श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 481–490

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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अ ० ३६ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४६ ९ ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तेषामृषीणां वचनं हरिः ।

योद्धुकामोऽभवद्विष्णुर्वीरभद्रेण तेन वै ॥ ४३

चतुर्भुजः सुसंनद्धो चक्रायुधधरः करैः ।

महाबलोऽमरगणैर्यज्ञवाटात्स निर्ययौ ॥ ४४

वीरभद्रः शूलपाणिर्नानागणसमन्वितः ।

ददर्श विष्णुं संनद्धं योद्धुकामं महाप्रभुम् ॥ ४५

तं दृष्ट्वा वीरभद्रोऽभूद् भ्रुकुटीकुटिलाननः ।

कृतान्त इव पापिष्ठं मृगेन्द्र इव वारणम् ॥ ४६

तथाविधं हरिं दृष्ट्वा वीरभद्रोऽरिमर्दनः ।

अवदत्त्वरितः क्रुद्धो गणैर्वीरैः समावृतः ॥ ४७

वीरभद्र उवाच

रे रे हरे महादेवशपथोल्लंघनं त्वया ।

कथमद्य कृतं चित्ते गर्वः किमभवत्तव ॥ ४८

तव श्रीरुद्रशपथोल्लंघने शक्तिरस्ति किम् ।

को वा त्वमसि को वा ते रक्षकोऽस्ति जगत्त्रये ॥ ४ ९

अत्र त्वमागतः कस्माद्वयं तन्नैव विद्महे ।

दक्षस्य यज्ञपाता त्वं कथं जातोऽसि तद्वद ॥ ५०

दाक्षायण्या कृतं यच्च तन्न दृष्टं किमु त्वया ।

प्रोक्तं यच्च दधीचेन श्रुतं तन्न किमु त्वया ॥ ५१

त्वं चापि दक्षयज्ञेऽस्मिन् अवदानार्थमागतः ।

अवदानं प्रयच्छामि तव चापि महाभुज ॥ ५२

वक्षो विदारयिष्यामि त्रिशूलेन हरे तव ।

कस्तवास्ति समायातो रक्षकोऽद्य ममान्तिकम् ॥ ५३

पातयिष्यामि भूपृष्ठे ज्वालयिष्यामि वह्निना ।

दग्धं भवन्तमधुना पेषयिष्यामि सत्वरम् ॥५४

रे रे हरे दुराचार महेशविमुखाधम ।

श्रीमहारुद्रमाहात्म्यं किन्न जानासि पावनम् ॥ ५५

ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] उन ऋषियोंके इस वचनको सुनकर भगवान् विष्णु वीरभद्रके साथ युद्ध करनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४३ ॥

महाबली चतुर्भुज भगवान् विष्णु हाथोंमें चक्र आदि आयुध धारणकर सम्यक् सावधान होकर देवताओंके साथ यज्ञमण्डपसे बाहर निकले । अनेक गणोंसे समन्वित तथा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए वीरभद्रने महाप्रभु विष्णुको युद्धके लिये तैयार देखा ॥ ४४-४५ ॥ उन्हें देखते ही वीरभद्र टेढ़ी भौंहोंसे युक्त मुखमण्डलवाले हो गये, जैसे पापीको देखकर यमराज और हाथीको देखकर सिंह हो जाता है ॥ ४६ ॥

उस प्रकार श्रीहरिको [ युद्धके लिये उद्यत ] देखकर वीरगणोंसे घिरे हुए शत्रुनाशक वीरभद्र कुपित होकर शीघ्रता से कहने लगे -॥४७ ॥

वीरभद्र बोले – हे हरे! आपने आज शिवजीके शपथकी अवहेलना क्यों की? और आपके मनमें घमण्ड क्यों हो गया है? क्या आपमें शिवजीके शपथका उल्लंघन करनेकी शक्ति है? आप कौन हैं? तीनों लोकोंमें आपका रक्षक कौन है? ॥ ४८-४९ ॥ यहाँ किसलिये आये हैं, इसे हम नहीं जान पा रहे हैं । आप दक्षके यज्ञरक्षक क्यों बन गये हैं, इसे बताइये । [ इस यज्ञमें ] सतीने जो किया, उसे क्या आपने नहीं देखा और दधीचिने जो कहा, उसे क्या आपने नहीं सुना? ॥ ५०-५१ ॥ आप दक्षके इस यज्ञमें अवदान ( यज्ञभाग ) प्राप्त करनेके लिये आये हुए हैं । हे महाबाहो! मैं [ शीघ्र ही ] आपको अवदान देता हूँ । हे हरे! मैं त्रिशूलसे आपका वक्षःस्थल विदीर्ण करूँगा । आपका कौन रक्षक है, वह मेरे समक्ष आये॥५२-५३ ॥ मैं आपको पृथिवीपर धराशायी करूँगा, अग्निसे जला दूँगा और पुनः दग्ध हुए आपको पीस डालूँगा ॥५४ ॥

हे हरे! हे दुराचारी! हे महेशविमुख! हे अधम! क्या आप शिवजीके पावन माहात्म्यको नहीं | जानते? ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 482

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४७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३६ अथापि त्वं महाबाहो योद्धुकामोऽग्रतः स्थितः । फिर भी हे महाबाहो! आप युद्धकी कामनासे नेष्यामि पुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेस्त्वमात्मना ॥ ५६ आगे स्थित हैं । यदि आप [ इस युद्धभूमिमें ] खड़े रह ब्रह्मोवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वीरभद्रस्य बुद्धिमान् उवाच विहसन् प्रीत्या विष्णुस्तत्र सुरेश्वरः विष्णुरुवाच शृणु त्वं वीरभद्राद्य प्रवक्ष्यामि त्वदग्रतः न रुद्रविमुखं मां त्वं वद शंकरसेवकम् ॥ अनेन प्रार्थितः पूर्वं यज्ञार्थं च पुनः पुनः । दक्षेणाविदितार्थेन कर्मनिष्ठेन मौढ्यतः

अहं भक्तपराधीनस्तथा सोऽपि महेश्वरः ।

दक्षो भक्तो हि मे तात तस्मादत्रागतो मखे ॥

शृणु प्रतिज्ञां मे वीर रुद्रकोपसमुद्भव ।

रुद्रतेज: स्वरूपो हि सुप्रतापालय प्रभो ॥

अहं निवारयामि त्वां त्वं च मां विनिवारय ।

तद्भविष्यति यद्भावि करिष्येऽहं पराक्रमम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्तवति गोविन्दे प्रहस्य स महाभुजः ।

अवदत्सुप्रसन्नोऽस्मि त्वां ज्ञात्वास्मत्प्रभोः प्रियम् ॥

ततो विहस्य सुप्रीतो वीरभद्रो गणाग्रणीः ।

प्रश्रयावनतोऽवादीद्विष्णुं देवं हि तत्त्वतः ॥

वीरभद्र उवाच

तव भावपरीक्षार्थमित्युक्तं मे महाप्रभो ।

इदानीं तत्त्वतो वच्मि शृणु त्वं सावधानतः ॥

यथा शिवस्तथा त्वं हि यथा त्वं च तथा शिवः ।

इति वेदा वर्णयन्ति शिवशासनतो हरे ॥

| गये तो मैं आपको उस स्थानपर भेज दूँगा, जहाँसे पुनः लौटना सम्भव नहीं है ॥५६ ॥

ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] उन वीरभद्रकी । इस बातको सुनकर बुद्धिमान् सुरेश्वर विष्णु ॥ ५७ प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहने लगे —॥५७ ॥

विष्णु बोले - हे वीरभद्र! आज आपके सामने । मैं जो कह रहा हूँ, उसको सुनिये । आप मुझ शंकरके ५८ सेवकको रुद्रविमुख मत कहिये ॥५८ ॥

कर्ममें निष्ठा रखनेवाले अज्ञानी इन दक्षने ॥ ५ ९ मूर्खतावश पहले मुझसे यज्ञके लिये बार - बार प्रार्थना की थी ॥५ ९ ॥ मैं भक्तके अधीन हूँ और वे भगवान् महेश्वर ६० भी भक्तके अधीन हैं । हे तात! दक्ष मेरे भक्त हैं, इसलिये मैं यज्ञमें आया हूँ ॥६० ॥

रुद्रके कोपसे उत्पन्न होनेवाले हे वीर! हे महान् ६१ प्रतापके आलय! हे प्रभो! आप रुद्रतेजस्वरूप हैं, आप मेरी प्रतिज्ञा सुनिये ॥ ६१ ॥

मैं [ यज्ञकी रक्षाके लिये ] आपसे युद्ध करूँगा ६२ और आप भी [ इस यज्ञके विध्वंसके लिये ] मुझसे युद्ध कीजिये । जो होनहार होगा, वह होगा, मैं अवश्य ही पराक्रम प्रकट करूँगा ॥६२ ॥

ब्रह्माजी बोले - विष्णुके इस प्रकार कहनेपर महाबाहु वीरभद्रने हँसते हुए कहा– [ हे विष्णो! ] मैं ६३ आपको अपने प्रभु शिवका प्रिय जानकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तदनन्तर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बड़े विनयसे भगवान् विष्णुसे कहा— ६४ ॥ ६३-६४ ॥ वीरभद्र बोले — हे महाप्रभो! मैंने आपके भावकी परीक्षाके लिये ही ऐसा वचन कहा था, अब मैं यथार्थ बात कह रहा हूँ, उसको आप सावधानीपूर्वक ६५ सुनिये ॥ ६५ ॥

हे हरे! जैसे शिव हैं, वैसे आप हैं और जैसे । आप हैं, वैसे शिव हैं । शिवके आदेशसे वेद ऐसा ही ६६ | कहते हैं ॥६६ ॥

पृष्ठ 483

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अ ० ३७ ] रुद्रसंहिता (

शिवाज्ञया वयं सर्वे सेवकाः शंकरस्य वै ।

तथापि च रमानाथ प्रवादोचितमादरात् ॥ ६७

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वीरभद्रस्य सोऽच्युतः ।

प्रहस्य चेदं प्रोवाच वीरभद्रहितं वचः ॥ ६८

विष्णुरुवाच

युद्धं कुरु महावीर मया सार्धमशङ्कितः ।

तवास्त्रैः पूर्यमाणोऽहं गमिष्यामि स्वमाश्रमम् ॥ ६ ९

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा हि विरम्यासौ सन्नद्धोऽभूद् रणाय च ।

स्वगणैर्वीरभद्रोऽपि सन्नद्धोऽभून्महाबलः ॥ ७०

सतीखण्ड ) ४७१ हे रमानाथ! भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार हम सब लोग उनके सेवक ही हैं, तथापि मैंने जो बात कही है, वह इस वाद - विवादके अवसरके अनुकूल ही है । आप प्रत्येक बातको आदरपूर्वक ही समझें ॥ ६७ ॥

ब्रह्माजी बोले- उन वीरभद्रका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णु हँसकर और उनके लिये हितकर यह वचन कहने लगे- ॥ ६८ ॥

विष्णु बोले - हे महावीर! आप नि: शंक होकर मेरे साथ युद्ध कीजिये, आपके अस्त्रोंसे शरीरके भर जानेपर ही मैं अपने आश्रमको जाऊँगा ॥६ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे विष्णु चुप होकर युद्धके लिये तैयार हो गये और महाबली वीरभद्र भी । अपने गणोंके साथ युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥७० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे विष्णुवीरभद्रसंवादो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें विष्णुवीरभद्रसंवाद - वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥

अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः गणोंसहित वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, जाना, प्रसन्न भगवान् शिवद्वारा ब्रह्मोवाच

वीरभद्रोऽथ युद्धे वै विष्णुना स महाबलः ।

संस्मृत्य शंकरं चित्ते सर्वापद्विनिवारणम् ॥ १

आरुह्य स्यन्दनं दिव्यं सर्ववैरिविमर्दनः ।

गृहीत्वा परमास्त्राणि सिंहनादं जगर्ज ह ॥ २

विष्णुश्चापि महाघोषं पाञ्चजन्याभिधं निजम् ।

दध्मौ बली महाशंखं स्वकीयान् हर्षयन्निव ॥ ३

तच्छ्रुत्वा शंखनिर्ह्रादं देवा ये च पलायिताः रणं हित्वा गताः पूर्वं ते द्रुतं पुनराययुः ॥ ४

वीरभद्रगणैस्ते तु लोकपालाः सवासवाः ।

युद्धं चक्रुस्तथा सिंहनादं कृत्वा बलान्विताः ॥ ५

गणानां लोकपालानां द्वन्द्वयुद्धं भयावहम् ।

अभवत्तत्र तुमुलं गर्जतां सिंहनादतः ॥ ६

दक्षवध, वीरभद्रका वापस कैलास पर्वतपर उसे गणाध्यक्ष पद प्रदान करना ब्रह्माजी बोले- सभी शत्रुओंके विनाशक, महाबलवान् वीरभद्र भगवान् विष्णुके साथ युद्धमें सभी प्रकारके दुःखोंको दूर करनेवाले भगवान् शंकरका अपने हृदयमें ध्यान करके दिव्य रथपर आरूढ़ होकर बड़े महान् अस्त्रोंको लेकर सिंहके समान गर्जन करने लगे॥१-२ ॥ बलशाली विष्णु भी अपने योद्धाओंको उत्साहित करते हुए महान् शब्द करनेवाले अपने पांचजन्य नामक शंखको बजाने लगे ॥३ ॥

उस शंखकी ध्वनिको सुनकर जो देवता पहले युद्धभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए थे, वे तत्क्षण लौटकर आ गये ॥४ ॥

तब सेनासहित समस्त इन्द्र आदि लोकपाल सिंहगर्जना करके वीरभद्रके गणोंके साथ युद्ध करने लगे ॥५ ॥

उस समय सिंहनाद करते हुए गणों एवं लोक-पालोंके बीच भयंकर घनघोर द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया ॥६ ॥

पृष्ठ 484

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४७२ नन्दिना युयुधे शक्रोऽनलो वै चाश्मना तथा कुबेरोऽपि हि कूष्माण्डपतिना युयुधे बली तदेन्द्रेण हतो नन्दी वज्रेण शतपर्वणा नन्दिना च हतः शक्रस्त्रिशूलेन स्तनान्तरे ॥

बलिनौ द्वावपि प्रीत्या युयुधाते परस्परम् ।

नानाघातांश्च कुर्वन्तौ नन्दिशक्रौ जिगीषया ॥

शक्त्या जघान चाश्मानं शुचिः परमकोपनः ।

सोऽपि शूलेन तं वेगाच्छितधारेण पावकम् ॥

यमेन सह सङ्ग्रामं महालोको गणाग्रणीः ।

चकार तुमुलं वीरो महादेवं स्मरन्मुदा ॥

नैर्ऋतेन समागम्य चंडश्च बलवत्तरः ।

युयुधे परमास्त्रैश्च नैर्ऋतिं निविडम्बयन् ॥

वरुणेन समं वीरो मुंडश्चैव महाबलः ।

युयुधे परया शक्त्या त्रिलोकीं विस्मयन्निव ॥

वायुना च हतो भृङ्गी स्वास्त्रेण परमौजसा ।

भृङ्गिणा च हतो वायुस्त्रिशूलेन प्रतापिना ॥

कुबेरेणैव सङ्गम्य कूष्मांडपतिरादरात् ।

युयुधे बलवान् वीरो ध्यात्वा हृदि महेश्वरम् ॥

योगिनीचक्रसंयुक्तो भैरवीनायको महान् ।

विदार्य देवानखिलान् पपौ शोणितमद्भुतम् ॥

क्षेत्रपालास्तथा तत्र बुभुक्षुः सुरपुङ्गवान् ।

काली चापि विदायैव तान्पपौ रुधिरं बहु ॥

अथ विष्णुर्महातेजा युयुधे तैश्च शत्रुहा ।

चक्रं चिक्षेप वेगेन दहन्निव दिशो दश ॥

क्षेत्रपालः समायान्तं चक्रमालोक्य वेगतः ।

तत्रागत्यागतो वीरश्चाग्रसत्सहसा बली ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ । इन्द्र नन्दीके साथ युद्ध करने लगे, अग्नि ॥ ७ अश्माके साथ और बलशाली कुबेर कूष्माण्डपतिके ॥ ८ । साथ युद्ध करने लगे । तब इन्द्रने सौ पर्ववाले वज्रसे नन्दीपर प्रहार किया । नन्दीने भी त्रिशूलसे इन्द्रकी ९ छातीमें प्रहार किया ॥७ – ९ ॥ बलवान् इन्द्र और नन्दी दोनों एक - दूसरेको १० जीतनेकी इच्छासे अनेक प्रकारके प्रहार करते हुए परस्पर प्रीतिपूर्वक लड़ने लगे ॥१० ॥

अत्यन्त क्रोधयुक्त अग्निने अपनी शक्तिसे अश्मापर ११ प्रहार किया तथा उसने भी अग्निपर बड़े वेगसे तीक्ष्ण धारवाले त्रिशूलसे प्रहार किया ॥११ ॥

गणोंमें श्रेष्ठ यूथपति महालोक प्रीतिपूर्वक १२ शिवजीका ध्यान करते हुए यमराजके साथ घनघोर युद्ध करने लगे ॥१२ ॥

महान् बलशाली चण्ड आ करके निर्ऋतिको १३ तिरस्कृत करते हुए बड़े - बड़े अस्त्रोंसे उनके साथ युद्ध करने लगे ॥१३ ॥

महाबलवान् मुण्ड भी त्रिलोकीको विस्मित १४ करते हुए अपनी उत्तम शक्तिसे वरुणके साथ युद्ध करने लगे ॥१४ ॥

वायुने अपने परम तेजस्वी अस्त्रसे भृंगीको १५ आहत कर दिया और प्रतापी भृंगीने भी त्रिशूलसे वायुपर प्रहार किया ॥ १५ ॥

वीर कूष्माण्डपतिने पहुँचकर हृदयमें आदरपूर्वक १६ शिवजीका ध्यान करके कुबेरके साथ युद्ध करना प्रारम्भ किया ॥१६ ॥

महान् भैरवीपति योगिनियोंके समूहको साथ १७ लेकर समस्त देवताओंको विदीर्ण करके विचित्र रूपसे उनका रक्त पीने लगे ॥१७ ॥

क्षेत्रपाल श्रेष्ठ देवताओंका भक्षण करने लगे १८ और काली भी उन देवताओंको विदीर्णकर रक्त पीने लगीं ॥ १८ ॥

तब शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् विष्णु १ ९ उनके साथ युद्ध करने लगे और उन्होंने दसों दिशाओंको दग्ध करते हुए वेगपूर्वक [ अपना ] चक्र फेंका ॥ १ ९ ॥ चक्रको वेगपूर्वक आते हुए देखकर बलवान् | क्षेत्रपालने सहसा वहाँ पहुँचकर उस चक्रको ग्रसित २० | कर लिया ॥ २० ॥

पृष्ठ 485

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अ ० ३७ ] रुद्रसंहिता (

चक्रं ग्रसितमालोक्य विष्णुः परपुरञ्जयः ।

मुखं तस्य परामृज्य तमुद्गालितवानरिम् ॥ २१

स्वचक्रमादाय महानुभावः चु चातीव भवैकभर्ता । महाबली तैर्युयुधे प्रवीरैः सङ्क्रुद्धनानायुधधारकोऽस्त्रैः ॥२२

चक्रे महारणं विष्णुः तैः सार्धं युयुधे मुदा ।

नानायुधानि संक्षिप्य तुमुलं भीमविक्रमम् ॥ २३

अथ ते भैरवाद्याश्च युयुधुस्तेन भूरिशः ।

नानास्त्राणि विमुञ्चन्तः संक्रुद्धाः परमौजसा ॥ २४

इत्थं तेषां रणं दृष्ट्वा हरिणातुलतेजसा ।

विनिवृत्य समागम्य तान्स्वयं युयुधे बली ॥ २५

अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूर्च्छितः ।

युयुधे भगवांस्तेन वीरभद्रेण माधवः ॥ २६

तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ।

महावीराब्धिपत्योस्तु नानास्त्रधरयोर्मुने ॥ २७

विष्णोर्योगबलात्तस्य देहादेव सुदारुणाः ।

शङ्खचक्रगदाहस्ता असंख्याताश्च जज्ञिरे ॥ २८

ते चापि युयुधुस्तेन वीरभद्रेण भाषता ।

विष्णुवत् बलवन्तो हि नानायुधधरा गणाः ॥ २ ९

तान्सर्वानपि वीरोऽसौ नारायणसमप्रभान् ।

भस्मीचकार शूलेन हत्वा स्मृत्वा शिवं प्रभुम् ॥ ३०

ततश्चोरसि तं विष्णुं लीलयैव रणाजिरे ।

जघान वीरभद्रो हि त्रिशूलेन महाबली ॥ ३१

सतीखण्ड ) ४७३ शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले भगवान् विष्णुने अपने चक्रको ग्रसित हुआ देखकर उसके मुखको मसलकर । उस शत्रुके मुखसे चक्रको उगलवा लिया ॥ २१ ॥

तब संसारके एकमात्र स्वामी, महानुभाव तथा महाबलवान् भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो उठे । वे क्रोधित होकर अपने चक्र तथा अनेक प्रकारके अस्त्रोंको लेकर उन अस्त्रोंसे उन महावीर गणोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥

विष्णुने प्रचण्ड पराक्रमके साथ भयंकर महायुद्ध किया । वे अनेक प्रकारके अस्त्र चलाकर प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ युद्ध कर रहे थे ॥२३ ॥

वे भैरव आदि गण भी अत्यधिक क्रोधमें भरकर महान् ओजसे अनेक प्रकारके अस्त्रोंको छोड़ते हुए उनके साथ युद्ध करने लगे ॥२४ ॥

इस प्रकार अतुलनीय तेजवाले विष्णुके साथ होते हुए उनके युद्धको देखकर बलवान् वीरभद्र लौटकर उनके पास पहुँचकर विष्णुके साथ स्वयं युद्ध करने लगे ॥२५ ॥

उसके बाद महातेजस्वी माधव भगवान् विष्णु अपने चक्रको लेकर कुपित हो उन वीरभद्रके साथ युद्ध करने लगे ॥२६ ॥

हे मुने! [ उस समय ] अनेक प्रकारके अस्त्र धारण करनेवाले महावीर वीरभद्र तथा सागरपति विष्णु – उन दोनोंका रोमांचकारी घनघोर युद्ध होने लगा ॥ २७ ॥

विष्णुके योगबलसे उनके शरीरसे शंख, चक्र और गदा हाथोंमें धारण किये हुए असंख्य वीरगण प्रकट हो गये ॥ २८ ॥

विष्णुके समान ही बलशाली तथा नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण किये हुए वे वीरगण वार्तालाप करते हुए वीरभद्रके साथ युद्ध करने लगे ॥२ ९ ॥ वीरभद्रने भगवान् शंकरका स्मरण करके विष्णुके समान तेजस्वी उन सभीको अपने त्रिशूलसे मारकर भस्म कर दिया ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् उन महाबली वीरभद्रने युद्धभूमिमें ही लीलापूर्वक विष्णुकी छातीपर त्रिशूलसे प्रहार | किया ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 486

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४७४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ तेन घातेन सहसा विहतः पुरुषोत्तमः । हे मुने! पुरुषोत्तम श्रीहरि त्रिशूलके प्रहारसे पपात च तदा भूमौ विसंज्ञोऽभून्मुने हरिः ॥ ३२ घायल होकर सहसा भूमिपर गिर पड़े और अचत हो गये ॥३२ ॥

ततो जज्ञेऽद्भुतं तेजः प्रलयानलसन्निभम् । तब प्रलयाग्निके समान तीनों लोकोंको जला त्रैलोक्यदाहकं तीव्रं वीराणामपि भीकरम् ॥ ३३ देनेवाला और वीरोंको भयभीत करनेवाला अद्भुत तेज क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमान् पुनरुत्थाय स प्रभुः प्रहर्तुं चक्रमुद्यम्य ह्यतिष्ठत्पुरुषर्षभः

तस्य चक्रं महारौद्रं कालादित्यसमप्रभम् ।

व्यष्टम्भयददीनात्मा वीरभद्रः शिवः प्रभुः ॥

मुने शंभो: प्रभावात्तु मायेशस्य महाप्रभोः ।

न चचाल हरेश्चक्रं करस्थं स्तंभितं ध्रुवम् ॥

अथ विष्णुर्गणेशेन वीरभद्रेण भाषता ।

अतिष्ठत् स्तंभितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः ॥

ततो विष्णुः स्तंभितो हि वीरभद्रेण नारद ।

यज्वोपमन्त्रणमनुं निःस्तंभनकरं जपन् ॥

ततः स्तंभननिर्मुक्तः शार्ङ्गधन्वा रमेश्वरः ।

शार्ङ्गं जग्राह स क्रुद्धः स्वधनुः सशरं मुने ॥

त्रिभिश्च धर्षितं बाणैस्तेन शार्ङ्गधनुर्हरेः ।

वीरभद्रेण तत्तात त्रिधाभूत्तत्क्षणान्मुने ॥

अथ विष्णुर्महावाण्या बोधितस्तं महागणम् ।

असह्यवर्चसं ज्ञात्वा ह्यन्तर्धातुं मनो दधे ॥

ज्ञात्वा च तत्सर्वमिदं भविष्यं सतीकृतं दुष्प्रसहं परेषाम् । गताः स्वलोकं स्वगणान्वितास्तु स्मृत्वा शिवं सर्वपतिं स्वतन्त्रम् ॥

सत्यलोकगतश्चाहं पुत्रशोकेन पीडितः ।

अचिन्तयं सुदुःखार्तो मया किं कार्यमद्य वै ॥

उत्पन्न हुआ । ३३ ॥

। पुरुषश्रेष्ठ श्रीमान् भगवान् विष्णु पुनः उठकर ॥ ३४ क्रोधसे नेत्रोंको लाल किये हुए अपने चक्रको उठाकर [ वीरभद्रको ] मारनेके लिये खड़े हो गये ॥ ३४ ॥

तब दीनतारहित चित्तवाले शिवस्वरूप वीरभद्रने ३५ प्रलयकालीन आदित्यके समान महातेजस्वी उस चक्रको स्तम्भित कर दिया ॥ ३५ ॥

हे मुने! मायापति महाप्रभु शंकरके प्रभावसे ३६ विष्णुके हाथमें स्थित चक्र चल नहीं पाया, वह निश्चितरूपसे स्तम्भित हो गया था ॥ ३६ ॥

तब भाषण करते हुए उन गणेश्वर वीरभद्रने ३७ विष्णुको भी स्तम्भित कर दिया और वे शिखरयुक्त पर्वतके समान खड़े रह गये ॥३७ ॥

हे नारद! वीरभद्रने जब भगवान् विष्णुको ३८ स्तम्भित कर दिया, तब यह देखकर याज्ञिकोंने स्तम्भनसे मुक्त करानेवाले मन्त्रका जप करके उन्हें स्तम्भनसे मुक्त कर दिया ॥३८ ॥

हे मुने! तदनन्तर स्तम्भनसे मुक्त होनेपर शार्ङ्ग ३ ९ नामक धनुष धारण करनेवाले रमापतिने कुपित होकर बाणसहित अपने धनुषको उठा लिया ॥ ३ ९ ॥ हे तात! हे मुने! उन वीरभद्रने तीन बाणोंसे ४० विष्णुके शार्ङ्ग धनुषपर प्रहार किया और वह उसी क्षण तीन टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ॥४० ॥

तब महावाणीद्वारा बोधित हुए विष्णुने उन ४१ महागण वीरभद्रको असह्य तेजसे सम्पन्न जानकर अन्तर्धान होनेका मनमें विचार किया ॥ ४१ ॥

सतीके द्वारा किये गये आत्मदाहके समस्त | परिणामको, जो शत्रुओंके लिये असह्य था, जानकर सभी | लोग सबके स्वामी स्वतन्त्र शिवजीका स्मरण करके ४२ अपने गणोंके साथ अपने - अपने लोकको चले गये ॥ ४२ ॥

मैं भी पुत्रके शोकसे पीड़ित हो सत्यलोक चला | आया और अत्यन्त दुःखसे व्याकुल होकर विचार ४३ । करने लगा कि मुझे अब क्या करना चाहिये ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 487

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अ ० ३७ ] रुद्रसंहिता (

विष्णो मयि गते चैव देवाश्च मुनिभिः सह ।

विनिर्जिता गणैः सर्वे ये ते यज्ञोपजीविनः ॥ ४४

तमुपद्रवमालक्ष्य विध्वस्तं च महामखम् ।

मृगस्वरूपो यज्ञो हि महाभीतोऽपि दुद्रुवे ॥ ४५

तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति ।

वीरभद्रः समादाय विशिरस्कमथाकरोत् ॥ ४६

ततः प्रजापतिं धर्मं कश्यपं च प्रगृह्य सः ।

अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम् ॥ ४७

मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महागणः ।

जघान मूर्ध्नि पादेन दत्तं च मुनिपुङ्गवम् ॥ ४८

सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च ।

चिच्छेद करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान् ॥ ४ ९

ततोऽन्यानपि देवादीन् विदार्य पृथिवीतले ।

पातयामास सोऽयं वै क्रोधाक्रांतातिलोचनः ॥ ५०

वीरभद्रो विदार्यापि देवान्मुख्यान्मुनीनपि ।

नाभूच्छांतो द्रुतक्रोधः फणिराडिव मंडितः ॥ ५१

वीरभद्रोद्धृतारातिः केसरीव वनद्विपान् ।

दिशो विलोकयामास कः कुत्रास्तीत्यनुक्षणम् ॥ ५२

व्यपोथयद् भृगुं यावन्मणिभद्रः प्रतापवान् ।

पदाक्रम्योरसि तदाकार्षीत्तच्छ्मश्रुलुञ्चनम् ॥ ५३

चंडश्चोत्पाटयामास पूष्णो दंतान् प्रवेगतः ।

शप्यमाने हरे पूर्वं योऽहसद्दर्शयन्दतः ॥५४

नन्दी भगस्य नेत्रे हि पातितस्य रुषा भुवि ।

उज्जहार दक्षमक्ष्णा यः शपन्तमसूसुचत् ॥ ५५

विडंबिता स्वधा तत्र सा स्वाहा दक्षिणा तथा ।

मंत्रास्तंत्रास्तथा चान्ये तत्रस्था गणनायकैः ॥ ५६

ववृषुस्ते पुरीषाणि वितानाग्नौ रुषा गणाः ।

अनिर्वाच्यं तदा चक्रुर्गणा वीरास्तमध्वरम् ॥५७

सतीखण्ड ) ४७५ मेरे तथा श्रीविष्णुके चले जानेपर जो भी यज्ञोपजीवी देवता थे, मुनियोंसहित उन सबको शिवगणोंने जीत लिया । उस उपद्रवको और महायज्ञको विध्वस्त हुआ देखकर यज्ञदेव अत्यन्त भयभीत हो मृगका रूप धारण करके भागने लगे ॥ ४४-४५ ॥ मृगरूपमें आकाशकी ओर भागते हुए उन यज्ञको वीरभद्रने पकड़कर सिरविहीन कर दिया ॥ ४६ ॥

उसके बाद महागण वीरभद्रने प्रजापति, धर्म, कश्यप, अनेक पुत्रोंवाले मुनीश्वर अरिष्टनेमि, मुनि अंगिरा, कृशाश्व तथा महामुनि दत्तके सिरपर पैरसे प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥ प्रतापी वीरभद्रने सरस्वती तथा देवमाता अदितिकी नासिकाके अग्रभागको अपने नखाग्रसे विदीर्ण कर दिया । तत्पश्चात् क्रोधके कारण चढ़ी हुई आँखोंवाले उन वीरभद्रने अन्यान्य देवताओंको भी विदीर्णकर उन्हें पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ४ ९ -५० ॥ मुख्य - मुख्य देवताओं और मुनियोंको विदीर्ण कर देनेपर भी वे शान्त नहीं हुए । महान् क्रोधसे भरे हुए वे नागराजकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ ५१ ॥

जैसे सिंह वनके हाथियोंकी ओर देखता है, उसी प्रकार शत्रुओंको मारकर भी वे वीरभद्र सभी दिशाओंमें देखने लगे, कौन शत्रु कहाँ है ॥ ५२ ॥

उसी समय प्रतापी मणिभद्रने भृगुको पटक दिया और उनकी छातीपर पैरसे प्रहार करके उनकी दाढ़ी नोंच ली ॥५३ ॥

चण्डने बड़े वेगसे पूषाके दाँत उखाड़ लिये; जो पूर्वकालमें महादेवजीको [ दक्षद्वारा ] शाप दिये जानेपर दाँत दिखाकर हँस रहे थे ॥५४ ॥

नन्दीने भगको रोषपूर्वक पृथ्वीपर गिरा दिया और उनकी दोनों आँखें निकाल लीं; जिन्होंने [ शिवको ] शाप देते हुए दक्षकी ओर नेत्रसे संकेत किया था ॥ ५५ ॥

गणेश्वरोंने स्वधा, स्वाहा, दक्षिणा, मन्त्र, तन्त्र तथा अन्य जो भी वहाँ उपस्थित थे, सबको तहस-नहस कर दिया ॥५६ ॥

उन गणोंने क्रोधित होकर वितानाग्निमें विष्ठाकी वर्षा कर दी । इस प्रकार वीर गणोंने यज्ञकी ऐसी दुर्गति कर दी, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५७ ॥

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४७६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३७ अन्तर्वेद्यन्तरगतं निलीनं तद्भयाद् बलात् । ब्रह्मपुत्र दक्ष उनके भयके मारे अन्तर्वेदीके भीतर आनिनाय समाज्ञाय वीरभद्रः स्वभूः सुतम् ॥ ५८ छिप गये थे, वीरभद्र पता लगाकर बलपूर्वक उन्हें कपोलेऽस्य गृहीत्वा तं खड्गेनोपहृतं शिरः अभेद्यमभवत्तस्य तच्च योगप्रभावतः

अभेद्यं तच्छिरो मत्वा शस्त्रास्त्रैश्च तु सर्वशः ।

करेण त्रोटयामास पद्भ्यामाक्रम्य चोरसि ॥

तच्छिरस्तस्य दुष्टस्य दक्षस्य हरवैरिणः ।

अग्निकुंडे प्रचिक्षेप वीरभद्रो गणाग्रणीः ॥

रेजे तदा वीरभद्रस्त्रिशूलं भ्रामयन्करे ।

क्रुद्धा रणाक्षसंवर्ताः प्रज्वाल्य पर्वतोपमाः ॥

अनायासेन हत्वैतान् वीरभद्रस्ततोऽग्निना ।

ज्वालयामास सक्रोधो दीप्ताग्निः शलभानिव ॥

वीरभद्रस्ततो दग्धान् दृष्ट्वा दक्षपुरोगमान् ।

अट्टाट्टहासमकरोत् पूरयंश्च जगत्त्रयम् ॥

वीरश्रिया वृतस्तत्र ततो नन्दनसंभवा ।

पुष्पवृष्टिरभूद्दिव्या वीरभद्रे गणान्विते ॥

ववुर्गंधवहाः शीताः सुगन्धाः सुखदाः शनैः ।

देवदुंदुभयो नेदुः सममेव ततः परम् ॥

कैलासं स ययौ वीरः कृतकार्यस्ततः परम् ।

विनाशितदृढध्वांतो भानुमानिव सत्वरम् ॥

कृतकार्यं वीरभद्रं दृष्ट्वा संतुष्टमानसः ।

शंभुवरगणाध्यक्ष चकार परमेश्वरः ॥

खींच लाये ॥५८ ॥

। उनका गाल पकड़कर उन्होंने उनके मस्तकपर ॥ ५ ९ । तलवारसे आघात किया, परंतु योगके प्रभावसे उनका सिर फटा नहीं, अभेद्य ही रह गया ॥ ५ ९ ॥ तब उनके सिरको अस्त्र - शस्त्रोंसे अभेद्य समझकर ६० उन्होंने पैरोंसे दक्षकी छातीको दबाकर हाथसे सिरको तोड़ दिया ॥६० ॥

तदनन्तर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने उन शिवद्रोही ६१ दुष्ट दक्षके उस सिरको अग्निकुण्डमें डाल दिया ॥ ६१ ॥

उस समय वीरभद्र अपने हाथमें त्रिशूल घुमाते ६२ हुए इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो युद्धभूमिमें संवर्ताग्नि सबको जलाकर क्रोधमें भरी हुई पर्वतके समान स्थित हो ॥ ६२ ॥

जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि पतिंगोंको जला ६३ डालती है, उसी प्रकार वीरभद्रने क्रोधित होकर बिना परिश्रम किये ही इन सबको मारकर अग्निसे जला डाला ॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् दक्ष आदिको जलाकर वीरोंकी ६४ शोभासे युक्त, त्रिलोकीको गुंजित करते हुए वीरभद्रने भयानक अट्टहास किया । तदनन्तर वहाँ गणोंसहित ६५ वीरभद्रके ऊपर नन्दनवनकी दिव्य पुष्पवृष्टि होने लगी ॥ ६४-६५ ॥ शीतल, सुगन्धित तथा सुखदायक हवाएँ धीरे-६६ धीरे बहने लगीं और उसीके साथ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं ॥ ६६ ॥

तदनन्तर घोर अन्धकारका नाश करनेवाले सूर्यकी ६७ भाँति वे वीरभद्र दक्ष और उनके यज्ञका विनाश करके कृतकार्य हो तुरंत कैलासपर्वतपर चले गये ॥६७ ॥

कार्यको पूर्ण किये हुए वीरभद्रको देखकर | परमेश्वर शिवजी मन - ही - मन प्रसन्न हुए और उन्होंने ६८ । वीरभद्रको गणोंका अध्यक्ष बना दिया ॥ ६८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे यज्ञविध्वंसवर्णनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें यज्ञविध्वंसवर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

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अ ० ३८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४७७ अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः दधीचि मुनि और राजा क्षुवके विवादका इतिहास, शुक्राचार्यद्वारा दधीचिको महामृत्युंजयमन्त्रका उपदेश, मृत्युंजयमन्त्रके सूत उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विधेरमितधीमतः ।

पप्रच्छ नारदः प्रीत्या विस्मितस्तं द्विजोत्तमः ॥ १

नारद उवाच

शिवं विहाय दक्षस्य सुरैर्यज्ञं हरिर्गतः ।

हेतुना केन तद् ब्रूहि यत्रावज्ञाभवत्ततः ॥ २

जानाति किं स शंभुं नो हरिः प्रलयविक्रमम् ।

रणं कथं च कृतवान् तद्गणैरबुधो यथा ॥ ३

एष मे संशयो भूयांस्तं छिंधि करुणानिधे ।

चरितं ब्रूहि शंभोस्तु चित्तोत्साहकरं प्रभो ॥ ४

ब्रह्मोवाच द्विजवर्य शृणु प्रीत्या चरितं शशिमौलिनः ॥ यत्पृच्छते कुर्वतश्च सर्वसंशयहारकम् ॥ ५

दधीचस्य मुनेः शापाद् भ्रष्टज्ञानो हरिः पुरा ।

सामरो दक्षयज्ञं वै गतः क्षुवसहायकृत् ॥ ६

नारद उवाच

किमर्थं शप्तवान्विष्णुं दधीचो मुनिसत्तमः ।

कोऽपकारः कृतस्तस्य हरिणा तत्सहायिना ॥ ७

ब्रह्मोवाच

समुत्पन्नो महातेजा राजा क्षुव इति स्मृतः ।

अभून्मित्रं दधीचस्य मुनीन्द्रस्य महाप्रभोः ॥ ८

चिरात्तप: प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुवदधीचयोः ।

महानर्थकरः ख्यातस्त्रिलोकेष्वभवत्पुरा ॥ ९

तत्र त्रिवर्णतः श्रेष्ठो विप्र एव न संशयः ।

इति प्राह दधीचो हि शिवभक्तस्तु वेदवित् ॥ १०

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दधीचस्य महामुनेः ।

क्षुवः प्राहेति नृपतिः श्रीमदेन विमोहितः ॥ ११

अनुष्ठानसे दधीचिको अवध्यताकी प्राप्ति सूतजी बोले- अत्यन्त बुद्धिमान् ब्रह्माका यह वचन सुनकर द्विजश्रेष्ठ नारद विस्मित होकर प्रसन्नतापूर्वक उनसे पूछने लगे ॥१ ॥

नारदजी बोले— [ हे ब्रह्मन्! ] भगवान् विष्णु शिवजीको छोड़कर [ अन्य ] देवताओंके साथ दक्षके यज्ञमें किस कारणसे गये, जहाँ उनका तिरस्कार ही हुआ, इसे बताइये । क्या वे प्रलयकारी पराक्रमवाले शंकरको नहीं जानते थे, उन्होंने अज्ञानीकी भाँति शिवगणोंके साथ युद्ध क्यों किया? ॥२-३ ॥ हे करुणानिधे! यह मुझे बहुत बड़ा सन्देह है, आप उसे दूर कीजिये और प्रभो! मनमें उत्साह पैदा करनेवाले शिवचरित्रको भी कहिये ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे द्विजवर्य! आप प्रेमपूर्वक शिवचरित्रका श्रवण कीजिये, जो पूछनेवालों तथा कहनेवालोंके सभी सन्देहोंको दूर करता है ॥५ ॥

पूर्वकालमें दधीचि मुनिने राजा क्षुवकी सहायता करनेवाले श्रीहरिको शाप दे दिया था, इसलिये भ्रष्ट ज्ञानवाले वे विष्णु देवताओंके साथ दक्षके यज्ञमें चले गये ॥ ६ ॥

नारदजी बोले – [ हे ब्रह्मन्! ] मुनियोंमें श्रेष्ठ दधीचिने भगवान् विष्णुको शाप क्यों दिया? क्षुवकी सहायता करनेवाले विष्णुने उनका कौन - सा अपकार किया था ॥७ ॥

ब्रह्माजी बोले- क्षुव नामसे प्रसिद्ध एक महा-तेजस्वी राजा उत्पन्न हुए थे । वे महाप्रभावशाली मुनीश्वर दधीचिके मित्र थे । पूर्वकालमें लम्बे समयसे तपके प्रसंगको लेकर क्षुव और दधीचिमें महान् अनर्थकारी विवाद आरम्भ हो गया, जो तीनों लोकोंमें विख्यात हो गया ॥८ - ९ ॥ उस विवादमें वेदविद् शिवभक्त दधीचिने कहा कि तीनों वर्णोंमें ब्राह्मण ही श्रेष्ठ हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ १० ॥

महामुनि दधीचिकी यह बात सुनकर धनके मदसे विमोहित राजा क्षुवने इस प्रकार प्रतिवाद किया ॥ ११ ॥

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४७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ क्षुव उवाच

अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ।

तस्मान्नृपो वरिष्ठो हि वर्णाश्रमपतिः प्रभुः ॥ १२

सर्वदेवमयो राजा श्रुतिः प्राहेति तत्परा ।

महती देवता या सा सोऽहमेव ततो मुने ॥ १३

तस्माद्विप्राद्वरो राजा च्यावनेय विचार्यताम् ।

नावमन्तव्य एवातः पूज्योऽहं सर्वथा त्वया ॥ १४

ब्रह्मोवाच

श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुवस्य मुनिसत्तमः ।

श्रुतिस्मृतिविरुद्धं तं चुकोपातीव भार्गवः ॥ १५

अथ क्रुद्धो महातेजा गौरवाच्चात्मनो मुने ।

अताडयत्क्षुवं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टितः ॥ १६

वज्रेण तं च चिच्छेद दधीचं ताडितः क्षुवः ।

जगर्जातीव संक्रुद्धो ब्रह्मांडाधिपतिः कुधीः ॥ १७ ।

पपात भूमौ निहतो तेन वज्रेण भार्गवः ।

शुक्रं सस्मार क्षुवकृद्भार्गवस्य कुलंधरः ॥ १८

शुक्रोऽथ संधयामास ताडितं च क्षुवेन तु ।

योगी दधीचस्य तदा देहमागत्य स द्रुतम् ॥ १ ९

संधाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः ।

शिवभक्ताग्रणीर्मृत्युञ्जयविद्याप्रवर्तकः ॥२०

शुक्र उवाच

दधीच तात संपूज्य शिवं सर्वेश्वरं प्रभुम् ।

महामृत्युञ्जयं मन्त्रं श्रौतमग्रयं वदामि ते ॥ २१

त्र्यम्बकं यजामहे त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम् । ।

त्रिमंडलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम् ॥ २२ ।

* त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव क्षुव बोले- राजा [ इन्द्र आदि ] आठ | लोकपालोंके स्वरूपको धारण करता है तथा समस्त वर्णों और आश्रमोंका स्वामी एवं प्रभु है, इसलिय । राजा ही सबसे श्रेष्ठ है । राजाकी श्रेष्ठता प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी कहती है कि राजा सर्वदेवमय है । इसलिये हे मुने! जो सबसे बड़ा देवता है, वह मैं ही हूँ ॥ १२-१३ ॥ अतः हे च्यवनपुत्र! राजा ब्राह्मणसे श्रेष्ठ होता है, आप [ इस सम्बन्धमें ] विचार करें और मेरा अनादर न करें, मैं आपके लिये सर्वथा पूजनीय हॅू ॥१४ ॥

ब्रह्माजी बोले- उन क्षुवका श्रुतियों और स्मृतियोंके विरुद्ध यह मत सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि अत्यन्त कुपित हो उठे ॥१५ ॥

तब हे मुने! आत्मगौरवके कारण कुपित हुए महातेजस्वी दधीचिने क्षुवके मस्तकपर [ अपनी ] बायीं मुट्ठीसे प्रहार किया ॥१६ ॥

तत्पश्चात् [ दधीचिके द्वारा ] ताड़ित किये गये ब्रह्माण्डाधिपति दुष्ट क्षुव अत्यन्त कुपित हो गरज उठे और उन्होंने वज्रसे दधीचिका सिर काट डाला ॥ १७ ॥

उस वज्रसे आहत हो दधीचि पृथिवीपर गिर पड़े । क्षुवके द्वारा काटे गये भार्गववंशधर दधीचिने [ गिरते समय ] शुक्राचार्यका स्मरण किया ॥ १८ ॥

तब योगी शुक्राचार्यने आकर क्षुवके द्वारा दधीचिके काटे गये शरीरको तुरंत जोड़ दिया ॥ १ ९ ॥ दधीचिकी देहको पूर्वकी भाँति ठीक करके शिवभक्तशिरोमणि तथा मृत्युंजयविद्याके प्रवर्तक शुक्राचार्य उनसे कहने लगे —॥२० ॥

शुक्र बोले- हे तात! दधीचि! मैं सर्वेश्वर प्रभु शंकरका पूजन करके श्रेष्ठ वैदिक महामृत्युंजय मन्त्र का आपको उपदेश देता हूँ ॥ २१ ॥

[ ' त्र्यम्बकं यजामहे ' ] हम त्रिलोकीके पिता, तीन नेत्रवाले, तीनों मण्डलों ( सूर्य, सोम तथा अग्नि ) -के पिता तथा तीनों गुणों ( सत्त्व, रज तथा तम ) -के स्वामी महेश्वरका पूजन करते हैं ॥२२ ॥

बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ ( यजुर्वेद ३।६० )