शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 491–500

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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अ ० ३८ ] रुद्रसंहिता (

त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः ।

त्रिदिवस्य त्रिबाहोश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः ॥ २३

त्रिदेवस्य महादेवः सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् ।

सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणेषु कृतौ यथा ॥ २४

इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च ।

पुष्पे सुगंधिवत्सूरः सुगंधिरमरेश्वरः ॥ २५

पुष्टिश्च प्रकृतेर्यस्मात्पुरुषाद् वै द्विजोत्तम ।

महदादिविशेषान्तविकल्पश्चापि सुव्रत ॥ २६

विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने ।

इन्द्रियाणां च देवानां तस्माद् वै पुष्टिवर्धनः ॥ २७

तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसापि वा ।

स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च प्रजायते ॥ २८

सत्येनान्येन सूक्ष्माग्रान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम् ।

बंधमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः ॥ २ ९

मृतसञ्जीवनीमन्त्रो मम सर्वोत्तमः स्मृतः ।

एवं जपपरः प्रीत्या नियमेन शिवं स्मरन् ॥ ३०

जप्त्वा

' हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पिब दिवानिशम् ।

शिवस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं क्वचित् ॥ ३१

कृत्वा न्यासादिकं सर्वं संपूज्य विधिवच्छिवम् ।

संविधायेदं निर्व्यग्रः शंकरं भक्तवत्सलम् ॥ ३२

सतीखण्ड ) ४७ ९ जो त्रितत्त्व ( आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व ), त्रिवह्नि ( आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि ) तथा पृथिवी, जल, तेज – इन तीनों भूतोंके एवं जो त्रिदिव ( स्वर्ग ), त्रिबाहु तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव - इन तीनों देवताओंके महान् ईश्वर महादेवजी हैं । ‘ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ' [ महामृत्युंजयमन्त्रका यह द्वितीय चरण है ] जैसे फूलोंमें उत्तम गन्ध होती है, उसी प्रकार वे भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंमें, तीनों गुणोंमें, समस्त कृत्योंमें, इन्द्रियोंमें, अन्यान्य देवोंमें और गणोंमें उनके प्रकाशक सारभूत आत्माके रूपमें व्याप्त हैं । अतएव सुगन्धयुक्त एवं सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर हैं ॥ २३–२५ ॥ हे द्विजोत्तम! जिन महापुरुषसे प्रकृतिकी पुष्टि होती है । हे सुव्रत! महत् तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त विकल्पके जो स्वरूप हैं । हे महामुने! जो विष्णु, पितामह, मुनिगणों एवं इन्द्रियोंसहित समस्त देवताओंकी पुष्टिका वर्धन करते हैं, इसलिये वे पुष्टिवर्धन हैं ॥ २६-२७ ॥ वे देव रुद्र अमृतस्वरूप हैं । जो पुण्यकर्मसे, तपस्यासे, स्वाध्यायसे, योगसे अथवा ध्यानसे उनकी आराधना करता है, उसे वे प्राप्त हो जाते हैं ॥२८ ॥

जिस प्रकार ककड़ीका पौधा अपने फलसे स्वयं ही लताको बन्धनमें बाँधे रखता है और पक जानेपर स्वयं ही उसे बन्धनसे मुक्त कर देता है, ठीक उसी प्रकार बन्धमोक्षकारी प्रभु सदाशिव अपने सत्यसे जगत्के समस्त प्राणियोंको मृत्युके पाशरूप सूक्ष्म बन्धनसे छुड़ा देते हैं ॥ २ ९ ॥ यह मृतसंजीवनी मन्त्र है, जो मेरे मतसे सर्वोत्तम है । हे दधीचि! आप मेरे द्वारा दिये गये इस मन्त्रका शिवध्यानपरायण होकर नियमसे जप कीजिये ॥ ३० ॥

जप और हवन भी इसी मन्त्रसे करें और इसी मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर दिन और रातमें जल भी पीजिये तथा शिव - विग्रहके पास स्थित हो उन्हींका ध्यान करते रहिये, इससे कभी भी मृत्युका भय नहीं रहता ॥ ३१ सब न्यास आदि करके विधिवत् शिवकी पूजा करके व्यग्रतारहित हो भक्तवत्सल सदाशिवका ध्यान करें ॥ ३२ ॥

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४८० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८

ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि यथा ध्यात्वा जपेन्मनुम् ।

सिद्धमन्त्रो भवेद्धीमान् यावच्छंभुप्रभावतः ॥ ३३

हस्तांभोजयुगस्थ कुंभयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ । अक्षस्त्रमृगहस्तमंबुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्रवत्-पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम् ॥ ३४ ब्रह्मोवाच

उपदिश्येति शुक्रः तं दधीचिं मुनिसत्तमम् ।

स्वस्थानमगमत्तात संस्मरन् शंकरं प्रभुम् ॥ ३५

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दधीचो हि महामुनिः ।

वनं जगाम तपसे महाप्रीत्या शिवं स्मरन् ॥ ३६

तत्र गत्वा विधानेन महामृत्युञ्जयाभिधम् ।

तं मनुं प्रजपन् प्रीत्या तपस्तेपे शिवं स्मरन् ॥ ३७

तन्मनुं सुचिरं जप्त्वा तपसाराध्य शंकरम् ।

शिवं संतोषयामास महामृत्युञ्जयं हि सः ॥ ३८

अथ शंभुः प्रसन्नात्मा तज्जपाद्भक्तवत्सलः ।

आविर्बभूव पुरतस्तस्य प्रीत्या महामुने ॥ ३ ९

तं दृष्ट्वा स्वप्रभुं शंभुं स मुमोद मुनीश्वरः ।

प्रणम्य विधिवद्भक्त्या तुष्टाव सुकृताञ्जलिः ॥ ४०

|

अथ प्रीत्या शिवस्तात प्रसन्नश्च्यावनिं मुने । ।

वरं ब्रूहीति स प्राह सुप्रसन्नेन चेतसा ॥ ४१

अब मैं सदाशिवके ध्यानको बता रहा जिसके अनुसार उनका ध्यान करके मन्त्रजप हूँ, करना । चाहिये । इस प्रकार [ जप करनेसे ] बुद्धिमान् भगवान् शिवके प्रभावसे उस मन्त्रको सिद्ध कर पुरुष लेता है ॥३३ ॥

[ ध्यानमन्त्रका अर्थ इस प्रकार है ] अपने दो करकमलोंमें स्थित दोनों कुम्भोंसे जलको निकालकर ऊपरवाले दोनों हाथोंसे सिरपर अभिषेक कर हुए, कुम्भसहित अपने अन्य दोनों हाथोंको अपनी गोदमें धारण करते हुए, शेष दो हाथोंसे अक्षमाला तथा मृगमुद्रा धारण करनेवाले, कमलके आसनपर विराजमान, सिरपर स्थित चन्द्रमासे टपकते हुए अमृतकणसे भीगे हुए शरीरवाले तथा तीन नेत्रवाले पार्वतीसहित महामृत्युंजय भगवान्का मैं ध्यान करता हूँ ॥३४ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे तात! मुनिश्रेष्ठ दधीचिको इस प्रकार उपदेश देकर शुक्राचार्य भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए अपने स्थानको चले गये ॥ ३५ ॥

उनकी बात सुनकर महामुनि दधीचि बड़े प्रेमसे शिवजीका स्मरण करते हुए तपस्याके लिये वनमें गये ॥ ३६ ॥

वहाँ जाकर वे विधिपूर्वक महामृत्युंजय नामक उस मन्त्रका जप करते हुए और प्रेमपूर्वक शिवका चिन्तन करते हुए तपस्या करने लगे ॥३७ ॥

दीर्घकालतक उस महामृत्युंजय मन्त्रका जप करके तपस्याद्वारा शंकरकी आराधना करके उन्होंने शिवको प्रसन्न कर लिया ॥ ३८ ॥

हे महामुने! तब उस जपसे प्रसन्नचित्त हुए भक्तवत्सल शिव उनके सामने प्रेमपूर्वक प्रकट हो गये ॥३ ९ ॥ अपने प्रभु शम्भुका [ साक्षात् ] दर्शन करके वे मुनीश्वर आनन्दित हो गये और उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे स्तवन करने लगे ॥४० ॥

हे तात! हे मुने! उसके बाद मुनिके प्रेमसे आनन्दित उन शिवने अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे दधीचिसे कहा - वर माँगो । शिवका वह वचन

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अ ० ३८ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८१

तच्छ्रुत्वा शंभुवचनं दधीचो भक्तसत्तमः ।

साञ्जलिर्नतकः प्राह शंकरं भक्तवत्सलम् ॥ ४२

दधीच उवाच

देवदेव महादेव मह्यं देहि वरत्रयम् ।

वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं हि सर्वतः ॥ ४३

ब्रह्मोवाच

तदुक्तवचनं श्रुत्वा प्रसन्नः परमेश्वरः ।

वरत्रयं ददौ तस्मै दधीचाय तथास्त्विति ॥ ४४

वरत्रयं शिवात्प्राप्य सानंदश्च महामुनिः ।

क्षुवस्थानं जगामाशु वेदमार्गे प्रतिष्ठितः ॥ ४५

प्राप्यावध्यत्वमुग्ग्रात्स वज्रास्थित्वमदीनताम् ।

अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि ॥ ४६

क्षुवो दधीचं वज्रेण जघानोरस्यथो नृपः ।

क्रोधं कृत्वा विशेषेण विष्णुगौरवगर्वितः ॥ ४७

नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः ।

प्रभावात्परमेशस्य धातृपुत्रो विसिस्मिये ॥ ४८

दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च वज्रस्य चात्यन्तपरप्रभावम् । क्षुवो दधीचस्य मुनीश्वरस्य विसिस्मिये चेतसि धातृपुत्रः ॥ ४ ९ आराधयामास हरिं मुकुन्द-मिन्द्रानुजं काननमाशु गत्वा । प्रपन्नपालश्च पराजितो हि दधीच मृत्युञ्जयसेवकेन ॥५०

पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् मधुसूदनः ।

प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः ॥ ५१

दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम् ।

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम् ॥ ५२

सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराद्यैः स्तुत्वा स्तुतं देवमजेयमीशम् । विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या जनार्दनाय प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥ ५३ सुनकर भक्तश्रेष्ठ दधीचि दोनों हाथ जोड़कर नतमस्तक हो भक्तवत्सल शंकरसे कहने लगे— ॥ ४१-४२ ॥ दधीचि बोले – हे देवदेव! हे महादेव! मुझे तीन वर दीजिये, मेरी हड्डी वज्र हो जाय, कोई भी मेरा वध न कर सके और मैं सर्वथा अदीन रहूँ ॥ ४३ ॥

ब्रह्माजी बोले- उनके कहे हुए वचनको सुनकर प्रसन्न हुए परमेश्वरने ' तथास्तु ' कहा और उन दधीचिको तीनों वर दे दिये । शिवजीसे तीन वर पाकर वेदमार्गमें प्रतिष्ठित महामुनि आनन्दमग्न हो गये और शीघ्र ही राजा क्षुवके स्थानपर गये ॥ ४४-४५ ॥ उग्र स्वभाववाले महादेवजीसे अवध्यता, अस्थिके वज्रमय होने और अदीनताका वर पाकर दधीचिने राजेन्द्र क्षुवके मस्तकपर पादमूलसे प्रहार किया ॥ ४६ ॥

तब विष्णुकी महिमासे गर्वित राजा क्षुवने भी क्रोधित होकर दधीचिकी छातीपर वज्रसे प्रहार किया ॥ ४७ ॥

वह वज्र परमेश्वर शिवके प्रभावसे महात्मा दधीचिका [ कुछ भी ] अनिष्ट न कर सका, इससे ब्रह्मपुत्र क्षुवको आश्चर्य हुआ । मुनीश्वर दधीचिकी अवध्यता, अदीनता तथा वज्रसे बढ़कर प्रभाव देखकर ब्रह्मकुमार क्षुवके मनमें बड़ा विस्मय हुआ ॥ ४८-४९ ॥ वे शरणागतपालक नरेश मृत्युंजयके सेवक दधीचिसे पराजित होकर शीघ्र ही वनमें जाकर इन्द्रके छोटे भाई मुकुन्द हरिकी आराधना करने लगे ॥५० ॥

उनकी पूजासे सन्तुष्ट होकर गरुडध्वज भगवान् मधुसूदनने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की ॥५१ ॥

उस दिव्य दृष्टिसे गरुडध्वज जनार्दन देवका दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके क्षुवने प्रिय वचनोंके द्वारा उनकी स्तुति की ॥५२ ॥

इस प्रकार इन्द्र आदिसे स्तुत उन अजेय ईश्वर देवका पूजन और स्तवन करके वे [ राजा क्षुव ] भक्तिभावसे उनकी ओर देखकर मस्तक झुकाकर । प्रणाम करके उन जनार्दनसे कहने लगे -॥५३ ॥

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पृष्ठ 494

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४८२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३८ राजोवाच राजा बोले- हे भगवन्! दधीचि नामसे भगवन् ब्राह्मणः कश्चिद्दधीच इति विश्रुतः । प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हैं, जो धर्मके ज्ञाता तथा विनम्र धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुराभवत् ॥५४ स्वभाववाले हैं, वे पहले मेरे मित्र थे ॥ ५४ ॥

अवध्यः सर्वदा सर्वैः शंकरस्य प्रभावतः । वे निर्विकार मृत्युंजय महादेवकी आराधना तमाराध्य महादेवं मृत्युञ्जयमनामयम् ॥ ५५ | करके उन्हीं शिवजीके प्रभावसे सबके द्वारा सदा लिये अवध्य हो गये हैं ॥५५ ॥

सावज्ञं वामपादेन मम मूर्ध्नि सदस्यपि । [ एक दिन ] उन महातपस्वी दधीचिने भरी ताडयामास वेगेन स दधीचो महातपाः ॥ ५६ सभामें अपने बायें पैरसे मेरे मस्तकपर बड़े वेगसे उवाच मां च गर्वेण न बिभेमीति सर्वतः । अवहेलनापूर्वक प्रहार किया और बड़े गर्वसे मुझसे मृत्युञ्जयाप्तसुवरो गर्वितो ह्यतुलं हरे ॥५७ कहा- मैं किसीसे नहीं डरता । हे हरे! वे मृत्युंजयसे ब्रह्मोवाच

अथ ज्ञात्वा दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः ।

सस्मारास्य महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः ॥

एवं स्मृत्वा हरिः प्राह क्षुवं विधिसुतं द्रुतम् ।

विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमण्वपि कुत्रचित् ॥

विशेषाद् रुद्रभक्तानां भयं नास्ति च भूपते ।

दुःखं करोति विप्रस्य शापार्थं स सुरस्य मे ॥

भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरेश्वरात् ।

विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च ॥

तस्मात्समेत्य राजेन्द्र सर्वयज्ञो न भूयते ।

उत्तम वर पाकर अनुपम गर्वसे भर गये हैं । ५६-५७ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] महात्मा दधीचिकी अवध्यताको जानकर श्रीहरिने महेश्वरके अतुलित ५८ प्रभावका स्मरण किया । इस प्रकार स्मरण करके विष्णु ब्रह्मपुत्र क्षुवसे शीघ्र बोले- राजेन्द्र! ब्राह्मणोंको ५ ९ कहीं भी थोड़ा - सा भी भय नहीं है ॥ ५८-५९ ॥ हे भूपते! विशेष रूपसे रुद्रभक्तोंके लिये तो भय ६० है ही नहीं । यदि मैं आपकी ओरसे कुछ करूँ तो ब्राह्मण दधीचिको दुःख होगा और वह मुझ जैसे देवताके लिये भी शापका कारण बन जायगा ॥६० ॥

हे राजेन्द्र! दधीचिके शापसे दक्षके यज्ञमें ६१ सुरेश्वर शिवके द्वारा मेरा विनाश होगा और फिर उत्थान भी होगा ॥ ६१ ॥

हे राजेन्द्र! दधीचिके शापके कारण ही सभी करोमि यलं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते ॥ ६२ देवताओं, मेरे तथा ब्रह्माके उपस्थित रहनेपर भी दक्षका यज्ञ सफल नहीं होगा । हे महाराज! मैं आपके लिये दधीचिको जीतनेका प्रयास करूँगा ॥ ६२ ॥

विष्णुका यह वचन सुनकर राजा क्षुवने कहा — ऐसा ही हो । इस प्रकार कहकर वे उस तस्थौ श्रुत्वा वाक्यं क्षुवः प्राह तथास्त्विति हरेर्नृपः । कार्यके लिये मन - ही - मन उत्सुक हो प्रसन्नतापूर्वक

तत्रैव तत्प्रीत्या तत्कामोत्सुकमानसः ॥ ६३ । वहीं ठहर गये ॥ ६३ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे क्षुवदधीचवादवर्णनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके ॥ ३८ ॥

द्वितीय सतीखण्डमें क्षुव और दधीचिके विवादका वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

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पृष्ठ 495

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अ ० ३ ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८३ अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिद्वारा देवताओंको शाप देना तथा राजा ब्रह्मोवाच

क्षुवस्य हितकृत्येन दधीचस्याश्रमं ययौ ।

विप्ररूपमथास्थाय भगवान् भक्तवत्सलः ॥

दधीचं प्राह विप्रर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः ।

क्षुवकार्यार्थमुद्युक्तः शैवेन्द्रं छलमाश्रितः ॥

विष्णुरुवाच

भो भो दधीच विप्रर्षे भवार्चनरताव्यय ।

वरमेकं वृणे त्वत्तस्तद्भवान् दातुमर्हति ॥

ब्रह्मोवाच

याचितो देवदेवेन दधीचः शैवसत्तमः ।

क्षुवकार्यार्थिना शीघ्रं जगाद वचनं हरिम् ॥

दधीच उवाच

ज्ञातं तवेप्सितं विप्र क्षुवकार्यार्थमागतः ।

भगवान् विप्ररूपेण मायी त्वमसि वै हरिः ॥

भूतं भविष्यं देवेश वर्तमानं जनार्दन ।

ज्ञानं प्रसादाद् रुद्रस्य सदा त्रैकालिकं मम ॥

त्वां जानेऽहं हरिं विष्णुं द्विजत्वं त्यज सुव्रत ।

आराधितोऽसि भूपेन क्षुवेण खलबुद्धिना ॥

जाने तवैव भगवन् भक्तवत्सलतां हरे ।

छलं त्यज स्वरूपं हि स्वीकुरु स्मर शंकरम् ॥

अस्ति चेत्कस्यचिद्भीतिर्भवार्चनरतस्य मे ।

वक्तुमर्हसि यत्नेन सत्यधारणपूर्वकम् ॥

वदामि न मृषा क्वापि शिवस्मरणसक्तधीः ।

न बिभेमि जगत्यस्मिन्देवदैत्यादिकादपि ॥

विष्णुरुवाच

भयं दधीच सर्वत्र नष्टं च तव सुव्रत ।

भवार्चनरतो यस्माद्भवान्सर्वज्ञ एव च ॥

क्षुवपर अनुग्रह करना ब्रह्माजी बोले - [ नारद! ] भक्तवत्सल भगवान् विष्णु राजा क्षुवके हितसाधनके लिये ब्राह्मणका १ रूप धारणकर दधीचिके आश्रम में गये ॥१ ॥

कपटरूप धारण करके जगद्गुरु श्रीहरि शिवभक्तोंमें २ श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि दधीचिको प्रणाम करके क्षुवके कार्यकी सिद्धिके लिये तत्पर हो उनसे कहने लगे— ॥२ ॥

विष्णु बोले - हे दधीचि! शिवकी आराधनामें तत्पर रहनेवाले हे विप्रर्षे! हे अव्यय! मैं आपसे एक ३ वर माँगता हूँ, कृपा करके उसे आप मुझे दीजिये ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले- क्षुवकी कार्यसिद्धि चाहनेवाले देवदेव विष्णुके द्वारा याचित परम शिवभक्त दधीचि ४ विष्णुसे शीघ्र यह वचन कहने लगे —॥४ ॥

दधीचि बोले- हे विप्र! मैंने आपका अभीष्ट जान लिया है, आप भगवान् श्रीहरि क्षुवके कार्यके ५ लिये ही यहाँ ब्राह्मणका रूप धारणकर आये हैं, आप तो मायावी हैं । हे देवेश! हे जनार्दन! शिवजीकी कृपासे मुझे भूत - भविष्य और वर्तमान – इन तीनों ६ कालोंका ज्ञान सदा रहता है॥५-६ ॥ मैं आप श्रीहरि विष्णुको जानता हूँ । हे ७ सुव्रत! इस ब्राह्मणवेशको छोड़िये । दुष्टबुद्धिवाले क्षुवने आपकी आराधना की है । हे भगवन्! हे हरे! मैं आपकी भक्तवत्सलताको जानता हूँ, यह छल ८ छोड़िये, अपने रूपको ग्रहण कीजिये और भगवान् शंकरका स्मरण कीजिये ॥ ७-८ ॥ शंकरकी आराधनामें लगे रहनेवाले मुझसे यदि ९ किसीको भय हो, तो आप उसे यत्नपूर्वक सत्यकी शपथके साथ कहिये । शिवके स्मरणमें आसक्त बुद्धिवाला मैं कभी झूठ नहीं बोलता । मैं इस संसारमें १० किसी देवता या दैत्यसे भी नहीं डरता॥९ -१० ॥ विष्णु बोले- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हे दधीचि! आपका भय तो सर्वथा नष्ट ही है; क्योंकि आप शिवकी आराधनामें तत्पर रहते हैं और ११ । सर्वज्ञ हैं ॥ ११ ॥

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पृष्ठ 496

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४८४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३ ९ बिभेमीति सकृद्वक्तुमर्हसि त्वं नमस्तव । आपको नमस्कार है । आप मेरे कहनेसे एक नियोगान्मम राजेन्द्र क्षुवात् प्रतिसहादहम् ॥ १२ बार अपने प्रतिद्वन्द्वी राजा क्षुवसे यह कह दीजिये हे राजेन्द्र! मैं आपसे डरता हूँ ॥१२ ॥

ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- विष्णुका यह वचन एवं श्रुत्वापि तद्वाक्यं विष्णोः स तु महामुनिः । भी शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ महामुनि दधीचि हँसकर सुनकर निर्भय विहस्य निर्भयः प्राह दधीचः शैवसत्तमः ॥ १३ हो कहने लगे — ॥ १३ ॥

दधीच उवाच दधीचि बोले- मैं पिनाकधारी देवाधिदेव न बिभेमि सदा क्वापि कुतश्चिदपि किंचन । शम्भुके प्रभावसे कहीं भी किसीसे किंचिन्मात्र भी प्रभावाद्देवदेवस्य शंभो: साक्षात्पिनाकिनः ॥ १४ नहीं डरता हूँ ॥१४ ॥

ब्रह्मोवाच

ततस्तस्य मुनेः श्रुत्वा वचनं कुपितो हरिः ।

चक्रमुद्यम्य संतस्थौ दिधक्षुर्मुनिसत्तमम् ॥१५

अभवत्कुंठितं तत्र विप्रे चक्रं सुदारुणम् ।

प्रभावाच्च तदीशस्य नृपतेः सन्निधावपि ॥ १६

दृष्ट्वा तं कुंठितास्यं तच्चक्रं विष्णुं जगाद ह ।

दधीचः सस्मितं साक्षात्सदसद्व्यक्तिकारणम् ॥ १७

दधीच उवाच भगवन् भवता लब्धं पुरातीव सुदारुणम् ।

सुदर्शनमिति ख्यातं चक्रं विष्णोः प्रयत्नतः ।

भवस्य तच्छुभं चक्रं न जिघांसति मामिह ॥ १८

भगवानथ क्रुद्धोऽस्मै सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः ।

ब्रह्मास्त्राद्यैः शरैश्चास्त्रैः प्रयत्नं कर्तुमर्हसि ॥ १ ९

ब्रह्मोवाच

स तस्य वचनं श्रुत्वा दृष्ट्वा निर्वीर्यमानुषम् ।

ससर्जाथ क्रुधा तस्मै सर्वास्त्राणि क्रमाद्धरिः ॥ २०

चक्रुर्देवास्ततस्तस्य विष्णोः साहाय्यमादरात् ।

द्विजेनैकेन संयोद्धुं प्रसृतस्य विबुद्धयः ॥ २१

चिक्षिपुः स्वानि स्वान्याशु शस्त्राण्यस्त्राणि सर्वतः ।

दधीचोपरि वेगेन शक्राद्या हरिपाक्षिकाः ॥ २२

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कुशमुष्टिमथादाय दधीचः संस्मरन् शिवम् । ।

ससर्ज सर्वदेवेभ्यो वज्रास्थिः सर्वतो वशी ॥ २३ ।

ब्रह्माजी बोले — उन मुनिका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णु क्रोधित हो उठे और वे मुनिश्रेष्ठ दधीचिको जलानेकी इच्छासे अपने चक्रको ऊपर उठाकर खड़े हो गये । राजा क्षुवके सामने ही ब्राह्मणपर चलाया जानेवाला उनका भयंकर चक्र शिवजीके प्रभावसे वहींपर कुण्ठित हो गया । इस प्रकार उस चक्रको कुण्ठित हुआ देखकर दधीचि हँसते हुए सत् एवं असत्की अभिव्यक्तिके कारणभूत । भगवान् विष्णुसे कहने लगे— ॥ १५–१७ ॥ दधीचि बोले- हे भगवन्! आपने पूर्व समयमें [ तपस्याके ] प्रयत्नसे शिवजीसे सुदर्शन नामक अत्यन्त दारुण जिस चक्रको प्राप्त किया है, शिवजीका वह शुभ चक्र मुझे नहीं मारना चाहता है । तब भगवान् श्रीहरिने क्रुद्ध होकर क्रमसे सभी अस्त्रोंको उनपर चलाया । [ इसपर दधीचिने कहा – ] अब आप ब्रह्मास्त्र आदि बाणोंसे तथा अन्य प्रकारके अस्त्रोंसे प्रयत्न कीजिये ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले - दधीचिके वचनको सुनकर भगवान् विष्णु उन्हें अपने सामने अत्यन्त तुच्छ मनुष्य समझकर क्रोधित हो अन्य प्रकारके अस्त्रोंका उनपर । प्रयोग करने लगे । उस समय एकमात्र उस ब्राह्मणसे युद्ध करनेके लिये मूर्ख देवता भी आदरपूर्वक विष्णुकी सहायता करने लगे ॥ २०-२१ ॥ विष्णुपक्षीय इन्द्र आदि देवगण भी दधीचिके ऊपर बड़े वेगसे अपने - अपने अस्त्र - शस्त्र शीघ्र चलाने लगे । तब वज्र हुई अस्थियोंवाले जितेन्द्रिय दधीचिने शिवजीका स्मरण करते हुए मुट्ठीभर कुशा लेकर सभी देवताओंपर प्रयोग किया॥२२-२३ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_17_2_Back

पृष्ठ 497

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अ ० ३ ९ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८५

शंकरस्य प्रभावात्तु कुशमुष्टिर्मुनेर्हि सा ।

दिव्यं त्रिशूलमभवत् कालाग्निसदृशं मुने ॥

दग्धुं देवान् मतिं चक्रे सायुधान् सशिखं च तत् ।

प्रज्वलत्सर्वतः शैवं युगांताग्न्यधिकप्रभम् ॥

नारायणेन्द्रमुख्यैस्तु देवैः क्षिप्तानि यानि च ।

आयुधानि समस्तानि प्रणेमुस्त्रिशिखं च तत् ॥

देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे ध्वस्तवीर्या दिवौकसः ।

तस्थौ तत्र हरिर्भीतः केवलं मायिनां वरः ॥

ससर्ज भगवान् विष्णुः स्वदेहात्पुरुषोत्तमः ।

आत्मनः सदृशान् दिव्यान् लक्षलक्षायुतान् गणान् ॥

ते चापि युयुधुस्तत्र वीरा विष्णुगणास्ततः ।

मुनिनैकेन देवर्षे दधीचेन शिवात्मना ॥

ततो विष्णुगणांस्तान्वै नियुध्य बहुशो रणे ।

ददाह सहसा सर्वान् दधीचः शैवसत्तमः ॥

ततस्तद्विस्मयार्थाय दधीचस्य मुनेर्हरिः ।

विश्वमूर्तिरभूच्छीघ्रं महामायाविशारदः ॥

तस्य देहे हरेः साक्षादपश्यद् द्विजसत्तमः ।

दधीचो देवतादीनां जीवानां च सहस्रकम् ॥

भूतानां कोटयश्चैव गणानां कोटयस्तथा ।

अंडानां कोटयश्चैव विश्वमूर्तेस्तनौ तदा ॥

दृष्ट्वैतदखिलं तत्र च्यावनिः सततं तदा ।

विष्णुमाह जगन्नाथं जगत्स्तवमजं विभुम् ॥

दधीच उवाच मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासो विचारतः । विज्ञातानि सहस्राणि दुर्विज्ञेयानि माधव मयि पश्य जगत्सर्वं त्वया युक्तमतन्द्रितः ब्रह्माणं च तथा रुद्रं दिव्यां दृष्टिं ददामि ते हे मुने! शंकरजीके प्रभावसे [ मुनीश्वर २४ दधीचिके द्वारा प्रयुक्त ] वह मुट्ठीभर कुशा कालाग्निके समान दिव्य त्रिशूल बन गया ॥२४ ॥

चारों ओरसे जलता हुआ, प्रलयाग्निसे भी २५ अधिक तेजवाला तथा ज्वालाओंसे युक्त वह शैव अस्त्र आयुधोंसहित समस्त देवताओंको भस्म करनेका विचार करने लगा ॥ २५ ॥

उस समय विष्णु, इन्द्र आदि मुख्य देवताओंके २६ द्वारा जो अस्त्र छोड़े गये थे, वे सभी उस त्रिशूलको प्रणाम करने लगे । तब नष्टपराक्रमवाले सभी स्वर्गवासी देवगण [ इधर - उधर ] भागने लगे । मायावियोंमें श्रेष्ठ २७ स्वामी विष्णु ही एकमात्र भयभीत हो वहाँ स्थित रहे ॥ २६-२७ ॥ तब पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपने २८ शरीरसे अपने ही समान हजारों एवं लाखों दिव्य गणोंको उत्पन्न किया । हे देवर्षे! तदनन्तर विष्णुके वीरगण अकेले शिवस्वरूप दधीचिसे युद्ध करने २ ९ लगे ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ महर्षि दधीचिने ३० रणमें उन गणोंके साथ वहाँ बहुत युद्धकर सहसा उन सबको जला दिया ॥ ३० ॥

तब मायाविशारद भगवान् विष्णु महर्षि ३१ दधीचिको विस्मित करनेके लिये शीघ्र ही विश्वमूर्ति हो गये ॥३१ ॥

ब्राह्मणश्रेष्ठ दधीचिने [ उस समय ] उन विष्णुके ३२ शरीरमें हजारों देवता आदिको और अन्य जीवोंको देखा । उस समय विश्वमूर्तिके शरीरमें करोड़ों भूत, करोड़ों ३३ गण तथा करोड़ों ब्रह्माण्ड विद्यमान थे॥३२-३३ ॥ इन सभीको देखकर दधीचि मुनि जगत्पति, ३४ जगत्स्तुत्य, अजन्मा तथा अविनाश उन _भगवान् विष्णुसे कहने लगे - ॥३४ ॥

दधीचि बोले- हे महाबाहो! आप मायाको त्याग दीजिये । विचार करनेसे सब प्रतिभासमात्र प्रतीत ॥ ३५ होता है । हे माधव! मैंने भी हजारों दुर्विज्ञेय वस्तुओंको जान लिया है । अब आप निरालस्य होकर मुझमें । अपने सहित ब्रह्मा, रुद्र तथा सम्पूर्ण जगत्को देखिये, ॥ ३६ मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ ॥ ३५-३६ ॥

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४८६ ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वतनौ निखिलं मुनिः ब्रह्माण्डं च्यावनिः शंभुतेजसा पूर्णदेहकः तदाह विष्णुं देवेशं दधीचः शैवसत्तमः संस्मरन् शंकरं चित्ते विहसन् विभयः सुधीः दधीच उवाच मायया त्वनया किं वा मंत्रशक्त्याथ वा हरे सत्कामनामिमां कृत्वा योद्धुमर्हसि यत्नतः ब्रह्मोवाच

एतच्छ्रुत्वा मुनेस्तस्य वचनं निर्भयस्तदा ।

शंभुतेजोमयं विष्णुः चुकोपातीव तं मुनिम् ॥

देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम् ।

योद्धुकामाश्च मुनिना दधीचेन प्रतापिना ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्रागमन्मत्सङ्गतः क्षुवः ।

अवारयन्तं निश्चेष्टं पद्मयोनिं हरिं सुरान् ॥

निशम्य वचनं मे हि ब्राह्मणो न विनिर्जितः ।

जगाम निकटं तस्य प्रणनाम मुनिं हरिः ॥

क्षुवो दीनतरो भूत्वा गत्वा तत्र मुनीश्वरम् ।

दधीचमभिवाद्यैव प्रार्थयामास विक्लवः ॥

क्षुव उवाच

प्रसीद मुनिशार्दूल शिवभक्तशिरोमणे ।

प्रसीद परमेशान दुर्लक्ष्यो दुर्जनैः सदा ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य राज्ञः सुरगणस्य हि ।

अनुजग्राह तं विप्रो दधीचस्तपसां निधिः ॥

अथ दृष्ट्वा रमेशादीन् क्रोधविह्वलितो मुनिः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३ ९ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर । । शिवके तेजसे पूर्ण शरीरवाले दधीचि मुनिने भगवान ॥ ३७ शरीरमें समस्त ब्रह्माण्डको दिखाया । अपने । शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् दधीचि मनमें तत्पश्चात् शंकरका ॥ ३८ । स्मरण करते हुए निर्भय होकर देवेश भगवान् विष्णुसे कहने लगे ॥ ३७-३८ ॥ । दधीचि बोले- हे हरे! आपकी इस मायासे

। अथवा मन्त्रशक्तिसे क्या हो सकता है? आप श्रेष्ठ ।

॥ ३ ९ कामना करके यत्नपूर्वक मुझसे युद्ध कीजिये ॥ ३ ९ ॥

ब्रह्माजी बोले- तब उन मुनिका यह वचन सुनकर विष्णु शिवजीके तेजसे निर्भय होकर उन ४० मुनिपर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४० ॥

उस समय जो देवता भाग गये थे, वे भी प्रतापी ४१ दधीचिसे युद्ध करनेकी इच्छासे उन नारायणदेवके पास आ गये ॥४१ ॥

इसी बीच मुझे साथ लेकर राजा क्षुव वहाँ ४२ आ गये । मैंने देवताओं तथा विष्णुको युद्ध करनेसे मना किया और कहा कि यह ब्राह्मण [ किसीसे ] जीता नहीं जा सकता है । मेरी इस बातको सुनकर ४३ भगवान् विष्णुने मुनिके निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४२-४३ ॥ उसके बाद वे क्षुव भी अत्यन्त दीन होकर वहाँ ४४ मुनीश्वर दधीचिके पास जाकर व्याकुल हो प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे -॥४४ ॥

क्षुव बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! प्रसन्न होइये । हे शिवभक्तशिरोमणे! प्रसन्न होइये । हे परमेशान! आप ४५ दुर्जनोंके द्वारा सदा दुर्लक्ष्य हैं ॥ ४५ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] उन राजा क्षुवकी तथा देवताओंकी यह बात सुनकर तपस्यानिधि ४६ ब्राह्मण दधीचिने उनपर अनुग्रह किया ॥ ४६ ॥

तदनन्तर विष्णु आदिको देखकर मुनिने क्रोध हृदि स्मृत्वा शिवं विष्णुं शशाप च सुरानपि ॥ ४७ व्याकुल होकर मनसे शिवजीका स्मरण करके विष्णु दधीच उवाच तथा देवताओंको शाप दे दिया ॥४७ ॥

रुद्रकोपाग्निना दधीचि बोले- देवराज इन्द्रसहित सभी देवता देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वराः । और मुनीश्वर तथा गणोंके साथ विष्णुदेव रुद्रकी

ध्वस्ता भवंतु देवेन विष्णुना च समं गणैः ॥ ४८ । क्रोधाग्निसे ध्वस्त हो जायँ ॥ ४८

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अ ० ४० ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८७ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देवताओंको शाप एवं शप्त्वा सुरान् प्रेक्ष्य क्षुवमाह ततो मुनिः । देकर पुनः क्षुवकी ओर देखकर मुनिने क्षुवसे कहा— देवैश्च पूज्यो राजेन्द्र नृपैश्चैव द्विजोत्तमः ॥ ४ ९ हे राजेन्द्र! श्रेष्ठ द्विज देवताओं और राजाओंसे भी

ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः ।

इत्युक्त्वा स स्फुटं विप्रः प्रविवेश निजाश्रमम् ॥

दधीचमभिवंद्यैव क्षुवो निजगृहं गतः ।

विष्णुर्जगाम स्वं लोकं सुरैः सह यथागतम् ॥

तदेवं तीर्थमभवत् स्थानेश्वर इति स्मृतम् ।

स्थानेश्वरमनुप्राप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥

कथितस्तव संक्षेपाद्वादः क्षुवदधीचयोः ।

नृपाप्तशापयोस्तात ब्रह्मविष्ण्वोः शिवं विना ॥

य इदं कीर्तयेन्नित्यं वादं क्षुवदधीचयोः ।

जित्वापमृत्युं देहान्ते ब्रह्मलोकं प्रयाति सः ॥

रणे यः कीर्तयित्वेदं प्रविशेत्तस्य सर्वदा ।

मृत्युभीतिर्भवेन्नैव विजयी च भविष्यति ॥

अधिक पूज्य होता है । हे राजेन्द्र! ब्राह्मण ही बली और प्रभावशाली होते हैं — ऐसा स्पष्टरूपसे कहकर वे ब्राह्मण ५० दधीचि अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये ॥ ४ ९ -५० ॥ तत्पश्चात् दधीचिको नमस्कार करके क्षुव अपने ५१ घर चले गये और भगवान् विष्णु भी जैसे आये थे, | उसी तरह देवताओंके साथ अपने वैकुण्ठलोकको लौट गये ॥५१ ॥

[ इस प्रकार ] वह स्थान स्थानेश्वर नामक तीर्थके ५२ रूपमें प्रसिद्ध हो गया । स्थानेश्वरमें पहुँचकर मनुष्य शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है । हे तात! इस प्रकार मैंने आपसे संक्षेपमें क्षुव और दधीचिका विवाद कह ५३ दिया और शंकरको छोड़कर ब्रह्मा और विष्णुको जो शाप प्राप्त हुआ, उसका भी वर्णन किया ॥ ५२-५३ ॥ जो [ व्यक्ति ] क्षुव और दधीचिके इस विवाद -५४ सम्बन्धी प्रसंगका नित्य पाठ करता है, वह अपमृत्युको जीतकर शरीरत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकको जाता है ॥५४ ॥

जो इसका पाठ करके रणभूमिमें प्रवेश करेगा, उसे सर्वदा मृत्युका भय नहीं रहेगा तथा वह ५५ | विजयी होगा ॥ ५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे विष्णुदधीचयुद्धवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें विष्णु और दधीचिके युद्धका वर्णन नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ९ ॥ अथ चत्वारिंशोऽध्यायः देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, उन सभीको लेकर विष्णुका कैलासगमन तथा भगवान् शिवसे मिलना नारद उवाच

विधे विधे महाप्राज्ञ शैवतत्त्वप्रदर्शक ।

श्राविता रमणीप्राया शिवलीला महाद्भुता ॥

वीरेण वीरभद्रेण दक्षयज्ञं विनाश्य वै ।

कैलासाद्रौ गते तात किमभूत्तद्वदाधुना ॥

नारदजी बोले - हे विधे! हे महाप्राज्ञ! हे शिवतत्त्वके प्रदर्शक! आपने अत्यन्त अद्भुत एवं रमणीय १ शिवलीला सुनायी है । हे तात! पराक्रमी वीरभद्र जब दक्षके यज्ञका विनाश करके कैलास पर्वतपर चले २ गये, तब क्या हुआ? अब उसे बताइये॥१-२ ॥

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४८८ ब्रह्मोवाच अथ देवगणाः सर्वे मुनयश्च पराजिताः रुद्रानीकैर्विभिन्नाङ्गा मम लोकं ययुस्तदा स्वयंभुवे नमस्कृत्य मह्यं संस्तूय भूरिशः तत्स्वक्लेशं विषेशेण कार्त्स्न्येनैव न्यवेदयन् तदाकर्ण्य ततोऽहं वै पुत्रशोकेन पीडितः अचिन्तयमतिव्यग्रो दूयमानेन चेतसा किं कार्यं कार्यमद्याशु मया देवसुखावहम् । येन जीवतु दक्षोऽसौ मखः पूर्णो भवेत्सुरः

एवं विचार्य बहुधा नालभं शमहं मुने ।

विष्णुं तदा स्मरन् भक्त्या ज्ञानमाप तदोचितम् ॥

अथ देवैश्च मुनिभिर्विष्णोर्लोकमहं गतः ।

नत्वा नुत्वा च विविधैः स्तवैर्दुःखं न्यवदेयम् ॥

यथाध्वरः प्रपूर्णः स्याद्देव यज्ञकरश्च सः ।

सुखिनः स्युः सुराः सर्वे मुनयश्च तथा कुरु ॥

देवदेव रमानाथ विष्णो देवसुखावह ।

वयं त्वच्छरणं प्राप्ताः सदेवमुनयो ध्रुवम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचो मे हि ब्रह्मणः स रमेश्वरः ।

प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा शिवात्मा दीनमानसः ॥

विष्णुरुवाच

तेजीयसि न सा भूता कृतागसि बुभूषताम् ।

तत्र क्षेमाय बहुधा बुभूषा हि कृतागसाम् ॥

कृतपापाः सुराः सर्वे शिवे हि परमेश्वरे ।

पराददुर्यज्ञभागं तस्य शंभोर्विधे यतः ॥

प्रसादयध्वं सर्वे हि यूयं शुद्धेन चेतसा । अथापरप्रसादं श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] समस्त देवता । और मुनि रुद्रके सैनिकोंसे पराजित तथा छिन्न - भिन्न ॥ ३ अंगोंवाले होकर मेरे लोकको चले गये । वहाँ । स्वयम्भूको नमस्कार करके और बार - बार मेरा स्तवन मुझ ॥ ४ । करके उन्होंने अपने विशेष क्लेशको पूर्णरूपसे बताया ॥ ३-४ ॥ । तब उसे सुनकर मैं पुत्रशोकसे पीड़ित हो ॥ ५ गया और अत्यन्त व्यग्र हो व्यथितचित्तसे विचार करने लगा ॥५ ॥

इस समय मैं कौन - सा कार्य करूँ, जो देवताओंके ॥ ६ लिये सुखकारी हो और जिससे देव दक्ष जीवित हो जायँ तथा यज्ञ भी पूरा हो जाय ॥६ ॥

हे मुने! इस प्रकार बहुत विचार करनेपर जब ७ मुझे शान्ति नहीं मिली, तब भक्तिपूर्वक विष्णुका स्मरण करते हुए मैंने उचित ज्ञान प्राप्त कर लिया ॥७ ॥

तदनन्तर देवताओं और मुनियोंके साथ मैं ८ विष्णुलोकमें गया और उन्हें नमस्कार करके तथा अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करके अपना दुःख उनसे कहने लगा- हे देव! जिस तरह भी यज्ञ ९ पूर्ण हो, यज्ञकर्ता [ दक्ष ] जीवित हों और समस्त देवता तथा मुनि सुखी हो जायँ, आप वैसा कीजिये । हे देवदेव! हे रमानाथ! हे देवसुखदायक विष्णो! हम १० देवता और मुनिलोग निश्चय ही आपकी शरणमें आये हैं ॥ ८-१० ॥ ब्रह्माजी बोले- मुझ ब्रह्माकी यह बात सुनकर शिवस्वरूप लक्ष्मीपति विष्णु शिवजीका ११ स्मरण करके दुखीचित्त होकर इस प्रकार कहने लगे- ॥ ११ ॥

विष्णु बोले — हे देवताओ! परम समर्थ तेजस्वी पुरुषसे कोई अपराध बन जाय, तो भी उसके बदलेमें १२ अपराध करनेवाले मनुष्योंके लिये उनका वह अपराध । मंगलकारी नहीं हो सकता । हे विधे! समस्त देवता १३ परमेश्वर शिवके अपराधी हैं; क्योंकि इन्होंने उन शम्भुको यज्ञका भाग नहीं दिया ॥ १२-१३ ॥ अब आप सभी लोग शुद्ध हृदयसे शीघ्र ही | प्रसन्न होनेवाले भगवान् शिवके पैर पकड़कर उन्हें

तं गृहीताङ्घ्रियुगं शिवम् ॥ १४ । प्रसन्न कीजिये ॥१४ ॥