श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 601–610
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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अ ० २३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५८ ९
सर्वे मिलित्वा शक्राद्या गुरुमामंत्र्य विह्वलाः ।
सुमेरो तप्तसर्वाङ्गा विधिं मां शरणं ययुः ॥ २२
तत्र गत्वा प्रणम्याशु विह्वला नष्टसुत्विषः ।
ऊचुः सर्वे च संस्तूय ह्यैकपद्येन मां हि ते ॥ २३
देवा ऊचुः
त्वया सृष्टमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ।
संतप्तमति कस्माद्वै न ज्ञातं कारणं विभो ॥ २४
तद् ब्रूहि कारणं ब्रह्मन् ज्ञातुमर्हसि नः प्रभो ।
दग्धीभूततनून्देवान् त्वत्तो नान्योऽस्ति रक्षकः ॥ २५
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषामहं स्मृत्वा शिवं हृदा ।
विचार्य मनसा सर्वं गिरिजायास्तपः फलम् ॥ २६
दग्धं विश्वमिति ज्ञात्वा तैः सर्वैरिह सादरात् ।
हरये तत्कथयितुं क्षीराब्धिमगमं द्रुतम् ॥ २७
तत्र गत्वा हरिं दृष्ट्वा विलसन्तं सुखासने ।
सुप्रणम्य सुसंस्तूय प्रावोचं सांजलिः सुरैः ॥ २८
त्राहि त्राहि महाविष्णो तप्तान्नः शरणागतान् ।
तपसोग्रेण पार्वत्यास्तपन्त्याः परमेण हि ॥ २ ९
इत्याकर्ण्य वचस्तेषामस्मदादिदिवौकसाम् ।
शेषासने समाविष्टोऽस्मानुवाच रमेश्वरः ॥ ३०
विष्णुरुवाच
ज्ञातं सर्वं निदानं मे पार्वतीतपसोऽद्य वै ।
युष्माभिः सहितस्त्वद्य व्रजामि परमेश्वरम् ॥३१
महादेवं प्रार्थयामो गिरिजाप्रापणाय तम् ।
पाणिग्रहार्थमधुना लोकानां स्वस्तयेऽमराः ॥ ३२
तपते हुए समस्त अंगवाले तथा व्याकुल वे सभी इन्द्र आदि परस्पर मिलकर गुरु बृहस्पतिसे | परामर्श करके मुझ ब्रह्माकी शरणमें सुमेरु पर्वतपर गये । नष्ट कान्तिवाले तथा व्याकुल वे सब वहाँ पहुँचकर शीघ्र प्रणाम करके तथा स्तुति करके एक साथ मुझसे कहने लगे— ॥ २२-२३ ॥ देवता बोले — हे विभो! इस चराचर सम्पूर्ण जगत्का आपने ही निर्माण किया है, किंतु इस समय यह सारी सृष्टि क्यों जल रही है, इसका कारण ज्ञात नहीं हो पा रहा है ॥ २४ ॥
हे प्रभो! हे ब्रह्मन्! इसका कारण आप बताइये; क्योंकि आप ही इसे जाननेमें समर्थ हैं । हम देवगणोंका सारा शरीर जल रहा है । दग्ध होते हुए शरीरवाले हम देवताओंका आपके अतिरिक्त कोई अन्य रक्षक नहीं है ॥ २५ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देवताओंकी बातको सुनकर मैं शिवजीका स्मरणकर हृदयमें सोचने लगा कि यह सब पार्वतीकी तपस्याका फल है ॥ २६ ॥
सारा विश्व जल जायगा, यह जानकर मैं भगवान् विष्णुसे निवेदन करनेके लिये उन सभीके साथ आदरपूर्वक शीघ्र क्षीरसागर गया ॥२७ ॥
देवगणोंके साथ वहाँ जाकर मैंने देखा कि नारायण सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हैं, उस समय मैं उन्हें प्रणामकर तथा स्तुति करके हाथ जोड़कर कहने लगा- ॥२८ ॥
हे महाविष्णो! तपस्यामें संलग्न पार्वतीकी परम कठोर तपस्यासे हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं, अत: हम शरणागतोंकी आप रक्षा कीजिये ॥ २ ९ ॥ हम देवताओंका यह वचन सुनकर शेषासनपर बैठे हुए रमेश्वर हमलोगोंसे कहने लगे —॥३० ॥
विष्णुजी बोले- मैंने सारा कारण जान लिया है । आप सब लोग पार्वतीकी तपस्यासे सन्तप्त हो रहे हैं, अतः मैं आपलोगोंके साथ अभी परमेश्वरके पास चल रहा हूँ । हे देवगणो! हमलोग सदाशिवके समीप चलकर उनसे प्रार्थना करें कि वे पार्वतीका पाणिग्रहण करें; क्योंकि शिवजीके द्वारा पार्वतीका पाणिग्रहण करनेपर ही लोकका कल्याण होगा ॥ ३१-३२ ॥
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५ ९ ० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २३ वरं दातुं शिवायै हि देवदेवः पिनाकधृक् । देवाधिदेव पिनाकधारी सदाशिव पार्वतीको यथा चेष्यति तत्रैव करिष्यामोऽधुना हि तत् ॥ ३३ प्रदान करनेके लिये जिस प्रकार उद्यत हों, उसी प्रकार वर तस्माद् वयं गमिष्यामो यत्र रुद्रो महाप्रभुः तपसोग्रेण संयुक्तोऽद्यास्ते परममङ्गलः ब्रह्मोवाच विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा सर्व ऊचुः सुरादयः महाभीता हठात् कुद्धाद्दग्धुकामात् लयंकरात् ॥ देवा ऊचुः
महाभयंकरं क्रुद्धं कालानलसमप्रभम् ।
न यास्यामो वयं सर्वे विरूपाक्षं महाप्रभुम् ॥
यथा दग्धः पुरा तेन मदनो दुरतिक्रमः ।
तथैव क्रोधयुक्तो नः स धक्ष्यति न संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य वचस्तेषां शक्रादीनां रमेश्वरः ।
सांत्वयंस्तान्सुरान्सर्वान्प्रोवाच स हरिर्मुने ॥
हरिरुवाच
हे सुरा मद्वचः प्रीत्या शृणुतादरतोऽखिलाः ।
न वो धक्ष्यति स स्वामी देवानां भयनाशनः ॥
तस्माद्भवद्भिर्गन्तव्यं मया सार्धं विचक्षणैः ।
शंभुं शुभकरं मत्वा शरणं तस्य सुप्रभोः ॥
शिवं पुराणं पुरुषं ह्यधीशं वरेण्यरूपं हि परं पुराणम् । तपो जुष परमात्मरूपं परात्परं तं शरणं व्रजामः ॥ ब्रह्मोवाच
एवमुक्तास्तदा देवा विष्णुना प्रभविष्णुना ।
जग्मुः सर्वे तेन सह द्रष्टुकामाः पिनाकिनम् ॥
प्रथमं शैलपुत्र्यास्तत्तपो द्रष्टुं तदाश्रमम् ।
जग्मुर्मार्गवशात्सर्वे विष्ण्वाद्याः सकुतूहलाः ॥
पार्वत्याः सुतपो दृष्ट्वा तेजसा व्यापृतास्तदा ।
प्रणेमुस्तां जगद्धात्रीं तेजोरूपां तपःस्थिताम् ॥
। उपाय हमलोगोंको इस समय करना चाहिये ॥ ३३
। इसलिये अब हमलोग उस स्थानपर चलेंगे ॥
॥ ३४ जहाँ परम मंगल महाप्रभु रुद्र इस समय उग्र तपस्यामं लीन हैं ॥ ३४ ॥
ब्रह्माजी बोले- विष्णुजीकी वह बात सुनकर प्रलय करनेवाले और क्रोधपूर्वक हठसे कामदेवको । नष्ट करनेवाले शंकरसे भयभीत वे देवता विष्णुसे ३५ कहने लगे— ॥ ३५ ॥
देवतागण बोले – [ हे विष्णो! ] महाभयंकर, क्रोधी, कालाग्निके समान प्रभावाले तथा विरूपाक्ष ३६ महाप्रभुके पास हमलोग नहीं जायँगे; क्योंकि उन्होंने जिस प्रकार दुराधर्ष कामदेवको भस्म कर दिया, उसी प्रकार क्रोधमें भरकर वे हमलोगोंको भी भस्म कर ३७ देंगे, इसमें सन्देह नहीं है॥३६-३७ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इन्द्रादि देवताओंकी यह बात सुनकर वे विष्णु उन सभी देवताओंको ३८ धीरज बँधाते हुए कहने लगे —॥३८ ॥
विष्णुजी बोले- हे देवगणो! आप सभी लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये, वे सदाशिव आपलोगोंको ३ ९ भस्म नहीं करेंगे; क्योंकि वे देवताओंके भयको नष्ट करनेवाले हैं । इसलिये आप सभी बुद्धिमान् लोग ४० शम्भुको कल्याणकारी मानकर मेरे साथ उन परम प्रभुके पास चलिये ॥ ३ ९ -४० ॥ वे शिव ही पुराणपुरुष, सबके अधीश्वर, सबसे श्रेष्ठ, तपस्या करनेवाले, परमात्मस्वरूप और परात्पर ४१ हैं, हमलोगोंको उन्हींका आश्रय लेना चाहिये ॥ ४१ ॥ ॥
ब्रह्माजी बोले – जब सर्वसमर्थ विष्णुने इस | प्रकार देवगणोंसे कहा, तब वे सब उनके साथ ४२ पिनाकी भगवान् सदाशिवके दर्शन करनेकी इच्छासे । चले । विष्णु आदि देवगण मार्गमें पड़नेके कारण | सर्वप्रथम कुतूहलवश उस आश्रममें गये, जहाँ पार्वती ४३तपस्या कर रही थीं ॥ ४२-४३ ॥ तप । तदनन्तर सभी देवताओंने पार्वतीका तथा । | देखकर उनके तेजसे व्यापृत हो तेजोरूपवाली और ४४ | तपमें अधिष्ठित उन जगदम्बाको प्रणाम किया
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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५ ९ १
प्रशंसन्तस्तपस्तस्याः साक्षात्सिद्धितनोः सुराः ।
तदा ते च यत्रास्ते वृषभध्वजः ॥ ४५
जग्मुस्तत्र
तत्र गत्वा च ते देवास्त्वां मुने प्रैषयंस्तदा ।
पश्यन्तो दूरतस्तस्थुः कामभस्मकृतो हरात् ॥ ४६
नारद त्वं शिवस्थानं तदा गत्वाभयः सदा ।
शिवभक्तो विशेषेण प्रसन्नं दृष्टवान् प्रभुम् ॥ ४७
पुनरागत्य यत्नेन देवानाहूय तांस्ततः ।
निनाय शंकरस्थानं तदा विष्ण्वादिकान्मुने ॥ ४८
अथ विष्ण्वादयः सर्वे तत्र गत्वा शिवं प्रभुम् ।
ददृशुः सुखमासीनं प्रसन्नं भक्तवत्सलम् ॥ ४ ९
योगपट्टस्थितं शंभुं गणैश्च परिवारितम् ।
तपोरूपं दधानं च परमेश्वररूपिणम् ॥ ५०
ततो विष्णुर्मयान्ये च सुरसिद्धमुनीश्वराः ।
प्रणम्य तुष्टुवुः सूक्तैर्वेदोपनिषदन्वितैः ॥ ५१
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय साक्षात् सिद्धिका शरीर धारण करनेवाली उन पार्वतीके तपकी प्रशंसा करते हुए वे देवगण वहाँ गये, जहाँ वृषध्वज थे॥४४-४५ ॥ हे मुने! वहाँ पहुँचकर उन देवताओंने [ सर्वप्रथम ] आपको शिवके समीप भेजा और वे स्वयं कामको नष्ट करनेवाले भगवान् शंकरको देखते हुए दूर ही स्थित रहे । उस समय हे नारद! विशेषरूपसे शिवभक्त आपने निर्भय होकर शिवजीके स्थानपर जाकर शिवजीको प्रसन्न मुद्रामें देखा । हे मुने! तदनन्तर लौटकर यत्नपूर्वक उन विष्णु आदि देवताओंको बुलाकर आप शिवजीके स्थानपर उन्हें ले गये ॥ ४६–४८ ॥ तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवताओंने शिवजीके स्थानमें जाकर प्रसन्न मनसे उन भक्तवत्सल भगवान् सदाशिवको सुखपूर्वक बैठे हुए देखा । वे योगासन लगाये हुए अपने गणोंसे घिरे थे । वे परमेश्वररूपी शंकर साक्षात् तपस्याके विग्रहवान् रूप थे ॥ ४ ९ -५० ॥ तब विष्णु एवं मेरे साथ रहनेवाले अन्य देव, मुनि तथा सिद्धगण उन परमेश्वर शिवजीको प्रणामकर वेद एवं उपनिषदोंके सूक्तोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ ५१ ॥
पार्वतीसांत्वनशिवदेवदर्शनवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीसान्त्वन-शिवदेवदर्शनवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्का विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना देवा ऊचुः नमो रुद्राय देवाय मदनांतकराय च स्तुत्याय भूरिभासाय त्रिनेत्राय नमो नमः शिपिविष्टाय भीमाय भीमाक्षाय नमो नमः महादेवाय प्रभवे त्रिविष्टपतये नमः त्वं नाथः सर्वलोकानां पिता माता त्वमीश्वरः शंभुरीशः शंकरोऽसि दयालुस्त्वं विशेषतः देवता बोले- कामदेवको विनष्ट करनेवाले रुद्र देवताको नमस्कार है, स्तुतिके योग्य, अत्यन्त । तेजस्वी तथा त्रिनेत्रको बार - बार नमस्कार है ॥१ ॥
॥ १ शिपिविष्ट, भीम एवं भीमाक्षको बार - बार । नमस्कार है । महादेव, प्रभु तथा स्वर्गपतिको नमस्कार ॥ है ॥२ ॥
आप सभी लोकोंके नाथ और माता - पिता । हैं । आप ईश्वर, शम्भु, ईश, शंकर तथा विशेष ॥ ३ । रूपसे दयालु हैं ॥ ३ ॥
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५ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
त्वं धाता सर्वजगतां त्रातुमर्हसि नः प्रभो ।
त्वां विना कः समर्थोऽस्ति दुःखनाशे महेश्वर ॥ ४
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सुराणां नन्दिकेश्वरः ।
कृपया परया युक्तो विज्ञप्तुं शंभुमारभत् ॥ ५
नंदिकेश्वर उवाच विष्ण्वादयः सुरगणा मुनिसिद्धसंघा-स्त्वां द्रष्टुमेव सुरवर्य विशेषयन्ति । कार्यार्थिनोऽसुरवरैः परिभर्त्स्यमानाः सम्यक् पराभवपदं परमं प्रपन्नाः ॥ ६
तस्मात्त्वया हि सर्वेश त्रातव्या मुनयः सुराः ।
दीनबंधुर्विशेषेण त्वमुक्तो भक्तवत्सलः ॥ ७
ब्रह्मोवाच
एवं दयावता शंभुर्विज्ञप्तो नंदिना भृशम् ।
शनैः शनैरुपरमद्ध्यानादुन्मील्य चाक्षिणी ॥ ८
ईशोऽथोपरतः शंभुस्तदा परमकोविदः ।
समाधेः परमात्मासौ सुरान्सर्वानुवाच ह ॥ ९
शंभुरुवाच
कस्माद्यूयं समायाता मत्समीपं सुरेश्वराः ।
हरिब्रह्मादयः सर्वे ब्रूत कारणमाशु तत् ॥ १०
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचः शम्भोः सर्वे देवा मुदान्विताः ।
विष्णोर्विलोकयामासुर्मुखं विज्ञप्तिहेतवे ॥ ११
अथ विष्णुर्महाभक्तो देवानां हितकारकः ।
मदीरितमुवाचेदं सुरकार्यं महत्तमम् ॥१२ ।
विष्णुरुवाच
तारकेण कृतं शंभो देवानां परमाद्भुतम् । ।
कष्टात्कष्टतरं देवा विज्ञप्तुं सर्व आगताः ॥ १३ ।
हे शंभो तव पुत्रेणौरसेन हि भविष्यति । ।
निहतस्तारको दैत्यो नान्यथा मम भाषितम् ॥ १४ ।
२४ आप ही सब जगत्को धारण करते अतएव हे प्रभो! आप हमलोगोंकी रक्षा हैं, हे परमेश्वर! आपके अतिरिक्त और कौन कीजिये ॥ दुःख दूर करनेमें समर्थ है ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] उन देवताओंका
। यह वचन सुनकर परम कृपासे युक्त होकर नन्दिकेश्वर ।
शिवजीसे निवेदन करने लगे -॥५ ॥
नन्दिकेश्वर बोले — हे सुरवर्य! सिद्ध, मुनि, विष्णु आदि देवगण दैत्योंसे पराजित एवं तिरस्कृत हो आपकी शरणमें आये हैं और वे आपके दर्शनकी इच्छा करते हैं ॥ ६ ॥
इसलिये हे सर्वेश! आप [ शरणागत हुए ] इन देवताओं तथा मुनियोंकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप विशेषरूपसे दीनबन्धु और भक्तवत्सल कहे गये हैं ॥७ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार जब दयालु नन्दिकेश्वरने बार - बार शिवजीसे निवेदन किया, तब उन्होंने धीरे - धीरे अपने नेत्र खोलकर समाधिका त्याग किया ॥ ८ ॥
उसके बाद समाधिसे उपरत हुए वे महाज्ञानी परमात्मा शम्भु सभी देवताओंसे कहने लगे- ॥९ ॥
शम्भु बोले- - आप सभी ब्रह्मा, विष्णु आदि सुरेश्वर मेरे पास किसलिये आये हैं? उस कारणको शीघ्र कहिये ॥ १० ॥
ब्रह्माजी बोले — शिवजीके इस वचनको सुनकर
। सभी देवता प्रसन्न हो गये और विज्ञप्तिके लिये ।
विष्णुके मुखकी ओर देखने लगे ॥११ ॥
तब शिवके परम भक्त तथा देवताओंके हितकारक विष्णु मेरे द्वारा कहे गये देवताओंके इस बहुत बड़े कार्यका निवेदन करने लगे -॥१२ ॥
विष्णुजी बोले — हे शम्भो! तारकसे इन देवताओंको अत्यन्त अद्भुत दुःख प्राप्त हो रहा है,, यहाँ । इसी कारण सभी देवता आपसे निवेदन करने
आये हुए हैं । ॥ १३ ॥
हे शम्भो! आपके द्वारा जो औरस पुत्र उत्पन्न होगा, उसीके द्वारा तारकासुरका वध होगा, यह म कथन अन्यथा नहीं हो सकता ॥१४ ॥
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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५ ९ ३
विचार्येत्थं महादेव कृपां कुरु नमोऽस्तु ते ।
देवान्समुद्धर स्वामिन् कष्टात्तारकनिर्मितात् ॥
तस्मात्त्वया गिरिजा देव शंभो ग्रहीतव्या पाणिना दक्षिणेन । पाणिग्रहेणैव महानुभावां दत्तां गिरीन्द्रेण च तां कुरुष्व ॥
विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नो ह्यब्रवीच्छिवः ।
दर्शयन् सद्गतिं तेषां सर्वेषां योगतत्परः ॥
शिव उवाच
यदा मे स्वीकृता देवी गिरिजा सर्वसुंदरी ।
तदा सर्वे सुरेन्द्राश्च मुनयो ऋषयस्तदा ॥
सकामाश्च भविष्यति न क्षमाश्च परे पथि ।
जीवयिष्यति दुर्गा सा पाणिग्रहणतः स्मरम् ॥
मदनो हि मया दग्धः सर्वेषां कार्यसिद्धये ।
ब्रह्मणो वचनाद्विष्णो नात्र कार्या विचारणा ॥
एवं विमृश्य मनसा कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
सुधीः सर्वैश्च देवेन्द्र हठं नो कर्तुमर्हसि ॥
दग्धे कामे मया विष्णो सुरकार्यं महत् कृतम् ।
सर्वे तिष्ठन्तु निष्कामा मया सह सुनिश्चितम् ॥
यथाहं च सुराः सर्वे तथा यूयमयत्नतः ।
तपः परमसंयुक्ताः करिष्यध्वं सुदुष्करम् ॥
यूयं समाधिना तेन मदनेन विना सुराः ।
परमानंदसंयुक्ता निर्विकारा भवंतु वै ॥
पुरावृत्तं स्मरकृतं विस्मृतं यद् विधे हरे ।
महेन्द्र मुनयो देवा यत्तत्सर्वं विमृश्यताम् ॥
महाधनुर्धरेणैव मदनेन हठात्सुराः सर्वेषां ध्यानविध्वंसः कृतस्तेन पुरामराः हे महादेव! आपको नमस्कार है, आप इस १५ बातका विचारकर देवताओंपर दया कीजिये । हे स्वामिन्! तारकासुरसे उत्पन्न इस महाकष्टसे देवताओंका उद्धार कीजिये ॥ १५ ॥
इसीलिये हे देव! हे शम्भो! आपको स्वयं गिरिजाका दाहिने हाथसे पाणिग्रहण करना चाहिये; क्योंकि गिरिराज हिमालय आपको पाणिग्रहणके द्वारा ही गिरिजाको प्रदान करना चाहते हैं, अतः आप उसे १६ स्वीकार कीजिये ॥ १६ ॥
विष्णुके इस वचनको सुनकर योगमें तत्पर १७ भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उनकी सद्गतिके लिये उत्तम उपदेश करते हुए कहने लगे- ॥ १७ ॥
शिवजी बोले- [ हे देवताओ! ] जब मैं सर्वसुन्दरी गिरिजादेवीको स्वीकार करूँगा, तब सभी देवता, १८ मुनि तथा ऋषि सकाम हो जायँगे । फिर तो ये परमार्थ मार्गपर चल न सकेंगे । मेरे पाणिग्रहणसे ये दुर्गा मृत १ ९ कामदेवको पुनः जीवित कर देंगी ॥ १८-१९ ॥ मैंने सबकी कार्यसिद्धिके लिये ही कामदेवको २० जलाया है । हे विष्णो! ब्रह्माके वचनानुसार ही मैंने यह कार्य सम्पादित किया है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २० ॥
हे देवेन्द्र! आप इस कार्याकार्यकी परिस्थितिमें २१ मनसे तत्त्वका विचार करके मेरे विवाहका हठ छोड़ दीजिये ॥ २१ ॥
हे विष्णो! मैंने कामदेवको जलाकर देवताओंका २२ बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है । अब उचित यही होगा कि मेरे साथ समस्त देवगण सुनिश्चित रूपसे निष्काम होकर निवास करें । हे देवताओ! जिस प्रकार २३ मैं तपस्या करता हूँ, उसी प्रकार आपलोग भी सहजरूपसे कठोर तपमें निरत हो जाइये ॥ २२-२३ ॥ अब तो कामदेव नहीं रहा, इसलिये हे २४ देवताओ! आपलोग निर्विघ्न समाधि लगाकर आनन्दयुक्त निर्विकार भावसे निवास कीजिये । हे विधे! हे विष्णो! हे महेन्द्र! हे मुनिगण! हे देवगण! आपलोगोंने पूर्व २५ समयमें कामदेवके द्वारा किये गये सारे कार्यको भुला दिया है, उन सबपर विचार कीजिये ॥ २४-२५ ॥ । हे देवताओ! पहले इस महाधनुर्धर कामदेवने ॥ २६ हठसे सभी देवताओंका ध्यान नष्ट कर दिया था ॥ २६ ॥
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५ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
कामो हि नरकायैव तस्मात् क्रोधोऽभिजायते ।
क्रोधाद्भवति संमोहो मोहाच्च भ्रंशते तपः ॥ २७
कामक्रोधौ परित्याज्यौ भवद्भिः सुरसत्तमैः ।
सर्वैरैव च मन्तव्यं मद्वाक्यं नान्यथा क्वचित् ॥ २८
ब्रह्मोवाच
एवं विश्राव्य भगवान् महादेवो वृषध्वजः ।
सुरान् प्रवाचयामास विधिविष्णू तथा मुनीन् ॥ २ ९
तूष्णींभूतोऽभवच्छंभुर्ध्यानमाश्रित्य वै पुनः ।
आस्ते पुरा यथा स्थाणुर्गणैश्च परिवारितः ॥ ३०
स्वात्मानमात्मना शंभुरात्मन्येव व्यचिन्तयत् ।
निरंजनं निराभासं निर्विकारं निरामयम् ॥ ३१
परात्परतरं नित्यं निर्ममं निरवग्रहम् ।
शब्दातीतं निर्गुणं च ज्ञानगम्यं परात्परम् ॥ ३२
एवं स्वरूपं परमं चिन्तयन् ध्यानमास्थितः ।
परमानंदसंमग्नो बभूव बहुसूतिकृत् ॥ ३३
ध्यानस्थितं च सर्वेशं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः ।
हरिशक्रादयः सर्वे नंदिनं प्रोचुरानताः ॥ ३४
देवा ऊचुः
किं वयं करवामाद्य विरक्तो ध्यानमास्थितः ।
शंभुस्त्वं शंकरसखः सर्वज्ञः शुचिसेवकः ॥ ३५
केनोपायेन गिरिशः प्रसन्नः स्याद्गणाधिप ।
तदुपायं समाचक्ष्व वयं त्वच्छरणं गताः ॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इति विज्ञापितो देवैर्मुने हर्यादिभिस्तदा ।
प्रत्युवाच सुरांस्तान्स नंदी शंभुप्रियो गणः ॥ ३७
नंदीश्वर उवाच
हे हरे हे विधे शक्र निर्जरा मुनयस्तथा । ।
शृणुध्वं वचनं मे हि शिवसंतोषकारकम् ॥ ३८
यदि वो हठ एवाद्य शिवदारपरिग्रहे । ।
अतिदीनतया सर्वे सुनुतिं कुरुतादरात् ॥ ३ ९ ।
२४ काम ही नरकका द्वार है, कामसे क्रोध होता है, क्रोधसे मोह होता है और मोहसे तप उत्पन्न विष्ट । हो जाता है । अतः आप सभी श्रेष्ठ देवताओंको एवं क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये । काम आप सभीको मेरी यह बात स्वीकार करनी चाहिये; क्योंकि । मेरी बात कभी असत्य नहीं सिद्ध होती ॥ २७-२८ ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] वृषभध्वज भगवान् ॥ महादेवजी इस प्रकार कहनेके बाद विधाता, विष्णु, मुनिगण तथा देवताओंसे उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ २ ९ ॥ तब अपने गणोंसे घिरे हुए वे शम्भु चुपचाप होकर समाधिमें स्थित हो स्थाणुके समान अचल हो गये ॥३० ॥
वे शम्भु अपने अन्तःकरणमें अपने निरंजन, निराभास, निर्विकार एवं निरामय स्वरूपका ध्यान करने लगे । जो सबसे परे, नित्य, निर्मम, विग्रहरहित, शब्दातीत, निर्गुण, ज्ञानगम्य तथा परात्पर है ॥ ३१-३२ ॥ इस प्रकार अनेक जगत्की सृष्टि करनेवाले वे अपने परम रूपका चिन्तन करते हुए ध्यानमें स्थित हो परमानन्दमें निमग्न हो गये । उस समय विष्णु, इन्द्र आदि सभी देवता शंकरजीको ध्यानमें स्थित देखकर विनम्र होकर नन्दिकेश्वरसे कहने लगे- ॥ ३३-३४ ॥ देवता बोले— [ हे नन्दिकेश्वर! ] शिवजी विरक्त होकर ध्यानमें मग्न हैं । अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये? आप शंकरके सखा, सर्वज्ञ एवं इनके पवित्र सेवक हैं ॥ ३५ ॥
हे गणाधिप! शिवजी किस उपायसे हमलोगोंपर प्रसन्न होंगे, उस उपायको शीघ्र बताइये । हमलोग आपकी शरणमें आये हैं ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! जब इन्द्रादि देवताओंने | इस प्रकार नन्दीसे निवेदन किया, तब शिवजीके प्रिय गण नन्दी उन देवताओंसे कहने लगे- ॥ ३७ ॥
नन्दीश्वर बोले - हे हरे! हे विधे! हे इन्द्र! हे देवताओ! हे मुनियो! आपलोग शिवजीको सन्तुष्ट करनेवाला मेरा वचन सुनें ॥ ३८ ॥
यदि आपलोगोंका ऐसा ही हठ है कि शिवजी स्त्रीका पाणिग्रहण करें, तो अत्यन्त दीनभावसे आप सभी शिवजीकी उत्तम स्तुति करें ॥ ३ ९ ॥
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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५ ९ ५
भक्तेर्वश्यो महादेवो न साधारणतः सुराः ।
अकार्यमपि सद्भक्त्या करोति परमेश्वरः ॥ ४०
एवं कुरुत सर्वे हि विधिविष्णुमुखाः सुराः ।
यथागतेन मार्गेणान्यथा गच्छत मा चिरम् ॥ ४१
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुने विष्ण्वादयः सुराः ।
तथेति मत्त्वा सुप्रीत्या शंकरं तुष्टुवुर्हि ते ॥ ४२
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो ।
समुद्धर महाक्लेशात् त्राहि नः शरणागतान् ॥ ४३
ब्रह्मोवाच
इत्येवं बहुदीनोक्त्या तुष्टुवुः शंकरं सुराः ।
रुरुदुः सुस्वरं सर्वे प्रेमव्याकुलमानसाः ॥ ४४
हरिर्मया सुदीनोक्त्या सुविज्ञप्तं चकार ह ।
संस्मरन्मनसा शंभुं भक्त्या परमयान्वितः ॥ ४५
सुरैरेवं स्तुतः शंभुर्हरिणा च मया भृशम् ।
भक्तवात्सल्यतो ध्यानाद्विरतोऽभून्महेश्वरः ॥ ४६
उवाच सुप्रसन्नात्मा हर्यादीन्हर्षयन्हरः ।
विलोक्य करुणादृष्ट्या शंकरो भक्तवत्सलः ॥ ४७
शंकर उवाच
हे हरे हे विधे देवाः शक्राद्या युगपत्समे ।
किमर्थमागता यूयं सत्यं ब्रूत ममाग्रतः ॥ ४८
हरिरुवाच
सर्वज्ञस्त्वं महेशान त्वन्तर्याम्यखिलेश्वरः ।
किं न जानासि चित्तस्थं तथा वच्यपि शासनात् ॥ ४ ९
तारकासुरतो दुःखं संभूतं विविधं मृड ।
सर्वेषां नस्तदर्थं हि प्रसन्नोऽकारि वै सुरैः ॥ ५०
शिवा सा जनिता शैलात्त्वदर्थं हि हिमालयात् ।
तस्यां त्वदुद्भवात्पुत्रात्तस्य मृत्युर्न चान्यथा ॥ ५१
इति दत्तो ब्रह्मणा हि तस्मै दैत्याय यद्वरः ।
तदन्यस्मादमृत्युः स बाधते निखिलं जगत् ॥ ५२
हे देवताओ! महादेव भक्तिद्वारा वशमें हो जाते हैं, अन्य साधारण उपायोंसे वशीभूत नहीं होते । वे परमेश्वर उत्तम भक्तिसे अकार्य भी कर सकते हैं ॥ ४० ॥
हे ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओ! आपलोग ऐसा ही कीजिये, अन्यथा जहाँसे आये हैं, वहीं शीघ्र ही चले जाइये, विलम्ब न कीजिये ॥४१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! उनकी यह बात सुनकर विष्णु आदि वे देवता उस बातको मानकर अत्यन्त प्रेमसे शंकरका स्तवन करने लगे — हे देवदेव, हे महादेव, हे करुणासागर, हे प्रभो! महान् क्लेशसे हमलोगोंका उद्धार कीजिये, हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार बहुत ही दीन हो देवताओंने शिवजीकी स्तुति की और वे सब व्याकुलचित्त होकर उच्च स्वरसे रोने लगे ॥ ४४ ॥
मुझे साथ लेकर विष्णुने मनसे शिवजीका स्मरण करते हुए परम भक्तिसे युक्त होकर दीन वचनोंसे शम्भुसे प्रार्थना की । इस प्रकार जब मैंने, विष्णुने तथा सभी देवताओंने शम्भुकी स्तुति की, तब भक्तवात्सल्यके कारण वे महेश्वर ध्यानसे विरत हो गये । तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर दुःखोंका हरण करनेवाले वे भक्त-वत्सल शंकर विष्णु आदि देवगणोंको हर्षित करते हुए करुणाभरी दृष्टिसे देखकर कहने लगे— ॥ ४५–४७ ॥ शंकर बोले- हे हरे! हे विधे! हे इन्द्रादि देवताओ! आप सब एक साथ किसलिये आये हैं, मेरे सामने सच - सच बताइये ॥४८ ॥
विष्णु बोले – हे महेश्वर! आप सर्वज्ञ, अन्तर्यामी तथा अखिलेश्वर हैं । क्या आप हमारे मनकी बात नहीं जानते, फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार निवेदन कर रहा हूँ । हे मृड! हम सब देवताओंको तारकासुरसे महान् दुःख प्राप्त हो रहा है, इसीलिये हम देवताओंने आपको प्रसन्न किया है । वे शिवा आपके लिये ही हिमालयकी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई हैं; क्योंकि आपके द्वारा पार्वतीसे उत्पन्न पुत्रके द्वारा ही तारकासुरकी मृत्यु होनेवाली है, यह बात अन्यथा नहीं है ॥ ४ ९ –५१ ॥ ब्रह्माजीने उस तारकासुरको इसी प्रकारका वरदान दे रखा है । वह अन्य किसीके द्वारा मारा नहीं जायगा, । यही कारण है कि वह सबको पीड़ित कर रहा है ॥ ५२ ॥
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५ ९ ६ नारदस्य निदेशात्सा करोति कठिनं तपः तत्तेजसाखिलं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ वरं दातुं शिवायै हि गच्छ त्वं परमेश्वर देवदुःखं जहि स्वामिन्नस्माकं सुखमावह ॥
देवानां मे महोत्साहो हृदये चास्ति शंकर ।
विवाहं तव संद्रष्टुं तत्त्वं कुरु यथोचितम् ॥
रत्यै यद्भवता दत्तो वरस्तस्य परात्पर ।
प्राप्तोऽवसर एवाशु सफलं स्वपणं कुरु ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा तं प्रणम्यैव विष्णुर्देवा महर्षयः ।
संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः संतस्थुस्तत्पुरोऽखिलाः ॥
भक्ताधीनः शंकरोऽपि श्रुत्वा देववचस्तदा ।
विहस्य प्रत्युवाचाशु वेदमर्यादरक्षकः ॥
शंकर उवाच
हे हरे हे विधे देवाः शृणुतादरतोऽखिलाः ।
यथोचितमहं वच्मि सविशेषं विवेकतः ॥
नोचितं हि विधानं वै विवाहकरणं नृणाम् ।
महानिगडसंज्ञो हि विवाहो दृढबन्धनः ॥
कुसङ्गा बहवो लोके स्त्रीसङ्गस्तत्र चाधिकः ।
उद्धरेत्सकलैर्बन्धैर्न स्त्रीसङ्गात्प्रमुच्यते ॥
लोहदारुमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते ।
स्त्र्यादिपाशसुसंबद्धो मुच्यते न कदाचन ॥
वर्धन्ते विषयाः शश्वन्महाबंधनकारिणः ।
विषयाक्रांतमनसः स्वप्ने मोक्षोऽपि दुर्लभः ॥
सुखमिच्छति चेत्प्राज्ञो विधिवद्विषयांस्त्यजेत् ।
विषवद्विषयानाहुर्विषयैयैर्निहन्यते ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २४ । इस समय देवर्षि नारदके उपदेशानुसार वे पार्वती ५३ | तपस्या कर रही हैं और उनके तेजसे चराचरसहित समस्त त्रैलोक्य व्याप्त हो रहा है ॥ ५३ ॥
। इसलिये हे परमेश्वर! आप शिवाको वर देनेहेतु ५४ जाइये । हे स्वामिन्! ऐसा करके हम देवताओंका । दुःख दूर कीजिये तथा हमलोगोंको सुखी कीजिये ॥ ५४ ॥
हे शंकर! देवताओंके और मेरे मनमें आपका ५५ विवाह देखनेके लिये महान् उत्साह है, अत: आप उसे उचित रूपसे कीजिये । हे परात्पर! आपने रतिको जो वरदान दिया है, उसका भी अवसर उपस्थित हो गया ५६ है, आप अपनी प्रतिज्ञाको सफल कीजिये ॥ ५५-५६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणामकर तथा अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके विष्णु आदि देवता और महर्षि सब - के - सब उनके ५७ सामने खड़े हो गये । तब वेदकी मर्यादाकी रक्षा करनेवाले तथा भक्तोंके अधीन रहनेवाले शिवजी भी ५८ देवताओंके वचनको सुनकर हँस करके शीघ्र कहने लगे— ॥ ५७-५८ ॥ शंकर बोले- हे हरे! हे विधे! हे देवताओ! मैं ज्ञानसे युक्त और यथोचित बातें कहता हूँ, उसे ५ ९ आप सब आदरपूर्वक सुनें । विवाह करना मनुष्योंके लिये उचित विधान नहीं है; क्योंकि विवाह बेड़ीके समान अत्यन्त कठिन दृढ़बन्धन है । संसारमें बहुतसे ६० कुसंग हैं, परंतु उनमें स्त्रीसंग सबसे बढ़कर है; क्योंकि मनुष्य सभी प्रकारके बन्धनोंसे छुटकारा प्राप्त ६१ कर सकता है, किंतु स्त्रीसंगसे उसका छुटकारा नहीं होता ॥५ ९ –६१ ॥ लोहे तथा लकड़ीके पाशोंमें दृढ़तापूर्वक बँधा ६२ हुआ पुरुष उससे छुटकारा पा सकता है, किंतु स्त्री | आदिके पाशमें बँधा हुआ कभी मुक्त नहीं होता है ॥ ६२ ॥
[ स्त्रीसंगसे ] महाबन्धनकारी विषय निरन्तर ६३ बढ़ते रहते हैं, विषयोंसे आक्रान्त मनवालेको स्वजमें भी मोक्ष दुर्लभ हो जाता है ॥६३ ॥
यदि बुद्धिमान् पुरुष सुख प्राप्त करना चाहे, तो । विषयोंको भलीभाँति छोड़ दे । जिन विषयोंसे प्राणी मारा ६४ । जाता है, वे विषय विषके समान कहे गये हैं । ६४ ॥
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अ ० २४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ५ ९ ७
जनो विषयिणा साकं वार्तातः पतति क्षणात् ।
विषयं प्राहुराचार्याः सितालिप्तेन्द्रवारुणीम् ॥
यद्यप्येवं हि जानामि सर्वं ज्ञानं विशेषतः ।
तथाप्यहं करिष्यामि प्रार्थनां सफलां च वः ॥
भक्ताधीनोऽहमेवास्मि तद्वशात्सर्वकार्यकृत् ।
अयथोचितकर्ता हि प्रसिद्धो भुवनत्रये ॥
कामरूपाधिपस्यैव पणश्च सफलः कृतः ।
सुदक्षिणस्य भूपस्य भवबंधगतस्य हि ॥
गौतमक्लेशकर्ताहं त्र्यंबकात्मा सुखावहः ।
तत्कष्टप्रददुष्टानां शापदायी विशेषतः ॥
विषं पीतं सुरार्थं हि भक्तवत्सलभावधृक् ।
देवकष्टं हृतं यत्नात्सर्वदैव मया सुराः ॥
भक्तार्थमसहं कष्टं बहुशो बहुयत्नतः ।
विश्वानरमुनेर्दुःखं हृतं गृहपतिर्भवन् ॥
किं बहूक्तेन च हरे विधे सत्यं ब्रवीम्यहम् ।
मत्पणोऽस्तीति यूयं वै सर्वे जानीथ तत्त्वतः ॥
यदा यदा विपत्तिर्हि भक्तानां भवति क्वचित् । तदा तदा हराम्याशु तत्क्षणात्सर्वशः सदा
जानेऽहं तारकादुःखं सर्वेषां वः समुत्थितम् ।
असुरात्तद्धरिष्यामि सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
नास्ति यद्यपि मे काचिद्विवाहकरणे रुचिः विवाहयिष्ये गिरिजां गिरिजां पुत्रोत्पादनहेतवे गच्छत स्वगृहाण्येव निर्भयाः सकलाः सुराः । कार्यं वः साधयिष्यामि नात्र कार्या विचारणा मोक्षकी कामना करनेवाला पुरुष विषयी पुरुषोंके ६५ साथ वार्ता करनेमात्रसे क्षणभरमें ही पतित हो जाता है । आचार्योंने विषयवासनाको शर्करासे आलिप्त इन्द्रायनफलके समान ( आपातमधुर ) कहा है ॥ ६५ ॥
यद्यपि मैं समस्त ज्ञान विशेष रूपसे जानता हूँ, ६६ फिर भी मैं आपलोगोंकी प्रार्थनाको सफल करूँगा ॥ ६६ ॥
तीनों लोकोंमें मेरी प्रसिद्धि है कि मैं भक्तोंके ६७ वशमें होनेसे सभी प्रकारके उचित - अनुचित कार्य करता हूँ ॥६७ ॥
मैंने कामरूप देशके राजाकी प्रतिज्ञा सफल की ६८ और भव - बन्धनमें पड़े हुए राजा सुदक्षिणका प्रण मैंने पूरा किया ॥६८ ॥
मैंने गौतमको क्लेश दिया, मैं त्र्यम्बकात्मा ६ ९ सबको सुख देनेवाला हूँ और जो भक्तोंको दुःख देनेवाले हैं, उन दुष्टोंको विशेष रूपसे कष्ट तथा शाप प्रदान करता हूँ ॥६ ९ ॥ मैंने अपनी भक्तवत्सलताका भाव प्रकट करनेके ७० लिये ही विषपान किया था । हे देवताओ! मैंने यत्नसे सदैव ही देवताओंके कष्टोंको दूर किया है ॥ ७० ॥
मैंने भक्तोंके लिये बहुत बार अनेक कष्ट उठाया ७१ है । मैंने विश्वानर मुनिके घर गृहपतिके रूपमें जन्म लेकर उनके दुःखको दूर किया है । हे हरे! हे विधे! मैं अधिक क्या कहूँ । मैं सत्य कहता हूँ और मेरी जो ७२ प्रतिज्ञा है, उसे भी आपलोग अच्छी तरह जानते हैं ॥ ७१-७२ ॥ जब - जब मेरे भक्तोंपर किसी प्रकारकी विपत्ति ॥ ७३ आती है, तब - तब मैं उन्हें शीघ्र ही सब प्रकारसे दूर कर देता हूँ ॥७३ ॥
इस समय तारकासुरके द्वारा जो विपत्ति आपलोगोंपर ७४ आ पड़ी है, उसे भी मैं जानता हूँ । उस दुःखको भी मैं दूर कर दूँगा, यह मैं सत्य - सत्य कह रहा हूँ ॥७४ ॥
यद्यपि मुझे विवाहमें कोई इच्छा नहीं है, तो । भी [ आपलोगोंके लिये ] पुत्र उत्पन्न करनेहेतु ॥ ७५ गिरिजासे विवाह करूँगा । हे देवताओ! अब आपलोग निडर होकर अपने - अपने घरोंको जाइये । मैं आपलोगोंका कार्य सिद्ध करूँगा । इसमें सन्देह ॥ ७६ नहीं करना चाहिये ॥ ७५-७६ ॥
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५ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २५ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- हे मुने! ऐसा कहकर इत्युक्त्वा मौनमास्थाय समाधिस्थोऽभवद्धरः । पुनः: मौन धारणकर समाधिस्थ हो गये और विष्णु शंकर आदि सर्वे विष्ण्वादयो देवाः स्वधामानि ययुर्मुने ॥ ७७ | समस्त देवता अपने - अपने धामोंको लौट गये ॥ ७७ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीविवाहस्वीकारो नाम चतुर्विंशोऽध् ऽध्यायः ॥ २४ ॥
॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीविवाहस्वीकार नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः भगवान् शंकरकी आज्ञासे सप्तर्षियोंद्वारा करना और वह वृत्तान्त भगवान् नारद उवाच
गतेषु तेषु देवेषु विधिविष्ण्वादिकेषु च ।
सर्वेषु मुनिषु प्रीत्या किं बभूव ततः परम् ॥ १
किं कृतं शंभुना तात वरं दातुं समागतः ।
कियत्कालेन च कथं तद्वद प्रीतिमावह ॥ २
ब्रह्मोवाच
गतेषु तेषु देवेषु ब्रह्मादिषु निजाश्रमम् ।
तत्तपः सुपरीक्षार्थं समाधिस्थोऽभवद्भवः ॥ ३
स्वात्मानमात्मना कृत्वा स्वात्मन्येव व्यचिन्तयत् ।
परात्परतरं स्वस्थं निर्मायं निरवग्रहम् ॥ ४
तद्वस्तुभूत भगवानीश्वरो वृषभध्वजः ।
अविज्ञातगतिः सूतिः स हरः परमेश्वरः ॥ ५
ब्रह्मोवाच
गिरिजा हि तदा तात तताप परमं तपः ।
तपसा तेन रुद्रोऽपि परं विस्मयमागतः ॥ ६
समाधेश्चलितस्सोऽभूद्भक्ताधीनोऽपि नान्यथा ।
वसिष्ठादीन्मुनीन्सप्त सस्मार सूतिकृद्धरः ॥ ७
सप्तापि मुनयः शीघ्रमाययुः स्मृतिमात्रतः ।
प्रसन्नवदनाः सर्वे वर्णयन्तो विधिं बहु ॥ ८
प्रणम्य तं महेशानं तुष्टुवुर्हर्षनिर्भराः ।
वाण्या गद्गदया बद्धकरा विनतकंधराः ॥ ९
सप्तर्षय ऊचुः
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो ।
जाता वयं सुधन्या हि त्वया यदधुना स्मृताः ॥ १० ।
पार्वतीके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा शिवको बताकर स्वर्गलोक जाना नारदजी बोले – [ हे ब्रह्मन्! ] उन ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं तथा सभी मुनियोंके प्रेमपूर्वक चले जानेपर फिर क्या हुआ? हे तात! शिवने क्या किया और फिर कितने समयके बाद तथा किस प्रकार वर देनेके लिये आये, उसे बताइये और प्रीति प्रदान कीजिये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उन ब्रह्मा आदि देवताओंके अपने-अपने आश्रमोंको चले जानेपर पार्वतीकी तपस्याकी परीक्षा करनेके लिये शिवजी समाधिस्थ हो गये ॥३ ॥
उन्होंने अपने आत्मासे ही परमात्मामें परात्पर, निरवग्रह, आत्मस्थित ज्योतिको धारणकर विचार किया ॥४ ॥
वस्तुतः वे शिव ही भगवान्, ईश्वर, वृषभध्वज, अविज्ञातगति, जगत्स्रष्टा, हर एवं परमेश्वर हैं ॥ ५ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे तात! उसी समय पार्वतीने भी महाघोर तपस्या प्रारम्भ की, उस तपसे शंकर भी । अत्यन्त विस्मित हो गये । भक्तोंके अधीन रहनेवाले वे समाधिसे विचलित हो गये । तब उन जगत्स्रष्टा हरने वसिष्ठादि सप्तर्षियोंका स्मरण किया ॥ ६-७ ॥ वे सभी सप्तर्षि भी शिवजीके स्मरण करते ही करते प्रसन्नमुख होकर अपने भाग्यकी बहुत सराहना । हुए वहाँ शीघ्र ही उपस्थित हो गये । उन महेश्वरको | प्रणाम करके वे हर्षपूर्वक गद्गद वाणी हाथ । जोड़कर तथा सिर झुकाकर स्तुति करने लगे ॥ ८ - ९ ॥ ! हे सप्तर्षि बोले- हे देवदेव! हे महादेव | करुणासागर! हे प्रभो! हमलोग धन्य हो गये, जो आपने आज हमलोगोंका स्मरण किया ॥१० ॥