श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 461–470
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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अ ० ३१ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४४ ९
ततः कृतः कथं नो वै स्वपुत्र्यास्त्वादरः परः ।
समागतायाः सत्याश्च मङ्गलाया गृहं स्वतः ॥ ५
सतीभवौ नार्चितौ हि किमिदं ज्ञानदुर्बल ।
ब्रह्मपुत्र इति वृथा गर्वितोऽसि विमोहितः ॥ ६
सा सत्येव सदाराध्या सर्वपुण्यफलप्रदा ।
त्रिलोकमाता कल्याणी शंकरार्धाङ्गभागिनी ॥ ७
सा सत्येवार्चिता नित्यं सर्वसौभाग्यदायिनी ।
माहेश्वरी स्वभक्तानां सर्वमङ्गलदायिनी ॥ ८
सा सत्येवार्चिता नित्यं संसारभयनाशिनी ।
मनोऽभीष्टप्रदा देवी सर्वोपद्रवहारिणी ॥ ९
सा सत्येवार्चिता नित्यं कीर्तिसंपत्प्रदायिनी ।
परमा परमेशानी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥ १०
सा सत्येव जगद्धात्री जगद्रक्षणकारिणी ।
अनादिशक्तिः कल्पान्ते जगत्संहारकारिणी ॥ ११
सा सत्येव जगन्माता विष्णुमाता विलासिनी ।
ब्रह्मेन्द्रचन्द्रवह्न्यर्कदेवादिजननी स्मृता ॥१२
सा सत्येव तपोधर्मदानादिफलदायिनी ।
शंभुशक्तिर्महादेवी दुष्टहन्त्री परात्परा ॥ १३
ईदृग्विधा सती देवी यस्य पत्नी सदा प्रिया ।
तस्मै भागो न दत्तस्ते मूढेन कुविचारिणा ॥ १४
शंभुर्हि परमेशानः सर्वस्वामी परात्परः ।
विष्णुब्रह्मादिसंसेव्यः सर्वकल्याणकारकः ॥ १५
तप्यते हि तपः सिद्धैरैतद्दर्शनकांक्षिभिः ।
युज्य योगिभिर्योगैरेतद्दर्शनकांक्षिभिः ॥ १६
अनन्तधनधान्यानां यागादीनां तथैव च ।
दर्शनं शंकरस्यैव महत्फलमुदाहृतम् ॥ १७
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_16_1_Front इसके अनन्तर तुमने अपने घरमें स्वतः आयी हुई अपनी मंगलमयी पुत्री सतीका विशेष आदर क्यों नहीं किया? ॥ ५ ॥
हे ज्ञानदुर्बल! तुमने सती और महादेवजीकी पूजा नहीं की, यह तुमने क्या किया? मैं ब्रह्माजीका पुत्र हूँ - ऐसा समझकर विमोहमें पड़कर तुम व्यर्थ ही घमण्डमें भरे हुए हो ॥ ६ ॥
वे सती सदा आराधना करनेके योग्य, समस्त पुण्योंका फल देनेवाली, तीनों लोकोंकी माता, कल्याण-स्वरूपा और शंकरके आधे अंगमें निवास करनेवाली हैं । वे माहेश्वरी सती देवी पूजित होनेपर सदा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाली और अपने भक्तोंको सब प्रकारके मंगल देनेवाली हैं । वे सती देवी ही पूजित होनेपर सदा संसारका भय दूर करनेवाली, मनोवांछित फल देनेवाली हैं और समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेवाली हैं ॥७ – ९ ॥ वे परमा परमेश्वरी सती ही पूजित होनेपर सदा कीर्ति, भोग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं । वे सती ही इस जगत्को जन्म देनेवाली माता, जगत्की रक्षा करनेवाली, अनादि शक्ति और कल्पके अन्तमें जगत्का संहार करनेवाली हैं॥१०-११ ॥ वे सती ही जगत्की माता, भगवान् विष्णुकी माता, विलासिनी तथा ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र, अग्नि एवं सूर्य आदिकी जननी मानी गयी हैं । वे सती ही तपस्या, धर्म तथा दान आदिका फल देनेवाली, | शम्भुशक्ति, महादेवी, दुष्टोंका हनन करनेवाली और परात्पर शक्ति हैं॥१२-१३ ॥ ऐसी सती देवी जिनकी सदा प्रिय भार्या हैं, उन शिवको दुष्ट विचारवाले मूढ़ तुमने यज्ञ - भाग नहीं दिया । भगवान् शिव ही परमेश्वर, सबके स्वामी, परात्पर, ब्रह्मा - विष्णु आदिके द्वारा सम्यक् सेव्य हैं और सबका कल्याण करनेवाले हैं ॥ १४-१५ ॥ इन्हींके दर्शनकी इच्छावाले सिद्ध पुरुष तपस्या करते हैं और इन्हींके दर्शनकी इच्छावाले योगीजन योगसाधनामें प्रवृत्त होते हैं । अनन्त धनधान्य और यज्ञ आदिका सबसे महान् फल शंकरका दर्शन ही | कहा गया है ॥ १६-१७ ॥
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४५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ शिव एव जगद्धाता सर्वविद्यापतिः प्रभुः । शिवजी ही जगत्का धारण - पोषण करनेवाले आदिविद्यावरस्वामी सर्वमङ्गलमङ्गलः ॥ १८ विद्याओंके पति, सब कुछ करनेमें समर्थ, आदि, विद्याके समस्त श्रेष्ठ स्वामी और समस्त मंगलोंके मंगल हैं । हे तच्छक्तेर्न कृतो यस्मात्सत्कारोऽद्य त्वया खल । | तुमने उनकी शक्तिका आज सत्कार नहीं किया खल! अत एवाध्वरस्यास्य विनाशो हि भविष्यति ॥ १ ९ अवश्य ही इस यज्ञका विनाश हो जायगा ॥, १८-१९ इसलिये ॥ अमङ्गलं भवत्येव पूजार्हाणामपूजया पूज्यमाना च नासौ हि यतः पूज्यतमा शिवा सहस्त्रेणापि शिरसां शेषो यत्पादजं रजः वहत्यहरहः प्रीत्या तस्य शक्तिः शिवा सती यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम् विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नस्तस्य शंभोः प्रिया सती यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम् ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नस्तस्य शंभो: प्रिया सती
यत्पादपद्ममनिशं ध्यात्वा संपूज्य सादरम् ।
इन्द्रादयो लोकपालाः प्रापुः स्वं स्वं परं पदम् ॥
जगत्पिता शिवः शक्तिर्जगन्माता च सा सती ।
सत्कृतौ न त्वया मूढ कथं श्रेयो भविष्यति ॥
दौर्भाग्यं त्वयि संक्रान्तं संक्रान्तास्त्वयि चापदः ।
यौ चानाराधितौ भक्त्या भवानीशंकरौ च तौ ॥
अनभ्यर्च्य शिवं शंभुं कल्याणं प्राप्नुयामिति ।
किमस्ति गर्वो दुर्वारः स गर्वोऽद्य विनश्यति ॥
सर्वेशविमुखो भूत्वा देवेष्वेतेषु कस्तव ।
करिष्यति सहायं तं न ते पश्यामि सर्वथा ॥
यदि देवाः करिष्यन्ति साहाय्यमधुना तव ।
तदा नाशं समाप्स्यन्ति शलभा इव वह्निना ॥
ज्वलत्वद्य मुखं ते वै यज्ञध्वंसो भवत्विति ।
सहायास्तव यावन्तस्ते ज्वलन्त्वद्य सत्वरम् ॥
अमराणां च सर्वेषां शपथोऽमङ्गलाय ते ।
करिष्यत्यद्य साहाय्यं यदेतस्य दुरात्मनः ॥
। पूजनीय व्यक्तियोंकी पूजा न करनेसे अमंगल ॥ २० होता है । क्या परम पूजनीया वे शिवा तुम्हारी पूजाके योग्य नहीं थीं? शेषनाग अपने हजार मस्तकोंसे । प्रतिदिन जिनकी चरणरजको प्रेमपूर्वक धारण करते ॥ २१ हैं, उन्हीं शिवकी शक्ति ये शिवा सती हैं ॥ २०-२१ ॥ । जिनके चरणकमलोंका आदरपूर्वक ध्यान और ॥ २२ पूजनकर विष्णु विष्णुत्वको प्राप्त हो गये, उन्हीं शिवकी पत्नी सती हैं ॥२२ ॥
। जिनके चरणकमलोंका ध्यान एवं पूजनकर ॥ २३ ब्रह्माजी ब्रह्मत्वको प्राप्त हो गये और जिनके चरण-कमलोंका आदरपूर्वक निरन्तर ध्यान एवं पूजन करके इन्द्र आदि लोकपालोंने अपने - अपने उत्तम पदको प्राप्त २४ किया है, उन्हीं शिवकी पत्नी सती हैं ॥ २३-२४ ॥ भगवान् शिव [ सम्पूर्ण ] जगत्के पिता हैं और २५ शक्तिरूपा देवी सती जगन्माता कही गयी हैं । हे मूढ़! तुमने उनका सत्कार नहीं किया, तुम्हारा कल्याण कैसे होगा? तुम्हारे ऊपर दुर्भाग्यका आक्रमण हो गया है और २६ विपत्तियाँ टूट पड़ी हैं; क्योंकि तुमने भक्तिपूर्वक उन भवानी और शंकरकी आराधना नहीं की ॥ २५-२६ ॥ कल्याणकारी शिवजीका पूजन - अर्चन न करके २७ मैं कल्याण प्राप्त कर लूँगा; यह कैसा गर्व है? वह तुम्हारा दुर्वार गर्व आज विनष्ट हो जायगा ॥ २७ ॥
इन देवताओंमें कौन ऐसा है, जो सर्वेश्वर शिवसे २८ विमुख होकर तुम्हारी सहायता करेगा, मुझे तो ऐसा कोई दिखायी नहीं दे रहा है । यदि देवता इस समय २ ९ तुम्हारी सहायता करेंगे तो जलती हुई आगसे खेलनेवाले । पतिंगोंके समान वे नाशको ही प्राप्त होंगे ॥ २८-२९ ॥ आज तुम्हारा मुख जल जाय, तुम्हारे यज्ञका नाश ३० हो जाय और जितने तुम्हारे सहायक हैं, वे भी आज शीघ्र ही भस्म हो जायँ । जो आज इस दुरात्मा दक्षक सहायता करेंगे; उन समस्त देवताओंके लिये शपथ है कि ३१ । उनका कर्म तुझ दक्षके अमंगलके लिये हो ॥ ३०-३१ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_16_1_Back
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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५१
निर्गच्छन्त्वमराः स्वोकमेतदध्वरमंडपात् ।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥
निर्गच्छन्त्वपरे सर्वे मुनिनागादयो मखात् ।
अन्यथा भवतां नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥
निर्गच्छ त्वं हरे शीघ्रमेतदध्वरमंडपात् ।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥
निर्गच्छ त्वं विधे शीघ्रमेतदध्वरमंडपात् ।
अन्यथा भवतो नाशो भविष्यत्यद्य सर्वथा ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वाध्वरशालायामखिलायां सुसंस्थितान् ।
व्यरमत्सा नभोवाणी सर्वकल्याणकारिणी ॥
तच्छ्रुत्वा व्योमवचनं सर्वे हर्यादयः सुराः ।
अकार्षुर्विस्मयं तात मुनयश्च तथा परे ॥
समस्त देवता आज इस यज्ञमण्डपसे निकलकर ३२ अपने - अपने स्थानको चले जायँ, अन्यथा आपलोगोंका सब प्रकारसे नाश हो जायगा । अन्य सब मुनि और नाग आदि भी इस यज्ञसे निकल जायँ, अन्यथा आज ३३ आपलोगोंका सर्वथा नाश हो जायगा॥३२-३३ ॥ हे विष्णु! आप इस यज्ञमण्डपसे शीघ्र निकल ३४ जायँ, अन्यथा आज आपका सर्वथा नाश हो जायगा । हे विधाता! आप भी इस यज्ञमण्डपसे शीघ्र निकल जाइये, अन्यथा आज आपका सर्वथा नाश हो ३५ जायगा ॥ ३४-३५ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] सम्पूर्ण यज्ञशालामें बैठे हुए लोगों से ऐसा कहकर सबका कल्याण ३६ करनेवाली आकाशवाणी मौन हो गयी । हे तात! इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर विष्णु आदि सभी देवता तथा अन्य मुनि आदि सभी लोग आश्चर्यचकित ३७ | हो गये ॥ ३६-३७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे सत्युपाख्याने नभोवाणीवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें सती - उपाख्यानमें आकाशवाणीका वर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः सतीके दग्ध होनेका समाचार सुनकर महाकालीको प्रकट करके नारद उवाच
श्रुत्वा व्योमगिरं दक्षः किमकार्षीत्तदाबुधः ।
अन्ये च कृतवन्तः किं ततश्च किमभूद् वद ॥
पराजिताः शिवगणा भृगुमंत्रबलेन वै ।
किमकार्षुः कुत्र गतास्तत्त्वं वद महामते ॥
ब्रह्मोवाच श्रुत्वा व्योमगिरं सर्वे विस्मिताश्च सुरादयः । नावोचत्किंचिदपि ते तिष्ठन्तस्तु विमोहिताः पलायमाना ये वीरा भृगुमंत्रबलेन ते । अवशिष्टाः शिवगणाः शिवं शरणमाययुः कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और उन्हें यज्ञ - विध्वंस करनेकी आज्ञा देना नारदजी बोले - [ हे ब्रह्मन्! ] आकाशवाणीको सुनकर अज्ञानी दक्षने क्या किया तथा अन्य उपस्थित १ लोगोंने क्या किया और उसके बाद क्या हुआ? इसे बताइये ॥ १ ॥
हे महामते! भृगुजीके मन्त्रबलसे पराजित होकर शिवजीके गणोंने क्या किया तथा वे कहाँ गये — यह सब आप मुझसे कहिये ॥२ ॥
ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] आकाशवाणी सुनकर समस्त देवता आदि आश्चर्यचकित हो गये, ॥ ३ वे मोहित होकर [ जहाँ - तहाँ ] खड़े हो गये और कुछ भी न बोल सके । भृगुजीके मन्त्रबलसे जो वीर शिवगण बच गये थे, वे भागते हुए शिवकी शरणमें ॥ ४ गये ॥ ३-४ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_16_2_Front
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४५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ सर्वं निवेदयामासू रुद्रायामिततेजसे । वे महातेजस्वी शिवजीको आदरपूर्वक चरित्रं च तथाभूत सुप्रणम्यादराच्च ते ॥ ५ करके जो चरित्र हुआ था, वह सब बताने लगे प्रणाम गणा ऊचुः गण बोले – हे देवदेव! हे महादेव! शरणमें ॥५ ॥
देवदेव महादेव पाहि नः शरणागतान् । । आये हुए हमलोगोंकी रक्षा कीजिये और हे संशृण्वादरतो नाथ सतीवार्तां च विस्तरात् ॥ ६ आदरपूर्वक सतीजीका चरित्र विस्तारसे सुनिये ॥६ नाथ! ॥ गर्वितेन महेशान दक्षेण सुदुरात्मना अपमानः कृतः सत्यानादरो निर्जरैस्तथा तुभ्यं भागमदान्नो स देवेभ्यश्च प्रदत्तवान् दुर्वचांस्यवदत्प्रोच्चैर्दुष्टो दक्षः सुगर्वितः
ततो दृष्ट्वा न ते भागं यज्ञेऽकुप्यत्सती प्रभो ।
विनिंद्य बहुशस्तातमधाक्षीत्स्वतनुं तदा ॥
गणास्त्वयुतसंख्याका मृतास्तत्र विलज्जया ।
स्वाङ्गान्याच्छिद्य शस्त्रैश्च क्रुध्याम ह्यपरे वयम् ॥
तद्यज्ञं ध्वंसितुं वेगात्सन्नद्धास्तु भयावहाः ।
तिरस्कृता हि भृगुणा स्वप्रभावाद्विरोधिना ॥
ते वयं शरणं प्राप्तास्तव विश्वंभर प्रभो ।
निर्भयान् कुरु नस्तस्माद् दयमान भवाद्भयात् ॥
अपमानं विशेषेण तस्मिन् यज्ञे महाप्रभो ।
दक्षाद्यास्तेऽखिला दुष्टा अकुर्वन् गर्विता अति ॥
इत्युक्तं निखिलं वृत्तं स्वेषां सत्याश्च शङ्कर ।
तेषां च मूढबुद्धीनां यथेच्छसि तथा कुरु ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य स्वगणानां वचः प्रभुः ।
सस्मार नारदं सर्वं ज्ञातुं तच्चरितं लघु ॥
आगतस्त्वं द्रुतं तत्र देवर्षे दिव्यदर्शनः ॥ हे महेश्वर! अभिमानसे युक्त दुरात्मा दक्षने तथा ॥ ७ देवताओंने सतीका अपमान तथा अनादर किया ॥७ ॥
। महाभिमानी दुष्ट दक्षने [ अपने यज्ञमें ] आपको ॥ ८ भाग नहीं दिया । देवताओंको भाग दिया, किंतु [ आपके विषयमें ] उच्च स्वरसे दुर्वचन भी कहा ॥ ८ ॥
हे प्रभो! उसके बाद यज्ञमें आपका भाग न ९ देखकर सतीजी कुपित हो गयीं और उन्होंने अपने पिताकी बार - बार निन्दा करके [ योगमार्गका अवलम्बनकर ] अपने शरीरको भस्म कर लिया । १० [ यह देखकर ] दस हजार गण लज्जावश शस्त्रोंसे अपने अंगोंको काटकर वहीं मर गये, [ बचे हुए ] हमलोग दक्षपर कुपित हो उठे॥९ -१० ॥ हमलोग भयानक रूप धारणकर वेगपूर्वक यज्ञका ११ विध्वंस करनेको उद्यत हो गये, परंतु विरोधी भृगुने अपने मन्त्रबलके प्रभावसे हमारा तिरस्कार कर दिया ॥ ११ ॥
हे विश्वम्भर! हे प्रभो! अब हमलोग आपकी १२ शरणमें आये हुए हैं, आप [ हमारे ऊपर ] दया करते हुए इस उत्पन्न भयसे हमलोगोंको निर्भय कीजिये ॥ १२ ॥
हे महाप्रभो! दक्ष आदि सभी दुष्टोंने अत्यन्त १३ गर्वित होकर उस यज्ञमें आपका बहुत अपमान किया है ॥१३ ॥
हे शंकर! इस प्रकार हमने अपना, सतीका और १४ उन मूर्खोका सारा वृत्तान्त आपसे कह दिया, अब आप जैसा चाहते हों, वैसा कीजिये ॥ १४ ॥
ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] अपने गणोंका यह वचन सुनकर प्रभु शिवने उनका सम्पूर्ण चरित्र १५ जाननेके लिये शीघ्रतापूर्वक आप नारदका स्मरण किया ॥ १५ ॥
हे देवर्षे! [ भगवान्के स्मरण करनेपर ] दिव्य | दर्शनवाले आप वहाँ शीघ्रतासे पहँच गये और | भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर शिवजीको वहाँ प्रणम्य शंकरं भक्त्या साञ्जलिस्तत्र तस्थिवान् ॥ १६ । खड़े हो गये ॥ १६ ॥ प्रणामकर
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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५३ त्वां प्रशस्याथ स स्वामी सत्या वार्तां च पृष्टवान् । उसके बाद स्वामी शंकरजीने आपकी प्रशंसा करके दक्षयज्ञगताया वै परं च चरितं तथा ॥ १७ दक्षयज्ञमें गयी हुई सतीका समाचार एवं अन्य दूसरी
पृष्टेन शंभुना तात त्वयाश्वेव शिवात्मना ।
तत्सर्वं कथितं वृत्तं जातं दक्षाध्वरे हि यत् ॥ १८
तदाकर्ण्येश्वरो वाक्यं मुने तत् त्वन्मुखोदितम् ।
रुद्रो महारौद्रपराक्रमः ॥ १ ९
उत्पाट्यैकां जटां रुद्रो लोकसंहारकारकः ।
आस्फालयामास रुषा पर्वतस्य तदोपरि ॥ २०
तोदनाच्च द्विधा भूता सा जटा च मुने प्रभोः ।
संबभूव महारावो महाप्रलयभीषणः ॥ २१
तज्जटायाः समुद्भूतो वीरभद्रो महाबलः ।
पूर्वभागेन देवर्षे महाभीमो गणाग्रणीः ॥ २२
स भूमिं विश्वतो वृत्य चात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ।
प्रलयानलसंकाशः प्रोन्नतो दो: सहस्त्रवान् ॥ २३
कोपनि: I श्वासतस्तत्र महारुद्रस्य चेशितुः ।
जातं ज्वराणां शतकं संनिपातास्त्रयोदश ॥ २४
महाकाली समुत्पन्ना तज्जटापरभागतः ।
महाभयंकरा तात भूतकोटिभिरावृता ॥ २५
सर्वे मूर्तिधराः क्रूराः ज्वरा लोकभयंकराः ।
स्वतेजसा प्रज्वलंतो दहंत इव सर्वतः ॥ २६
अथ वीरो वीरभद्रः प्रणम्य परमेश्वरम् ।
कृताञ्जलिपुटः प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २७
वीरभद्र उवाच
महारुद्र महारौद्र सोमसूर्याग्निलोचन ।
किं कर्तव्यं मया कार्यं शीघ्रमाज्ञापय प्रभो ॥ २८
शोषणीयाः किमीशान क्षणार्धेनैव सिंधवः ।
पेषणीयाः किमीशान क्षणार्धेनैव पर्वताः ॥२ ९
क्षणेन भस्मसात्कुर्यां ब्रह्मांडमुत किं हर ।
क्षणेन भस्मसात्कुर्यां सुरान्वा किं मुनीश्वरान् ॥ ३०
व्याश्वासः सर्वलोकानां किमु कार्यो हि शंकर ।
कर्तव्यं किमुतेशान सर्वप्राणिविहिंसनम् ॥ ३१
घटनाओंके सम्बन्धमें पूछा । हे नारद! शिवजीके पूछनेपर शिवस्वरूप आपने शीघ्र ही जो कुछ भी दक्षयज्ञमें घटित हुआ था, वह सब समाचार कह दिया ॥ १७-१८ ॥ हे मुने! आपके मुखसे कही हुई बातको सुनकर महारौद्रपराक्रमी भगवान् शंकर शीघ्र ही अत्यन्त क्रोधित हो उठे । लोकका संहार करनेवाले रुद्रने उसी समय एक जटा उखाड़कर क्रोधसे उसे पर्वतके ऊपर पटक दिया ॥ १ ९ -२० ॥ हे मुने! भगवान् शंकरद्वारा जटा पटके जानेके फलस्वरूप वह जटा दो टुकड़ोंमें विभक्त हो गयी और उससे महान् प्रलयंकारी भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ ॥ २१ ॥
हे देवर्षे! उस जटाके पूर्वभागसे महाभयंकर, महाबली सभी गणोंमें अग्रणी वीरभद्र उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥
वे चारों ओरसे पृथिवीको घेरकर दस अंगुलपर्यन्त पृथिवीसे ऊपर स्थित हो गये । वे प्रलयाग्निके समान थे और एक हजार भुजाओंसे युक्त थे ॥२३ ॥
उन महारुद्र महेश्वरके क्रोधयुक्त निःश्वाससे सौ प्रकारके ज्वर तथा तेरह सन्निपात उत्पन्न हुए ॥ २४ ॥
हे तात! उस जटाके दूसरे भागसे महाकाली उत्पन्न हुईं, जो बड़ी भयंकर थीं और करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई थीं ॥२५ ॥
मूर्तिधारी वे सभी ज्वर क्रूर तथा संसारको भयभीत करनेवाले थे और अपने तेजसे ऐसे प्रज्वलित हो रहे थे, मानो सबको जला देंगे ॥ २६ ॥
तदनन्तर वाक्यविशारद महावीर वीरभद्र हाथ जोड़कर शिवजीको प्रणाम करके कहने लगे— ॥ २७ ॥
वीरभद्र बोले - हे महारुद्र! हे महारौद्र! सूर्य, सोम तथा अग्निरूप नेत्रवाले हे प्रभो! मैं कौन - सा कार्य करूँ? शीघ्र ही आज्ञा प्रदान कीजिये ॥२८ ॥
हे ईशान! क्या मैं आधे ही क्षणमें समुद्रोंको सुखा दूँ अथवा हे ईशान! क्या आधे ही क्षणमें पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँ अथवा हे हर! क्या मैं क्षणभरमें सारे ब्रह्माण्डको भस्म कर दूँ अथवा क्या मैं क्षणभरमें देवताओं एवं मुनीश्वरोंको भस्म कर दूँ अथवा हे शंकर! क्या मैं सभी लोगोंका श्वास रोक दूँ अथवा हे ईशान! क्या मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश कर डालूँ? ॥ २ ९ -३१ ॥
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४५४ ममाशक्यं न कुत्रापि त्वत्प्रसादान्महेश्वर पराक्रमेण मत्तुल्यो न भूतो न भविष्यति यत्र यत्कार्यमुद्दिश्य प्रेषयिष्यसि मां प्रभो तत्कार्यं साधयाम्येव सत्वरं त्वत्प्रसादतः क्षुद्रास्तरंति लोकाब्धिं शासनाच्छंकरस्य ते हरातोऽहं न किं तर्तुं महापत्सागरं क्षमः त्वत्प्रेषिततृणेनापि महत्कार्यमयत्नतः । श्रीशिवमहापुराण । हे महेश्वर! आपकी कृपासे कोई ॥ ३२ नहीं है, जो मैं न कर सकूँ, पराक्रममें तो कोई हुआ है और न तो होगा ॥ । हे प्रभो! आप मुझे जिस कार्यके ॥ ३३ भेजेंगे, मैं आपकी कृपासे उस कार्यको करूँगा ॥३३ ॥
। हे हर! आप शिवकी आज्ञासे क्षुद्रजन [ अ ० ३२ भी कार्य ऐसा मेरे समान न ३२ ॥ लिये जहाँ भी शीघ्र ही सिद्ध भी इस संसार-॥ ३४ सागरको पार कर जाते हैं, तो क्या मैं इस महान् विपत्तिरूपी समुद्रको पार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता? ॥ ३४ ॥
हे शंकर! आपके द्वारा भेजे गये तृणसे भी क्षणेन शक्यते कर्तुं शंकरात्र न संशयः ॥ ३५ क्षणमात्रमें ही बिना प्रयत्नके बहुत बड़ा कार्य किया
लीलामात्रेण ते शंभो कार्यं यद्यपि सिध्यति ।
तथाप्यहं प्रेषणीयो तवैवानुग्रहो ह्ययम् ॥
शक्तिरेतादृशी शंभो ममापि त्वदनुग्रहात् ।
विना शक्तिर्न कस्यापि शंकर त्वदनुग्रहात् ॥
त्वदाज्ञया विना कोऽपि तृणादीनपि वस्तुतः ।
नैव चालयितुं शक्तः सत्यमेतन्न संशयः ॥
शंभो नियम्याः सर्वेऽपि देवाद्यास्ते महेश्वर ।
तथैवाहं नियम्यस्ते नियन्तुः सर्वदेहिनाम् ॥
प्रणतोऽस्मि महादेव भूयोऽपि प्रणतोऽस्म्यहम् ।
प्रेषय स्वेष्टसिद्ध्यर्थं मामद्य हर सत्वरम् ॥
स्पंदोऽपि जायते शंभोऽसव्याङ्गानां मुहुर्मुहुः ।
भविष्यत्यद्य विजयो मामतः प्रेषय प्रभो ॥
हर्षोत्साहविशेषोऽपि जायते मम कश्चन ।
जा सकता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५ ॥
हे शम्भो! यद्यपि सारा कार्य आपके लीलामात्रसे ३६ ही सिद्ध हो सकता है, फिर भी यदि आप मुझे भेज दें, तो यह आपकी [ बहुत बड़ी ] कृपा होगी ॥ ३६ ॥
हे शम्भो! हे शंकर! आपकी कृपासे मुझमें ऐसी ३७ शक्ति है, जैसी कि आपकी कृपाके बिना अन्य किसीमें भी नहीं हो सकती ॥३७ ॥
आपकी कृपाके बिना कोई एक तृण भी ३८ हिलानेमें समर्थ नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८ ॥
हे शम्भो! हे महेश्वर! सभी देवता आपके ३ ९ नियन्त्रणमें हैं, उसी प्रकार मैं भी समस्त प्राणियोंके नियामक आपके नियन्त्रणमें ही हूँ ॥३ ९ ॥ हे महादेव! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, मैं ४० बारम्बार प्रणाम करता हूँ । हे हर! आज मुझे अपनी इष्टसिद्धिके लिये आप शीघ्र ही भेजिये ॥ ४० ॥
हे शम्भो! मेरे दाहिने अंगोंमें बार - बार स्पन्दन ४१ हो रहा है । हे प्रभो! आज मेरी विजय होगी । अतः आप मुझे भेजिये ॥ ४१ ॥
हे शम्भो! इस समय मुझे विशेष हर्ष तथा शंभो त्वत्पादकमले संसक्तश्च मनो मम ॥ ४२ उत्साह हो रहा है और मेरा मन आपके चरणकमलमें भविष्यति प्रतिपदं शुभसंतानसंततिः लगा हुआ है । अतः पग - पगपर [ मेरे लिये ] शुभ ॥ ४३ परिणामका विस्तार होगा ॥ ४२-४३ ॥ तस्यैव विजयो नित्यं तस्यैव हे शम्भो! उत्तम आश्रय - स्वरूप आप शिवमें यस्य शुभमन्वहम् । । जिसकी सुदृढ़ भक्ति है, उसीकी सदा विजय होती है शंभो दृढा भक्तिस्त्वयि शोभनसंश्रये ॥ ४४ | और उसीका प्रतिदिन कल्याण होता है ॥ ४४ ॥
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अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५५ ब्रह्मोवाच
इत्युक्तं तद्वचः श्रुत्वा संतुष्टो मङ्गलापतिः ।
वीरभद्र जयेति त्वं प्रोक्ताशीः प्राह तं पुनः ॥ ४५
महेश्वर उवाच
शृणु मद्वचनं तात वीरभद्र सुचेतसा ।
करणीयं प्रयत्नेन तद् द्रुतं मे प्रतोषकम् ॥ ४६
यागं कर्तुं समुद्युक्तो दक्षो विधिसुतः खलः ।
मद्विरोधी विशेषेण महागर्वोऽबुधोऽधुना ॥ ४७
तन्मखं भस्मसात्कृत्वा सयागपरिवारकम् ।
पुनरायाहि मत्स्थानं सत्वरं गणसत्तम ॥ ४८
सुरा भवन्तु गंधर्वा यक्षा वान्ये च केचन ।
तानप्यद्यैव सहसा भस्मसात्कुरु सत्वरम् ॥ ४ ९
तत्रास्तु विष्णुर्ब्रह्मा वा शचीशो वा यमोऽपि वा ।
अपि चाद्यैव तान्सर्वान्पातयस्व प्रयत्नतः ॥ ५०
सुरा भवन्तु गंधर्वा यक्षा वान्ये च केचन ।
तानप्यद्यैव सहसा भस्मसात्कुरु सत्वरम् ॥५१
दधीचिकृतमुल्लंघ्य शपथं मयि तत्र ये ।
तिष्ठन्ति ते प्रयत्नेन ज्वालनीयास्त्वया ध्रुवम् ॥ ५२
प्रमथाश्चागमिष्यन्ति यदि विष्ण्वादयो भ्रमात् ।
नानाकर्षणमंत्रेण ज्वालयानीय सत्वरम् ॥ ५३
ये तत्रोल्लंघ्य शपथं मदीयं गर्विताः स्थिताः ।
ते हि मद्द्रोहिणोऽतस्तान् ज्वालयानलमालया ॥ ५४
सपत्नीकान्ससारांश्च दक्षयागस्थलस्थितान् ।
प्रज्वाल्य भस्मसात्कृत्वा पुनरायाहि सत्वरम् ॥ ५५
तत्र त्वयि गते देवा विश्वाद्या अपि सादरम् । ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] उनके द्वारा कहे गये इस वचनको सुनकर मंगलापति [ सदाशिव ] अत्यन्त प्रसन्न हो गये और हे वीरभद्र! तुम्हारी जय हो, यह आशीर्वाद देकर उनसे पुनः कहने लगे-॥ ४५ ॥
महेश्वर बोले- हे तात! हे वीरभद्र! शान्त मनसे मेरी बात सुनो और शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक उस कार्यको करो, जिससे मुझे प्रसन्नता हो ॥४६ ॥
इस समय ब्रह्माका पुत्र दक्ष यज्ञ करनेके लिये तत्पर है । वह महाभिमानी, दुष्ट तथा अज्ञानी विशेष रूपसे मेरा विरोध कर रहा है ॥ ४७ ॥
हे गणश्रेष्ठ! तुम यज्ञको तथा यज्ञमें सम्मिलित सभीको भस्म करके शीघ्र ही मेरे स्थानको पुनः लौट आओ ॥ ४८ ॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई भी जो वहाँ हों, उन्हें आज ही शीघ्र डालना ॥ ४ ९ ॥ वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम उन सबको प्रयत्नपूर्वक आज ही देवता, गन्धर्व, यक्ष अथवा वहाँ हों, उन्हें आज ही शीघ्र डालना ॥५१ ॥
दधीचिकी दिलायी हुई मेरी सहसा भस्म कर कोई भी हो, तुम गिरा दो ॥५० ॥
अन्य कोई भी जो सहसा भस्म कर शपथका उल्लंघन करके जो भी वहाँ ठहरे हुए हैं, उन्हें निश्चय ही तुम । प्रयत्नपूर्वक जला देना ॥५२ ॥
यदि भ्रमवश प्रमथगण और विष्णु आदि वहाँ आ जायँ तो शीघ्र ही अनेक आकर्षण मन्त्रोंसे खींचकर उन्हें भस्म कर देना ॥ ५३ ॥
जो मेरी शपथका उल्लंघन करके गर्वित हो वहाँ ठहरे हुए हैं, वे मेरे द्रोही हैं, अत: उन्हें अग्निकी लपटोंसे भस्म कर देना ॥५४ ॥
दक्षके यज्ञस्थलमें स्थित लोगोंको उनकी पत्नियों तथा सामग्रीसहित जलाकर भस्म करके शीघ्रतासे पुनः चले आओ ॥ ५५ ॥
तुम्हारे वहाँ जानेपर विश्वेदेव आदि देवगण भी यदि [ सामने आकर ] सादर स्तुति करें, तो भी तुम स्तोष्यन्ति त्वां तदाप्याशु ज्वालया ज्वालयैव तान् ॥ ५६ | उन्हें शीघ्र ही आगकी ज्वालासे जला डालना ॥५६ ॥
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४५६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ देवानपि कृतद्रोहान् ज्वालामालासमाकुलैः । इस प्रकार जो भी मुझसे द्रोह करनेवाले ज्वालय ज्वलनैः शीघ्रं माध्यायाध्यायपालकम् ॥ ५७ | देवतागण वहाँ उपस्थित हों, उन्हें शीघ्र ही अग्निकी दक्षादीन्सकलांस्तत्र सपत्नीकान्सबांधवान् प्रज्वाल्य वीर दक्षं नु सलीलं सलिलं पिब ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वेदमर्यादपालकः ।
विरराम महावीरं कालारिः सकलेश्वरः ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये । ज्वालामें जलाकर मेरे समीप लौट आना । मन्त्रपालक । समझकर उनकी उपेक्षा कदापि न करना ॥५७ । हे वीर! पत्नियों तथा बन्धुओंसहित वहाँ उपस्थित ॥ ॥ ५८ दक्ष आदि सभीको लीलापूर्वक भस्म करनेके बाद ही तुम जल ग्रहण करना अर्थात् कार्य पूर्ण होनेके अनन्तर ही पूर्ण विश्राम करना ॥५८ ॥
ब्रह्माजी बोले — वेदमर्यादाका पालन करनेवाले, कालके भी शत्रु तथा सर्वेश्वर शिवजीने रोषसे आँखें लाल - लालकर महावीर [ वीरभद्र ] - से इस प्रकार ५ ९ । कहकर मौन धारण कर लिया ॥ ५ ९ ॥ सतीखण्डे वीरभद्रोत्पत्तिशिवोपदेशवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें वीरभद्रकी उत्पत्ति और उन्हें शिवका उपदेशवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥
अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः गणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ - विध्वंसके लिये प्रस्थान ब्रह्मोवाच
इत्युक्तं श्रीमहेशस्य श्रुत्वा वचनमादरात् ।
वीरभद्रोऽतिसंतुष्टः प्रणनाम महेश्वरम् ॥
शासनं शिरसा धृत्वा देवदेवस्य शूलिनः । प्रचचाल ततः शीघ्रं वीरभद्रो मखं प्रति ।
शिवोऽथ प्रेषयामास शोभार्थं कोटिशो गणान् ।
तेन सार्धं महावीरान्प्रलयानलसन्निभान् ॥
अथ ते वीरभद्रस्य पुरतः प्रबला गणाः ।
पश्चादपि ययुर्वीराः कुतूहलकरा गणाः ॥
वीरभद्रसमेता ये गणाः शतसहस्रशः ।
पार्षदाः कालकालस्य सर्वे रुद्रस्वरूपिणः ॥
गणैः समेतः किल तैर्महात्मा स वीरभद्र हरवेषभूषणः । सहस्त्रबाहुर्भुजगाधिपाढ्यो ययौ रथस्थः प्रबलोऽतिभीकरः ॥
नल्वानां च सहस्त्रे द्वे प्रमाणं स्यन्दनस्य हि ।
अयुतेनैव सिंहानां वाहनानां प्रयत्नतः ॥
ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] महेश्वरके कहे गये इस वचनको आदरपूर्वक सुनकर वीरभद्र बहुत १ सन्तुष्ट हुए । उन्होंने महेश्वरको प्रणाम किया ॥ १ ॥
तत्पश्चात् त्रिशूलधारी उन देवाधिदेवकी आज्ञाको शिरोधार्य करके वीरभद्र वहाँसे शीघ्र ही दक्षके २ यज्ञकी ओर चल पड़े । भगवान् शिवने प्रलयाग्निके समान करोड़ों महावीर गणोंको [ केवल ] शोभाके ३ लिये उनके साथ भेज दिया॥२-३ ॥ वे बलशाली तथा वीर गण वीरभद्रके आगे ४ और पीछे भी चल रहे थे । कौतूहल करते हुए वीरभद्रसहित जो लाखों गण थे, वे कालके भी काल ५ शिवके पार्षद थे, वे सब रुद्रके ही समान थे ॥ ४-५ ॥ महात्मा वीरभद्र शिवके समान ही वेशभूषा धारण । करके रथपर बैठकर उन गणोंके साथ चल पड़े । उनकी एक हजार भुजाएँ थीं, उनके शरीरमें नागराज लिपटे ६ हुए थे । वे प्रबल और भयंकर दिखायी पड़ रहे थे ॥ ६ ॥
उनका रथ आठ लाख हाथ विस्तारवाला था । | उसमें दस हजार सिंह जुते हुए थे, जो प्रयत्नपूर्वक ७ रथको खींच रहे थे ॥७ ॥
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अ ० ३३ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४५७
तथैव प्रबलाः सिंहा बहवः पार्श्वरक्षकाः ।
शार्दूला मकरा मत्स्या गजास्तत्र सहस्रशः ॥ ८
वीरभद्रे प्रचलिते दक्षनाशाय सत्वरम् ।
कल्पवृक्षसमुत्सृष्टा पुष्पवृष्टिरभूत्तदा ॥ ९
तुष्टुवुश्च गणा वीरं शिपिविष्टे प्रचेष्टितम् ।
चक्रुः कुतूहलं सर्वे तस्मिंश्च गमनोत्सवे ॥ १०
काली कात्यायनीशानी चामुंडा मुंडमर्दिनी ।
भद्रकाली तथा भद्रा त्वरिता वैष्णवी तथा ॥ ११
एताभिर्नवदुर्गाभिर्महाकाली समन्विता ।
ययौ दक्षविनाशाय सर्वभूतगणैः सह ॥ १२
डाकिनी शाकिनी चैव भूतप्रमथगुह्यकाः ।
कूष्मांडाः पर्पटाश्चैव चटका ब्रह्मराक्षसाः ॥ १३
भैरवा: क्षेत्रपालाश्च दक्षयज्ञविनाशकाः ।
निर्ययुस्त्वरितं वीराः शिवाज्ञाप्रतिपालकाः ॥ १४
तथैव योगिनीचक्रं चतुःषष्टिगणान्वितम् ।
निर्ययौ सहसा क्रुद्धं दक्षयज्ञं विनाशितुम् ॥ १५
तेषां गणानां सर्वेषां संख्यानं शृणु नारद ।
महाबलवतां संघो मुख्यानां धैर्यशालिनाम् ॥ १६
अभ्ययाच्छङ्कुकर्णश्च दशकोट्या गणेश्वरः ।
दशभिः केकराक्षश्च विकृतोऽष्टाभिरेव च ॥ १७
चतुःषष्ट्या विशाखश्च नवभिः पारियात्रिकः ।
षड्भिः सर्वाङ्कको वीरस्तथैव विकृताननः ॥ १८
ज्वालकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः ।
सप्तभिः समदज्जीमान् दुद्रभोऽष्टाभिरेव च ॥ १ ९
पञ्चभिश्च कपालीशः षड्भिः संदारको गणः ।
कोटिकोटिभिरेवेह कोटिकुण्डस्तथैव च ॥ २०
विष्टम्भोऽष्टाष्टभिर्वीरैः कोटिभिर्गणसत्तमः ।
सहस्रकोटिभिस्तात सन्नादः पिप्पलस्तथा ॥ २१
आवेशनस्तथाष्टाभिरष्टाभिश्चंद्रतापनः महावेशः सहस्त्रेण कोटिना गणपो वृतः ॥ २२
कुण्डी द्वादशकोटीभिस्तथा पर्वतको मुने ।
विनाशितुं दक्षयज्ञं निर्ययौ गणसत्तमः ॥ २३
उसी प्रकार बहुत - से प्रबल सिंह, शार्दूल, मगर, मत्स्य और हजारों हाथी उनके पार्श्वरक्षक थे ॥ ८ ॥
इस प्रकार जब दक्षके विनाशके लिये वीरभद्रने प्रस्थान किया, उस समय कल्पवृक्षोंसे फूलोंकी वर्षा होने लगी । सभी गणोंने शिवजीके कार्यके लिये चेष्टा करनेवाले वीरभद्रकी स्तुति की और उस यात्राके उत्सवमें कुतूहल करने लगे॥९ -१० ॥ उसी समय काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मुण्डमर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी — इन नौ दुर्गाओं तथा समस्त भूतगणोंके साथ महाकाली दक्षका विनाश करनेके लिये चल पड़ीं ॥ ११-१२ ॥ शिवकी आज्ञाके पालक, डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, पर्पट, चटक, ब्रह्मराक्षस, भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि वीर दक्षके यज्ञका विनाश करनेके लिये तुरंत चल दिये॥१३-१४ ॥ उसी प्रकार चौंसठ गणोंके साथ योगिनियोंका मण्डल भी सहसा कुपित होकर दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये निकल पड़ा ॥ १५ ॥
हे नारद! उन सभी गणोंके धैर्यशाली तथा महाबली मुख्य गणोंका जो समूह था, उसकी संख्याको सुनिये ॥१६ ॥
शंकुकर्ण [ नामक ] गणेश्वर दस करोड़ गणोंके साथ, केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ तथा विकृत आठ करोड़ गणोंके साथ चल पड़े ॥१७ ॥
हे तात! हे मुने! विशाख चौंसठ करोड़, पारियात्रिक नौ करोड़, सर्वांकक छ: करोड़, वीर विकृतानन भी छ: करोड़, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालकेश बारह करोड़, समदज्जीमान् सात करोड़, दुद्रभ आठ करोड़, कपालीश पाँच करोड़, सन्दारक छः करोड़, कोटि और कुण्ड एक - एक करोड़, गणोंमें उत्तम विष्टम्भ चौंसठ करोड़ वीरोंके साथ, सन्नाद, पिप्पल एक हजार करोड़, आवेशन तथा चन्द्रतापन आठ-आठ करोड़, गणाधीश महावेश हजार करोड़ गणोंके साथ, कुंडी बारह करोड़ और गणश्रेष्ठ पर्वतक भी बारह करोड़ गणोंके साथ दक्षयज्ञका विध्वंस करनेके लिये चल पड़े॥१८–२३ ॥
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४५८ कालश्च कालकश्चैव महाकालस्तथैव च कोटीनां शतकेनैव दक्षयज्ञं ययौ प्रति अग्निकृच्छतकोट्या च कोट्याग्निमुख एव च आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव घनावहः सन्नाहः शतकोट्या च कोट्या च कुमुदो गणः अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या गणाधिपः काष्ठागूढश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा । सुमन्त्रको गणाधीशस्तथा तात सुनिर्ययौ
काकपादोदरः षष्टिकोटिभिर्गणसत्तमः ।
तथा सन्तानकः षष्टिकोटिभिर्गणपुङ्गवः ॥
महाबलश्च नवभिः कोटिभिः पुङ्गवस्तथा ॥
मधुपिङ्गस्तथा तात गणाधीशो हि निर्ययौ ।
नीलो नवत्या कोटीनां पूर्णभद्रस्तथैव च ॥
निर्ययौ शतकोटीभिश्चतुर्वक्त्रो गणाधिपः ॥
विरूपाक्षश्च कोटीनां चतुःषष्ट्या गणेश्वरः ।
तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च गणाधिपः ॥
संवर्तकस्तथा चैव कुलीशश्च स्वयं प्रभुः ।
लोकान्तकश्च दीप्तात्मा तथा दैत्यान्तको मुने ॥
गणो भृङ्गीरिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा ।
अशनिर्भालकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रकः ॥
कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृतः ।
वीरेशो ह्यभ्ययाद्वीरः वीरभद्रः शिवाज्ञया ॥
भूतकोटिसहस्त्रैस्तु प्रययौ कोटिभिस्त्रिभिः ।
रोमजैः श्वगणैश्चैव तथा वीरो ययौ द्रुतम् ॥
तदा भेरीमहानादः शंखाश्च विविधस्वनाः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३३ । काल, कालक और महाकाल सौ - सौ करोड़ ॥ २४ गणोंको साथ लेकर दक्षयज्ञकी ओर चल पड़े ॥ २४ ॥
। हे तात! अग्निकृत् सौ करोड़, अग्निमुख ॥ २५ करोड़, आदित्यमूर्धा तथा घनावह एक - एक करोड़ एक, । सन्नाह सौ करोड़, गण कुमुद एक करोड़, गणेश्वर ॥ २६ अमोघ तथा कोकिल एक - एक करोड़ और गणाधीश काष्ठागूढ़, सुकेशी, वृषभ तथा सुमन्त्रक चौंसठ-॥ २७ चौंसठ करोड़ गणोंको साथ लेकर चले ॥ २५-२७ ॥ हे तात! गणोंमें श्रेष्ठ काकपादोदर साठ करोड़, २८ गणश्रेष्ठ सन्तानक साठ करोड़, महाबल तथा पुंगव २ ९ नौ - नौ करोड़, गणाधीश मधुपिंग नौ करोड़ और नील तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंको साथ लेकर चल ३० पड़े । गणराज चतुर्वक्त्र सौ करोड़ गणोंको साथ लेकर ३१ | चला ॥ २८–३१ ॥ हे मुने! गणेश्वर विरूपाक्ष, तालकेतु, षडास्य ३२ तथा गणेश्वर पंचास्य चौंसठ करोड़, संवर्तक, स्वयं प्रभु कुलीश, लोकान्तक, दीप्तात्मा, दैत्यान्तक एवं ३३ शिवके परम प्रिय गण श्रीमान् भृंगी, रिटि, अशनि, भालक और सहस्रक चौंसठ करोड़ गणोंके साथ ३४ | चले ॥ ३२–३४ ॥ महावीर तथा वीरेश्वर वीरभद्र भी शिवजीकी ३५ आज्ञासे बीसों, सैकड़ों तथा हजारों करोड़ गणोंसे घिरे हुए वहाँ पहुँचे ॥ ३५ ॥
वीरभद्र हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ ३६ रोमजनित श्वगणोंके साथ शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये ॥ ३६ ॥
उस समय भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी । जटाहरो मुखाश्चैव शृङ्गाणि विविधानि च ॥ ३७ शंख बजने लगे । जटाहर, मुखों तथा शृंगोंसे अनेक ते तानि विततान्येव बंधनानि सुखानि च । प्रकारके शब्द होने लगे । उस महोत्सवमें चित्तको वादित्राणि विनेदुश्च विविधानि महोत्सवे ॥ ३८ आकर्षित एवं सुखानुभूति उत्पन्न करनेवाले बाजोंके वीरभद्रस्य शब्द चारों ओर व्याप्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥ यात्रायां सबलस्य महामुने । हे महामुने! सेनासहित महाबली वीरभद्रकी उस शकुनान्यभवंस्तत्र भूरीणि सुखदानि च ॥ ३ ९ | यात्रामें अनेक प्रकारके सुखदायक शकुन होने लगे ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे वीरभद्रयात्रावर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके ॥ ३३ ॥
यात्राका वर्णन नामक तैंतीसवाँ द्वितीय सतीखण्डमें वीरभद्रकी अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥