शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 611–620
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५ ९९
किमर्थं संस्मृता नाथ शासनं देहि तद्धि नः ।
स्वदाससदृशीं स्वामिन्कृपां कुरु नमोऽस्तु ते ॥ ११
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य मुनीनां तु विज्ञप्तिं करुणानिधिः ।
प्रोवाच विहसन्प्रीत्या प्रोत्फुल्लनयनाम्बुजः ॥ १२
महेश्वर उवाच
हे सप्तमुनयस्ताताः शृणुतारं वचो मम ।
अस्मद्धितकरा यूयं सर्वज्ञानविचक्षणाः ॥ १३
तपश्चरति देवेशी पार्वती गिरिजाधुना ।
गौरीशिखरसंज्ञे हि पर्वते दृढमानसा ॥ १४
मां पतिं प्राप्तुकामा हि सा सखीसेविता द्विजाः ।
सर्वान्कामान्विहायान्यान्परं निश्चयमागता ॥ १५
तत्र गच्छत यूयं मच्छासनान्मुनिसत्तमाः ।
परीक्षां दृढतायास्तत्कुरुत प्रेमचेतसः ॥ १६
सर्वथा छलसंयुक्तं वचनीयं वचश्च वः ।
न संशयः प्रकर्तव्यः शासनान्मम सुव्रताः ॥ १७
ब्रह्मोवाच
इत्याज्ञप्ताश्च मुनयो जग्मुस्तत्र द्रुतं हि ते ।
यत्र राजति सा दीप्ता जगन्माता नगात्मजा ॥ १८
तत्र दृष्टा शिवा साक्षात्तपः सिद्धिरिवापरा ।
मूर्ता परमतेजस्का विलसन्ती सुतेजसा ॥ १ ९
हृदा प्रणम्य तां ते तु ऋषयस्सप्त सुव्रताः ।
सन्नता वचनं प्रोचुः पूजिताश्च विशेषतः ॥ २०
ऋषय ऊचुः
शृणु शैलसुते देवि किमर्थं तप्यते तपः ।
इच्छसि त्वं सुरं कं च किं फलं तद्वदाधुना ॥ २१
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सा शिवा देवी गिरीन्द्रतनया द्विजैः ।
प्रत्युवाच वचः सत्यं सुगूढमपि तत्पुरः ॥ २२
पार्वत्युवाच
मुनीश्वराः संशृणुत मद्वाक्यं प्रीतितो हृदा ।
ब्रवीमि स्वविचारं वै चिंतितो यो धिया स्वया ॥ २३
हे नाथ! आपने किसलिये स्मरण किया है, हम-लोगोंको आज्ञा दीजिये । हे स्वामिन्! अपने दासके समान ही हमलोगोंपर कृपा कीजिये, आपको प्रणाम है ॥ ११ ॥
ब्रह्माजी बोले – मुनियोंकी इस विज्ञप्तिको सुनकर विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले वे करुणानिधि हँसते हुए प्रेमपूर्वक कहने लगे— ॥ १२ ॥
महेश्वर बोले — हे सप्तर्षिगण! आपलोग सभी प्रकारके ज्ञानमें विचक्षण हैं तथा मेरा हित करनेवाले हैं । हे तात! मेरी बात शीघ्र सुनिये ॥१३ ॥
इस समय गौरीशिखर नामक पर्वतपर देवेशी पार्वती गिरिजा अत्यन्त दृढ़ चित्तसे तपस्या कर रही है ॥१४ ॥
हे ऋषियो! सखियोंसे सेवित उसने अपनी समस्त कामनाओंका त्यागकर बड़ी दृढ़ताके साथ मुझे अपना पति बनानेके लिये निश्चय कर लिया है ॥ १५ ॥
हे मुनिश्रेष्ठो! आपलोग मेरी आज्ञासे वहाँ जाइये । और उसके प्रेम एवं दृढ़ताकी परीक्षा कीजिये ॥ १६ ॥
हे सुव्रतो! मेरी आज्ञा है कि आपलोग उससे सर्वथा छलयुक्त वचन कहिये, इसमें संशय न कीजिये ॥ १७ ॥
ब्रह्माजी बोले- शिवजीकी आज्ञा प्राप्तकर मुनिगण उसी समय उस स्थानपर गये, जहाँ जगन्माता पार्वती तपस्या कर रही थीं । उन लोगोंने वहाँ साक्षात् दूसरी तप: सिद्धिके समान, तेजसे देदीप्यमान और परमतेजकी मूर्तिस्वरूपा पार्वतीको देखा॥१८-१९ ॥ हे सुव्रतो! उन सप्तर्षियोंने हृदयसे पार्वतीको प्रणाम करके उनसे विशेष रूपसे सत्कृत हो विनम्र होकर यह वचन कहा— ॥२० ॥
ऋषिगण बोले- हे शैलसुते! देवि! सुनो, तुम किस उद्देश्यसे तपस्या कर रही हो? तुम किस देवताको प्रसन्न करना चाहती हो और क्या फल चाहती हो, उसे इस समय बताओ ॥२१ ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] जब उन सप्तर्षियोंने इस प्रकार देवी पार्वतीसे कहा, तब वे सत्य तथा अत्यन्त गोपनीय वचन उनके सामने कहने लगीं— ॥ २२ ॥
पार्वती बोलीं- हे मुनीश्वरो! मैंने अपनी बुद्धिसे जो विचार किया है, उसे आपके समक्ष प्रकट करती हूँ । आपलोग प्रेमपूर्वक मेरी बात सुनें ॥ २३ ॥
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६०० करिष्यथ प्रहासं मे श्रुत्वा वाचो ह्यसंभवाः संकोचो वर्णनाद्विप्रा भवत्येव करोमि किम् ॥ इदं मनो हि सुदृढमवशं परकर्मकृत् जलोपरि महाभित्तिं चिकीर्षति महोन्नताम् सुरर्षेः शासनं प्राप्य करोमि सुदृढं तपः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ । हे विप्रो! आपलोग मेरी असम्भव बात सुनकर २४ परिहास करेंगे, इसलिये उसे कहने में भी मुझे संकोच हो रहा है, पर मैं क्या करूँ? आपलोगोंके पूछने पर कह रही हूँ ॥२४ ॥
। मेरा यह मन बड़ी दृढ़तासे हठपूर्वक दूसरेके ॥ २५ वशमें हो गया है और जलके ऊपर बहुत ऊँची दीवार उठाना चाहता है । सदाशिव ही पति हों — ऐसा । मनोरथ लेकर देवर्षि नारदकी आज्ञा प्राप्त करके मैं रुद्रः पतिर्भवेन्मे हि विधायेति मनोरथम् ॥ २६ अति कठोर व्रत कर रही हूँ । इसमें मेरे मनरूपी अपक्षो मन्मनःपक्षी व्योम्नि उड्डीयते हठात् तदाशां शंकरः स्वामी पिपर्त्तु करुणानिधिः ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्या विहस्य मुनयश्च ते । सम्मान्य गिरिजां प्रीत्या प्रोचुश्छलवचो मृषा ऋषय ऊचुः
न ज्ञातं तस्य चरितं वृथापण्डितमानिनः ।
देवर्षेः: क्रूरमनसः सुज्ञा भूत्वाप्यगात्मजे ॥
नारदः कूटवादी च परचित्तप्रमथकः ।
तस्य वार्ताश्रवणतो हानिर्भवति सर्वथा ॥
तत्र त्वं शृणु सद्बुद्ध्या चेतिहासं सुशोभितम् । क्रमात्त्वां बोधयंतो हि प्रीत्या तमुपधारय
ब्रह्मपुत्रो हि यो दक्षः सुषुवे पितुराज्ञया ।
स्वपल्यामयुतं पुत्रानयुंक्त तपसि प्रियान् ॥
ते सुताः पश्चिमदिशि नारायणसरो गताः । तपोऽर्थे ते प्रतिज्ञाय नारदस्तत्र वै ययौ
कूटोपदेशमाश्राव्य तत्र तान्नारदो मुनिः ।
तदाज्ञया च ते सर्वे पितुन गृहमाययुः ॥
तच्छ्रुत्वा कुपितो दक्षः पित्राश्वासितमानसः । उत्पाद्य पुत्रान्प्रायुङ्क्त सहस्त्रप्रमितांस्ततः
तेऽपि तत्र गताः पुत्राः तपोऽर्थं पितुराज्ञया ।
नारदोऽपि ययौ तत्र पुनस्तत्स्वोपदेशकृत् ॥
पक्षीको यद्यपि पंख नहीं हैं, फिर भी यह हठपूर्वक । आकाशमें उड़ना चाहता है । करुणासागर स्वामी ॥ २७ शंकर मेरी उस आशाको पूर्ण करें॥२५–२७ ॥ ब्रह्माजी बोले – उनकी यह बात सुनकर वे मुनि गिरिजाका सम्मान करके हँसकर प्रेमपूर्वक ॥ २८ मिथ्या तथा छलयुक्त वचन कहने लगे ॥ २८ ॥
ऋषिगण बोले- हे पर्वतराजपुत्रि! बुद्धिमती होकर भी तुमने व्यर्थ ही अपनेको पण्डित माननेवाले तथा क्रूर २ ९ चित्तवाले उस देवर्षि नारदका चरित्र नहीं जाना है ॥ २ ९ ॥ वह नारद तो मिथ्यावादी और दूसरेके चित्तको ३० भुलावेमें डालनेवाला है, उसकी बात सुननेसे सर्वथा हानि ही होती है । उस नारदके सम्बन्धमें एक सुन्दर इतिहास हमलोग कह रहे हैं, उसको तुम उत्तम ॥ ३१ बुद्धिसे सुनो और प्रेमपूर्वक उसे अपने हृदयमें धारण करो ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माके पुत्र दक्षने अपने पिताकी आज्ञासे अपनी ३२ पत्नीसे दस हजार प्रिय पुत्र उत्पन्न किये और उनको । तपस्यामें नियुक्त किया । तपस्याके लिये प्रतिज्ञा करके ॥ ३३ वे दक्षपुत्र पश्चिम दिशामें नारायण सरोवरपर गये, नारद । भी वहाँ पहुँच गये । उन नारदने उन्हें मिथ्या उपदेश | देकर विरक्त कर दिया और उनकी आज्ञासे वे पुनः ३४ अपने पिताके घर लौटकर नहीं आये ॥ ३२-३४ ॥ हो यह समाचार सुनकर दक्ष अत्यन्त व्याकुल ॥ ३५ उठे । ब्रह्मदेवने उन्हें धैर्य प्रदान किया । तदनन्तर उन्होंने भी पुनः एक हजार पुत्र उत्पन्न किये और उन पुत्रोंको । तपकार्यमें नियुक्त किया । वे भी अपने पिताकी आज्ञा गये. वहीं तप करनेके लिये गये । पुनः नारद वहाँ पहुँच ३६ । और उन्हें भी अपना उपदेश दिया ॥ ३५-३६ ॥
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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६०१
ददौ तदुपदेशं ते तेभ्यो भ्रातृपथं ययुः ।
आययुर्न पितुर्गेहं भिक्षुवृत्तिरताश्च ते ॥ ३७
इत्थं नारदसद्वृत्तिर्विश्रुता शैलकन्यके ।
अन्यां शृणु हि तद्वृत्तिं वैराग्यकरणीं नृणाम् ॥ ३८
विद्याधरश्चित्रकेतुर्यो बभूव पुराकरोत् ।
स्वोपदेशमयं दत्त्वा तस्मै शून्यं च तद्गृहम् ॥ ३ ९
प्रह्लादाय स्वोपदेशान्हिरण्यकशिपोः परम् ।
दत्त्वा दुःखं ददौ चायं परबुद्धिप्रभेदकः ॥ ४०
मुनिना निजविद्या यच्छ्राविता कर्णरोचना ।
स स्वगेहं विहायाशु भिक्षां चरति प्रायशः ॥ ४१
नारदो मलिनात्मा हि सर्वदोज्ज्वलदेहवान् ।
जानीमस्तं विशेषेण वयं तत्सहवासिनः ॥ ४२
बकं साधुं वर्णयन्ति स मत्स्यानत्ति सर्वथा ।
सहवासी विजानीयाच्चरित्रं सहवासिनाम् ॥ ४३
लब्ध्वा तदुपदेशं हि त्वमपि प्राज्ञसंमता ।
वृथैव मूर्खीभूता त्वं तपश्चरसि दुष्करम् ॥ ४४
यदर्थमीदृशं बाले करोषि विपुलं तपः ।
सोदासीनो निर्विकारो मदनारिर्न संशयः ॥ ४५
अमङ्गलवपुर्धारी निर्लज्जोऽसदनोऽकुली ।
कुवेषी प्रेतभूतादिसङ्गी नग्नो हि शूलभृत् ॥ 11 ४६
स धूर्तस्तव विज्ञानं विनाश्य निजमायया ।
मोहयामास सयुक्त्या कारयामास वै तपः ॥ ४७
ईदृशं हि वरं लब्ध्वा किं सुखं संभविष्यति ।
विचारं कुरु देवेशि त्वमेव गिरिजात्मजे ॥ ४८
[ उसका उपदेश मानकर ] वे भी अपने भाइयोंके मार्गपर चले गये और भिक्षावृत्तिमें संलग्न हो गये । वे पुनः अपने पिताके घर नहीं आये । नारदका यह चरित्र है, जो जगत्में प्रसिद्ध है । हे शैलपुत्रि! मनुष्योंको विरक्त करनेवाले उनके अन्य चरित्रको भी सुनो ॥ ३७-३८ ॥ पूर्व समयमें एक विद्याधर था, जो चित्रकेतु नामका राजा हुआ था । उसको भी इसी नारदने उपदेश देकर उसका घर सूना कर दिया । प्रह्लादको उपदेश देकर हिरण्यकशिपुसे नाना प्रकारके दुःख दिलवाये । इस प्रकार वह [ उलटा उपदेश देकर ] दूसरोंकी बुद्धि फेर देता है ॥३ ९ -४० ॥ इस नारदने कानोंको प्रिय लगनेवाली अपनी विद्या जिन - जिन लोगोंको सुनायी, वे शीघ्र ही प्रायः अपना घर छोड़कर भिक्षा माँगने लगे ॥४१ ॥
वे नारद यद्यपि देखनेमें बड़े सज्जन लगते हैं, किंतु उनका मन मलिन है, हमलोग उनके साथ रहनेके कारण उनका चरित्र विशेषरूपसे जानते हैं ॥ ४२ ॥
बगुले श्वेत वर्ण शरीरको देखकर सब लोग उसे साधु कहते हैं । फिर भी क्या वह मछली नहीं खाता । साथमें रहनेवाला ही साथ रहनेवालोंका [ वास्तविक ] चरित्र जानता है ॥४३ ॥
तुम तो परम बुद्धिमती हो, फिर कैसे उनके उपदेशमें फँसकर मूर्खोकी तरह कठिन तपस्यामें लग गयी!॥ ४४ ॥
हे बाले! यह परम दुःखकी बात है कि तुम जिसे अपना पति बनानेके लिये इतना कठिन तप कर रही हो, वह कामदेवका शत्रु है और उदासीन तथा निर्विकार है ॥४५ ॥
वह अमंगल वेष धारण करनेवाला शिव निर्लज्ज है, उसके घरका तथा कुलका आज तक किसीको पता नहीं है, वह कुवेषी, भूत एवं प्रेतादिका साथ करनेवाला, त्रिशूल धारण करनेवाला और नग्न रहनेवाला है ॥४६ ॥
उस धूर्त नारदने अपनी मायासे तुम्हारे ज्ञानको नष्ट करके बड़ी युक्तिसे तुम्हें मोहित कर दिया और तुमसे तपस्या करवायी ॥ ४७ ॥
ऐसे वरको प्राप्तकर तुम्हें क्या सुख मिलेगा? । हे देवेशि! हे पार्वति! तुम्हीं विचार करो ॥ ४८ ॥
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६०२ प्रथमं दक्षजां साध्वीं विवाह्य सुधिया सतीम् निर्वाहं कृतवान्नैव मूढः किंचिद्दिनानि हि तां तथैव स वै दोषं दत्त्वात्याक्षीत् स्वयं प्रभुः ध्यायन्स्वरूपमकलमशोकमरमत्सुखी एकलः परनिर्वाणो ह्यसङ्गोऽद्वय एव च तेन नार्याः कथं देवि निर्वाहः संभविष्यति अद्यापि शासनं प्राप्य गृहमायाहि दुर्मतिम् त्यजास्माकं महाभागे भविष्यति च शं तव त्वद्योग्यो हि वरो विष्णुः सर्वसद्गुणवान्प्रभुः वैकुण्ठवासी लक्ष्मीशो नानाक्रीडाविशारदः तेन ते कारयिष्यामो विवाहं सर्वसौख्यदम् । इतीदृशं त्यज हठं सुखिता भव पार्वति ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा पार्वती जगदम्बिका ।
विहस्य च पुनः प्राह मुनीन् ज्ञानविशारदान् ॥
पार्वत्युवाच
सत्यं भवद्भिः कथितं स्वज्ञानेन मुनीश्वराः ।
परंतु मे हठो नैव मुक्तो भवति हे द्विजाः ॥
स्वतनोः शैलजातत्वात्काठिन्यं सहजं स्थितम् ।
इत्थं विचार्य सुधिया मां निषेद्धुं न चार्हथ ॥
सुरर्षेर्वचनं पथ्यं त्यक्ष्ये नैव कदाचन ।
गुरूणां वचनं पथ्यमिति वेदविदो विदुः ॥
गुरूणां वचनं सत्यमिति येषां दृढा मतिः ।
तेषामिहामुत्र सुखं परमं नासुखं क्वचित् ॥
गुरूणां वचनं सत्यमिति यद्धृदये न धीः ।
इहामुत्रापि तेषां हि दुःखं न च सुखं क्वचित् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ । मूढ़ शिवने सद्बुद्धिसे दक्षकन्या सतीसे पहले ॥ ४ ९ विवाह करके कुछ दिन भी उसका निर्वाह नहीं किया । और सतीको ही दोष लगाकर उसका स्वयं त्याग ॥५० । दिया । वे तो अपने अकल, अशोक स्वरूपका ध्यान करते कर । हुए सुखी होकर रमण करते रहे । वे तो अकेले, परनिर्वाण असंग तथा अद्वैत हैं, हे देवि! उनके साथ स्त्रीका निर्वाह, ॥ ५१ किस प्रकार सम्भव होगा? ॥४ ९ –५१ ॥ । अब भी तुम हमारी बात मानकर घर चली ॥ ५२ जाओ और अपनी दुर्बुद्धिका त्याग कर दो । है महाभागे! [ ऐसा करनेसे ] तुम्हारा कल्याण होगा ॥ ५२ ॥
। तुम्हारे योग्य वर विष्णु हैं, सभी सद्गुणोंसे ॥ ५३ सम्पन्न वे प्रभु वैकुण्ठमें निवास करनेवाले, लक्ष्मीके ईश और नाना प्रकारकी क्रीड़ाओंमें कुशल हैं ॥ ५३ ॥
हमलोग तुम्हारा विवाह उन विष्णुसे करायेंगे, ॥ ५४ वह विवाह सब प्रकारके सुखोंको देनेवाला है । हे पार्वति! तुम इस प्रकारके हठका परित्याग करो और सुखी हो जाओ ॥ ५४ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस वचनको सुनकर जगदम्बा पार्वती हँसकर उन ज्ञानविशारद मुनियोंसे पुनः कहने ५५ लगीं - ॥ ५५ ॥
पार्वती बोलीं- हे मुनिगण! आपलोग यद्यपि अपने विचारसे सत्य कह रहे हैं, किंतु हे द्विजो! मेरा ५६ हठ नहीं छूटेगा ॥ ५६ ॥
पर्वतसे उत्पन्न होनेके कारण मेरे इस शरीर में ५७ काठिन्य एवं हठका होना स्वाभाविक है, ऐसा अपनी बुद्धिसे विचारकर हे ब्राह्मणो! मुझे तपस्यासे मना मत कीजिये ॥ ५७ ॥
मेरे लिये नारदजीका वचन सर्वथा हितकर है, मैं ५८ उनका परित्याग कदापि नहीं करूँगी । वेदवेत्ता विद्वान् । कहते हैं कि गुरुका वचन कल्याणकारी होता है ॥ ५८ ॥
जिन लोगोंने बुद्धिसे यह निश्चित किया है कि ५ ९ गुरुके वचन सर्वदा सत्य हैं, उनको इस लोक तथा । परलोकमें सदैव सुख प्राप्त होता है 1 । उन्हें कभी दुःख होता ही नहीं ॥ ५ ९ ॥ जिन लोगों के हृदयमें यह विचार नहीं है कि गुरुओंका | वचन सत्य होता है, उन्हें इस लोक एवं परलोकमें ॥ ६० । दुःख ही दुःख होता है, उन्हें सुख कभी नहीं होता ॥ ६०
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अ ० २५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६०३
सर्वथा न परित्याज्यं गुरूणां वचनं द्विजाः ।
गृहं वसेद्वा शून्यं स्यान्मे हठः सुखदः सदा ॥ ६१
यद्भवद्भिः सुभणितं वचनं मुनिसत्तमाः ।
तदन्यथा तद्विवेकं वर्णयामि समासतः ॥ ६२
गुणालयो विहारी च विष्णुः सत्यं प्रकीर्तितः ।
सदाशिवोऽगुणः प्रोक्तस्तत्र कारणमुच्यते ॥ ६३
शिवो ब्रह्माविकारः स भक्तहेतोर्धृताकृतिः ।
प्रभुतां लौकिकीं नैव संदर्शयितुमिच्छति ॥ ६४
अतः परमहंसानां धार्यते सुप्रिया गतिः ।
अवधूतस्वरूपेण परानंदेन शंभुना ॥ ६५
भूषणादिरुचिर्मायालिप्तानां ब्रह्मणो न च ।
सप्रभुर्निर्गुणोऽजो निर्मायोऽलक्ष्यगतिर्विराट् ॥ ६६
धर्मजात्यादिभिः शम्भुर्नानुगृह्णाति वै द्विजाः ।
गुरोरनुग्रहेणैव शिवं जानामि तत्त्वतः ॥ ६७
चेच्छिवः स हि मे विप्रा विवाहं न करिष्यति ।
अविवाहा सदाहं स्यां सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ६८
उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्निः । विकसति यदि पद्मं पर्वताग्रे शिलायां न हि चलति हठो मे सत्यमेतद् ब्रवीमि ॥ ६ ९ ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा तान्प्रणम्याशु मुनीन्सा पर्वतात्मजा ।
विरराम शिवं स्मृत्वा निर्विकारेण चेतसा ॥ ७०
ऋषयोऽपीत्थमाज्ञाय गिरिजायाः सुनिश्चयम् ।
प्रोचुर्जयगिरं तत्र ददुश्चाशिषमुत्तमाम् ॥ ७१
अथ प्रणम्य तां देवीं मुनयो हृष्टमानसाः ।
शिवस्थानं द्रुतं जग्मुस्तत्परीक्षाकरा मुने ॥ ७२
हे ब्राह्मणो! गुरुओंके वचनका किसी प्रकार त्याग नहीं करना चाहिये । चाहे घर बसे अथवा उजड़े - यह हठ मुझे सदा सुख देनेवाला है ॥ ६१ ॥
हे मुनिसत्तमो! आपलोगोंने जो वचन कहा है, उस विषयमें मैं संक्षेपमें अपना विचार प्रकट करती हूँ ॥६२ ॥
आपलोगोंने जो विष्णुको सर्वगुणसम्पन्न, वैकुण्ठमें विहार करनेवाला तथा सदाशिवको निर्गुण एवं निर्विकार कहा है, वह सत्य ही है, इसका कारण मैं आपलोगोंको बताती हूँ । शिव परब्रह्म एवं विकाररहित हैं, वे भक्तोंके लिये ही शरीर धारण करते हैं । वे प्रभु कभी भी सांसारिक प्रभुता दिखानेकी इच्छा नहीं करते । अतः परमानन्द शम्भु अवधूतस्वरूपसे परमहंसोंकी प्रिय गति धारण करते हैं ॥ ६३-६५ ॥ मायामें लिप्त रहनेवालोंको ही भूषणादिमें अभिरुचि होती है, ब्रह्मको किसी प्रकारकी कोई अभिरुचि नहीं होती । वे सदाशिव प्रभु निर्गुण, अज, मायारहित, अलक्ष्यगति एवं विराट् हैं ॥ ६६ ॥
हे द्विजो! धर्म, जाति आदिके द्वारा ही शम्भुका अनुग्रह नहीं होता है, मैं तो गुरुके अनुग्रहसे ही शिवको तत्त्वपूर्वक जानती हूँ । हे ब्राह्मणो! यदि शंकर मेरे साथ विवाह नहीं करेंगे, तो मैं सर्वदा अविवाहित रहूँगी, यह मैं सत्य - सत्य कहती हूँ ॥ ६७-६८ ॥ चाहे सूर्य पश्चिम दिशामें उदय हो, सुमेरु चलायमान हो जाय, अग्नि शीतल हो जाय, पर्वतपर कमल खिलने लगें, किंतु मेरा हठ नहीं डिगेगा, यह मैं सत्य कहती हूँ ॥६ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- यह कहकर और उन मुनियोंको प्रणाम करके वे पार्वती विकाररहित चित्तसे शिवजीका स्मरणकर मौन हो गयीं । तदनन्तर | ऋषियोंने भी पार्वतीका यह निश्चय जानकर उनकी जय - जयकार की और उन्हें उत्तम आशीर्वाद प्रदान किया । हे मुने! शिवाकी परीक्षा करनेवाले वे मुनिगण उन देवीको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त होकर शीघ्र ही । शिवस्थानको चले गये॥७०-७२ ॥
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६०४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ तत्र गत्वा शिवं नत्वा वृत्तान्तं विनिवेद्य तत् । वे लोग वहाँ जाकर शिवको प्रणाम करके | वृत्तान्तका निवेदनकर उनकी आज्ञा प्राप्त उस करके तदाज्ञां समनुप्राप्य स्वर्लोकं जग्मुरादरात् ॥ ७३ | आदरपूर्वक स्वर्गलोकको चले गये ॥७३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे सप्तर्षिकृतपरीक्षावर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें सप्तर्षिकृतपरीक्षावर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः पार्वतीकी परीक्षा लेनेके लिये वेष धारणकर पार्वतीके ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु मुनिषु स्वं लोकं शंकरः स्वयम् ।
परीक्षितुं तपो देव्या ऐच्छत्सूतिकरः प्रभुः ॥
परीक्षाछद्मना शंभुर्द्रष्टुं तां तुष्टमानसः ।
जटिलं रूपमास्थाय स ययौ पार्वतीवनम् ॥
अतीव स्थविरो विप्रदेहधारी स्वतेजसा ।
प्रज्वलन्मनसा हृष्टो दंडी छत्री बभूव सः ॥
तत्रापश्यत्स्थितां देवीं सखीभिः परिवारिताम् ।
वेदिकोपरि शुद्धां तां शिवामिव विधोः कलाम् ॥
शंभुर्निरीक्ष्य तां देवीं ब्रह्मचारिस्वरूपवान् ।
उपकंठं ययौ प्रीत्या तदासौ भक्तवत्सलः ॥
आगतं तं तदा दृष्ट्वा ब्राह्मणं तेजसाद्भुतम् ।
अपूजयच्छिवा देवी सर्वपूजोपहारकैः ॥
सुसत्कृतं संविधाभिः पूजितं परया मुदा ।
पार्वती कुशलं प्रीत्या पप्रच्छ द्विजमादरात् ॥
पार्वत्युवाच
ब्रह्मचारिस्वरूपेण कस्त्वं हि कुत आगतः ।
इदं वनं भासयसे वद वेदविदां वर ॥
विप्र उवाच
अहमिच्छाभिगामी च वृद्धो विप्रतनुः सुधीः ।
तपस्वी सुखदोऽन्येषामुपकारी न संशयः ॥
भगवान् शिवका जटाधारी ब्राह्मणका समीप जाना, शिव - पार्वती - संवाद ब्रह्माजी बोले- हे नारद! उन मुनियोंके अपने-अपने लोक चले जानेपर जगत्स्रष्टा प्रभु शिवने स्वयं १ पार्वतीके तपकी परीक्षा लेनेकी इच्छा की ॥१ ॥
प्रसन्नचित्त वे शिवजी परीक्षाके बहाने उन्हें देखनेके २ लिये जटाधारीरूप धारणकर पार्वतीके वनमें गये ॥ २ ॥
उन्होंने प्रसन्न मनसे बूढ़े ब्राह्मणका वेष धारण ३ किया और अपने तेजसे देदीप्यमान हो दण्ड तथा छत्र धारण कर लिया था ॥३ ॥
वहाँपर उन्होंने सखियोंसे घिरी हुई उन विशुद्ध ४ पार्वतीको वेदीपर बैठी हुई साक्षात् चन्द्रकलाके समान देखा ॥४ ॥
तब ब्रह्मचारीका रूप धारण किये हुए वे ५ भक्तवत्सल शिव उन देवीको देखकर प्रेमपूर्वक उनके समीप गये ॥५ ॥
उस अपूर्व तेजस्वी ब्राह्मणको आया हुआ ६ देखकर शिवादेवीने सभी प्रकारकी पूजासामग्री से | उनका पूजन किया । इस प्रकार भलीभाँति पूजा-| सत्कार करनेके अनन्तर पार्वतीजी प्रसन्नताके साथ उस ७ ब्राह्मणसे आदरपूर्वक कुशल पूछने लगीं— ॥ ६-७ ॥ पार्वती बोलीं- हे ब्राह्मण! ब्रह्मचारीका स्वरूप धारण किये हुए आप कौन हैं और कहाँसे आये हैं? आप इस वनको प्रकाशित कर रहे हैं । हे वेदवेत्ताओं ८ श्रेष्ठ! यह सब मुझसे कहिये ॥८ ॥
ब्राह्मण बोले- मैं वृद्ध ब्राह्मणका शरीर धारण | किये अपने इच्छानुसार चलनेवाला एक बुद्धिमान् | तपस्वी हूँ, मैं दूसरोंको सुख देनेवाला तथा उनका । उपकार करनेवाला हूँ इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
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अ ० २६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६०५ त्वं कस्यासि तनया किमर्थं विजने वने । का तपश्चरसि दुर्धर्षं मुनिभिः प्रपदैरपि ॥
न बाला न च वृद्धासि तरुणी भासि शोभना ।
कथं पतिं विना तीक्ष्णं तपश्चरसि वै वने ॥
किं त्वं तपस्विनी भद्रे कस्यचित्सहचारिणी ।
तपस्वी स न पुष्णाति देवि त्वां च गतोऽन्यतः ॥
वद कस्य कुले जाता कः पिता तव काभिधा ।
महासौभाग्यरूपा त्वं वृथा तव तपोरतिः ॥
किं त्वं वेदप्रसूर्लक्ष्मीः किं सुरूपा सरस्वती ।
एतासु मध्ये का वा त्वं नाहं तर्कितुमुत्सहे ॥
पार्वत्युवाच
नाहं वेदप्रसूर्विप्र न लक्ष्मीश्च सरस्वती ।
अहं हिमाचलसुता सांप्रतं नाम पार्वती ॥
दक्षसुता जाता सती नामान्यजन्मनि । तुम कौन हो और किसकी कन्या हो, इस निर्जन १० वनमें अकेली रहकर इतनी कठिन तपस्या क्यों कर । रही हो, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर है ॥ १० ॥
तुम न तो बाला हो, न ही वृद्धा, तुम तो सर्वथा ११ तरुणी जान पड़ती हो । पतिके बिना इस वनमें इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो? हे भद्रे! क्या तुम किसी तपस्वीकी सहचारिणी हो, जो इतनी घोर १२ तपस्यामें निमग्न हो । क्या वह तपस्वी तुम्हारा पोषण नहीं करता अथवा तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चला गया है? ॥ ११-१२ ॥ तुम किसके कुलमें उत्पन्न हुई हो, तुम्हारे १३ पिता कौन हैं तथा तुम्हारा क्या नाम है, यह बताओ, तुम तो सौभाग्य - शालिनी हो, तपस्यामें तुम्हारी आसक्ति तो व्यर्थ ही है ॥१३ ॥
क्या तुम वेदोंकी जन्मदात्री सावित्री हो या महालक्ष्मी १४ हो अथवा सुन्दर रूप धारण किये हुए सरस्वती हो! इनमें तुम कौन हो! मैं अनुमान नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १४ ॥
पार्वती बोलीं- हे विप्र! न तो मैं सावित्री हूँ, न महालक्ष्मी और न ही सरस्वती ही हूँ । मैं हिमालयकी १५ पुत्री हूँ और मेरा वर्तमान नाम पार्वती है ॥ १५ ॥
पूर्वजन्ममें मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय मेरा पुरा निन्दितः पतिः ॥ १६ नाम सती था । मेरे पिताने मेरे पतिकी निन्दा की थी, योगेन त्यक्तदेहाहं यत्पित्रा
अत्र जन्मनि संप्राप्तः शिवोऽपि विधिवैभवात् ।
मां त्यक्त्वा भस्मसात्कृत्य मन्मथं स जगाम ह ॥
प्रयाते शंकरे तापोद्विजिताहं पितुर्गृहात् ।
आगता तपसे विप्र सुदृढा स्वर्णदीतटे ॥
कृत्वा तपः कठोरं च सुचिरं प्राणवल्लभम् न प्राप्याग्नौ विविक्षन्ती त्वां दृष्ट्वा संस्थिता क्षणम् ॥ गच्छ त्वं प्रविशाम्यग्नौ शिवेनाङ्गीकृता न हि यत्र यत्र जनुर्लप्स्ये वरिष्यामि शिवं वरम् इसलिये मैंने [ योगमार्गका अवलम्बनकर ] अपना शरीर त्याग दिया था । मैंने इस जन्ममें भी भाग्यवश १७ शिवजीको ही प्राप्त किया, परंतु वे कामदेवको जलाकर मुझे छोड़कर चले गये । हे विप्र! शंकरजीके चले जानेपर मैं कष्टसे उद्विग्न हो गयी और तपके १८ लिये दृढ़ होकर पिताके घरसे गंगाके तटपर चली आयी॥१६–१८ ॥ बहुत समयतक कठोर तपस्या करनेके बाद भी । १ ९ मेरे प्राणवल्लभ सदाशिव मुझे प्राप्त नहीं हुए, इस कारण मैं अग्निमें प्रवेश करना चाहती थी, किंतु आपको देखकर क्षणमात्रके लिये रुक गयी ॥ १ ९ ॥ अब आप जाइये । शिवजीने मुझे अंगीकार नहीं किया, इसलिये मैं अब अग्निमें प्रवेश करूँगी । मैं जहाँ - जहाँ जन्म लूँगी, वहाँ भी शिवको ही वररूपमें
।
॥ २० । प्राप्त करूँगी ॥ २० ॥
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६०६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर पार्वती इत्युक्त्वा पार्वती वह्नौ तत्पुरः प्रविवेश सा । ब्रह्मचारीद्वारा बारम्बार निषेध करनेपर भी अग्निमें प्रवेश निषिध्यमाना पुरतो ब्राह्मणेन पुनः पुनः ॥ २१ गयीं । पार्वतीके अग्निमें प्रवेश करते ही उनकी तपस्याके कर वह्निप्रवेशं कुर्वत्याः पार्वत्यास्तत्प्रभावतः । | प्रभावसे वह अग्नि उसी समय शीघ्र ही चन्दनके समान बभूव तत्क्षणं सद्यो वह्निश्चन्दनपङ्कवत् ॥२२ शीतल हो गयी । क्षणभर अग्निमें रहनेके बाद ज्यों ही वे क्षणं तदन्तरे स्थित्वा ह्युत्पतन्तीं दिवं द्विजः । पुनः पप्रच्छ सहसा विहसन्सुतनुं शिवः द्विज उवाच
अहो तपस्ते किं भद्रे न बुद्धं किञ्चिदेव हि ।
न दग्धो वह्निना देहो न च प्राप्तं मनीषितम् ॥
अतः सत्यं निकामं वै वद देवि मनोरथम् ।
ममाग्रे विप्रवर्यस्य सर्वानंदप्रदस्य हि ॥
यथाविधि त्वया देवि कीर्त्यतां सर्वथात्मना ।
तस्मान्मैत्री च संजाता कार्यं गोप्यं त्वया न हि ॥
किमिच्छसि वरं देवि प्रष्टुमिच्छाम्यतः परम् ।
त्वय्येव तदसौ देवि फलं सर्वं प्रदृश्यते ॥
परार्थे च तपश्चेद्वै तिष्ठेत्तु तप एव तत् ।
रत्नं हस्ते समादाय हित्वा काचस्तु संचितः ॥
ईदृशं तव सौन्दर्यं कथं व्यर्थीकृतं त्वया ।
हित्वा वस्त्राण्यनेकानि चर्मादि च धृतं त्वया ॥
तत्सर्वं कारणं ब्रूहि तपसस्त्वस्य सत्यतः ।
तच्छ्रुत्वा विप्रवर्योऽहं यथा हर्षमवाप्नुयाम् ॥
ब्रह्मोवाच
इति पृष्टा तदा तेन सखीं प्रेरयताम्बिका ।
तन्मुखेनैव तत्सर्वं कथयामास सुव्रता ॥
तया च प्रेरिता तत्र पार्वत्या विजयाभिधा ।
प्राणप्रिया सुव्रतज्ञा सखी जटिलमब्रवीत् ॥
सख्युवाच
शृणु साधो प्रवक्ष्यामि पार्वतीचरितं परम् ।
हेतुं च तपसस्सर्वं यदि त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥
द्युलोक जानेको उद्यत हुईं, तब [ विप्ररूप ] शिव हँसते ॥ २३ हुए उन सुन्दरांगीसे सहसा पूछने लगे- ॥ २१-२३ ॥ द्विज बोले- हे भद्रे! तुम्हारी यह कैसी तपस्या है? मुझे तो तुम्हारी इस तपस्याका कुछ भी फल नहीं जान पड़ता । इस अग्निने तुम्हारे शरीरको भी नहीं २४ जलाया और तुम्हारा मनोरथ भी प्राप्त नहीं हुआ ॥ २४ ॥
इसलिये हे देवि! सब प्रकारका आनन्द प्रदान २५ करनेवाले मुझ विप्रवरके सामने तुम अपना मनोरथ ठीकसे कहो, हे देवि! तुम पूर्णरूपसे इस बातको यथाविधि कह दो । [ परस्पर बातचीतसे ] हमारी-२६ तुम्हारी मित्रता हो गयी, अत: तुम्हें इस बातको गोपनीय नहीं रखना चाहिये । २५-२६ ॥ हे देवि! इसके पश्चात् मैं पूछना चाहता हूँ कि २७ तुम कौन - सा वरदान चाहती हो? हे देवि! मुझे सारे वरदानका फल तुम्हींमें दिखायी पड़ रहा है ॥ २७ ॥
यह तपस्या यदि तुमने दूसरेके लिये की है, तो वह २८ सारा - का - सारा तुम्हारा तप व्यर्थ हो गया और तुमने हाथमें रत्नको ले करके उसे खोकर पुनः काँच धारण किया ॥ २८ ॥
इस प्रकारकी अपनी सुन्दरता तुमने व्यर्थ २ ९ क्यों कर दी? अनेक प्रकारके वस्त्र त्यागकर तुमने यह मृगचर्म क्यों धारण किया? इसलिये तुम इस तपस्याका सारा कारण सत्य - सत्य बताओ, जिससे कि उसे सुनकर ३० ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ मैं प्रसन्नता प्राप्त करूँ ॥ २ ९ -३० ॥ ब्रह्माजी बोले — जब इस प्रकार उस ब्राह्मणने | पार्वतीसे पूछा, तब उन सुव्रताने अपनी सखीको प्रेरित ३१ किया और उसके मुखसे सारा वृत्तान्त कहलवाया ॥ ३१ मी तदनन्तर उस पार्वतीसे प्रेरित होकर पार्वतीको ३२ प्राणोंके समान प्रिय तथा उत्तम व्रतको जाननेवाली विजया । नामकी सखी उस ब्रह्मचारीसे कहने लगी- ॥ ३२ ॥
सखी बोली- हे साधो! यदि आप इस पार्वतीका श्रेष्ठ चरित्र एवं इसकी तपस्याका समस्त कारण ३३ । जानना चाहते हैं, तो मैं उसे कहूँगी, आप सुनें ॥ ३३ ॥
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अ ० २६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६०७
सखी मे गिरिराजस्य सुतेयं हिमभूभृतः ।
ख्याता वै पार्वती नाम्ना तस्या मातास्ति मेनका ॥
ऊढेयं न च केनापि न वाञ्छति शिवात्परम् ।
त्रीणि वर्षसहस्राणि तपश्चरणसाधिनी ॥
तदर्थं मेऽनया सख्या प्रारब्धं तप ईदृशम् ।
तदत्र कारणं वक्ष्ये शृणु साधो द्विजोत्तम ॥
हित्वेन्द्रप्रमुखान्देवान् हरिं ब्रह्माणमेव च ।
पतिं पिनाकपाणिं वै प्राप्तुमिच्छति पार्वती ॥
इयं सखी मदीया वै वृक्षानारोपयत्पुरा ।
तेषु सर्वेषु संजातं फलपुष्पादिकं द्विज ॥
रूपसार्थाय जनककुलालंकरणाय च ।
समुद्दिश्य महेशानं कामस्यानुग्रहाय च ॥
मत्सखी नारदादेशात्तपस्तपति दारुणम् ।
मनोरथं कुतस्तस्या न फलिष्यति तापस ॥
यत्ते पृष्टं द्विजश्रेष्ठ मत्सख्या मनसीप्सितम् ।
मया ख्यातं च तत्प्रीत्या किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥
ब्रह्मोवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा विजयाया यथार्थतः ।
मुने स जटिलो रुद्रो विहसन्वाक्यमब्रवीत् ॥
जटिल उवाच
सख्येदं कथितं तत्र परिहासोऽनुमीयते ।
यथार्थं चेत्तदा देवी स्वमुखेनाभिभाषताम् ॥
ब्रह्मोवाच इत्युक्ते च तदा तेन जटिलेन द्विजन्मना उवाच पार्वती देवी स्वमुखेनैव तं द्विजम् ॥ यह मेरी सखी पर्वतराज हिमालयकी पुत्री है और
३४ पार्वती नामसे प्रसिद्ध है । इसकी माता मेनका है ॥ ३४ ॥
अभीतक इसका विवाह किसीके साथ नहीं ३५ हुआ है, यह शिवजीको छोड़कर दूसरेको अपना पति नहीं बनाना चाहती । यह तीन हजार वर्षसे तपस्या कर रही है । हे साधो! हे द्विजोत्तम! उन्हींके लिये ३६ मेरी सखीने ऐसा तप आरम्भ किया है, इसका भी कारण मैं आपसे कहती हूँ आप सुनें । यह पार्वती इन्द्रादि प्रमुख देवताओं एवं ब्रह्मा, विष्णु आदिको ३७ छोड़कर केवल पिनाकपाणि शंकरको ही पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा करती है ॥ ३५-३७ ॥ हे द्विज! तपस्या प्रारम्भ करनेके पूर्व मेरी सखीने ३८ जिन वृक्षोंको लगाया था, उन सबमें फूल, फल आदि आ गये हैं [ अतः प्रतीत होता है कि मेरी सखीके मनोरथ पूर्ण होनेका समय आ गया है । ] ॥ ३८ ॥
यह मेरी सखी नारदजीके उपदेशानुसार अपने ३ ९ रूपको सार्थक करनेके लिये, अपने पिताके कुलको अलंकृत करनेके लिये और कामदेवपर अनुग्रह करनेके लिये महेश्वरके उद्देश्यसे कठिन तप कर ४० रही है, हे तापस! क्या इसका मनोरथ सफल नहीं होगा? ॥ ३ ९ -४० ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आपने मेरी सखीके जिस मनोरथको ४१ पूछा था, उसे मैंने प्रीतिपूर्वक कह दिया, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥४१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! विजयाकी इस यथार्थ बातको सुनकर वे जटाधारी रुद्र हँसते हुए यह वचन ४२ कहने लगे —॥४२ ॥
जटिल बोले- सखीके द्वारा जो यह कहा गया है, वह तो परिहास मालूम पड़ता है, यदि यह ४३ यथार्थ है, तो देवी अपने मुखसे कहें ॥ ४३ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार जब जटाधारी । ब्राह्मणने कहा, तब पार्वतीदेवी अपने मुखसे ही उन ४४ । ब्राह्मणसे कहने लगीं ॥४४ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवाजटिलसंवादो नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
शिवाजटिलसंवादवर्णन
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६०८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ अथ सप्तविंशोऽध्यायः जटाधारी ब्राह्मणद्वारा पार्वतीके समक्ष शिवजीके स्वरूपकी निन्दा करना पार्वत्युवाच शृणु द्विजेन्द्र जटिल मद्वृत्तं निखिलं खलु सख्युक्तं मेऽद्य यत्सत्यं तत्तथैव न चान्यथा मनसा वचसा साक्षात्कर्मणा पतिभावतः सत्यं ब्रवीमि नोऽसत्यं वृतो वै शंकरो मया जानामि दुर्लभं वस्तु कथं प्राप्यं मया भवेत् तथापि मन औत्सुक्यात्तप्यतेऽद्य तपो मया ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा वचनं तस्मै स्थिता सा गिरिजा तदा उवाच ब्राह्मणस्तत्र तच्छ्रुत्वा पार्वतीवचः ब्राह्मण उवाच एतावत्कालपर्यन्तं ममेच्छा महती ह्यभूत् किं वस्तु कांक्षती देवी कुरुते सुमहत्तपः तज्ज्ञात्वा निखिलं देवि श्रुत्वा त्वन्मुखपंकजात् । इतो गच्छाम्यहं स्थानाद्यथेच्छसि तथा कुरु न कथ्यते त्वया मह्यं मित्रत्वं निष्फलं भवेत् । यथा कार्यं तथा भावि कथनीयं सुखेन च ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा वचनं तस्य यावद्गन्तुमियेष सः तावच्च पार्वती देवी प्रणम्योवाच तं द्विजम् ॥ पार्वत्युवाच किं गमिष्यसि विप्रेन्द्र स्थितो भव हितं वद । इत्युक्ते च तया तत्र स्थित्वोवाच स दण्डधृक् द्विज उवाच
यदि श्रोतुमना देवि मां स्थापयसि भक्तितः ।
वदामि तत्त्वं तत्सर्वं येन ते वयुनं भवेत् ॥
जानाम्यहं महादेवं सर्वथा गुरुधर्मतः ।
प्रवदामि यथार्थं हि सावधानतया शृणु ॥
वृषध्वजो महादेवो भस्मदिग्धो जटाधरः ।
व्याघ्रचर्माम्बरधरः संवीतो गजकृत्तिना ॥
पार्वती बोलीं- हे द्विजेन्द्र! हे जटिल! मेरा समस्त । वृत्तान्त सुनें । इस समय मेरी सखीने जो कुछ भी कहा ॥ १ है, वह सब सत्य है, कुछ भी झूठा नहीं है ॥ १ ॥
। मैंने मन, वचन एवं कर्मसे शंकरजीका ही ॥ २ पतिभावसे वरण किया है, यह बात मैं सत्य कहती हूँ, असत्य नहीं । मैं जानती हूँ कि दुर्लभ वस्तु मुझे । कैसे प्राप्त हो सकती है, फिर भी मनकी उत्सुकतावश ॥ ३ मैं इस समय तप कर रही हूँ ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार उस ब्रह्मचारीसे । कहकर गिरिजा चुप हो गयीं । तब वे ब्राह्मण ॥ ४ पार्वतीकी बात सुनकर कहने लगे —॥४ ॥
ब्राह्मण बोले- अभीतक मुझे यह बड़ी इच्छा । थी कि यह देवी किस वस्तुको प्राप्त करनेके लिये ॥ ५ अत्यन्त कठिन तप कर रही है ॥५ ॥
हे देवि! तुम्हारे मुखकमलसे सारी बातें सुनकर ॥ ६ और उसे जानकर अब मैं यहाँसे जाना चाहता हूँ, अब तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही करो ॥ ६ ॥
यदि तुम मुझसे इन बातोंको न कहती, तो मित्रता ॥ ७ व्यर्थ हो जाती । कार्य तो होनहारके अनुसार होता है, इसलिये सुखपूर्वक उसे कहना चाहिये ॥७ ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे नारद! ] इस प्रकार कहकर । ज्यों ही उस ब्राह्मणने जानेकी इच्छा की, तभी पार्वती ८ देवी प्रणाम करके उन द्विजसे कहने लगीं —॥८ ॥
पार्वती बोलीं – हे विप्रेन्द्र! आप क्यों जा रहे हैं, ठहरिये और मेरे हितकी बात कहिये । उनके ऐसा ॥ ९ कहनेपर वे दण्डधारी रुककर कहने लगे - ॥ ९ ॥
ब्राह्मण बोले- हे देवि! यदि तुम सुननेकी इच्छा | करती हो और भक्तिपूर्वक मुझे रोकती हो, तो मैं तुमसे १० वह सब तत्त्व कहता हूँ, जिससे [ उनके विषयमें ] तुम्हें । । भलीभाँति जानकारी हो जायगी । मैं गुरुप्रसादसे महादेव अच्छी तरहसे जानता हूँ । जो बात सत्य है, उसको कह ११ रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो ॥ १०-११ ॥ रहते । महादेव बैलकी सवारी करते हैं, भस्म पोते • करते | हैं, जटा धारण किये रहते हैं, व्याघ्रचर्म धारण १२ हैं और हाथीका चमड़ा ओढ़ते हैं ॥१२ ॥