श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 701–710

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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अ ० ४६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६ ९ १ अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः नगरमें बरातियोंका प्रवेश, द्वाराचार ब्रह्मोवाच

अथ शंभुः प्रसन्नात्मा सदूतं स्वगणैः सुरैः ।

सर्वैरन्यैर्गरेर्धाम जगाम सकुतूहलम् ॥ १

मेनापि स्त्रीगणैस्तैश्च हिमाचलवरप्रिया ।

तत उत्थाय स्वगृहाभ्यंतरं सा जगाम ह ॥ २

नीराजनार्थं शम्भोश्च दीपपात्रकरा सती ।

सर्वर्षिस्त्रीगणैस्साकमगच्छद् द्वारमादरात् ॥ ३

तत्रागतं महेशानं शंकरं गिरिजावरम् ।

ददर्श प्रीतितो मेना सेवितं सकलैः सुरैः ॥ ४

चारुचंपकवर्णाभं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ।

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यं रत्नस्वर्णादिभूषितम् ॥ ५

मालतीमालया युक्तं सद्रत्नमुकुटोज्ज्वलम् ।

सत्कंठाभरणं चारुवलयाङ्गदभूषितम् ॥ ६

वह्निशौचेनातुलेन त्वतिसूक्ष्मेण चारुणा ।

अमूल्यवस्त्रयुग्मेन विचित्रेणातिराजितम् ॥ ७

चन्दनागरुकस्तूरीचारुकुंकुमभूषितम् 1 रत्नदर्पणहस्तं च कज्जलोज्ज्वललोचनम् ॥ ८

सर्वस्वप्रभयाच्छन्नमतीव सुमनोहरम् ।

अतीव तरुणं रम्यं भूषिताङ्गैश्च भूषितम् ॥ ९

कामिनीकांतमव्यग्रं कोटिचन्द्राननांबुजम् ।

कोटिस्मराधिकतनुच्छविं सर्वांगसुन्दरम् ॥ १०

ईदृग्विधं सुदेवं तं स्थितं स्वपुरतः प्रभुम् ।

दृष्ट्वा जामातरं मेना जहौ शोकं मुदान्विता ॥ ११

प्रशशंस स्वभाग्यं सा गिरिजां भूधरं कुलम् ।

मैने कृतार्थमात्मानं जहर्ष च पुनः पुनः ॥ १२

तथा पार्वतीद्वारा कुलदेवताका पूजन ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर शिवजी प्रसन्नचित्त होकर अपने गणों, देवताओं, दूतों तथा अन्य सभी लोगोंके साथ कुतूहलपूर्वक हिमालयके घर गये ॥ १ ॥

हिमालयकी श्रेष्ठ प्रिया मेना भी सभी स्त्रियोंके साथ उठकर अपने घरके अन्दर गयीं ॥२ ॥

इसके बाद वे सती शिवजीकी आरतीके लिये हाथमें दीपक लेकर सभी ऋषियोंकी स्त्रियोंको साथ लेकर आदरपूर्वक द्वारपर आयीं ॥३ ॥

वहाँ मेनाने द्वारपर आये हुए, सभी देवताओंसे सेवित गिरिजापति महेश्वर शिवको बड़े प्रेमसे देखा ॥४ ॥

सुन्दर चम्पक पुष्पके वर्णके समान आभावाले, पाँच मुखवाले, तीन नेत्रवाले, मन्द मुसकान तथा प्रसन्नतायुक्त मुखवाले, रत्न तथा सुवर्ण आदिसे शोभित, मालतीकी मालासे युक्त, उत्तम रत्नोंसे जटित मुकुट प्रकाशित, गलेमें सुन्दर हार धारण किये हुए, सुन्दर कंगन तथा बाजूबन्दसे सुशोभित, अग्निके समान देदीप्यमान, अनुपम, अत्यन्त सूक्ष्म, मनोहर, बहुमूल्य तथा विचित्र युग्म वस्त्र धारण किये हुए, चन्दन- अगरु-कस्तूरी तथा सुन्दर कुमकुमके लेपसे शोभित, हाथमें रत्नमय दर्पण लिये हुए, कज्जलके कारण कान्तिमान् नेत्रवाले, सम्पूर्ण प्रभासे आच्छन्न, अत्यन्त मनोहर, पूर्ण यौवनवाले, रम्य, सजे हुए अंगोंसे विभूषित, स्त्रियोंको सुन्दर लगनेवाले, व्यग्रतासे रहित, करोड़ों चन्द्रमाके समान मुखकमलवाले, करोड़ों कामदेवसे भी अधिक शरीरकी छविवाले तथा सर्वांगसुन्दर — इस प्रकारके अपने जामाता सुन्दर देव प्रभु शिवको अपने आगे स्थित देखकर मेनाने अपना शोक त्याग दिया और वे आनन्दमें भर गयीं ॥५–११ ॥ वे अपने भाग्य, गिरिजा तथा पर्वतके कुलकी प्रशंसा करने लगीं । उन्होंने अपनेको कृतार्थ माना और । वे बार - बार प्रसन्न होने लगीं ॥१२ ॥

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६ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४६

नीराजनं चकारासौ प्रफुल्लवदना सती ।

अवलोकपरा तत्र मेना जामातरं मुदा ॥ १३

गिरिजोक्तमनुस्मृत्य मेना विस्मयमागता ।

मनसैव ह्युवाचेदं हर्षफुल्लाननाम्बुजा ॥ १४

यद्वै पुरोक्तं च तया पार्वत्या मम तत्र च ।

ततोऽधिकं प्रपश्यामि सौन्दर्यं परमेशितुः ॥ १५

महेशस्य सुलावण्यमनिर्वाच्यं च संप्रति ।

एवं विस्मयमापन्ना मेना स्वगृहमाययौ ॥ १६

प्रशशंसुर्युवतयो धन्या धन्या गिरेः सुता ।

दुर्गा भगवतीत्येवमूचुः काश्चन कन्यकाः ॥१७

न दृष्टो वर इत्येवमस्माभिर्दानगोचरः ।

धन्या हि गिरिजादेवीमूचुः काश्चन कन्यकाः ॥ १८

जगुर्गन्धर्वप्रवरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।

दृष्ट्वा शंकररूपं च प्रहृष्टाः सर्वदेवताः ॥ १ ९

नानाप्रकारवाद्यानि वादका मधुराक्षरम् ।

नानाप्रकारशिल्पेन वादयामासुरादरात् ॥२०

हिमाचलोऽपि मुदितो द्वाराचारमथाकरोत् ।

मेनापि सर्वनारीभिर्महोत्सवपुरस्सरम् ॥ २१

परपृच्छां चकारासौ मुदिता स्वगृहं ययौ ।

शिवो निवेदितं स्थानं जगाम गणनिर्जरैः ॥ २२

एतस्मिन्नन्तरे दुर्गां शैलान्तःपुरचारिकाः ।

बहिर्जग्मुः समादाय पूजितुं कुलदेवताम् ॥ २३

तत्र तां ददृशुर्देवा निमेषरहिता मुदा ।

सुनीलाञ्जनवर्णाभां स्वाङ्गेश्च प्रतिभूषिताम् ॥ २४

त्रिनेत्रादृतनेत्रां तामन्यवारितलोचनाम् ।

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सकटाक्षां मनोहराम् ॥ २५

सुचारुकबरीभारां चारुपत्रकशोभिताम् । तब वे सती मेना प्रसन्नमुख होकर आरती करने लगीं और आनन्दपूर्वक उन्हें देखने लगीं । वे मेना गिरिजाकी कही हुई बातका स्मरणकर विस्मित हो गयीं । उनका मुखकमल हर्षके कारण खिल उठा और वे अपने मनमें कहने लगीं - उस पार्वतीने मुझसे पूर्वमें जो कहा था, मैं तो उससे भी अधिक सौदर्य परमेश्वरका देख रही हूँ । इस समय महेश्वरका सौन्दर्य तो वर्णनसे परे है । इस प्रकार विस्मित हुई मेना अपने घरके भीतर गयीं॥१३–१६ ॥ युवतियाँ प्रशंसा करने लगीं कि गिरिजा धन्य हैं, धन्य हैं और कुछ कन्याओंने तो यह कहा कि ये साक्षात् भगवती दुर्गा हैं ॥ १७ ॥

कुछ कन्याएँ तो इस प्रकार कहने लगीं कि ये गिरिजा धन्य हैं, जो इन्हें मनोहर पति प्राप्त हुआ । हमलोगोंने तो इस प्रकारके मनोहर वरका दर्शन ही नहीं किया है ॥१८ ॥

[ उस समय ] श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे, अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । सभी देवता शंकरजीके रूपको देखकर अत्यन्त हर्षित हो गये ॥ १ ९ ॥ बाजा बजानेवाले अनेक प्रकारके कौशलसे मधुर ध्वनिमें आदरपूर्वक अनेक प्रकारके वाद्य बजाने लगे ॥२० ॥

इसके बाद हिमालयने भी प्रसन्न होकर द्वाराचार किया । मेनाने भी आनन्दित होकर सभी स्त्रियोंके साथ महोत्सवपूर्वक परिछन किया । फिर । वे अपने घरमें चली गयीं । इसके बाद शिवजी भी अपने गणों और देवताओंके साथ निर्दिष्ट स्थानपर चले गये॥२१-२२ ॥ इसी बीच हिमालयके अन्तःपुरकी परिचारिकाएँ । दुर्गाको साथ लेकर कुलदेवताकी पूजा करनेके लिये बाहर गयीं ॥ २३ ॥

वहाँपर देवताओंने प्रेमपूर्वक अपलक दृष्टि नील अंजनके समान वर्णवाली, अपने अंगोंसे विभूषित | शिवजीके द्वारा आदृत, तीन नेत्रोंवाली, [ शिवजी | अतिरिक्त ] अन्यके ऊपरसे हटे नेत्रवाली, मन्द-हुए मन्द हासयुक्त तथा प्रसन्न न मुखमण्डलवाली, कटाक्षयुक् मनोहर, सुन्दर केशपाशवाली, सुन्दर पत्र - रचनासे

पृष्ठ 703

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अ ० ४६ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६ ९ ३ कस्तूरीबिन्दुभिस्सार्धं सिन्दूरबिन्दुशोभिताम् ॥ २६ ।

रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षसा सुविराजिताम् ।

रत्नकेयूरवलयां रत्नकङ्कणमंडिताम् ॥ २७

सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च चारुगण्डस्थलोज्ज्वलाम् ।

मणिरत्नप्रभामुष्टिदन्तराजिविराजिताम् ॥२८

मधुबिम्बाधरोष्ठां च रत्नयावकसंयुताम् ।

रत्नदर्पणहस्तां च क्रीडापद्मविभूषिताम् ॥ २ ९

चन्दनागुरुकस्तूरीकुंकुमेनातिचर्चिताम् I क्वणन्मंजीरपादां च रक्तांघ्रितलराजिताम् ॥ ३०

प्रणेमुः शिरसा देवीं भक्तियुक्ताः समेनकाम् ।

सर्वे सुरादयो दृष्ट्वा जगदाद्यां जगत्प्रसूम् ॥ ३१

त्रिनेत्रो नेत्रकोणेन तां ददर्श मुदान्वितः ।

शिवः सत्याकृतिं दृष्ट्वा विजहौ विरहज्वरम् ॥ ३२

शिवः सर्वं विसस्मार शिवासंन्यस्तलोचनः ।

पुलकांचितसर्वाङ्गो हर्षाद्गौरीविलोचनः ॥ ३३

अथ काली बहिः पुर्या गत्वा पूज्य कुलाम्बिकाम् ।

विवेश भवनं रम्यं स्वपितुस्सद्विजाङ्गना ॥ ३४

शङ्करोऽपि सुरैः सार्धं हरिणा ब्रह्मणा तथा ।

हिमाचलसमुद्दिष्टं स्वस्थानमगमन्मुदा ॥ ३५

तत्र सर्वे सुखं तस्थुः सेवन्तः शङ्करं यथा ।

सम्मानिता गिरीशेन नानाविधसुसम्पदा ॥ ३६

शोभित, कस्तूरी- बिन्दुसहित सिन्दूरबिन्दुसे शोभित, वक्षःस्थलपर श्रेष्ठ रत्नोंके हारसे सुशोभित, रत्ननिर्मित बाजूबन्द धारण करनेवाली, रत्नमय कंकणोंसे मण्डित, श्रेष्ठ रत्नोंके कुण्डलोंसे प्रकाशित, सुन्दर कपोलवाली, मणि एवं रत्नोंकी कान्तिको फीकी कर देनेवाली दन्तपंक्तिसे सुशोभित, मनोहर बिम्बफलके समान अधरोष्ठवाली, रत्नोंके यावक ( महावर ) -से युक्त, हाथमें रत्नमय दर्पण धारण की हुई, क्रीड़ाके लिये कमलसे विभूषित, चन्दन-अगरु - कस्तूरी तथा कुमकुमके लेपसे सुशोभित, मधुर शब्द करते हुए घुँघरुओंसे युक्त चरणोंवाली तथा रक्तवर्णके पादतलसे शोभित उन देवीको देखा॥२४–३० ॥ उस समय सभी देवता आदिने जगत्की आदिस्वरूपा तथा जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली देवीको | देखकर भक्तियुक्त हो सिर झुकाकर मेनासहित उन्हें प्रणाम किया ॥३१ ॥

त्रिनेत्र शंकरने भी उन्हें अपने नेत्रके कोण देखा और सतीके रूपको देखकर विरहज्वरको त्याग दिया ॥ ३२ ॥

शिवापर टिकाये हुए नेत्रवाले शिव सब कुछ भूल गये । गौरीको देखनेसे हर्षके कारण उनके सभी अंग पुलकित हो उठे । इस प्रकार कालीने नगरके बाहर जाकर कुलदेवीका पूजनकर द्विजपनियोंके साथ अपने पिताके रम्य घरमें प्रवेश किया ॥ ३३-३४ ॥ शंकरजी भी देवताओं, ब्रह्मा तथा विष्णुके हिमालयके द्वारा निर्दिष्ट अपने स्थानपर साथ प्रसन्नतापूर्वक चले गये ॥ ३५ ॥

वहाँपर सभी लोग गिरीशके द्वारा नाना प्रकारकी सम्पत्तिसे सम्मानित होकर शंकरजीकी / सेवा करते हुए सुखपूर्वक ठहर गये ॥३६ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे तृतीये पार्वतीखण्डे वरागमादिवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें वरके ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥

आगमन आदिका वर्णन नामक छियालीसवाँ

पृष्ठ 704

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६ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४७ अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः पाणिग्रहणके लिये हिमालयके ब्रह्मोवाच

ततः शैलवरः सोऽपि प्रीत्या दुर्गोपवीतकम् ।

कारयामास सोत्साहं वेदमन्त्रैश्शिवस्य च ॥ १

अथ विष्ण्वादयो देवा मुनयः सकुतूहलम् ।

हिमाचलप्रार्थनया विवेशान्तर्गृहं गिरेः ॥ २

श्रुत्याचारं भवाचारं विधाय च यथार्थतः ।

शिवामलंकृतां चक्रुः शिवदत्तविभूषणैः ॥ ३

प्रथमं स्नापयित्वा तां भूषयित्वाथ सर्वशः ।

नीराजिता सखीभिश्च विप्रपत्नीभिरेव च ॥ ४

अहताम्बरयुग्मेन शोभिता वरवर्णिनी ।

विरराज महाशैलदुहिता शङ्करप्रिया ॥ ५

कंचुकी परमा दिव्या नानारत्नान्विताद्भुता ।

विधृता च तया देव्या विलसन्त्यधिकं मुने ॥ ६

सा बभार तदा हारं दिव्यरत्नसमन्वितम् ।

वलयानि महार्हाणि शुद्धचामीकराणि च ॥ ७

स्थिता तत्रैव सुभगा ध्यायन्ती मनसा शिवम् ।

शुशुभेऽति महाशैलकन्यका त्रिजगत्प्रसूः ॥ ८

तदोत्सवो महानासीदुभयत्र मुदावहः ।

• दानं बभूव विविधं ब्राह्मणेभ्यो विवर्णितम् ॥ ९

अन्येषां द्रव्यदानं च बभूव विविधं महत् ।

गीतवाद्यविनोदश्च तत्रोत्सवपुरस्सरम् ॥ १०

अथ विष्णुरहं धाता शक्राद्या अमरास्तथा ।

मुनयश्च महाप्रीत्या निखिलाः सोत्सवा मुदा ॥ ११

सुप्रणम्य शिवां भक्त्या स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ।

सम्प्राप्य हिमगिर्याज्ञां स्वं स्वं स्थानं समाश्रिताः ॥ १२

एतस्मिन्नन्तरे तत्र ज्योतिःशास्त्रविशारदः ।

हिमवन्तं गिरीन्द्रं तं गर्गो वाक्यमभाषत ॥ १३

घर शिवके गमनोत्सवका वर्णन ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर शैलराजने प्रसन्नतापूर्वक | बड़े उत्साहसे वेदमन्त्रोंके द्वारा शिवा एवं शिवजीका उपनयन - संस्कार सम्पन्न कराया । तदनन्तर विष्णु आदि देवताओं एवं मुनियोंने हिमालयके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर उनके घरके भीतर प्रवेश किया ॥ १-२ ॥ उन लोगोंने लोक तथा वेदरीतिको यथार्थ रूपसे सम्पन्नकर शिवके द्वारा दिये गये आभूषणोंसे पार्वतीको अलंकृत किया । सखियों और ब्राह्मणोंकी पत्नियोंने पहले पार्वतीको स्नान कराकर पुनः सभी प्रकारसे सजाकर उनकी आरती उतारी । शंकरप्रिया तथा गिरिराजसुता वरवर्णिनी पार्वती उस समय दो नूतन वस्त्र धारण किये हुए अत्यन्त शोभित हो रही थीं॥३–५ ॥ हे मुने! उन देवीने अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित परम दिव्य तथा अद्भुत कंचुकी धारण की, जिससे वे अधिक शोभा पाने लगीं । तदनन्तर उन्होंने दिव्य रत्नोंसे जड़ा हुआ हार तथा शुद्ध सुवर्णके बने हुए बहुमूल्य कंकणोंको भी धारण किया ॥ ६-७ ॥ तीनों जगत्को उत्पन्न करनेवाली तथा महाशैलकी कन्या सौभाग्यवती वे पार्वती मनमें शिवजीका ध्यान करते हुए वहींपर बैठी हुई अत्यन्त शोभित होने लगीं ॥८ ॥

उस समय दोनों पक्षोंमें आनन्ददायक महान् उत्सव हुआ और [ उभयपक्षसे ] नाना प्रकारके अवर्णनीय । दान ब्राह्मणोंको दिये गये । इसी प्रकार लोगोंको भी | अनेक प्रकारके दान दिये गये और वहाँ उत्सवपूर्व । गीत, वाद्य एवं विनोद सम्पन्न हुए ॥ ९ -१० ॥ तब मैं ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि सभी देवगण तथा सभी मुनिलोग बड़ी प्रसन्नताके साथ आनन्दपूर्वक उत्सव मनाकर भक्तिपूर्वक पार्वतीको | प्रणामकर तथा शिवजीके चरणकमलोंका ध्यानकर हिमालयकी आज्ञा प्राप्त करके अपने - अपने स्थानपर । बैठ गये । इसी समय वहाँ ज्योतिःशास्त्रके पारंगत | विद्वान् गर्गाचार्य उन गिरिराज हिमालयसे यह वचन कहने लगे — ॥११–१३ ॥

पृष्ठ 705

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अ ० ४७ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६ ९ ५ गर्ग उवाच

हिमाचल धराधीश स्वामिन् कालीपितः प्रभो ।

पाणिग्रहार्थं शंभुं चानय त्वं निजमंदिरम् ॥

ब्रह्मोवाच

अथ तं समयं ज्ञात्वा कन्यादानोचितं गिरिः ।

निवेदितं च गर्गेण मुमुदेऽतीव चेतसि ॥

महीधरान्द्विजांश्चैव परानपि मुदा गिरिः ।

प्रेषयामास सुप्रीत्या शिवानयनकाम्यया ॥

ते पर्वता द्विजाश्चैव सर्वमङ्गलपाणयः ।

संजग्मुः सोत्सवाः प्रीत्या यत्र देवो महेश्वरः ॥

तदा वादित्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा ।

महोत्साहोऽभवत्तत्र गीतनृत्यान्वितेन हि ॥

श्रुत्वा वादित्रनिर्घोषं सर्वे शंकरसेवकाः ।

उत्थितास्त्वैकपद्येन सदेवर्षिगणा मुदा ॥

परस्परं समूचुस्ते हर्षनिर्भरमानसाः ।

अत्रागच्छन्ति गिरयः शिवानयनकाम्यया ॥

पाणिग्रहणकालो हि नूनं सद्यः समागतः ।

महद्भाग्यं हि सर्वेषां संप्राप्तमिह मन्महे ॥

धन्या वयं विशेषेण विवाहं शिवयोर्ध्रुवम् ।

द्रक्ष्यामः परमप्रीत्या जगतां मङ्गलालयम् ॥

ब्रह्मोवाच

एवं यावदभूत्तेषां संवादस्तत्र चादरात् ।

तावत्सर्वे समायाताः पर्वतेन्द्रस्य मंत्रिणः ॥

गत्वा प्रार्थयाञ्चक्रुः शिवं विष्ण्वादिकानपि ।

कन्यादानोचितः कालो वर्तते गम्यतामिति ॥

तच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे मुने विष्ण्वादयोऽखिलाः ।

मुमुदुश्चेतसातीव जयेत्यूचुर्गिरिं द्रुतम् ॥

शिवोऽपि मुमुदेऽतीव कालीप्रापणलालसः । गुप्तं चकार तच्चिह्नं मनस्येवाद्भुताकृतिः गर्ग बोले- हे हिमालय! हे धराधीश! हे स्वामिन्! हे कालीके पिता! हे प्रभो! अब आप १४ पाणिग्रहणके निमित्त शिवजीको अपने घरपर ले आइये ॥ १४ ॥

ब्रह्माजी बोले- तत्पश्चात् गर्गके द्वारा निर्देश किये गये कन्यादानके लिये उचित समयको जानकर १५ हिमालय मनमें अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥१५ ॥

हिमालयने आनन्दित होकर [ उसी समय ] ९ ६ पर्वतों, द्विजों तथा अन्य लोगोंको भी अत्यन्त प्रेमके साथ शिवजीको बुलानेकी इच्छासे भेजा । वे पर्वत तथा ब्राह्मण हाथोंमें सभी मांगलिक वस्तुएँ लेकर १७ महान् उत्सव करते हुए प्रेमपूर्वक वहाँ गये, जहाँ भगवान् महेश्वर थे॥१६-१७ ॥ उस समय गीत - नृत्यसहित वाद्यध्वनि तथा वेदध्वनिसे १८ महान् उत्सव होने लगा ॥१८ ॥

वाद्योंके शब्दको सुनकर शंकरजीके सभी सेवक, १ ९ देवता, ऋषि तथा गण आनन्दित होकर एक साथ ही उठ खड़े हुए और वे हर्षसे परिपूर्ण होकर परस्पर कहने लगे- शिवजीको बुलानेकी इच्छासे [ गिरिराजके २० द्वारा भेजे गये ] पर्वत यहाँ आ रहे हैं ॥१ ९ -२० ॥ निश्चय ही पाणिग्रहणका काल शीघ्र उपस्थित २१ हो गया है, अत: सभीका महाभाग्य उपस्थित हो गया है— ऐसा हमलोग मानते हैं । हमलोग विशेष रूपसे धन्य हैं, क्योंकि हमलोग संसारके मंगलोंके स्थानस्वरूप शिवा-२२ शिवके विवाहको अत्यन्त प्रेमसे देखेंगे ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब आदरपूर्वक उनका यह संवाद हो रहा था, उसी समय गिरिराजके सभी २३ मन्त्री वहाँ आ गये । उन लोगोंने जा करके विष्णु आदि तथा शंकरसे प्रार्थना की कि कन्यादानका उचित समय उपस्थित हो गया है, अब आप लोग २४ | चलें ॥ २३-२४ ॥ यह सुनकर वे विष्णु आदि सभी देवता मन - ही-२५ मन अत्यन्त प्रसन्न हुए और जोर - जोरसे गिरिराज हिमालयकी जय - जयकार करने लगे ॥ २५ ॥

इधर, शिवजी भी कालीको प्राप्त करनेकी लालसासे अत्यन्त प्रसन्न हो उठे, किंतु अद्भुत ॥ २६ रूपवाले उन शिवने उसके लक्षणको मनमें गुप्त रखा ।

पृष्ठ 706

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६ ९ ६ अथ स्नानं कृतं तेन मङ्गलद्रव्यसंयुतम् शूलिना सुप्रसन्नेन लोकानुग्रहकारिणा स्नातः सुवाससा युक्तः सर्वैस्तैः परिवारितः आरोपितो वृषस्कन्धे लोकपालैः सुसेवितः पुरस्कृत्य प्रभुं सर्वे जग्मुर्हिमगिरेर्गृहम् वाद्यानि वादयन्तश्च कृतवन्तः कुतूहलम् हिमागप्रेषिता विप्रास्तथा ते पर्वतोत्तमाः शम्भोरग्रचरा ह्यासन्कुतूहलसमन्विताः बभौ छत्रेण महता ध्रियमाणो हि मूर्धनि चामरैर्वीज्यमानोऽसौ सवितानो महेश्वरः अहं विष्णुस्तथा चेन्द्रो लोकपालास्तथैव च अग्रगाः स्मातिशोभन्ते श्रिया परमया श्रिताः ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पटहानकगोमुखाः पुनः पुनरवाद्यन्त वादित्राणि महोत्सवे तथैव गायकाः सर्वे जगुः परममङ्गलम् नर्तक्यो ननृतुः सर्वा नानातालसमन्विताः एभिस्समेतो जगदेकबन्धु-तदानीं परमेशवर्चसा सुसेव्यमानः सकलैः सुरेश्वरै-र्विकीर्यमाणः कुसुमैश्च हर्षितैः सम्पूजितस्तदा शम्भुः प्रविष्टो यज्ञमण्डपम् । संस्तूयमानो बह्वीभिः स्तुतिभिः परमेश्वरः वृषादुत्तारयामासुर्महेशं पर्वतोत्तमाः निन्युर्गृहान्तरं प्रीत्या महोत्सवपुरस्सरम् ॥ हिमालयोऽपि सम्प्राप्तं सदेवगणमीश्वरम् प्रणम्य विधिवद्भक्त्या श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४७ । । इसके उपरान्त लोकपर कृपा करनेवाले शूलधारीने ॥ २७ । परम प्रसन्न होकर मांगलिक द्रव्योंसे युक्त [ जलसे स्नान किया ॥ २६-२७ ॥ ] । सभी लोकपालोंने स्नान किये हुए तथा सुन्दर ॥ २८ वस्त्रसे युक्त उन शिवको चारों ओरसे घेरकर उनकी । सेवा की तथा उन्हें वृषभके स्कन्धपर बैठाया । इसके । बाद प्रभुको आगे करके सभी लोग हिमालयके घरकी ॥ २ ९ ओर चल पड़े । वे वाद्य बजाते हुए कुतूहल कर रहे थे ॥ २८-२९ ॥ । उस समय हिमालयके द्वारा भेजे गये ब्राह्मण ॥ ३० तथा श्रेष्ठ पर्वतगण कुतूहलसे युक्त होकर शिवजीके आगे - आगे चल रहे थे । मस्तकपर विशाल छत्र । लगाये हुए, चँवर डुलाये जाते एवं वितानसे युक्त वे ॥ ३१ महेश्वर अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे । उस समय । आगे - आगे चलते हुए मैं, विष्णु, इन्द्र तथा समस्त ॥ ३२ लोकपाल परम ऐश्वर्यसे युक्त होकर सुशोभित हो रहे थे ॥ ३०-३२ ॥ । उस महोत्सवमें शंख, भेरियाँ, नगाड़े, बड़े - बड़े ॥ ३३ ढोल तथा गोमुख आदि बाजे बार - बार बज रहे थे ॥ ३३ ॥

। सभी गायक भी मंगलगीत गा रहे थे तथा सभी ॥ ३४ नर्तकियाँ अनेक प्रकारके तालोंके साथ नाच रही थीं ॥ ३४ ॥

। उस समय इन सभीके साथ जगत्के एकमात्र | बन्धु शिव परम तेजसे युक्त होकर समस्त हर्षित | सुरेश्वरोंके द्वारा सेवित होते हुए तथा अपने ऊपर पुष्प ॥ ३५ विकीर्ण किये जाते हुए चल रहे थे ॥ ३५ ॥

तत्पश्चात् सभी लोगोंसे भली - भाँति पूजित ॥ ३६ होकर शम्भुने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, उस समय । | सभी लोग उन परमेश्वरकी नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति कर रहे थे ॥ ३६ ॥

और श्रेष्ठ पर्वतोंने शिवजीको वृषभसे उतारा से । ३७ प्रेमके साथ महोत्सवपूर्वक उन्हें घरके भीतर | गये ॥ ३७ ॥

हिमालयने भी देवताओं तथा गणोंसहित । । आये हुए ईश्वरको विधिवत् भक्तिपूर्वक प्रणाम नीराजनमथाकरोत् ॥ ३८ किया और उनकी आरती उतारी ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 707

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अ ० ४७ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६ ९ ७

सर्वान्सुरान्मुनीनन्यान् प्रणम्य समहोत्सवः ।

सम्मानमकरोत्तेषां प्रशंसन्स्वविधिं मुदा ॥

सोऽगः साच्युतमीशानं सुपाद्यार्घ्यपुरस्सरम् ।

सदेवमुख्यवर्गं च निनाय स्वालयान्तरम् ॥

प्राङ्गणे स्थापयामास रत्नसिंहासनेषु तान् ।

सर्वान्विष्णुं च मामीशं विशिष्टांश्च विशेषतः ॥

सखीभिर्मेनया प्रीत्या ब्राह्मणस्त्रीभिरेव च ।

अन्याभिश्च पुरन्ध्रीभिश्चक्रे नीराजनं मुदा ॥

पुरोधसा कृत्यविदा शंकराय महात्मने ।

मधुपर्कादिकं यद्यत्कृत्यं तत्तत्कृतं मुदा ॥

मया स नोदितस्तत्र पुरोधाः कृतवांस्तदा ।

सुमङ्गलं च यत्कर्म प्रस्तावसदृशं मुने ॥

अन्तर्वेद्यां महाप्रीत्या सम्प्रविश्य हिमाद्रिणा ।

यत्र सा पार्वती कन्या सर्वाभरणभूषिता ॥

वेदिकोपरि तन्वङ्गी संस्थिता सुविराजिता ।

तत्र नीतो महादेवो विष्णुना च मया सह ॥

लग्नं निरीक्षमाणास्ते वाचस्पतिपुरोगमाः ।

कन्यादानोचितं तत्र बभूवुः परमोत्सवाः ॥

तत्रोपविष्टो गर्गश्च यत्रास्ति घटिकालयम् ।

यावच्छेषा घटी तावत्कृतं प्रणवभाषणम् ॥

पुण्याहं प्रवदन् गर्गः समादध्रेऽञ्जलिं मुदा ।

पार्वत्यक्षतपूर्णं च ववृषे च शिवोपरि ॥

तया सम्पूजितो रुद्रो दध्यक्षतकुशाम्बुभिः ।

परमोदारया तत्र पार्वत्या रुचिरास्यया ॥

विलोकयन्ती तं शम्भुं यस्यार्थे परमं तपः ।

कृतं पुरा महाप्रीत्या विरराज शिवाति सा ॥

मया मुने तदोक्तस्तु गर्गादिमुनिभिश्च सः । समानर्च शिवां शम्भुः लौकिकाचारसंरतः एवं परस्परं तौ वै पार्वतीपरमेश्वरौ । [ इसी प्रकार ] उत्साहयुक्त होकर उन्होंने सभी ३ ९ देवताओं, मुनियों तथा अन्य लोगोंको प्रणामकर अपने भाग्यकी प्रशंसा करते हुए प्रेमपूर्वक उन सबका सम्मान किया ॥ ३ ९ ॥ वे हिमालय विष्णु और प्रमुख देवसमुदाय-४० सहित ईशानको उत्तम पाद्य तथा अर्घ्य प्रदानकर उन्हें अपने घरमें ले गये और उन्होंने आँगनमें रत्नके सिंहासनपर विशेष - विशेष देवताओंको, मुझे, विष्णुको, ४१ ईशको तथा सभी विशिष्ट लोगोंको आदरपूर्वक बैठाया ॥ ४०-४१ ॥ मेनाने भी बड़े प्रेमसे अपनी सखियों, ब्राह्मणस्त्रियों ४२ तथा अन्य पुरन्ध्रियोंके साथ मुदित होकर शिवजीकी आरती उतारी । कर्मकाण्डके ज्ञाता पुरोहितने मधुपर्क-दान आदि जो - जो कृत्य था, वह सब महात्मा ४३ शंकरके लिये सम्पन्न किया॥४२-४३ ॥ हे मुने! पुरोहितने मेरे द्वारा प्रेरित होकर प्रस्तावके ४४ अनुकूल जो मांगलिक कार्य था, उसे किया ॥४४ ॥

उसके बाद अन्तर्वेदीमें बड़े प्रेमसे प्रविष्ट होकर ४५ हिमालय वेदीके ऊपर समस्त आभूषणोंसे विभूषित तन्वंगी कन्या पार्वती जहाँ विराजमान थीं, वहाँ विष्णु ४६ तथा मेरे साथ महादेवजीको ले गये । उस समय वहाँ बृहस्पति आदि देवता कन्यादानोचित लग्नकी प्रतीक्षा ४७ करते हुए अत्यन्त आनन्दित हो रहे थे॥४५–४७ ॥ जहाँ घटिकायन्त्र स्थापित था, वहींपर गर्गाचार्य ४८ बैठे हुए थे । विवाहकी घड़ी आनेतक वे प्रणवका जप कर रहे थे । गर्गाचार्यने पुण्याहवाचन करते हुए अक्षतोंको पार्वतीकी अंजलिमें दिया, तब पार्वतीने ४ ९ प्रेमपूर्वक शिवके ऊपर अक्षतोंकी वर्षा की । इसके बाद परम उदार तथा सुन्दर मुखवाली उन पार्वतीने दही, अक्षत तथा कुशके जलसे शिवजीकी पूजा ५ ° की ॥ ४८- ५० ॥ जिनके लिये उन शिवाने पूर्वकालसे अत्यन्त ५१ कठोर तप किया था, उन शम्भुको प्रेमपूर्वक देखी हुई वे अत्यन्त शोभित हो रही थीं । हे मुने! तदनन्तर मेरे एवं गर्ग आदि मुनियोंके कहनेपर सदाशिवने ॥ ५२ लौकिक विधिका आश्रयणकर पार्वतीका पूजन किया । इस प्रकार जगन्मय पार्वती तथा परमेश्वर परस्पर

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६ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० अर्चयन्तौ तदानीं च शुशुभाते जगन्मयौ ॥ ५३ । |

त्रैलोक्यलक्ष्म्या संवीतौ निरीक्षन्तौ परस्परम् । ।

तदा नीराजितौ लक्ष्म्यादिभिः स्त्रीभिर्विशेषतः ॥ ५४

तथापरा वै द्विजयोषितश्च

नीराजयामासुरथो पुरस्त्रियः ।

शिवां च शम्भुं च विलोकयन्त्योऽ-वापुर्मुदं ताः सकला महोत्सवम् ॥ ५५

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ४८ एक - दूसरेका सत्कार करते हुए परम शोभाको प्राप्त हो रहे थे । लक्ष्मी आदि देवियोंने त्रैलोक्यकी शोभा समन्वित होकर एक - दूसरेकी ओर देखते दोनोंकी विशेषरूपसे आरती उतारी ॥ ५१-५४ हुए उन तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी स्त्रियों तथा नगरकी ॥ अन्य स्त्रियोंने उनकी आरती की । उस समय शिवा तथा शिवको उत्सुकतापूर्वक देखती हुई वे सब बहुत आनन्दित हुईं ॥ ५५ ॥

रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवहिमगिरिगृहाभ्यन्तरगमनोत्सववर्णनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें हिमालयके घर शिवके गमनोत्सवका वर्णन नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥

अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः शिव - पार्वतीके विवाहका प्रारम्भ, हिमालयद्वारा शिवके गोत्रके विषयमें प्रश्न होनेपर नारदजीके द्वारा उत्तरके रूपमें शिवमाहात्म्य प्रतिपादित करना, हर्षयुक्त हिमालयद्वारा कन्यादानकर विविध उपहार प्रदान करना ब्रह्मोवाच

एतस्मिन्नन्तरे तत्र गर्गाचार्यप्रणोदितः ।

हिमवान्मेनया सार्धं कन्यां दातुं प्रचक्रमे ॥

हैमं कलशमादाय मेना चार्धांगमाश्रिता ।

हिमाद्रेश्च महाभागा वस्त्राभरणभूषिता ॥

पाद्यादिभिस्ततः शैलः प्रहृष्टः सपुरोहितः ।

तं वरं वरयामास वस्त्रचंदनभूषणैः ॥

ततो हिमाद्रिणा प्रोक्ता द्विजास्तिथ्यादिकीर्तने ।

प्रयोगो भण्यतां तावदस्मिन्समय आगते ॥

तथेति चोक्ता ते सर्वे कालज्ञा द्विजसत्तमाः ।

तिथ्यादिकीर्तनं चक्रुः प्रीत्या परमनिर्वृताः ॥

ततो हिमाचलः प्रीत्या शंभुना प्रेरितो हृदा ।

सूतीकृतपरेशेन विहसन् शंभुमब्रवीत् ॥

स्वगोत्रं कथ्यतां शम्भो प्रवरश्च कुलं तथा ।

नाम वेदं तथा शाखां माकार्षीः समयात्ययम् ॥

ब्रह्माजी बोले- इसी समय वहाँ गर्गाचार्यसे प्रेरित हो मेनासहित हिमवान् कन्यादान करनेहेतु १ उद्यत हुए ॥१ ॥

उस समय वस्त्र तथा आभूषणोंसे शोभित महाभागा मेना सोनेका कलश लेकर पति हिमवान्के २ दाहिने भागमें बैठ गयीं । तत्पश्चात् पुरोहितके | सहित हिमालयने प्रसन्न होकर पाद्य आदिसे और वस्त्र, चन्दन तथा आभूषणसे उन वरका वरण ३ किया ॥ २-३ ॥ इसके बाद हिमालयने ब्राह्मणोंसे कहा - अब ४ [ कन्या - दानका ] यह समय उपस्थित हो गया है, | अतः आपलोग संकल्पके लिये तिथि आदिका उच्चारण । कीजिये । उनके यह कहनेपर कालके ज्ञाता श्रेष्ठ

५ ब्राह्मण निश्चिन्त होकर प्रेमपूर्वक तिथि आदिका ।

उच्चारण करने लगे ॥ ४-५ ॥

तब सृष्टिकर्ता परमेश्वर शम्भुके द्वारा हृदयसे ६ प्रेरित हुए हिमालयने हँसते हुए प्रसन्नताके साथ | शिवजीसे कहा- हे शम्भो! अब आप अपने गोत्र, | प्रवर, कुल, नाम, वेद तथा शाखाको कहिये, विलम्ब ७ | मत कीजिये ॥ ६-७ ॥

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अ ० ४८ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ६ ९९ ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य हिमाद्रेः शंकरस्तदा ।

सुमुखो विमुखः सद्योऽप्यशोच्यः शोच्यतां गतः ॥ ८

एवंविधः सुरवरैर्मुनिभिस्तदानीं गंधर्वयक्षगणसिद्धगणैस्तथैव दृष्टो निरुत्तरमुखो भगवान्महेशोऽ-कार्षीस्सुहास्यमथ तत्र स नारद त्वम् ॥ ९

वीणामवादयंस्त्वं हि ब्रह्मविज्ञोऽथ नारद ।

शिवेन प्रेरितस्तत्र मनसा शंभुमानसः ॥ १०

तदा निवारितो धीमान् पर्वतेन्द्रेण वै हठात् ।

विष्णुना च मया देवैर्मुनिभिश्चाखिलैस्तथा ॥ ११

न निवृत्तोऽभवस्त्वं हि स यदा शंकरेच्छया ।

इति प्रोक्तोऽद्रिणा तर्हि वीणां मा वादयाधुना ॥ १२

सुनिषिद्धो हठात्तेन देवर्षे त्वं यदा बुध ।

प्रत्यवोचो गिरीशं तं सुसंस्मृत्य महेश्वरम् ॥ १३

नारद उवाच

त्वं हि मूढत्वमापन्नो न जानासि च किंचन ।

वाच्ये महेशविषयेऽतीवासि त्वं बहिर्मुखः ॥ १४

त्वया पृष्टो हरः साक्षात्स्वगोत्रकथनं प्रति ।

समयेऽस्मिंस्तदत्यंतमुपहासकरं वचः ॥ १५

अस्य गोत्रं कुलं नाम नैव जानन्ति पर्वत ।

विष्णुब्रह्मादयोऽपीह परेषां का कथा स्मृता ॥ १६

यस्यैकदिवसे शैल ब्रह्मकोटिर्लयं गता ।

स एव शंकरस्तेद्य दृष्टः कालीतपोबलात् ॥१७

अरूपोऽयं परब्रह्म निर्गुणः प्रकृतेः परः ।

निराकारो निर्विकारी मायाधीशः परात्परः ॥ १८

अगोत्रकुलनामा हि स्वतंत्रो भक्तवत्सलः ।

तदिच्छया हि सगुणः सुतनुर्बहुनामभृत् ॥ १ ९

सुगोत्री गोत्रहीनश्च कुलहीनः कुलीनकः ।

पार्वतीतपसा सोऽद्य जामाता ते न संशयः ॥ २०

ब्रह्माजी बोले- उन हिमालयकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न होते हुए भी उदास हो गये और शोकके योग्य न होते हुए भी शोकयुक्त हो गये ॥ ८ ॥

उस समय श्रेष्ठ देवताओं, मुनियों, गन्धर्वों, यक्षों तथा सिद्धोंने जब शंकरको निरुत्तरमुख देखा, तब हे नारद! आपने सुन्दर हास्य किया । हे नारद! उस समय ब्रह्मवेत्ता तथा शिवजीमें आसक्त चित्तवाले आपने शिवजीके द्वारा मनसे प्रेरित होकर वीणा बजायी । उस समय पर्वतराज, विष्णु, मैंने, देवताओं तथा सभी मुनियोंने आप बुद्धिमान्‌को ऐसा करनेसे हठपूर्वक रोका॥९ –११ ॥ किंतु जब शिवजीकी इच्छासे आप नहीं माने, तब [ पुन: ] हिमालयने आपसे कहा - इस समय आप वीणा मत बजाइये । हे बुद्धिमान्! हे देवर्षे! जब उन्होंने हठपूर्वक आपको मना किया, तब आप महेश्वरका स्मरण करके हिमालयसे कहने लगे— ॥ १२-१३ ॥ नारदजी बोले – [ हे पर्वतराज! ] आप मूढ़तासे युक्त हैं, अतः कुछ भी नहीं जानते । महेश्वरके विषयमें कथनीय बातोंसे आप सर्वथा अनभिज्ञ हैं ॥ १४ ॥

आपने इस समय जो इन साक्षात् महेश्वरसे गोत्र बतानेके लिये कहा है, वह वचन अत्यन्त हास्यास्पद है ॥१५ ॥

हे पर्वत! ब्रह्मा, विष्णु आदि भी इनका गोत्र, कुल, नाम नहीं जानते, दूसरोंकी क्या बात कही जाय!॥ १६ ॥

हे शैल! जिनके एक दिनमें करोड़ों ब्रह्मा लयको प्राप्त हो जाते हैं, उन शंकरका दर्शन आपने आज कालीके तपके प्रभावसे ही किया है ॥ १७ ॥

ये प्रकृतिसे परे, परब्रह्म, अरूप, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, मायाधीश तथा परात्पर हैं ॥१८ ॥

ये स्वतन्त्र, भक्तवत्सल और गोत्र, कुल तथा नामसे सर्वथा रहित हैं । ये अपनी इच्छासे ही सगुण, सुन्दर शरीरवाले तथा अनेक नामवाले हो जाते हैं ॥ १ ९ ॥ ये गोत्रहीन होते हुए भी श्रेष्ठ गोत्रवाले हैं, कुलहीन होते हुए भी उत्तम कुलवाले हैं और आज पार्वतीके तपसे आपके जामाता हुए हैं, इसमें | सन्देह नहीं ॥ २० ॥

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७०० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

लीलाविहारिणा तेन मोहितं सचराचरम् ।

नो जानाति शिवं कोऽपि प्राज्ञोऽपि गिरिसत्तम ॥

लिङ्गाकृतेर्महेशस्य केन दृष्टं न मस्तकम् ।

विष्णुर्गत्वा हि पातालं तदैनं नाप विस्मितः ॥

किं बहूक्त्या नगश्रेष्ठ शिवमाया दुरत्यया ।

तदधीनास्त्रयो लोका हरिब्रह्मादयोऽपि च ॥

तस्मात्त्वया शिवातात सुविचार्य प्रयत्नतः ।

न कर्तव्यो विमर्शोऽत्र त्वेवंविधवरे मनाक् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा त्वं मुने ज्ञानी शिवेच्छाकार्यकारकः ।

प्रत्यवोचः पुनस्तं वै शैलेद्रं हर्षयन् गिरा ॥

नारद उवाच

शृणु तात महाशैल शिवाजनक मद्वचः ।

तच्छ्रुत्वा तनयां देवीं देहि त्वं शंकराय हि ॥

सगुणस्य महेशस्य लीलया रूपधारिणः ।

गोत्रं कुलं विजानीहि नादमेव हि केवलम् ॥

शिवो नादमयः सत्यं नादः शिवमयस्तथा ।

उभयोरन्तरं नास्ति नादस्य च शिवस्य च ॥

सृष्टौ प्रथमजत्वाद्धि लीलासगुणरूपिणः ।

शिवान्नादस्य शैलेन्द्र सर्वोत्कृष्टस्ततः स हि ॥

अतो हि वादिता वीणा प्रेरितेन मयाद्य वै ।

सर्वेश्वरेण मनसा शंकरेण हिमालय ॥

ब्रह्मोवाच

एतच्छ्रुत्त्वा तव मुने वचस्तत्तु गिरीश्वरः ।

हिमाद्रिस्तोषमापन्नो गतविस्मयमानसः ॥

अथ विष्णुप्रभृतयः सुराश्च मुनयस्तथा ।

साधु साध्विति ते सर्वे प्रोचुर्विगतविस्मयाः ॥।

४८ उन लीलाविहारीने चराचरसहित जगत्को २१ मोहित कर रखा है । हे गिरिसत्तम! कोई ज्ञानी भी इन्हें नहीं जानता । ब्रह्माजी भी लिंगकी महान | आकृतिवाले महेशके मस्तकको नहीं देख सके । २२ विष्णु भी पातालतक जाकर इन्हें नहीं प्राप्त कर पाये और आश्चर्यचकित हो गये॥२१-२२ ॥ हे गिरिश्रेष्ठ! अधिक कहनेसे क्या लाभ, २३ शिवजीकी माया बड़ी दुस्तर है । त्रैलोक्य और विष्णु, ब्रह्मा आदि भी उसी [ माया ] के अधीन हैं ॥ २३ ॥

इसलिये हे पार्वतीतात! प्रयत्नपूर्वक भली - भाँति २४ विचार करके आप वरके गोत्र, कुल एवं इस प्रकारके वरके सम्बन्धमें थोड़ा भी सन्देह मत कीजिये ॥ २४ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! ऐसा कहकर ज्ञानी तथा शिवकी इच्छासे कार्य करनेवाले आप पर्वतराजको २५ | [ अपनी ] वाणीसे हर्षित करते हुए पुनः उनसे कहने लगे— ॥ २५ ॥

नारदजी बोले - हे तात! हे महाशैल! हे शिवाजनक! आप मेरी बात सुनिये तथा उसे सुनकर २६ शंकरजीको अपनी कन्या प्रदान कीजिये ॥२६ ॥

[ अपनी ] लीलासे अनेक रूप धारण २७ करनेवाले सगुण महेशका गोत्र तथा कुल केवल नाद ही जानिये ॥ २७ ॥

शिव नादमय हैं और नाद भी शिवमय है, २८ यही सत्य है । थाना - इन दोनोंमें भेद | नहीं है ॥ २८ ॥

सृष्टिके आरम्भमें लीलासे सगुण रूप धारण २ ९ करनेवाले शिवके द्वारा सर्वप्रथम नादकी उत्पत्ति । होनेके कारण वह सर्वश्रेष्ठ है ॥२ ९ ॥

इसलिये हे हिमालय! अपने मनमें सर्वेश्वर ।

३० शिवसे प्रेरित होकर मैंने आज वीणा बजायी है ॥ ३० ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! गिरीश्वर हिमालय । | आपका यह वचन सुनकर सन्तुष्ट हो गये और उनके ३१ मनका विस्मय जाता रहा ॥३१ ॥ ।

तब विष्णु आदि वे देवता एवं मुनि विस्मयरहित ३२ हो ' साधु - साधु ' - ऐसा कहने लगे ॥३२ ॥