शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 681–690
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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अ ० ४१ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६६ ९ विष्णुरुवाच
निवातकवचैः पूर्वं मोहितोऽसि शचीपते ।
महाविद्याबलेनैव दानवैः पूर्ववैरिभि: ॥
पर्वतो हिमवानेष तथान्येऽखिलपर्वताः ।
विपक्षा हि कृताः सर्वे मम वाक्याच्च वासव ॥
तेऽनुस्मृत्या तु वै दृष्ट्वा मायया गिरयो ह्यमी ।
जेतुमिच्छन्ति ये मूढा न भेतव्यमरावपि ॥
ईश्वरो नो हि सर्वेषां शंकरो भक्तवत्सलः ।
सर्वथा कुशलं शक्र करिष्यति न संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
एवं संवदमानं तं शक्रं विकृतमानसम् ।
हरिणोक्तश्च गिरिशो लौकिकीं गतिमाश्रितः ॥
ईश्वर उवाच
हे हरे हे सुरेशान किं ब्रूथोऽद्य परस्परम् ।
इत्युक्त्वा तौ महेशानो मुने त्वां प्रत्युवाच सः ॥
किं नु a क्ति महाशैलो यथार्थं वद नारद ।
वृत्तान्तं सकलं ब्रूहि न गोप्यं कर्तुमर्हसि ॥
ददाति वा नैव ददाति शैलः सुतां स्वकीयां वद तच्च शीघ्रम् । किं ते दृष्टं किं कृतं तत्र गत्वा प्रीत्या सर्वं तद्वदाश्वद्य तात ॥ ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः शम्भुना तत्र मुने त्वं देवदर्शनः ।
सर्वं रहस्यवोचो वै यद् दृष्टं तत्र मण्डपे ॥
नारद उवाच
देवदेव महादेव शृणु मद्वचनं शुभम् ।
नास्ति विघ्नभयं नाथ विवाहे किंचिदेव हि ॥
अवश्यमेव शैलेशस्तुभ्यं दास्यति कन्यकाम् ।
त्वामानयितुमायाता इमे शैला न संशयः ॥
विष्णुजी बोले- हे शचीपते! आपके वैरी निवात - कवचादि दानवगणोंने महाविद्याके बलसे ३३ पूर्वसमयमें भी आपको मोहित किया था । हे वासव! इसी प्रकार आपने मेरी आज्ञासे पर्वतराज हिमालयके तथा अन्य दूसरे पर्वतोंके पंखका छेदन कर दिया है । ३४ इस कारण ये पर्वत भी उसी मायाको देखकर तथा सुनकर आपको जीतनेकी इच्छा करते हैं । ये सभी मूर्ख हैं और पराक्रम नहीं जानते हैं, अतः आप इनसे ३५ भयभीत न हों॥३३–३५ ॥ हे देवेन्द्र! इसमें कोई भी सन्देह नहीं ३६ कि भक्तवत्सल भगवान् सदाशिव हम सभीका मंगल करेंगे ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार व्याकुल हुए इन्द्रको देखकर विष्णुने उन्हें समझाया । तब लौकिक ३७ गतिका आश्रय लेनेवाले भगवान् शिव उनसे कहने लगे— ॥३७ ॥
ईश्वर बोले — हे हरे! हे सुरपते! आपलोग आपसमें क्या विचार - विमर्श कर रहे हैं? [ ब्रह्माजी बोले- ] ३८ उन दोनोंसे इस प्रकार कहकर हे मुने! पुनः उन्होंने आपसे कहा — हे नारद! महाशैलने क्या कहा है, आप यथार्थ रूपसे सारा वृत्तान्त कहिये, आप उसे ३ ९ गुप्त न रखें ॥ ३८-३९ ॥ आप शीघ्रतासे बताइये कि शैलराजकी कन्या देनेकी इच्छा है अथवा नहीं? हे तात! आपने वहाँ जाकर क्या देखा और क्या किया? यह सारा वृत्तान्त ४० प्रेमपूर्वक कहिये ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! जब शिवजीने आपसे यह कहा, तब दिव्य दृष्टिवाले आपने मण्डपमें जो कुछ ४१ देखा था, वह सब एकान्तमें इस प्रकार कहा— ॥ ४१ ॥
नारदजी बोले – हे देवदेव! हे महादेव! आप मेरा शुभ वचन सुनें । इस विवाहमें किसी प्रकारके ४२ विघ्न दिखायी नहीं पड़ते और न तो किसी प्रकारका भय ही है ॥४२ ॥
शैलराज निश्चित रूपसे आपको ही अपनी कन्या देना चाहते हैं और ये पर्वत इसी निमित्त आपको लेनेकी इच्छासे यहाँ आये हैं, इसमें सन्देह ४३ | नहीं है ॥ ४३ ॥
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६७० किन्तु ह्यमरमोहार्थं माया विरचिताद्भुता कुतूहलार्थं सर्वज्ञ न कश्चिद्विघ्नसम्भवः विचित्रं मण्डपं गेहेऽकार्षीत्तस्य तदाज्ञया विश्वकर्मा महामायी नानाश्चर्यमयं विभो सर्वदेवसमाजश्च कृतस्तत्र विमोहनः तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप्तोऽहं तन्मायाविमोहितः ब्रह्मोवाच
तच्छ्रुत्वा तद्वचस्तात लोकाचारकरः प्रभुः ।
हर्यादीन्प्रहसन् शम्भुरुवाच सकलान्सुरान् ॥
ईश्वर उवाच
कन्यां दास्यति चेन्मह्यं पर्वतो हि हिमाचलः ।
मायया मम किं कार्यं वद विष्णो यथातथम् ॥
हे ब्रह्मन् शक्र मुनयः सुरा ब्रूत यथार्थतः ।
मायया मम किं कार्यं कन्यां दास्यति चेगिरिः ॥
केनाप्युपायेन फलं हि साध्य-मित्युच्यते पण्डितैर्न्यायविद्भिः । तस्मात्सर्वैर्गम्यतां शीघ्रमेव कार्यार्थिभिर्विष्णुपुरोगमैश्च श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४१ । हे सर्वज्ञ! परंतु एक बात यह है कि कुतूहलवश ॥ ४४ । वहाँ सभी देवताओंको मोहित करनेके लिये । अद्भुत माया रची गयी है । इसके अतिरिक्त वहाँ एक | किसी प्रकारके विघ्नकी सम्भावना नहीं है और । हे विभो! महामाया करनेवाले विश्वकर्माने ॥ ४४ ॥
॥ ४५ हिमालयकी आज्ञासे उनके घरमें महान् आश्चर्ययुक्त । मण्डपकी रचना की है । उस मण्डपमें विश्वकर्माने सारे देवसमाजके चित्रका निर्माण किया है, उसे देखकर मैं ॥ ४६ मोहित होकर आश्चर्यमें पड़ गया हूँ ॥ ४५-४६ ॥ ब्रह्माजी बोले- नारदका वचन सुनकर लोकाचार करनेवाले प्रभु शिवजी विष्णु आदि ४७ देवताओंसे हँसते हुए कहने लगे —॥४७ ॥
ईश्वर बोले - हे विष्णो! यदि पर्वत हिमालय मुझे अपनी कन्या देंगे, तो आप यथार्थ रूपसे बताइये ४८ कि मुझे मायासे क्या प्रयोजन है? ॥ ४८ ॥
हे ब्रह्मन्! हे शक्र! हे मुनिगण तथा हे देवताओ! ४ ९ आपलोग यथार्थ रूपसे कहिये कि हिमालय मुझे अपनी कन्या दे रहे हैं, तो मायासे मेरा क्या प्रयोजन है? ॥ ४ ९ ॥ न्यायशास्त्रके जानकार पण्डितोंने कहा है कि जिस किसी उपायसे अपने साध्यको प्राप्त करना चाहिये । अतः आप सभी विष्णु आदि देवगण इस ॥५० कार्यसिद्धिकी इच्छासे शीघ्र ही चलें ॥ ५० ॥
ब्रह्मोवाच
एवं संवदमानोऽसौ देवैः शम्भुरभूत्तदा ।
कृतः स्मरेणेव वशी वशं वा प्राकृतो नरः ॥
अथ शम्भ्वाज्ञया सर्वे विष्ण्वाद्या निर्जरास्तदा ।
ऋषयश्च महात्मानो ययुर्मोहभ्रमावहम् ॥
पुरस्कृत्य मुने त्वां च पर्वतांस्तान्सविस्मयाः ।
हिमाद्रेश्च तदा जग्मुर्मन्दिरं परमाद्भुतम् ॥
अथ विष्ण्वादिसंयुक्तो मुदितैः स्वबलैर्युतः ।
आजगामोपहैमागपुरं प्रमुदितो हरः ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये ब्रह्माजी बोले — देवताओंसे इस प्रकार कहनेवाले जितेन्द्रिय भगवान् सदाशिवको कामदेवने साधारण मनुष्यके ५१ समान अपने वशमें कर लिया । उसके बाद शिवजी की | आज्ञासे विष्णु आदि देवता एवं ऋषिगण भ्रान्त तथा ५२ मोहित करनेवाले हिमालय - गृहकी ओर गये ॥ ५१-५२१ ॥ हे मुने! उन देवताओंने आप नारदको तथा उन ५३ पर्वतोंको आगेकर आश्चर्यचकित हो हिमालयके अपूर्व । एवं परम अद्भुत मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५३ ॥
इस प्रकार हर्षमें भरे हुए विष्णु आदि देवताओं तथा | प्रसन्नतासे युक्त अपने गणोंके साथ वे शिवजी आनन्दित ५४ । होकर हिमालयके नगरके समीप आ गये ॥ ५४ ॥
पार्वतीखण्डे मण्डपरचनावर्णनं ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः मण्डपरचनावर्णन नामक इकतालीसवाँ रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
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अ ० ४२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६७१ अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः हिमालयद्वारा प्रेषित मूर्तिमान् पर्वतों और ब्राह्मणोंद्वारा बरातकी अगवानी, देवताओं और ब्रह्मोवाच
अथाकर्ण्य गिरीशश्च निजपुर्युपकण्ठतः ।
प्राप्तमीशं सर्वगं वै मुमुदे ति हिमालयः ॥ १
अथ सम्भृतसम्भारः सम्भाषां कर्तुमीश्वरम् ।
शैलान्प्रस्थापयामास ब्राह्मणानपि सर्वशः ॥
स्वयं जगाम सद्भक्त्या प्राणेप्सुं द्रष्टुमीश्वरम् ।
भक्त्युद्द्रुतमनाः शैलः प्रशंसन् स्वविधिं मुदा ॥ ३
देवसेनां तदा दृष्ट्वा हिमवान्विस्मयं गतः ।
जगाम सम्मुखस्तत्र धन्योऽहमिति चिन्तयन् ॥ ४
देवा हि तद्बलं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गताः ।
आनन्दं परमं प्रापुर्देवाश्च गिरयस्तथा ॥ ५
पर्वतानां महासेना देवानां च तथा मुने ।
मिलित्वा विरराजेव पूर्वपश्चिमसागरौ ॥ ६
परस्परं मिलित्वा ते देवाश्च पर्वतास्तथा ।
कृतकृत्यं तथात्मानं मेनिरे परया मुदा ॥ ७
अथेश्वरं पुरो दृष्ट्वा प्रणनाम हिमालयः ।
सर्वे प्रणेमुर्गिरयो ब्राह्मणाश्च सदाशिवम् ॥ ८
वृषभस्थं प्रसन्नास्यं नानाभरणभूषितम् ।
दिव्यावयवलावण्यप्रकाशितदिगन्तरम् ॥ ९
सुसूक्ष्माहतसत्पट्टवस्त्रशोभितविग्रहम् सद्रत्नविलसन्मौलिं विहसन्तं शुचिप्रभम् ॥ १० भूषाभूताहियुक्ताङ्गमद्भुतावयवप्रभम् 1 दिव्यद्युतिं सुरेशैश्च सेवितं करचामरैः ॥ ११
वामस्थिताच्युतं दक्षभागस्थितविधिं प्रभुम् ।
पृष्ठस्थित हरिं पृष्ठपार्श्वस्थितसुरादिकम् ॥ १२
नानाविधसुराद्यैश्च संस्तुतं लोकशंकरम् । पर्वतोंके मिलापका वर्णन ब्रह्माजी बोले - गिरिराज हिमालय सर्वव्यापी शिवजीको अपने नगरके निकट आया हुआ सुनकर बड़े प्रसन्न हुए ॥१ ॥
तदनन्तर उन्होंने सभी सामग्री एकत्रित करके परमेश्वरकी अगवानी करनेके लिये बहुत - से ब्राह्मणों तथा पर्वतोंको भेजा और प्राणोंसे प्रिय ईश्वरका दर्शन करनेके लिये भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले वे हिमालय अपने भाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक स्वयं भी गये ॥ २-३ ॥ उस समय देवसेनाको देखकर हिमवान् विस्मित हो गये और मैं धन्य हूँ - ऐसा सोचते हुए वे उनके सामने गये । देवता भी हिमालयकी [ विशाल ] सेनाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये । इस प्रकार देवताओं तथा पर्वतोंको परम आनन्द प्राप्त हुआ ॥ ४-५ ॥ हे मुने! [ उस समय ] देवताओं तथा पर्वतोंकी विशाल सेना मिलकर पूर्व तथा पश्चिम सागरके समान शोभित हुई । वे देवता तथा पर्वत परस्पर मिलकर बड़ी प्रसन्नतासे अपनेको कृतकृत्य मानने लगे ॥ ६-७ ॥ उसके बाद हिमालयने ईश्वरको सामने देखकर उन्हें प्रणाम किया और सभी पर्वतों तथा ब्राह्मणोंने भी सदाशिवको प्रणाम किया ॥ ८ ॥
हिमालयने वृषभपर सवार, प्रसन्न मुखवाले, नानालंकारोंसे शोभित, अपने दिव्य शरीरकी शोभासे दिगन्तरोंको प्रकाशित करनेवाले, अत्यन्त सूक्ष्म तथा नवीन रेशमी वस्त्रसे शोभित विग्रहवाले, सिरपर रत्नोंसे जटित मुकुट धारण किये हुए, हँसते हुए, शुभ्र कान्तिवाले, सर्पोंके अलंकारोंसे सुशोभित अंगवाले, अंगोंकी अद्भुत प्रभावाले, दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, हाथोंमें चँवर धारण किये देवताओंद्वारा सेवित, बायीं ओर अच्युत, दाहिनी ओर ब्रह्मा, पृष्ठभागमें इन्द्र और पीछे तथा पार्श्वभागमें देवता आदिसे शोभायमान, अनेकविध देवता आदिके द्वारा स्तुत, संसारका कल्याण करनेवाले, अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले,
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६७२ स्वहेत्वात्ततनुं ब्रह्म सर्वेशं वरदायकम् ॥ सगुणं निर्गुणं चापि भक्ताधीनं कृपाकरम् प्रकृतेः पुरुषस्यापि परं सच्चित्सुखात्मकम् ॥
प्रभोर्दक्षिणभागे तु ददर्श हरिमच्युतम् ।
विनतातनयारूढं नानाभूषणभूषितम् ॥
प्रभोश्च वामभागे तु मुने मां सन्ददर्श ह ।
चतुर्मुखं महाशोभं स्वपरीवारसंयुतम् ॥
एतौ सुरेश्वरौ दृष्ट्वा शिवस्यातिप्रियौ सदा ।
प्रणनाम गिरीशश्च सपरीवार आदरात् ॥
तथा शिवस्य पृष्ठे च पार्श्वयोः सुविराजितान् ।
देवादीन्प्रणनामासौ दृष्ट्वा गिरिवरेश्वरः ॥
शिवाज्ञया पुरो भूत्वा जगाम स्वपुरं गिरिः ।
शेषहर्यात्मभूः शीघ्रं मुनिभिर्निर्जरादिभिः ॥
सर्वे मुनिसुराद्याश्च गच्छन्तः प्रभुणा सह ।
गिरेः पुरं समुदिताः शशंसुर्बहु नारद ॥
रचिते शिखरे रम्ये संस्थाप्य देवतादिकम् ।
जगाम हिमवाँस्तत्र यत्रास्ति विधिवेदिका ॥
कारयित्वा विशेषेण चतुष्कं तोरणैर्युतम् ।
स्नानदानादिकं कृत्वा परीक्षामकरोत्तदा ॥
स्वपुत्रान्प्रेषयामास शिवस्य निकटे तथा ।
हिमो विष्ण्वादिसम्पूर्णवर्गयुक्तस्य शैलराट् ॥
कर्तुमैच्छद्वराचारं महोत्सवपुरस्सरम् ।
महाहर्षयुतः सर्वबन्धुयुग्घिमशैलराट् ॥
अथ ते गिरिपुत्राश्च तत्र गत्वा प्रणम्य तम् ।
सस्ववर्गं प्रार्थनान्तामूचुः शैलेश्वरस्य वै ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४२ १३ | ब्रह्मस्वरूप, सर्वेश्वर, वर प्रदान करनेवाले, नित | तथा सगुण रूपवाले, भक्तोंके अधीन रहनेवाले । । करनेवाले, प्रकृति तथा पुरुषसे भी, कृपा । १४ सच्चिदानन्दस्वरूप शिवको देखा॥९ –१४ परे ॥ और हिमालयने प्रभुके दक्षिण भागमें गरुड़पर १५ तथा नाना प्रकारके आभूषणोंसे श्रीहरिको देखा ॥ १५ ॥
हे मुने! उन्होंने प्रभुके १६ मुखवाले, महान् शोभावाले तथा युक्त मुझे देखा ॥ १६ ॥
इस प्रकार शिवके परम सवार सुसज्जित अच्युत वामभागमें चार अपने परिवारसे प्रिय हम दोनों १७ सुरेश्वरोंको देखकर गिरीशने परिवारसहित आदरसे प्रणाम किया ॥ १७ ॥
फिर गिरीश्वरने देवाधिदेव सदाशिवके पीछे १८ तथा पार्श्वभागमें स्थित हुए सभी देवताओंको प्रणाम किया ॥ १८ ॥
इसके बाद शिवजीकी आज्ञासे गिरिराज १ ९ हिमालय आगे होकर अपने नगरमें प्रविष्ट हुए तदनन्तर शेष, विष्णु तथा ब्रह्मा भी देवताओंके साथ नगरमें गये ॥१ ९ ॥ हे नारद! प्रभुके साथ जाते हुए सभी मुनि, २० देवता आदि एवं देवगण परम प्रसन्न हो हिमालयके नगरकी प्रशंसा करने लगे । उसके बाद हिमालय सुरम्य तथा निवासके योग्य बनाये गये अपने शिखरपर २१ देवता आदिको ठहराकर स्वयं वहाँ चले गये, जहाँ वेदी बनी थी ॥ २०-२१ ॥ | उसे चौकोर तथा तोरणोंसे विशेष रूपसे २२ सुसज्जित कराकर स्नान - दानादि क्रियाकर उन्होंने [ विधिपूर्वक ] वहाँका निरीक्षण किया ॥ २२ ॥
तदनन्तर पर्वतराज हिमालयने विष्णु आदि
२३ सम्पूर्ण वर्गसे युक्त शिवके समीप अपने पुत्रोंको ।
भेजा ॥ २३ ॥
वे पर्वतराज परम प्रसन्न हो अपने बन्धुगणोंके २४ साथ महान् उत्सवपूर्वक वरका यथोचित आचार करना चाहते थे । तब उन पर्वतपुत्रोंने वहाँ जाकर | अपने वर्गोंके सहित विराजमान उन शिवको प्रणाम २५ करके शैलेश्वरकी वह प्रार्थना सुनायी ॥ २४-२५ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६७३
ततस्ते स्वालयं जग्मुः शैलपुत्रास्तदाज्ञया ।
शैलराजाय संचख्युः ते चायान्तीति हर्षिताः ॥
अथ देवाः प्रार्थनान्तां गिरेः श्रुत्वातिहर्षिताः ।
मुने विष्ण्वादयः सर्वे सेश्वरा मुमुदुर्भृशम् ॥
कृत्वा सुवेषं सर्वेऽपि निर्जरा मुनयो गणाः ।
गमनं चक्रुरन्येऽपि प्रभुणा गिरिरागृहम् ॥
तस्मिन्नवसरे मेना द्रष्टुकामाभवच्छिवम् ।
प्रभोराह्वाययामास मुने त्वां मुनिसत्तमम् ॥
अगमस्त्वं मुने तत्र प्रभुणा प्रेरितस्तदा ।
मनसा शिवहृद्धेतुं पूर्णं कर्तुं तमिच्छता ॥
त्वां प्रणम्य मुने मेना प्राह विस्मितमानसा ।
द्रष्टुकामा प्रभो रूपं शंकरस्य मदापहम् ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये तत्पश्चात् वे पर्वतपुत्र उनकी आज्ञासे अपने घर २६ चले गये और प्रसन्न होकर शैलराजसे बोले कि अब लोग आ रहे हैं । हे मुने! इसपर शिवजीसहित विष्णु आदि समस्त देवता गिरिराजकी वह प्रार्थना सुनकर २७ परम प्रसन्न और अत्यन्त आह्लादित हो गये । उसके बाद सभी देवता, मुनि, गण तथा अन्य लोग उत्तम २८ वेशभूषा धारण करके प्रभुके साथ पर्वतराजके घर गये॥२६–२८ ॥ उस अवसरपर मेनाने शिवजीको देखना चाहा २ ९ और हे मुने! प्रभुको देखनेके लिये उन्होंने आप मुनिश्रेष्ठको बुलवाया । तब हे मुने! आप प्रभुसे प्रेरित होकर शिवजीके हृदयकी बात पूर्ण करनेकी इच्छासे ३० युक्त मनसे वहाँ गये ॥ २ ९ -३० ॥ हे मुने! आपको प्रणाम करके विस्मित मनवाली मेना भगवान् शंकरके मदविनाशक रूपको देखनेकी ३१ । इच्छासे [ आपसे ] कहने लगीं ॥३१ ॥
पार्वतीखण्डे देवगिरिमिलापवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें देवताओं तथा पर्वतोंका मिलाप - वर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः मेनाद्वारा शिवको देखनेके लिये महलकी छतपर जाना, नारदद्वारा सबका दर्शन कराना, शिवद्वारा अद्भुत लीलाका प्रदर्शन, शिवगणों तथा शिवके भयंकर वेषको मेनोवाच
निरीक्षिष्यामि प्रथमं मुने तं गिरिजापतिम् ।
कीदृशं शिवरूपं हि यदर्थे तप उत्तमम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्यज्ञानपरा सा च दर्शनार्थं शिवस्य च ।
त्वया मुने समं सद्यश्चन्द्रशालां समागता ॥
शिवोऽपि च तदा तस्यां ज्ञात्वाहंकारमात्मनः ।
प्राह विष्णुं च मां तात लीलां कृत्वाद्भुतां प्रभुः ॥
शिव उवाच
मदाज्ञया युवां तातौ सदेवौ च पृथक्पृथक् ।
गच्छतं हि गिरिद्वारं वयं पश्चाद् व्रजेमहि ॥
देखकर मेनाका मूर्च्छित होना मेना बोलीं- हे मुने! मैं पहले गिरिजाके होनेवाले पतिको देखूँगी । जिनके लिये उसके द्वारा उत्तम १ तप किया गया है, उन शिवका रूप कैसा है?॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार अज्ञानके वशीभूत वे मेना शिवका दर्शन करनेके लिये आपके साथ शीघ्र ही चन्द्रशालापर गयीं । हे तात! २ । उस समय प्रभु शिवजी भी अपने प्रति उनके अहंकारको जानकर अद्भुत लीला करके मुझसे और विष्णुसे बोले— ॥ २-३ ॥ शिवजीने कहा- हे तात! आप दोनों मेरी आज्ञासे देवताओंके साथ अलग - अलग पर्वत हिमालयके
४ दरवाजेपर चलें । हमलोग बादमें चलेंगे ॥४ ॥
2223 Shivmahapuranam Part I_Section_23_1_Front
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६७४ ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य हरिः सर्वानाहूयोवाच तन्मयाः सुराः सर्वे तथैवाशु गमनं चक्रुरुत्सुकाः
स्थितां शिरोगृहे मेनां मुने विश्वेश्वरस्त्वया ।
तथैव दर्शयामास हृद्विभ्रंशो यथा भवेत् ॥
एतस्मिन् समये मेना सेनां च परमां शुभाम् । निरीक्षन्ती मुने दृष्ट्वा सामान्यं हर्षिताभवत्
प्रथमं चैव गन्धर्वाः सुन्दराः सुभगास्तदा ।
आयाताः शुभवस्त्राढ्या नानालंकारभूषिताः ॥
नानावाहनसंयुक्ता नानावाद्यपरायणाः ।
पताकाभिर्विचित्राभिरप्सरोगणसंयुताः ॥
अथ दृष्ट्वा वसुं तत्र तत्पतिं परमप्रभुम् ।
मेना प्रहर्षिता ह्यासीच्छिवोऽयमिति चाब्रवीत् ॥
शिवस्य गणका एते न शिवोऽयं शिवापतिः ।
इत्येवं त्वं ततस्तां वै अवोच ऋषिसत्तम ॥
एवं श्रुत्वा तदा मेना विचारे तत्पराभवत् ।
इतश्चाभ्यधिको यो वै स च कीदृग्भविष्यति ॥
एतस्मिन्नन्तरे यक्षा मणिग्रीवादयश्च ये ।
तेषां सेना तया दृष्टा शोभापि द्विगुणीकृता ॥
तत्पतिं च मणिग्रीवं दृष्ट्वा शोभान्वितं हि सा ।
अयं रुद्रः शिवास्वामी मेना प्राहेति हर्षिता ॥
नायं रुद्रः शिवास्वामी सेवकोऽयं शिवस्य वै ।
इत्यवोचोऽगपल्यै त्वं तावद्बह्निः स आगतः ॥
ततोऽपि द्विगुणां शोभां दृष्ट्वा तस्य च साब्रवीत् ।
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवीः ॥
तावद्यमः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभः ।
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता ॥
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावन्निर्ऋतिरागतः ।
बिभ्राणो द्विगुणां शोभां शुभः पुण्यजनप्रभुः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ ब्रह्माजी बोले- यह सुनकर विष्णुने । । देवगणोंको बुलाकर वैसा करनेको कहा । उसके सभी । ॥ ५ सभी देवता शिवमें चित्त लगाये हुए ब बाद चलने लगे ॥५ ॥ उत्सुक होकर ।
हे मुने! उसी समय शिवजीके दर्शनकी इच्छा ६ मेना भी तुमको साथ लेकर महलकी अटारीपर । चढ़ गयीं । तब तुम उन्हें इस प्रकार दिखाने लगे । जिससे उनका हृदय विदीर्ण हो । हे मुने! उस समय, ॥ ७ परम शुभ सेनाको देखती हुई मेना सामान्यरूपसे हर्षित हो उठीं ॥ ६-७ ॥ सबसे पहले सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए, सुभग, ८ शुभ, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, विविध वाहनोंसे युक्त, अनेक प्रकारके बाजे बजानेमें तत्पर और विचित्र पताकाओं तथा अप्सराओंको अपने साथ ९ लिये हुए गन्धर्व आये । उस समय मेना गन्धर्वपति परमप्रभु वसुको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं और १० उन्होंने पूछा कि क्या ये शिवजी हैं? ॥ ८-१० ॥ हे ऋषिश्रेष्ठ! तब आपने उनसे यह कहा— ११ ये शिवजीके गण हैं, शिवाके पति शंकरजी नहीं हैं ॥११ ॥
यह सुनकर मेनाने विचार किया कि जो इनसे १२ भी अधिक श्रेष्ठ है, वह कैसा होगा ॥ १२ ॥
उसी समय जो मणिग्रीव आदि यक्ष थे, १३ उनकी सेनाको उन्होंने देखा, जिनकी शोभा गन्धर्वोंसे दुगुनी थी ॥१३ ॥
यक्षाधिपति मणिग्रीवको अत्यन्त शोभासे समन्वित १४ देखकर ये शिवास्वामी रुद्र हैं - मेनाने हर्षित होकर ऐसा कहा । हे नारद! तब तुमने कहा — ये शिवास्वामी १५ । रुद्र नहीं हैं, ये तो शिवके सेवक हैं । उसी समय | शोभा देखकर मेनाने पूछा- क्या ये ही गिरिजाके १६ स्वामी रुद्र हैं? तब आपने कहा- नहीं ॥ १४–१६ ॥ तत्पश्चात् उनकी भी शोभासे द्विगुणित शोभायुक्त १७ यम आये । उन्हें देखकर प्रसन्न होकर मेनाने कहा-क्या ये रुद्र हैं? तब आपने उनसे कहा- नहीं, उसी | समय उनसे भी द्विगुणित शोभा धारण किये हुए १८ पुण्यजनोंके प्रभु शुभ निर्ऋति आये ॥ १७-१८ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६७५
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता ।
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावद्वरुण आगतः ॥ १ ९
ततोऽपि द्विगुणां शोभां दृष्ट्वा तस्य च साब्रवीत् ।
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवीः ॥ २०
तावद्वायुः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभः ।
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता ॥ २१
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावद्धनद आगतः ।
ततोऽपि द्विगुणां शोभां बिभ्राणो गुह्यकाधिपः ॥ २२
तं दृष्ट्वा प्राह सा मेना रुद्रोऽयमिति हर्षिता ।
नेति त्वमब्रवीस्तां वै तावदीशान आगतः ॥ २३
ततोऽपि द्विगुणां शोभां दृष्ट्वा तस्य च साब्रवीत् ।
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवीः ॥ २४
तावदिन्द्रः समायातः ततोऽपि द्विगुणप्रभः ।
सर्वामरवरो नानादिव्यभास्त्रिदिवेश्वरः ॥ २५
तं दृष्ट्वा शंकरः सोऽयमिति सा प्राह मेनका ।
शक्रः सुरपतिश्चायं स नेति त्वं तदाब्रवीः ॥ २६
तावच्चन्द्रः समायातः शोभां तद्विगुणां दधत् ।
दृष्ट्वा तं प्राह रुद्रोऽयं तां तु नेति त्वमब्रवीः ॥ २७
तावत्सूर्यः समायातः शोभां तद्विगुणां दधत् ।
दृष्ट्वा तं प्राह सा सोऽयं तां तु नेति त्वमब्रवीः ॥ २८
तावत्समागतास्तत्र भृग्वाद्याश्च मुनीश्वराः ।
तेजसो राशयः सर्वे स्वशिष्यगणसंयुताः ॥ २ ९
तन्मध्ये चैव वागीशं दृष्ट्वा सा प्राह मेनका ।
रुद्रोऽयं गिरिजास्वामी तदा नेति त्वमब्रवीः ॥ ३०
तावद्ब्रह्मा समायातः तेजसां राशिरुत्तमः ।
सर्षिवर्यसुतः साक्षाद्धर्मपुंज इव स्तुतः ॥ ३१
दृष्ट्वा मां तं तदा मेना महाहर्षवती मुने ।
सोऽयं शिवापतिः प्राह तां तु नेति त्वमब्रवीः ॥ ३२
उन्हें देखकर मेनाने प्रसन्न होकर कहा — क्या ये रुद्र हैं? तब आपने उनसे कहा- नहीं । तभी वरुण आ गये । निर्ऋतिसे भी दुगुनी शोभा उनकी देखकर उन मेनाने कहा — ये गिरिजास्वामी रुद्र हैं? तब
आपने कहा- नहीं ॥। १ ९ -२० ॥
तदनन्तर उनसे भी दुगुनी शोभा धारण किये वायुदेव वहाँ आये । उनको देखकर मेनाने हर्षित | होकर कहा- क्या ये ही रुद्र हैं? तब आपने उनसे कहा— नहीं । उसी समय गुह्यकपति कुबेर उनसे भी दूनी शोभा धारण किये हुए वहाँ आये॥२१-२२ ॥ उनको देखकर प्रसन्न हो उन मेनाने कहा—
क्या ये ही रुद्र हैं? तब आपने उनसे कहा- नहीं ।
इतनेमें ईशानदेव आ गये ॥ २३ ॥
कुबेरसे भी दुगुनी उनकी शोभा देखकर मेनाने कहा- क्या ये गिरिजापति रुद्र हैं, तब आपने कहा— नहीं ॥ २४ ॥
तदनन्तर उनसे भी दुगुनी शोभासे सम्पन्न, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, अनेक प्रकारकी दिव्य कान्तिवाले और स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र आये ॥२५ ॥
उनको देखकर वे मेना बोलीं- क्या ये ही शंकर हैं? तब आपने कहा- ये देवराज इन्द्र हैं, वे नहीं हैं ॥ २६ ॥
तब उनसे भी दुगुनी शोभा धारण करनेवाले चन्द्रमा आये । उन्हें देखकर मेना बोलीं – क्या ये ही रुद्र हैं? तब आपने कहा- नहीं । इसके बाद उनसे भी दुगुनी शोभा धारण करनेवाले सूर्य आये । उन्हें देखकर मेनाने कहा- क्या ये ही शिव हैं? आपने कहा- नहीं ॥ २७-२८ ॥ इतनेमें तेजोराशि भृगु आदि मुनीश्वर अपने शिष्योंसहित वहाँ पहुँच गये ॥२ ९ ॥ उनके मध्यमें बृहस्पतिको देखकर मेना बोलीं- ये ही गिरिजापति रुद्र हैं? तब आपने कहा-नहीं ॥ ३० ॥
उसके बाद तेजोंकी महाराशि तथा साक्षात् धर्मके पुंजके समान मैं ब्रह्मा स्तुत होता हुआ ऋषियों तथा पुत्रोंके सहित उपस्थित हुआ । हे मुने! मुझे देखकर मेना बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा — क्या ये ही शिव हैं? तब आपने उनसे कहा- नहीं ॥ ३१-३२ ॥
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६७६ एतस्मिन्नन्तरे तत्र विष्णुर्देवः समागतः सर्वशोभान्वितः श्रीमान्मेघश्यामश्चतुर्भुजः कोटिकन्दर्पलावण्यः पीताम्बरधरः स्वराट् । राजीवलोचनः शान्तः पक्षीन्द्रवरवाहनः
शंखादिलक्षणैर्युक्तो मुकुटादिविभूषितः ।
श्रीवत्सवक्षा लक्ष्मीशो ह्यप्रमेयप्रभान्वितः ॥
तं दृष्ट्वा चकिताक्ष्यासीन्महाहर्षेण साब्रवीत् ।
सोऽयं शिवापतिः साक्षाच्छिवो वै नात्र संशयः ॥
अथ त्वं मेनकावाक्यमाकर्ण्योवाच ऊतिकृत् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४३ । इसी बीच सम्पूर्ण शोभासे युक्त, श्रीमान् ॥ ३३ । समान श्याम वर्णवाले, चार भुजाओंसे युक्त, मेघके । | कामदेवके समान कमनीय, पीताम्बर धारण किये , करोड़ों । अपने तेजसे प्रकाशित, कमलनयन शान्तस्वभाव हुए, , ॥ ३४ श्रेष्ठ गरुड़पर सवार, शंख आदि लक्षणोंसे, मुकुट आदिसे विभूषित, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका युक्त, | चिह्न धारण किये हुए, अप्रमेय कान्तिसे सम्पन्न ३५ लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु वहाँ आये॥३३–३५ ॥ उनको देखकर उनके नेत्र चकित हो गये और ३६ | उन्होंने हर्षसे भरकर कहा — ये ही साक्षात् गिरिजापति शिव हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६ ॥
तब मेनकाका वचन सुनकर परम कौतुकी नायं शिवापतिरयं किन्त्वयं केशवो हरिः ॥ ३७ आपने कहा- वे शिवापति नहीं हैं, अपितु ये केशव
शंकराखिलकार्यस्य ह्यधिकारी च तत्प्रियः ।
अतोऽधिको वरो ज्ञेयः स शिवः पार्वतीपतिः ॥
तच्छोभां वर्णितुं मेने मया नैव हि शक्यते ।
स एवाखिलब्रह्माण्डपतिः सर्वेश्वरः स्वराट् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मेना मेने च तां शुभाम् ।
महाधनां भाग्यवतीं कुलत्रयसुखावहाम् ॥
उवाच च प्रसन्नास्या प्रीतियुक्तेन चेतसा ।
स्वभाग्यमधिकं चापि वर्णयन्ती मुहुर्मुहुः ॥
मेनोवाच
धन्याहं सर्वथा जाता पार्वत्या जन्मनाधुना ।
धन्यो गिरीश्वरोऽप्यद्य सर्वं धन्यतमं मम ॥
ये ये दृष्टा मया देवा नायकाः सुप्रभान्विताः । एतेषां यः पतिः सोऽत्र पतिरस्या भविष्यति ॥
अस्याः किं वर्ण्यते भाग्यमपि वर्षशतैरपि ।
वर्णितुं शक्यते नैव तत्प्रभुप्राप्तिदर्शनात् ॥
विष्णु हैं ॥ ३७ ॥
ये शंकरजीके समस्त कार्योंके अधिकारी तथा ३८ उनके प्रिय हैं, उन पार्वतीपति शिवको इनसे भी अधिक श्रेष्ठ समझना चाहिये । हे मेने! उनकी शोभाका वर्णन मैं नहीं कर सकता, वे ही समस्त ब्रह्माण्डोंके ३ ९ अधिपति, सर्वेश्वर तथा स्वराट् हैं ॥ ३८-३९ ॥ ब्रह्माजी बोले- नारदके वचनको सुनकर उसको [ पार्वतीको ] महाधनवती, भाग्यवती, तीनों ४० कुलों ( पितृकुल, मातृकुल तथा पतिकुल ) -को सुख देनेवाली तथा कल्याणकारिणी समझा ॥४० ॥
उसके बाद प्रीतियुक्त चित्तसे प्रसन्न मुखवाली ४१ मेना बार - बार अपने भाग्यकी बड़ाई करती हुई कहने लगीं— ॥ ४१ ॥
मेना बोलीं- पार्वतीके जन्मसे इस समय मैं, | सर्वथा धन्य हो गयी, गिरीश्वर भी आज धन्य हो ४२ गये, मेरा सब कुछ धन्य हो गया । उत्तम प्रभासे | युक्त जिन - जिन देवताओं एवं देवाधिपतियोंको मैंने | देखा - इन सबके जो स्वामी हैं वे ही इसके पति ४३ होंगे ॥ ४२-४३ ॥, उसके भाग्यका क्या वर्णन किया जाय! उसके | द्वारा भगवान् शिवको पतिरूपमें प्राप्त करनेके | कारण सौ वर्षोंमें भी पार्वतीके सौभाग्यका ' वर्णन ४४ । नहीं किया जा सकता ॥४४ ॥
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अ ० ४३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६७७ ब्रह्मोवाच
इत्यवादीच्च सा मेना प्रेमनिर्भरमानसा ।
तावत्समागतो रुद्रोऽद्भुतोतिकारकः प्रभुः ॥ ४५
अद्भुतात्मगणास्तात मेनागर्वापहारकाः ।
आत्मानं दर्शयन् मायानिर्लिप्तं निर्विकारकम् ॥ ४६
तमागतमभिप्रेत्य नारद त्वं मुने तदा ।
मेनामवोचः सुप्रीत्या दर्शयंस्तं शिवापतिम् ॥ ४७
नारद उवाच
अयं स शंकरः साक्षाद् दृश्यतां सुन्दरि त्वया ।
यदर्थे शिवया तप्तं तपोऽति विपिने महत् ॥ ४८ ।
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता हर्षिता मेना तं ददर्श मुदा प्रभुम् ।
अद्भुताकृतिमीशानमद्भुतानुगमद्भुतम् ॥४ ९ ।
तावदेवं समायाता रुद्रसेना महाद्भुता ।
भूतप्रेतादिसंयुक्ता नानागणसमन्विता ॥ ५०
वात्यारूपधराः केचित्पताकामर्मरस्वनाः ।
वक्रतुंडास्तत्र केचिद्विरूपाश्चापरे तथा ॥ ५१
करालाः श्मश्रुलाः केचित्केचित्खञ्जा ह्यलोचनाः ।
दण्डपाशधराः केचित्केचिन्मुद्गरपाणयः ॥ ५२
विरुद्धवाहनाः केचिच्छंगनादनिनादिनः ।
डमरोर्वादिनः केचित्केचिद्गोमुखवादिनः ॥ ५३
अमुखाः विमुखाः केचित्केचिद् बहुमुखा गणाः ।
अकरा विकराः केचित्केचिद् बहुकरा गणाः ॥ ५४
अनेत्रा बहुनेत्राश्च विशिराः कुशिरास्तथा ।
अकर्णा बहकर्णाश्च नानावेषधरा गणाः ॥ ५५
इत्यादिविकृताकारा अनेके प्रबला गणाः ।
असंख्यातास्तथा तात महावीरा भयंकराः ॥ ५६
ब्रह्माजी बोले- प्रेमसे परिपूर्ण चित्तवाली मेना जब इस प्रकार कह रही थीं, उसी समय सब कुछ करनेमें सर्वथा समर्थ प्रभु रुद्र अद्भुत वेष धारणकर आ गये ॥ ४५ ॥
हे तात! उनके गण भी अद्भुत थे, जो मेनाके गर्वको दूर करनेवाले थे । उस समय प्रभु रुद्र अपनेको मायासे निर्लिप्त तथा निर्विकार दिखा रहे थे ॥ ४६ ॥
हे नारद! हे मुने! उस समय उनको आया देखकर परम प्रेमसे आप शिवाके पति शंकरको दिखाते हुए मेनासे कहने लगे —॥४७ ॥
नारदजी बोले – हे सुन्दरि! आप देखिये, ये ही वे साक्षात् शंकर हैं, जिनके निमित्त वनमें पार्वतीने कठिन तप किया था ॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोले – नारदके वचनको सुनकर मेना हर्षित होकर अद्भुत आकृतिवाले, अद्भुत गणोंसे युक्त तथा आश्चर्यजनक प्रभु शिवजीको देखने लगीं ॥ ४ ९ ॥ उसी समय भूत - प्रेत आदिसे युक्त तथा नाना प्रकारके गणोंसे समन्वित अत्यन्त अद्भुत रुद्रसेना आ पहुँची ॥५० ॥
उनमें कोई आँधीके समान रूप धारण किये हुए थे, कोई पताकाके समान मर्मर शब्द कर रहे थे, कोई वक्रतुण्ड थे तथा कोई विकृत रूपवाले, कोई विकराल थे, कोई बड़ी दाढ़ी - मूँछवाले थे, कोई लँगड़े थे, कोई अन्धे थे, कोई हाथमें दण्ड, पाश तथा कोई मुद्गर धारण किये हुए थे, कोई विरुद्ध वाहनपर सवार थे, कोई शृंगीनाद कर रहे थे, कोई डमरू बजा रहे थे, कोई गोमुख बजा रहे थे, कोई मुखरहित थे, कोई विकट मुखवाले थे, कोई गण बहुत मुखवाले थे, कोई हाथसे रहित थे, कोई विकृत हाथवाले थे, कोई गण बहुत हाथोंवाले थे । कोई नेत्रहीन, कोई बहुत नेत्रवाले, कोई बिना सिरके, कोई विकृत सिरवाले, कोई कर्णहीन तथा कोई बहुत कानवाले थे । सभी गण नाना प्रकारके वेष धारण किये हुए थे । इसी / प्रकार और भी विकृत आकारवाले अनेक प्रबल गण थे । हे तात! वे असंख्य, बड़े वीर और भयंकर | थे ॥ ५१–५६ ॥
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६७८
अङ्गुल्या दर्शयंस्त्वं तां मुने रुद्रगणांस्ततः ।
हरस्य सेवकान्पश्य हरं चापि वरानने ॥
असंख्यातान् गणान् दृष्ट्वा भूतप्रेतादिकान् मुने ।
तत्क्षणादभवत्सा वै मेनका त्राससंकुला ॥
तन्मध्ये शंकरं चैव निर्गुणं गुणवत्तरम् ।
वृषभस्थं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं भूतिभूषितम् ॥
कपर्दिनं चन्द्रमौलिं दशहस्तं कपालिनम् ।
व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च पिनाकवरपाणिनम् ॥
शूलयुक्तं विरूपाक्षं विकृताकारमाकुलम् ।
गजचर्म वसानं हि वीक्ष्य त्रेसे शिवाप्रसूः ॥
चकितां कम्पसंयुक्तां विह्वलां विभ्रमद्धियम् ।
शिवोऽयमिति चाङ्गुल्या दर्शयंस्तां त्वमब्रवीः ॥
त्वदीयं तद्वचः श्रुत्वा वाताहतलता इव ।
सा पपात द्रुतं भूमौ मेना दुःखभरा सती ॥
किमिदं विकृतं दृष्ट्वा वञ्चिताहं दुराग्रहे ।
इत्युक्त्वा मूर्च्छिता तत्र मेनका साभवत्क्षणात् ॥
अथ प्रयत्नैर्विविधैः सखीभिरुपसेविता ।
लेभे संज्ञां शनैर्मेना गिरीश्वरप्रिया तदा ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ उसके बाद हे मुने! आपने मेनाको रुद्रगणोंको ५७ अँगुलीसे दिखाते हुए कहा - हे वरानने! आप | शंकरके गणोंको और शंकरको भी देखिये इन ॥ ५७ ॥
हेमुने! भूत - प्रेत आदि असंख्य गणोंको देखकर ५८ वे मेना तत्क्षण भयसे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं ॥ ५८ ॥
उन गणोंके मध्य निर्गुण, परम गुणी, वृषभपर ५ ९ सवार, पाँच मुख तथा तीन नेत्रवाले, शिवविभूतिस विभूषित, जटाजूटसे युक्त, मस्तकमें चन्द्रकलासे शोभित. दस भुजाओंसे युक्त, कपाल धारण किये, व्याघ्रचर्मका ६० उत्तरीय धारण किये हुए, हाथमें श्रेष्ठ पिनाक धारण किये हुए, शूलसे युक्त, विरूप नेत्रवाले, विकृत आकारवाले, व्याकुल तथा गजचर्म ओढ़े हुए शिवको ६१ देखकर पार्वतीकी माता भयभीत हो उठीं ॥ ५ ९ –६१ ॥ उसके अनन्तर आश्चर्यचकित, काँपती हुई, व्याकुल ६२ तथा भ्रमित बुद्धिवाली उन मेनाको अँगुलीके संकेतसे शिवजीकी ओर दिखाते हुए आपने कहा- ये ही शिव हैं । आपके उस वचनको सुनते ही वे सती मेना ६३ दुःखित होकर वायुके झोंकेसे गिरी हुई लताके समान शीघ्र ही पृथिवीपर गिर पड़ीं । इस विकृत रूपको देखकर दुराग्रहमें फँसकर मैं ठगी गयी - ऐसा कहकर ६४ वे मेना क्षणमात्रमें मूच्छित हो गयीं॥६२–६४ ॥ उसके बाद सखियोंके द्वारा अनेक प्रकारके प्रयत्नोंसे उपचार करनेपर हिमालयप्रिया मेनाको धीरे-६५ | धीरे चैतन्य प्राप्त हुआ ॥ ६५ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवाद्भुतलीलावर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवकी अद्भुत लीलाका वर्णन नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः शिवजीके रूपको देखकर मेनाका विलाप, पार्वती तथा, शिवके साथ कन्याका विवाह न ब्रह्मोवाच
संज्ञां लब्ध्वा ततः सा च मेना शैलप्रिया सती ।
विललापातिसंक्षुब्धा तिरस्कारमथाकरोत् ॥
तत्र तावत्स्वपुत्रांश्च निनिन्द स्खलिता मुहुः ।
प्रथमं सा ततः पुत्रीं कथयामास दुर्वचः ॥
नारद आदि सभीको फटकारना करनेका हठ, विष्णुद्वारा मेनाको समझाना ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] चेतना प्राप्तकर | शैलप्रिया सती मेना अत्यन्त क्षुब्ध होकर विलाप करने १ लगीं और सबका तिरस्कार करने लगीं । उन्होंने व्याकुल | होकर सर्वप्रथम अपने पुत्रोंकी निन्दा की और इसके २ बाद वे अपनी पुत्रीको दुर्वचन कहने लगीं ॥१-२ ॥