शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 691–700
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६७ ९ मेनोवाच
मुने पुरा त्वया प्रोक्तं वरिष्यति शिवा शिवम् ।
पश्चाद्धिमवतः कृत्यं पूजार्थं विनिवेशितम् ॥
ततो दृष्टं फलं सत्यं विपरीतमनर्थकम् ।
मुनेऽधमाहं दुर्बुद्धे सर्वथा वञ्चिता त्वया ॥
पुनस्तया तपस्तप्तं दुष्करं मुनिभिश्च यत् ।
तस्य लब्धं फलं ह्येतत्पश्यतां दुःखदायकम् ॥
किं करोमि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहताम् ।
कुलादिकं विनष्टं मे विहतं जीवितं मम ॥
क्व गता ऋषयो दिव्याः श्मश्रूणि त्रोटयाम्यहम् ।
तपस्विनी च या पत्नी सा धूर्ता स्वयमागता ॥
केषाञ्चैवापराधेन सर्वं नष्टं ममाधुना ।
इत्युक्त्वा वीक्ष्य च सुतामुवाच वचनं कटु ॥
किं कृतं ते सुते दुष्टे कर्म दुःखकरं मम ।
हेम दत्त्वा त्वयानीतः काचो वै दुष्टया स्वयम् ॥
हित्वा तु चन्दनं भूयो लेपितः कर्दमस्त्वया ।
हंसमुड्डीय काको वै गृहीतो हस्तपञ्जरे ॥
हित्वा ब्रह्मजलं दूरे पीतं कूपोदकं त्वया ।
सूर्यं हित्वा तु खद्योतो गृहीतो यत्नतस्त्वया ॥
तण्डुलांश्च तथा हित्वा कृतं वै तुषभक्षणम् ।
प्रक्षिप्याज्यं तथा तैलं कारण्डं भुक्तमादरात् ॥
सिंहसेवां तथा मुक्त्वा शृगालः सेवितस्त्वया ।
ब्रह्मविद्यां तथा मुक्त्वा कुगाथा च श्रुता त्वया ॥
गृहे यज्ञविभूतिं हि दूरीकृत्य सुमङ्गलाम् ।
गृहीतं च चिताभस्म त्वया पुत्रि ह्यमङ्गलम् ॥
मेना बोली- हे मुने! पहले आपने ही कहा था कि यह पार्वती शिवको वरण करेगी । तत्पश्चात् ३ हिमवान्से कहकर आपने उसे तपस्याके कार्यमें लगाया ॥ ३ ॥
उसका तो प्रतिकूल एवं अनर्थकारी परिणाम ४ दिखायी पड़ा, यह सत्य है । हे दुष्टबुद्धिवाले मुने! आपने मुझ अधमको सर्वथा धोखा दिया ॥ ४ ॥
हे मुने! उसने मुनियोंके द्वारा असाध्य परम ५ दुष्कर जो तप किया, उसका यह फल प्राप्त हुआ, जो देखनेवालोंको भी दुःख देनेवाला है । अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? कौन मेरे दुःखको दूर करेगा, ६ मेरा कुल आदि नष्ट हो गया, मेरा जीवन भी नष्ट हो गया॥५-६ ॥ वे दिव्य ऋषि कहाँ गये? मैं उनकी दाढ़ी - मूँछ ७ उखाड़ लूँ । जो वसिष्ठपत्नी तपस्विनी है, वह धूर्त यहाँ स्वयं आयी थी ॥७ ॥
किनके अपराधसे मेरा सब कुछ नष्ट हो ८ गया – ऐसा कहकर पुत्रीकी ओर देखकर वे कटु वचन कहने लगीं ॥८ ॥
हे सुते! हे दुष्टे! तुमने मुझे दुःख देनेवाला कर्म ९ क्यों किया? तुझ दुष्टने स्वयं सोना देकर काँच ले लिया!॥ ९ ॥
चन्दनको छोड़कर तुमने अपने शरीरमें १० कीचड़का लेप कर लिया! हंसको उड़ाकर तुमने पिंजड़ेमें कौआ ग्रहण कर लिया! ॥१० ॥
गंगाजलको दूर छोड़कर तुमने कुएँका जल पी ११ लिया और सूर्यको छोड़कर प्रयत्नपूर्वक जुगनू ग्रहण कर लिया! ॥११ ॥
चावलोंका त्यागकर भूसी खा ली और घीको १२ छोड़कर आदरपूर्वक कारण्डका तेल पी लिया! ॥१२ ॥
सिंहकी सेवा छोड़कर तुमने शृगालकी सेवा की १३ और ब्रह्मविद्याका त्यागकर तुमने कुत्सित गाथा सुनी!॥ १३ ॥
हे पुत्रि! तुमने घरकी परम मांगलिक यज्ञविभूतिको छोड़कर अमंगल चिताभस्मको धारण १४ | किया! ॥१४ ॥
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६८० सर्वान् देववरांस्त्यक्त्वा विष्ण्वादीन्परमेश्वरान् कृतं त्वया कुबुद्ध्या वै शिवार्थं तप ईदृशम् धिक्त्वां च तव बुद्धिं च धिग्रूपं चरितं तव धिक् चोपदेशकर्तारं धिक्सख्यावपि ते तथा ॥
आवां च धिक्तथा पुत्रि यौ ते जन्मप्रवर्तकौ ।
धिक्ते नारद बुद्धिं च सप्तर्षींश्च कुबुद्धिदान् ॥
धिक्कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं सर्वं धिग्यत्कृतं त्वया ।
गृहं तु धुक्षितं त्वेतन्मरणं तु ममैव हि ॥
पर्वतानामयं राजा नायातु निकटे मम ।
सप्तर्षयः स्वयं नैव दर्शयन्तु मुखं मम ॥
साधितं किं च सर्वैस्तु मिलित्वा घातितं कुलम् ।
बन्ध्याहं न कथं जाता गर्भो न गलितः कथम् ॥
अथो न वा मृता चाहं पुत्रिका न मृता कथम् ।
राक्षसाद्यैः कथं नो वा भक्षिता गगने पुनः ॥
छेदयामि शिरस्तेऽद्य किं करोमि कलेवरैः ।
त्यक्त्वा त्वां च कुतो यायां हाहा मे जीवितं हतम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा पतिता सा च मेना भूमौ विमूर्छिता ।
व्याकुला शोकरोषाद्यैर्न गता भर्तृसन्निधौ ॥
हाहाकारो महानासीत्तस्मिन्काले मुनीश्वर ।
सर्वे समागतास्तत्र क्रमात्तत्सन्निधौ सुराः ॥
पुरा देवमुने चाहमागतस्तु स्वयं तदा ।
मां दृष्ट्वा त्वं वचस्तां वै प्रावोच ऋषिसत्तम ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ । विष्णु आदि परमेश्वरों तथा श्रेष्ठ देवगणोंको ॥ १५ छोड़कर तुमने कुबुद्धिसे शिवके निमित्त ऐसा । किया!॥ १५ ॥ तप
। तुम्हें तथा तुम्हारी बुद्धिको धिक्कार है तुम्हारे , १६ रूप तथा आचरणको धिक्कार है, तुम्हें उपदेश देनेवालेको धिक्कार है और तुम्हारी उन सखियोंको भी धिक्कार है! हे पुत्रि! जो तुमको जन्म देनेवाले १७ हैं - ऐसे हम दोनोंको धिक्कार है । हे नारद! आपकी बुद्धिको धिक्कार है और कुबुद्धि देनेवाले सप्तर्षियोंको धिक्कार है!॥ १६-१७ ॥ कुलको धिक्कार है, तुम्हारी कार्यकुशलताको १८ धिक्कार है, तुमने जो कुछ किया, उस सबको धिक्कार है, तुमने घरको नष्ट कर दिया, अब तो मेरा मरण ही है ॥१८ ॥
ये पर्वतराज मेरे निकट न आयें और स्वयं १ ९ सप्तर्षिगण भी मुझे अपना मुँह न दिखायें ॥ १ ९ ॥ सब लोगोंने मिलकर यह क्या किया, जिससे २० मेरा कुल ही नष्ट हो गया । मैं वन्ध्या क्यों न हुई, मेरा गर्भ क्यों नहीं गिर गया । मैं ही क्यों नहीं मर गयी अथवा मेरी पुत्री ही क्यों नहीं मर गयी । २१ आकाशमें [ ले जाकर ] राक्षसोंने उसे क्यों नहीं खा लिया? ॥ २०-२१ ॥ आज मैं तुम्हारा सिर काट डालूँ, अब मुझे इस २२ शरीरसे क्या करना है, किंतु क्या करूँ, तुम्हें त्यागकर भी कहाँ जाऊँ? हाय! मेरा जीवन ही नष्ट हो गया ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर वे मेना । मूच्छित हो पृथिवीपर गिर पड़ीं । वे शोक तथा २३ | रोष आदिसे व्याकुल होनेके कारण पतिके पास न जा सकीं ॥ २३ ॥
हे मुनीश्वर! उस समय सारे घरमें हाहाक २४ मच गया, फिर सब देवता बारी - बारीसे वहाँ उनके समीप आये ॥२४ ॥
हे देवमुने! पहले मैं स्वयं ही [ उनके समीप ] । आया । तब हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे देखकर आप उनसे २५ । यह वचन कहने लगे —॥२५ ॥
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६८१ नारद उवाच
यथार्थं सुंदरं रूपं न ज्ञातं ते शिवस्य वै ।
लीलयेदं धृतं रूपं न यथार्थं शिवेन च ॥ २६
तस्मात्क्रोधं परित्यज्य स्वस्था भव पतिव्रते ।
कार्यं कुरु हठं त्यक्त्वा शिवां देहि शिवाय च ॥ २७
ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य वचस्ते सा मेना त्वां वाक्यमब्रवीत् ।
उत्तिष्ठेतो गच्छ दूरं दुष्टाधमवरो भवान् ॥२८
इत्युक्ते तु तया देवा इन्द्राद्याः सकलाः क्रमात् ।
समागत्य च दिक्पाला वचनं चेदमब्रुवन् ॥ २ ९
देवा ऊचुः
हे मेने पितृकन्ये हि शृण्वस्मद्वचनं मुदा ।
अयं वै परमः साक्षाच्छिवः परसुखावहः ॥ ३०
कृपया च भवत्पुत्र्यास्तपो दृष्ट्वातिदुस्सहम् ।
दर्शनं दत्तवान् शम्भुर्वरं सद्भक्तवत्सलः ॥ ३१
ब्रह्मोवाच
अथोवाच सुरान्मेना विलप्याति मुहुर्मुहुः ।
न देया तु मया कन्या गिरिशायोग्ररूपिणे ॥ ३२
किमर्थं तु भवन्तश्च सर्वे देवाः प्रवञ्चिताः ।
रूपमस्याः परन्नाम व्यर्थीकर्तुं समुद्यताः ॥ ३३
इत्युक्ते च तया तत्र ऋषयः सप्त एव हि ।
ऊचुस्ते वच आगत्य वसिष्ठाद्या मुनीश्वर ॥ ३४
सप्तर्षय ऊचुः
कार्यं साधयितुं प्राप्ताः पितृकन्ये गिरिप्रिये ।
विरुद्धं चात्र युक्तार्थे कथं मन्यामहे वयम् ॥ ३५
अयं वै परमो लाभो दर्शनं शंकरस्य यत् ।
दानपात्रं स ते भूत्वागतस्तव च मंदिरम् ॥ ३६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता तैस्ततो मेना मुनिवाक्यं मृषाकरोत् ।
प्रत्युवाच च रुष्टा सा तानृषीन् ज्ञानदुर्बला ॥ ३७
मेनोवाच
शस्त्राद्यैर्घातयिष्येऽहं न दास्ये शंकराय ताम् ।
दूरं गच्छत सर्वे हि नागन्तव्यं मदन्तिके ॥ ३८
नारदजी बोले – [ हे मेने! ] तुमने शिवजीके वास्तविक सुन्दर रूपको नहीं पहचाना, शिवजीने यह रूप लीलासे धारण किया है, यह उनका यथार्थ रूप नहीं है । हे पतिव्रते! इसलिये तुम क्रोध छोड़कर स्वस्थ हो जाओ और हठ छोड़कर कार्य करो तथा पार्वतीको शंकरके निमित्त प्रदान करो ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे नारद! तब आपका वचन सुनकर मेनाने आपसे यह वाक्य कहा- तुम बड़े दुष्ट एवं अधम हो, उठो और यहाँसे दूर चले जाओ । उनके इस प्रकार कहनेपर समस्त इन्द्रादि देवता तथा दिक्पाल क्रमसे आकर मेनासे यह वचन कहने लगे- ॥ २८-२९ ॥ देवता बोले — हे मेने! हे पितृकन्ये! प्रसन्न होकर तुम हमारी बात सुनो । ये दूसरोंको सुख देनेवाले साक्षात् शिवजी हैं । भक्तवत्सल इन भगवान् शिवने तुम्हारी पुत्रीका अत्यन्त कठिन तप देखकर कृपापूर्वक उसे दर्शन देकर वर प्रदान किया॥३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- इसके बाद मेना बारंबार बहुत विलाप करके देवताओंसे बोली- भयानक रूपवाले शिवको मैं अपनी कन्या नहीं दूँगी ॥३२ ॥
आप सभी देवगण किसलिये प्रपंचमें पड़े हैं और इसके श्रेष्ठ रूपको व्यर्थ करनेके लिये तत्पर हैं? ॥ ३३ ॥
हे मुनीश्वर! उनके इस प्रकार कहनेपर सभी वसिष्ठादि सप्तर्षि वहाँ आकर उनसे यह वचन कहने लगे ॥ ३४ ॥
सप्तर्षि बोले- हे पितृकन्ये! हे गिरिप्रिये! हम कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं, जो बात ठीक है, उसे हम विपरीत कैसे मान सकते हैं? यह सबसे बड़ा लाभ है, जो आपको शंकरजीका दर्शन प्राप्त हुआ और वे दानके पात्र होकर आपके घर आये हैं ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी बोले- उनके इस प्रकार कहनेपर मेनाने उन मुनियोंके वचनको झूठा समझ लिया और वे अज्ञानतावश रुष्ट होकर उन ऋषियोंसे इस प्रकार कहने लगीं —॥३७ ॥
मेना बोलीं- मैं शस्त्र आदिसे उसका वध कर डालूंगी, किंतु शंकरके निमित्त उसे नहीं दूँगी । आप सभी दूर चले जाइये और मेरे पास मत आइयेगा ॥ ३८ ॥
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६८२ ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा विररामाशु सा विलप्यातिविह्वला ।
हाहाकारो महानासीत्तत्र तद्वृत्ततो मुने ॥
ततो हिमालयस्तत्राजगामातिसमाकुलः ।
तां च बोधयितुं प्रीत्या प्राह तत्त्वं च दर्शयन् ॥
हिमालय उवाच
शृणु मे वचो मेऽद्य विकलासि कथं प्रिये ।
के के समागता गेहं कथं चैतान्विनिन्दसि ॥
शंकरं त्वं न जानासि रूपं दृष्ट्वासि विह्वला ।
विकटं तस्य शंभोस्तु नानारूपाभिधस्य हि ॥
स शंकरो मया ज्ञातः सर्वेषां प्रतिपालकः ।
पूज्यानां पूज्य एवासौ कर्तानुग्रहनिग्रहौ ॥
हठं न कुरु मुञ्च त्वं दुःखं प्राणप्रियेऽनघे ।
उत्तिष्ठारं तथा कार्यं कर्तुमर्हसि सुव्रते ॥
यद्वै द्वारगतः शंभुः पुरा विकटरूपधृक् ।
नानालीलां च कृतवान् चेतयामि च तामिमाम् ॥
तन्माहात्म्यं परं दृष्ट्वा कन्यां दातुं त्वया मया ।
अङ्गीकृतं तदा देवि तत्प्रमाणं कुरु प्रिये ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा सोऽद्रिनाथो हि विरराम ततो मुने ।
तदाकर्ण्य शिवामाता मेनोवाच हिमालयम् ॥
मेनोवाच
मद्वचः श्रूयतां नाथ तथा कर्तुं त्वमर्हसि ।
गृहीत्वा तनुजां चैनां बद्ध्वा कण्ठे तु पार्वतीम् ॥
अधः पातय निःशंकं दास्ये तां न हराय हि ।
तथैनामथवा नाथ गत्वा वै सागरे सुताम् ॥
निमज्जय दयां त्यक्त्वा ततोऽद्रीश सुखी भव ।
यदि दास्यसि पुत्रीं त्वं रुद्राय विकटात्मने ।
तर्हि त्यक्ष्याम्यहं स्वामिन्निश्चयेन कलेवरम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर वे मेना | हो गयीं और पुनः विलाप करके अत्यन्त चुप व्याकुल हो ३ ९ उठीं । हे मुने! उस समय इस समाचारसे बड़ा हाहाकार । मच गया । तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल होकर हिमालय ४० / मेनाको समझानेके लिये वहाँ आये और तत्त्वकी कहते हुए प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे ॥ ३ ९ -४० ॥ बात हिमालय बोले — हे मेने! हे प्रिये! तुम आज व्याकुल क्यों हो गयी, मेरी बात सुनो, तुम्हारे ४१ घर कौन - कौन लोग आये हैं, तुम इनकी निन्दा क्यों करती हो? ॥४१ ॥
तुम शंकरको [ अच्छी तरह ] नहीं जानती हो, ४२ अनेक रूप और नामवाले उन शंकरके विकट रूपको देखकर व्याकुल हो गयी हो । उन शंकरको मैं जानता हूँ । वे सबका पालन करनेवाले, पूज्योंके भी पूज्य और ४३ निग्रह तथा अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ ४२-४३ ॥ हे प्राणप्रिये! हे पुण्यशीले! हठ मत करो ४४ और दुःखका त्याग करो । हे सुव्रते! शीघ्रतासे उठो, कार्य करो ॥४४ ॥
तुम मेरी बात मानो, ये शंकर विकट रूप ४५ धारणकर द्वारपर जो आये हैं, वे अपनी लीला ही दिखा रहे हैं ॥ ४५ ॥
हे देवि! पहले हम दोनोंने उनका श्रेष्ठ माहात्म्य ४६ देखकर ही कन्या देना स्वीकार किया था । हे प्रिये! अब उस बातको सत्यरूपसे प्रमाणित करो ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार कहकर । उन पर्वतराज हिमालयने मौन धारण कर लिया । तब ४७ यह सुनकर पार्वतीकी माता मेना हिमालयसे कहने लगीं— ॥ ४७ ॥
मेना बोली- हे नाथ! मेरी बात सुनिये और ४८ | आप वैसा ही कीजिये, इस अपनी कन्या पार्वतीको | पकड़कर कण्ठमें रस्सी बाँधकर नि: शंक हो नीचे गिरा दीजिये, किंतु मैं शिवको उसे नहीं दूँगी अथवा ४ ९ हे नाथ! हे पर्वतराज! इस कन्याको ले जाकर | दयारहित होकर समुद्रमें डुबो दीजिये और इसके बाद । सुखी हो जाइये । ऐसा करनेसे ही सुख मिलेगा । हे | स्वामिन्! यदि आप भयंकर रूपवाले रुद्रको पुत्री देंगे, ५० तो मैं निश्चित रूपसे शरीर त्याग दूँगी 1182-4011 ।
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६८३ ब्रह्मोवाच
इत्युक्ते च तदा तत्र बचने मेनया हठात् ।
उवाच वचनं रम्यं पार्वती स्वयमागता ॥ ५१
पार्वत्युवाच
मातस्ते विपरीता हि बुद्धिर्जाताशुभावहा ।
धर्मावलम्बनात्त्वं हि कथं धर्मं जहासि वै ॥ ५२
अयं रुद्रोऽपरः साक्षात्सर्वप्रभव ईश्वरः ।
शम्भुः सुरूपः सुखदः सर्वश्रुतिषु वर्णितः ॥ ५३
महेशः शंकरश्चायं सर्वदेवप्रभुः स्वराट् ।
नानारूपाभिधो मातर्हरिर्ब्रह्मादिसेवितः ॥ ५४
अधिष्ठानं च सर्वेषां कर्ता हर्ता च स प्रभुः ।
निर्विकारी त्रिदेवेशो ह्यविनाशी सनातनः ॥ ५५
यदर्थे देवताः सर्वा आयाता किंकरीकृताः ।
द्वारि ते सोत्सवाश्चाद्य किमतोऽन्यत्परं सुखम् ॥ ५६
उत्तिष्ठातः प्रयत्नेन जीवितं सफलं कुरु ।
देहि मां त्वं शिवायास्मै स्वाश्रमं कुरु सार्थकम् ॥ ५७
देहि मां परमेशाय शंकराय जनन्यहो ।
स्वीकुरु त्वमिमं मातर्विनयं मे ब्रवीमि ते ॥ ५८
चेन्न दास्यसि तस्मै मां न वृणेऽन्यमहं वरम् ।
भागं लभेत्कथं सैंहं शृगालः परवंचकः ॥५ ९
मनसा वचसा मातः कर्मणा च हरः स्वयम् ।
मया वृतो वृतश्चैव यदिच्छसि तथा कुरु ॥ ६०
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य शिवावाक्यं मेना शैलेश्वरप्रिया ।
सुविलप्य महाक्रुद्धा गृहीत्वा तत्कलेवरम् ॥ ६१
मुष्टिभिः कूर्परैश्चैव दन्तान्धर्षयती च सा । ब्रह्माजी बोले- हे नारद! जब मेना हठपूर्वक यह बात कह रही थीं, उसी समय पार्वती स्वयं आ गयीं और मनोहर वचन कहने लगीं — ॥५१ ॥
पार्वती बोलीं- हे मातः! आपकी बुद्धि विपरीत तथा अमंगलकारिणी कैसे हो गयी? धर्मका अवलम्बन करनेवाली होनेपर भी आप धर्मका त्याग क्यों कर रही हैं? ये रुद्र सबसे श्रेष्ठ, साक्षात् ईश्वर, सबको उत्पन्न करनेवाले, शम्भु, सुन्दर रूपवाले, सुख देनेवाले तथा सभी श्रुतियोंमें वर्णित हैं ॥ ५२-५३ ॥ हे मातः! ये ही महेश कल्याण करनेवाले, सर्वदेवोंके प्रभु तथा स्वराट् हैं । नाना प्रकारके रूप एवं नामवाले और ब्रह्मा एवं विष्णु आदिसे भी सेवित हैं ॥ ५४ ॥
वे सबके कर्ता, हर्ता, अधिष्ठान, निर्विकारी, त्रिदेवेश, अविनाशी तथा सनातन हैं । इन्हींके लिये सभी देवगण दासके समान होकर तुम्हारे द्वारपर उत्सव करते हुए आये हैं । अब इससे बढ़कर और क्या सुख होगा? ॥ ५५-५६ ॥ अतः हे मातः! प्रयत्नपूर्वक उठिये और अपने जीवनको सफल कीजिये, आप इन शंकरजीके निमित्त मुझे प्रदान कीजिये और अपना गृहस्थाश्रम सफल बनाइये । हे जननि! आज आप मुझे परमेश्वर शंकरके निमित्त प्रदान कीजिये । हे मातः! मैं आपसे कह रही हूँ, आप मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार कीजिये ॥ ५७-५८ ॥ यदि आपने मुझे इनको नहीं दिया, तो मैं किसी दूसरेका पतिके रूपमें वरण नहीं करूँगी । परवंचक शृगाल सिंहके भागको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है? ॥५ ९ ॥ हे मातः! मैंने स्वयं मन, वचन तथा कर्मसे शिवजीका वरण कर लिया है, अब आप जैसा चाहती हैं, वैसा कीजिये ॥ ६० ॥
ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] पार्वतीका यह वचन सुनकर पर्वतराजकी प्रिया मेना बहुत विलापकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उनके शरीरको पकड़कर दाँतोंको कटकटाती हुई व्याकुल तथा रोषयुक्त होकर मुक्के केहुनोंसे पुत्रीको मारने लगीं ॥६१-६२ ॥ ताडयामास तां पुत्रीं विह्वलातिरुषान्विता ॥ ६२ / तथा
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६८४ ये तत्र ऋषयस्तात त्वदाद्याश्चापरे मुने तद्धस्तात्तां परिच्छिद्य निन्युर्दूरतरं ततः तान्वै तथाविधान्दृष्ट्वा भर्त्सयित्वा पुनः पुनः उवाच श्रावयन्ती सा दुर्वचो निखिलान्पुनः मेनोवाच किमेनां हि करिष्येऽहं दुष्टाग्रहवतीं शिवाम् दास्याम्यस्यै गरं तीव्रं कूपे क्षेप्स्यामि वा ध्रुवम् छेत्स्यामि कालीमथवा शस्त्रास्त्रैर्भूरिखण्डशः निमज्जयिष्ये वा सिन्धौ स्वसुतां पार्वतीं खलु अथवा स्वशरीरं हि त्यक्ष्याम्याश्वन्यथा ध्रुवम् न दास्ये शम्भवे कन्यां दुर्गां विकटरूपिणे वरोऽयं कीदृशो भीमोऽनया लब्धश्च दुष्टया कारितश्चोपहासो मे गिरेश्चापि कुलस्य हि न माता न पिता भ्राता न बन्धुर्गोत्रजोऽपि हि नो सुरूपं न चातुर्यं न गृहं वास्य किंचन न वस्त्रं नाप्यलङ्काराः सहायाः केऽपि तस्य न वाहनं न शुभं ह्यस्य न वयो न धनं तथा न पावित्र्यं न विद्या च कीदृशः काय आर्तिदः किं विलोक्य मया पुत्री देयास्मै स्यात्सुमङ्गला ब्रह्मोवाच इत्यादि सुविलप्याथ बहुशो मेनका तदा रुरोदोच्चैर्मुने सा हि दुःखशोकपरिप्लुता
अथाहं द्रुतमागत्याकथयं मेनकां च ताम् ।
शिवतत्त्वं च परमं कुज्ञानहरमुत्तमम् ॥
ब्रह्मोवाच श्रोतव्यं प्रीतितो मेने मदीयं वचनं शुभम् यस्य श्रवणतः प्रीत्या कुबुद्धिस्ते विनश्यति ॥
शङ्करो जगतः कर्ता भर्ता हर्ता तथैव च ।
न त्वं जानासि तद्रूपं कथं दुःखं समीहसे ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४४ । हे तात! हे मुने! तदनन्तर वहाँपर तुम तथा अन्य ॥ ६३ । जो ऋषि थे, वे मेनाके हाथसे पार्वतीको छुड़ाकर । ले गये । उन सबको वैसा करते देखकर उन्हें दूर । फटकारकर वे मेना उन्हें सुनाती हुई पुनः बार दुर्वचन - बार ॥ ६४ कहने लगीं— ॥६३-६४ ॥ मेना बोलीं- हाय! इस दुराग्रहशील पार्वतीका । अब मैं क्या करूँ? अब निश्चय ही या तो इसे तीव्र ॥ ६५ विष दे दूँगी या कुएँमें डाल दूँगी ॥६५ ॥
। अथवा अस्त्र - शस्त्रोंसे काटकर इस कालीके ॥ ६६ टुकड़े - टुकड़े कर डालूंगी अथवा अपनी पुत्री इस पार्वतीको समुद्रमें डुबो दूँगी । अथवा मैं शीघ्र । ही निश्चित स्वयं अपना शरीर त्याग दूँगी, किंतु ॥ ६७ विकट रूपधारी शिवको अपनी कन्या दुर्गा नहीं दूँगी ॥ ६६-६७ ॥ । इस दुष्टाने यह कैसा विकराल वर पाया है । ॥ ६८ ऐसा करके इसने मेरा, गिरिराजका तथा इस कुलका उपहास करा दिया ॥ ६८ ॥
। इस [ शंकर ] -के न माता हैं, न पिता हैं, न भाई ॥ ६ ९ हैं, न गोत्रमें उत्पन्न बन्धु हैं, न तो इसका सुन्दर रूप है, न तो इसमें चतुराई ही है, न इसके पास घर है, न । वस्त्र है, न अलंकार है, इसका कोई सहायक भी नहीं ॥ ७० हैं, इसका वाहन भी अच्छा नहीं है, इसकी वय भी
[ विवाहयोग्य ] नहीं है । इसके पास धन भी नहीं है ॥
॥७१ न इसमें पवित्रता है, न विद्या है, इसका कष्टदायक मैं इसे अपनी सुमंगली पुत्री प्रदान करूँ? ॥६ ९ –७१ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार बहुत । । विलाप करके दुःख तथा शोकसे व्याप्त होकर वे मेना । ॥ ७२ जोर - जोरसे रोने लगीं । उसके बाद मैं शीघ्रतासे आकर | उन मेनासे अज्ञानका हरण करनेवाले श्रेष्ठ तथा परम ७३ शिवतत्त्वका वर्णन करने लगा ॥ ७२-७३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मेने! आप प्रीतिपूर्वक म
। । शुभ वचनको सुनिये, जिसके प्रेमपूर्वक सुननेसे आपकी ।
७४ कुबुद्धि नष्ट हो जायगी ॥७४ ॥
शंकर जगत्की सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले ।, । तथा विनाश करनेवाले हैं । आप उनके रूपको नहीं ७५ । जानती हैं और दुःख क्यों उठा रही हैं? ॥ ७५ ॥
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अ ० ४४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६८५
अनेकरूपनामा च नानालीलाकरः प्रभुः ।
सर्वस्वामी स्वतन्त्रश्च मायाधीशोऽविकल्पकः ॥ ७६
इति विज्ञाय मेने त्वं शिवां देहि शिवाय वै ।
कुहठं त्यज कुज्ञानं सर्वकार्यविनाशनम् ॥ ७७
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता सा मया मेना विलपन्ती मुहुर्मुहुः ।
लजां किंचिच्छनैस्त्यक्त्वा मुने मां वाक्यमब्रवीत् ॥ ७८
मेनोवाच
किमर्थं तु भवान्ब्रह्मन् रूपमस्या महावरम् ।
व्यर्थीकरोति किमियं हन्यतां न स्वयं शिवा ॥ ७ ९
न वक्तव्यं च भवता शिवाय प्रतिदीयताम् ।
न दास्येऽहं शिवायैनां स्वसुतां प्राणवल्लभाम् ॥ ८०
ब्रह्मोवाच
इत्युक्ते तु तदा सिद्धाः सनकाद्या महामुने ।
समागत्य महाप्रीत्या वचनं हीदमब्रुवन् ॥ ८१
सिद्धा ऊचुः
अयं वै परमः साक्षाच्छिवः परसुखावहः ।
कृपया च भवत्पुत्र्यै दर्शनं दत्तवान्प्रभुः ॥ ८२
ब्रह्मोवाच
अथोवाच तु तान्मेना विलप्य च मुहुर्मुहुः ।
न देया तु मया सम्यग्गिरिशायोग्ररूपिणे ॥ ८३
किमर्थं तु भवन्तश्च सर्वे सिद्धाः प्रपञ्चिनः ।
रूपमस्याः परं नाम व्यर्थीकर्तुं समुद्यताः ॥ ८४
इत्युक्ते च तया तत्र मुनेऽहं चकितोऽभवम् ।
सर्वे विस्मयमापन्ना देवसिद्धर्षिमानवाः ॥ ८५
एतस्मिन्समये तस्या हठं श्रुत्वा दृढं महत् ।
द्रुतं शिवप्रियो विष्णुः समागत्याब्रवीदिदम् ॥ ८६
विष्णुरुवाच
पितॄणां च प्रिया पुत्री मानसी गुणसंयुता ।
पत्नी हिमवतः साक्षाद्ब्रह्मणः कुलमुत्तमम् ॥ ८७
सहायास्तादृशा लोके धन्या ह्यसि वदामि किम् ।
धर्मस्याधारभूतासि कथं धर्मं जहासि हि ॥ ८८
प्रभु अनेक रूप तथा नामवाले, विविध लीला करनेवाले, सबके स्वामी, स्वतन्त्र, मायाधीश तथा विकल्पसे रहित हैं । हे मेने! ऐसा जानकर आप शिवाको शिवजीके लिये प्रदान कीजिये और सभी कार्यका नाश करनेवाले इस दुराग्रह तथा दुर्बुद्धिका त्याग कीजिये ॥ ७६-७७ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! मेरे ऐसा कहनेपर वे मेना बार - बार विलाप करती हुई शनैः - शनैः लज्जा त्यागकर मुझसे कहने लगीं— ॥ ७८ ॥
मेना बोलीं – हे ब्रह्मन्! आप इसके अति श्रेष्ठ रूपको किसलिये व्यर्थ कर रहे हैं? आप इस शिवाको स्वयं मार क्यों नहीं डालते? आप ऐसा न कहिये कि इसे शिवको दे दीजिये, मैं अपनी इस प्राणप्रिया पुत्रीको शिवके निमित्त नहीं दूँगी ॥ ७ ९ -८० ॥ ब्रह्माजी बोले- हे महामुने! तब उनके ऐसा कहनेपर सनक आदि सिद्ध आकर [ मेनासे ] प्रेमपूर्वक यह वचन कहने लगे —॥८१ ॥
सिद्ध बोले- ये परम सुख प्रदान करनेवाले साक्षात् परमात्मा शिव हैं । इन प्रभुने कृपा करके आपकी पुत्रीको दर्शन दिया है ॥८२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब मेनाने बार - बार विलाप करते हुए उनसे भी कहा कि मैं भयंकर रूपवाले शंकरको इसे नहीं दूँगी ॥ ८३ ॥
प्रपंचवाले आप सभी सिद्ध लोग इसके श्रेष्ठ रूपको व्यर्थ करनेके लिये क्यों उद्यत हुए हैं?॥ ८४ ॥
हे मुने! उनके ऐसा कहनेपर मैं चकित हो गया और सभी देव, सिद्ध, ऋषि तथा मनुष्य भी आश्चर्यमें पड़ गये । इसी समय उनके दृढ़ तथा महान् हठको सुनकर शिवके प्रिय विष्णुजी शीघ्र ही वहाँ आकर यह कहने लगे— ॥ ८५-८६ ॥ विष्णुजी बोले- आप पितरोंकी प्रिय मानसी कन्या हैं, गुणोंसे युक्त हैं और साक्षात् हिमालयकी पत्नी हैं, आपका अत्यन्त पवित्र ब्रह्मकुल है । वैसे ही आपके सहायक भी हैं, इसलिये आप लोकमें धन्य हैं, मैं विशेष क्या कहूँ । आप धर्मकी आधारभूत हैं, । तो आप धर्मका त्याग क्यों कर रही हैं? ॥ ८७-८८ ॥
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६८६ ‘ श्रीशिवमहापुराण
देवैश्च ऋषिभिश्चैव ब्रह्मणा वा मया तथा ।
विरुद्धं कथ्यते किं नु त्वयैव सुविचार्यताम् ॥ ८ ९
शिवं त्वं न च जानासि निर्गुणः सगुणः स हि ।
विरूपः ससुरूपो हि सर्वसेव्यः सतां गतिः ॥ ९ ०
तेनैव निर्मिता देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।
तत्पार्श्वे च तदा तेन निर्मितः पुरुषोत्तमः ॥ ९ १
ताभ्यां चाहं तथा ब्रह्मा ततश्च गुणरूपतः ।
अवतीर्य स्वयं रुद्रो लोकानां हितकारकः ॥ ९ २
ततो वेदास्तथा देवा यत्किंचिद् दृश्यते जगत् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव तत्सर्वं शंकरादभूत् ॥ ९ ३
तद्रूपं वर्णितं केन ज्ञायते केन वा पुनः ।
मया च ब्रह्मणा यस्य ह्यन्तो लब्धश्च नैव हि ॥ ९ ४
आब्रह्मस्तम्बपर्यंतं यत्किञ्चिद् दृश्यते जगत् ।
तत्सर्वं च शिवं विद्धि नात्र कार्या विचारणा ॥ ९ ५
स एवेदृक्सुरूपेणावतीर्णी निजलीलया ।
शिवातपःप्रभावाद्धि तव द्वारि समागतः ॥ ९ ६
तस्मात्त्वं हिमवत्पलि दुःखं मुञ्च शिवं भज ।
भविष्यति महानन्दः क्लेशो यास्यति संक्षयम् ॥ ९ ७
ब्रह्मोवाच एवं प्रबोधितायास्तु मेनकाया अभून्मुने ।
तस्यास्तु कोमलं किंचिन्मनो विष्णुप्रबोधितम् ।
॥ ९ ८
परं हठं न तत्याज कन्यां दातुं हराय न ।
स्वीचकार तदा मेना शिवमायाविमोहिता ॥ ९९
उवाच च हरि मेना किञ्चिबुद्धा गिरिप्रिया ।
श्रुत्वा विष्णुवचो रम्यं गिरिजाजननी हि सा ॥ १००
|
यदि रम्यतनुः सः स्यात्तदा देया मया सुता । ।
नान्यथा कोटिशो यत्नैर्वच्मि सत्यं दृढं वचः ॥ १०१ ।
[ अ ० ४४ भला, आप ही विचार करें कि सभी ऋषि, ब्रह्माजी तथा मैं विरुद्ध क्यों देवता, । आप शिवजीको नहीं जानती हैं । वे निर्गुण बोलेंगे? कुरूप, सुरूप, सज्जनोंको शरण देनेवाले तथा, सगुण, सेव्य हैं ॥ ८ ९ - ९ ० ॥ सभीके उन्होंने ही मूल प्रकृति ईश्वरीदेवीका निर्माण किया और उस समय उनके बगलमें उन्होंने पुरुषोत्तमकी भी रचना की । तदनन्तर उन दोनोंसे मैं तथा ब्रह्मा अपने गुण तथा रूपके अनुसार उत्पन्न हुए हैं । किंतु वे रुद्र स्वयं अवतरित होकर लोकोंका हित करते हैं॥९ १ - ९ २ ॥ वेद, देवता तथा जो कुछ स्थावर - जंगमरूप जगत् दिखायी देता है, वह सब शिवजीसे ही उत्पन्न हुआ है । उनके स्वरूपका वर्णन किसने किया है और उसे कौन जान सकता है? मैं तथा ब्रह्माजी भी उनका अन्त न पा सके॥९ ३ - ९ ४ ॥ ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखायी देता है, उस सबको शिव समझिये, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । अपनी लीलासे इस प्रकारके सुन्दर रूपसे अवतीर्ण हुए वे [ शिव ] पार्वतीके तपके
प्रभावसे ही आपके द्वारपर आये हैं । ९ ५ - ९ ६ ॥
इसलिये हे हिमालयपनि! आप दुःखका त्याग कीजिये और शिवजीका भजन कीजिये, [ ऐसा | करनेसे ] महान् आनन्द प्राप्त होगा और क्लेश नष्ट हो जायगा ॥९ ७ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार समझानेपर उन मेनाका विष्णुप्रबोधित मन कुछ कोमल हो गया ॥ ९ ८ ॥ किंतु उस समय शिवकी मायासे विमोहित मेनाने हठका परित्याग नहीं किया और शिवको कन्या देना स्वीकार नहीं किया॥९९॥
पार्वतीकी माता गिरिप्रिया उन मेनाने विष्णुके मनोहर वचनको होकर सुनकर कुछ उबुद्ध तो विष्णुजीसे कहा- यदि वे सुन्दर शरीर धारण करें, मैं अपनी कन्या दे सकती हूँ अन्यथा करोड़ों , प्रयत्नोंसे भी मैं नहीं दूँगी । मैं सत्य तथा दृढ़ वचन कहती हूँ ॥ १००-१०१ ॥
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अ ० ४५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६८७ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] जो सबको वचनं मेना तूष्णीमास दृढव्रता । मोहनेवाली है, उस शिवेच्छासे प्रेरित हुई धन्य तथा इत्युक्त्वा दृढ़ व्रतवाली वे मेना इस प्रकार कहकर चुप हो शिवेच्छाप्रेरिता धन्या तथा याखिलमोहिनी ॥ १०२ । गयीं ॥ १०२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे मेनाप्रबोधवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें मेनाप्रबोधवर्णन नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता और क्षमा - प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियोंका शिवके रूपका दर्शन करके जन्म और ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे त्वं हि विष्णुना प्रेरितो द्रुतम् ।
अनुकूलयितुं शंभुमयास्तन्निकटे मुने ॥
तत्र गत्वा स वै रुद्रो भवता सुप्रबोधितः ।
स्तोत्रैर्नानाविधैः स्तुत्वा देवकार्यचिकीर्षया ॥
श्रुत्वा त्वद्वचनं प्रीत्या शंभुना धृतमद्भुतम् ।
स्वरूपमुत्तमं दिव्यं कृपालुत्वं च दर्शितम् ॥
तद् दृष्ट्वा सुन्दरं शम्भुं स्वरूपं मन्मथाधिकम् ।
अत्यहृष्यो मुने त्वं हि लावण्यपरमायनम् ॥
स्तोत्रैर्नानाविधैः स्तुत्वा परमानन्दसंयुतः ।
आगच्छस्त्वं मुने तत्र यत्र मेना स्थिताखिलैः ॥
तत्रागत्य सुप्रसन्नो मुनेऽतिप्रेमसंकुलः ॥
हर्षयंस्तां शैलपत्नीं मेनां त्वं वाक्यमब्रवीः ॥
नारद उवाच
मेने पश्य विशालाक्षि शिवरूपमनुत्तमम् ।
कृता शिवेन तेनैव सुकृपा करुणात्मना ॥
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वा सा तद्वचो मेना विस्मिता शैलकामिनी ।
ददर्श शिवरूपं तत्परमानन्ददायकम् ॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं सर्वावयवसुन्दरम् ।
विचित्रवसनं चात्र नानाभूषणभूषितम् ॥
जीवनको सफल मानना ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इसी समय आप विष्णुजीसे प्रेरित होकर शिवजीको प्रसन्न करनेके १ लिये शीघ्र उनके पास गये । वहाँ जाकर देवकार्य करनेकी इच्छासे आपने अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति करके रुद्रको भलीभाँति समझाया । तब सदाशिव २ शम्भुने आपकी बात सुनकर अपनी कृपालुता दिखायी और प्रेमपूर्वक अद्भुत दिव्य तथा उत्तम स्वरूप धारण ३ | कर लिया॥१-३ ॥ कामदेवसे भी अधिक कमनीय, लावण्यके परम ४ निधि तथा सुन्दर रूपवाले उन शिवको देखकर हे मुने! आप अत्यन्त प्रसन्न हो गये और परमानन्दसे युक्त हो अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुतिकर आप पुनः ५ वहाँ आये, जहाँ मेना सभी लोगोंके साथ थीं॥४-५ ॥ हे मुने! वहाँ आकर अत्यन्त हर्षित तथा ६ प्रेमयुक्त आप हिमालयकी पत्नी मेनाको हर्षित करते हुए यह वचन कहने लगे —॥६ ॥
नारदजी बोले - हे विशाल नेत्रोंवाली मेने! आप शिवजीके अत्युत्तम रूपको देखिये, उन्हीं करुणामय ७ शंकरने यह महती कृपा की है ॥७ ॥
ब्रह्माजी बोले- यह बात सुनकर शैलकामिनी मेना विस्मित हो परमानन्द प्रदान करनेवाले शिवरूपको ८ देखने लगीं । वह रूप करोड़ों सूर्यके समान कान्तिमान्, सभी अंगोंसे सुन्दर, विचित्र वस्त्रसे युक्त, अनेक ९ आभूषणोंसे अलंकृत, अत्यन्त प्रसन्न, सुन्दर हास्यसे
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६ ९ ० तस्यैव सफलं जन्म तस्यैव सफलाः क्रियाः । येन दृष्टः शिवः साक्षात्सर्वपापप्रणाशकः
पार्वत्या साधितं सर्वं शिवार्थे यत्तपः कृतम् ।
धन्येयं कृतकृत्येयं शिवा प्राप्य शिवं पतिम् ॥
यदीदं युगलं ब्रह्मा न युञ्ज्याच्छिवयोर्मुदा । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४५ | सफल है एवं उसीकी क्रियाएँ सफल हैं जिसने ॥ ३६ सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाले साक्षात् शिवका , किया ॥ ३५-३६ ॥ दर्शन पार्वतीने सब कुछ सिद्ध कर लिया, जो उसने ३७ शिवके लिये तप किया । यह पार्वती शिवको पतिरूपयं प्राप्तकर धन्य तथा कृतकृत्य हो गयी ॥३७ ॥
यदि ब्रह्मा प्रसन्नतापूर्वक शिवा - शिवकी तदा च सकलोऽप्यस्य श्रमो निष्फलतामियात् ॥ ३८ इस जोड़ीको न मिलाते तो, उनका सम्पूर्ण श्रम व्यर्थ
सम्यक् कृतं तथा चात्र योजितं ` युग्ममुत्तमम् ।
सर्वेषां सार्थता जाता सर्वकार्यसमुद्भवा ॥
विना तु तपसा शम्भोर्दर्शनं दुर्लभं नृणाम् ।
दर्शनाच्छंकरस्यैव सर्वे याताः कृतार्थताम् ॥
लक्ष्मीर्नारायणं लेभे यथा वै स्वामिनं पुरा ।
तथासौ पार्वती देवी हरं प्राप्य सुभूषिता ॥
ब्रह्माणं च यथा लेभे स्वामिनं वै सरस्वती ।
तथासौ पार्वती देवी हरं प्राप्य सुभूषिता ॥
वयं धन्याः स्त्रियः सर्वाः पुरुषाः सकला वराः ।
ये ये पश्यन्ति सर्वेशं शंकरं गिरिजापतिम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्थमुक्त्वा तु वचनं चन्दनैश्चाक्षतैरपि ।
शिवं समर्चयामासुर्लाजान्ववृषुरादरात् ॥
तस्थुस्तत्र स्त्रियः सर्वा मेनया सह सोत्सुकाः ।
वर्णयन्त्योऽधिकं भाग्यं मेनायाश्च गिरेरपि ॥
कथास्तथाविधाः शृण्वंस्तद्वामावर्णिताः शुभाः ।
प्रहृष्टोऽभूत्प्रभुः सर्वेर्मुने विष्ण्वादिभिस्तदा ॥
हो जाता ॥३८ ॥
इन्होंने बहुत ठीक किया, जो यहाँ उत्तम ३ ९ जोड़ीका संयोग करा दिया । इससे सभीके समस्त कार्योंकी सार्थकता हो गयी । बिना तपस्याके मनुष्योंको शिवजीका दर्शन दुर्लभ है, [ आज ] शिवजीके दर्शनसे ४० ही सभी लोग कृतार्थ हो गये । जिस प्रकार पूर्व समयमें लक्ष्मीने नारायणको पतिरूपमें प्राप्त किया था, उसी प्रकार ये पार्वती देवी भी शिवको प्राप्तकर ४१ सुशोभित हो गयीं ॥ ३ ९ —४१ ॥ जिस प्रकार सरस्वतीने ब्रह्माको पतिरूपमें ४२ पाया था, वैसे ही पार्वती देवी शंकरको प्राप्तकर सुशोभित हो गयीं ॥ ४२ ॥
हम सभी स्त्रियाँ धन्य हैं तथा सभी पुरुष धन्य ४३ हैं, जो - जो गिरिजापति सर्वेश्वर शिवका दर्शन कर रहे हैं ॥ ४३ ॥
ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] ऐसा कहकर उन | लोगोंने चन्दन एवं अक्षतसे शिवजीका पूजन किया ४४ और आदरपूर्वक उनके ऊपर लाजाकी वर्षा की ॥ ४४३५ उसके अनन्तर सभी स्त्रियाँ उत्सुक होकर मेना के ४५ साथ खड़ी रहीं और हिमालय तथा मेनाके महान् भाग्यकी । सराहना करने लगीं । हे मुने! स्त्रियोंके द्वारा कही गयी | उस प्रकारकी शुभ बातोंको सुनकर विष्णु आदि सभी ४६ देवताओंके साथ प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए । ४५-४६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डेशिवसुन्दरस्वरूप-पुरवास्युत्सववर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके ॥ ४५ ॥
स्वरूप और पुरवासियोंके उत्सवका वर्णन तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवके सुन्दर नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥