श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 501–510
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
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अ ० ४० ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४८ ९
यस्मिन् प्रकुपिते देवे विनश्यत्यखिलं जगत् ।
सलोकपालयज्ञस्य शासनाज्जीवितं द्रुतम् ॥
तमाशु प्रियया देवं विहीनं च दुरुक्तिभिः ।
क्षमापयध्वं हृद्विद्धं दक्षेण सुदुरात्मना ॥
अयमेव महोपायस्तच्छान्त्यै केवलं विधे ।
शंभो: संतुष्टये मन्ये सत्यमेवोदितं मया ॥
नाहं न त्वं सुराश्चान्ये मुनयोऽपि तनूभृतः ।
यस्य तत्त्वं प्रमाणं च न विदुर्बलवीर्ययोः ॥
आत्मतन्त्रस्य तस्यापि परस्य परमात्मनः ।
क उपायं विधित्सेद्वै परं मूढं विरोधिनम् ॥
चलिष्येऽहमपि ब्रह्मन् सर्वैः सार्धं शिवालयम् ।
क्षमापयामि गिरिशं कृतागश्च शिवे ध्रुवम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्थमादिश्य विष्णुर्मां ब्रह्माणं सामरादिकम् ।
सार्धं देवैर्मतिं चक्रे तद्गिरौ गमनाय सः ॥
ययौ स्वधिष्ण्यनिलयं शिवस्याद्रिवरं शुभम् ।
कैलासं सामरमुनिप्रजेशादिमयो हरिः ॥
अतिप्रियं प्रभोर्नित्यं सुजुष्टं किन्नरादिभिः । जिन भगवान्के कुपित होनेपर यह सारा जगत् १५ नष्ट हो जाता है तथा जिनके शासनसे लोकपालोंसहित यज्ञका जीवन शीघ्र ही समाप्त जाता है, उन प्रियाविहीन तथा अत्यन्त दुरात्मा दक्षके दुर्वचनोंसे १६ बिंधे हुए हृदयवाले देव शंकरसे आपलोग शीघ्र ही क्षमा माँगिये ॥ १५-१६ ॥ हे विधे! उन शम्भुकी शान्ति तथा सन्तुष्टिके १७ लिये केवल यही महान् उपाय है - ऐसा मैं समझता हूँ । यह मैंने सच्ची बात कही है ॥१७ ॥
हे विधे! न मैं, न तुम, न अन्य देवता, न १८ मुनिगण और न दूसरे शरीरधारी ही जिनके बल तथा पराक्रमके तत्त्व तथा प्रमाणोंको जान पाते हैं, उन स्वतन्त्र परमात्मा परमेश्वरको विरुद्धकर प्रसन्न करनेका १ ९ [ प्रणिपात करनेके अतिरिक्त ] कोई दूसरा उपाय नहीं हो सकता ॥ १८-१९ ॥ हे ब्रह्मन्! आपलोगोंके साथ मैं भी शिवालय २० चलूँगा और शिवके प्रति स्वयं अपराधी होनेपर भी उनसे क्षमा करवाऊँगा ॥ २० ॥
ब्रह्माजी बोले- देवता आदिके साथ मुझ ब्रह्माको इस प्रकार आदेश देकर भगवान् विष्णुने देवताओंके २१ साथ कैलासपर्वतपर जानेका विचार किया ॥ २१ ॥
देवता, मुनि, प्रजापति आदिको साथ लेकर वे २२ विष्णु शिवजीके स्वप्रकाशस्वरूप शुभ तथा श्रेष्ठ कैलास पर्वतपर पहुँच गये ॥२२ ॥
कैलास भगवान् शिवको सदा ही प्रिय है, वह मनुष्योंके अतिरिक्त किन्नरों, अप्सराओं तथा योगसिद्ध नरेतरैरप्सरोभिर्योगसिद्धैर्महोन्नतम् ॥२३ महात्माओंसे सेवित था और बहुत ऊँचा था ॥ २३ ॥
वह चारों ओरसे अनेक मणिमय शिखरोंसे नानामणिमयैः शृङ्गैः शोभमानं समन्ततः । धातुओंसे विचित्र जान पड़ता था नानाधातुविचित्रं वै नानाद्रुमलताकुलम् ॥ २४ सुशोभित था, अनेक नानामृगगणाकीर्णं नानापक्षिसमन्वितम् नानाजलप्रस्रवणैरमरैः सिद्धयोषिताम् रमणैर्विहरन्तीनां नानाकन्दरसानुभिः द्रुमजातिभिरन्याभी राजितं राजतप्रभम् और अनेक प्रकारके वृक्ष तथा लताओंसे भरा हुआ था ॥२४ ॥
अनेक प्रकारके पशुओं - पक्षियों तथा अनेक । प्रकारके झरनोंसे वह परिव्याप्त था । उसके शिखरपर ॥ २५ सिद्धांगनाएँ अपने - अपने पतियोंके साथ विहार करती थीं । वह अनेक प्रकारकी कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक । प्रकारके वृक्षोंकी जातियोंसे सुशोभित था । उसकी ॥ २६ कान्ति चाँदीके समान श्वेतवर्णकी थी॥२५-२६ ॥
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४ ९ ० व्याघ्रादिभिर्महासत्त्वैर्निर्घुष्टं क्रूरतोज्झितम् सर्वशोभान्वितं दिव्यं महाविस्मयकारकम् पर्यस्तं गङ्गया सत्या स्थानपुण्यतरोदया सर्वपावनसंकर्च्या विष्णुपद्या सुनिर्मलम् ॥ एवंविधं गिरिं दृष्ट्वा कैलासाख्यं शिवप्रियम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४० । वह पर्वत बड़े - बड़े व्याघ्र आदि जन्तुओंसे ॥ २७ / भयानकतासे रहित, सम्पूर्ण शोभासे सम्पन्न युक्त, | तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला, दिव्य । वह सभीको पवित्र कर देनेवाली था ॥ २७ ॥
तथा अनेक २८ तीर्थोंका निर्माण करनेवाली विष्णुपदी सती श्रीगंगाजी से घिरा हुआ तथा अत्यन्त निर्मल था ॥२८ ॥
शिवजीके परम प्रिय कैलास नामक इस प्रकारके ययुस्ते विस्मयं देवा विष्ण्वाद्याः समुनीश्वराः ॥ २ ९ पर्वतको देखकर मुनीश्वरोंसहित विष्णु आदि देवता
तत्समीपेऽलकां रम्यां ददृशुर्नाम ते पुरीम् ।
कुबेरस्य महादिव्यां रुद्रमित्रस्य निर्जराः ॥
वनं सौगन्धिकं चापि ददृशुस्तत्समीपतः ।
सर्वद्रुमान्वितं दिव्यं यत्र तन्नादमद्भुतम् ॥
तद्बाह्यतस्तस्य दिव्ये सरितावतिपावने ।
नंदा चालकनंदा च दर्शनात्पापहारिके ॥
पपुः सुरस्त्रियो नित्यमवगूह्य स्वलोकतः ।
विगाह्य पुंभिस्तास्तत्र क्रीडंति रतिकर्शिताः ॥
हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगंधिकं च यत् ।
गच्छन्तस्ते सुरा आराद्ददृशुः शांकरं वटम् ॥
पर्यक्कृताचलच्छायं पादोनविटपायतम् ।
शतयोजनकोत्सेधं निर्नीडं तापवर्जितम् ॥
महापुण्यवतां दृश्यं सुरम्यं चातिपावनम् ।
आश्चर्यचकित हो गये ॥२ ९ ॥
उन देवताओंने उस कैलासके सन्निकट शिवके ३० मित्र कुबेरकी अलका नामक परम दिव्य तथा रम्य पुरीको देखा ॥ ३० ॥
उन्होंने उसके पास ही सौगन्धिक नामक दिव्य वन ३१ भी देखा, जो अनेक प्रकारके दिव्य वृक्षोंसे शोभित था और जहाँ [ पक्षियोंकी ] अद्भुत ध्वनि हो रही थी ॥ ३१ ॥
उससे बाहर नन्दा एवं अलकनन्दा नामक दिव्य ३२ तथा परम पावन सरिताएँ बह रही थीं, जो दर्शनमात्रसे ही [ मनुष्योंके ] पापोंका विनाश कर देती हैं ॥ ३२ ॥
देवस्त्रियाँ प्रतिदिन अपने लोकसे आकर उनका ३३ जल पीतीं और स्नान करके रतिसे आकृष्ट होकर पुरुषोंके साथ विहार करती हैं ॥३३ ॥
उसके बाद उस अलकापुरी तथा सौगन्धिक ३४ वनको छोड़कर आगेकी ओर जाते हुए उन देवताओंने समीपमें ही शंकरजीके वटवृक्षको देखा ॥३४ ॥
वह [ वटवृक्ष ] उस पर्वतके चारों ओर छाया ३५ फैलाये हुए था, उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, उसका घेरा सौ योजन ऊँचा था, वह घोंसलोंसे विहीन था और तापसे रहित था । उसका दर्शन [ केवल ] शंभुयोगस्थलं दिव्यं योगिसेव्यं महोत्तमम् ॥ ३६ पुण्यात्माओंको ही होता है । वह अत्यन्त रमणीय, | परम पावन, शिवजीका योगस्थल, दिव्य योगियोंके निवासके योग्य तथा अत्युत्तम था ॥ ३५-३६ ॥ मुमुक्षुशरणे तस्मिन् महायोगमये वटे । विष्णु आदि सभी देवताओंने महायोगमय तथा आसीनं ददृशुः सर्वे शिवं विष्ण्वादयः सुराः ॥ ३७ मुमुक्षुओंको शरण प्रदान करनेवाले उस वटवृक्ष नीचे बैठे हुए शिवजीको देखा ॥३७ ॥
विधिपुत्रैर्महासिद्धेः शिवभक्तिरतैः सदा । शान्त स्वभाववाले,, अत्यन्त शान्त विग्रहवाले, उपास्यमानं समुदा शांतैः संशांतविग्रहैः | शिवभक्तिमें तत्पर तथा महासिद्ध [ सनक आदि ] ब्रह्मपुत्र ॥ ३८ प्रसन्नताके साथ उनकी उपासना कर रहे थे ॥ ३८ ॥
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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४ ९ १
तथा सख्या कुबेरेण भर्त्रा गुह्यकरक्षसाम् ।
सेव्यमानं विशेषेण स्वगणैर्ज्ञातिभिः सदा ॥
तापसाभीष्टसद्रूपं बिभ्रतं परमेश्वरम् ।
वात्सल्याद्विश्वसुहृदं भस्मादिसुविराजितम् ॥
मुने तुभ्यं प्रवोचन्तं पृच्छते ज्ञानमुत्तमम् ।
कुशासने सूपविष्टं सर्वेषां शृण्वतां सताम् ॥
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं चरणं चैव जानुनि ।
बाहुप्रकोष्ठाक्षमालं स्थितं सतर्कमुद्रया ॥
एवंविधं शिवं दृष्ट्वा तदा विष्ण्वादयः सुराः ।
प्रणेमुस्त्वरितं सर्वे करौ बध्वा विनम्रकाः ॥
उपलभ्यागतं रुद्रो मया विष्णुं सतां गतिः ।
उत्थाय चक्रे शिरसाभिवंदनमपि प्रभुः ॥
वंदिताङ् घ्रिस्तदा सर्वैर्दिव्यैर्विष्ण्वादिभिः शिवः । ननामाथ यथा विष्णुः कश्यपं लोकसद्गतिः सुरसिद्धगणाधीशमहर्षिसुनमस्कृतम् समुवाच सुरैर्विष्णुं कृतसन्नतिमादरात् गुह्यकों एवं राक्षसोंके पति उनके मित्र कुबेर ३ ९ अपने गणों तथा कुटुम्बीजनोंके साथ विशेषरूपसे उनकी सेवा कर रहे थे । वे परमेश्वर शिव तपस्वीजनोंको प्रिय लगनेवाले सुन्दर रूपको धारण किये हुए थे, वात्सल्यके कारण वे सम्पूर्ण विश्वके मित्ररूप प्रतीत ४० हो रहे थे और भस्म आदिसे उनके अंगोंकी बड़ी
शोभा हो रही थी ॥। ३ ९ -४० ॥
हे मुने! आपके पूछनेपर कुशासनपर बैठे हुए वे ४१ शिव सभी सज्जनोंको सुनाते हुए आपको ज्ञानका उपदेश दे रहे थे । वे अपना बायाँ चरण अपनी दायीं जाँघपर और बायाँ हाथ बायें घुटनेपर रखे कलाईमें ४२ रुद्राक्षकी माला डाले सुन्दर तर्कमुद्रामें विराजमान थे ॥ ४१-४२ ॥ इस प्रकारके स्वरूपवाले शिवको देखकर ४३ उस समय विष्णु आदि सभी देवताओंने शीघ्रतासे नम्रतापूर्वक दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया । तब सज्जनोंके शरणदाता प्रभु रुद्रने मेरे साथ आये हुए ४४ विष्णुको देखकर उठ करके सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४३-४४ ॥ विष्णु आदि देवताओंने जब भगवान् शिवजीके ॥ ४५ चरणोंमें प्रणाम किया, तब उन्होंने भी उसी प्रकार मुझे नमस्कार किया, जिस प्रकार लोकोंको सद्गति प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु कश्यपको प्रणाम करते हैं ॥ ४५ ॥
तब शिवजीने देवताओं, सिद्धों, गणाधीशों और 1 महर्षियोंसे नमस्कृत तथा वन्दित विष्णुसे आदरपूर्वक ॥ ४६ । वार्तालाप किया ॥४६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे शिवदर्शनवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें शिवके दर्शनका वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥
अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति विष्णु आदि बोले – हे देवदेव! हे महादेव! विष्ण्वादय ऊचुः लोकाचारका प्रदर्शन करनेवाले हे प्रभो! आपकी देवदेव महादेव लौकिकाचारकृत्प्रभो । कृपासे हमलोग आप परमेश्वर शम्भुको परम ब्रह्म ब्रह्म त्वामीश्वरं शंभुं जानीमः कृपया तव ॥ १ मानते हैं ॥१ ॥
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४ ९ २ किं मोहयसि नस्तात मायया परया तव दुर्ज्ञेयया सदा पुंसां मोहिन्या परमेश्वर प्रकृतेः पुरुषस्यापि जगतो योनिबीजयोः परब्रह्म परस्त्वं च मनोवाचामगोचरः त्वमेव विश्वं सृजसि पास्यत्सि निजतन्त्रतः स्वरूपां शिवशक्तिं हि क्रीडन्नूर्णपटो यथा
त्वमेव क्रतुमीशान ससर्जिथ दयापरः ।
दक्षेण सूत्रेण विभो सदा त्रय्यभिपत्तये ॥
त्वयैव लोकेऽवसिताः सेतवो यान् धृतव्रताः ।
शुद्धान् श्रद्दधते विप्रा वेदमार्गविचक्षणाः ॥
कर्तुस्त्वं मङ्गलानां हि स्वपरं तु सुखे विभो ।
अमङ्गलानां च हितं मिश्रं वाथ विपर्ययम् ॥
सर्वकर्मफलानां हि सदा दाता त्वमेव हि ।
सर्वे हि प्रोक्ताः पशवस्तत्पतिस्त्वं श्रुतिश्रुतः ॥
पृथग्धियः कर्मदृशोऽरुंतुदाश्च दुराशयाः ।
वितुदंति परान् मूढा दुरुक्तैर्मत्सरान्विताः ॥
तेषां दैववधानां भो भूयात्त्वच्च वधो विभो ।
भगवन्परमेशान कृपां कुरु परप्रभो ॥
नमो रुद्राय शांताय ब्रह्मणे परमात्मने । श्रीशिवमहापुराण अ ० ४१ । हे परमेश्वर! हे तात! आप सम्पूर्ण संसारको ॥ २ मोहनेवाली अपनी उत्कृष्ट तथा दुर्जेय मायासे क्यों मोहित कर रहे हैं? ॥२ ॥ हमें
। आप संसारके योनि एवं बीजभूत प्रकृति ॥ ३ पुरुषसे भी परे हैं । आप परब्रह्म हैं एवं मन तथा वाणीके विषयसे परे हैं ॥ ३ ॥ तथा
। आप ही अपनी इच्छासे इस विश्वका सृजन ॥ ४ करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार भी करते हैं । जैसे मकड़ी अपने मुँहसे जाला बनाती है तथा उसको पुन: समेट लेती है, उसी प्रकार आप भी अपनी शक्तिके द्वारा अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते रहते हैं ॥४ ॥
हे ईशान! हे विभो! आपने ही दयालु होकर ५ वेदत्रयीकी रक्षाके लिये दक्षरूपी सूत्रके द्वारा यज्ञकी रचना की है ॥५ ॥
आपने ही संसारमें उन [ वैदिक ] मर्यादाओंकी ६ स्थापना की है, जिनपर वेदमार्गपरायण तथा दृढ़ - व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण लोग श्रद्धा करते हैं ॥६ ॥
हे विभो! आप ही मंगलोंके कर्ता हैं, आप ही ७ अपनों और दूसरोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं और आप ही अमंगलोंका भी हितकारी अथवा अहितकारी या मिश्रित फल देनेवाले हैं ॥७ ॥
हे प्रभो! आप ही सदा सब कर्मोंका फल प्रदान ८ करनेवाले हैं । जगत् के समस्त प्राणी पशु कहे गये हैं, उनकी रक्षाके कारण ही आपका नाम पशुपति है-ऐसा वेदोंमें कहा गया है ॥८ ॥
आपसे भिन्न बुद्धि होनेके कारण ही कर्मपर ९ विश्वास करनेवाले, मर्मभेदी वचन बोलनेवाले, दुरात्मा, दुर्बुद्धि लोग ही ईर्ष्यावश कटुवाक्योंसे दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं॥९॥
हे विभो! दुर्दैवद्वारा मारे गये उन लोगोंका वध १० क्या आपके द्वारा होना चाहिये, हे भगवन्! हे परमेशान! हे परप्रभो! आप कृपा कीजिये ॥ १० ॥
परम शान्त, रुद्र ब्रह्मको नमस्कार है । कपर्दिने महेशाय ज्योत्स्नाय महते नमः ॥ ११ परमात्मा, जटाधारी, स्वयंप्रकाश महान् महेशको हमारा नमस्कार है ॥ ११ ॥
त्वं हि विश्वसृजां स्रष्टा धाता त्वं प्रपितामहः । आप ही प्रजापतियोंके स्रष्टा, धाता, प्रपितामह, त्रिगुणात्मा | त्रिगुण ( सत्त्व, रज, तम ) -स्वरूप, निर्गुण एवं प्रकृति
निर्गुणश्च प्रकृतेः पुरुषात्परः ॥ १२ । तथा पुरुषसे परे हैं ॥१२ ॥
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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४ ९ ३
नमस्ते नीलकंठाय वेधसे परमात्मने ।
विश्वाय विश्वबीजाय जगदानंदहेतवे ॥ १३
ओंकारस्त्वं वषट्कारः सर्वारंभप्रवर्तकः ।
हंतकारः स्वधाकारो हव्यकव्यान्नभुक् सदा ॥१४
कृतः कथं यज्ञभङ्गस्त्वया धर्मपरायण ।
ब्रह्मण्यस्त्वं महादेव कथं यज्ञहनो विभो ॥ १५
ब्राह्मणानां गवां चैव धर्मस्य प्रतिपालकः ।
शरण्योऽसि सदानन्त्यः सर्वेषां प्राणिनां प्रभो ॥ १६
नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे ।
नमो भवाय देवाय रसायांबुमयाय ते ॥ १७
शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः ।
रुद्रायाग्निस्वरूपाय महातेजस्विने नमः ॥ १८
ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः ।
पशूनां पतये तुभ्यं यजमानाय वेधसे ॥ १ ९
भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ।
महादेवाय सोमाय प्रवृत्ताय नमोऽस्तु ते ॥ २०
उग्राय सूर्यरूपाय नमस्ते कर्मयोगिने ।
नमस्ते कालकालाय नमस्ते रुद्रमन्यवे ॥ २१
नमः शिवाय भीमाय शंकराय शिवाय ते ।
उग्रोऽसि सर्वभूतानां नियंता यच्छिवोऽसि नः ॥ २२
मयस्कराय विश्वाय ब्रह्मणे ह्यार्तिनाशिने ।
अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः ॥२३
शर्वाय सर्वरूपाय पुरुषाय परात्मने ।
सदसद्व्यक्तिहीनाय महतः कारणाय ते ॥ २४
जाताय बहुधा लोके प्रभूताय नमो नमः ।
नीलाय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे ॥ २५
नीलकण्ठ, विधाता, परमात्मा, विश्व, विश्वके बीज और जगत् के आनन्दभूत आपको नमस्कार है ॥ १३ ॥
[ हे प्रभो! ] आप ही ॐकार, वषट्कार, सभीके आदिप्रवर्तक, हन्तकार, स्वधाकार एवं हव्य-कव्यके सदा भोक्ता हैं ॥१४ ॥
हे धर्मपरायण! आपने इस यज्ञका विध्वंस क्यों किया? हे महादेव! आप तो ब्राह्मणोंके रक्षक हैं, तब हे विभो! आप इस यज्ञके विनाशक कैसे बन गये? ॥ १५ ॥
हे प्रभो! आप ब्राह्मण, गौ तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले एवं सभी प्राणियोंको शरण प्रदान करनेवाले तथा अनन्त हैं ॥१६ ॥
हे भगवन्! हे रुद्र! हे सूर्यके समान अमित तेजवाले! आपको प्रणाम है । रसरूप, जलरूप, जगन्मय - स्वरूप आप भव देवताको नमस्कार है ॥ १७ ॥
सुगन्धवाले पृथ्वीस्वरूप आप शर्वको नमस्कार है | अग्निस्वरूप महातेजस्वी आप रुद्रको नमस्कार है ॥१८ ॥
आप वायुरूप, स्पर्शरूप ईश्वरको नमस्कार है, आप पशुओंके पति, यजमान एवं विधाताको नमस्कार है ॥१ ९ ॥ आकाशस्वरूप शब्दवाले आप भीमको नमस्कार है । सोमस्वरूपसे कर्ममें प्रवृत्त करनेवाले आप महादेवको नमस्कार है ॥२० ॥
आप उग्र, सूर्यरूप कर्मयोगीको नमस्कार है । हे रुद्र! कालोंके भी काल एवं क्रोधस्वरूप आपके लिये नमस्कार है ॥२१ ॥
शिव, भीम एवं कल्याण करनेवाले आप शिव-शंकरको नमस्कार है । [ हे प्रभो! ] आप उग्र हैं, सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं एवं हमारा कल्याण करनेवाले हैं ॥ २२ ॥
आप मयस्कर [ सुख प्रदान करनेवाले ], विश्वरूप, ब्रह्म, दुःखोंका नाश करनेवाले, अम्बिकापति तथा उमापति हैं, आपको नमस्कार है ॥२३ ॥
शर्व, सर्वरूप, पुरुषरूप, परात्मा, सत् एवं असत्की अभिव्यक्तिसे हीन, महत्तत्त्वके कारण, संसारमें अनेक प्रकारसे उत्पन्न होनेवाले, प्रभूतस्वरूप, नीलस्वरूप, नीलरुद्र, कद्रुद्र एवं प्रचेताको बार - बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥
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४ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ मीढुष्टमाय देवाय शिपिविष्टाय ते नमः । आप मीढुष्टम, देव तथा शिपिविष्टको नमस्कार महीयसे नमस्तुभ्यं हन्त्रे देवारिणां सदा ॥ २६ है । देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले तथा सर्वश्रेष्ठको
ताराय च सुताराय तरुणाय सुतेजसे ।
हरिकेशाय देवाय महेशाय नमो नमः ॥ २७
देवानां शंभवे तुभ्यं विभवे परमात्मने ।
परमाय नमस्तुभ्यं कालकंठाय ते नमः ॥ २८
हिरण्याय परेशाय हिरण्यवपुषे नमः ।
भीमाय भीमरूपाय भीमकर्मरताय च ॥ २ ९
भस्मदिग्धशरीराय रुद्राक्षाभरणाय च ।
नमो ह्रस्वाय दीर्घाय वामनाय नमोऽस्तु ते ॥ ३०
दूरेवधाय ते देवाग्रेवधाय नमो नमः ।
धन्विने शूलिने तुभ्यं गदिने हलिने नमः ॥ ३१
नानायुधधरायैव दैत्यदानवनाशिने ।
सद्याय सद्यरूपाय सद्योजाताय वै नमः ॥३२
वामाय वामरूपाय वामनेत्राय ते नमः ।
अघोराय परेशाय विकटाय नमो नमः ॥ ३३
तत्पुरुषाय नाथाय पुराणपुरुषाय च ।
पुरुषार्थप्रदानाय व्रतिने परमेष्ठिने ॥ ३४
ईशानाय नमस्तुभ्यमीश्वराय नमो नमः ।
ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय नमः साक्षात्परात्मने ॥ ३५
उग्रोऽसि सर्वदुष्टानां नियंतासि शिवोऽसि नः ।
कालकूटाशिने तुभ्यं देवाद्यवनकारिणे ॥ ३६
वीराय वीरभद्राय रक्षद्वीराय शूलिने । ।
महादेवाय महते पशूनां पतये नमः ॥ ३७
वीरात्मने सुविद्याय श्रीकंठाय पिनाकिने ।
नमोऽनंताय सूक्ष्माय नमस्ते मृत्युमन्यवे ॥ ३८
|
पराय परमेशाय परात्परतराय ते ।
परात्पराय विभवे नमस्ते विश्वमूर्तये ॥ ३ ९
नमस्कार है ॥२६ ॥
तारकमन्त्रस्वरूप, सबका उद्धार करनेवाले, तरुणरूप, परमतेजस्वी, हरिकेश, देव महेश्वरको बार बार नमस्कार है ॥ २७ ॥
देवताओंका कल्याण करनेवाले, सभी ऐश्वर्योंसे युक्त, परमात्मा तथा परम आपको नमस्कार है । आप कालकण्ठको नमस्कार है । सुवर्णस्वरूप, परमेश, सुवर्णमय शरीरवाले, भीम, भीमरूप एवं भीमकर्ममें रत रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥ भस्मसे लिप्त शरीरवाले, रुद्राक्षका आभूषण धारण करनेवाले तथा ह्रस्व - दीर्घ वामनस्वरूपवाले आपको बार - बार नमस्कार है ॥ ३० ॥
हे देव! दूर रहनेवालों तथा आगे रहनेवालोंका वध करनेवाले आपको नमस्कार है । धनुष, शूल, गदा तथा हल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । अनेक आयुधोंको धारण करनेवाले, दैत्य - दानवोंका विनाश करनेवाले, सद्य, सद्यरूप तथा सद्योजात आपको नमस्कार है । वाम, वामरूप तथा वामनेत्र आपको नमस्कार है । अघोर, परेश एवं विकटको बार - बार नमस्कार है ॥ ३१–३३ ॥ तत्पुरुष, नाथ, पुराणपुरुष, पुरुषार्थ प्रदान करनेवाले, व्रतधारी परमेष्ठीको नमस्कार है । ईशान, ईशस्वरूप आपको बार - बार नमस्कार है । ब्रह्म, ब्रह्मस्वरूप एवं साक्षात् परमात्मस्वरूपको नमस्कार है ॥ ३४-३५ ॥ आप उग्र हैं, सभी दुष्टोंका नियन्त्रण एवं हम देवताओंका कल्याण करनेवाले हैं । कालकूट विषका पान करनेवाले, देवताओं आदिकी रक्षा करनेवाले, वीर, वीरभद्र, वीरोंकी रक्षा करनेवाले, त्रिशूलधारी, पशुपति, महादेव, महान् आपको नमस्कार है ॥ ३६-३७ ॥ वीरात्मा, श्रेष्ठ विद्यावाले, श्रीकण्ठ, पिनाकी, अनन्त, सूक्ष्म, मृत्यु तथा क्रोधस्वरूपवाले आपको बार - बार नमस्कार है । पर, परमेश, परसे भी पर, परात्पर, सर्वैश्वर्य - सम्पन्न तथा विश्वमूर्ति आपको नमस्कार है॥३८-३९ ॥
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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४ ९ ५
नमो विष्णुकलत्राय विष्णुक्षेत्राय भानवे ।
भैरवाय शरण्याय त्र्यंबकाय विहारिणे ॥ ४०
मृत्युञ्जयाय शोकाय त्रिगुणाय गुणात्मने ।
चन्द्रसूर्याग्निनेत्राय सर्वकारणसेतवे ॥ ४१
भवता हि जगत्सर्वं व्याप्तं स्वेनैव तेजसा 1
।
परब्रह्म निर्विकारी चिदानंद: प्रकाशवान् ॥ ४२
ब्रह्मविष्ण्विन्द्रचन्द्रादिप्रमुखाः सकलाः सुराः ।
मुनयश्चापरे त्वत्तः संप्रसूता महेश्वर ॥ ४३
यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा ।
अष्टमूर्तिरितीशश्च त्वमाद्यः करुणामयः ॥ ४४
त्वद्भयाद्वाति वातोऽयं दहत्यग्निर्भयात्तव ।
सूर्यस्तपति ते भीत्या मृत्युर्धावति सर्वतः ॥ ४५
दयासिन्धो महेशान प्रसीद परमेश्वर ।
रक्ष रक्ष सदैवास्मान् यस्मान्नष्टान् विचेतसः ॥ ४६
रक्षिताः सततं नाथ त्वयैव करुणानिधे ।
नानापद्भ्यो वयं शंभो तथैवाद्य प्रपाहि नः ॥ ४७
यज्ञस्योद्धरणं नाथ कुरु शीघ्रं प्रसादकृत् ।
असमाप्तस्य दुर्गेश दक्षस्य च प्रजापतेः ॥ ४८
भगोऽक्षिणी प्रपद्येत यजमानश्च जीवतु ।
पूष्णो दन्ताश्च रोहन्तु भृगोः श्मश्रूणि पूर्ववत् ॥ ४ ९
भवतानुगृहीतानां देवादीनां च सर्वशः ।
आरोग्यं भग्नगात्राणां शंकर त्वायुधाश्मभिः ॥ ५०
पूर्णभागोऽस्तु ते नाथावशिष्टेऽध्वरकर्मणि ।
रुद्रभागेन यज्ञस्ते कल्पितो नान्यथा क्वचित् ॥ ५१
विष्णुको अपना मित्र माननेवाले, विष्णुको अपना कुटुम्ब माननेवाले, भानुरूप, भैरव, सबको शरण देनेवाले, त्रिलोचन एवं [ सर्वत्र ] विहार करनेवाले [ शिवजी ] -को प्रणाम है ॥ ४० ॥
मृत्युंजय, शोकस्वरूप, त्रिगुण, गुणरूप, सूर्य - चन्द्र - अग्निरूप नेत्रवाले तथा समस्त कारणोंके सेतुस्वरूप आपको नमस्कार है । आपने ही अपने तेजसे सारे जगत्को व्याप्त किया है । आप परब्रह्म, विकाररहित, चिदानन्द एवं प्रकाशवान् हैं ॥ ४१-४२ ॥ हे महेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्र आदि समस्त देव तथा अन्य मुनिगण आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥४३ ॥
आप ही आठ प्रकारसे अपने शरीरको विभक्तकर जगत्की रक्षा करते हैं, इस कारण आप अष्टमूर्ति हैं । आप ही ईश्वर, जगत्के आदिकारण तथा करुणामय हैं ॥ ४४ ॥
आपके भयसे वायु सर्वदा बहता रहता है, आपके भयसे अग्नि जलती है, आपके भयसे सूर्य तपता है तथा आपके ही भयसे मृत्यु सर्वत्र दौड़ती | रहती है ॥ ४५ ॥
हे दयासिन्धो! हे महेशान! हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये । हमलोग नष्ट और कर्तव्यशून्य हो गये हैं, अतः हमलोगोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४६ ॥
हे करुणानिधान! हे नाथ! आपने सदैव ही आपत्तियोंमें हमलोगोंकी रक्षा की है । हे शम्भो! उसी प्रकार आज भी हमलोगोंकी रक्षा कीजिये ॥४७ ॥
हे नाथ! हे दुर्गेश! हे कृपा करनेवाले! आप प्रजापति दक्षके अपूर्ण यज्ञका उद्धार कीजिये ॥४८ ॥
भग देवता पूर्ववत् नेत्र प्राप्त कर लें, यजमान दक्ष जीवित हो जायँ, पूषा अपने दाँतोंको पूर्ववत् प्राप्त कर लें तथा महर्षि भृगुकी दाढ़ी पूर्ववत् हो जाय ॥ ४ ९ ॥ हे शंकर! शस्त्रोंसे तथा पत्थरोंसे छिन्न - भिन्न शरीरवाले तथा आपके द्वारा अनुगृहीत देवता आदिको आरोग्य प्राप्त हो जाय ॥५० ॥
हे नाथ! इस शेष यज्ञकर्ममें आपका ही पूर्ण भाग हो । आपके उसी रुद्रभागसे ही यज्ञकी पूर्ति होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥५१ ॥
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४ ९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ इत्युक्त्वा सप्रजेशश्च रमेशश्च कृताञ्जलिः । यह कहकर ब्रह्मासहित विष्णुदेव | जोड़कर क्षमा करानेके लिये उद्यत हो हाथ दंडवत्पतितो भूमौ क्षमापयितुमुद्यतः ॥ ५२ । समान पृथिवीपर लेट गये ॥५२ ॥ दण्डके
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सतीखण्डे देवस्तुतिवर्णनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके द्वितीय सतीखण्डमें देवताओंद्वारा ॥ ४१ ॥
स्तुति - वर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शिवका देवता आदिपर अनुग्रह, दक्षयज्ञ मण्डपमें पधारकर दक्षको जीवित करना तथा दक्ष ब्रह्मोवाच श्रीब्रह्मेशप्रजेशेन सदैव मुनिना च वै अनुनीतः शंभुरासीत्प्रसन्नः परमेश्वरः आश्वास्य देवान् विष्ण्वादीन् विहस्य करुणानिधिः उवाच परमेशानः कुर्वन् परमनुग्रहम् श्रीमहादेव उवाच
शृणुतं सावधानेन मम वाक्यं सुरोत्तमौ ।
यथार्थं वच्मि वां तात वां क्रोधं सर्वदासहम् ॥
नाघं तनौ तु बालानां वर्णये नानुचिन्तये ।
मम मायाभिभूतानां दंडस्तत्र धृतो मया ॥
दक्षस्य यज्ञभङ्गोऽयं न कृतश्च मया क्वचित् ।
परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥
परेषां क्लेदनं कर्म न कार्यं तत् कदाचन ।
परं द्वेष्टि परेषां यदात्मनस्तद्भविष्यति ॥
दक्षस्य यज्ञशीष्र्णो हि भवत्वजमुखं शिरः ।
मित्रनेत्रेण संपश्येद्यज्ञभागं भगः सुरः ॥
पूषाभिधः सुरस्तात दद्भिर्जक्षतु पिष्टभुक् ।
याजमानैर्भग्नदन्तः सत्यमेतन्मयोदितम् ॥
बस्तश्मश्रुर्भवेदेव भृगुर्मम विरोधकृत् । और विष्णु आदिद्वारा शिवकी स्तुति ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] मुझ ब्रह्मा, । लोकपाल, प्रजापति तथा मुनियोंसहित विष्णुके अनुनय-॥ १ विनय करनेपर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये । विष्णु । आदि देवताओंको आश्वासन देकर उनपर परम अनुग्रह करते हुए करुणानिधान परमेश्वर शिवजी ॥ हँसकर कहने लगे— ॥ १-२ ॥ श्रीमहादेवजी बोले- हे श्रेष्ठ देवताओ! आप दोनों सावधान होकर मेरी बात सुनें, मैं सच्ची बात कह ३ रहा हूँ, हे तात! मैं आप दोनोंका क्रोध सर्वदा सहता रहता हूँ । बालकों अर्थात् अज्ञानियोंके द्वारा किये गये अपराधका मैं न तो वर्णन करता हूँ और न चिन्तन ही ४ करता हूँ । इसपर भी मेरी मायासे भ्रान्त प्राणियोंके शिक्षणार्थ ही मैं दण्ड धारण करता हूँ॥३-४ ॥ दक्षके यज्ञका विध्वंस मैंने कभी नहीं किया है । ५ दक्ष स्वयं ही दूसरोंसे द्वेष करते हैं । दूसरोंके प्रति जैसा व्यवहार किया जायगा, वह अपने लिये ही फलित होगा । अतः दूसरोंको कष्ट देनेवाला कार्य कभी नहीं ६ करना चाहिये, जो दूसरोंसे द्वेष करता है, वह द्वेष अपने लिये ही होता है ॥५-६ ॥ दक्षका मस्तक जल गया है, इसलिये इनके ७ सिरके स्थानमें बकरेका सिर जोड़ दिया जाय । भग । देवता मित्रकी आँखसे यज्ञका भाग देखें । हे तात! | पूषा नामक देवता, जिनके दाँत टूट गये हैं, यजमानके ८ । दाँतोंसे भलीभाँति पिसे हुए अन्नका भक्षण करें । यह । मैंने सच्ची बात बतायी है । I मेरा विरोध करनेवाले भृगुकी दाढ़ीके स्थानमें बकरेकी दाढ़ी लगा दी जाय । | शेष सभी देवताओंके, जिन्होंने मुझे यज्ञका उच्छिष्ट
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अ ० ४२ ] रुद्रसंहिता ( सतीखण्ड ) ४ ९ ७ देवाः प्रकृतिसर्वांगा ये म उच्छेषणं ददुः ॥
बाहुभ्यामश्विनौ पूष्णो हस्ताभ्यां कृतवाहकः ।
भवन्त्वध्वर्यवश्चान्ये भवत्प्रीत्या मयोदितम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा परमेशानो विरराम दयान्वितः ।
चराचरपतिर्देवः सम्राट् वेदानुसारकृत् ॥
तदा सर्वे सुराद्यास्ते श्रुत्वा शंकरभाषितम् ।
साधु साध्विति संप्रोचुः परितुष्टाः सविष्ण्वजाः ॥
ततः शंभुं समामन्त्र्य मया विष्णुः सुरर्षिभिः ।
भूयस्तद्देवयजनं ययौ च परया मुदा ॥
एवं तेषां प्रार्थनया विष्णुप्रभृतिभिः सुरैः ।
ययौ कनखलं शंभुर्यज्ञवाटं प्रजापतेः ॥
रुद्रस्तदा ददर्शाथ वीरभद्रेण यत्कृतम् ।
प्रध्वंसं तं क्रतोस्तत्र देवर्षीणां विशेषतः ॥
स्वहा स्वधा तथा पूषा तुष्टिर्धृतिः सरस्वती ।
तथान्ये ऋषयः सर्वे पितरश्चाग्नयस्तथा ॥
येऽन्ये च बहवस्तत्र यक्षगंधर्वराक्षसाः ।
त्रोटिता लुंचिताश्चैव मृताः केचिद्रणाजिरे ॥
यज्ञं तथाविधं दृष्ट्वा समाहूय गणाधिपम् ।
वीरभद्रं महावीर्यमुवाच प्रहसन् प्रभुः ॥
वीरभद्र महाबाहो किं कृतं कर्म ते त्विदम् ।
महान् दंडो धृतस्तात देवर्ष्यादिषु सत्वरम् ॥
दक्षमानय शीघ्रं त्वं येनेदं कृतमीदृशम् ।
यज्ञो विलक्षणस्तात यस्येदं फलमीदृशम् ॥
ब्रह्मोवाच एवमुक्तः शंकरेण वीरभद्रस्त्वरान्वितः । कबंधमानयित्वाग्रे तस्य शंभोरथाक्षिपत् ९ । भाग दिया, सारे अंग पहलेकी भाँति ठीक हो जायँ । याज्ञिकोंमेंसे जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे अश्विनीकुमारोंकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट
१० हो गये हैं, वे पूषाके हाथोंसे अपना काम चलायें ।
यह मैंने आपलोगोंके प्रेमवश कहा है ॥ ७–१० ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] इस प्रकार कहकर वेदका अनुसरण करनेवाले सुरसम्राट् चराचरपति ११ दयालु परमेश्वर महादेवजी चुप हो गये । भगवान् शंकरका वह वचन सुनकर श्रीविष्णु और ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता सन्तुष्ट हो गये । वे तत्काल साधुवाद १२ देने लगे । तदनन्तर भगवान् शम्भुको आमन्त्रित करके मुझ ब्रह्मा और देवर्षियोंके साथ भगवान् विष्णु १३ अत्यन्त हर्षित हो पुनः दक्षकी यज्ञशालाकी ओर चले ॥ ११–१३ ॥ इस प्रकार उनकी प्रार्थनासे भगवान् शम्भु विष्णु १४ आदि देवताओंके साथ कनखलमें स्थित प्रजापति दक्षकी यज्ञशालामें गये । उस समय रुद्रदेवने वहाँ यज्ञका और विशेषतः देवताओं तथा ऋषियोंका १५ विध्वंस, जो वीरभद्रके द्वारा किया गया था, उसे देखा ॥ १४-१५ ॥ स्वाहा, स्वधा, पूषा, तुष्टि, धृति, सरस्वती, १६ अन्य समस्त ऋषि, पितर, अग्नि तथा अन्यान्य बहुत-| से यक्ष, गन्धर्व और राक्षस वहाँ पड़े थे । उनमेंसे कुछ लोगोंके अंग तोड़ डाले गये थे । कुछ लोगोंके बाल १७ नोंच लिये गये थे और कितने ही उस समरांगणमें मरे पड़े थे ॥ १६-१७ ॥ उस यज्ञकी वैसी दुरवस्था देखकर भगवान् १८ शंकरने अपने गणनायक पराक्रमी वीरभद्रको बुलाकर हँसते हुए कहा - हे महाबाहु वीरभद्र! यह तुमने कैसा काम किया? हे तात! थोड़ी ही देरमें देवता १ ९ तथा ऋषि आदिको बड़ा भारी दण्ड दे दिया! हे तात! जिसने ऐसा [ द्रोहपूर्ण ] कार्य किया तथा इस विलक्षण २० यज्ञका आयोजन किया और जिसे ऐसा फल मिला, उस दक्षको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ ॥ १८ - २० ॥ ब्रह्माजी बोले- भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर वीरभद्रने शीघ्रतापूर्वक दक्षका धड़ लाकर उन शम्भुके ॥ २१ समक्ष डाल दिया ॥२१ ॥
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४ ९ ८ विशिरस्कं च तं दृष्ट्वा शंकरो लोकशंकरः वीरभद्रमुवाचाग्रे विहसन् मुनिसत्तम शिरः कुत्रेति तेनोक्तं वीरभद्रोऽब्रवीत्प्रभुः मया शिरो हुतं चाग्नौ तदानीमेव शंकर इति श्रुत्वा वचस्तस्य वीरभद्रस्य शंकरः देवान् तथाज्ञपत्प्रीत्या यदुक्तं तत्पुरा प्रभुः विधाय कार्त्स्न्येन च तद्यदाह भगवान् भवः मया विष्ण्वादयः सर्वे भृग्वादीनथ सत्वरम् अथ प्रजापतेस्तस्य सवनीयपशोः शिरः बस्तस्य संदधुः शंभोः कायेनारं सुशासनात् संधीयमाने शिरसि शंभुसद्दृष्टिवीक्षितः । सद्यः सुप्त इवोत्तस्थौ लब्धप्राणः प्रजापतिः उत्थितश्चाग्रतः शंभुं ददर्श करुणानिधिम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ । मुनिश्रेष्ठ! उसे सिररहित देख लोककल्याणका ॥ २२ भगवान् शंकरने आगे खड़े हुए वीरभद्रसे हँसकर | पूछा- दक्षका सिर कहाँ है? तब प्रभावशाली वीरभद्रने ॥ | कहा- हे शंकर! मैंने तो उसी समय दक्षके सिरको ॥ २३ आगमें होम कर दिया था ॥ २२-२३ ॥ । वीरभद्रकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरने ॥ २४ देवताओंको प्रसन्नतापूर्वक वैसी ही आज्ञा दी, जो पहले से । दे रखी थी । भगवान् भवने उस समय जो कुछ कहा । उसकी मेरे द्वारा पूर्ति कराकर श्रीहरि आदि सब देवताओंने, ॥ २५ भृगु आदि सबको शीघ्र ही ठीक कर दिया ॥ २४-२५ ॥ । तदनन्तर शम्भुके आदेशसे प्रजापति दक्षके धड़के ॥ २६ साथ सवनीय पशु - बकरेका सिर जोड़ दिया गया । उस सिरके जोड़े जाते ही शम्भुकी कृपादृष्टि पड़नेसे प्रजापति दक्ष प्राण प्राप्त करके तत्क्षण सोकर जगे हुए ॥ २७ पुरुषकी भाँति उठकर खड़े हो गये ॥ २६-२७ ॥ उठते ही दक्षने प्रसन्नचित्त होकर प्रेमपूर्वक दक्षः प्रीतमतिः प्रीत्या संस्थितः सुप्रसन्नधीः ॥ २८ अपने सामने करुणानिधि भगवान् शंकरको देखा ।
पुरा हरमहाद्वेषकलिलात्माभवद्धि सः ।
शिवावलोकनात् सद्यः शरच्चन्द्र इवामलः ॥
भवं स्तोतुमनाः सोऽथ नाशक्नोदनुरागतः ।
उत्कण्ठाविकलत्वाच्च संपरेतां सुतां स्मरन् ॥
अथ दक्षः प्रसन्नात्मा शिवं लज्जासमन्वितः ।
तुष्टाव प्रणतो भूत्वा शंकरं लोकशंकरम् ॥
दक्ष उवाच नमामि देवं वरदं वरेण्यं महेश्वरं ज्ञाननिधिं सनातनम् । नमामि देवाधिपतीश्वरं हरं सदा सुखाढ्यं जगदेकबांधवम् ॥ नमामि विश्वेश्वर विश्वरूपं पुरातनं ब्रह्मनिजात्मरूपम् । नमामि शर्वं भवभावभावं परात्परं शंकरमानतोऽस्मि ॥ पहले महादेवजीसे द्वेष करनेके कारण उनका अन्तःकरण मलिन हो गया था, परंतु उस समय शिवजीके दर्शनसे २ ९ वे तत्काल शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति निर्मल हो गये ॥ २८-२९ ॥ यद्यपि वे [ प्रेमके वशीभूत होकर ] मनमें ३० शिवजीकी स्तुति करनेकी इच्छा कर रहे थे, किंतु उन्हें | उसी समय सतीके ब्रह्माजी बोले- शरीरत्यागका स्मरण हो गया, इसलिये वे उत्कण्ठासे व्याकुल होनेके कारण स्तुति नहीं कर सके ॥ ३० ॥
तदनन्तर लज्जित होकर दक्ष प्रजापति प्रसन्नचित्त ३१ हो विनम्रतापूर्वक लोकका कल्याण करनेवाले शंकरकी स्तुति करने लगे ॥३१ ॥
दक्ष बोले — वरदानी, श्रेष्ठ, महेश्वर, ज्ञाननिधि, सनातन देवको नमस्कार करता हूँ । देवाधिदेवोंके भी | ईश्वर, सुखरूप एवं संसारके एकमात्र बन्धु भगवान् ३२ शंकरजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३२ ॥
हे विश्वेश्वर! [ आप ] विश्वरूप, पुरातन, ब्रह्मा । तथा आत्मस्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ । मैं शर्वको । नमस्कार करता हूँ । मैं संसारके भावोंका चिन्तन ३३ करनेवाले परात्पर शंकरको नमस्कार करता हूँ ॥ ३३ ॥