शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 551–560

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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अ ० १० ] रुद्रसंहिता (

दिगम्बरो बभूवाथ त्यक्त्वा गार्हस्थ्यसद्गतिम् ।

पुनर्बभ्राम लोकान्वै सर्वान् लीलाविशारदः ॥ ९

न प्राप दर्शनं क्वापि सतीविरहदुःखितः ।

पुनश्च गिरिमायातः शंकरो भक्तशंकरः ॥ १०

समाधाय मनो यत्नात् समाधिं दुःखनाशनम् ।

चकार च ददर्शासौ स्वरूपं निजमव्ययम् ॥ ११

इत्थं चिरतरं स्थाणुस्तस्थौ ध्वस्तगुणत्रयः ।

निर्विकारी परं ब्रह्म मायाधीशः स्वयं प्रभुः ॥ १२

ततः समाधिं तत्याज व्यतीयुर्ह्यमिताः समाः ।

यदा तदा बभूवाशु चरितं तद्वदामि वः ॥ १३

प्रभोर्ललाटदेशात्तु यत्पृषच्छ्रमसंभवम् ।

पपात धरणौ तत्र स बभूव शिशुर्द्रुतम् ॥ १४

चतुर्भुजोऽरुणाकारो रमणीयाकृतिर्मुने ।

अलौकिकद्युतिः श्रीमाँस्तेजस्वी परदुस्सहः ॥ १५

रुरोद स शिशुस्तस्य पुरो हि परमेशितुः ।

प्राकृतात्मजवत्तत्र भवाचाररतस्य हि ॥ १६

तदा विचार्य सुधिया धृत्वा सुस्त्रीतनुं क्षितिः ।

आविर्बभूव तत्रैव भयमानीय शंकरात् ॥ १७

तं बालं द्रुतमुत्थाप्य क्रोडायां निदधे वरम् ।

स्तन्यं सापाययत्प्रीत्या दुग्धं चोपरिसम्भवम् ॥ १८

चुचुम्ब तन्मुखं स्नेहात्स्मित्वा क्रीडयदात्मजम् ।

सत्यभावात्स्वयं माता परमेशहितावहा ॥ १ ९

तद् दृष्ट्वा चरितं शम्भुः कौतुकी सूतिकृत्कृती ।

अन्तर्यामी विहस्याथोवाच ज्ञात्वा रसां हरः ॥ २०

पार्वतीखण्ड ) ५३ ९ लीलाविशारद वे शिवजी गृहस्थोचित उत्तम आचरणको छोड़कर दिगम्बर हो गये और पुनः सभी लोकोंमें भ्रमण करने लगे ॥९ ॥

सतीके विरहसे दुखी हुए भगवान् शंकरको कहीं भी सतीका दर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तब भक्तोंका कल्याण करनेवाले शिवजी पुनः [ कैलास ] पर्वतपर आ गये ॥१० ॥

उसके बाद उन्होंने यत्नपूर्वक मनको एकाग्रकर दुःख दूर करनेवाली समाधि लगायी और अपने अविनाशी स्वरूपका दर्शन किया ॥ ११ ॥

इस प्रकार मायाधीश, त्रिगुणातीत, विकाररहित परब्रह्म स्वयंप्रभु सदाशिव स्थायी होकर समाधिमें बहुत दिनोंतक लीन रहे ॥१२ ॥

जब [ समाधि लगाये हुए उनको ] बहुत वर्ष बीत गये, तब उन्होंने अपनी समाधिका त्याग किया । उस समय जो चरित्र हुआ, उसे मैं आपसे शीघ्र कह रहा हूँ ॥१३ ॥

प्रभुके ललाटस्थलसे जो पसीनेकी बूँदें पृथ्वीपर गिरीं, उनसे शीघ्र ही एक बालक उत्पन्न हुआ ॥१४ ॥

हे मुने! वह चार भुजाओंसे युक्त, अरुण-वर्णवाला, अत्यन्त मनोहर रूपवाला, अलौकिक तेजसे सम्पन्न, श्रीमान्, तेजस्वी तथा शत्रुओंके लिये दुःसह था ॥ १५ ॥

वह बालक उन लोकाचाररत परमेश्वर शिवके सामने समीप जाकर साधारण पुत्रकी भाँति रोने लगा ॥ १६ ॥

उसी समय भगवान् शंकरसे भयभीत हुई पृथ्वी बुद्धिसे विचारकर अत्यन्त सुन्दर स्त्रीका शरीर धारण करके प्रकट हो गयी । उसने शीघ्रतासे उस सुन्दर बालकको अपनी गोदमें उठाकर रख लिया और प्रेमसे उसे अपना दूध पिलाने लगी ॥ १७-१८ ॥ इस प्रकार वह परमेश्वरके हित - साधनके लिये सत्यभावसे बालककी माता बनी और प्रेमपूर्वक हँसते हुए बालकका मुख चूमने लगी ॥१ ९ ॥ तब कौतुकी, सृष्टिकर्ता तथा अन्तर्यामी शम्भु इस चरित्रको देखकर उसे पृथ्वी जानकर हँस करके | उससे बोले -॥२० ॥

पृष्ठ 552

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५४० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११

धन्या त्वं धरणि प्रीत्या पालयैतं सुतं मम ।

त्वय्युद्भूतं श्रमजलान्महातेजस्विनो वरम् ॥ 11 २१

मम श्रमक भूर्बालो यद्यपि प्रियकृत्क्षिते ।

त्वन्नाम्ना स्याद्भवेत्ख्यातस्त्रितापरहितः सदा ॥ २२

असौ बालः कुदाता हि भविष्यति गुणी तव ।

ममापि सुखदाता हि गृहाणैनं यथारुचि ॥ २३

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा विररामाथ किंचिद्विरहमुक्तधीः ।

लोकाचारकरो रुद्रो निर्विकारी सतां प्रियः ॥ २४

अपि क्षितिर्जगामाशु शिवाज्ञामधिगम्य सा ।

स्वस्थानं ससुता प्राप सुखमात्यंतिकं च वै ॥ २५

स बालो भौम इत्याख्यां प्राप्य भूत्वा युवा द्रुतम् ।

तस्यां काश्यां चिरं कालं सिषेवे शंकरं प्रभुम् ॥ २६

विश्वेश्वरप्रसादेन ग्रहत्वं प्राप्य भूमिजः ।

दिव्यं लोकं जगामाशु शुक्रलोकात्परं वरम् ॥ २७

इत्युक्तं शम्भुचरितं सतीविरहसंयुतम् ।

तपस्याचरणं शम्भोः शृणु चादरतो मुने ॥ २८

हे धरणि! तुम धन्य हो, तुम मेरे पुत्रका प्रेमसे पालन करो । यह श्रेष्ठ [ बालक ] मेरे महातेजस्व पसीनेसे तुममें उत्पन्न हुआ है ॥२१ ॥

हे क्षिते! यद्यपि मेरे श्रमजल ( पसीने ) -से उत्पन्न हुआ यह बालक मुझे बड़ा प्रिय है, फिर भी यह तुम्हारे नामसे विख्यात होगा और सदा तीनों तापोंसे रहित होगा । यह बालक भूमिदान करनेवाला, गुणोंसे सम्पन्न और तुम्हें तथा मुझको भी सुख प्रदान करनेवाला होगा, अतः तुम इसे रुचिके अनुसार ग्रहण करो ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले- विरहवेदनासे थोड़ा - सा मुक्त हुए भगवान् शिव इस प्रकार कहकर चुप हो गये । [ वस्तुतः ] निर्विकारी तथा सज्जनोंके प्रिय वे प्रभु शिवजी लोकाचारका अनुसरण करते हैं ॥ २४ ॥

तब शिवजीसे आज्ञा लेकर पृथ्वी शीघ्र पुत्रसहित अपने स्थानपर चली गयी और उसे अत्यन्त सुख प्राप्त हुआ ॥ २५ ॥

वह बालक भौम नाम प्राप्त करके शीघ्र ही युवा हो उस काशीमें बहुत कालतक शिवजीकी सेवा करता रहा । इस प्रकार वह भूमिपुत्र विश्वेश्वरकी कृपासे ग्रहपद प्राप्तकर शुक्रलोकसे भी आगे दिव्य लोकमें चला गया ॥ २६-२७ ॥ हे मुने! मैंने सतीके विरहयुक्त शिव - चरित्रको कहा, अब आप शिवजीकी तपस्याके आचरणको । आदरके साथ सुनिये ॥ २८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे भौमोत्पत्तिशिवलीलावर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें भौमकी उत्पत्ति तथा शिवलीलाका वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः भगवान् शिवका तपस्याके लिये हिमालयपर ब्रह्मोवाच

वर्धमाना गिरेः पुत्री सा शक्तिर्लोकपूजिता ।

अष्टवर्षा यदा जाता हिमालयगृहे सती ॥१ ॥

तज्जन्म गिरिशो ज्ञात्वा सतीविरहकातरः ।

कृत्वा तामद्भुतामन्तर्मुमोदातीव नारद ॥ २ ॥

आगमन, वहाँ पर्वतराज हिमालयसे वार्तालाप ब्रह्माजी बोले- हिमालयकी वह लोकपूजित । पुत्री पार्वती उनके घरमें बढ़ती हुई जब आठ वर्षकी हो गयी, तब हे नारद! उसका जन्म [ हिमालयके | घरमें ] जानकर सतीके विरहसे दुखी हुए शंकरजी | सतीकी इस अद्भुत लीलासे मन - ही - मन अत्यन्त प्रसन्न हो उठे॥१-२ ॥

पृष्ठ 553

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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता (

तस्मिन्नेवान्तरे शम्भुलौकिकीं गतिमाश्रितः ।

समाधातुं मनः सम्यक् तपः कर्तुं समैच्छत ॥

कांश्चिद्गुणवरान् शान्तान् नंद्यादीनवगृह्य च ।

गङ्गावतारमगमद्धिमवत्प्रस्थमुत्तमम् ॥ ४

यत्र गङ्गा निपतिता पुरा ब्रह्मपुरात्स्त्रुता ।

सर्वाघौघविनाशाय पावनी परमा मुने ॥ ५

तपःप्रारम्भमकरोत्स्थित्वा तत्र वशी हरः ।

एकाग्रं चिंतयामास स्वमात्मानमतन्द्रितः ॥

चेतो ज्ञानभवं नित्यं ज्योतीरूपं निरामयम् ।

जगन्मयं चिदानन्दं द्वैतहीनं निराश्रयम् ॥ ७

हरे ध्यानपरे तस्मिन्प्रमथा ध्यानतत्पराः ।

अभवन्केचिदपरे नन्दिभृंग्यादयो गणाः ॥ ८

सेवां चक्रुस्तदा केचिद्गणाः शम्भोः परात्मनः ।

नैवाकूजंस्तु मौना हि द्वारपाः केचनाभवन् ॥ ९

एतस्मिन्नन्तरे तत्र जगाम हिमभूधरः ।

शङ्करस्यौषधिप्रस्थे श्रुत्वागमनमादरात् ॥ १०

प्रणनाम प्रभुं रुद्रं सगणो भूधरेश्वरः ।

समानर्च च सुप्रीतस्तुष्टाव स कृताञ्जलिः ॥ ११

हिमालय उवाच

देवदेव महादेव कपर्दिन् शंकर प्रभो ।

त्वयैव लोकनाथेन पालितं भुवनत्रयम् ॥ १२

नमस्ते देवदेवेश योगिरूपधराय च ।

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सगुणाय विहारिणे ॥ १३

कैलासवासिने शम्भो सर्वलोकाटनाय च ।

नमस्ते परमेशाय लीलाकाराय शूलिने ॥ १४

परिपूर्णगुणाधानविकाररहिताय ते नमोऽनहाय वीहाय धीराय परमात्मने ॥ १५ पार्वतीखण्ड ) ५४१ उसी समय लौकिक गतिका आश्रय लेकर शम्भुने अपने मनको एकाग्र करनेके लिये तप करनेका विचार किया ॥३ ॥

नन्दी आदि कुछ शान्त, श्रेष्ठ पार्षदोंको साथ लेकर वे हिमालयके गंगावतार नामक उत्तम शिंखरपर गये, हे मुने! जहाँ पूर्वकालमें ब्रह्मधामसे प्रवाहित होकर समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये परम पावनी गंगा गिरी थीं ॥ ४-५ ॥ जितेन्द्रिय हरने वहीं रहकर तपस्या आरम्भ की, वे आलस्यका त्यागकर चेतन, ज्ञानस्वरूप, नित्य, ज्योतिर्मय, निरामय, जगन्मय, चिदानन्दस्वरूप, द्वैतहीन तथा आश्रयरहित अपने आत्मभूत परमात्माका एकाग्रभावसे चिन्तन करने लगे ॥६-७ ॥ भगवान् हरके ध्यानपरायण होनेपर नन्दी, भृंगी आदि कुछ अन्य पार्षदगण भी ध्यानमें तत्पर हो गये ॥ ८ ॥

उस समय कुछ गण परमात्मा शम्भुकी सेवा करते थे और कुछ द्वारपाल हो गये । वे सब - के - सब मौन रहते थे और कुछ नहीं बोलते थे ॥ ९ ॥

इसी समय गिरिराज हिमालय उस औषधि-शिखरपर भगवान् शंकरका आगमन सुनकर आदरपूर्वक वहाँ गये ॥१० ॥

अपने गणोंसहित गिरिराजने प्रभु रुद्रको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर [ वे शिवजीकी ] स्तुति करने लगे ॥ ११ ॥

हिमालय बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे कपर्दिन्! हे प्रभो! हे शंकर! आप लोकनाथने ही तीनों लोकोंका पालन किया है ॥ १२ ॥

योगीरूप धारण करनेवाले हे देवदेवेश! आपको नमस्कार है, निर्गुण, सगुण तथा विहार करनेवाले आपको नमस्कार है । हे शम्भो! आप कैलासवासी, सभी लोकोंमें विचरण करनेवाले, लीला करनेवाले, त्रिशूलधारी परमेश्वरको नमस्कार है । [ सभी प्रकारसे ] परिपूर्ण गुणोंके आकर, विकाररहित, सर्वथा इच्छारहित होते हुए भी इच्छावाले तथा धैर्यवान् आप परमात्माको | नमस्कार है ॥ १३–१५ ॥

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५४२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११

अबहिर्भोगकाराय जनवत्सल ते नमः ।

त्रिगुणाधीश मायेश ब्रह्मणे परमात्मने ॥

विष्णुब्रह्मादिसेव्याय विष्णुब्रह्मस्वरूपिणे ।

विष्णुब्रह्मैकदात्रे ते भक्तप्रिय नमोऽस्तु ते ॥

तपोरत तपः स्थान सुतपःफलदायिने ।

तपःप्रियाय शान्ताय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे ॥

व्यवहारकरायैव लोकाचारकराय ते ।

सगुणाय परेशाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥

लीला तव महेशानावेद्या साधुसुखप्रदा ।

भक्ताधीनस्वरूपोऽसि भक्तवश्यो हि कर्मकृत् ॥

मम भाग्योदयादत्र त्वमागत इह प्रभो ।

सनाथं कृतवान्मां त्वं वर्णितो दीनवत्सलः ॥

अद्य मे सफलं जन्म सफलं जीवनं मम ।

अद्य मे सफलं सर्वं यदत्र त्वं समागतः ॥

ज्ञात्वा मां दासमव्यग्रमाज्ञां देहि महेश्वर ।

त्वत्सेवां च महाप्रीत्या कुर्यामहमनन्यधीः ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य गिरीशस्य महेश्वरः ।

किंचिदुन्मील्य नेत्रे च ददर्श सगणं गिरिम् ॥

सगणं तं तथा दृष्ट्वा गिरिराजं वृषध्वजः ।

उवाच ध्यानयोगस्थः स्मयन्निव जगत्पतिः ॥

महेश्वर उवाच

तव पृष्ठे तपस्तप्तुं रहस्यमहमागतः ।

यथा न कोऽपि निकटं समायातु तथा कुरु ॥

त्वं महात्मा तपोधामा मुनीनां च सदाश्रयः ।

देवानां राक्षसानां च परेषां च महात्मनाम् ॥

हे जनवत्सल! हे त्रिगुणाधीश! हे मायापते १६ बाहरी भोगोंको ग्रहण न करनेवाले आप! परब्रह्म । परमात्माको नमस्कार है । हे भक्तप्रिय! आप | विष्णु आदिके द्वारा सेव्य, ब्रह्मा - विष्णुस्वरूप ब्रह्मा, तथा १७ विष्णु - ब्रह्माको सुख प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ हे तपोरत! हे तप: स्थान! आप उत्तम तपस्याका १८ फल प्रदान करनेवाले, तपस्यासे प्रेम करनेवाले, शान्त तथा ब्रह्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ॥ १८ ॥

व्यवहार तथा लोकाचार करनेवाले आप सगुण, १ ९ परेश परमात्माको नमस्कार है ॥१ ९ ॥ हे महेश्वर! आपकी लीलाको कोई जान नहीं २० सकता और यह साधुओंको सुख देनेवाली है । आप भक्तोंके अधीन स्वरूपवाले तथा भक्तोंके वशमें होकर कर्म करनेवाले हैं ॥ २० ॥

हे प्रभो! मेरे भाग्यके उदय होनेसे ही आप २१ यहाँ आये हैं । आपने मुझे सनाथ कर दिया, इसीलिये आप दीनवत्सल कहे गये हैं । आज मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया, २२ आज मेरा सब कुछ सफल हो गया, जो आप यहाँ पधारे हैं॥२१-२२ ॥ हे महेश्वर! मुझे अपना दास समझकर नि: संकोच २३ आज्ञा दीजिये, मैं अनन्य बुद्धि होकर बड़े प्रेमसे आपकी सेवा करूँगा ॥ २३ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] गिरिराजका | यह वचन सुनकर महेश्वरने थोड़ी - सी आँखें २४ खोलकर सेवकोंसहित हिमालयको देखा । सेवकोंसहित | गिरिराजको [ उपस्थित ] देखकर ध्यानयोग स्थ २५ हुए जगदीश्वर वृषभध्वज मुसकराते हुए कहने लगे- ॥ २४-२५ ॥ महेश्वर बोले - [ हे शैलराज! ] मैं आपके । | शिखरपर एकान्तमें तपस्या करनेके लिये आया हूं, २६ आप ऐसा प्रबन्ध कीजिये, जिससे कोई भी मेरे निकट न आ सके ॥२६ ॥

मुनियों, आप महात्मा, तपस्याके धाम तथा | देवताओं, राक्षसों और अन्य महात्माओंको सा २७ आश्रय देनेवाले हैं ॥२७ ॥।

पृष्ठ 555

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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५४३

सदावासो द्विजादीनां गङ्गापूतश्च नित्यदा ।

परोपकारी सर्वेषां गिरीणामधिपः प्रभुः ॥

अहं तपश्चराम्यत्र गङ्गावतरणे स्थले ।

आश्रितस्तव सुप्रीतो गिरिराज यतात्मवान् ॥

निर्विघ्नं मे तपश्चात्र हेतुना येन शैलप ।

सर्वथा हि गिरिश्रेष्ठ सुयत्नं कुरु साम्प्रतम् ॥

ममेदमेव परमं सेवनं पर्वतोत्तम ।

स्वगृहं गच्छ सत्प्रीत्या तत्संपादय यत्नतः ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा जगतां नाथस्तूष्णीमास स सूतिकृत् ।

गिरिराजस्तदा शम्भुं प्रणयादिदमब्रवीत् ॥

हिमालय उवाच

पूजितोऽसि जगन्नाथ मया त्वं परमेश्वर ।

स्वागतेनाद्य विषये स्थितं त्वां प्रार्थयामि किम् ॥

महता तपसा त्वं हि देवैर्यत्नपराश्रितैः ।

न प्राप्यसे महेशान स त्वं स्वयमुपस्थितः ॥

मत्तोऽप्यन्यतमो नास्ति न मत्तोऽन्योऽस्ति पुण्यवान् ।

भवानिति च मत्पृष्ठे तपसे समुपस्थितः ॥

देवेन्द्रादधिकं मन्ये स्वात्मानं परमेश्वर ।

सगणेन त्वयागत्य कृतोऽनुग्रहभागहम् ॥

निर्विघ्नं कुरु देवेश स्वतन्त्रः परमं तपः ।

करिष्येऽहं तथा सेवां दासोऽहं ते सदा प्रभो ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा गिरिराजोऽसौ स्वं वेश्म द्रुतमागतः । 1

वृत्तान्तं तं समाचख्यौ प्रियायै च समादरात् ॥

नीयमानान् परीवारान् स्वगणानपि नारद ।

समाहूयाखिलान् शैलपतिः प्रोवाच तत्त्वतः ॥

आप द्विज आदिके सदा निवासस्थान, २८ गंगासे सर्वदा पवित्र, दूसरोंका उपकार करनेवाले तथा सम्पूर्ण पर्वतोंके सामर्थ्यशाली राजा हैं । हे गिरिराज! मैं चित्तको नियममें रखकर यहाँ गंगावतरणस्थलमें २ ९ आपके आश्रित होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ तपस्या करूँगा ॥ २८-२९ ॥ हे शैलराज! हे गिरिश्रेष्ठ! जिस साधनसे यहाँ ३० मेरी तपस्या बिना किसी विघ्नके हो सके, उसे इस समय आप सर्वथा यत्नपूर्वक कीजिये ॥ ३० ॥

हे पर्वतप्रवर! मेरी यही सबसे ३१ आप अपने घर जाइये और उसका यत्नपूर्वक प्रबन्ध कीजिये ॥ ३१ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] सृष्टिकर्ता वे जगदीश्वर चुप हो गये, ३२ शम्भुसे प्रेमपूर्वक यह बात कही— ॥ हिमालय बोले - हे जगन्नाथ बड़ी सेवा है, उत्तम प्रीतिसे ऐसा कहकर तब गिरिराजने ३२ ॥ ! हे परमेश्वर! आज मैंने आपका स्वागतपूर्वक पूजन किया है, [ यही ३३ मेरे लिये महान् सौभाग्यकी बात है । ] अब मैं अपने देशमें उपस्थित आपसे क्या प्रार्थना करूँ? ॥३३ ॥

हे महेश्वर! बड़े - बड़े यत्नका आश्रय ले लेनेवाले ३४ देवतालोग महान् तपके द्वारा भी आपको नहीं पाते, वे आप स्वयं उपस्थित हो गये हैं ॥ ३४ ॥

मुझसे बढ़कर कोई सौभाग्यशाली नहीं है और ३५ मुझसे बढ़कर कोई पुण्यात्मा नहीं है; जो आप मेरे पृष्ठभागपर तपस्याके लिये उपस्थित हुए हैं ॥ ३५ ॥

हे परमेश्वर! मैं अपनेको देवराज इन्द्रसे भी ३६ बढ़कर समझता हूँ; क्योंकि गणोंसहित आपने [ यहाँ ] आकर मुझे अनुग्रहका भागी बना दिया ॥ ३६ ॥

हे देवेश! आप स्वतन्त्र होकर बिना किसी ३७ विघ्नके उत्तम तपस्या कीजिये । हे प्रभो! मैं आपका दास हूँ, अत: सदा आपकी सेवा करूँगा ॥३७ ॥

ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] ऐसा कहकर वे गिरिराज तुरंत अपने घर आ गये और उन्होंने अपनी ३८ प्रियाको बड़े आदरसे वह सारा वृत्तान्त सुनाया ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् शैलराज साथ जानेवाले परिजनोंको तथा अपने समस्त गणोंको बुलाकर उनसे भलीभाँति ३ ९ | कहने लगे- ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 556

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५४४ हिमालय उवाच अद्यप्रभृति नो यातु कोऽपि गङ्गावतारणम् मच्छासनेन मत्प्रस्थं सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् गमिष्यति जनः कश्चित्तत्र चेत्तं महाखलम् दण्डयिष्ये विशेषेण सत्यमेतन्मयोदितम् इति तान्स नियम्याशु स्वगणान्निखिलान्मुने सुयत्नं कृतवान् शैलस्तं शृणु त्वं वदामि ते श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ हिमालय बोले- मेरी आज्ञासे आजसे । भी गंगावतरण नामक मेरे शिखरपर न जाय कोई , यह मैं ॥ ४० । सत्य कह रहा हूँ । यदि कोई व्यक्ति वहाँ जायगातो । मैं उस महादुष्टको विशेष रूपसे दण्ड दूँगा, यह मैंन ॥ ४१ | सत्य कहा है ॥ ४०-४१ ॥ हे मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणोंको शीघ्र ही नियन्त्रित करके हिमवान्ने [ विघ्ननिवारणके लिये ] । जो सुन्दर प्रयत्न किया, उसे आपको बता रहा हूँ, ॥ ४२ आप सुनिये ॥४२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवशैलसमागमवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवशैलसमागमवर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः हिमवान्‌का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना, शिवद्वारा कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना ब्रह्मोवाच

अथ शैलपतिर्हष्टः सत्पुष्पफलसंचयम् ।

समादाय स्वतनयासहितोऽगाद्धरान्तिकम् ॥

स गत्वा त्रिजगन्नाथं प्रणम्य ध्यानतत्परम् ।

अर्पयामास तनयां कालीं तस्मै हृदाद्भुताम् ॥

फलपुष्पादिकं सर्वं तत्तदग्रे निधाय सः ।

अग्रे कृत्वा सुतां शम्भुमिदमाह च शैलराट् ॥

हिमगिरिरुवाच

भगवंस्तनया मे त्वां सेवितुं चन्द्रशेखरम् ।

समुत्सुका समानीता त्वदाराधनकांक्षया ॥

सखीभ्यां सह नित्यं त्वां सेवतामेव शंकरम् ।

अनुजानीहि तां नाथ मयि ते यद्यनुग्रहः ॥

ब्रह्मोवाच

अथ तां शंकरोऽपश्यत्प्रथमारूढयौवनाम् ।

फुल्लेन्दीवरपत्राभां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥

समस्तलीलासंस्थानशुभवेषविजृम्भिकाम् ।

कम्बुग्रीवां विशालाक्ष चारुकर्णयुगोज्ज्वलाम् ॥

ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] तदनन्तर शैलराज हर्षित होकर उत्तम फल - फूलका समूह लेकर १ अपनी पुत्रीके साथ भगवान् हरके समीप गये । वहाँ जाकर उन्होंने ध्यानपरायण त्रिलोकीनाथको प्रणाम करके अपनी अद्भुत कन्या कालीको हृदयसे उन्हें २ अर्पित कर दिया ॥ १-२ ॥ सब फल- न - फूल आदि उनके सामने रखकर और पुत्रीको आगे करके वे शैलराज शम्भुसे यह कहने लगे - ॥३ ॥

हिमगिरि बोले - हे भगवन्! मेरी पुत्री आप | चन्द्रशेखरकी सेवा करनेके लिये बड़ी उत्सुक है, अतः ४ आपकी आराधनाकी इच्छासे मैं इसको लाया हूँ ॥ ४ ॥

यह अपनी दो सखियोंके साथ सदा आप ५ शंकरकी ही सेवा करेगी । हे नाथ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है, तो इसे [ सेवाके लिये ] आज्ञा दीजिये ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले- तब शंकरने यौवनकी । प्रथमावस्थामें वर्तमान, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाल, ६ विकसित नीलकमलके पत्रके समान आभावाली, समस्त लीलाओंकी स्थानरूप, सुन्दर वेषसे सुसज्जित, | शंखके समान ग्रीवावाली, विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर ७ कर्णयुगलसे शोभित मृणालके चिकनी एवं । , समान

पृष्ठ 557

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 557 का मूल पृष्ठ
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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५४५ मृणालायतपर्यन्तबाहुयुग्ममनोहराम् राजीवकुड्मलप्रख्यौ घनपीनौ दृढौ स्तनौ ॥ ८

बिभ्रतीं क्षीणमध्यां च त्रिवलीमध्यराजिताम् ।

स्थलपद्मप्रतीकाशपादयुग्मविराजिताम् ॥ ९

ध्यानपंजरनिर्बद्धमुनिमानसमप्यलम् 1 दर्शनाद् भ्रंशने शक्तां योषिद्गणशिरोमणिम् ॥ १०

दृष्ट्वा तां तादृशीं तात ध्यानिनां च मनोहराम् ।

विग्रहे तन्त्रमन्त्राणां वर्धिनीं कामरूपिणीम् ॥ ११

न्यमीलयद् दृशौ शीघ्रं दध्यौ स्वं रूपमुत्तमम् ।

परतत्त्वं महायोगी त्रिगुणात्परमव्ययम् ॥ १२

दृष्ट्वा तदानीं सकलेश्वरं विभुं तपो जुषाणं विनिमीलितेक्षणम् । कपर्दिनं चन्द्रकलाविभूषणं वेदान्तवेद्यं परमासने स्थितम् ॥ १३ ववन्द शीर्णा च पुनर्हिमाचल: स संशयं प्रापददीनसत्त्वः । उवाच वाक्यं जगदेकबन्धुं गिरीश्वरो वाक्यविदां वरिष्ठः ॥ १४ हिमाचल उवाच

देवदेव महादेव करुणाकर शंकर ।

पश्य मां शरणं प्राप्तमुन्मील्य नयने विभो ॥ १५

शिव शर्व महेशान जगदानन्दकृत्प्रभो ।

त्वां नतोऽहं महादेव सर्वापद्विनिवर्तकम् ॥ १६

न त्वां जानन्ति देवेश वेदा: शास्त्राणि कृत्स्नशः ।

अतीतो महिमाध्वानं तव वाङ्मनसोः सदा ॥ १७

अतद्व्यावृत्तितस्त्वां वै चकितं चकितं सदा ।

अभिधत्ते श्रुतिः सर्वा परेषां का कथा मता ॥ १८

जानन्ति बहवो भक्तास्त्वत्कृपां प्राप्य भक्तितः ।

शरणागतभक्तानां न कुत्रापि भ्रमादिकम् ॥ १ ९

2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_19_1_Front लम्बी दो भुजाओंसे मनोहर प्रतीत होनेवाली, कमलकलीके समान घने, मोटे तथा दृढ़ स्तनोंको धारण करनेवाली, पतले कटिप्रदेशवाली, त्रिवलीयुक्त मध्यभागवाली, स्थलपद्मके समान चरणयुगलसे सुशोभित, अपने दर्शनसे ध्यानरूपी पिंजड़े में बन्द मुनियोंके मनको भी विचलित करनेमें समर्थ और स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ उस [ कन्या ] -को देखा॥६–१० ॥ ध्यानियोंके भी मनका हरण करनेवाली, विग्रहसे तन्त्र - मन्त्रोंको बढ़ानेवाली तथा कामरूपिणी वैसी उस कन्याको देखकर उन महायोगीने शीघ्र दोनों नेत्र बन्द कर लिये और वे अपने उत्तम, परमतत्त्वमय, तीनों गुणोंसे परे तथा अविनाशी स्वरूपका ध्यान करने लगे ॥ ११-१२ ॥ उस समय सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, तप करते हुए, बन्द नेत्रोंवाले, चन्द्रकलारूप आभूषणवाले, जटा धारण करनेवाले, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य तथा उत्तम आसनमें स्थित शिवको देखकर महात्मा हिमालयने उन्हें प्रणाम किया, वे पुनः संशयमें पड़ गये । इसके बाद वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गिरीश्वर जगत्के एकमात्र बन्धु शंकरसे यह वचन कहने लगे - ॥ १३-१४ ॥ हिमालय बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणाकर! हे शंकर! हे विभो! आँखें खोलकर मुझ शरणागतको देखिये ॥ १५ ॥

हे शिव! हे शर्व! हे महेशान! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले प्रभो! हे महादेव! मैं सम्पूर्ण आपत्तियोंको दूर करनेवाले आपको प्रणाम करता हूँ । हे देवेश! वेद और शास्त्र भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते हैं; क्योंकि आपकी महिमा वाणी तथा मनके मार्गसे भी सर्वथा परे है॥१६-१७ ॥ सभी श्रुतियाँ भी आपकी महिमाका पार न पा सकनेके कारण चकित होकर नेति - नेति कहते हुए सदा आपका वर्णन करती हैं, फिर दूसरोंकी क्या बात कही जाय! ॥१८ ॥

बहुत - से भक्त ही भक्तिके द्वारा आपकी कृपा प्राप्त करके उसे जान सकते हैं; क्योंकि [ आपकी ] शरणमें आये हुए भक्तोंको कहीं भी भ्रम आदि नहीं होता ॥ १ ९ ॥

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५४६ श्रीशिवमहापुरा [ अ ० १२ विज्ञप्तिं शृणु मत्प्रीत्या स्वदासस्य ममाधुना । अब आप दया करके इस समय मुझ तव देवाज्ञया तात दीनत्वाद्वर्णयामि हि ॥ २० दासका निवेदन सुनें । हे देव! हे तात! मैं अपने सभाग्योऽहं महादेव प्रसादात्तव शंकर मत्वा स्वदासं मां नाथ कृपां कुरु नमोऽस्तु ते प्रत्यहं चागमिष्यामि दर्शनार्थं तव प्रभो अनया सुतया स्वामिन्निदेशं दातुमर्हसि ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्योन्मील्य नेत्रे महेश्वरः । त्यक्तध्यानः परामृश्य देवदेवोऽब्रवीद्वचः महेश्वर उवाच

आगन्तव्यं त्वया नित्यं दर्शनार्थं ममाचल ।

कुमारीं सदने स्थाप्य नान्यथा मम दर्शनम् ॥

ब्रह्मोवाच

महेशवचनं श्रुत्वा शिवातातस्तथाविधम् ।

अचलः प्रत्युवाचेदं गिरिशं नतकंधरः ॥

हिमाचल उवाच

कस्मान्मयानया सार्धं नागन्तव्यं तदुच्यताम् ।

सेवने किमयोग्येयं नाहं वेदम्यत्र कारणम् ॥

ब्रह्मोवाच

ततोऽब्रवीद्गिरिं शंभुः प्रहसन्वृषभध्वजः ।

लोकाचारं विशेषेण दर्शयन्हि कुयोगिनाम् ॥

शंभुरुवाच

इयं कुमारी सुश्रोणी तन्वी चन्द्रानना शुभा ।

नानेतव्या मत्समीपे वारयामि पुनः पुनः ॥

मायारूपा स्मृता नारी विद्वद्भिर्वेदपारगैः ।

युवती तु विशेषेण विघ्नकर्त्री तपस्विनाम् ॥

अहं तपस्वी योगी च निर्लिप्तो मायया सदा ।

प्रयोजनं युवत्या वै स्त्रिया किं मेऽस्ति भूधर ॥

एवं पुनर्न वक्तव्यं तपस्विवरसंश्रित । आज्ञासे दीन होकर उसका वर्णन कर रहा हूँ आपकी । हे महादेव! हे शंकर! मैं आपकी कृपासे ॥ २० ॥

भाग्यशाली ॥ २१ हो गया हूँ । हे नाथ! मुझे अपना दास समझकर मुझपर । कृपा करें, आपको नमस्कार है । हे प्रभो! मैं आपके

दर्शनके लिये प्रतिदिन इस कन्याके साथ आया करूँगा ।

॥ २२ हे स्वामिन्! मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये ॥ २१-२२ ॥

ब्रह्माजी बोले- उनका यह वचन सुनकर अपने नेत्र खोलकर ध्यान त्यागकर और कुछ सोच - विचारकर ॥ २३ देवदेव महादेव यह वचन कहने लगे- ॥ २३ ॥

महेश्वर बोले - हे भक्त! [ अपनी ] कन्याको घरपर ही छोड़कर नित्य मेरे दर्शनके लिये आप आ २४ । सकते हैं । अन्यथा मेरा दर्शन नहीं होगा ॥ २४ ॥

ब्रह्माजी बोले- महेशके इस प्रकारके वचनको सुनकर पार्वतीके पिता हिमालय सिर झुकाकर शिवजीसे २५ | यह कहने लगे - ॥ २५ ॥

हिमाचल बोले - [ हे प्रभो! ] इस कन्याके साथ [ आपके दर्शनके लिये ] किस कारणसे मुझे नहीं आना चाहिये, इसे बताइये । क्या यह आपकी २६ सेवा करनेमें अयोग्य है? मैं इसका कारण नहीं समझ पा रहा हूँ ॥ २६ ॥

ब्रह्माजी बोले — तत्पश्चात् वृषभध्वज शंकर विशेषतः कुयोगियोंका लोकाचार दिखाते हुए हँसकर २७ हिमालयसे कहने लगे- ॥ २७ ॥

शम्भु बोले – - [ हे शैलराज! ] मनोहर | नितम्बवाली, तन्वी, चन्द्रमुखी तथा सुन्दरी इस कन्याको २८ मेरे सन्निकट मत लाइयेगा, इसके लिये मैं बार - बार मना करता हूँ ॥ २८ ॥

वेदोंके पारगामी विद्वानोंने स्त्रीको मायारूपा २ ९ कहा है, उसमें भी विशेष रूपसे युवती स्त्री तो तपस्वियोंके लिये विघ्नकारिणी होती है ॥ २ ९ ॥ हे भूधर! मैं तपस्वी, योगी तथा सदा मायासे ३० निर्लिप्त रहनेवाला हूँ । अतः मुझे युवती स्त्रीसे क्या | प्रयोजन है? हे तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय! आपको | पुनः ऐसा नहीं कहना चाहिये क्योंकि आप वेदधर्ममें वेदधर्मप्रवीणस्त्वं यतो ज्ञानिवरो बुधः ॥ ३१ प्रवीण, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा; विद्वान् हैं ॥ ३०-३१ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_19_1_Back

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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५४७ तत्सङ्गाद्विषयोत्पत्तिराशु वै । भवत्यचल विनश्यति च वैराग्यं ततो भ्रश्यति सत्तपः ॥

अतस्तपस्विना शैल न कार्यां स्त्रीषु सङ्गतिः ।

महाविषयमूलं सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याद्युक्त्वा बहुतरं महायोगी महेश्वरः ।

विरराम गिरीशं तं महायोगिवरः प्रभुः ॥

एतच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शंभो -निरामयं निःस्पृहं निष्ठुरं च । कालीतातश्चकितोऽभूत्सुरर्षे तद्वत्किंचिद्व्याकुलश्चास तूष्णीम् ॥ तपस्विनोक्तं वचनं निशम्य तथा गिरीशं चकितं विचार्य । अतः प्रणम्यैव शिवं भवानी जगाद वाक्यं विशदं तदानीम् ॥ हे पर्वत! उनके संगसे शीघ्र ही विषयवासना ३२ उत्पन्न हो जाती है, वैराग्य नष्ट हो जाता है और उससे श्रेष्ठ तपस्या नष्ट हो जाती है । अतः हे शैल! तपस्वियोंको स्त्रियोंका संग नहीं करना चाहिये; वह ३३ [ स्त्री ] महाविषयका मूल तथा ज्ञान - वैराग्यका नाश करनेवाली होती है ॥ ३२-३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे नारद! इस प्रकारकी बहुत-सी बातें उन गिरिराजसे कहकर महान् योगियोंमें श्रेष्ठ ३४ महायोगी प्रभु महेश्वर चुप हो गये ॥३४ ॥

हे देवर्षे! उन शम्भुका यह स्पृहारहित, निरामय तथा निष्ठुर वचन सुनकर कालीके पिता [ हिमालय ] विस्मयमें पड़ गये और वे कुछ - कुछ ३५ व्याकुल - से होकर चुप हो गये । उस समय तपस्वीके द्वारा कही गयी बातको सुनकर और गिरिराजको आश्चर्यमें पड़ा हुआ विचार करके शिवजीको प्रणामकर भवानी उनसे विशद वचन ३६ कहने लगीं॥३५-३६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवहिमाचलसंवादवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिव - हिमाचल-संवादवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः पार्वती और परमेश्वरका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना, पार्वतीका भवान्युवाच

किमुक्तं गिरिराजाय त्वया योगिंस्तपस्विना ।

तदुत्तरं शृणु विभो मत्तो ज्ञानविशारद ॥ १

तपःशक्त्यान्वितः शम्भो करोषि विपुलं तपः ।

तव बुद्धिरियं जाता तपस्तप्तुं महात्मनः ॥ २

सा शक्तिः प्रकृतिर्ज्ञेया सर्वेषामपि कर्मणाम् ।

तया विरच्यते सर्वं पाल्यते च विनाश्यते ॥ ३

कस्त्वं का प्रकृतिः सूक्ष्मा भगवंस्तद्विमृश्यताम् ।

विना प्रकृत्या च कथं लिङ्गरूपी महेश्वरः ॥ ४

2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_19_2_Front महेश्वरकी सेवामें तत्पर रहना भवानी बोलीं- हे योगिन्! आपने तपस्वी होकर भी मेरे पितासे क्या कह दिया । हे ज्ञानविशारद! उसका उत्तर मुझसे सुनिये । हे शम्भो! आप तपकी शक्तिसे सम्पन्न होकर ही महातपस्या कर रहे हैं और [ उसी महाशक्तिकी ही प्रेरणासे ] तपस्या करनेके लिये आप महात्माको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है । सभी कर्मोंको करनेवाली उस शक्तिको ही प्रकृति जानना चाहिये, उसीके द्वारा सबकी सृष्टि, पालन और संहार होता है॥१–३ ॥ अतः हे भगवन्! आप कौन हैं और सूक्ष्म प्रकृति क्या है, इसका आप विचार करें । प्रकृतिके बिना लिंगरूपी महेश्वर किस प्रकार रह सकते हैं? ॥ ४ ॥

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५४८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १३ अर्चनीयोऽसि वन्द्योऽसि ध्येयोऽसि प्राणिनां सदा । आप प्रकृतिके ही कारण सदा प्राणियोंके लिये प्रकृत्या च विचार्येति हृदा सर्वे तदुच्यताम् ॥ ५ अर्चनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैं [ इस बातको | हृदयसे विचारकर ही आप वह सब कहिये ] ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] पार्वतीजीके ॥५ ॥

पार्वत्यास्तद्वचः श्रुत्वा महोतिकरणे रतः । । वचनको सुनकर महती लीला करनेमें उस सुविहस्य प्रसन्नात्मा महेशो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ प्रसन्नचित्त महेश्वर हँसकर कहने लगे- रत ॥ रहनेवाले ६ ॥ महेश्वर उवाच तपसा परमेणैव प्रकृतिं नाशयाम्यहम् प्रकृत्या रहितः शम्भुरहं तिष्ठामि तत्त्वतः ॥ तस्माच्च प्रकृतेः सद्भिर्न कार्य: सङ्ग्रहः क्वचित् । स्थातव्यं निर्विकारैश्च लोकाचारविवर्जितैः ब्रह्मोवाच

इत्युक्ता शम्भुना तात लौकिकव्यवहारतः ।

सुविहस्य हृदा काली जगाद मधुरं वचः ॥

काल्युवाच

यदुक्तं भवता योगिन्वचनं शंकर प्रभो ।

सा च किं प्रकृतिर्न स्यादतीतस्तां भवान्कथम् ॥

एतद्विचार्य वक्तव्यं तत्त्वतो हि यथातथम् ।

प्रकृत्या सर्वमेतच्च बद्धमस्ति निरंतरम् ॥

तस्मात्त्वया न वक्तव्यं न कार्यं किंचिदेव हि ।

वचनं रचनं सर्वं प्राकृतं विद्धि चेतसा ॥

यच्छृणोषि यदश्नासि यत्पश्यसि करोषि यत् ।

तत्सर्वं प्रकृतेः कार्यं मिथ्यावादो निरर्थकः ॥

प्रकृतेः परमश्चेत्त्वं किमर्थं तप्यसे तपः ।

त्वया शंभोऽधुना ह्यस्मिन्गिरौ हिमवति प्रभो ॥

प्रकृत्या गिलितोऽसि त्वं न जानासि निजं हर ।

निजं जानासि चेदीश किमर्थं तप्यसे तपः ॥

वाग्वादेन च किं कार्यं मम योगिंस्त्वया सह ।

प्रत्यक्षे ह्यनुमानस्य न प्रमाणं विदुर्बुधाः ॥

इंद्रियाणां गोचरत्वं यावद्भवति देहिनाम् । महेश्वर बोले- मैं उत्तम तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका । नाश करता हूँ और वस्तुतः प्रकृतिसे रहित होकर ही ७ शम्भुके रूपमें स्थित रहता हूँ । अतः सत्पुरुषोंको कभी भी प्रकृतिका संग्रह नहीं करना चाहिये और लोकाचारसे ॥ ८ दूर तथा विकाररहित रहना चाहिये॥७-८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे तात! जब शम्भुने लौकिक व्यवहारके अनुसार यह बात कही, तब काली मन-९ ही - मन हँसकर यह मधुर वचन कहने लगीं - ॥९ ॥

काली बोलीं – हे योगिन्! हे शंकर! हे प्रभो! आपने जो बात कही है, क्या वह प्रकृति नहीं है, आप १० उससे परे कैसे हैं? इन सबका तात्त्विक दृष्टिसे ठीक-ठीक विचार करके ही आपको बोलना चाहिये । यह ११ सब कुछ सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है । इसीलिये आपको न तो बोलना चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और करना सब व्यवहार प्रकृति ही है-१२ ऐसा अपनी बुद्धिसे समझिये॥१०–१२ ॥ आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते और करते हैं, १३ वह सब प्रकृतिका ही कार्य है । इसे मिथ्या कह देना निरर्थक है । हे प्रभो! शम्भो! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं, १४ तो इस समय इस हिमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये कर रहे हैं । हे हर! प्रकृतिने आपको निगल लिया है, अतः आप अपनेको नहीं जानते । हे ईश! यदि आप अपनेको १५ जानते हैं, तो किसलिये तप करते हैं ॥ १३-१५ ॥ हे योगिन्! मुझे आपके साथ वाद - विवाद करनेकी १६ क्या आवश्यकता है । विद्वान् पुरुष प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर अनुमान प्रमाणको नहीं मानते ॥ १६ ॥

जो कुछ प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है, वह तावत्सर्वं विमन्तव्यं प्राकृतं ज्ञानिभिर्धिया ॥ १७ सब ज्ञानी पुरुषोंको बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना किं बहूक्तेन । चाहिये । हे योगीश! बहुत कहनेसे क्या लाभ! मेरी योगीश शृणु मद्वचनं परम् । उत्तम बात सुनिये । मैं वह प्रकृति हूँ और आप पुरुष हैं । सा चाहं पुरुषोऽसि त्वं सत्यं सत्यं न संशयः ॥ १८ | यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ १७-१८ ॥ 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_19_2_Back