श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 531–540

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५१ ९ य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः । जो एकाग्र होकर इस चरित्रको नित्य सुनता अथवा सुनाता है, पढ़ता अथवा पढ़ाता है, वह सभी पठेद्वा पाठयेद्वापि सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ५० कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे देवसान्त्वनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवसान्त्वनवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः मेनाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर देवीका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर वरदान देना, नारद उवाच

अन्तर्हितायां देव्यां तु दुर्गायां स्वगृहेषु च ।

गतेष्वमरवृन्देषु किमभूत्तदनन्तरम् ॥

कथं मेनागिरीशौ च तेपाते परमं तपः ।

कथं सुताभवत्तस्य मेनायां तात तद्वद ॥

ब्रह्मोवाच

विप्रवर्य सुतश्रेष्ठ शृणु तच्चरितं महत् ।

प्रणम्य शङ्करं भक्त्या वच्मि भक्तिविवर्धनम् ॥

उपदिश्य गते तात सुरवृन्दे गिरीश्वरः ।

हर्यादौ मेनका चापि तेपाते परमं तपः ॥

अहर्निशं शिवां शम्भुं चिन्तयन्तौ च दम्पती ।

सम्यगारेधतुर्नित्यं भक्तियुक्तेन चेतसा ॥

गिरिप्रियातीव मुदानर्च देवीं शिवेन सा ।

दानं ददौ द्विजेभ्यश्च सदा तत्तोषहेतवे ॥

चैत्रमासं समारभ्य सप्तविंशतिवत्सरान् ।

शिवां सम्पूजयामासापत्यार्थिन्यन्वहं रता ॥

अष्टम्यामुपवासं तु कृत्वादान्नवमीतिथौ । मोदकैर्बलिपिष्टैश्च पायसैर्गन्धपुष्पकैः गङ्गायामौषधिप्रस्थे कृत्वा मूर्ति महीमयीम् । उमायाः पूजयामास नानावस्तुसमर्पणैः कदाचित्सा निराहारा कदाचित्सा धृतव्रता कदाचित्पवनाहारा कदाचिज्जलभुग्ह्यभूत् ॥ मेनासे मैनाकका जन्म नारदजी बोले - हे तात! जब देवी दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं और देवगण अपने - अपने धामको चले गये, उसके बाद क्या हुआ? ॥ १ ॥

हे तात! मेना तथा हिमाचलने किस प्रकार कठोर तप किया और भगवती किस प्रकार मेनाके गर्भसे उत्पन्न २ होकर उन हिमाचलकी कन्या हुईं, उसे कहिये ॥ २ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे विप्रवर्य! हे सुतश्रेष्ठ! मैं शिवजीको भक्तिपूर्वक प्रणामकर उनके भक्तिवर्धक ३ महान् चरित्रको कह रहा हूँ ॥ ३ ॥

उपदेश देकर विष्णु आदि देवसमुदायके चले ४ जानेपर पर्वतराज हिमाचल तथा मेनका कठोर तप करने लगे ॥४ ॥

वे पति - पत्नी भक्तियुक्त चित्तसे दिन - रात शम्भु ५ और शिवाका चिन्तन करते हुए उनकी सम्यक् रीतिसे नित्य आराधना करने लगे । गिरिप्रिया वे मेना प्रसन्नतापूर्वक शिवजीके साथ देवीका पूजन करती थीं और उन्हें प्रसन्न ६ करनेके लिये नित्य ब्राह्मणोंको दान देती थीं ॥ ५-६ ॥ सन्तानकी कामनासे मेनाने चैत्रमाससे आरम्भ ७ करके सत्ताईस वर्षोंतक प्रतिदिन तत्परतापूर्वक शिवाकी पूजा की ॥७ ॥

वे अष्टमीको उपवास करके नवमी तिथिको ॥ ८ लड्डू, पीठी, खीर, गन्ध, पुष्प आदि अर्पण करती थीं ॥ ८ ॥

वे गंगाके औषधिप्रस्थमें उमादेवीकी मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर अनेक प्रकारकी वस्तुएँ समर्पितकर उनकी ॥ ९ पूजा किया करती थीं । वे कभी निराहार रहती थीं, । कभी व्रत धारण करती थीं, कभी जल पीकर ही रहतीं १० । थीं और कभी हवा पीकर ही रह जाती थीं ॥ ९ -१० ॥

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५२० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ शिवाविन्यस्तचेतस्का सप्तविंशतिवत्सरान् । इस प्रकार विशुद्ध तेजसे दीप्तिमती निनाय मेनका प्रीत्या परं सा मृष्टवर्चसा ॥ ११ प्रेमपूर्वक शिवामें चित्त लगाते हुए सत्ताईस मेनाने व्यतीत किये ॥ ११ ॥ वर्ष

सप्तविंशतिवर्षान्ते जगन्माता जगन्मयी । सत्ताईसवें वर्षकी समाप्तिपर जगन्मयी जगज्जननी सुप्रीताभवदत्यर्थमुमा शंकरकामिनी अनुग्रहाय मेनायाः पुरतः परमेश्वरी आविर्बभूव सा देवी सन्तुष्टा तत्सुभक्तितः दिव्यावयवसंयुक्ता तेजोमण्डलमध्यगा उवाच विहसन्ती सा मेनां प्रत्यक्षतां गता देव्युवाच वरं ब्रूहि महासाध्वि यत्ते मनसि वर्तते सुप्रसन्ना च तपसा तवाहं गिरिकामिनि

यत्प्रार्थितं त्वया मेने तपोव्रतसमाधिना ।

दास्ये तेऽहं च तत्सर्वं वाञ्छितं यद्यदा भवेत् ॥

ततः सा मेनका देवीं प्रत्यक्षां कालिकां तदा ।

दृष्ट्वा च प्रणनामाथ वचनं चेदमब्रवीत् ॥

मेनोवाच

देवि प्रत्यक्षतो रूपं दृष्टं तव मयाधुना ।

त्वामहं स्तोतुमिच्छामि प्रसन्ना भव कालिके ॥

ब्रह्मोवाच

अथ सा मेनयेत्युक्ता कालिका सर्वमोहिनी ।

बाहुभ्यां सुप्रसन्नात्मा मेनकां परिषस्वजे ॥

ततः प्राप्तमहाज्ञाना मेनका कालिकां शिवाम् ।

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्भक्त्या प्रत्यक्षतां गताम् ॥

मेनोवाच महामायां जगद्धात्रीं चण्डिकां लोकधारिणीम् । प्रणमामि महादेवीं सर्वकामार्थदायिनीम् ॥ नित्यानन्दकरीं मायां योगनिद्रां जगत्प्रसूम् । प्रणमामि सदा सिद्धां ॥ १२ । शंकरकामिनी उमा अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं ॥१२ ॥

। मेनाकी उत्तम भक्तिसे सन्तुष्ट होकर परमेश्वरी ॥ १३ देवी उनपर अनुग्रह करनेके लिये उनके सामने प्रकट हुईं ॥ १३ ॥

। तेजोराशिके बीचमें विराजमान तथा दिव्य ॥ १४ अवयवोंसे संयुक्त उमादेवी प्रत्यक्ष होकर मेनासे हँसती हुई कहने लगीं— ॥ १४ ॥

देवी बोलीं- हे महासाध्वि! जो तुम्हारे मनमें । हो, वह वर माँगो । हे गिरिकामिनि! मैं तुम्हारी ॥ १५ तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १५ ॥

हे मेने! तुमने तपस्या, व्रत और समाधिके द्वारा १६ जो प्रार्थना की है, वह सब मैं तुम्हें प्रदान करूंगी और जब भी तुम्हारी जो इच्छा होगी, वह भी दूँगी ॥ १६ ॥

तब उन मेनाने प्रत्यक्ष प्रकट हुई १७ कालिका देवीको देखकर प्रणाम किया और यह वचन कहा- T— ॥ १७ ॥

मेना बोलीं – हे देवि! इस समय मुझे आपके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, अतः मैं आपकी स्तुति

१८ करना चाहती हूँ । हे कालिके! आप प्रसन्न हों ॥ १८ ॥

ब्रह्माजी बोले— [ नारद! ] मेनाके ऐसा कहनेपर सर्वमोहिनी कालिकाने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर १ ९ अपनी दोनों बाँहोंसे मेनाका आलिंगन किया ॥१ ९ ॥ तत्पश्चात् मेनकाको महाज्ञानकी प्राप्ति हो २० गयी और वे प्रिय वचनोंद्वारा भक्तिभावसे प्रत्यक्ष हुई शिवा कालिकाकी स्तुति करने लगीं - ॥ २० ॥

मेना बोलीं- मैं महामाया, जगत्का पालन करनेवाली, चण्डिका, लोकको धारण करनेवाली तथा २१ सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाली महादेवीको प्रणाम करती हूँ ॥२१ ॥

नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली, माया, योगनिद्रा, जगज्जननी, सिद्धस्वरूपिणी तथा सुन्दर कमलोंकी | माला धारण करनेवाली देवीको सदा प्रणाम करती शुभसारसमालिनीम् ॥ २२ हूँ ॥ २२ ॥

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अ ०५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५२१

मातामहीं सदानन्दां भक्तशोकविनाशिनीम् ।

आकल्पं वनितानां च प्राणिनां बुद्धिरूपिणीम् ॥

सा त्वं बंधच्छेदहेतुर्यतीनां कस्ते गेयो मादृशीभिः प्रभावः । हिंसां या वाथर्ववेदस्य सा त्वं नित्यं कामं त्वं ममेष्टं विधेहि ॥ नित्यानित्यैर्भावहीनैः परास्तै-स्तत्तन्मात्रैर्योज्यते भूतवर्ग: । तेषां शक्तिस्त्वं सदा नित्यरूपा काले योषा योगयुक्ता समर्था ॥ योनिर्धरित्री जगतां त्वमेव त्वमेव नित्या प्रकृतिः परस्तात् । यया वशं क्रियते ब्रह्मरूपं सा त्वं नित्या मे प्रसीदाद्य मातः ॥ त्वं जातवेदोगतशक्तिरुग्रा त्वं दाहिका सूर्यकरस्य शक्तिः । आह्लादिका त्वं बहुचन्द्रिका या तां त्वामहं स्तौमि नमामि चण्डीम् ॥

योषाणां सत्प्रिया च त्वं नित्या त्वं चोर्ध्वरेतसाम् ।

वाञ्छा त्वं सर्वजगतां माया च त्वं यथा हरेः ॥

या चेष्टरूपाणि विधाय देवी सृष्टिस्थितिर्नाशमयी च कर्त्री ब्रह्माच्युतस्थाणुशरीरहेतुः सा त्वं प्रसीदाद्य पुनर्नमस्ते ब्रह्मोवाच तत इत्थं स्तुता दुर्गा कालिका पुनरेव हि उवाच मेनकां देवीं वांछितं वरयेत्युत उमोवाच प्राणप्रिया मम त्वं हि हिमाचलविलासिनि यदिच्छसि ध्रुवं दास्ये नादेयं विद्यते मम मातामही, नित्य आनन्द प्रदान करनेवाली, भक्तोंके २३ शोकको सर्वदा विनष्ट करनेवाली तथा नारियों एवं प्राणियोंकी बुद्धिस्वरूपिणी देवीको मैं प्रणाम करती हूँ ॥ २३ ॥

आप यतियोंके बन्धनके नाशकी हेतुभूत [ ब्रह्मविद्या ] हैं, तो मुझ - जैसी नारियाँ आपके प्रभावका क्या वर्णन कर सकती हैं । अथर्ववेदकी जो हिंसा है, वह आप ही हैं । [ हे देवि! ] आप मेरे अभीष्ट २४ फलको सदा प्रदान कीजिये ॥२४ ॥

भावहीन तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओंसे आप ही पंचभूतोंके समुदायको संयुक्त करती हैं । आप उनकी शक्ति हैं और सदा नित्यरूपा हैं । आप २५ समय- समयपर योगयुक्त एवं समर्थ नारीके रूपमें प्रकट होती हैं ॥ २५ ॥

आप ही जगत्की उत्पादिका और आधारशक्ति हैं, आप ही सबसे परे नित्या प्रकृति हैं । जिसके द्वारा ब्रह्म स्वरूपको वशमें किया जाता है, वह नित्या [ विद्या ] २६ आप ही हैं । हे मातः! आज मुझपर प्रसन्न होइये ॥ २६ ॥

आप ही अग्निके भीतर व्याप्त उग्र शक्ति हैं । आप ही सूर्यकिरणोंकी प्रकाशिका शक्ति हैं । चन्द्रमामें जो आह्लादिका शक्ति है, वह भी आप ही हैं, उन आप २७ चण्डी देवीका मैं स्तवन और वन्दन करती हूँ ॥ २७ ॥

आप स्त्रियोंको बहुत प्रिय हैं । ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियोंकी २८ नित्या ब्रह्मशक्ति भी आप ही हैं । आप सम्पूर्ण जगत्की वांछा हैं तथा श्रीहरिकी माया भी आप ही हैं ॥ २८ ॥

जो देवी इच्छानुसार रूप धारण करके सृष्टि, स्थिति, पालन तथा संहारमयी होकर उन कार्योंका । सम्पादन करती हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरकी भी हेतुभूता हैं, वे आप ही हैं । आप मुझपर

॥ २ ९ प्रसन्न हों । आपको पुनः मेरा नमस्कार है ॥ २ ९ ॥

ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] मेनाके इस । प्रकार स्तुति करनेपर दुर्गा कालिकाने पुनः मेना देवीसे ॥ ३० कहा- तुम अपना मनोवांछित वर माँग लो ॥ ३० ॥

उमा बोलीं- हे हिमाचलप्रिये! तुम मुझे प्राणोंसे अधिक प्रिय हो, तुम जो भी चाहती हो, उसे मैं । निश्चय ही दूँगी, तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय ॥ ३१ | नहीं है ॥ ३१ ॥

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५२२ इति श्रुत्वा महेशान्याः पीयूषसदृशं वचः उवाच परितुष्टा सा मेनका गिरिकामिनी मेनोवाच शिवे जय जय प्राज्ञे महेश्वरि भवाम्बिके वरयोग्यास्म्यहं चेत्ते वृणे भूयो वरं वरम् प्रथमं शतपुत्रा मे भवन्तु जगदम्बिके बह्वायुषो वीर्यवन्त ऋद्धिसिद्धिसमन्विताः पश्चात्तथैका तनया स्वरूपगुणशालिनी । कुलद्वयानंदकरी भुवनत्रयपूजिता

सुता भव मम शिवे देवकार्यार्थमेव हि ।

रुद्रपत्नी भव तथा लीलां कुरु भवाम्बिके ॥

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा मेनकोक्तं हि प्राह देवी प्रसन्नधीः ।

स्मितपूर्वं वचस्तस्याः पूरयन्ती मनोरथम् ॥

देव्युवाच

शतपुत्राः सम्भवन्तु भवत्या वीर्यसंयुताः ।

तत्रैको बलवान्मुख्यः प्रथमं सम्भविष्यति ॥

सुताहं सम्भविष्यामि सन्तुष्टा तव भक्तितः ।

देवकार्यं करिष्यामि सेविता निखिलैः सुरैः ॥

ब्रह्मोवाच

एवमुक्त्वा जगद्धात्री कालिका परमेश्वरी ।

पश्यन्त्या मेनकायास्तु तत्रैवान्तर्दधे शिवा ॥

मेनकापि वरं लब्ध्वा महेशान्या अभीप्सितम् ।

मुदं प्रापामितां तात तपःक्लेशोऽप्यनश्यत ॥

दिशि तस्यां नमस्कृत्य सुप्रहृष्टमनाः सती । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ । महेश्वरीका अमृतके समान यह मधुर वचन ॥ ३२ सुनकर हिमगिरिकामिनी मेना अत्यधिक सन्तुष्ट होकर कहने लगीं— ॥३२ ॥

मेना बोलीं- हे शिवे! आपकी जय हो । हो, हे प्राज्ञे! हे महेश्वरि! हे भवाम्बिके! यदि मैं, जय वर ॥ ३३ पानेके योग्य हूँ तो आपसे पुनः श्रेष्ठ वर माँगती हूँ ॥ ३३ ॥

। हे जगदम्बिके! पहले तो मुझे सौ पुत्र हों, वे ॥ ३४ दीर्घ आयुवाले, पराक्रमसे युक्त तथा ऋद्धि - सिद्धिसे सम्पन्न हों ॥३४ ॥

उन पुत्रोंके पश्चात् मेरी एक पुत्री हो, जो ॥ ३५ स्वरूप और गुणोंसे युक्त, दोनों कुलोंको आनन्द देनेवाली तथा तीनों लोकोंमें पूजित हो ॥ ३५ ॥

हे शिवे! आप ही देवताओंका कार्य सिद्ध ३६ करनेके लिये मेरी पुत्री हों । हे भवाम्बिके! आप रुद्रदेवकी पत्नी हों और लीला करें ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] मेनकाकी वह बात सुनकर प्रसन्नहृदया देवी उमा उनके मनोरथको पूर्ण ३७ करती हुई मुसकराकर यह वचन कहने लगीं— ॥ ३७ ॥

देवी बोलीं- तुम्हें सौ बलवान् पुत्र होंगे । उनमें एक बलवान् और प्रधान होगा, जो सबसे पहले ३८ उत्पन्न होगा ॥३८ ॥

तुम्हारी भक्तिसे सन्तुष्ट मैं [ स्वयं ] पुत्रीके ३ ९ रूपमें अवतीर्ण होऊँगी और समस्त देवताओंसे सेवित होकर उनका कार्य सिद्ध करूँगी ॥ ३ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले — परमेश्वरी कालिका शिवा ४० अन्तर्धान हो गयीं ॥४० ॥

हे तात! महेश्वरीसे ४१ भी अपार हर्ष हुआ और नष्ट हो गया ॥ ४१ ॥

अत्यन्त प्रसन्नचित्त ऐसा कहकर जगद्धात्री मेनकाके देखते - देखते वहीं अभीष्ट वर पाकर मेनकाको उनका तपस्याजनित क्लेश साध्वी मेना उस दिशामें जयशब्दं प्रोच्चरन्ती स्वस्थानं प्रविवेश ह ॥ ४२ नमस्कारकर जय शब्दका उच्चारण करती हुई अपने स्थानको चली गयीं ॥ ४२ ॥

ऐसे तो मेनाके प्रसन्न मुखमण्डलसे ही अथ तस्मै स्वपतये शशंस | हिमवान्‌को सारी बातोंकी जानकारी हो गयी, फिर भी स्वचिह्नबुद्धमिव सुवरं च तम् । । मेनाने अपने मुखसे वरदानकी सारी बात पुनरुक्त

वै सुवाचा पुनरुक्तया ॥ ४३ । वचनोंके समान हिमालयसे पुनः कह दीं ॥ ४३ ॥

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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५२३ शैलपतिर्हष्टोऽभवन्मेनावचो हि तत् । श्रुत्वा प्रशशंस प्रियां प्रीत्या शिवाभक्तिरतां च ताम् ॥

कालक्रमेणाथ तयोः प्रवृत्ते सुरते मुने ।

गर्भो बभूव मेनाया ववृधे प्रत्यहं च सः ॥

असूत सा नागवधूपभोग्यं सुतमुत्तमम् ।

समुद्रबद्धसत्सख्यं मैनाकाभिधमद्भुतम् ॥

वृत्रशत्रावपि क्रुद्धे वेदनाज्ञं सपक्षकम् ।

पविक्षतानां देवर्षे पक्षच्छिदि वराङ्गकम् ॥

प्रवरं शतपुत्राणां महाबलपराक्रमम् ।

स्वोद्भवानां महीध्राणां पर्वतेन्द्रैकधिष्ठितम् ॥

आसीन्महोत्सवस्तत्र हिमाचलपुरेऽद्भुतः ।

दम्पत्योः प्रमुदाधिक्यं बभूव क्लेशसंक्षयः ॥

दानं ददौ द्विजातिभ्योऽन्येभ्यश्च प्रददौ धनम् । शिवाशिवपदद्वन्द्वे स्नेहोऽभूदधिकस्तयोः मेनाका वचन सुनकर पर्वतराज [ हिमालय ] ४४ प्रसन्न हुए और उन्होंने शिवामें भक्ति रखनेवाली [ अपनी ] उन प्रियाकी प्रेमपूर्वक प्रशंसा की ॥ ४४ ॥

हे मुने! तत्पश्चात् कालक्रमसे ४५ सहवासमें प्रवृत्त होनेपर मेनाको गर्भ वह प्रतिदिन बढ़ने लगा ॥ ४५ ॥

समयानुसार उन्होंने एक उत्तम ४६ दिया, जिसका नाम मैनाक था । उसने उत्तम मैत्री की । वह अद्भुत पर्वत विहारका स्थल है ॥ ४६ ॥

उन दोनोंके रह गया और पुत्रको जन्म समुद्रके साथ नागवधुओंके हे देवर्षे! जिस समय इन्द्रने पर्वतोंपर क्रोधित होकर ४७ उनके पंख काटना प्रारम्भ किया, उस समय वज्रद्वारा कटे हुए पर्वतोंके पंखोंको देखकर वह मैनाक वेदनासे अनभिज्ञ ही रहा और पंखयुक्त ही रहा ॥४७ ॥

हिमालयके सौ पुत्रोंमें मैनाक सबसे श्रेष्ठ और ४८ । महाबल तथा पराक्रमसे युक्त था । अपने आप प्रकट हुए समस्त पर्वतोंमें एकमात्र मैनाक ही पर्वतराजके पदपर अधिष्ठित हुआ ॥ ४८ ॥

उस समय हिमालयके नगरमें महान् उत्सव ४ ९ हुआ । दोनों पति - पत्नी अत्यधिक प्रसन्नताको प्राप्त हुए और उनका क्लेश नष्ट हो गया ॥ ४ ९ ॥ उन्होंने ब्राह्मणोंको दान दिया तथा अन्य लोगोंको भी धन प्रदान किया । शिवाशिवके चरणयुगलमें उन ॥ ५० । दोनोंका अत्यधिक स्नेह हो गया ॥५० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे मेनावरलाभवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें मेनाकी वरप्राप्तिका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः देवी उमाका हिमवान्के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा स्तवन, देवीका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे वार्तालाप तथा पुनः नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] कुछ समय ब्रह्मोवाच बीतनेके पश्चात् उन पति - पत्नी दोनोंने देवताओंके अथ सस्मरतुर्भक्त्या दम्पती तौ भवाम्बिकाम् । कार्यके लिये जन्महेतु भक्तिपूर्वक जगदम्बाका

प्रसूतिहेतवे तत्र देवकार्यार्थमादरात् ॥ १ । स्मरण किया ॥ १ ॥

पृष्ठ 536

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५२४ ततः सा चण्डिका योगात्त्यक्तदेहा पुरा पितुः ईहया भवितुं भूयः समैच्छद् गिरिदारतः सत्यं विधातुं स्ववचः प्रसन्नाखिलकामदा पूर्णांशाच्छैलचित्ते सा विवेशाथ महेश्वरी विरराज ततः सोऽति प्रमदोऽपूर्वसुद्युतिः हुताशन इवाधृष्यस्तेजोराशिर्महामनाः ततो गिरिः स्वप्रियायां परिपूर्णं शिवांशकम् समाधिमत्वात्समये समधत्त सुशंकरे समधत्त गिरेः पत्नी गर्भं देव्याः प्रसादतः चित्ते स्थितायाः करुणाकरायाः सुखदं गिरेः गिरिप्रिया सर्वजगन्निवासासंश्रयाधिकम् विरेजे सुतरां मेना तेजोमण्डलगा सदा सुखोदयं स्वभर्तुश्च मेना दौर्हृदलक्षणम् दधौ निदानं देवानामानन्दस्येप्सितं शुभम् देहसादादसंपूर्णभूषणा लोध्रसंमुखा । स्वल्पभेन्दुक्षयेकासौ विचेष्यक्ष विभावरी तदाननं मृत्सुरभि नायं तृप्तिं गिरीश्वरः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ । इधर, अपने पिताके यज्ञमें योगद्वारा शरीरत्याग ॥ २ करने वाली भगवती चण्डिकाने हिमालयपत्नी मेनाके | गर्भसे जन्म लेनेका विचार किया । प्रसन्न होनेपर ॥ | सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली वे महेश्वरी । अपने ॥ । वचनको सत्य करनेके लिये पूर्ण अंशसे हिमवान्‌के चित्तमें प्रविष्ट हुईं ॥ २-३ ॥ ॥ उस समय महामनस्वी वे हिमालय प्रसन्नतासे ॥ ४ अपूर्व कान्तिसम्पन्न होकर अग्निके समान अधृष्य तथा तेजसमूहसे युक्त हो गये ॥४ ॥

। तत्पश्चात् समाधिसम्पन्न होनेसे गिरिराज ॥ ५ हिमालयने सुन्दर कल्याणकारी समयमें अपनी प्रिया मेनाके उदरमें शिवाके उस परिपूर्ण अंशका ध्यान किया ॥५ ॥

। इस तरह हिमालयकी पत्नीने हिमवान्‌के ॥ ६ हृदयमें विराजमान करुणा करनेवाली देवीकी कृपासे सुखदायक गर्भ धारण किया । सम्पूर्ण जगत्को । आश्रय देनेवाली उन देवीके गर्भमें आनेसे गिरिप्रिया ॥ ७ मेना सदा तेजोमण्डलके बीचमें स्थित होकर अधिक शोभा पाने लगी ॥ ६-७ ॥ । मेनाने अपने पतिको सुख देनेवाले तथा देवताओंके ॥ ८ आनन्दके कारणभूत शुभ अभीष्ट गर्भलक्षणको धारण किया । शरीरके अधिक दुर्बल होनेके कारण उन्होंने सभी आभूषणोंको उतार दिया, उनका मुखमण्डल ॥ ९ लोध समान [ श्वेत वर्ण ] हो गया और वे प्रभात-कालीन चन्द्रमाके प्रकाशके क्षीण हो जानेसे अल्प तारागणोंवाली रात्रिके समान दीखने लगीं ॥ ८ - ९ ॥ गिरिराज मिट्टीके समान सुगन्धित उनके मुने रहस्युपाघ्राय प्रेमाधिक्यं बभूव तत् ॥ १० मुखमण्डलको एकान्तमें सूँघकर तृप्त नहीं होते थे

मेना स्पृहावती केषु न मे शंसति वस्तुषु ।

किंचिदिष्टं ह्रियापृच्छदनुवेलं सखीर्गिरिः ॥

उपेत्य दौर्हृदं शैल्यं यद्वव्रेऽपश्यदाशु तत् ।

आनीतं नेष्टमस्याद्धा नासाध्यं त्रिदिवेऽपि हि ॥

और [ गर्भवती होनेके कारण दिनानुदिन ] मेनामें । । उनका प्रेमाधिक्य होने लगा । वे हिमालय मेनाकी ११ सखियोंसे सदा यह पूछते रहते थे कि मेनाको किन वस्तुओंकी इच्छा है । वह लज्जाके कारण अपना कुछ भी इष्ट मुझसे नहीं बताती है ॥ १०-११ ॥ कष्टप्रद गर्भलक्षणके प्राप्त कर लेनेपर वे मेना जिस | वस्तुके लिये कहती थीं, उसे अपने सामने गिरिराजके | द्वारा उपस्थित हुआ देखती थीं; क्योंकि उनकी इच्छित १२ । कोई भी वस्तु तीनों लोकोंमें दुर्लभ नहीं थी ॥ १२ ॥

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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५२५

प्रचीयमानावयवा निस्तीर्य दौर्हृदव्यथाम् ।

रेजे मेना बाललता नद्धपत्राधिका यथा ॥ १३

गिरिः सगर्भां महिषीममंस्त धरणीमिव ।

निधानगर्भामभ्यन्तर्लीनवह्निशमीमिव ॥ १४

प्रियाप्रीतेश्च मनसः स्वार्जितद्रविणस्य च ।

समुन्नतेः श्रुतेः प्राज्ञः क्रियाश्चक्रे यथोचिताः ॥ १५

ददर्श काले मेनां स प्रतीतः प्रसवोन्मुखीम् ।

अभ्रितां च दिवं गर्भगृहे भिषगधिष्ठिते ॥ १६

दृष्ट्वा प्रियां शुभाङ्गीं वै मुमोदाति गिरीश्वरः ।

गर्भस्थजगदम्बां हि महातेजोवतीं तदा ॥ १७

तस्मिन्नवसरे देवा मुने विष्ण्वादयस्तथा ।

मुनयश्च समागम्य गर्भस्थां तुष्टुवुः शिवाम् ॥ १८

देवा ऊचुः

दुर्गे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब महेश्वरि ।

सत्यव्रते सत्यपरे त्रिसत्ये सत्यरूपिणि ॥ १ ९

सत्यस्थे सत्यसुप्रीते सत्ययोने च सत्यतः ।

सत्यवक्त्रे सत्यनेत्रे प्रपन्नाः शरणं च ते ॥ २०

शिवप्रिये महेशानि देवदुःखक्षयङ्करि ।

त्रैलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तवत्सला ॥ २१

आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्यं कुरुष्व ह ।

सनाथाः कृपया ते हि वयं सर्वे महेश्वरि ॥ २२

त्वत्तः सर्वे च सुखिनो लभन्ते सुखमुत्तमम् ।

त्वां विना न हि किंचिद्वै शोभते त्रिभवेष्वपि ॥ २३

ब्रह्मोवाच

इत्थं कृत्वा महेशान्या गर्भस्थाया बहुस्तुतिम् ।

प्रसन्नमनसो देवाः स्वं स्वं धाम ययुस्तदा ॥ २४

व्यतीते नवमे मासे दशमे मासि पूर्णतः ।

गर्भस्था सा गतिं दध्रे कालिका जगदम्बिका ॥ २५

धीरे - धीरे गर्भजन्य व्यथाको पारकर पुष्ट अंगोंवाली वह मेना पत्तोंसे समन्वित बाललताके समान शोभित होने लगी । हिमालयने अपनी सगर्भा पत्नीको रत्नभण्डारको अपने भीतर छिपाये रखनेवाली पृथ्वी और अग्निको अपने भीतर छिपाये रखनेवाले शमी वृक्षके समान समझा ॥ १३-१४ ॥ महाबुद्धिमान् हिमालयने अपनी प्रियाके प्रीतियोग्य, अपने द्वारा अर्जित द्रव्योंके अनुसार, राजसी प्रवृत्तिं एवं अपने शास्त्रज्ञानके अनुरूप संस्कार किये ॥ १५ ॥

उन्होंने प्रसवोन्मुखी अपनी प्रियाको वैद्योंके द्वारा निर्दिष्ट गर्भगृहमें मेघमण्डलसे आच्छादित आकाशके समान देखा । शुभ लक्षणोंवाली, गर्भमें जगदम्बाको धारण करनेवाली, महातेजयुक्त तथा सुन्दर अंगोंवाली प्रिया मेनाको देखकर गिरिराज हिमवान् बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे॥१६-१७ ॥ हेमुने! उस समय विष्णु आदि देवता तथा मुनिगण आकर गर्भमें स्थित शिवाकी स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥

देवगण बोले- हे दुर्गे! हे प्राज्ञे! हे जगदम्बे! हे महेश्वरि! हे सत्यव्रते! हे सत्यपरे! हे त्रिसत्ये! हे सत्य - स्वरूपिणि! आपकी जय हो, आपकी जय हो । हे सत्यस्थे! हे सत्यसुप्रीते! हे सत्ययोने! हे सत्यवक्त्रे! हे सत्यनेत्रे! हम सभी आपकी शरणमें प्राप्त हुए हैं ॥ १ ९ -२० ॥ हे शिवप्रिये! हे महेश्वरि! देवताओंके दुःखको दूर करनेवाली! आप तीनों लोकोंकी माता, शर्वाणी, सर्वव्यापिनी तथा भक्तोंसे स्नेह रखनेवाली हैं । हे त्रिलोकेशि! आप प्रकट होकर देवगणोंके कार्यको पूर्ण करें । हे महेश्वरि! हम सभी देवगण आपकी कृपासे सनाथ हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥ इस संसारके सभी सुखी मनुष्य आपके द्वारा ही उत्तम सुख प्राप्त करते हैं, आपके बिना इस त्रिलोकमें कुछ भी शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सभी देवगण प्रसन्न-चित्त होकर गर्भस्थित महेश्वरीकी बहुत स्तुति करके अपने - अपने धामको चले गये । जब नौवाँ महीना बीत गया और दसवाँ भी पूरा हो चला, तब गर्भस्थित जगदम्बा । महाकालीने गर्भसे बाहर आनेकी इच्छा की ॥ २४-२५ ॥

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५२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

तदा सुसमयश्चासीच्छान्तभग्रहतारकः ।

नभः प्रसन्नतां यातं प्रकाशः सर्वदिक्षु हि ॥ २६

मही मङ्गलभूयिष्ठा सवनग्रामसागरा ।

सरःस्रवन्तीवापीषु पुफुल्लुः पंकजानि वै ॥ २७

ववुश्च विविधा वाताः सुखस्पर्शा मुनीश्वर ।

मुमुदुः साधवः सर्वेऽसतां दुःखमभूद् द्रुतम् ॥ २८

दुन्दुभीन्वादयामासुर्नभस्यागत्य निर्जराः ।

पुष्पवृष्टिरभूत्तत्र जगुर्गन्धर्वसत्तमाः ॥ २ ९

विद्याधरस्त्रियो व्योम्नि ननृतुश्चाप्सरास्तथा ।

तदोत्सवो महानासीद्देवादीनां नभःस्थले ॥ ३०

तस्मिन्नवसरे देवी पूर्वशक्ति: शिवा सती ।

आविर्बभूव पुरतो मेनाया निजरूपतः ॥ ३१

वसन्तत मधौ मासे नवम्यां मृगधिष्ण्यके ।

अर्धरात्रे समुत्पन्ना गङ्गेव शशिमण्डलात् ॥ ३२

समये तत्स्वरूपेण मेनकाजठराच्छिवा ।

समुद्धूय समुत्पन्ना सा लक्ष्मीरिव सागरात् ॥ ३३

ततस्तस्यां तु जातायां प्रसन्नोऽभूत्तदा भवः ।

अनुकूलो ववौ वायुर्गम्भीरो गंधयुक् शुभः ॥ ३४

बभूव पुष्पवृष्टिश्च तोयवृष्टिपुरस्सरम् ।

जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जगर्जुश्च तदा घनाः ॥ ३५

तस्यां तु जायमानायां सर्वस्वं समपद्यत ।

हिमवन्नगरे तत्र सर्वं दुःखं क्षयं गतम् ॥ ३६

तस्मिन्नवसरे तत्र विष्ण्वाद्याः सकलाः सुराः ।

आजग्मुः सुखिनः प्रीत्या ददृशुर्जगदम्बिकाम् ॥ ३७

तुष्टुवुस्तां शिवामम्बां कालिकां शिवकामिनीम् । ।

दिव्यरूपां महामायां शिवलोकनिवासिनीम् ॥ ३८

देवा ऊचुः |

जगदम्ब महादेवि सर्वसिद्धिविधायिनि । ।

देवकार्यकरी त्वं हि सदातस्त्वां नमामहे ॥ ३ ९ ।

६ वह समय बड़ा सुहावना हो गया, नक्षत्र, तारे तथा ग्रह शान्त हो गये, आकाश निर्मल हो गया और सभी । दिशाओंमें प्रकाश फैल गया । वन, ग्राम तथा सागरके । सहित पृथ्वीपर नाना प्रकारके मंगल होने लगे । तालाब नदियों एवं बावलियोंमें कमल खिल उठे ॥ २६-२७, ॥ हे मुनीश्वर! अनेक प्रकारकी सुखस्पर्शी वायु बहने लगी, सभी साधुजन आनन्दित हो गये तथा दुर्जन शीघ्र ही दुखी हो गये ॥२८ ॥

देवता आकाशमें आकर दुन्दुभियाँ बजाने लगे, वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी तथा श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे । अप्सराएँ और विद्याधरोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाचने लगीं, इस प्रकार आकाशमण्डलमें देवताओं आदिका महान् उत्सव होने लगा ॥२ ९ -३० ॥ उसी अवसरपर आद्याशक्ति सती शिवा देवी मेनाके सामने अपने रूपमें प्रकट हुईं ॥३१ ॥

वे वसन्त ऋतुके चैत्रमासमें नवमी तिथिको मृगशिरा नक्षत्रमें आधी रातके समय चन्द्रमण्डलसे गंगाकी भाँति प्रकट हुईं । वे शिवा मेनाके गर्भ से अपने स्वरूपसे इस प्रकार प्रकट हुईं, जैसे समुद्रसे महालक्ष्मीका आविर्भाव हुआ था ॥ ३२-३३ ॥ उस समय भगवतीके प्रकट होनेपर शंकरजी प्रसन्न हो गये और अनुकूल, गम्भीर, सुगन्धित तथा शुभ वायु बहने लगी । उस समय जलकी वर्षाके साथ पुष्पवृष्टि होने लगी, [ अग्निहोत्रकी ] शान्त अग्नि प्रज्वलित हो उठी और बादल गरजने लगे ॥ ३४-३५ ॥ उनके प्रकट होते ही हिमालयके नगरमें समस्त सम्पत्ति स्वतः आ गयी तथा [ लोगोंका ] सारा दुःख दूर हो गया ॥ ३६ ॥

उस अवसरपर विष्णु आदि समस्त देवगण सुखी होकर वहाँ आ गये और प्रेमसे जगदम्बाका दर्शन करने लगे । वे शिवलोकमें निवास करनेवाली | शिवप्रिया महाकाली दिव्यरूपधारिणी उन महामाया जगदम्बाकी स्तुति करने लगे ॥ ३७-३८ ॥ देवता बोले- हे जगदम्ब! हे महादेवि! हे सर्वसिद्धिविधायिनि! आप देवताओंका कार्य पूर्ण करनेवाली हैं, इसलिये हम सभी आपको सदा प्रणाम करते हैं ॥ ३ ९ ॥

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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५२७

सर्वथा कुरु कल्याणं देवानां भक्तवत्सले ।

मेनामनोरथः पूर्णः कृतः कुरु हरस्य च ॥

ब्रह्मोवाच

इत्थं स्तुत्वा शिवां देवा विष्ण्वाद्याः सुप्रणम्य ताम् ।

स्वं स्वं धाम ययुः प्रीताः शंसन्तस्तद्गतिं पराम् ॥

तां तु दृष्ट्वा तथा जातां नीलोत्पलदलप्रभाम् ।

श्यामां सा मेनका देवीं मुदमायाति नारद ॥

दिव्यरूपं विलोक्यानु ज्ञानमाप गिरिप्रिया ।

विज्ञाय परमेशानीं तुष्टावातिप्रहर्षिता ॥

मेनोवाच

जगदम्ब महेशानि कृतातिकरुणा त्वया ।

आविर्भूता मम पुरो विलसन्ती यदम्बिके ॥

त्वमाद्या सर्वशक्तीनां त्रिलोकजननी शिवे ।

शिवप्रिया सदा देवी सर्वदेवस्तुता परा ॥

कृपां कुरु महेशानि मम ध्यानस्थिता भव ।

एतद्रूपेण प्रत्यक्षं रूपं धेहि सुतासमम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्या मेनाया भूधरस्त्रियाः ।

प्रत्युवाच शिवा देवी सुप्रसन्ना गिरिप्रियाम् ॥

देव्युवाच

हे मेने त्वं पुरा मां च सुसेवितवती रता ।

त्वद्भक्त्या सुप्रसन्नाहं वरं दातुं गतान्तिकम् ॥

वरं ब्रूहीति मद्वाणीं श्रुत्वा ते तद्वरो वृतः सुता भव महादेवि सा मे देवहितं कुरु तथा दत्त्वा वरं तेऽहं गता स्वं पदमादरात् । समयं प्राप्य तनयाभवं ते गिरिकामिनि दिव्यरूपं धृतं मेऽद्य यत्ते मत्स्मरणं भवेत् अन्यथा मर्त्यभावेन तवाज्ञानं भवेन्मयि हे भक्तवत्सले! आप हर प्रकारसे देवताओंका ४० कल्याण करें । आपने मेनाका मनोरथ पूर्ण किया है, अब शिवका भी मनोरथ पूर्ण करें ॥ ४० ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार विष्णु आदि देवता शिवाकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करके उनकी परम गतिकी ४१ प्रशंसा करते हुए अपने - अपने धामको चले गये ॥ ४१ ॥

हे नारद! नीलकमलके दलके समान कान्तिमयी ४२ उन श्यामा भगवतीको उत्पन्न हुआ देखकर मेना परम प्रसन्न हो गयीं । उस दिव्य रूपको देखकर गिरिप्रिया मेनाको ज्ञान प्राप्त हो गया । वे उन्हें ४३ परमेश्वरी जानकर अत्यन्त हर्षित होकर उनकी स्तुति करने लगीं॥४२-४३ ॥ मेना बोलीं – हे जगदम्बे! हे महेश्वरि! हे अम्बिके! आपने बड़ी कृपा की, जो सुशोभित होती ४४ हुई मेरे सामने प्रकट हुईं । हे शिवे! आप सम्पूर्ण शक्तियोंमें आद्याशक्ति तथा तीनों लोकोंकी जननी हैं । हे देवि! आप भगवान् शिवको सदा ही प्रिय हैं तथा ४५ सम्पूर्ण देवताओंसे स्तुत पराशक्ति हैं । हे महेश्वरि! आप कृपा करें और इसी रूपसे मेरे ध्यानमें स्थित हो जायँ और अब मेरी पुत्रीके समान प्रत्यक्ष रूप धारण ४६ | करें ॥ ४४–४६ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] पर्वतपत्नी उन मेनाकी यह बात सुनकर शिवा देवी अत्यन्त प्रसन्न ४७ होकर उन गिरिप्रियासे कहने लगीं ॥४७ ॥

देवी बोलीं- हे मेने! आपने पहले तत्पर होकर मेरी बड़ी सेवा की थी, [ उस समय ] आपकी ४८ भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न होकर वर देनेके लिये मैं आपके पास गयी थी । वर माँगिये - मेरी इस वाणीको सुनकर आपने वह वर माँगा था - हे महादेवि! आप ॥ ४ ९ मेरी पुत्री हो जायँ और देवताओंका हित साधन करें । तब मैं आपको आदरपूर्वक वह वर देकर अपने धामको चली गयी । हे गिरिकामिनि! अब समय ॥ ५० पाकर मैं आपकी पुत्री हुई हूँ ॥ ४८-५० ॥ आज मैंने जो दिव्य रूप धारण किया है, वह इसलिये कि आपको मेरा स्मरण हो जाय, अन्यथा । मनुष्यरूपमें प्रकट होनेपर मेरे विषयमें आप अनजान ॥ ५१ । ही बनी रहतीं ॥५१ ॥

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५२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

युवां मां पुत्रिभावेन दिव्यभावेन वासकृत् ।

चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यातास्थो मद्गतिं पराम् ॥ ५२

देवकार्यं करिष्यामि लीलां कृत्वाद्भुतां क्षितौ ।

शम्भुपत्नी भविष्यामि तारयिष्यामि सज्जनान् ॥ ५३

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वासीच्छिवा तूष्णीमम्बिका स्वात्ममायया ।

पश्यन्त्यां मातरि प्रीत्या सद्योऽभूत्तनयातनुः ॥ ५४ ।

७ अब आप दोनों पुत्रीभावसे अथवा दिव्य भावसे स्नेहपूर्वक मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरे परम । पदको प्राप्त होओगे । मैं पृथ्वीपर अद्भुत लीला करके देवताओंका कार्य सिद्ध करूँगी, भगवान् शम्भुकी पत्नी होऊँगी और सज्जनोंका उद्धार करूँगी ॥ ५२-५३ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर अम्बिका शिवा ॥ मौन हो गयीं और उसी क्षण माताके देखते - देखते अपनी मायासे प्रसन्नतापूर्वक [ नवजात ] पुत्रीरूपमें हो गयीं ॥ ५४ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीजन्मवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीके जन्मका वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः पार्वतीका नामकरण तथा ब्रह्मोवाच

ततो मेनापुरः सा वै सुता भूत्वा महाद्युतिः ।

चकार रोदनं तत्र लौकिकीं गतिमाश्रिता ॥

अरिष्टशय्यां परितः सद्विसारिसुतेजसा ।

निशीथदीपा विहतत्विष आसन्नरं मुने ॥

श्रुत्वा तद् रोदनं रम्यं गृहस्थाः सर्वयोषितः ।

जहृषुः सम्भ्रमात्तत्रागताः प्रीतिपुरस्सराः ॥

तच्छ्रुद्धान्तचरः शीघ्रं शशंस भूभृते तदा ।

पार्वतीजन्म सुखदं देवकार्यकरं शुभम् ॥

तच्छुद्धान्तःचरायाशु पुत्रीजन्म सुशंसते ।

सितातपत्रं नादेयमासीत्तस्य महीभृतः ॥

गतस्तत्र गिरिः प्रीत्या सपुरोहितसद्विजः ।

ददर्श तनयां तां तु शोभमानां सुभाससा ॥

नीलोत्पलदलश्यामां सुद्युतिं सुमनोरमाम् ।

दृष्ट्वा च तादृशीं कन्यां मुमोदाति गिरीश्वरः ॥

सर्वे च मुमुदुस्तत्र पौराश्च पुरुषाः स्त्रियः ।

तदोत्सवो महानासीन्नेदुर्वाद्यानि भूरिशः ॥

उनकी बाललीलाएँ एवं विद्याध्ययन ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] तदनन्तर मेनाके सामने महातेजस्वी कन्या होकर वे लौकिक गतिका १ आश्रय लेकर रोने लगीं । हे मुने! उस समय प्रसूति-गृहकी शय्याके चारों ओर फैले हुए उनके महान् तेजसे २ रात्रिके दीपक शीघ्र ही कान्तिहीन हो गये ॥ १-२ ॥ उनका मनोहर रुदन सुनकर घरकी सब स्त्रियाँ ३ प्रसन्न हो गयीं और शीघ्र ही प्रेमपूर्वक वहाँ चली आयीं ॥ ३ ॥

तब अन्तःपुरके दूतने देवकार्य सम्पन्न करनेवाले, ४ कल्याणकारक तथा सुख देनेवाले पार्वतीजन्मको शीघ्र ही पर्वतराजको बताया । पुत्रीजन्मका समाचार सुनानेवाले अन्तःपुरके दूतको [ न्योछावररूपमें ] देनेहेतु ५ उन पर्वतराजके लिये श्वेतछत्रतक अदेय नहीं रहा । | तत्पश्चात् पुरोहित और ब्राह्मणोंके साथ गिरिराज | वहाँ गये और उन्होंने अपूर्व कान्तिसे सुशोभित हुई ६ उस कन्याको देखा ॥४-६ ॥ नीलकमलके समान श्यामवर्ण, सुन्दर कान्ति ७ युक्त तथा अत्यन्त मनोरम उस कन्याको देखकर ही गिरिराज अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ७ ॥

नगरमें रहनेवाले समस्त स्त्री एवं पुरुष परम । प्रसन्न हुए । इस समय नगरमें अनेक प्रकारके बाजे ८ बजने लगे और बहुत बड़ा उत्सव होने लगा ।