शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 621–630

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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अ ० २७ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६० ९ कपालधारी सर्पोौघैः सर्वगात्रेषु वेष्टितः । वे कपाल धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण शरीरमें विषदिग्धोऽभक्ष्यभक्षो विरूपाक्षो विभीषणः ॥ १३ साँप लपेटे रहते हैं । वे विष पीनेवाले, अभक्ष्यका भक्षण

अव्यक्तजन्मा सततं गृहभोगविवर्जितः ।

दिगंबरो दशभुजो भूतप्रेतान्वितस्सदा ॥ १४

केन वा कारणेन त्वं तं भर्तारं समीहसे ।

क्व ज्ञानं ते गतं देवि तद्वदाद्य विचारतः ॥ १५

पूर्वं श्रुतं मया चैव व्रतं तस्य भयंकरम् ।

शृणु ते निगदाम्यद्य यदि ते श्रवणे रुचिः ॥१६

दक्षस्य दुहिता साध्वी सती वृषभवाहनम् ।

वव्रे पतिं पुरा दैवात्तत्संभोगः परिश्रुतः ॥ १७

कपालिजायेति सती दक्षेण परिवर्जिता ।

यज्ञे भागप्रदानाय शंभुश्चापि विवर्जितः ॥ १८

सा तथैवापमानेन भृशं कोपाकुला सती ।

तत्याजासून्प्रियाँस्तत्र तया त्यक्तश्च शंकरः ॥ १ ९

त्वं स्त्रीरत्नं तव पिता राजा निखिलभूभृताम् ।

तथाविधं पतिं कस्मादुग्रेण तपसेहसे ॥ २०

दत्त्वा सुवर्णमुद्रां च ग्रहीतुं काचमिच्छसि ।

हित्वा च चंदनं शुभ्रं कर्दमं लेप्तुमिच्छसि ॥ २१

सूर्यतेजः परित्यज्य खद्योतद्युतिमिच्छसि ।

विहायैव चर्माम्बरमिहेच्छसि ॥ २२

चीनांशुकं

गृहवासं परित्यज्य वनवासं समीहसे ।

लोहमिच्छसि देवेशि त्यक्त्वा शेवधिमुत्तमम् ॥ २३

इन्द्रादिलोकपालांश्च हित्वा शिवमनुव्रता ।

नैतत्सूक्तं हि लोकेषु विरुद्धं दृश्यतेऽधुना ॥ २४

क्व त्वं कमलपत्राक्षी क्वासौ वै त्रिविलोचनः ।

करनेवाले, विरूपाक्ष और महाभयंकर हैं ॥ १३ ॥

उनके जन्मका किसीको पता नहीं है और वे गृहस्थोचित भोगसे सर्वथा रहित हैं । वे दिगम्बर, दशभुजावाले तथा भूत - प्रेतोंके साथ निवास करते हैं ॥ १४ ॥

हे देवि! तुम किस कारणसे उन्हें अपना पति बनाना चाहती हो, तुम्हारा ज्ञान कहाँ खो गया है, इसे विचारकर मुझसे इस समय कहो - मैंने पूर्व समयमें भी उनका भयंकर चरित्र सुना है । यदि तुम्हें उसे सुननेकी इच्छा हो, तो मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो ॥ १५-१६ ॥ पहले दक्षकन्या साध्वी सतीने वृषभवाहन शिवका वरण किया था, उसके साथ उन्होंने जैसा व्यवहार किया, वह बात भी तुमने सुनी होगी । दक्षने स्वयं अपनी कन्याको इसीलिये नहीं बुलाया कि वह कपालीकी पत्नी है और यज्ञमें शिवजीको भाग भी नहीं दिया ॥ १७-१८ ॥ इस अपमानसे अत्यन्त क्रुद्ध हुई सतीने अपने प्रिय प्राण त्याग दिये और उसने शंकरजीको भी छोड़ दिया ॥ १ ९ ॥ तुम सभी स्त्रियोंमें रत्न हो और तुम्हारे पिता भी पर्वतोंके राजा हैं, फिर उग्र तपस्याके द्वारा तुम इस प्रकारके पतिको क्यों प्राप्त करना चाहती हो? ॥ २० ॥

तुम सुवर्णकी मुद्रा देकर काँच क्यों ग्रहण करना चाहती हो और सुन्दर चन्दनको छोड़कर कीचड़ लगानेकी इच्छा क्यों कर रही हो? सूर्यका तेज छोड़कर तुम जुगनूका प्रकाश क्यों चाहती हो और रेशमी वस्त्रको त्यागकर चमड़ा क्यों पहनना चाहती हो? ॥ २१-२२ ॥ घरमें रहना छोड़कर वनमें रहना चाहती हो और हे देवेशि! उत्तम खजानेको छोड़कर लोहेकी इच्छा करती हो । जो तुम इन्द्र आदि लोकपालोंको छोड़कर शिवमें अनुरक्त हुई हो, यह तो उचित नहीं है और यह लोकके सर्वथा विरुद्ध दिखायी पड़ता है ॥ २३-२४ ॥ कहाँ तुम कमलके समान विशाल नेत्रवाली हो और कहाँ वे भयंकर तीन नेत्रवाले हैं । तुम चन्द्रमाके समान मुखवाली हो तथा वे शिव पाँच मुखवाले कहे शशांकवदना त्वं पंचवक्त्रः शिवः स्मृतः ॥ २५ । गये हैं ॥ २५ ॥

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पृष्ठ 622

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६१० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७

वेणी शिरसि ते दिव्या सर्पिणीव विभासिता ।

जटाजूटं शिवस्यैव प्रसिद्धं परिचक्षते ॥ २६

चंदनं च त्वदीयाङ्गे चिताभस्म शिवस्य च ।

क्व दुकूलं त्वदीयं वै शाङ्करं क्व गजाजिनम् ॥ २७

क्व भूषणानि दिव्यानि क्व सर्पाः शंकरस्य च ।

क्व चरा देवताः सर्वाः क्व च भूतबलिप्रियः ॥ २८

क्व वा मृदङ्गवादश्च क्व च तड्डुमरुस्तथा ।

क्व च भेरीकलापश्च क्व च शृङ्गरवोऽशुभः ॥ २ ९

क्व च ढक्कामयः शब्दो गलनादः क्व चाशुभ: ।

भवत्याश्च शिवस्यैव न युक्तं रूपमुत्तमम् ॥ ३०

यदि द्रव्यं भवेत्तस्य कथं स्यात्स दिगम्बरः ।

वाहनं च बलीवर्दः सामग्री कापि तस्य न ॥ ३१

वरेषु ये गुणाः प्रोक्ता नारीणां सुखदायकाः ।

तन्मध्ये हि विरूपाक्षे एकोऽपि न गुणः स्मृतः ॥ ३२

तवापि कामो दयितो दग्धस्तेन हरेण च ।

अनादरस्तदा दृष्टो हित्वा त्वामन्यतो गतः ॥ ३३

जातिर्न दृश्यते तस्य विद्या ज्ञानं तथैव च ।

सहायाश्च पिशाचा हि विषं कण्ठे हि दृश्यते ॥ ३४

एकाकी च सदा नित्यं विरागी च विशेषतः ।

तस्मात्त्वं हि हरेणैव मनो योक्तुं न चार्हसि ॥ ३५

क्व च हारस्त्वदीयो वै क्व च तन्मुण्डमालिका ।

अङ्गरागः क्व ते दिव्यः चिताभस्म क्व तत्तनौ ॥ ३६

सर्वं विरुद्धं रूपादि तव देवि हरस्य च । मह्यं न रोचते ह्येतद्यदिच्छसि तुम्हारे सिरपर सर्पिणीके समान वेणी सुशोभित है और शिवका जटाजूट तो प्रसिद्ध ही है ॥ । तुम्हारे शरीरमें चन्दनका लेप और २६ ॥ शिवके । । शरीरमें चिताका भस्म लगा रहता है । कहाँ तुम्हारा | दुकूल और कहाँ शंकरका गजचर्म! कहाँ [ तुम्हारे ] दिव्य आभूषण और कहाँ शंकरके सर्प! कहाँ सभी देवता तुम्हारे सेवक तथा कहाँ भूतों तथा बलिको प्रिय समझनेवाला वह शिव! ॥ २७-२८ ॥ कहाँ [ तुम्हें सुख देनेवाला ] मृदंगवाद्य और कहाँ डमरू? कहाँ तुम्हारी भेरीकी ध्वनि और कहाँ उनका अशुभदायक शृंगीका शब्द! कहाँ तुम्हारा ढक्का नामक बाजेका शब्द और उनका अशुभ गलेका शब्द! तुम्हारा रूप उत्तम है और शिवका रूप नहीं है ॥ २ ९ -३० ॥ यदि उनके पास द्रव्य होता तो वे दिगम्बर कैसे होते, उनका वाहन भी बैल है तथा उनके पास और कोई सामग्री भी नहीं है । स्त्रियोंको सुख देनेवाले जो गुण वरोंमें बताये गये हैं, उनमेंसे एक भी गुण विरूपाक्ष शिवमें नहीं कहा गया है ॥ ३१-३२ ॥ उन्होंने तुम्हारे अत्यन्त प्रिय कामदेवको भी भस्म कर दिया । उस समय तुमने अपना अनादर भी देख लिया कि वे तुम्हें छोड़कर अन्यत्र चले गये ॥ ३३ ॥

उनकी जातिका पता नहीं है, उसी प्रकार उनके ज्ञान तथा विद्याका भी पता नहीं, पिशाच ही उनके सहायक हैं और उनके गलेमें विष दिखायी पड़ता है ॥ ३४ ॥

वे विशेष रूपसे विरक्त हैं, इसलिये अकेले रहते हैं । अत: तुम शंकरके साथ अपना मन मत जोड़ो ॥ ३५ ॥

कहाँ तुम्हारा हार और कहाँ उनकी मुण्डमाला! कहाँ तुम्हारा दिव्य अंगराग और कहाँ उनके शरीरमें चिताभस्म!॥ ३६ ॥

हे देवि! तुम्हारा और शंकरका रूप आदि सब तथा कुरु ॥ ३७ कुछ एक - दूसरेके विपरीत है मुझे तो यह अच्छा नहीं | लगता, अब तुम जैसा चाहती , हो, वैसा करो ॥ ३७ ॥

असद्वस्तु च यत्किंचित् तत्सर्वं स्वयमीहसे । जो कुछ भी असद् वस्तु है, वह सब तुम स स्वयं । निवर्तय मनस्तस्मान्नो । चाह रही हो । तुम उससे अपना मन हटा लो '

चेदिच्छसि तत्कुरु ॥ ३८ । अन्यथा जो चाहती हो, उसे करो ॥३८॥

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पृष्ठ 623

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 623 का मूल पृष्ठ
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अ ० २८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६११ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- उस ब्राह्मणके इस प्रकारके इत्येवं वचनं श्रुत्वा तस्य विप्रस्य पार्वती । वचन सुनकर पार्वती कुपित मनसे उन शिवनिन्दक उवाच क्रुद्धमनसा शिवनिन्दापरं द्विजम् ॥ ३ ९ ब्राह्मणसे कहने लगीं - ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे ब्रह्मचारिप्रतारणवाक्यवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें ब्रह्मचारिप्रतारणवाक्यवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

अथाष्टाविंशोऽध्यायः पार्वतीद्वारा परमेश्वर शिवकी महत्ता प्रतिपादित करना और रोषपूर्वक जटाधारी ब्राह्मणको फटकारना, शिवका पार्वतीके समक्ष प्रकट होना पार्वत्युवाच

एतावद्धि मया ज्ञातं कश्चिदन्योऽयमागतः ।

इदानीं सकलं ज्ञातमवध्यस्त्वं विशेषतः ॥

त्वयोक्तं विदितं देव तदलीकं न चान्यथा ।

यदि त्वयोदितं स्याद्वै विरुद्धं नोच्यते त्वया ॥

कदाचिद् दृश्यते तादृक् वेषधारी महेश्वरः ।

स्वलीलया परब्रह्म स्वरागोपात्तविग्रहः ॥

ब्रह्मचारिस्वरूपेण प्रतारयितुमुद्यतः ।

आगतश्छलसंयुक्तं वचोऽवादीः कुयुक्तितः ॥

शंकरस्य स्वरूपं तु जानामि सुविशेषतः ।

शिवतत्त्वमतो वच्मि सुविचार्य यथार्हतः ॥

वस्तुतो निर्गुणो ब्रह्म सगुणः कारणेन सः ।

कुतो जातिर्भवेत्तस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥

स सर्वासां हि विद्यानामधिष्ठानं सदाशिवः ।

किं तस्य विद्यया कार्यं पूर्णस्य परमात्मनः ॥

वेदा उच्छ्वासरूपेण पुरा दत्ताश्च विष्णवे ।

शंभुना तेन कल्पादौ तत्समः ' कोऽस्ति सुप्रभुः ॥

सर्वेषामादिभूतस्य वयोमानं कुतस्ततः ।

प्रकृतिस्तु ततो जाता किं शक्तेस्तस्य कारणम् ॥

2223 पार्वतीजी बोलीं- मैं तो यही समझती थी कि यह कोई अन्य ही आया है, किंतु अब मैंने सब कुछ १ जान लिया है । [ क्रोध तो बहुत आ रहा है, किंतु ब्रह्मचारी होनेसे ] तुम विशेषरूपसे अवध्य हो ॥ १ ॥

हे देव! आपने जो कहा है, उसे मैंने जान २ लिया, वह सब मिथ्या है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं । यदि आप शिवजीको जानते होते, तो ऐसी विरुद्ध बातें नहीं करते ॥२ ॥

महेश्वर, जो इस प्रकारका वेष धारण करते हुए ३ देखे जाते हैं, उसका यही कारण है कि वे लीला करनेके लिये ही वैसा वेष धारण करते हैं । आप ब्रह्मचारीका रूप धारणकर मुझे छलना चाहते हैं, इसीलिये कुतर्कसे ४ भरी हुई ऐसी बातें मुझसे कह रहे हैं ॥ ३-४ ॥ शंकरके स्वरूपको मैं विशेष रूपसे जानती हूँ, ५ इसलिये विचारकर यथार्थ रूपसे शिवतत्त्व कहती हूँ ॥ ५ ॥

वस्तुत: वे निर्गुण ब्रह्म हैं और कारणवश सगुण हो जाते हैं । जो निर्गुण होकर मायासे सगुणरूप धारण ६ करता है, उसका जन्म किस प्रकारसे सम्भव है? ॥६ ॥

वे सदाशिव सभी विद्याओंके अधिष्ठान हैं, ७ उन पूर्ण परमात्माको विद्यासे क्या प्रयोजन? कल्पके आदिमें उन्हीं सदाशिवने सर्वप्रथम विष्णुको उच्छ्वासरूपसे वेद प्रदान किये थे, उनके समान कौन परम प्रभु ८ है? ॥ ७-८ ॥ जो सबका आदिकारण है, उसकी अवस्थाका प्रमाण कौन कर सकता है । यह प्रकृति तो उन्हींसे उत्पन्न हुई है, फिर उनकी शक्तिका दूसरा कारण क्या ९ हो सकता है? ॥ ९ ॥

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पृष्ठ 624

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६१२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ ये भजंति च तं प्रीत्या शक्तीशं शंकरं सदा । जो लोग प्रेमपूर्वक शक्तिके पति उन सदाशिवका तस्मै शक्तित्रयं शंभुः स ददाति सदाव्ययम् ॥ १० भजन करते हैं, उनको शिवजी सदा ही अक्षयरूप ।

तस्यैव भजनाज्जीवो मृत्युं जयति निर्भयः ।

तस्मान्मृत्युञ्जयं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये ॥ ११

तस्यैव पक्षपातेन विष्णुर्विष्णुत्वमाप्नुयात् ।

ब्रह्मत्वं च यथा ब्रह्मा देवा देवत्वमेव च ॥ १२

दर्शनार्थं शिवस्यादौ यथा गच्छति देवराट् ।

भूतादयस्तत्परस्य द्वारपालाः शिवस्य तु ॥ १३

दण्डैश्च मुकुटं विद्धं मृष्टं भवति सर्वतः ।

किं तस्य बहुपक्षेण स्वयमेव महाप्रभुः ॥ १४

कल्याणरूपिणस्तस्य सेवयेह न किं भवेत् ।

किं न्यूनं तस्य देवस्य मामिच्छति सदाशिवः ॥ १५

सप्तजन्मदरिद्रः स्यात्सेवेद्यो यदि शंकरम् ।

तस्यैतत्सेवनाल्लोके लक्ष्मीः स्यादनपायिनी ॥ १६

यदग्रे सिद्धयोऽष्टौ च नित्यं नृत्यंति तोषितुम् ।

अवाङ्मुखाः सदा तत्र तद्धितं दुर्लभं कुतः ॥ १७

यद्यस्य मङ्गलानीह सेवते शंकरस्य न ।

तथापि मङ्गलं तस्य स्मरणादेव जायते ॥१८

यस्य पूजाप्रभावेण कामाः सिद्ध्यन्ति सर्वशः । ।

कुतो विकारस्तस्यास्ति निर्विकारस्य सर्वदा ॥ १ ९

शिवेति मङ्गलं नाम मुखे यस्य निरन्तरम् ।

तस्यैव दर्शनादन्ये पवित्राः सन्ति सर्वदा ॥ २० ।

यद्यपूतं भवेद्भस्म चितायाश्च त्वयोदितम् ।

नित्यमस्याङ्गगं देवैः शिरोभिर्धार्यते कथम् ॥ २१ ।

। तीनों शक्तियाँ ( क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति और ज्ञानशक्ति । प्रदान करते हैं ॥१० ॥ )

• जीव उन्हींके भजनसे निर्भय होकर मृत्युको जीत लेता है, इसलिये त्रिलोकीमें उनका मृत्युंजय नाम प्रसिद्ध है ॥११ ॥

उन्हींके पक्षमें रहनेसे विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व तथा देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है ॥१२ ॥

देवताओंमें प्रमुख इन्द्र जब भगवान् शिवके दर्शनार्थ जाते हैं, तब भगवान् शिवके जो द्वारपाल एवं भूत आदि हैं, सादर उनके दण्डोंमें घिसा गया इन्द्रका मुकुट सब प्रकारसे उज्ज्वल हो उठता है । उनके विषयमें बहुत बात करनेसे क्या? वे तो स्वयं प्रभु हैं ॥ १३-१४ ॥ उन कल्याणस्वरूप शिवजीकी सेवा करनेसे इस लोकमें क्या नहीं सिद्ध हो जाता है । उन देवके पास किस बातकी कमी है, जो वे सदाशिव मेरी इच्छा करें ॥ १५ ॥

जो सात जन्मोंका दरिद्र हो, वह भी यदि शंकरकी सेवा करे, तो उनकी इस सेवासे उसे लोकमें स्थिर रहनेवाली लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥

जिन्हें सन्तुष्ट करनेके लिये आठों सिद्धियाँ सदा नीचेकी ओर मुख किये जिनके आगे सदा नृत्य करती हैं, उनसे हित होना कहाँसे दुर्लभ है? ॥१७ ॥

यद्यपि समस्त मंगल उन शिवजीकी सेवा नहीं करते अर्थात् वे मंगलवेश धारण नहीं करते, तो भी उनके स्मरणमात्रसे ही पुरुषका मंगल होता है ॥ १८ ॥

जिनकी पूजाके प्रभावसे निरन्तर समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, उन निर्विकार शंकरमें विकार कहाँसे हो सकता है? जिसके मुखसे ' शिव ' यह मंगल नाम निरन्तर निकलता है, उस पुरुषके दर्शनमात्रसे ही दूसरे प्राणी सदा पवित्र हो जाते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ [ हे ब्रह्मचारिन्! ] जैसा आपने कहा है कि चिताकी भस्म अपवित्र होती है, तो देवगण उनके अंगमें शोभित भस्म सिरपर नित्य क्यों धारण करते हैं? ॥ २१ ॥

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पृष्ठ 625

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अ ० २८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६१३

यो देवो जगतां कर्ता भर्ता हर्ता गुणान्वितः ।

निर्गुणः शिवसंज्ञश्च स विज्ञेयः कथं भवेत् ॥

अगुणं ब्रह्मणो रूपं शिवस्य परमात्मनः ।

तत्कथं हि विजानन्ति त्वादृशास्तद्बहिर्मुखाः ॥

दुराचाराश्च पापाश्च वेदेभ्यो ये विनिर्गताः ।

तत्त्वं ते नैव जानन्ति शिवस्यागुणरूपिणः ॥

शिवनिन्दां करोतीह तत्त्वमज्ञाय यः पुमान् ।

आजन्मसंचितं पुण्यं भस्मीभवति तस्य तत् ॥

त्वया निंदा कृता यात्र हरस्यामिततेजसः ।

त्वत्पूजा च कृता यन्मे तस्मात्पापं भजाम्यहम् ॥

शिवविद्वेषिणं दृष्ट्वा सचैलं स्नानमाचरेत् ।

शिवविद्वेषिणं दृष्ट्वा प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥

रे रे दुष्ट त्वया चोक्तमहं जानामि शंकरम् ।

निश्चयेन न विज्ञातश्शिव एव सनातनः ॥

यथा तथा भवेद्रुद्रो यथा वा बहुरूपवान् ।

ममाभीष्टतमो नित्यं निर्विकारी सतां प्रियः ॥

विष्णुर्ब्रह्मापि न समः तस्य क्वापि महात्मनः । कुतोऽन्ये निर्जराद्याश्च कालाधीनाः सदैव ते

इति बुद्ध्या समालोक्य स्वया सत्या सुतत्त्वतः ।

शिवार्थं वनमागत्य करोमि विपुलं तपः ॥

स एव परमेशानः सर्वेशो भक्तवत्सलः संप्राप्तुं मेऽभिलाषो हि दीनानुग्रहकारकम् ॥ ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा गिरिजा सा हि गिरीश्वरसुता मुने जो देव जगत्का कर्ता, भर्ता तथा हर्ता है, २२ गुणोंसे संयुक्त है, निर्गुण तथा शिव है, उसे कोई किस प्रकार जान सकता है? ब्रह्मस्वरूप परमात्मा शिवजीका रूप सदा निर्गुण है । अतः आपके सदृश शिवद्रोही २३ उन्हें किस प्रकार जान सकते हैं? ॥ २२-२३ ॥ जो दुराचारी, महापापी, वेद एवं देवतासे विमुख हैं, वे २४ निर्गुणरूपवाले शिवके तत्त्वको नहीं जान सकते ॥ २४ ॥

जो पुरुष तत्त्वको न जानकर शिवकी निन्दा करता २५ है, उसका जन्मपर्यन्त संचित किया गया पुण्य भस्म हो जाता है । आपने इस समय जो महातेजस्वी शिवकी २६ निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है, इसका पाप मुझे भी लग गया है । शिवजीकी निन्दा करनेवालेको देखकर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये और शिवद्रोहीको २७ देखते ही प्रायश्चित्त भी करना चाहिये ॥ २५–२७ ॥ अरे दुष्ट! तुमने जो कहा कि मैं शिवको जानता २८ हूँ, तुम्हें तो निश्चित रूपसे सनातन शिवजीका कुछ ज्ञान नहीं है । वे रुद्र चाहे किसी भी स्वरूपवाले हों, रूपवान् हों अथवा अरूपी हों, वे सज्जनोंके प्रिय २ ९ निर्विकारी प्रभु मेरे तो सर्वस्व हैं और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ २८-२९ ॥ उन महात्मा सदाशिवकी ब्रह्मा, विष्णु भी किसी ॥ ३० प्रकार समता नहीं कर सकते, फिर जो सर्वदा कालके अधीन अन्य देवता आदि हैं, वे किस प्रकार उनकी समता कर सकते हैं? ॥ ३० ॥

इस प्रकार अपनी सत्य बुद्धिसे विचारकर मैं ३१ उन शिवकी प्राप्तिहेतु वनमें आकर घोर तपस्या कर रही हूँ ॥ ३१ ॥

वे ही परमेश्वर, सर्वेश एवं भक्तवत्सल हैं ॥ ३२ दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले उन्हींको प्राप्त करनेकी मेरी इच्छा है ॥३२ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार वे गिरिराजपुत्री । मौन हो गयीं और निर्विकार चित्तसे पुनः शिवजीका ध्यान विरराम शिवं दध्यौ निर्विकारेण चेतसा ॥ ३३ करने लगीं । तदनन्तर वे ब्राह्मण पार्वतीके इस प्रकारके तदाकर्ण्य वचो देव्या ब्रह्मचारी स वै द्विजः । वचनको सुनकर पुन: ज्यों ही कुछ कहनेको उद्यत हुए, पुनर्वचनमाख्यातुं प्रचक्रमे ॥ ३४ उसी समय शिवजीमें मन लगाये हुए और शिवजीकी यावदेव निन्दासे पराङ्मुख रहनेवाली पार्वती अपनी विजया नामकी

उवाच गिरिजा तावत्स्वसखीं विजयां द्रुतम् । शीघ्रतापूर्वक कहने लगीं - ॥ ३३–३५ ॥

शिवसक्तमनोवृत्तिः शिवनिंदापराङ्मुखी ॥ ३५ सखीसे

पृष्ठ 626

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६१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ गिरिजोवाच पार्वती बोलीं- हे सखि! बोलनेकी इच्छावाला वारणीयः प्रयत्नेन सख्ययं हि द्विजाधमः । | यह द्विजाधम पुनः शिवकी निन्दा करेगा, अतः इसे प्रयत्न-पुनर्वक्तुमनाश्चैव शिवनिंदां करिष्यति ॥ ३६ पूर्वक रोको; क्योंकि केवल शिवकी निन्दा करनेवालेको न केवलं भवेत्पापं निन्दां कर्तुश्शिवस्य हि । ही पाप नहीं लगता, अपितु जो उनकी निन्दाको । यो वै शृणोति तन्निन्दां पापभाक् स भवेदिह ॥ ३७ है, वह भी पापका भागी होता है ॥ ३६-३७ ॥ सुनता

शिवनिन्दाकरो वध्यः सर्वथा शिवकिंकरैः ।

ब्राह्मणश्चेत्स वै त्याज्यो गन्तव्यं तत्स्थलाद् द्रुतम् ॥ ३८

अयं दुष्टः पुनर्निन्दां करिष्यति शिवस्य हि ।

ब्राह्मणत्वादवध्यश्चेत्त्याज्योऽदृश्यश्च सर्वथा ॥ ३ ९

हित्वैतत्स्थलमद्यैव यास्यामो ऽन्यत्र मा चिरम् ।

यथा संभाषणं न स्यादनेनाऽविदुषा पुनः ॥ ४०

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा चोमया यावत्पादमुत्क्षिप्यते मुने ।

असौ तावच्छिवः साक्षादालंबे प्रियया स्वयम् ॥ ४१

कृत्वा स्वरूपं सुभगं शिवाध्यानं यथा तथा ।

दर्शयित्वा शिवायै तामुवाचावाङ्‌मुखीं शिवः ॥ ४२

शिव उवाच

कुत्र यास्यसि मां हित्वा न त्वं त्याज्या मया पुनः ।

प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि नादेयं विद्यते तव ॥ ४३

अद्यप्रभृति ते दासः तपोभिः क्रीत एव ते ।

क्रीतोऽस्मि तव सौन्दर्यात्क्षणमेकं युगाय ते ॥ ४४

त्यज्यतां च त्वया लज्जा मम पत्नी सनातनी ।

गिरिजे त्वं हि सद्बुध्या विचारय महेश्वरि ॥ ४५

मया परीक्षितासि त्वं बहुधा दृढमानसे । । | तत्क्षमस्वापराधं मे लोकलीलानुसारिणः ॥ ४६

न त्वादृशीं प्रणयिनीं पश्यामि च त्रिलोकके । ।

सर्वथाहं तवाधीनः स्वकामः पूर्यतां शिवे ॥ ४७ ॥

शिवभक्तोंको चाहिये कि वे शिवनिन्दकका वध कर दें । यदि वह ब्राह्मण है, तो उसका त्याग कर देना चाहिये और उस स्थानसे अन्यत्र चले जाना चाहिये ॥३८ ॥

यह दुष्ट पुनः शिवजीकी निन्दा करेगा, ब्राह्मण होनेके कारण यह अवध्य है, अतः इसका त्यागकर अन्यत्र चलना चाहिये, जहाँ जानेपर यह पुन: दिखायी न पड़े ॥ ३ ९ ॥ अब इस स्थानको छोड़कर हमलोग अविलम्ब दूसरे स्थानपर चलेंगे, जिससे इस मूर्ख ब्राह्मणसे पुन: सम्भाषण न करना पड़े ॥४० ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इतना कहनेके अनन्तर ज्यों ही पार्वतीने अन्यत्र जानेके लिये अपना पैर उठाया, इतनेमें ब्रह्मचारीस्वरूप साक्षात् शिवजीने पार्वतीको पकड़ लिया । उन शिवने उस समय जैसा पार्वती ध्यान कर रही थीं, उसी प्रकारका अत्यन्त सुन्दर रूप धारणकर उन्हें दर्शन दिया और पुनः नीचेकी ओर मुख की हुई पार्वतीसे वे शिव कहने लगे- ॥ ४१-४२ ॥ शिवजी बोले— [ हे देवि! ] तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रही हो? मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा । मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ, मेरे द्वारा तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है ॥ ४३ ॥

आजसे मैं तुम्हारे तपोंसे तुम्हारा खरीदा हुआ दास हो गया । तुमने अपने सौन्दर्यसे मुझे मोल ले लिया है, तुम्हारे बिना एक क्षण भी युगके समान है ॥ ४४ ॥

हे गिरिजे! तुम लज्जाका त्याग करो, तुम तो मेरी सनातन पत्नी हो । हे महेश्वरि! इसे तुम अपनी सद्बुद्धिसे स्वयं विचार करो । हे दृढ़ मनवाली! मैंने तुम्हारी अनेक प्रकारसे परीक्षा की, मुझ लोकलीलाका अनुसरण करनेवालेके इस अपराधको क्षमा करो । मैंने तुम्हारी -जैसी पतिव्रता सती त्रिलोकमें कहीं नहीं देखी । हे शिवे! मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ, तुम अपनी कामना पूर्ण करो ॥ ४५–४७ ॥

पृष्ठ 627

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अ ० २ ९ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६१५ एहि प्रिये मत्सकाशं पत्नी त्वं मे वरस्तव । हे प्रिये! तुम मेरे पास आओ, तुम मेरी पत्नी हो त्वया साकं द्रुतं यास्ये स्वगृहं पर्वतोत्तमम् ॥ ४८ तथा मैं तुम्हारा वर हूँ, अब मैं तुम्हें अपने साथ लेकर ब्रह्मोवाच

इत्युक्ते देवदेवेन पार्वती मुदमाप सा ।

तपोजातं तु यत्कष्टं तज्जहौ च पुरातनम् ॥

सर्वः श्रमो विनष्टोऽभूत्सत्यास्तु मुनिसत्तम ।

फले जाते श्रमः पूर्वो जन्तोर्नाशमवाप्नुयात् ॥

पर्वतोंमें उत्तम अपने घर कैलासको चलूँगा ॥ ४८ ॥

ब्रह्माजी बोले - – देवदेव शंकरजीके इस प्रकार कहनेपर पार्वतीको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और उन्हें ४ ९ पूर्व समयमें तपस्याके कारण जो दुःख हुआ था, वह तत्क्षण ही दूर हो गया । हे मुनिसत्तम! पार्वतीका सारा श्रम दूर हो गया; क्योंकि फलके प्राप्त हो जानेपर | प्राणीका पूर्वमें किया हुआ सारा श्रम नष्ट हो जाता ५० | है ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वत्या शिवरूपदर्शनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पार्वतीको शिवरूपदर्शन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः शिव और पार्वतीका संवाद, विवाहविषयक पार्वतीके अनुरोधको शिवद्वारा स्वीकार करना नारद उवाच

ब्रह्मन् विधे महाभाग किं जातं तदनन्तरम् ।

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथय त्वं शिवायशः ॥

ब्रह्मोवाच

देवर्षे श्रूयतां सम्यक् कथयामि कथां मुदा ।

तां महापापसंहर्त्री शिवभक्तिविवर्धिनीम् ॥

पार्वती वचनं श्रुत्वा हरस्य परमात्मनः ।

दृष्ट्वानन्दकरं रूपं जहर्षातीव च द्विज ॥

प्रत्युवाच महासाध्वी स्वोपकण्ठस्थितं विभुम् ।

अतीव सुखिता देवी प्रीत्युत्फुल्लानना शिवा ॥

पार्वत्युवाच

त्वं नाथो मम देवेश त्वया किं विस्मृतं पुरा ।

दक्षयज्ञविनाशं हि यदर्थं कृतवान्हठात् ॥

स त्वं साहं समुत्पन्ना मेनायां कार्यसिद्धये ।

देवानां देवदेवेश तारकाप्तासुखात्मनाम् ॥

यदि प्रसन्नो देवेश करोषि च कृपां यदि ।

पतिर्भव ममेशान मम वाक्यं कुरु प्रभो ॥

नारदजी बोले – - हे ब्रह्मन्! हे विधे! हे महाभाग! इसके बाद फिर क्या हुआ? मैं वह सब सुनना चाहता १ हूँ, आप शिवाके चरित्रको कहिये ॥१ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे देवर्षे! सुनिये, मैं इस कथाको प्रसन्नतापूर्वक कह रहा हूँ । यह कथा पापका २ नाश करनेवाली तथा शिवमें भक्ति बढ़ानेवाली है ॥ २ ॥

हे द्विज! परमात्मा हरका वचन सुनकर और ३ उनके परमानन्दकारी रूपको देखकर पार्वतीजी परम आनन्दित हो गयीं । स्नेहके कारण उनके नेत्रकमल खिल उठे । उसके बाद वे महासाध्वी सुखी हो प्रसन्नतासे ४ अपने समीप खड़े प्रभुसे कहने लगीं ॥ ३-४ ॥ पार्वती बोलीं- हे देवेश! आप तो मेरे नाथ हैं, क्या आप इस बातको भूल गये कि मेरे ही निमित्त आपने दक्षके यज्ञका विनाश किया था । ५ यद्यपि आप तो वही हैं, किंतु मैं देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये मेनासे पुन: उत्पन्न हुई हूँ । हे ६ देवदेवेश! देवतागण तारक असुरसे इस समय अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं॥५-६ ॥ हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझपर कृपा करना चाहते हैं, तो हे महेशान! हे ७ प्रभो! आप मेरे पति बनिये और मेरा वचन मानिये ।

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६१६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९

पितुर्गेहे मया सम्यग्गम्यते त्वदनुज्ञया ।

प्रसिद्धं क्रियतां तद्वै विशुद्धं परमं यशः ॥ ८

गन्तव्यं भवता नाथ हिमवत्पार्श्वतः प्रभो ।

याचस्व मां ततो भिक्षुर्भूत्वा लीलाविशारदः ॥ ९

तथा त्वया प्रकर्तव्यं लोकेषु ख्यापयन् यशः "

पितुर्मे सफलं सर्वं कुरुष्वैवं गृहाश्रमम् ॥१०

ऋषिभिर्बोधितः प्रीत्या स्वबन्धुपरिवारितः ।

करिष्यति न संदेहस्तव वाक्यं पिता मम ॥ ११

दक्षकन्या पुराहं वै पित्रा दत्ता यदा तव ।

यथोक्तविधिना तत्र विवाहो न कृतस्त्वया ॥ १२

न ग्रहाः पूजितास्तेन दक्षेण जनकेन मे ।

ग्रहाणां विषयस्तेन सच्छिद्रोऽयं महानभूत् ॥ १३

तस्माद्यथोक्तविधिना कर्तुमर्हसि मे प्रभो ।

विवाहं त्वं महादेव देवानां कार्यसिद्धये ॥ १४

विवाहस्य यथा रीतिः कर्तव्या सा तथा ध्रुवम् ।

जानातु हिमवान् सम्यक् कृतं पुत्र्या शुभं तपः ॥ १५

ब्रह्मोवाच

इत्येवं वचनं श्रुत्वा सुप्रसन्नः सदाशिवः ।

प्रोवाच वचनं प्रीत्या गिरिजां प्रहसन्निव ॥ १६

शिव उवाच

शृणु देवि महेशानि परमं वचनं मम ।

यथोचितं सुमाङ्गल्यमविकारि तथा कुरु ॥ १७ ।

ब्रह्मादिकानि भूतानि त्वनित्यानि वरानने ।

दृष्टं यत्सर्वमेतच्च नश्वरं विद्धि भामिनि ।

॥ १८

एकोऽनेकत्वमापन्नो निर्गुणो हि गुणान्वितः ।

स्वज्योत्स्नया यो विभाति परज्योत्स्नान्वितोऽभवत् ॥ १ ९

|

स्वतन्त्रः परतन्त्रश्च त्वया देवि कृतो ह्यहम् ।

सर्वकर्त्री च प्रकृतिर्महामाया त्वमेव हि ॥ २०

| इस समय आप मुझे पिताके घर जानेकी आज्ञा अब आप अपना विशुद्ध और उत्कृष्ट यश दें, जगत्‌ में प्रसिद्ध करें ॥ ७-८ ॥ हे नाथ! हे प्रभो! अनेक लीलाओंको करनेवाले आपको भिक्षु बनकर मेरे पिताके पास जाना चाहिये और उनसे मुझे माँगना चाहिये । आपको अपने यशका लोकमें विस्तार करते हुए ऐसा उपाय करना चाहिये, जिससे मेरे पिताका गृहस्थाश्रम सफल हो जाय । ऋषियोंने मेरे पिताको समझा दिया है, इसलिये बन्धुजनों एवं परिवारसे युक्त मेरे पिता आपकी बात निःसन्देह मान जायँगे ॥ ९ –११ ॥ पूर्व समयमें जब मैं दक्षकी कन्या थी, उस समय भी मेरे पिताने मुझे आपको ही दिया था, किंतु उस समय आपने यथोक्त विधिसे मुझसे विवाह नहीं किया था । उस समय मेरे पिता दक्षने विधिपूर्वक ग्रहोंका पूजन नहीं किया था । उन ग्रहोंके कारण ही विवाहमें विघ्न हुआ ॥ १२-१३ ॥ अतः हे प्रभो! हे महादेव! देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये आप यथोक्त रीतिसे मेरे साथ विवाह कीजिये ॥ १४ ॥

विवाहकी जो विधि है, उसे अवश्य करना चाहिये, जिससे हिमवान् जान लें कि कि मेरी पुत्रीने उत्तम तपस्या की है ॥ १५ ॥

ब्रह्माजी बोले — यह वचन सुनकर सदाशिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और वे हँसते हुए प्रेमपूर्वक पार्वतीसे यह वचन कहने लगे —॥१६ ॥

शिवजी बोले — हे देवि! हे महेशानि! मेरी उत्तम बात सुनो, जिससे विवाहमें किसी प्रकारकी बाधा न हो, वैसा उचित मंगल कार्य करो । हे भामिनि! इस जगत् में ब्रह्मा आदिसे लेकर जितने स्थावर तथा जंगम पदार्थ दिखायी पड़ते हैं, उन्हें अनित्य तथा नश्वर समझो ॥ १७-१८ ॥ यह एक निर्गुण ब्रह्म ही सगुण रूप धारणकर अनेक रूपमें परिवर्तित हो गया है, यही स्वयं अपनी सत्तासे प्रकाशित होते हुए भी पर प्रकाशसे युक्त हो गया है । हे देवि! मैं सदा स्वतन्त्र हूँ, पर तुमने मुझे परतन्त्र बना दिया है; क्योंकि सब कुछ करनेवाली महामाया प्रकृति तुम्हीं हो ॥ १ ९ -२० ॥

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अ ० २ ९ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६१७ मायामयं कृतमिदं च जगत्समग्रं सर्वात्मना हि विधृतं परया स्वबुद्ध्या । सर्वात्मभिः सुकृतिभिः परमात्मभावैः संसिक्तमात्मनि गुणैः परिवेष्टितञ्च ॥ २१

के ग्रहाः के ऋतुगणाः के वान्येऽपि त्वया ग्रहाः ।

किमुक्तं चाधुना देवि शिवार्थं वरवर्णिनि ॥ २२

गुणकार्यप्रभेदेनावाभ्यां प्रादुर्भवः कृतः ।

भक्तहेतोर्जगत्यस्मिन्भक्तवत्सलभावतः ॥ २३

त्वं हि वै प्रकृतिः सूक्ष्मा रजः सत्त्वतमोमयी ।

व्यापारदक्षा सततं सगुणा निर्गुणापि च ॥ २४

सर्वेषामिह भूतानामहमात्मा सुमध्यमे ।

निर्विकारी निरीहश्च भक्तेच्छोपात्तविग्रहः ॥ २५

हिमालयं न गच्छेयं जनकं तव शैलजे ।

ततस्त्वां भिक्षुको भूत्वा न याचेयं कथंचन ॥ २६

महागुणैर्गरिष्ठोऽपि महात्मापि गिरीन्द्रजे ।

देहीति वचनात्सद्यः पुरुषो याति लाघवम् ॥ २७

इत्थं ज्ञात्वा तु कल्याणि किमस्माकं वदस्यथ ।

कार्यं त्वदाज्ञया भद्रे यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २८

ब्रह्मोवाच

तेनोक्तापि महादेवी सा साध्वी कमलेक्षणा ।

शंकरं भक्त्या सुप्रणम्य पुनः पुनः ॥ २ ९

जगाद पार्वत्युवाच

त्वमात्मा प्रकृतिश्चाहं नात्र कार्या विचारणा ।

स्वतन्त्रौ भक्तवशगौ निर्गुणौ सगुणावपि ॥ ३०

प्रयत्नेन त्वया शम्भो कार्यं वाक्यं मम प्रभो । यह सम्पूर्ण जगत् मायाके द्वारा रचित है और सर्वात्मा परमात्माने अपनी श्रेष्ठ बुद्धिके द्वारा इसे धारण कर रखा है । सभी पवित्र आत्माएँ, जो परमात्माके स्वरूपको प्राप्त कर चुकी हैं और सदा मेरे साथ अभेदभावसे रहती हैं, उनसे तथा अपने गुणोंसे यह संसार घिरा हुआ है ॥२१ ॥

हे देवि! इस जगत्में तुम्हें छोड़कर न तो कोई ग्रह है, न तो कोई ऋतु है । हे वरवर्णिनि! तुम शिवके लिये ग्रहोंकी बात क्यों करती हो? ॥ २२ ॥

हम दोनों भक्तोंके लिये भक्तवत्सलतावश गुण-कार्यके भेदसे प्रकट हुए हैं । रज, सत्त्व तथा तमोमयी तुम सूक्ष्म प्रकृति हो, निरन्तर जगत् के कार्यमें दक्ष हो और सगुण तथा निर्गुण रूपवाली हो॥२३-२४ ॥ हे सुमध्यमे! सभी प्राणियोंकी आत्मा मैं ही हूँ । मैं सर्वथा निर्विकार तथा निरीह होकर भी भक्तोंके लिये ही शरीर धारण करता हूँ । किंतु हे शैलपुत्रि! मैं तुम्हारे पिता हिमालयके पास नहीं जाऊँगा और न तो भिक्षुकका रूप धारणकर उनसे तुमको माँगूँगा॥२५-२६ ॥ हे गिरिजे! महान् गुणोंसे वरिष्ठ कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह ' दीजिये ' – इस शब्दका उच्चारण करते ही लघुताको प्राप्त हो जाता है । हे कल्याणि! इस बातको जानते हुए भी तुम मुझसे इस प्रकारकी बात क्यों करती हो? हे भद्रे! यह कार्य तो तुम्हारे आज्ञानुसार ही मुझे करना है, अतः तुम जैसा चाहती हो, वैसा करो ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले- उनके द्वारा यह कहे जानेपर कमलके समान नेत्रोंवाली साध्वी महादेवी भक्तिपूर्वक शंकरजीको बार - बार प्रणामकर उनसे पुन: कहने लगीं— ॥ २ ९ ॥ पार्वती बोलीं- [ हे महेश्वर! ] आप आत्मा हैं और मैं प्रकृति हूँ, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हम दोनों स्वतन्त्र एवं गुणरहित होकर भी भक्तके वशमें होकर सगुण रूप धारण करते रहते हैं ॥ ३० ॥

हे शम्भो! हे प्रभो! आपको मेरी बात प्रयत्नपूर्वक मान लेनी चाहिये । अतः हे शंकर! आप हिमालयसे कीजिये मुझे सौभाग्य प्रदान कीजिये ॥३१ ॥

याचस्व मां हिमगिरेः सौभाग्यं देहि शङ्कर ॥ ३१ । याचना,

पृष्ठ 630

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६१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ ९ कृपां कुरु महेशान तव भक्तास्मि नित्यशः । हे महेश्वर! आप मुझपर दया करें, मैं आपकी तव पत्नी सदा नाथ ह्यहं जन्मनि जन्मनि ॥ ३२ / नित्य भक्त हूँ । हे नाथ! मैं सदा जन्म - जन्मान्तरकी त्वं ब्रह्म परमात्मा हि निर्गुणः प्रकृतेः परः निर्विकारी निरीहश्च स्वतन्त्रः परमेश्वरः तथापि सगुणोऽपीह भक्तोद्धारपरायणः विहारी स्वात्मनि रतो नानालीलाविशारदः सर्वथा त्वामहं जाने महादेव महेश्वर किमुक्तेन च सर्वज्ञ बहुना हि दयां कुरु विस्तारय यशो लोके कृत्वा लीलां महाद्भुताम् यत्सुगीय जना नाथाञ्जसोत्तीर्णा भवाम्बुधिम् ब्रह्मोवाच

इत्येवमुक्त्वा गिरिजा सुप्रणम्य पुनः पुनः ।

विरराम महेशानं नतस्कन्धा कृताञ्जलिः ॥

इत्येवमुक्तः स तया महात्मा महेश्वरो लोकविडम्बनाय । तथेति मत्वा प्रहसन् बभूव मुदान्वितः कर्तुमनास्तदेव ॥

ततो ह्यन्तर्हितश्शम्भुर्बभूव सुप्रहर्षितः ।

कैलासं प्रययौ काल्या विरहाकृष्टमानसः ॥

तत्र गत्वा महेशानो नन्द्यादिभ्यः स ऊचिवान् ।

वृत्तान्तं सकलं तं वै परमानन्दनिर्भरः ॥

तेऽपि श्रुत्वा गणाः सर्वे भैरवाद्याश्च सर्वशः ।

बभूवुः सुखिनोऽत्यन्तं विदधुः परमोत्सवम् ॥

महत् सुमङ्गलं तत्र बभूवातीव नारद ।

सर्वेषां दुःखनाशोऽभूद्रुद्रः प्रापापि संमुदम् ॥

आपकी पत्नी हूँ । आप ब्रह्म, परमात्मा, निर्गुण, प्रकृतिसे । परे, विकाररहित, इच्छारहित, स्वतन्त्र तथा परमेश्वर ॥ ३३ हैं, तथापि भक्तोंके उद्धारके लिये आप सगुण रूप । धारण करते हैं । आप आत्मपरायण होकर भी विहार ॥ ३४ करनेवाले तथा नाना प्रकारकी लीलामें निपुण हैं । है महादेव! हे महेश्वर! मैं आपको सर्वथा जानती हूँ ॥ हे सर्वज्ञ! बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन, आप मुझपर ॥ ३५ दया कीजिये ॥ ३२-३५ ॥ । हे नाथ! आप अद्भुत लीलाकर संसारमें अपने ॥ ३६ यशका विस्तार कीजिये, जिसका गान करके आपके भक्त इस संसाररूपी समुद्रसे अनायास ही पार हो जायँ ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर गिरिजा शंकरजीको बारंबार हाथ जोड़कर सिर झुकाकर ३७ प्रणाम करके मौन हो गयीं ॥३७ ॥

पार्वतीने जब इस प्रकार कहा, तब लोकविडम्बनाके निमित्त शंकरजीने हँसते हुए प्रसन्न होकर ऐसा ही होगा — यह कहकर वे वैसा करनेके लिये उद्यत हो ३८ | गये ॥ ३८ ॥

उसके बाद वे शम्भु प्रसन्न हो अन्तर्धान हो गये ३ ९ और कालीके विरहसे आकृष्टचित्तवाले वे कैलासको चले गये ॥३ ९ ॥ वहाँ जाकर उन महेश्वरने परमानन्दमें निमग्न हो ४० यह सारा वृत्तान्त नन्दीश्वरादि गणोंको बताया ॥ ४० ॥

इस वृत्तान्तको सुनकर वे सम्पूर्ण भैरवादि ४१ गण भी बहुत सुखी हुए और महान् उत्सव करने लगे ॥ ४१ ॥

हे नारद! उस समय वहाँ महामंगल होने | लगा, सबका दुःख दूर हो गया और रुद्रको भी परम ४२ । प्रसन्नता हुई ॥ ४२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवाशिवसंवादवर्णनं ॥ २ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः शिवा - शिवसंवादवर्णन नामक उनतीसवाँ तृतीय पार्वतीखण्डमें अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ९ ॥