहाँ अपूज्य लोगोंकी पूजा होती है और पूजनीयकी पूजा नहीं होती, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु एवं भय - ये तीन अवश्य होंगे ॥८ - ९ ॥
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४६२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन माननीयो वृषध्वजः । इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्नसे तुम्हें भगवान् अमानितान्महेशाच्च महद्भयमुपस्थितम् ॥ १० वृषभध्वजका सम्मान करना चाहिये । महेश्वरका अद्यापि न वयं सर्वे प्रभवः प्रभवामहे भवतो दुर्नयेनैव मया सत्यमुदीर्यते ब्रह्मोवाच विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा दक्षश्चिन्तापरोऽभवत् विवर्णवदनो भूत्वा तूष्णीमासीद्भुवि स्थितः एतस्मिन्नन्तरे वीरभद्रः सैन्यसमन्वितः अगच्छदध्वरं रुद्रप्रेरितो गणनायकः पृष्ठे केचित्समायाता गगने केचिदागताः दिशश्च विदिशः सर्वे समावृत्य तथापरे शर्वाज्ञया गणाः शूरा निर्भया रुद्रविक्रमाः । असंख्याः सिंहनादान्वै कुर्वंतो वीरसत्तमाः
तेन नादेन महता नादितं भुवनत्रयम् ।
रजसा चावृतं व्योम तमसा चावृता दिशः ॥
सप्तद्वीपान्विता पृथ्वी चचालाति भयाकुला ।
सशैलकानना तत्र चुक्षुभुः सकलाब्धयः ॥
एवंभूतं च तत्सैन्यं लोकक्षयकरं महत् ।
दृष्ट्वा च विस्मिताः सर्वे बभूवुरमरादयः ॥
सैन्योद्योगमथालोक्य दक्षश्चासृङ्मुखाकुलः ।
दंडवत्पतितो विष्णुं सकलत्रोऽभ्यभाषत ॥
दक्ष उवाच
भवद्द्बलेनैव मया यज्ञः प्रारंभितो महान् ।
सत्कर्मसिद्धये विष्णो प्रमाणं त्वं महाप्रभो ॥
विष्णो त्वं कर्मणां साक्षी यज्ञानां प्रतिपालकः ।
धर्मस्य वेदगर्भस्य ब्रह्मणस्त्वं महाप्रभो ॥
तस्माद्रक्षा विधातव्या यज्ञस्यास्य मम प्रभो ।
त्वदन्यः कः समर्थोऽस्ति यतस्त्व सकलप्रभुः ॥
| अपमान करनेसे ही [ आपके ऊपर ] महान् उपस्थित हुआ है ॥१० ॥
। हम सब लोग प्रभु होते हुए ॥ ११ दुर्नीतिके कारण कुछ भी करनेमें सत्य कह रहा हूँ ॥११ ॥
ब्रह्माजी बोले – - [ हे नारद । वचन सुनकर दक्ष चिन्तामें पड़ गये ॥ १२ उनके चेहरेका रंग फीका पड़ गया पृथिवीपर खड़े रह गये ॥१२ ॥
भय भी आज आपकी समर्थ नहीं हैं । मैं ! ] विष्णुका यह । उनका मुख तथा और वे चुप होकर । इसी समय रुद्रके भेजे हुए गणनायक वीरभद्र ॥ १३ । अपनी सेनाके साथ यज्ञस्थलमें जा पहुँचे ॥१३ ॥
। कुछ गण भूपृष्ठपर आ गये, कुछ आकाशमें स्थित ॥ १४ हो गये और कुछ गण दिशाओं तथा विदिशाओंको व्याप्त करके खड़े हो गये । शिवकी आज्ञासे वे रुद्रके ॥ १५ समान पराक्रमवाले, शूर, निर्भीक तथा वीरोंमें श्रेष्ठ असंख्य गण सिंहनाद करते हुए वहाँ पहुँच गये ॥ १४-१५ ॥ उस घोर नादसे तीनों लोक गूँज उठे । आकाश १६ धूलसे भर गया और दिशाएँ अन्धकारसे आवृत हो गयीं । सातों द्वीपोंसे युक्त पृथिवी भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर पर्वत और वनोंसहित काँपने लगी तथा १७ सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे ॥ १६-१७ ॥ समस्त लोकोंका विनाश करनेवाले इस प्रकारके १८ उस विशाल सैन्यदलको देखकर समस्त देवता आदि चकित रह गये ॥१८ ॥
इस सैन्य - उद्योगको देखकर मुखसे रक्तका वमन १ ९ करते हुए वे दक्ष पत्नीसहित विष्णुके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े और इस प्रकार कहने लगे -॥१ ९ ॥ दक्ष बोले — हे विष्णो! हे महाप्रभो! आपके बलसे | ही मैंने इस महान् यज्ञको आरम्भ किया है, सत्कर्मकी २० सिद्धिके लिये आप ही प्रमाण माने गये हैं ॥ २० ॥
हे विष्णो! आप कर्मोंके साक्षी तथा यज्ञों के २१ प्रतिपालक हैं । हे महाप्रभो! आप वेदसारसर्वस्व, धर्म | और ब्रह्माके रक्षक हैं 1 । अतः हे प्रभो! आपको मेरे इस यज्ञकी रक्षा करनी चाहिये । आपके अतिरिक्त दूसरा २२ कौन समर्थ है; क्योंकि आप सबके प्रभु हैं ॥ २१-२२ ॥
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अ ० ३५ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६३ ब्रह्मोवाच
दक्षस्य वचनं श्रुत्वा विष्णुदनतरं तदा ।
अवोचद् बोधयंस्तं वै शिवतत्त्वपराङ्मुखम् ॥
विष्णुरुवाच
या रक्षा विधातव्या तव यज्ञस्य दक्ष वै ।
ख्यातो मम पणः सत्यो धर्मस्य परिपालनम् ॥
तत्सत्यं तु त्वयोक्तं हि किं तत्तस्य व्यतिक्रमः ।
शृणु त्वं वच्म्यहं दक्ष क्रूरबुद्धिं त्यजाधुना ॥
नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे यज्जातं वृत्तमद्भुतम् ।
तत् किं न स्मर्यते दक्ष विस्मृतं किं कुबुद्धिना ॥
रुद्रकोपाच्च को ह्यत्र समर्थो रक्षणे तव ।
न यस्याभिमतं दक्ष यस्त्वां रक्षति दुर्मतिः ॥
किं कर्म किमकर्मेति तन्न पश्यसि दुर्मते । समर्थं केवलं कर्म न भविष्यति सर्वदा स्वकर्म विद्धि तद्येन समर्थत्वेन जायते । न त्वन्यः कर्मणो दाता शं भवेदीश्वरं विना ईश्वरस्य च यो भक्त्या शांतस्तद्गतमानसः कर्मणो हि फलं तस्य प्रयच्छति तदा शिवः केवलं ज्ञानमाश्रित्य निरीश्वरपरा नराः निरयं ते च गच्छन्ति कल्पकोटिशतानि च पुनः कर्ममयैः पाशैर्बद्धा जन्मनि जन्मनि निरयेषु प्रपच्यन्ते केवलं कर्मरूपिणः अयं रुद्रगणाधीशो वीरभद्रोऽरिमर्दनः ब्रह्माजी बोले- तब दक्षकी अत्यन्त दीनतापूर्ण बात सुनकर भगवान् विष्णु शिवतत्त्वसे विमुख उन २३ दक्षको बोध प्रदान करते हुए कहने लगे – ॥ २३ ॥
विष्णु बोले - हे दक्ष! मुझे आपके यज्ञकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये; धर्मके परिपालनविषयक जो २४ मेरी सत्य प्रतिज्ञा है, वह [ सर्वत्र ] विख्यात है ॥ २४ ॥
आपने जो कहा है, वह सत्य है, उसका २५ व्यतिक्रम कैसे हो सकता है । परंतु दक्ष! मैं जो कहता हूँ, उसे आप सुनिये । आप इस समय क्रूरतापूर्ण बुद्धिको त्याग दीजिये ॥ २५ ॥
हे दक्ष! देवताओंके क्षेत्र नैमिषारण्यमें जो अद्भुत २६ घटना घटित हुई थी, क्या उसका स्मरण आपको नहीं हो रहा है? आप कुबुद्धिके कारण उसे भूल गये? ॥ २६ ॥
रुद्रके कोपसे आपकी रक्षा करनेमें यहाँ कौन २७ समर्थ है? हे दक्ष! आपकी रक्षा किसको अभिमत नहीं है? परंतु जो आपकी रक्षा करनेको उद्यत होता है, वह दुर्बुद्धि है । २७ ॥ हे दुर्मते! क्या कर्म है और क्या अकर्म है, इसे ॥ २८ आप नहीं समझ पा रहे हैं । केवल कर्म ही [ सब कुछ करनेमें ] सर्वदा समर्थ नहीं हो सकता ॥ २८ ॥
जिसके सहयोगसे कर्ममें कुछ करनेका सामर्थ्य ॥ २ ९ आता है, उसीको आप स्वकर्म समझिये । भगवान् शिवके बिना दूसरा कोई कर्ममें कल्याण करनेकी । शक्ति देनेवाला नहीं है । जो शान्त होकर ईश्वरमें मन ॥ ३० लगाकर भक्तिपूर्वक कार्य करता है, उसीको भगवान् शिव उस कर्मका फल देते हैं ॥ २ ९ -३० ॥ । जो मनुष्य केवल ज्ञानका सहारा लेकर ॥ ३१ अनीश्वरवादी हो जाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंतक नरकमें ही पड़े रहते हैं । केवल कर्मपरायण रहनेवाले । लोग प्रत्येक जन्ममें कर्ममय पाशोंसे बँधते हैं और ॥ ३२ नरकोंकी यातना भोगते हैं ॥ ३१-३२ ॥ । ये रुद्रगणोंके स्वामी, शत्रुमर्दन तथा रुद्रकी समायातोऽध्वराङ्गणे ॥ ३३ क्रोधाग्निसे उत्पन्न वीरभद्र यज्ञभूमिमें आ गये हैं ॥ ३३ ॥
रुद्रकोपाग्निसंभूतः ये हमलोगोंके विनाशके लिये आये हैं, इसमें अयमस्मद्विनाशार्थमागतोऽस्ति न संशयः । संशय नहीं है । चाहे कुछ भी हो, वास्तवमें इनके
अशक्यमस्य नास्त्येव किमप्यस्तु तु वस्तुतः ॥ ३४ । लिये कुछ भी अशक्य नहीं है ॥३४ ॥
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४६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३५ प्रज्वाल्यास्मानयं सर्वान् ध्रुवमेव महाप्रभुः । महान् सामर्थ्यशाली ये हम सबको अवश्य ततः प्रशांतहृदयो भविष्यति न संशयः ॥ ३५ जलाकर ही शान्तचित्त होंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५ ॥
श्रीमहादेवशपथं समुल्लंघ्य भ्रमान्मया । मैं भ्रमसे महादेवजीकी शपथका उल्लंघन करके यतः स्थितं ततः प्राप्यं मया दुःखं त्वया सह ॥ ३६ जो यहाँ रुक गया, उसके कारण आपके साथ मुझे शक्तिर्मम तु नास्त्येव दक्षाद्यैतन्निवारणे शपथोल्लंघनादेव शिवद्रोही यतोऽस्म्यहम् कालत्रयेऽपि न यतो महेशद्रोहिणां सुखम् ततोऽवश्यं मया प्राप्तं दुःखमद्य त्वया सह सुदर्शनाभिधं चक्रमेतस्मिन्न लगिष्यति शैवचक्रमिदं यस्मादशैवलयकारणम् ॥ विनापि वीरभद्रेण नामैतच्चक्रमैश्वरम् । हत्वा गमिष्यत्यधुना सत्वरं हरसन्निधौ
शैवं शपथमुल्लंघ्य स्थितं मां चक्रमीदृशम् ।
असंहत्यैव सहसा कृपयैव स्थिरं परम् ॥
अतः परमिदं चक्रमपि न स्थास्यति ध्रुवम् । भी दुःख सहना पड़ेगा । हे दक्ष! आज मुझमें इनको । रोक सकनेकी शक्ति नहीं है; क्योंकि शपथका ॥ ३७ उल्लंघन करनेसे मैं शिवद्रोही हो गया हूँ ॥ ३६-३७ ॥ । भगवान् शिवसे द्रोह करनेवालेको त्रिकालमें भी ॥ ३८ सुख नहीं मिलता है, अतः आज आपके साथ मुझे भी । अवश्य दुःख प्राप्त हुआ है । मेरा सुदर्शन नामक चक्र भी इनपर प्रभाव नहीं डाल पायेगा; क्योंकि यह शैवचक्र ३ ९ [ केवल ] अशैवोंका लय करनेवाला है ॥ ३८-३९ ॥ वीरभद्रपर इस चक्रसे प्रहार करते ही बिना ॥ ४० उनका वध किये ही यह शैवचक्र शीघ्र ही शिवजीके पास चला जायगा । यह शैवचक्र शिवकी शपथका उल्लंघन करनेवाले मेरे पास मुझपर सहसा बिना ४१ प्रहार किये हुए ही अबतक स्थित है, यही उनकी महान् कृपा है॥४०-४१ ॥ अब यह चक्र निश्चित रूपसे मेरे पास नहीं गमिष्यत्यधुना शीघ्रं ज्वालामालासमाकुलम् ॥४२ रहेगा और अग्निकी लपटोंसे व्याप्त होकर इस समय
वीरभद्रः पूजितोऽपि शीघ्रमस्माभिरादरात् ।
महाक्रोधसमाक्रांतो नास्मान् संरक्षयिष्यति ॥
अकांडप्रलयोऽस्माकमागतोऽद्य हि हा हहा ।
हा हा बत तवेदानीं नाशोऽस्माकमुपस्थितः ॥
शरण्योऽस्माकमधुना नास्त्येव हि जगत्त्रये ।
शंकरद्रोहिणो लोके कः शरण्यो भविष्यति ॥
तनुनाशेऽपि संप्राप्यास्तैश्चापि यमयातनाः ।
ता नैव शक्यते सोढुं बहुदुःखप्रदायिनीः ॥
शिवद्रोहिणमालोक्य दष्टदन्तो यमः स्वयम् ।
तप्ततैलकटाहेषु पातयत्येव नान्यथा ॥
गन्तुमेवाहमुद्युक्तः सर्वथा शपथोत्तरम् । तथापि न गतः शीघ्रं शीघ्र ही चला जायगा । हमलोगोंके द्वारा शीघ्रतासे ४३ आदरपूर्वक पूजा किये जानेपर भी महान् क्रोधसे भरे हुए ये वीरभद्र हमारी रक्षा नहीं करेंगे ॥ ४२-४३ ॥ हाय! यह बड़े दुःखकी बात है कि असमयमें ही ४४ हमलोगोंके लिये प्रलय आ गया है । इस समय आपका और हमारा विनाश उपस्थित हो गया है ॥४४ ॥
इस समय त्रिलोकीमें हमारी रक्षा करनेवाला ४५ कोई नहीं है, भला शंकरके द्रोहीको शरण देनेवाला संसारमें कौन होगा? शरीरका नाश हो जानेपर भी [ शिवद्रोहके कारण ] उन्हें यमकी यातनाएँ प्राप्त ४६ होती हैं । बहुत दुःख देनेवाली उन यातनाओंको सहा नहीं जा सकता ॥ ४५-४६ ॥ शिवद्रोहीको देखकर यमराज स्वयं दाँत पीसते ४७ हुए सन्तप्त तैलपूर्ण कड़ाहोंमें डाल देते हैं, इसमें कोई । सन्देह नहीं है । शपथके बाद मैं शीघ्र ही जानेको उद्यत था, किंतु दुष्टके संसर्गरूपी पापके कारण दुष्टसंसर्गपापतः ॥ ४८ नहीं गया ॥ ४७-४८ ॥
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अ ० ३६ ] रुद्रसंहिता (
यदद्य क्रियतेऽस्माभिः पलायनमितस्तदा ।
शार्वौ नाकर्षकः शस्त्रैरस्मानाकर्षयिष्यति ॥ ४ ९
स्वर्गे वा भुवि पाताले यत्र कुत्रापि वा यतः ।
श्रीवीरभद्रशस्त्राणां गमनं न हि दुर्लभम् ॥ ५०
यावन्तश्च गणाः सन्ति श्रीरुद्रस्य त्रिशूलिनः ।
तावतामपि सर्वेषां शक्तिरेतादृशी ध्रुवम् ॥ ५१
श्रीकालभैरवः काश्यां नखाग्रेणैव लीलया ।
पुरा शिरश्च चिच्छेद पञ्चमं ब्रह्मणो ध्रुवम् ॥ ५२
एतदुक्त्वा स्थितो विष्णुरतित्रस्तमुखाम्बुजः ।
वीरभद्रोऽपि संप्राप तदैवाध्वरमंडपम् ॥ ५३
एवं ब्रुवति गोविन्द आगतं सैन्यसागरम् ।
वीरभद्रेण सहितं ददृशुश्च सुरादयः ॥ ५४
सतीखण्ड ) ४६५ यदि इस समय हमलोग भागनेका प्रयास भी करें, तो कर्षण करनेवाले शिवभक्त वीरभद्र अपने शस्त्रोंसे हमें खींच लेंगे; क्योंकि स्वर्ग, पृथिवी, पातालमें जहाँ कहीं भी वीरभद्रके शस्त्रोंका जाना असम्भव नहीं है ॥४ ९ -५० ॥ त्रिशूलधारी श्रीरुद्रके जितने भी गण यहाँ हैं, उन सबकी ऐसी ही शक्ति है । पूर्व समयमें काशीमें कालभैरवने अपने नखके अग्रभागसे लीलापूर्वक ब्रह्माजीके पाँचवें सिरको काट दिया था॥५१-५२ ॥ ऐसा कहकर अत्यन्त व्याकुल मुखकमलवाले विष्णु चुपचाप बैठ गये, उसी समय वीरभद्र भी यज्ञमण्डपमें आ पहुँचे । विष्णु ऐसा कह ही रहे थे कि वीरभद्रके साथ [ विशाल ] सैन्यसमूह भी आ । गया, जिसे देवता आदिने देखा॥५३-५४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने विष्णुवाक्यवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सती - उपाख्यानमें विष्णुका वचनवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः युद्धमें शिवगणोंसे पराजित हो देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत ब्रह्मोवाच
इन्द्रोऽपि प्रहसन् विष्णुमात्मवादरतं तदा ।
वज्रपाणिः सुरैः सार्धं योद्धुकामोऽभवत्तदा ॥
तदेन्द्रो गजमारूढो बस्तारूढोऽनलस्तथा ।
यमो महिषमारूढो निर्ऋतिः प्रेतमेव च ॥
पाशी च मकरारूढो मृगारूढः सदागतिः ।
कुबेरः पुष्पकारूढः संनद्धोऽभूदतन्द्रितः ॥
तथान्ये सुरसंघाश्च यक्षचारणगुह्यकाः ।
आरुह्य वाहनान्येव स्वानि स्वानि प्रतापिनः ॥
ब्रह्माजी बोले – उस समय [ शिवतत्त्वरूपी ] आत्मवादमें रत विष्णुपर हँसते हुए इन्द्र हाथमें गदा १ धारणकर देवताओंको साथ लेकर [ वीरभद्रसे ] युद्ध करनेके लिये तत्पर हो गये ॥१ ॥
उस समय इन्द्र हाथीपर सवार हो गये, अग्नि २ भेंड़पर सवार हो गये, यम भैंसेपर चढ़ गये और निर्ऋति प्रेतपर सवार हो गये ॥२ ॥
वरुण मकरपर, वायु मृगपर और कुबेर पुष्पक ३ विमानपर आरूढ़ हो आलस्यरहित होकर [ युद्धके लिये ] तैयार हो गये । इसी प्रकार प्रतापी अन्य देवसमूह, यक्ष, चारण तथा गुह्यक भी अपने - अपने ४ । वाहनोंपर आरूढ़ होकर तैयार हो गये॥३-४ ॥
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४६६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६
तेषामुद्योगमालोक्य दक्षश्चासृङ्मुखस्तथा ।
तदन्तिकं समागत्य सकलत्रोऽभ्यभाषत ॥ ५
दक्ष उवाच
युष्मद्बलेनैव मया यज्ञः प्रारंभितो महान् ।
सत्कर्मसिद्धये यूयं प्रमाणाः स्युर्महाप्रभाः ॥ ६
ब्रह्मोवाच
तच्छ्रुत्वा दक्षवचनं सर्वे देवाः सवासवाः ।
निर्ययुस्त्वरितं तत्र युद्धं कर्तुं समुद्यताः ॥ ७
अथ देवगणाः सर्वे युयुधुस्ते बलान्विताः ।
शक्रादयो लोकपाला मोहिताः शिवमायया ॥ ८
देवानां च गणानां च तदासीत्समरो महान् ।
तीक्ष्णतोमरनाराचैर्युयुधुस् परस्परम् ॥ ९
नेदुः शंखाश्च भेर्यश्च तस्मिन् रणमहोत्सवे ।
महादुन्दुभयो नेदुः पटहा डिण्डिमादयः ॥ १०
तेन शब्देन महता श्लाघ्यमानास्तदा सुराः ।
लोकपालैश्च सहिता जघ्नुस्तान् शिवकिंकरान् ॥ ११
इन्द्राद्यैर्लोकपालैश्च गणाः शंभोः पराङ्मुखाः ।
कृताश्च मुनिशार्दूल भृगोर्मन्त्रबलेन च ॥ १२
उच्चाटनं कृतं तेषां भृगुणा यज्वना तदा ।
यजनार्थं च देवानां तुष्ट्यर्थं दीक्षितस्य च ॥ १३
पराजितान् स्वकान् दृष्ट्वा वीरभद्रो रुषान्वितः ।
भूतप्रेतपिशाचांश्च कृत्वा तानेव पृष्ठतः ॥ १४
वृषभस्थान् पुरस्कृत्य स्वयं चैव महाबलः ।
महात्रिशूलमादाय पातयामास निर्जरान् ॥ १५ ।
देवान् यक्षान् साध्यगणान् गुह्यकान् चारणानपि ।
शूलघातैश्च ते सर्वे गणा वेगात् प्रजघ्निरे ॥ १६
|
केचिद् द्विधा कृताः खड्गैर्मुद्गरैश्च विपोथिताः । ।
अन्यैः शस्त्रैरपि सुरा गणैर्भिन्नास्तदाभवन् ॥ १७ ।
उन देवताओंके उद्योगको देखकर रक्तसे सने हुए मुखवाले वे दक्ष अपनी पत्नीके साथ उनके पास जाकर कहने लगे -॥५ ॥
दक्ष बोले— [ हे देवगणो! ] मैंने आपलोगोंके ही बलसे इस यज्ञको प्रारम्भ किया है; क्योंकि महातेजस्वी आपलोग ही सत्कर्मकी सिद्धिके लिये प्रमाण हैं ॥ ६ ॥
ब्रह्माजी बोले- दक्षके उस वचनको सुनकर इन्द्र आदि सभी देवगण युद्ध करनेके लिये तैयार हो निकल पड़े । तदनन्तर समस्त देवगण तथा इन्द्र आदि लोकपाल शिवजीकी मायासे मोहित होकर अपनी-अपनी सेनाओंको साथ लेकर युद्ध करने लगे॥७-८ ॥ उस समय देवताओं तथा शिवगणोंमें महान् युद्ध होने लगा । वे तीखे तोमर तथा बाणोंसे परस्पर युद्ध करने लगे । उस युद्धमहोत्सवमें शंख तथा भेरियाँ बजने लगीं और बड़ी - बड़ी दुन्दुभियाँ, नगाड़े तथा डिण्डिम आदि बजने लगे॥९ -१० ॥ उस महान् शब्दसे उत्साहमें भरे हुए समस्त देवगण लोकपालोंको साथ लेकर उन शिवगणोंको मारने लगे । हे मुनिश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओं एवं लोकपालोंने भृगुके मन्त्रबलके प्रभावसे शिवजीके गणोंको पराङ्मुख कर दिया ॥ ११-१२ ॥ उस समय याज्ञिक भृगुजीने दीक्षा ग्रहण किये हुए दक्षके तथा देवताओंके सन्तोषहेतु और यज्ञकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये उन शिवगणोंका उच्चाटन कर दिया ॥१३ ॥
इस प्रकार अपने गणोंको पराजित देखकर वीरभद्र क्रोधमें भर उठे और भूत, प्रेत तथा पिशाचोंको पीछे करके वे महाबली वीरभद्र बैलपर सवार सभी शिवगणोंको आगे करके स्वयं त्रिशूल लेकर देवताओं गिराने लगे॥१४-१५ ॥ सभी शिवगणों ने भी त्रिशूलके प्रहारोंसे शीघ्रतापूर्व देवताओं, यक्षों, साध्यगणों, गुह्यकों तथा चारणोंको मार डाला । गणोंने तलवारोंसे कुछ देवताओंके दो टुकड़े कर दिये, कुछको मुद्गरोंसे पीट डाला और कुछको घायल कर दिया ॥ १६-१७ ॥
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अ ० ३६ ] रुद्रसंहिता (
एवं पराजिताः सर्वे पलायनपरायणाः ।
परस्परं परित्यज्य गता देवास्त्रिविष्टपम् ॥ १८
केवलं लोकपालास्ते शक्राद्यास्तस्थुरुत्सुकाः ।
सङ्ग्रामे दारुणे तस्मिन् धृत्वा धैर्यं महाबलाः ॥ १ ९
सर्वे मिलित्वा शक्राद्या देवास्तत्र रणाजिरे ।
बृहस्पतिं च च पप्रच्छुर्विनयावनतास्तदा ॥ २०
लोकपाला ऊचुः
गुरो बृहस्पते तात महाप्राज्ञ दयानिधे ।
शीघ्रं वद पृच्छतो नः कुतोऽस्माकं जयो भवेत् ॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां स्मृत्वा शंभुं प्रयत्नवान् ।
बृहस्पतिरुवाचेदं महेन्द्रं ज्ञानदुर्बलम् ॥ २२
बृहस्पतिरुवाच
यदुक्तं विष्णुना पूर्वं तत्सर्वं जातमद्य वै ।
तदेव विवृणोमीन्द्र सावधानतया शृणु ॥ २३
अस्ति यश्चेश्वरः कश्चित् फलदः सर्वकर्मणाम् ।
कर्तारं भजते सोऽपि न स्वकर्तुः प्रभुर्हि सः ॥ २४
न मंत्रौषधयः सर्वे नाभिचारा न लौकिकाः ।
न कर्माणि न वेदाश्च न मीमांसाद्वयं तथा ॥ २५
अन्यान्यपि च शास्त्राणि नानावेदयुतानि च ।
ज्ञातुं नेशं संभवन्ति वदन्त्येवं पुरातनाः ॥ २६
न स्वज्ञेयो महेशानः सर्ववेदायुतेन सः ।
भक्तैरनन्यशरणैर्नान्यथेति महाश्रुतिः ॥ २७
शान्त्या च परया दृष्ट्या सर्वथा निर्विकारया ।
तदनुग्रहतो नूनं ज्ञातव्यो हि सदाशिवः ॥ २८
परं तु संवदिष्यामि कार्याकार्यविवक्षितौ ।
सिद्धयंशं च सुरेशान तं शृणु त्वं हिताय वै ॥ २ ९
त्वमिन्द्र बालिशो भूत्वा लोकपालैः सहाद्य वै । सतीखण्ड ) ४६७ इस प्रकार सभी देवता पराजित होकर भाग चले और एक - दूसरेको रणभूमिमें छोड़कर देवलोकको चले गये । उस अत्यन्त भयानक युद्धमें महाबली इन्द्र आदि लोकपाल ही धैर्य धारण करके उत्साहित होकर खड़े रहे॥१८-१९ ॥ उस समय इन्द्र आदि समस्त देवता एकत्र होकर विनयभावसे युक्त हो उस युद्धस्थलमें बृहस्पतिजीसे पूछने लगे— ॥ २० ॥
लोकपाल बोले- हे गुरो! हे बृहस्पते! हे तात! हे महाप्राज्ञ! हे दयानिधे! शीघ्र बताइये, हमलोग यह पूछते हैं कि हमारी विजय किस प्रकार होगी? ॥ २१ ॥
ब्रह्माजी बोले — उनकी यह बात सुनकर उपायोंको जाननेवाले बृहस्पति शम्भुका स्मरण करके ज्ञानदुर्बल महेन्द्रसे कहने लगे —॥२२ ॥
बृहस्पति बोले – हे इन्द्र! भगवान् विष्णुने पहले जो कहा था, वह सब आज घटित हो गया, मैं उसी बातको कह रहा हूँ, सावधानीपूर्वक सुनिये ॥ २३ ॥
समस्त कर्मोंका फल देनेवाले जो कोई ईश्वर हैं, वे भी अपने कर्ता शिवका भजन करते हैं । वे अपने कर्ताके प्रभु नहीं हैं ॥ २४ ॥
न मन्त्र, न औषधियाँ, न समस्त आभिचारिक कर्म, न लौकिक पुरुष, न कर्म, न वेद, न पूर्वमीमांसा, न उत्तरमीमांसा तथा न अनेक वेदोंसे युक्त अन्यान्य शास्त्र ही ईश्वरको जाननेमें समर्थ होते हैं, ऐसा प्राचीन विद्वान् कहते हैं ॥ २५-२६ ॥ अनन्यशरण भक्तोंको छोड़कर दूसरे लोग सम्पूर्ण वेदोंका दस हजार बार स्वाध्याय करके भी महेश्वरको भलीभाँति नहीं जान सकते - यह महाश्रुति है । भगवान् सदाशिवके अनुग्रहसे ही सर्वथा शान्त, निर्विकार एवं उत्तम दृष्टिसे उनको जाना जा सकता है ॥ २७-२८ ॥ तब भी हे सुरेश्वर! उचित - अनुचित कार्यके निर्णयमें सबके कल्याणके लिये सिद्धिके उत्तम अंशका प्रतिपादन करूँगा, आप उसे सुनिये । हे इन्द्र! आप लोकपालोंके साथ नादान बनकर इस समय दक्षयज्ञमें आ गये, किंतु आप कौन - सा पराक्रम आगतो दक्षयज्ञं हि किं करिष्यसि विक्रमम् ॥ ३० करेंगे? ॥ २ ९ -३० ॥
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४६८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६
एते रुद्रसहायाश्च गणाः परमकोपनाः ।
आगता यज्ञविघ्नार्थं तं करिष्यन्त्यसंशयम् ॥ ३१
सर्वथा न ह्युपायोऽत्र केषांचिदपि तत्त्वतः ।
यज्ञविघ्नविनाशार्थं सत्यं सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३२
ब्रह्मोवाच
एवं बृहस्पतेर्वाक्यं श्रुत्वा ते हि दिवौकसः ।
चिंतामापेदिरे सर्वे लोकपालाः सवासवाः ॥३३
ततोऽब्रवीद् वीरभद्रो महावीरगणैर्वृतः ।
इन्द्रादीन् लोकपालांस्तान् स्मृत्वा मनसि शंकरम् ॥ ३४
वीरभद्र उवाच
सर्वे यूयं बालिशत्वादवदानार्थमागताः ।
अवदानं प्रयच्छामि आगच्छत ममान्तिकम् ॥ ३५
हे शक्र हे शुचे भानो हे शशिन् हे धनाधिप ।
हे पाशपाणे हे वायो निर्ऋते यम शेष हे ॥ ३६
हे सुरासुरसंघा हीहैत यूयं विचक्षणाः ।
अवदानानि दास्यामि आतृप्त्याद्यासतां वरान् ॥ ३७
ब्रह्मोवाच एवमुक्त्वा सितैर्बाणैर्जघानाथ रुषान्वितः ।
निखिलांस्तान् सुरान् सद्यो वीरभद्रो गणाग्रणीः ।
तैर्बाणैर्निहताः सर्वे वासवाद्याः सुरेश्वराः ॥ ३८
पलायनपरा भूत्वा जग्मुस्ते च दिशो दश ।
गतेषु लोकपालेषु विद्रुतेषु सुरेषु च ।
यज्ञवाटोपकंठे हि वीरभद्रोऽगमद् गणैः ॥ ३ ९
तदा ते ऋषयः सर्वे सुभीता हि रमेश्वरम् ।
विज्ञप्तुकामाः सहसा शीघ्रमूचुर्नता भृशम् ॥ ४०
ऋषय ऊचुः |
देवदेव रमानाथ सर्वेश्वर महाप्रभो ।
रक्ष यज्ञं हि दक्षस्य यज्ञोऽसि त्वं न संशयः ॥ ४१
यज्ञकर्मा यज्ञरूपो यज्ञाङ्गो यज्ञरक्षकः ।
रक्ष यज्ञमतो रक्ष त्वत्तोऽन्यो न हि रक्षकः ॥ ४२ ।
भगवान् रुद्रके सहायक ये गण अत्यन्त कुपित होकर यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हैं, ये अवश्य ही उसे करेंगे ॥३१ ॥
मैं यह सत्य -सत्य कह रहा हूँ कि इस यज्ञमें विघ्ननिवारणके लिये वस्तुतः किसीके भी पास सर्वथा कोई उपाय नहीं है ॥ ३२ ॥
ब्रह्माजी बोले — बृहस्पतिकी इस बातको सुनकर स्वर्गमें रहनेवाले इन्द्रसहित वे समस्त लोकपाल चिन्तामें पड़ गये । तब महावीर गणोंसे घिरे हुए वीरभद्र मन-ही - मन भगवान् शंकरका स्मरण करके उन इन्द्र आदि लोकपालोंसे कहने लगे — ॥३३-३४ ॥ वीरभद्र बोले — आपलोग मूर्खताके कारण ही [ इस यज्ञमें ] अपना - अपना भाग लेनेके लिये आये हैं । अतः मेरे समीप आइये, मैं आपलोगोंको यज्ञका फल देता हूँ ॥ ३५ ॥
हे शक्र! हे अग्ने! हे सूर्य! हे चन्द्र! हे कुबेर! हे यम! हे वरुण! हे वायो! बुद्धिमान् देव तथा राक्षसगण मैं आपलोगोंको तृप्त करनेके करूँगा ॥ ३६-३७ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस श्रेष्ठ वीरभद्रने क्रोधमें भरकर देवताओंको शीघ्र ही घायल हे निर्ऋते! हे शेष! हे ! आपलोग इधर आइये, लिये इसका फल प्रदान प्रकार कहकर गणोंमें तीक्ष्ण बाणोंसे उन सभी कर दिया । उन बाणोंसे घायल होकर इन्द्र आदि वे समस्त सुरेश्वर भागकर दसों दिशाओंमें चले गये । लोकपालोंके चले जानेपर और देवताओंके भाग जानेपर वीरभद्र गणोंके साथ यज्ञशालाके समीप पहुँचे ॥ ३८-३९ ॥ उस समय वहाँ उपस्थित समस्त ऋषि अत्यन्त भयभीत होकर रमापति श्रीहरिसे [ रक्षाकी ] प्रार्थना करनेके लिये सहसा विनम्र हो शीघ्र कहने लगे - ॥ ४० ॥
ऋषिगण बोले — हे देवदेव! हे रमानाथ! हे सर्वेश्वर! हे महाप्रभो! दक्षके यज्ञकी रक्षा कीजिये, । आप यज्ञस्वरूप हैं, इसमें संशय नहीं है । आप ही यज्ञ करनेवाले, यज्ञरूप, यज्ञके अंग और यज्ञके रक्षक हैं, अतः यज्ञकी रक्षा कीजिये - रक्षा कीजिये, आपके अतिरिक्त कोई दूसरा रक्षक नहीं है॥४१-४२ ॥