शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 631–640

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 631 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३० ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६१ ९ अथ त्रिंशोऽध्यायः पार्वतीके पिताके घरमें आनेपर महामहोत्सवका होना, महादेवजीका नटरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होना तथा अनेक लीलाएँ किंतु माता - पिताके द्वारा मना नारद उवाच

विधे तात महाभाग धन्यस्त्वं परमार्थदृक् ।

अद्भुतेयं कथाश्रावि त्वदनुग्रहतो मया ॥ १

गते हरे स्वशैले हि पार्वती सर्वमङ्गला ।

किं चकार गता कुत्र तन्मे वद महामते ॥ २

ब्रह्मोवाच

शृणु सुप्रीतितस्तात यज्जातं तदनन्तरम् ।

हरे गते निजस्थाने तद् वदामि शिवं स्मरन् ॥ ३

पार्वत्यपि सखीयुक्ता रूपं कृत्वा तु सार्थकम् ।

जगाम स्वपितुर्गेहं महादेवेति वादिनी ॥ ४

पार्वत्यागमनं श्रुत्वा मेना च स हिमाचल: ।

दिव्यं यानं समारुह्य प्रययौ हर्षविह्वलः ॥ ५

पुरोहितश्च पौराश्च सख्यश्चैवाप्यनेकशः ।

सम्बन्धिनस्तथान्ये च सर्वे ते च समाययुः ॥ ६

भ्रातरः सकला जग्मुर्मैनाकप्रमुखास्तदा ।

जयशब्दं प्रब्रुवन्तो महाहर्षसमन्विताः ॥ ७

संस्थाप्य मङ्गलघटं राजवर्त्मनि राजिते ।

चन्दनागरुकस्तूरीफलशाखासमन्विते ॥ ८

सुपुरोधाब्राह्मणैश्च मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ।

नारीभिर्नर्तकीभिश्च गजेन्द्रादिसुशोभितैः ॥ ९

परितः परितो रंभास्तम्भवृन्दसमन्विते ।

पतिपुत्रवतीयोषित्समूहैर्दीपहस्तकैः ॥१०

द्विजवृन्दैश्च संयुक्ते कुर्वद्भिर्मङ्गलध्वनिम् ।

नानाप्रकारवाद्यैश्च शंखध्वनिभिरन्विते ॥ ११

एतस्मिन्नन्तरे दुर्गाजगाम स्वपुरान्तिकम् ।

विशंती नगरं देवी ददर्श पितरौ पुनः ॥ १२

सुप्रसन्नौ प्रधावन्तौ हर्षविह्वलमानसौ ।

दृष्ट्वा काली स्वालिभिः प्रणनाम तो ॥ १३

सुप्रहृष्टा दिखाना, शिवद्वारा पार्वतीकी याचना, करनेपर अन्तर्धान हो जाना नारदजी बोले – हे विधे! हे तात! हे महाभाग! परमार्थके ज्ञाता आप धन्य हैं, आपकी कृपासे मैंने यह अद्भुत कथा सुनी । जब शिवजी कैलास चले गये, तब सर्वमंगला पार्वतीने क्या किया और वे पुनः कहाँ गयीं? हे महामते! मुझसे कहिये॥१-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे तात! हरके अपने स्थान चले जानेके बाद जो कुछ हुआ, उसे प्रेमपूर्वक सुनो, मैं शिवजीका स्मरणकर उसे कह रहा हूँ ॥ ३ ॥

पार्वती अपना रूप सार्थककर ' महादेव ' शब्दका उच्चारण करती हुई पिताके घर अपनी सखियोंके साथ गयीं । पार्वतीके आगमनका समाचार सुनते ही मेना तथा हिमालय दिव्य विमानपर चढ़कर हर्षसे विह्वल हो उनकी अगवानीके लिये चले ॥ ४-५ ॥ उस समय पुरोहित, पुरवासी, अनेक सखियाँ तथा अन्य दूसरे सब सम्बन्धी आये । मैनाक आदि सभी भाई महाप्रसन्न हो ' जय ' शब्दका उच्चारण करने लगे ॥ ६-७ ॥ चन्दन, अगरु, कस्तूरी, फल तथा वृक्षकी शाखाओंसे युक्त राजमार्गको अपूर्व सजावटसे सम्पन्नकर स्थान - स्थानपर मंगलघट स्थापित कराया गया ॥८ ॥

सारा राजमार्ग पुरोहित, ब्राह्मण, ब्रह्मवेत्ता, मुनियों, नर्तकियों एवं बड़े - बड़े गजेन्द्रोंसे खचाखच भर गया ॥ ९ ॥

जगह - जगहपर केलेके खम्भे लगाये गये और चारों ओर पति - पुत्रवती स्त्रियाँ हाथमें दीपक लिये हुए खड़ी हो गयीं । ब्राह्मणोंका समूह मंगलपाठपूर्वक । वेदोंका उद्घोष कर रहा था । अनेक प्रकारके वाद्य तथा शंखकी ध्वनि हो रही थी । इसी बीच दुर्गा देवी अपने नगरके समीप आयीं और प्रवेश करते ही उन्होंने सर्वप्रथम अपने माता - पिताका पुनः दर्शन किया । उन | कालीको देखकर माता - पिता हर्षसे विह्वल हो प्रसन्नतासे दौड़ पड़े । पुनः पार्वतीने भी उनको देखकर सखियोंसहित । उन्हें प्रणाम किया ॥ १०–१३ ॥

पृष्ठ 632

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 632 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२० तौ सम्पूर्णाशिषं दत्त्वा चक्रतुस्तौ स्ववक्षसि हे वत्से त्वेवमुच्चार्य रुदन्तौ प्रेमविह्वलौ ततः स्वकीया अप्यस्या अन्या नार्योऽपि संमुदा भ्रातृस्त्रियोऽपि सुप्रीत्या दृढालिङ्गनमादधुः साधितं हि त्वया सम्यक् सुकार्यं कुलतारणम् त्वत्सदाचरणेनापि पाविताः स्माखिला वयम्

इति सर्वे सुप्रशंस्य प्रणेमुस्तां प्रहर्षिताः ।

चन्दनैः सुप्रसूनैश्च समानर्चुः शिवां मुदा ॥

तस्मिन्नवसरे देवा विमानस्था मुदाम्बरे ।

पुष्पवृष्टिं शुभां चक्रुर्नत्वा तां तुष्टुवुः स्तवैः ॥

तदा तां च रथे स्थाप्य सर्वे शोभान्विते वरे ।

पुरं प्रवेशयामासुः सर्वे विप्रादयो मुदा ॥

अथ विप्राः पुरोधाश्च सख्योऽन्याश्च स्त्रियः शिवाम् ।

गृहं प्रवेशयामासुर्बहुमानपुरस्सरम् ॥

स्त्रियो निर्मञ्छनं चक्रुर्विप्रा युयुजुराशिषः ।

हिमवान्मेनका माता मुमोदाति मुनीश्वर ॥

स्वाश्रमं सफलं मेने कुपुत्रात्पुत्रिका वरा ।

हिमवान्नारदं त्वां च संस्तुवन् साधु साध्विति ॥

ब्राह्मणेभ्यश्च बंदिभ्यः पर्वतेन्द्रो धनं ददौ ।

मङ्गलं पाठयामास स द्विजेभ्यो महोत्सवम् ॥

एवं स्वकन्यया हृष्टौ पितरौ भ्रातरस्तथा ।

जामयश्च महाप्रीत्या समूषुः प्राङ्गणे मुने ॥

ततः स हिमवान् तात सुप्रहृष्टाः प्रसन्नधीः ।

सम्मान्य सकलान्प्रीत्या स्नातुं गङ्गां जगाम ह ॥

एतस्मिन्नन्तरे शंभुः सुलीलो भक्तवत्सलः ।

सुनर्तकनटी भूत्वा मेनकासंनिधिं ययौ ॥

पई शृङ्गं वामे

कथा करे धृत्वा दक्षिणे डमरुं तथा ।

रक्तवासा नृत्यानविशारदः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३० । माता - पिताने आशीर्वाद देकर कालीको अपनी ॥ १४ गोदमें ले लिया और ' हे वत्से! ' — इस । उच्चारणकर स्नेहसे विह्वल हो रोने लगे ॥१४ प्रकार ॥ । तदनन्तर इनके अपने सगे - सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंने । ॥ १५ तथा अन्य भाई आदिकी पत्नियोंने भी प्रीतिपूर्वक पार्वतीका । दृढ़ आलिंगन किया और उन्होंने कहा — तुमने कुलको ॥ १६ तारनेका कार्य भलीभाँति सम्पन्न किया । तुम्हारे इस सदाचरणसे हम सभी पवित्र हो गयीं ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार गिरिजाकी प्रशंसाकर सभी लोगोंने १७ उन्हें प्रणाम किया और चन्दन तथा उत्तम पुष्पोंके द्वारा प्रसन्नतासे उनका पूजन करने लगे ॥ १७ ॥

उसी समय विमानोंमें बैठे हुए देवगण भी १८ आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने लगे और पार्वतीको नमस्कारकर स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे । उसके बाद १ ९ ब्राह्मण आदि प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारकी शोभासे सुसज्जित रथमें पार्वतीको बैठाकर नगरमें ले गये और ब्राह्मण, पुरोहित, स्त्रियों तथा सखियोंने बड़े प्रेमके साथ २० आदरपूर्वक उनको घरमें प्रवेश कराया ॥ १८–२० ॥ स्त्रियाँ मंगलाचार करने लगीं और ब्राह्मण २१ आशीर्वाद देने लगे । हे मुनीश्वर! उस समय माता मेनका तथा पिता हिमवान्को अत्यन्त प्रसन्नता हुई । उन्होंने गृहस्थाश्रमको सफल माना और कहा कि २२ कुपुत्रकी अपेक्षा पुत्री ही अच्छी होती है । तदनन्तर वे हिमालय, आप नारदको भी साधुवाद देते हुए प्रशंसा करने लगे ॥ २१-२२ ॥ पर्वतराज हिमालयने ब्राह्मणों एवं बन्दीजनोंको २३ बहुत - सा धन दिया और ब्राह्मणोंद्वारा मंगलपाठ कराया, बहुत बड़ा उत्सव किया ॥ २३ ॥

हे मुने! इस प्रकार प्रसन्न हुए माता - पिता, भाई तथा २४ सभी सम्बन्धीगण पार्वतीके साथ आँगनमें बैठे ॥ २४ ॥

हे तात! तत्पश्चात् हिमालय परम प्रसन्न हो २५ सभी सम्बन्धियोंका प्रेमपूर्वक सम्मानकर गंगास्नानको गये ॥ २५ ॥

उसी समय लीला करनेमें तत्पर भक्तवत्सल २६ भगवान् शंकर सुन्दर नाचनेवाले नटका रूप धारणकर २७ । मेनकाके समीप पहुँचे । वे बाएँ हाथमें श्रृंगी, दाहिने हाथमें पहन

पृष्ठ 633

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 633 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३० ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२१

ततस्सुनरूपोऽसौ मेनाया प्राङ्गणे मुदा ।

चक्रे सुनृत्यं विविधं गानं चातिमनोहरम् ॥ २८

शृङ्गं च डमरुं तत्र वादयामास सुध्वनिम् ।

महतीं विविधां तत्र स चकार मनोहराम् ॥ २ ९

तां द्रष्टुं नागराः सर्वे पुरुषाश्च स्त्रियस्तथा I

आजग्मुः सहसा तत्र बाला वृद्धा अपि ध्रुवम् ॥ ३०

श्रुत्वा सुगीतं तद् दृष्ट्वा सुनृत्यं च मनोहरम् ।

सहसा मुमुहुः सर्वे मेनापि च तदा मुने ॥ ३१

मूर्च्छा संप्राप सा दुर्गा विलोक्य हृदि शंकरम् ।

त्रिशूलादिकचिह्नानि बिभ्रतं चातिसुन्दरम् ॥ ३२

विभूतिभूषितं रम्यमस्थिमालासमन्वितम् ।

त्रिलोचनोज्ज्वलद्वक्त्रं नागयज्ञोपवीतकम् ॥ ३३

वरं वृण्वत्युक्तवन्तं गौरवर्णं महेश्वरम् ।

दीनबन्धुं दयासिन्धुं सर्वथा सुमनोहरम् ॥ ३४

हृदयस्थं हरं दृष्ट्वेदृशं सा प्रणनाम तम् ।

वरं वव्रे मानसं हि पतिर्मे त्वं भवेति च ॥ ३५

वरं दत्त्वा शिवां चाथ तादृशं प्रीतितो हृदा ।

अन्तर्धाय पुनस्तत्र सुननर्त स भिक्षुकः ॥ ३६

ततो मेना सुरत्नानि स्वर्णपात्रस्थितानि च ।

तस्मै दातुं ययौ प्रीत्या तद्भूतिप्रीतमानसः ॥३७

तानि न स्वीचकारासौ भिक्षां याचे शिवां च ताम् ।

पुनः सुनृत्यं गानञ्च कौतुकात्कर्तुमुद्यतः ॥ ३८

मेना तद्वचनं श्रुत्वा चुकोपाति सुविस्मिता ।

भिक्षुकं भर्त्सयामास बहिष्कर्तुमियेष सा ॥ ३ ९

एतस्मिन्नन्तरे तत्र गङ्गातो गिरिराययौ ।

ददर्श पुरतो भिक्षु प्राङ्गणस्थं नराकृतिम् ॥ ४०

श्रुत्वा मेनामुखाद् वृत्तं तत्सर्वं सुचुकोप सः ।

आज्ञां चकारानुचरान्बहिष्कर्तुञ्च तं नटम् ॥ ४१

महाग्निमिव दुःस्पर्शं प्रज्वलन्तं सुतेजसम् ।

न शशाक बहिष्कर्तुं कोऽपि तं मुनिसत्तम ॥ ४२

हुए थे । नृत्य - गान प्रवीण वे शिवजी मेनाके आँगनमें बड़ी प्रसन्नताके साथ अनेक प्रकारका मनोहर नृत्य एवं गान करने लगे ॥ २६–२८ ॥ वे सुन्दर ध्वनिसे शृंगी तथा डमरू बजाने लगे और नाना प्रकारकी मनोहर लीला करने लगे ॥ २ ९ ॥ उस लीलाको देखनेके लिये सभी नगर - निवासी स्त्री - पुरुष, बालक तथा वृद्ध सहसा वहाँ आ गये ॥ ३० ॥

हे मुने! उस मनोहर नृत्यको देखकर एवं गीतको सुनकर सभी लोग तथा मेना भी अत्यन्त मोहित हो गयीं । त्रिशूल आदि चिह्नसे युक्त एवं अत्यन्त मनोहर रूप धारण करनेवाले उस नटको देखकर पार्वती भी उन्हें हृदयसे शंकर जानकर मूर्च्छित हो गयीं ॥ ३१-३२ ॥ विभूतिसे विभूषित होनेके कारण अत्यन्त मनोहर, अस्थिमालासे समन्वित, त्रिलोचन, देदीप्यमान मुख-मण्डलवाले, नागका यज्ञोपवीत धारण किये हुए, गौरवर्ण, दीनबन्धु, दयासागर, सर्वथा मनोहर और ‘ वर माँगो ’ इस प्रकार कहते हुए उन हृदयस्थ महेश्वरको देखकर पार्वतीने उन्हें प्रणाम किया और मनमें वर माँगा कि आप ही हमारे पति हों ॥ ३३-३५ ॥ इस प्रकार हृदयसे पार्वतीको प्रीतिपूर्वक वर देकर शिवजी अन्तर्धान होकर पुनः भिक्षुकका रूप धारणकर नृत्य करने लगे । तब उस नृत्यसे प्रसन्न होकर मेना सोनेके पात्रमें बहुत सारे रत्न रखकर बड़े प्रेमसे उस भिक्षुकको देनेके लिये गयीं, किंतु भिक्षुकने उन्हें स्वीकार नहीं किया और भिक्षामें शिवाको माँगा तथा पुनः नृत्य - गान करने लगे॥३६–३८ ॥ मेना भिक्षुकके वचनको सुनकर विस्मित हो क्रोधसे भर गयीं । वे भिक्षुककी भर्त्सना करने लगीं और उन्होंने उसे बाहर निकालनेकी इच्छा की । इसी समय हिमालय भी गंगाजीसे आ गये और उन्होंने नरकी आकृतिवाले भिक्षुकको आँगनमें स्थित देखा ॥ ३ ९ -४० ॥ मेनाद्वारा सभी बातोंको जानकर हिमालयको बड़ा क्रोध आया । उन्होंने भिक्षुकको घरसे बाहर निकालनेके लिये अपने सेवकोंको आज्ञा दी ॥ ४१ ॥

किंतु हे मुनिसत्तम! प्रलयाग्निके समान जलते हुए तेजसे अत्यन्त दुःसह उस भिक्षुकको बाहर निकालनेमें कोई भी समर्थ नहीं हुआ ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 634

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 634 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३० ततः स भिक्षुकस्तात नानालीलाविशारदः । हे तात! उस समय अनेक लीलाओंमें प्रवीण दर्शयामास शैलाय स्वप्रभावमनन्तकम् ॥ ४३ | उस भिक्षुकने पर्वतराज हिमालयको अपना अनन्त शैलो ददर्श तं तत्र विष्णुरूपधरं द्रुतम् किरीटिनं कुण्डलिनं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् यद्यत्पुष्पादिकं दत्तं पूजाकाले गदाभृते गात्रे शिरसि तत्सर्वं भिक्षुकस्य ददर्श ह ॥ ततो ददर्श जगतां स्वष्टारं स चतुर्मुखम् । रक्तवर्णं पठन्तं च श्रुतिसूक्तं गिरीश्वरः

ततः सूर्यस्वरूपं च जगच्चक्षुस्स्वरूपकम् ।

ददर्श गिरिराजः स क्षणं कौतुककारिणम् ॥

ततो ददर्श तं तात रुद्ररूपं महाद्भुतम् ।

पार्वती सहितं रम्यं विहसन्तं सुतेजसम् ॥

ततस्तेजस्स्वरूपं च निराकारं निरंजनम् ।

निरुपाधिं निरीहं च महाद्भुतमरूपकम् ॥

एवं बहूनि रूपाणि तस्य तत्र ददर्श सः ।

सुविस्मितो बभूवाशु परमानन्दसंयुतः ॥

अथासौ भिक्षुवर्यो हि तस्मात्तस्याश्च सूतिकृत् ।

भिक्षां ययाचे दुर्गां तां नान्यज्ञ्जग्राह किञ्चन ॥

न स्वीचकार शैलेन्द्रो मोहितश्शिवमायया ।

भिक्षुः किंचिन्न जग्राह तत्रैवान्तर्दधे ततः ॥

तदा बभूव सुज्ञानं मेनाशैलेशयोरिति ।

आवां शिवो वञ्चयित्वा स्वस्थानं गतवान्प्रभुः ॥

तयोर्विचिन्त्य तत्रैवं शिवे भक्तिरभूत्परा ।

महामोक्षकरी दिव्या सर्वानन्दप्रदायिनी ॥

। प्रभाव दिखाया । हिमालयने देखा कि वह भिक्षुक । तत्क्षण किरीट, कुण्डल, पीताम्बर तथा चतुर्भुज ॥ ४४ धारणकर विष्णुके स्वरूपमें हो गया है॥४३-४४ रूप ॥ । विष्णुपूजाके लिये उन्होंने जो - जो पुष्पादि अर्पण । ४५ किये थे, वह सभी पूजोपहारकी सामग्री विष्णुरूपधारी इन भिक्षुकके सिर एवं गलेमें पड़ी हुई उन्होंने देखी ॥ ४५ ॥

तत्पश्चात् गिरिराजने देखा कि उस भिक्षुकने ॥ ४६ रक्तवर्ण होकर वेदोंके सूक्तों उच्चारण करते हुए, चतुर्भुज, जगत्स्रष्टा ब्रह्माका रूप धारण कर लिया है ॥ ४६ ॥

पुनः गिरीश्वरने एक क्षण बाद देखा कि वह ४७ जगच्चक्षु सूर्यके रूपमें परिवर्तित हो गया । इस प्रकार उन्होंने क्षण - क्षणमें रूप बदलकर कौतुक करते हुए उस भिक्षुकको देखा । हे तात! तत्पश्चात् हिमालयने ४८ देखा कि वह भिक्षुक अद्भुत रूप धारण किये हुए रुद्र हो गया है, जो पार्वतीसहित परम मनोहर अपने तेजसे प्रकाशित हो रहा है ॥ ४७-४८ ॥ तदनन्तर उन्होंने निराकार, निरंजन, निरुपाधि, ४ ९ निरीह, परम अद्भुत, तेजस्वरूपमें परिवर्तित होते हुए उस भिक्षुकको देखा । इस प्रकार जब हिमालयने उस ५० भिक्षुकके अनेक विस्मयकारक रूप देखे, तब वे आनन्दयुक्त होकर आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४ ९ -५० ॥ उसके बाद पुनः भिक्षुकरूपधारी उन सृष्टिकर्ता ५१ शिवजीने हिमालयसे दुर्गाकी याचना की और कुछ नहीं | माँगा, किंतु शिवमायासे मोहित होनेके कारण हिमालयने | उसे स्वीकार नहीं किया, भिक्षुकने भी और कुछ ग्रहण ५२ नहीं किया और वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ ५१-५२१ ॥ म तब मेना और शैलराजको ज्ञान हुआ कि ५३ प्रभु शंकरजी हम दोनोंको वंचितकर अपने स्थानको चले गये ॥५३ ॥

इस बातका विचार करके उन दोनोंको दिव्य, | सर्वानन्दप्रदायिनी तथा परम मोक्ष देनेवाली परा भक्ति ५४ । शिवजीमें उत्पन्न हो गयी ॥५४ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पार्वतीप्रत्यागमनमहोत्सववर्णनं ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय नाम त्रिंशोऽध्यायः पार्वतीप्रत्यागमनमहोत्सववर्णन रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

पृष्ठ 635

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 635 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३१ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२३ अथैकत्रिंशोऽध्यायः देवताओंके कहनेपर शिवका ब्राह्मण वेषमें ब्रह्मोवाच

तयोर्भक्तिं शिवे ज्ञात्वा परामव्यभिचारिणीम् ।

सर्वे शक्रादयो देवाश्चिचिन्तुरिति नारद ॥

देवा ऊचुः

एकान्तभक्त्या शैलश्चेत्कन्यां तस्मै प्रदास्यति ।

ध्रुवं निर्वाणतां सद्यः स प्राप्स्यति च भारते ॥

अनन्तरत्नाधारश्चेत्पृथ्वीं त्यक्त्वा प्रयास्यति ।

रत्नगर्भाभिधा भूमिर्मिथ्यैव भविता ध्रुवम् ॥

स्थावरत्वं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय सः ।

कन्यां शूलभृते दत्त्वा शिवलोकं गमिष्यति ॥

महादेवस्य सारूप्यं लप्स्यते नात्र संशयः ।

तत्र भुक्त्वा वरान्भोगांस्ततो मोक्षमवाप्स्यति ॥

ब्रह्मोवाच

इत्यालोच्य सुराः सर्वे कृत्वा चामन्त्रणं मिथः ।

प्रस्थापयितुमैच्छंस्ते गुरुं तत्र सुविस्मिताः ॥

ततः शक्रादयो देवाः सर्वे गुरुनिकेतनम् ।

जग्मुः प्रीत्या सविनया नारद स्वार्थसाधकाः ॥

गत्वा तत्र गुरुं नत्वा सर्वे देवाः सवासवाः ।

चक्रुर्निवेदनं तस्मै गुरवे वृत्तमादरात् ॥

देवा ऊचुः

गुरो हिमालयगृहं गच्छास्मत्कार्यसिद्धये ।

तत्र गत्वा प्रयत्नेन कुरु निन्दां च शूलिनः ॥

पिनाकिना विना दुर्गा वरं नान्यं वरिष्यति ।

अनिच्छया सुतां दत्त्वा फलं तूर्णं लभिष्यति ॥

कालेनैवाधुना शैल इदानीं भुवि तिष्ठतु ।

अनेकरत्नाधारं तं स्थापय त्वं क्षितौ गुरो ॥

हिमालयके यहाँ जाना और शिवकी निन्दा करना ब्रह्माजी बोले — हे नारद! इस प्रकार मेना और शैलराजकी शिवमें अनन्य भक्ति देखकर इन्द्र १ आदि सभी देवताओंने विचार किया ॥१ ॥

देवता बोले- यदि हिमालय शिवजीमें अनन्य भक्तिपूर्वक शंकरजीको अपनी कन्या देंगे तो भारतमें २ अवश्य ही निर्वाण पद प्राप्त कर लेंगे ॥ २ ॥

यदि इन अनन्त रत्नोंसे पूर्ण वे हिमालय ३ वसुन्धराको त्यागकर चले जायँगे, तो निश्चय ही इस पृथिवीका रत्नगर्भा —यह नाम व्यर्थ हो जायगा । इस स्थावररूपको छोड़कर दिव्यरूप धारणकर और ४ अपनी कन्या शूलधारी शंकरको देकर वे अवश्य ही शिवलोक चले जायँगे ॥ ३-४ ॥ उन्हें शिवलोकमें सारूप्य मुक्ति प्राप्त होगी, ५ इसमें संशय नहीं । वहाँ अनेक प्रकारके श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर वे मुक्त हो जायँगे ॥५ ॥

ब्रह्माजी बोले – यह कहकर वे सभी देवता इस बातका विचारकर विस्मित हो परस्पर मन्त्रणा करके बृहस्पतिको हिमालयके पास भेजनेकी इच्छा ६ करने लगे ॥ ६ ॥

हे नारद! तब इन्द्रादि सभी देवता स्वार्थ-७ साधनकी इच्छासे विनम्र होकर प्रीतिपूर्वक बृहस्पतिके घर गये ॥७ ॥

वे देवता वहाँ जाकर बृहस्पतिको प्रणाम करके ८ आदरपूर्वक उन गुरुसे सारा वृत्तान्त कहने लगे— ॥ ८ ॥

देवता बोले- हे गुरो! आप हमलोगोंकी कार्यसिद्धिके लिये हिमालयके पास जाइये और वहाँ ९ जाकर प्रयत्नपूर्वक शिवकी निन्दा कीजिये॥९ ॥

पार्वती शिवके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण नहीं करेंगी और वे हिमालय बिना इच्छाके ही अपनी १० / कन्या पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करेंगे और शीघ्र ही इसका फल प्राप्त कर लेंगे । हे गुरो! हमलोगोंकी इच्छा है कि हिमालय अभी पृथिवीपर निवास करें । अतः आप अनेक रत्नोंको धारण करनेवाले उन ११ हिमालयको पृथ्वीपर स्थापित कीजिये ॥ १०-११ ॥

पृष्ठ 636

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 636 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले – देवगणोंकी यह इति देववचः श्रुत्वा प्रददौ कर्णयोः करम् । | सुनकर बृहस्पतिने अपने कानोंपर हाथ रख लिया बात न स्वीचकार स गुरुः स्मरन्नाम शिवेति च ॥ १२ / और शिवजीका नाम - स्मरण करते हुए उन्होंने इस अथ स्मृत्वा महादेवं बृहस्पतिरुदारधीः उवाच देववर्यांश्च धिक्कृत्वा च पुनः पुनः बृहस्पतिरुवाच सर्वे देवा: स्वार्थपराः परार्थध्वंसकारकाः कृत्वा शंकरनिंदां हि यास्यामि नरकं ध्रुवम् कश्चिन्मध्ये च युष्माकं गच्छेच्छैलान्तिकं सुराः संपादयेत्स्वाभिमतं शैलेन्द्रं प्रतिबोध्य च अनिच्छया सुतां दत्त्वा सुखं तिष्ठतु भारते तस्मै भक्त्या सुतां दत्त्वा मोक्षं प्राप्स्यति निश्चितम् ॥

पश्चात्सप्तर्षयः सर्वे बोधयिष्यन्ति पर्वतम् ।

पिनाकिना विना दुर्गा वरं नान्यं वरिष्यति ॥

अथवा गच्छत सुरा ब्रह्मलोकं सवासवाः ।

वृत्तं कथयत स्वं तत्स वः कार्यं करिष्यति ॥

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा ते समालोच्याजग्मुर्मम सभां सुराः ।

सर्वे निवेदयाञ्चक्रुर्नत्वा तद्गतमादरात् ॥

देवानां तद्वचः श्रुत्वा शिवनिन्दाकरं तदा ।

वेदवक्ता विलप्याहं तानवोचं सुरान्मुने ॥

ब्रह्मोवाच

नाहं कर्तुं क्षमो वत्साः शिवनिन्दां सुदुस्सहाम् ।

संपद्विनाशरूपां च विपदां बीजरूपिणीम् ॥

सुरा गच्छत कैलासं सन्तोषयत शंकरम् ।

प्रस्थापयत तं शीघ्रं हिमालयगृहं प्रति ॥

स गच्छेदुपशैलेशमात्मनिन्दां करोतु वै ।

परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे मता ॥

। बातको स्वीकार नहीं किया । उदारबुद्धिवाले बृहस्पति । । महादेवजीका स्मरणकर श्रेष्ठ देवताओंको बार - बार ॥ १३ धिक्कारते हुए कहने लगे - ॥ १२-१३ ॥ बृहस्पति बोले — हे देवताओ! तुमलोग स्वार्थसाधक और दूसरेके कार्यको विनष्ट करनेवाले । हो । शंकरजीकी निन्दा करके मैं निश्चित रूपसे नरक ॥ १४ चला जाऊँगा ॥१४ ॥

। इसलिये आपलोगोंमेंसे कोई हिमालयके पास ॥ १५ जाकर हिमालयको समझाकर अपना कार्य सिद्ध करे, जिससे वे अनिच्छापूर्वक अपनी कन्या शिवजीको । देकर भारतमें निवास करें; क्योंकि भक्तिपूर्वक कन्या १६ देकर वे निश्चित ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे ॥ १५-१६ ॥ बादमें सप्तर्षि पर्वतराजको समझायेंगे कि यह १७ पार्वती शिवजीको छोड़कर दूसरे किसीका वरण नहीं करेगी ॥ १७ ॥

अथवा हे देवताओ! आपलोग इन्द्रके साथ १८ ब्रह्मलोकको जायँ और अपना सारा वृत्तान्त ब्रह्माजीको बतायें, वे ही आपलोगोंका कार्य सम्पन्न करेंगे ॥ १८ ॥

ब्रह्माजी बोले- यह सुनकर और विचारकर वे सभी देवता मेरी सभामें आये और प्रणामकर १ ९ आदरपूर्वक अपना सारा वृत्तान्त उन्होंने मुझसे निवेदन किया ॥१ ९ ॥ हे मुने! तब देवताओंकी उस शिव-२० निन्दाविषयक बातको सुनकर वेदवक्ता मैं दुखी होकर उन देवताओंसे कहने लगा —॥२० ॥

ब्रह्माजी बोले — हे वत्सो! मैं शिवजीकी दु: सह | निन्दा नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि शिवजीकी निन्दा २१ सम्पत्तिका विनाश करनेवाली एवं विपत्तियोंका कारण है ॥ २१ ॥

इसलिये हे देवताओ! आपलोग कैलासपर जायँ २२ और शिवको सन्तुष्ट करें तथा उन्हींको हिमालय के । घर भेजिये । वे ही स्वयं हिमालयके घर जाकर अ अपनी | निन्दा करें; क्योंकि परनिन्दा विनाशके लिये और २३ । आत्मनिन्दा यशके लिये कही गयी है । २२-२३ ॥

पृष्ठ 637

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 637 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३१ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२५ ब्रह्मोवाच

श्रुत्वेति मद्वचो देवा मां प्रणम्य मुदा च ते ।

कैलासं प्रययुः शीघ्रं शैलानामधिपं गिरिम् ॥ २४

तत्र गत्वा शिवं दृष्ट्वा प्रणम्य नतमस्तकाः ।

सुकृतांजलयः सर्वे तुष्टुवुस्तं सुरा हरम् ॥२५

देवा ऊचुः

देवदेव महादेव करुणाकर शंकर ।

वयं त्वां शरणापन्नाः कृपां कुरु नमोऽस्तु ते ॥ २६

त्वं भक्तवत्सलः स्वामिन्भक्तकार्यकरः सदा ।

दीनोद्धरः कृपासिन्धुर्भक्तापद्विनिमोचकः ॥ २७

ब्रह्मोवाच

इति स्तुत्वा महेशानं सर्वे देवाः सवासवाः ।

सर्वं निवेदयांचक्रुस्तद्वृत्तं तत आदरात् ॥ २८

तच्छ्रुत्वा देववचनं स्वीचकार महेश्वरः ।

देवान् सुयापयामास तानाश्वास्य विहस्य सः ॥ २ ९

देवा मुमुदिरे सर्वे शीघ्रं गत्वा स्वमंदिरम् ।

सिद्धं मत्वा स्वकार्यं हि प्रशंसन्तः सदाशिवम् ॥ ३०

ततः स भगवाञ्छम्भुर्महेशो भक्तवत्सलः ।

प्रययौ शैलभूपं च मायेशो निर्विकारवान् ॥ ३१

यदा शैलः सभामध्ये समुवास मुदान्वितः ।

बन्धुवर्गैः परिवृतः पार्वतीसहितः स्वयम् ॥ ३२

एतस्मिन्नन्तरे तत्र ह्याजगाम सदाशिवः ।

दण्डी छत्री दिव्यवासा बिभ्रत्तिलकमुज्ज्वलम् ॥ ३३

करे स्फटिकमालां च शालग्रामं गले दधत् ।

जपन्नाम हरेर्भक्त्या साधुवेषधरो द्विजः ॥ ३४

तं च दृष्ट्वा समुत्तस्थौ सगणोऽपि हिमालयः ।

ननाम दण्डवद्भूमौ भक्त्यातिथिमपूर्वकम् ॥ ३५

ननाम पार्वती भक्त्या प्राणेशं विप्ररूपिणम् ।

ज्ञात्वा तं मनसा देवी तुष्टाव परया मुदा ॥ ३६

ब्रह्माजी बोले- वे देवता मेरी बात सुनकर प्रेमसे मुझे प्रणामकर शीघ्र ही शैलराज कैलास-पर्वतपर गये ॥ २४ ॥

वहाँ जाकर शिवजीको देखकर सिर झुकाकर | शिवजीको प्रणाम करके हाथ जोड़कर वे सभी देवता उन शिवजीकी स्तुति करने लगे - ॥ २५ ॥

देवता बोले – हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणाकर! हे शंकर! हम सब आपकी शरणमें हैं, आपको प्रणाम है, हमलोगोंपर कृपा कीजिये ॥ २६ ॥

हे स्वामिन्! आप भक्तवत्सल हैं, सदा भक्तोंका कार्य करनेवाले, दीनोंका उद्धार करनेवाले, कृपासिन्धु और भक्तोंकी आपत्ति दूर करनेवाले हैं ॥ २७ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार इन्द्रादि देवगणोंने शिवजीकी स्तुति करके बड़े आदरके साथ अपना सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन किया ॥२८ ॥

देवताओंकी उस बातको सुनकर शिवजीने उसे स्वीकार कर लिया और उन्होंने हँसकर देवताओंको आश्वासन देकर उन्हें विदा कर दिया ॥ २ ९ ॥ तब सभी देवगण प्रसन्न हो गये और अपना कार्य सिद्ध जानकर शिवजीकी प्रशंसा करते हुए वे अपने स्थानको चले गये । तब वे भक्तवत्सल, मायेश, निर्विकार महेश्वर भगवान् शम्भु शैलराजके पास गये । ३०-३१ ॥ उस समय गिरिराज अपने बन्धुवर्गोंके साथ पार्वतीसहित प्रसन्न मनसे सभामें विराजमान थे ॥ ३२ ॥

उसी समय दण्ड, छत्र एवं दिव्य वस्त्र धारण किये तथा उज्ज्वल तिलक लगाये हुए भगवान् सदाशिव उनकी सभामें आ गये ॥३३ ॥

वे एक हाथमें स्फटिककी माला और गलेमें शालग्रामशिला धारण किये हुए थे । वे भली प्रकार ब्राह्मणका वेष धारणकर नारायणके नामका जप कर रहे थे ॥३४ ॥

उन्हें देखकर हिमालय सभासदोंके साथ खड़े हो गये और उन्होंने भूतलपर दण्डके समान पड़कर भक्ति-भावसे उन अपूर्व अतिथिको साष्टांग प्रणाम किया ॥ ३५ ॥

ब्राह्मणवेषधारी शिवजीको अपना प्राणेश्वर समझकर पार्वतीने प्रणाम किया और हृदयसे परम प्रसन्नतासे उनकी स्तुति की ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 638

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 638 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२६ आशिषं युयुजे विप्रः सर्वेषां प्रीतितश्शिवः शिवाया अधिकं तात मनोऽभिलषितं हृदा ॥ मधुपर्कादिकं सर्वं जग्राह ब्राह्मणो मुदा दत्तं शैलाधिराजेन हिमागेन महादरात् पप्रच्छ कुशलं चास्य हिमाद्रिः पर्वतोत्तमः तं द्विजेन्द्रं महाप्रीत्या सम्पूज्य विधिवन्मुने पुनः पप्रच्छ शैलेशस्तं ततः को भवानिति । उवाच शीघ्रं विप्रेन्द्रो गिरीन्द्रं सादरं वचः विप्रेन्द्र उवाच

ब्राह्मणोऽहं गिरिश्रेष्ठ वैष्णवो बुधसत्तमः ।

घटिकीं वृत्तिमाश्रित्य भ्रमामि धरणीतले ॥

मनोयायी सर्वगामी सर्वज्ञोऽहं गुरोर्बलात् ।

परोपकारी शुद्धात्मा दयासिन्धुर्विकारहा ॥

मया ज्ञातं हराय त्वं स्वसुतां दातुमिच्छसि ।

इमां पद्मसमां दिव्यां वररूपां सुलक्षणाम् ॥

निराश्रयायासङ्गाय कुरूपायागुणाय च ।

श्मशानवासिने व्यालग्राहिरूपाय योगिने ॥

दिग्वाससे कुगात्राय व्यालभूषणधारिणे ।

अज्ञातकुलनाम्ने च कुशीलायाविहारिणे ॥

विभूतिदिग्धदेहाय संक्रुद्धायाविवेकिने ।

अज्ञातवयसेऽतीव कुजटाधारिणे सदा ॥

सर्वाश्रयाय भ्रमिणे नागहाराय भिक्षवे ।

कुमार्गनिरतायाथ वेदाऽध्वत्यागिने हठात् ॥

इयं ते बुद्धिरचला न हि मङ्गलदा खलु । विबोध ज्ञानिनां श्रेष्ठ नारायणकुलोद्भव ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ । ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले उन सदाशिवने ३७ बड़े प्रेम - पूर्वक उन सबको आशीर्वाद दिया और | विशेषकर पार्वतीको हृदयसे उनका मनोवांछित आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ३७ ॥

। उन ब्राह्मणने शैलाधिराज हिमवान्‌के द्वारा ॥ ३८ बड़े आदरके साथ दिये गये मधुपर्क आदिको प्रेमसे ग्रहण किया ॥ ३८ ॥

। हे मुने! इस प्रकार प्रेमपूर्वक उन द्विजेन्द्रका ॥ ३ ९ विधिवत् पूजन करनेके पश्चात् पर्वतश्रेष्ठ हिमालय उनका कुशल पूछने लगे । पर्वतराजने उनसे पूछा कि आप कौन हैं? तब विप्रेन्द्र गिरिराजसे आदरपूर्वक ॥ ४० शीघ्र यह वचन कहने लगे - ॥ ३ ९ -४० ॥ विप्रेन्द्र बोले – हे गिरिश्रेष्ठ! मैं बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण हूँ और ज्योतिषवृत्तिका सहारा ४१ लेकर पृथिवीतलमें विचरण करता हूँ ॥४१ ॥

मैं अपने गुरुकी कृपासे मनके समान सर्वत्र ४२ चलनेवाला, सर्वत्र गमन करनेवाला, सर्वज्ञ, परोपकारी, शुद्ध मनवाला, दयासिन्धु तथा विकारका नाश करनेवाला हूँ ॥४२ ॥

मुझे ज्ञात हुआ है कि आप कमलके समान, ४३ दिव्य, उत्तम रूपवाली तथा सर्वलक्षणसम्पन्न अपनी यह कन्या आश्रयरहित, असंग, कुरूप, गुणहीन, ४४ श्मशानमें रहनेवाले, सर्पधारी, योगी, नग्न, मलिन शरीरवाले, सर्पका आभूषण धारण करनेवाले, अज्ञात | कुल तथा नामवाले, कुशील, विहारमें रुचि न ४५ रखनेवाले, विभूतिसे लिप्त देहवाले, अत्यन्त क्रोधी, अज्ञानी, अज्ञात आयुवाले, सदा विकृत जटा ४६ धारण करनेवाले, सबको आश्रय देनेवाले, भ्रमणशील, | नागोंका हार पहननेवाले, भिक्षुक, कुमार्गमें निरत तथा ४७ हठपूर्वक वैदिक मार्गका त्याग करनेवाले शिवको देना चाहते हैं॥४३–४७ ॥। [ हे हिमालय! ] आपका यह अटल विचार अवश्य ही मंगलदायक नहीं है । नारायणकुलमें | उत्पन्न तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [ गिरिराज! ] आप इसपर ४८ विचार कीजिये ॥४८ ॥

पृष्ठ 639

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 639 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६२७ न ते पात्रानुरूपश्च पार्वतीदानकर्मणि । महाजनः स्मेरमुखः श्रुतमात्राद्भविष्यति पश्य शैलाधिप त्वं च न तस्यैकोऽस्ति बान्धवः । महारत्नाकरः त्वं च तस्य किञ्चिद्धनं न हि बान्धवान्मेनकां कुध्रपते शीघ्रं सुतांस्तथा सर्वान्पृच्छ प्रयत्नेन पण्डितान्पार्वतीं विना रोगिणो नौषधं शश्वद्रोचते गिरिसत्तम । कुपथ्यं रोचतेऽभीक्ष्णं महादोषकरं सदा ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा ब्राह्मणः शीघ्रं स वै भुक्त्वा मुदान्वितः जगाम स्वालयं शान्तो नानालीलाकरश्शिवः इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके पार्वतीके दानकर्ममें वे आपके इस दानके ॥ ४ ९ अनुरूप पात्र नहीं हैं । बड़े लोग इस बातको सुनकर आपकी हँसी करेंगे । देखिये, उनका कोई बन्धु-बान्धव नहीं है और आप पर्वतराज हैं, उनके पास ॥ ५० कुछ भी नहीं है और आप रत्नाकर हैं ॥ ४ ९ -५० ॥ । हे शैलाधिराज! आप पार्वतीको छोड़कर ॥ ५१ [ इस विषयमें ] बान्धवोंसे, मेनासे, पुत्रोंसे और सभी पण्डितोंसे प्रयत्नपूर्वक शीघ्रतासे पूछिये ॥५१ ॥

हे गिरिसत्तम! रोगीको सर्वदा औषधि अच्छी ॥ ५२ नहीं लगती, अपितु महादोषकारक कुपथ्य ही सदा बहुत अच्छा लगता है ॥५२ ॥

ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर नाना प्रकारकी । । लीला करनेवाले विप्ररूप शिव प्रसन्नतापूर्वक भोजनकर ॥ ५३ । शान्तचित्त हो शीघ्र अपने घर चले गये ॥५३ ॥

तृतीये पार्वतीखण्डे शिवमायावर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवमायावर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः ब्राह्मण वेषधारी शिवद्वारा शिवस्वरूपकी निन्दा सुनकर मेनाका कोपभवनमें गमन, शिवद्वारा सप्तर्षियोंका स्मरण और उन्हें हिमालयके घर भेजना, हिमालयकी शोभाका वर्णन तथा हिमालयद्वारा सप्तर्षियोंका स्वागत ब्रह्मोवाच

ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा मेनोवाच हिमालयम् ।

शोकेनासाधुनयना हृदयेन विदूयता ॥

मेनोवाच

शृणु शैलेन्द्र मद्वाक्यं परिणामे सुखावहम् ।

पृच्छ शैववरान्सर्वान्किमुक्तं ब्राह्मणेन ह ॥

निन्दानेन कृता शम्भोर्वैष्णवेन द्विजन्मना ।

श्रुत्वा तां मे मनोऽतीव निर्विण्णं हि नगेश्वर ॥

तस्मै रुद्राय शैलेश न दास्यामि सुतामहम् ।

कुरूपशीलनाम्ने हि सुलक्षणयुतां निजाम् ॥

न मन्यसे वचो चेन्मे मरिष्यामि न संशयः ।

त्यक्ष्यामि च गृहं सद्यो भक्षयिष्यामि वा विषम् ॥

गले बद्ध्वांबिकां रज्ज्वा यास्यामि गहनं वनम् ।

महाम्बुधौ मज्जयिष्ये तस्मै दास्यामि नो सुताम् ॥

ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] ब्राह्मणका यह वचन सुनकर [ अश्रुपूर्ण नेत्रोंवाली ] मेना व्यथित १ मनसे हिमालयसे कहने लगीं —॥१ ॥

मेना बोलीं- हे शैलेन्द्र! परिणाममें सुख प्रदान करनेवाले मेरे वचनको सुनें, सभी श्रेष्ठ शैवोंसे पूछिये २ कि इस ब्राह्मणने क्या कह दिया? ॥२ ॥

हे नगेश्वर! इस विष्णुभक्त ब्राह्मणने शिवजीकी ३ निन्दा की है, उसे सुनकर मेरा मन अत्यन्त दुखी है ॥ ३ ॥

हे शैलेश्वर! मैं कुत्सित रूप एवं शीलवाले ४ उस रुद्रको अपनी सुलक्षणा कन्या नहीं दूँगी ॥ ४ ॥

यदि आप मेरे वचनको नहीं मानेंगे, तो इसमें सन्देह नहीं कि मैं मर जाऊँगी, तुरंत घर छोड़ दूँगी अथवा ५ विष खा लूँगी अथवा अम्बिकाके गलेमें रस्सी बाँधकर घोर वनमें चली जाऊँगी अथवा उसे महासागरमें डुबो ६ दूँगी, किंतु उसको अपनी कन्या नहीं दूँगी ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 640

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 640 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२८ इत्युक्त्वाशु तथा गत्वा मेना कोपालयं शुचा त्यक्त्वा हारं रुदन्ती सा चकार शयनं भुवि एतस्मिन्नन्तरे तात शम्भुना सप्त एव ते संस्मृता ऋषयः सद्यो विरहव्याकुलात्मना ऋषयश्चैव ते सर्वे शम्भुना संस्मृता यदा तदाजग्मुः स्वयं सद्यः कल्पवृक्षा इवापरे ॥ अरुन्धती तथायाता साक्षात्सिद्धिरिवापरा तान्दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्विजहौ स्वजपं हरः स्थित्वाग्रे ऋषयः श्रेष्ठा नत्वा स्तुत्वा शिवं मुने । मेनिरे च तदात्मानं कृतार्थं ते तपस्विनः ततो विस्मयमापन्ना नमस्कृत्य स्थिताः पुनः प्रोचुः प्राञ्जलयस्ते वै शिवं लोकनमस्कृतम् ॥ ऋषय ऊचुः सर्वोत्कृष्ट महाराज सार्वभौम दिवौकसाम् । स्वभाग्यं वर्ण्यतेऽस्माभिः किं पुनः सकलोत्तमम्

तपस्तप्तं त्रिधा पूर्वं वेदाध्ययनमुत्तमम् ।

अग्नयश्च हुताः पूर्वं तीर्थानि विविधानि च ॥

वाङ्मनःकायजं किंचित्पुण्यं स्मरणसम्भवम् ।

तत्सर्वं सङ्गतं चाद्य स्मरणानुग्रहात्तव ॥

यो वै भजति नित्यं त्वां कृतकृत्यो भवेन्नरः ।

किं पुण्यं वर्ण्यते तेषां येषां च स्मरणं तव ॥

सर्वोत्कृष्टा वयं जाताः स्मरणात्ते सदाशिव ।

मनोरथपथं नैव गच्छसि त्वं कथंचन ॥

वामनस्य फलं यद्वज्जन्मान्धस्य दृशौ यथा ।

वाचालत्वं च मूकस्य रंकस्य निधिदर्शनम् ॥

पङ्गोर्गिरिवराक्रान्तिर्वन्ध्यायाः प्रसवस्तथा ।

दर्शनं भवतस्तद्वज्जातं नो दुर्लभं प्रभो ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ । इस प्रकार कहकर शोक सन्तप्त वे मेना शीघ्र ॥ ७ कोपभवनमें जाकर हार उतारकर रोती हुई भूमिषा लेट गयीं ॥७ ॥

। हे तात! उसी समय [ कालीके ] विरहसे ॥ ८ व्याकुल हुए शंकरजीने शीघ्र ही उन सप्तर्षियोंका स्मरण किया ॥८ ॥

। जब शिवजीने उन सभी ऋषियोंका स्मरण ९ किया, तब वे दूसरे कल्पवृक्षके समान तत्काल वहाँ । उपस्थित हो गये और साक्षात् सिद्धिके समान अरुन्धती ॥ १० भी वहाँ आ गयीं । सूर्यके समान तेजस्वी उन ऋषियोंको देखकर शिवजीने अपना जप छोड़ दिया ॥ ९ -१० ॥ हे मुने! वे श्रेष्ठ तपस्वी ऋषि शिवजीके आगे ॥ ११ खड़े होकर उन्हें प्रणामकर उनकी स्तुति करके अपनेको कृतार्थ समझने लगे ॥ ११ ॥

। तत्पश्चात् विस्मयमें पड़कर वे पुनः लोकनमस्कृत १२ शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़कर सामने खड़े होकर उनसे कहने लगे— ॥ १२ ॥

ऋषिगण बोले — हे सर्वोत्कृष्ट! हे देवताओंके सम्राट्! हे महाराज! हमलोग अपने सर्वोत्तम भाग्यकी ॥ १३ सराहना किस प्रकार करें ॥१३ ॥

हमलोगोंने जो पूर्व समयमें [ कायिक, वाचिक तथा १४ मानसिक ] तीनों प्रकारकी तपस्या की है, उत्तम वेदाध्ययन किया है, अग्निहोत्र किया है तथा नाना प्रकारके तीर्थ किये हैं और ज्ञानपूर्वक वाणी, मन तथा शरीरसे जो १५ कुछ भी पुण्य किया है, वह सब आज आपके स्मरणरूप अनुग्रहके प्रभावसे सफल हो गया ॥ १४-१५ ॥ जो मनुष्य आपका नित्य स्मरण करता है, वह १६ कृतकृत्य हो जाता है, तब उसके पुण्यका क्या वर्णन । किया जाय, जिसका स्मरण आप करते हैं ॥१६ ॥

हे सदाशिव! आपके द्वारा स्मरण किये जानेसे १७ हमलोग सर्वोत्कृष्ट हो गये हैं, आप तो किसीके । मनोरथमार्गमें किसी प्रकार आते ही नहीं हैं ॥ १७ ॥

जिस प्रकार बौनेको फल प्राप्त हो जाता है, १८ जन्मान्धको नेत्रकी प्राप्ति होती है, गूँगेको वाणी मिल | जाती है, कंगालको निधिदर्शन हो जाता है, पंगुको ऊँचे । पहाड़पर चढ़नेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है तथा वन्ध्याको । | प्रसव सम्भव हो जाता है, उसी प्रकार हे प्रभो! हमें १ ९ आपका यह दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया ॥ १८-१९ ॥ ।