शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 541–550

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५२ ९

बभूव मङ्गलं गानं ननृतुर्वारयोषितः ।

दानं ददौ द्विजातिभ्यो जातकर्म विधाय च ॥

अथ द्वारं समागत्य चकार सुमहोत्सवम् ।

हिमाचलः प्रसन्नात्मा भिक्षुभ्यो द्रविणं ददौ ॥

अथो शुभमुहूर्तेऽस्मिन् हिमवान्मुनिभिः सह ।

नामाकरोत्सुतायास्तु कालीत्यादि सुखप्रदम् ॥

दानं ददौ तदा प्रीत्या द्विजेभ्यो बहु सादरम् ।

उत्सवं कारयामास विविधं गानपूर्वकम् ॥

इत्थं कृत्वोत्सवं भूरि कालीं पश्यन्मुहुर्मुहुः ।

लेभे मुदं सपत्नीको बहुपुत्रोऽपि भूधरः ॥

तत्र सा ववृधे देवी गिरिराजगृहे शिवा ।

गङ्गेव वर्षासमये शरदीवाथ चन्द्रिका ॥

एवं सा कालिका देवी चार्वङ्गी चारुदर्शना ।

दध्रे चानुदिनं रम्यां चन्द्रबिम्बकलामिव ॥

कुलोचितेन नाम्ना तां पार्वतीत्याजुहाव ह ।

बन्धुप्रियां बन्धुजनः सौशील्यगुणसंयुताम् ॥

उमेति मात्रा तपसे निषिद्धा कालिका च सा ।

पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम भुवने मुने ॥

दृष्टिः पुत्रवतोऽप्यद्रेस्तस्मिंस्तृप्तिं जगाम न ।

अपत्ये पार्वतीत्याख्ये सर्वसौभाग्यसंयुते ॥

मधोरनन्तपुष्पस्य चूते हि भ्रमरावलिः ।

विशेषसङ्गा भवति सहकारे मुनीश्वर ॥

पूतो विभूषितश्चापि स बभूव तया गिरिः ।

संस्कारवत्यैव गिरा मनीषीव हिमालयः ॥

प्रभामहत्या शिखयेव दीपो भवनस्य च ।

त्रिमार्गयेव सन्मार्गस्तद्वद् गिरिजया गिरिः ॥

मंगलगान होने लगा और वारांगनाएँ नृत्य करने ९ लगीं । गिरिराजने [ कन्याका ] जातकर्म संस्कारकर द्विजातियोंको दान दिया ॥८ - ९ ॥ उसके बाद दरवाजेपर आकर हिमाचलने महान् १० उत्सव मनाया और प्रसन्नचित्त होकर भिक्षुकोंको बहुत - सा धन दिया ॥ १० ॥

तदनन्तर हिमवान्ने शुभ मुहूर्तमें मुनियोंके साथ ११ उस कन्याके काली आदि सुखदायक नाम रखे ॥ ११ ॥

उन्होंने उस समय ब्राह्मणोंको प्रेम तथा आदरपूर्वक १२ बहुत - सा धन प्रदान किया और गानपूर्वक अनेक प्रकारका उत्सव कराया । इस प्रकार उत्सव मनाकर बार - बार कालीको देखते हुए सपत्नीक हिमालय अनेक पुत्रोंवाले १३ होनेपर भी बहुत आनन्दित हुए ॥ १२-१३ ॥ देवी शिवा गिरिराजके घरमें वर्षाके समय १४ गंगाके समान तथा शरद् ऋतुकी चाँदनीके समान बढ़ने लगीं । इस प्रकार परम सुन्दरी तथा दिव्य दर्शनवाली कालिका देवी प्रतिदिन चन्द्रकलाके समान १५ शोभायुक्त हो बढ़ने लगीं ॥ १४-१५ ॥ सुशीलता आदि गुणोंसे संयुक्त तथा बन्धुजनोंकी १६ प्रिय उस कन्याको कुटुम्बके लोग अपनी कुलपरम्पराके अनुसार ‘ पार्वती ' इस नामसे पुकारने लगे ॥ १६ ॥

हे मुने! माताने उन कालिकाको ‘ उमा ' कहकर १७ तपस्या करनेसे मना किया था, अतः बादमें वे सुमुखी लोकमें उमा नामसे विख्यात हुईं ॥१७ ॥

पुत्रवान् होते हुए भी पर्वतराज हिमालय १८ सर्वसौभाग्ययुक्त उस पार्वती नामक अपनी सन्तानको देखते हुए तृप्त नहीं होते थे, क्योंकि हे मुनीश्वर! वसन्त ऋतुमें नाना प्रकारके पुष्पोंमें रस होनेपर भी १ ९ भ्रमरावली आमके बौरपर ही विशेष रूपसे आसक्त होती है॥१८-१९ ॥ वे पर्वतराज हिमालय उस पार्वतीसे उसी प्रकार २० पवित्र तथा विभूषित हुए, जिस प्रकार संस्कारसे युक्त वाणीसे विद्वान् पवित्र तथा विभूषित होता है ॥ २० ॥

जिस प्रकार महान् प्रभावशाली शिखासे भवनका दीपक एवं त्रिमार्गगामिनी गंगासे सन्मार्ग शोभित होता है, उसी प्रकार पार्वतीद्वारा पर्वतराज २१ । सुशोभित हुए ॥ २१ ॥

पृष्ठ 542

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५३० कन्दुकैः कृत्रिमैः पुत्रैः सखीमध्यगता च सा गङ्गासैकतवेदीभिर्बाल्ये रेमे मुहुर्मुहुः अथ देवी शिवा सा चोपदेशसमये मुने । पपाठ विद्या: सुप्रीत्या यतचित्ता च सद्गुरोः प्राक्तना जन्मविद्यास्तां शरदीव प्रपेदिरे हंसालिः स्वर्णदीं नक्तमात्मभासो महौषधिम् इत्थं सुवर्णिता लीला शिवायाः काचिदेव हि अन्यलीलां प्रवक्ष्येऽहं शृणु त्वं प्रेमतो मुने श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । वे पार्वती बचपनमें अपनी सहेलियोंके साथ कन्दुक ॥ २२ ( गेंद ), कृत्रिम पुत्रों [ पुतला ] तथा गंगाकी बालुकासे बनायी गयी वेदियोंद्वारा क्रीड़ा करती थीं ॥ २२ ॥

उसके अनन्तर हे मुने! वे शिवा देवी उपदेशके ॥ २३ समय एकाग्रचित्त होकर सद्गुरुसे अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सभी विद्याएँ पढ़ने लगीं । जिस प्रकार शरद् ऋतुमें । हंसपंक्ति गंगाको तथा रात्रिमें अमृतमयी चन्द्र किरणें ॥ २४ औषधियोंको प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार उन पार्वतीको पूर्वजन्मकी विद्याएँ स्वयं प्राप्त हो गयीं । हे मुने! इस प्रकार मैंने शिवाकी कुछ लीलाका ही आपसे वर्णन । किया, अब अन्य लीलाका भी वर्णन करूँगा, आप ॥ २५ । प्रेमपूर्वक सुनें ॥ २३–२५ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीबाल्यलीलावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीकी बाल्यलीलाका वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः नारद मुनिका हिमालयके समीप गमन, वहाँ पार्वतीका हाथ देखकर भावी लक्षणोंको बताना, चिन्तित हिमवान्‌को शिवमहिमा बताना तथा शिवसे विवाह करनेका परामर्श देना ब्रह्मोवाच

एकदा त्वं शिवज्ञानी शिवलीलाविदां वरः ।

हिमाचलगृहं प्रीत्यागमस्त्वं शिवप्रेरितः ॥

दृष्ट्वा मुने गिरीशस्त्वां नत्वानर्च स नारद ।

आहूय च स्वतनयां त्वदङ्घ्रयोस्तामपातयत् ॥

पुनर्नत्वा मुनीश त्वामुवाच हिमभूधरः ।

साञ्जलिः स्वविधिं मत्वा बहुसन्नतमस्तकः ॥

हिमालय उवाच

हे मुने नारद ज्ञानिन् ब्रह्मपुत्रवर प्रभो ।

सर्वज्ञस्त्वं सकरुणः परोपकरणे रतः ॥

मत्सुताजातकं ब्रूहि गुणदोषसमुद्भवम् ।

कस्य प्रिया भाग्यवती भविष्यति सुता मम ॥

ब्रह्माजी बोले- हे नारद! एक समयकी बात है, आप शिवजीसे प्रेरित होकर प्रसन्नतापूर्वक १ हिमालयके घर गये । आप शिवतत्त्वके ज्ञाता और शिवकी लीलाके जानकारोंमें श्रेष्ठ हैं । हे मुने! गिरिराज हिमालयने आपको देखकर प्रणाम करके २ आपकी पूजा की और अपनी पुत्रीको बुलाकर उनसे आपके चरणोंमें प्रणाम करवाया ॥ १-२ ॥ हे मुनीश्वर! तत्पश्चात् स्वयं नमस्कार करके ३ हिमाचल अपने सौभाग्यकी सराहना करके मस्तक झुकाकर हाथ जोड़कर आपसे कहने लगे- ॥३ ॥

हिमालय बोले - हे मुने! हे नारद! हे ज्ञानिन्! | हे ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ! हे प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, ४ दयामय हैं और दूसरोंके उपकारमें लगे रहनेवाले हैं । गुण - दोषको प्रकट करनेवाले आप मेरी पुत्रीके | जन्मफलका वर्णन कीजिये, मेरी सौभाग्यवती पुत्री ५ किसकी पत्नी होगी? ॥४-५ ॥

पृष्ठ 543

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३१ ब्रह्मोवाच

इत्युक्तो मुनिवर्य त्वं गिरीशेन हिमाद्रिणा ।

विलोक्य कालिकाहस्तं सर्वाङ्गं च विशेषतः ॥

अवोचस्त्वं गिरिं तात कौतुकी वाग्विशारदः ।

ज्ञानी विदितवृत्तान्तो नारदः प्रीतमानसः ॥

नारद उवाच

एषा ते तनया मेने सुधांशोरिव वर्धिता ।

आद्या कला शैलराज सर्वलक्षणशालिनी ॥

स्वपतेः सुखदात्यन्तं पित्रोः कीर्तिविवर्धिनी ।

महासाध्वी च सर्वासु महानन्दकरी सदा ॥

सुलक्षणानि सर्वाणि त्वत्सुतायाः करे गिरे ।

एका विलक्षणा रेखा तत्फलं शृणु तत्त्वतः ॥

योगी नग्नोऽगुणोऽकामी मातृतातविवर्जितः ।

अमानोऽशिववेषश्च पतिरस्याः किलेदृशः ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्ते हि सत्यं मत्वा च दम्पती ।

मेना हिमाचलश्चापि दुःखितौ तौ बभूवतुः ॥

शिवाकर्ण्यवचस्ते हि तादृशं जगदम्बिका ।

लक्षणैस्तं शिवं मत्वा जहर्षाति मुने हृदि ॥

न मृषा नारदवचस्त्विति संचिन्त्य सा शिवा ।

स्नेहं शिवपदद्वन्द्वे चकाराति हृदा तदा ॥

उवाच दुखितः शैलस्त्वां तदा हृदि नारद ।

कमुपायं मुने कुर्यामतिदुःखमभूदिति ॥

तच्छ्रुत्वा त्वं मुने प्रात्थ महाकौतुककारकः । हिमाचलं शुभैर्वाक्यैर्हर्षयन्वाग्विशारदः । नारद उवाच

स्नेहाच्छृणु गिरे वाक्यं मम सत्यं मृषा न हि ।

कररेखा ब्रह्मलिपिनं मृषा भवति ध्रुवम् ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! हे तात! गिरिराज हिमालयके ऐसा कहनेपर कालिकाके हाथ और ६ विशेष रूपसे उसके सम्पूर्ण अंगोंको देखकर कौतुकी, बोलनेमें चतुर, ज्ञानी और सभी वृत्तान्तोंको जाननेवाले आप नारद प्रसन्नचित्त होकर पर्वतराजसे कहने ७ लगे - ॥६-७ ॥ नारद बोले- हे शैलराज! हे मेने! आपकी यह पुत्री चन्द्रमाकी आदि कलाके समान बढ़ रही है, ८ यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है ॥८ ॥

यह अपने पतिके लिये अत्यन्त सुखदायिनी, ९ माता - पिताकी कीर्तिको बढानेवाली, समस्त नारियोंमें परम साध्वी और [ स्वजनोंको ] सदा महान् आनन्द देनेवाली होगी॥९॥

हे गिरे! आपकी पुत्रीके हाथमें उत्तम लक्षण १० विद्यमान हैं, केवल एक रेखा विलक्षण है, उसका फल यथार्थरूपसे सुनिये । इसे ऐसा पति प्राप्त होगा, जो योगी, नग्न, निर्गुण, निष्काम, माता - पिता से रहित, ११ मानविहीन और अमंगल वेषवाला होगा ॥ १०-११ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] आपकी इस बातको सुनकर और सत्य मानकर वे मेना तथा १२ हिमालय - दोनों पति - पत्नी बहुत दुखी हुए ॥१२ ॥

परंतु हे मुने! जगदम्बा शिवा आपके उस प्रकारके वचनको सुनकर और इन लक्षणोंसे युक्त उन शिवको १३ मानकर मन - ही - मन अत्यन्त हर्षित हुईं ॥ १३ ॥

नारदजीकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती-१४ यह सोचकर वे शिवा शिवके युगलचरणोंमें सम्पूर्ण हृदयसे अत्यन्त स्नेह करने लगीं ॥ १४ ॥

हे नारद! उस समय मन - ही - मन दुखी हो हिमवान्ने १५ आपसे कहा –—मुने! [ उस रेखाका फल सुनकर ] मुझे बड़ा दुःख हुआ है, मैं क्या उपाय करूँ? ॥ १५ ॥

हे मुने! यह सुनकर महान् कौतुक करनेवाले १६ और वार्तालापविशारद आप मंगलकारी वचनोंद्वारा हिमाचलको हर्षित करते हुए कहने लगे- ॥ १६ ॥

नारदजी बोले - हे गिरिराज! आप स्नेहपूर्वक सुनिये । मेरी. बात सच्ची है, वह झूठ नहीं होगी । हाथकी रेखा ब्रह्माजीकी लिपि है । निश्चय ही वह १७ । मिथ्या नहीं होती है ॥ १७ ॥

पृष्ठ 544

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५३२ तादृशोऽस्याः पतिः शैल भविष्यति न संशयः तत्रोपायं शृणु प्रीत्या यं कृत्वा लप्स्यसे सुखम् ॥ तादृशोऽस्ति वरः शम्भुः लीलारूपधरः प्रभुः कुलक्षणानि सर्वाणि तत्र तुल्यानि सद्गुणैः प्रभौ दोषो न दुःखाय दुःखदोऽत्यप्रभौ हि सः रविपावकगङ्गानां तत्र ज्ञेया निदर्शना

तस्माच्छिवाय कन्यां स्वां शिवां देहि विवेकतः ।

शिवः सर्वेश्वरः सेव्योऽविकारी प्रभुरव्ययः ॥

शीघ्रप्रसादः स शिवः तां ग्रहीष्यत्यसंशयम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । हे शैल! इसका पति वैसा ही होगा, इसमें संशय १८ नहीं है, परंतु आप इसके उपायको प्रेमपूर्वक सुनिये जिसे करके आप सुख प्राप्त करेंगे ॥ १८ ॥,

। उस प्रकारके वर तो लीलारूपधारी प्रभु शिव ही ॥ १ ९ हैं, उनमें समस्त कुलक्षण सद्गुणोंके समान ही हैं ॥ १ ९ ॥ । समर्थ पुरुषमें दोष दुःखका कारण नहीं होता, ॥ २० असमर्थमें ही वह दुःखदायक होता है । इस विषय में सूर्य, अग्नि और गंगाका दृष्टान्त जानना चाहिये ॥२० ॥

इसलिये आप विवेकपूर्वक अपनी कन्या शिवाको २१ शिवको अर्पण कीजिये । भगवान् शिव सर्वेश्वर, सबके सेव्य, निर्विकार, सामर्थ्यशाली और अविनाशी हैं । विशेषतः वे तपस्यासे वशमें हो जाते हैं । अत: तपःसाध्यो विशेषेण यदि कुर्याच्छिवा तपः ॥ २२ यदि शिवा तप करे, तो शीघ्र ही प्रसन्न होनेवाले वे

सर्वथा सुसमर्थो हि स शिवः सकलेश्वरः ।

कुलिशस्यापि विध्वंसी ब्रह्माधीनः सुखप्रदः ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा त्वं पुनस्तात कौतुकी ब्रह्मविन्मुने ।

शैलराजमवोचो हि हर्षयन्वचनैः शुभैः ॥

भाविनी दयिता शम्भोः सानुकूला सदा हरे ।

महासाध्वी सुव्रता च पित्रोः सुखविवर्धिनी ॥

शम्भोश्चित्तं वशे चैषा करिष्यति तपस्विनी ।

स चाप्येनामृते योषां न ह्यन्यामुद्बहिष्यति ॥

एतयोः सदृशं प्रेम न कस्याप्येव तादृशम् ।

भूतं वा भविता वापि नाधुना च प्रवर्तते ॥

अनयोः सुरकार्याणि कर्तव्यानि मृतानि च ।

यानि यानि नगश्रेष्ठ जीवितानि पुनः पुनः ॥

अनया कन्यया तेऽद्रे अर्धनारीश्वरो हरः ।

भविष्यति तथा हर्षदिनयोर्मिलितं पुनः ॥

शरीरार्थं हरस्यैषा हरिष्यति सुता तव ।

तपःप्रभावात्संतोष्य महेशं सकलेश्वरम् ॥

शिव उसे अवश्य ग्रहण कर लेंगे ॥ २१-२२ ॥

सर्वेश्वर शिव सब प्रकारसे समर्थ तथा वज्र २३ [ -लेख ] का भी विनाश करनेवाले हैं । ब्रह्माजी उनके अधीन हैं तथा वे सबको सुख देनेवाले हैं ॥ २३ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे तात! हे ब्रह्मवित्! हे मुने! ऐसा कहकर कौतुक करनेवाले आपने शुभ वचनोंसे २४ गिरिराजको हर्षित करते हुए पुन: कहा- — 112811 पार्वती भगवान् शंकरकी पत्नी होगी और वह २५ सदा रुद्रदेवके अनुकूल रहेगी; क्योंकि यह महासाध्वी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली है तथा माता-पिताके सुखको बढ़ानेवाली है ॥ २५ ॥

यह तपस्विनी भगवान् शिवके मनको अपने २६ वशमें कर लेगी और वे भी इसके सिवा किसी दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं करेंगे ॥ २६ ॥

इन दोनोंका जैसा प्रेम है, वैसा प्रेम न तो किसीका २७ हुआ है, न इस समय है और न आगे होगा ॥ २७ ॥

हे गिरिश्रेष्ठ! इन्हें देवताओंके कार्य करने हैं, २८ उनके जो - जो कार्य नष्टप्राय हो गये हैं, उन सबका इनके द्वारा पुनः उद्धार होगा ॥२८ ॥

हे गिरे! आपकी इस कन्यासे भगवान् हर २ ९ अर्धनारीश्वर होंगे, इन दोनोंका पुनः हर्षपूर्वक मिलन होगा ॥ २ ९ ॥ • आपकी यह पुत्री तपस्याके प्रभावसे सर्वेश्वर | महेश्वरको सन्तुष्ट करके उनके शरीरके आधे भागको ३० अपने अधिकारमें कर लेगी ॥ ३० ॥

पृष्ठ 545

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३३

स्वर्णगौरी सुवर्णाभा तपसा तोष्य तं हरम् ।

विद्युद्गौरतमा चेयं तव पुत्री भविष्यति ॥

गौरीति नाम्ना कन्या तु ख्यातिमेषा गमिष्यति ।

सर्वदेवगणैः पूज्या हरिब्रह्मादिभिस्तथा ॥

नान्यस्मै त्वमिमां दातुमिहार्हसि नगोत्तम ।

इदं चोपांशु देवानां न प्रकाश्यं कदाचन ॥

ब्रह्मोवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा देवर्षे तव नारद ।

उवाच हिमवान्वाक्यं मुने त्वां वाग्विशारदः ॥

हिमालय उवाच

हे मुने नारद प्राज्ञ विज्ञप्तिं कांचिदेव हि ।

करोमि तां शृणु प्रीत्यातस्त्वं प्रमुदमावह ॥

श्रूयते त्यक्तसङ्गः स महादेवो यतात्मवान् ।

तपश्चरति सन्नित्यं देवानामप्यगोचरः ॥

स कथं ध्यानमार्गस्थः परब्रह्मार्पितं मनः ।

भ्रंशयिष्यति देवर्षे तत्र मे संशयो महान् ॥

अक्षरं परमं ब्रह्म प्रदीपकलिकोपमम् ।

सदाशिवाख्यं स्वं रूपं निर्विकारमजात्परम् ॥

निर्गुणं सगुणं तच्च निर्विशेषं निरीहकम् ।

अतः पश्यति सर्वत्र न तु बाह्यं निरीक्षते ॥

इति स श्रूयते नित्यं किन्नराणां मुखान्मुने ।

इहागतानां सुप्रीत्या किं तन्मिथ्यावचो ध्रुवम् ॥

विशेषतः श्रूयते स साक्षान्नाम्ना तथा हरः ।

समयं कृतवान्पूर्वं तन्मया गदितं शृणु ॥

न त्वामृतेऽन्यां वरये दाक्षायणि सति प्रिये ।

भार्यार्थं न ग्रहीष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

यह आपकी कन्या अपनी तपस्यासे उन शिवको ३१ सन्तुष्टकर विद्युत् तथा सुवर्णके समान गौरवर्णकी होगी ॥ ३१ ॥

इसीलिये यह कन्या गौरी नामसे विख्यात ३२ होगी और ब्रह्मा, विष्णु तथा समस्त देवगण इसका पूजन करेंगे ॥ ३२ ॥

हे गिरिश्रेष्ठ! आप इस कन्याको किसी दूसरेके ३३ लिये नहीं देना और इस रहस्यको देवताओंसे कभी प्रकट नहीं करना ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे देवर्षे! हे नारद! हे मुने! आपका यह वचन सुनकर वाक्यविशारद हिमालय ३४ आपसे यह वाक्य कहने लगे —॥३४ ॥

हिमालय बोले - हे मुने! हे नारद! हे प्राज्ञ! मैं आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ, आप उसे प्रेमपूर्वक ३५ सुनिये और आनन्दका अनुभव कीजिये ॥ ३५ ॥

सुना जाता है कि वे महादेवजी आसक्तियोंका ३६ त्याग करके अपने मनको संयममें रखते हुए नित्य तपस्या करते हैं और देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते ॥ ३६ ॥

हे देवर्षे! ध्यानमार्गमें स्थित हुए वे [ भगवान् ३७ शंकर ] परब्रह्ममें लगाये हुए अपने मनको किस प्रकार विचलित करेंगे, इस विषयमें मुझे महान् संशय है ॥ ३७ ॥

दीपककी लौके समान प्रकाशमान, अविनाशी, ३८ प्रकृतिसे परे, निर्विकार, निर्गुण, सगुण, निर्विशेष और निरीह जो परब्रह्म है, वही उनका अपना सदाशिव नामक

स्वरूप है, अत: वे उसीका सर्वत्र साक्षात्कार करते हैं ।

३ ९ किसी बाह्य वस्तुपर दृष्टिपात नहीं करते ॥ ३८-३९ ॥

हे मुने! यहाँ आये हुए किन्नरोंके मुखसे उनके ४० विषयमें नित्य ऐसा सुना जाता है, क्या यह बात मिथ्या ही है ॥४० ॥

विशेषतः यह बात भी सुननेमें आती है कि उन ४१ भगवान् हरने पूर्व समयमें [ सतीके समक्ष ] प्रतिज्ञा की थी, उसे मैं कहता हूँ, आप सुनें ॥४१ ॥

[ उन्होंने कहा था- ] हे दाक्षायणि! हे सति! हे प्रिये! मैं तुम्हारे अतिरिक्त दूसरी स्त्रीका न तो वरण करूँगा और न तो उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करूँगा, यह ४२ । मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 546

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५३४ इति सत्या समं तेन पुरैव समयः कृतः तस्यां मृतायां स कथं स्वयमन्यां ग्रहीष्यति ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा स गिरिस्तूष्णीमास तस्य पुरस्तव तदाकर्ण्याथ देवर्षे त्वं प्रावोचः सुतत्त्वतः नारद उवाच वै कार्या त्वया चिंता गिरिराज महामते एषा तव सुता काली दक्षजा ह्यभवत्पुरा ॥ सतीनामाभवत्तस्याः सर्वमङ्गलदं सदा सती सा वै दक्षकन्या भूत्वा रुद्रप्रियाभवत् पितुर्यज्ञे तथा प्राप्यानादरं शंकरस्य च तं दृष्ट्वा कोपमाधायात्याक्षीद्देहं च सा सती पुनः सै समुत्पन्ना तव गेहेऽम्बिका शिवा । पार्वती हरपत्नीयं भविष्यति न संशयः एतत्सर्वं विस्तरात्त्वं प्रोक्तवान्भूभृते मुने । पूर्वरूपं चरित्रं च पार्वत्याः प्रीतिवर्धनम् तं सर्वं पूर्ववृत्तान्तं काल्या मुनिमुखाद्गिरिः श्रुत्वा सपुत्रदारः स तदा निःसंशयोऽभवत् ॥ ततः काली कथां श्रुत्वा नारदस्य मुखात्तदा लज्जयाधोमुखी भूत्वा स्मितविस्तारितानना करेण तां तु संस्पृश्य श्रुत्वा तच्चरितं गिरिः मूर्ध्नि शश्वत्तथाघ्राय स्वासनान्ते न्यवेशयत्

ततस्त्वं तां पुनर्दृष्ट्वावोचस्तत्र स्थितां मुने ।

हर्षयन् गिरिराजं च मेनकां तनयैः सह ॥

सिंहासनं तु किन्त्वस्याः शैलराज भवेदतः । शम्भोरूरौ सदैतस्या आसनं तु भविष्यति

हरेरूर्वासनं प्राप्य तनया तव सन्ततम् ।

न यत्र कस्यचिद् दृष्टिर्मानसं वा गमिष्यति ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । इस प्रकार सतीके साथ उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा ॥ ४३ कर ली है । अब सतीके मर जानेपर वे स्वयं दूसरी स्त्रीको कैसे ग्रहण करेंगे? ॥४३ ॥

ब्रह्माजी बोले – हे देवर्षे! यह कहकर उन । गिरिने आपके सामने मौन धारण कर लिया, तब इसे ॥ ४४ सुनकर आप तत्त्वपूर्वक यह बात कहने लगे- ॥ ४४ ॥

नारदजी बोले – हे गिरिराज! हे महामते! । आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, आपकी यह ४५ कन्या काली पूर्व समयमें दक्षकी पुत्री थी ॥४५ ॥

। उस समय उसका नाम सती था, जो सदा मंगल ॥ ४६ प्रदान करनेवाला है । वह सती दक्षकन्या होकर रुद्रकी प्रिया बनी थी ॥ ४६ ॥

। उस सतीने अपने पिताके यज्ञमें अनादर पाकर ॥ ४७ तथा भगवान् शंकरका भी अपमान हुआ देखकर कोप करके अपने शरीरको त्याग दिया था ॥ ४७ ॥

वे ही अम्बिका शिवा आपके घरमें उत्पन्न हुई ॥ ४८ हैं । यह पार्वती भगवान् शंकरकी पत्नी होगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥

[ ब्रह्माजीने कहा— ] हे मुने! उस समय आपने ॥ ४ ९ पार्वतीका यह सब प्रीतिवर्धक पूर्वजन्म तथा चरित्र विस्तारपूर्वक गिरिराजसे कहा था ॥४ ९ ॥ । मुनिके मुखसे कालीके सम्पूर्ण पूर्व वृत्तान्तको ५० सुनकर पुत्र - स्त्रीसहित वे गिरि सन्देहरहित हो गये ॥ ५० ॥

। तत्पश्चात् कालीने नारदजीके मुखसे उस कथाको ॥ ५१ सुनकर लज्जासे मुख नीचे कर लिया और उनके मुखपर मुसकान छा गयी ॥५१ ॥

। उसके चरित्रको सुनकर, हाथसे उसका स्पर्श ॥ ५२ करके और बार - बार उसका मस्तक सूँघकर हिमालयने उसे अपने आसनके पास बैठाया ॥ ५२ ॥

तब हे मुने! आप वहाँ बैठी हुई उस कालीको ५३ देखकर पुत्रोंसहित गिरिराज एवं मेनाको प्रसन्न करते | हुए कहने लगे - हे शैलराज! इस पार्वतीके बैठने ॥ ५४ । लिये यह सिंहासन क्या है? इसका आसन तो सदा । शम्भुका ऊरुदेश होगा । यह तुम्हारी तनया शिवजीके ऊरुका आसन प्राप्त करेगी, जहाँ किसीकी दृष्टि ५५ । अथवा मनतक नहीं जा सकेगा ॥ ५३-५५ ॥

पृष्ठ 547

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५३५ ब्रह्मोवाच इति वचनमुदारं नारद त्वं गिरीशं त्रिदिवमगम उक्त्वा तत्क्षणादेव प्रीत्या । गिरिपतिरपि चित्ते चारुसंमोदयुक्तः स्वगृहमगमदेवं सर्वसम्पत्समृद्धम् ॥ ५६ । ब्रह्माजी बोले- हे नारद! इस प्रकार आप गिरिराजसे उदार वचन कहकर वहाँसे स्वर्ग चले गये और वे गिरिराज भी चित्तमें प्रसन्न होकर सम्पूर्ण समृद्धियोंसे युक्त अपने घर चले गये ॥ ५६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे नारदहिमालयसंवादवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें नारदहिमालयसंवादवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः पार्वतीके विवाहके सम्बन्धमें मेना और हिमालयका वार्तालाप, पार्वती और हिमालयद्वारा देखे गये नारद उवाच

विधे तात त्वया शैववर प्राज्ञाद्भुता कथा ।

वर्णिता करुणां कृत्वा प्रीतिर्मे वर्धिताधिका ॥ १

विधे गते स्वकं धाम मयि वै दिव्यदर्शने ।

ततः किमभवत्तात कृपया तद्वदाधुना ॥ २

ब्रह्मोवाच गते त्वयि मुने स्वर्गे कियत्काले गते सति मेना प्राप्यैकदा शैलनिकटं प्रणनाम सा ॥ ३

स्थित्वा सविनयं प्राह स्वनाथं गिरिकामिनी ।

तत्र शैलाधिनाथं सा प्राणप्रियसुता सती ॥ ४

मेनोवाच

मुनिवाक्यं न बुद्धं मे सम्यङ् नारीस्वभावतः ।

विवाहं कुरु कन्यायाः सुन्दरेण वरेण ह ॥

सर्वथा हि भवेत्तत्रोद्वाहोऽपूर्वसुखावहः ।

वरश्च गिरिजायास्तु सुलक्षणकुलोद्भवः ॥ ६

प्राणप्रिया सुता मे हि सुखिता स्याद्यथा प्रिया ।

सद्वरं प्राप्य सुप्रीता तथा कुरु नमोऽस्तु ते ॥ ७

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वाश्रुमुखी मेना पत्यङ्घ्रयोः पतिता तदा ।

तामुत्थाप्य गिरिः प्राह यथावत्प्राज्ञसत्तमः ॥ ८

अपने स्वप्नका वर्णन नारदजी बोले – हे विधे! हे तात! हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! हे प्राज्ञ! आपने करुणा करके [ भगवान् शिवकी ] यह अद्भुत कथा कही, उससे [ मेरे मनमें ] बहुत प्रीति बढ़ी है । हे विधे! जब दिव्य दृष्टिवाला मैं अपने स्थानको चला गया, तब हे तात! क्या हुआ? अब कृपाकर उसे मुझे बतलाइये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले - – हे मुने! आपके स्वर्ग चले जानेपर कुछ समय बीतनेपर मेनाने हिमालयके पास आकर उन्हें प्रणाम किया । तत्पश्चात् पुत्रीको प्राणोंसे भी अधिक चाहनेवाली साध्वी गिरिप्रिया मेना वहाँ बैठकर अपने पति गिरिराजसे विनयपूर्वक कहने लगीं ॥ ३-४ ॥ मेना बोलीं- स्त्री स्वभावके - कारण मुनिकी बातको मैंने अच्छी तरह नहीं समझा, [ मेरी तो यह प्रार्थना है कि ] आप कन्याका विवाह किसी सुन्दर वरके साथ कर दीजिये । यह विवाह सर्वथा अपूर्व सुख देनेवाला होना चाहिये । गिरिजाका वर शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और कुलीन होना चाहिये । मेरी पुत्री मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है । वह प्रिया उत्तम वर पाकर जिस प्रकार भी प्रसन्न और सुखी हो सके, वैसा कीजिये, आपको मेरा नमस्कार है ॥ ५–७ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर अश्रुयुक्त मुखवाली मेना पतिके चरणोंमें गिर पड़ीं, तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हिमवान् उन्हें उठाकर यथोचित बात कहने लगे -॥८ ॥

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५३६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ हिमालय उवाच

शृणु त्वं मेनके देवि यथार्थं वच्मि तत्त्वतः ।

भ्रमं त्यज मुनेर्वाक्यं वितथं न कदाचन ॥

यदि स्नेहः सुतायास्ते सुतां शिक्षय सादरम् ।

तपः कुर्याच्छंकरस्य सा भक्त्या स्थिरचेतसा ॥

चेत्प्रसन्नः शिवः काल्याः पाणिं गृह्णाति मेनके ।

सर्वं भूयाच्छुभं नश्येन्नारदोक्तममङ्गलम् ॥

अमङ्गलानि सर्वाणि मङ्गलानि सदा शिवे ।

तस्मात्सुतां शिवप्राप्त्यै तपसे शिक्षय द्रुतम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य गिरेर्वाक्यं मेना प्रीततराभवत् ।

सुतोपकंठमगमदुपदेष्टुं तपोरुचिम् ॥

सुताङ्गं सुकुमारं हि दृष्ट्वातीवाथ मेनका ।

विव्यथे नेत्रयुग्मे चाश्रुपूर्णेऽभवतां द्रुतम् ॥

सुतां समुपदेष्टुं तन्न शशाक गिरिप्रिया ।

बुबुधे पार्वती तद्वै जननीङ्गितमाशु सा ॥

अथ सा कालिका देवी सर्वज्ञा परमेश्वरी ।

उवाच जननीं सद्यः समाश्वास्य पुनः पुनः ॥

पार्वत्युवाच

मातः शृणु महाप्राज्ञेऽद्यतनेऽजमुहूर्तके ।

रात्रौ दृष्टो मया स्वप्नस्तं वदामि कृपां कुरु ॥

विप्रश्चैव तपस्वी मां सदयः प्रीतिपूर्वकम् ।

उपादिदेश सुतपः कर्तुं मातः शिवस्य वै ॥

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा मेनका शीघ्रं पतिमाहूय तत्र च ।

तत्स्वप्नं कथयामास सुतादृष्टमशेषतः ॥

सुतास्वप्नमथाकर्ण्य मेनकातो गिरीश्वरः ।

उवाच परमप्रीतः प्रियां सम्बोधयनिगरा ॥

गिरीश्वर उवाच

हे प्रियेऽपररात्रान्ते स्वप्नो दृष्टो मयापि हि ।

तं शृणु त्वं महाप्रीत्या वच्म्यहं ते समादरात् ॥

एकस्तपस्वी परमो नारदोक्तवराङ्गधृक् ।

पुरोपकंठं सुप्रीत्या तपः कर्तुं समागतः ॥

हिमालय बोले - हे देवि! हे मेनके! मैं यथार्थ और तत्त्वकी बात बताता हूँ, सुनिये । आप भ्रम छोड़िये । ९ । मुनिकी बात कभी झूठ नहीं हो सकती 1 । यदि आपको | पुत्रीके प्रति स्नेह है, तो उसे सादर शिक्षा दीजिये कि वह भक्तिपूर्वक सुस्थिर चित्तसे शंकरके लिये तप करे । १० हे मेनके! यदि शिव प्रसन्न होकर कालीका पाणिग्रहण कर लेते हैं, तो सब शुभ ही होगा और नारदजीका ११ बताया हुआ अमंगल नष्ट हो जायगा । शिवके समीप सारे अमंगल सदा मंगलरूप हो जाते हैं, इसलिये आपको १२ शिवकी प्राप्तिके लिये पुत्रीको तपस्या करनेकी शीघ्र शिक्षा देनी चाहिये॥९ –१२ ॥ ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] हिमवान्की यह बात सुनकर मेना परम प्रसन्न हुईं । वे तपस्यामें रुचिका १३ उपदेश देनेके लिये पुत्रीके पास गयीं । पुत्रीके सुकुमार शरीरपर दृष्टिपात करके मेनाको बड़ी व्यथा हुई और १४ उनके दोनों नेत्रोंमें शीघ्र ही आँसू भर आये ॥ १३-१४ ॥ तब गिरिप्रिया मेना पुत्रीको उपदेश न दे सर्की, १५ किंतु माताकी उस चेष्टाको वे पार्वती शीघ्र ही समझ गयीं । तदनन्तर वे सर्वज्ञ परमेश्वरी कालिका देवी माताको १६ बार - बार आश्वासन देकर शीघ्र कहने लगीं ॥ १५-१६ ॥ पार्वती बोलीं- हे मातः! हे महाप्राज्ञे! सुनिये, आजकी रात्रिके ब्राह्ममुहूर्तमें मैंने एक स्वप्न १७ देखा है, उसे बताती हूँ, आप कृपा करें । हे मातः! एक दयालु एवं तपस्वी ब्राह्मणने मुझे शिवके निमित्त उत्तम तपस्या करनेका प्रसन्नतापूर्वक उपदेश दिया १८ है ॥ १७-१८ ॥ ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] यह सुनकर मेनकाने । | वहाँ शीघ्र अपने पतिको बुलाकर पुत्रीके देखे हुए उस १ ९ स्वजको पूर्णरूपसे बताया । तब मेनकासे पुत्री के स्वप्नको सुनकर गिरिराज बड़े प्रसन्न हुए और वाणीसे पत्नीको २० समझाते हुए कहने लगे— ॥ १ ९ -२० ॥ गिरिराज बोले- हे प्रिये! मैंने भी रातके । अन्तिम प्रहरमें एक स्वप्न देखा है, मैं आदरपूर्वक उसे २१ बताता हूँ, आप प्रेमपूर्वक सुनें । नारदजीके द्वारा बताये | गये वरके अंगों [ लक्षणों ] को धारण करनेवाले एक । परम तपस्वी प्रसन्नताके साथ तपस्या करनेके लिये । २२ । मेरे नगरके निकट आये । तब मैं भी अति प्रसन्न होकर

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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता (

गृहीत्वा स्वसुतां तत्रागमं प्रीततरोऽप्यहम् ।

मया ज्ञातः स वै शम्भुर्नारदोक्तवरः प्रभुः ॥ २३

सेवार्थं तस्य तनयामुपदिश्य तपस्विनः ।

तं वै प्रार्थितवांस्तस्यां न तदाङ्गीचकार सः ॥ २४

अभूद्विवादः सुमहान्सांख्यवेदान्तसंमतः ।

ततस्तदाज्ञया तत्र संस्थितासीत्सुता मम ॥ २५

निधाय हृदि तं कामं सिषेवे भक्तितश्च सा ।

इति दृष्टं मया स्वप्नं प्रोक्तवांस्ते वरानने ॥ २६

ततो मेने कियत्कालं परीक्ष्यं तत्फलं प्रिये ।

योग्यमस्तीदमेवेह बुध्यस्व त्वं मम ध्रुवम् ॥२७

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा गिरिराजश्च मेनका वै मुनीश्वर ।

सन्तस्थतुः परीक्षन्तौ तत्फलं शुद्धचेतसौ ॥ २८

इत्थं व्यतीतेऽल्पदिने परमेशः सतां गतिः ।

सतीविरहसुव्यग्रो भ्रमन्सर्वत्र सूतिकृत् ॥ २ ९

तत्राजगाम सुप्रीत्या कियद् गणयुतः प्रभुः ।

तपः कर्तुं सतीप्रेमविरहाकुलमानसः ॥ ३०

तपश्चकार स्वं तत्र पार्वती सेवने रता ।

सखीभ्यां सहिता नित्यं प्रसन्नार्थमभूत्तदा ॥ ३१

विद्धोऽपि मार्गणैः शम्भुर्विकृतिं नाप स प्रभुः ।

प्रेषितेन सुरैः स्वात्ममोहनार्थं स्मरेण वै ॥ ३२

दग्ध्वा स्मरं च तत्रैव स्ववह्निनयनेन सः ।

स्मृत्वा मम वचः क्रुद्धो मह्यमन्तर्दधे ततः ॥ ३३

ततः कालेन कियता विनाश्य गिरिजामदम् ।

प्रसादितः सुतपसा प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः ॥ ३४

लौकिकाचारमाश्रित्य रुद्रो विष्णुप्रसादितः ।

कालीं विवाहयामास ततोऽभूद् बहुमङ्गलम् ॥ ३५

पार्वतीखण्ड ) ५३७ अपनी पुत्रीको साथ लेकर वहाँ गया । [ उस समय ] मुझे ज्ञात हुआ कि नारदजीके द्वारा बताये हुए वर भगवान् शम्भु ये ही हैं । मैंने उन तपस्वीकी सेवा लिये अपनी पुत्रीको उपदेश देकर उनसे भी प्रार्थना की कि वे इसकी सेवा स्वीकार करें, परंतु उस समय उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया । इतनेमें वहाँ सांख्य और वेदान्तके अनुसार बहुत बड़ा विवाद छिड़ गया । तदनन्तर उनकी आज्ञासे मेरी पुत्री वहीं रह गयी और अपने हृदयमें उन्हींकी कामना रखकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा करने लगी । हे सुमुखि! मैंने यही स्वप्न देखा था, जिसे तुम्हें बता दिया । अतः हे मेने! हे प्रिये! कुछ समयतक इस स्वप्नके फलकी परीक्षा करनी चाहिये, इस समय यही उचित जान पड़ता है, अब आप इसीको मेरा निश्चित मत समझिये ॥ २१–२७ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! यह कहकर वे गिरिराज तथा मेना शुद्धचित्त हो [ कुछ कालपर्यन्त ] स्वप्नफलकी प्रतीक्षा करने लगे ॥२८ ॥

इसके अनन्तर अभी कुछ ही काल बीता था कि सृष्टिकर्ता तथा सज्जनोंको गति देनेवाले परमेश्वर शिवजी सतीके विरहसे अत्यन्त व्याकुल होकर सर्वत्र घूमते हुए गणोंके साथ तप करनेके लिये प्रेमपूर्वक वहाँ आये । सतीके प्रेमविरहमें व्याकुल चित्तवाले वे वहीं अपना तप करने लगे । उस समय पार्वती अपनी दो सखियोंके साथ उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ २ ९ –३१ ॥ [ उस समय ] उन आत्मस्वरूप शिवको मोहित करनेके लिये देवताओंके द्वारा भेजे कामदेवके बाणोंसे विद्ध होकर भी भगवान् शम्भु विचलित नहीं हुए ॥ ३२ ॥

अपनी नेत्राग्निसे कामदेवको जलाकर मेरे वचनका स्मरणकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये ॥३३ ॥

तत्पश्चात् कुछ समय बीतनेके बाद गिरिजाके अभिमानका नाश करके पुनः उनकी कठोर तपस्यासे प्रसन्न किये गये महेश्वर प्रसन्न हुए ॥३४ ॥

उसके बाद विष्णुके द्वारा प्रसन्न किये गये रुद्रने लोकाचारका आश्रय लेकर पार्वतीके साथ विवाह किया । उस अवसरपर बहुत मंगल हुआ ॥ ३५ ॥

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५३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० इत्येतत्कथितं तात समासाच्चरितं विभोः । पुनः ब्रह्माजी बोले- हे तात! इस प्रकार मैंने | संक्षेपमें विभु शंकरका अत्यन्त दिव्य चरित्र [ आपसे शंकरस्य परं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३६ | कहा, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? || ३६ ] || इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे स्वप्नवर्णनपूर्वकं संक्षेपशिवचरितवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें स्वप्नवर्णनपूर्वक संक्षेपमें शिवचरित - वर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

अथ शिवजीके नारद उवाच

विष्णुशिष्य महाभाग विधे शैववर प्रभो ।

शिवलीलामिमां व्यासात्प्रीत्या मे वक्तुमर्हसि ॥

सतीविरहयुक् शम्भुः किं चक्रे चरितं तथा ।

तपः कर्तुं कदायातो हिमवत्प्रस्थमुत्तमम् ॥

शिवाशिवविवादोऽभूत्कथं कामक्षयश्च वै ।

तपः कृत्वा कथं प्राप शिवं शम्भुं च पार्वती ॥

तत्सर्वमपरं चापि शिवसच्चरितं परम् ।

वक्तुमर्हसि मे ब्रह्मन्महानन्दकरं शुभम् ॥

सूत उवाच

इति श्रुत्वा नारदस्य प्रश्नं लोकाधिपोत्तमः ।

विधिः प्रोवाच सुप्रीत्या स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥

ब्रह्मोवाच देवर्षे शैववर्याद्य तद्यशः शृणु चादरात् । दशमोऽध्यायः ललाटसे भौमोत्पत्ति नारदजी बोले - हे विष्णुशिष्य! हे महाभाग! हे विधे! हे शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ! हे प्रभो! आप १ शिवजीकी इस लीलाको प्रीतिपूर्वक विस्तारसे मुझसे कहिये ॥१ ॥

सतीके विरहसे युक्त होकर शिवजीने कौन - सा २ चरित्र किया और वे उत्तम हिमालय पर्वतपर तप करनेके लिये कब आये? ॥२ ॥

शिवा और शिवजीका विवाद और कामदेवका ३ विनाश किस प्रकार हुआ? पार्वतीने तपस्या करके किस प्रकार कल्याणकारी शम्भुको प्राप्त किया? ॥ ३ ॥

हे ब्रह्मन्! इन सब बातोंको तथा महान् आनन्द ४ देनेवाले अन्य सुन्दर शिवचरित्रोंको मुझसे कहिये ॥४ ॥

सूतजी बोले — नारदजीके इस प्रश्नको सुनकर लोकाधिपतियोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी शिवजीके ५ चरणकमलका ध्यान करके अति प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे - ॥५ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे देवर्षे! हे शैववर्य! मंगल करनेवाले, उत्तम भक्तिको बढ़ानेवाले पावन शिव-पावनं मङ्गलकरं भक्तिवर्धनमुत्तमम् ॥ ६ चरित्रको आदरपूर्वक

आगत्य स्वगिरिं शम्भुः प्रियाविरहकातरः ।

सस्मार स्वप्रियां देवीं सतीं प्राणाधिकां हृदा ॥

गणानाभाष्य शोचंस्तां तद्गुणान्प्रेमवर्धनान् ।

वर्णयामास सुप्रीत्या दर्शयँल्लौकिकीं गतिम् ॥

सुनिये ॥ ६ ॥

अपने पर्वतपर आकर प्रियाके विरहसे दुखी ७ शम्भुने प्राणोंसे भी बढ़कर अपनी प्रिया सती देवीका हृदयसे स्मरण किया ॥७ ॥

वे [ अपने ] गणोंको बुलाकर उन सतीके लिये । | शोक प्रकट करते हुए, लौकिक गति दिखाते हुए उनके प्रेमवर्धक गुणोंका अत्यन्त प्रेमपूर्वक वर्णन ८ करने लगे ॥८ ॥