शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 721–730
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730
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अ ० ५१ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७११
विवाहोत्सव एतस्मिन् सुखिनो निखिला जनाः ।
अहमेका महेशान दुःखिनी स्वपतिं विना ॥
सनाथा कुरु मां देव प्रसन्नो भव शङ्कर ।
स्वोक्तं सत्यं विधेहि त्वं दीनबन्धो पर प्रभो ॥
त्वां विना कः समर्थोऽत्र त्रैलोक्ये सचराचरे ।
नाशने मम दुःखस्य ज्ञात्वेति करुणां कुरु ॥
सोत्सवे स्वविवाहेऽस्मिन्सर्वानन्दप्रदायिनि ।
सोत्सवामपि मां नाथ कुरु दीनकृपाकर ॥
जीविते मम नाथे हि पार्वत्या प्रियया सह ।
सुविहारः प्रपूर्णश्च भविष्यति न संशयः ॥
सर्वं कर्तुं समर्थोऽसि यतस्त्वं परमेश्वरः ।
किं बहूक्त्यात्र सर्वेश जीवयाशु पतिं मम ॥
ब्रह्मोवाच
तदित्युक्त्वा कामभस्म ददौ सग्रन्थिबन्धनम् ।
रुदोद पुरतः शम्भोर्नाथ नाथेत्युदीर्य च ॥
रतिरोदनमाकर्ण्य सरस्वत्यादयः स्त्रियः ।
रुरुदुः सकला देव्यः प्रोचुर्दीनतरं वचः ॥
देव्य ऊचुः
भक्तवत्सलनामा त्वं दीनबन्धुर्दयानिधिः ।
कामं जीवय सोत्साहां रतिं कुरु नमोऽस्तु ते ॥
ब्रह्मोवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः ।
कृपादृष्टि चकाराशु करुणासागरः प्रभुः ॥
सुधादृष्ट्या शूलभृतो भस्मतो निर्गतः स्मरः ।
तद्रूपवेषचिह्नात्मा सुन्दरोऽद्भुतमूर्तिमान् ॥
तद्रूपं च तदाकारं सस्मितं सधनुश्शरम् ।
दृष्ट्वा पतिं रतिस्तं च प्रणनाम महेश्वरम् ॥
हे महेश्वर! इस विवाहोत्सवमें सभी लोग सुखी ४ हैं, केवल मैं ही अपने पतिके बिना दुखी हूँ ॥ ४ ॥
हे देव! मुझे सनाथ कीजिये । हे शंकर! अब ५ । आप प्रसन्न होइये । हे दीनबन्धो! हे परप्रभो! अपने वचनको आप सत्य कीजिये ॥५ ॥
इस चराचर त्रिलोकीमें आपके बिना कौन मेरा ६ दुःख दूर करनेमें समर्थ है, ऐसा जानकर मुझपर दया कीजिये ॥ ६ ॥
हे नाथ! हे दीनोंपर कृपा करनेवाले! सभीको ७ आनन्द देनेवाले उत्सवपूर्ण अपने इस विवाहमें मुझे भी आनन्दित कीजिये ॥७ ॥
मेरे पतिके जीवित होनेपर ही प्रिया पार्वती ८ साथ आपका विहार पूर्ण होगा, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥
आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, क्योंकि आप ९ परमेश्वर हैं । हे सर्वेश! बहुत क्या कहूँ, आप मेरे पतिको शीघ्र जीवित कीजिये ॥ ९ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर रतिने अपने गाँठमें बँधी हुई कामकी भस्म उन्हें दे दी और हे नाथ! हे नाथ! ऐसा कहकर उनके सामने विलाप १० करने लगी ॥१० ॥
रतिके रुदनको सुनकर [ वहाँ उपस्थित ] सरस्वती ११ आदि सभी स्त्रियाँ रोने लगीं और अत्यन्त दीन वचन कहने लगीं ॥११ ॥
देवियाँ बोलीं- [ हे प्रभो! ] आप भक्तवत्सल नामवाले, दीनबन्धु और दयानिधि हैं, आप कामको १२ जीवित कर दीजिये तथा रतिको प्रसन्न कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥
ब्रह्माजी बोले- उनके इस वचनको सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गये । उन करुणासागर प्रभुने शीघ्र १३ ही [ उनपर ] कृपादृष्टि की ॥ १३ ॥
शूलधारी शिवजीकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही १४ भस्मसे उसी रूप - वेष - चिह्नको धारण किये हुए, सुन्दर तथा अद्भुत शरीरवाले कामदेव प्रकट हो गये ॥१४ ॥
उसी रूप तथा उसी आकारवाले, हास्ययुक्त एवं धनुष - बाणयुक्त [ अपने ] पतिको देखकर रतिने उन्हें । तथा महेश्वरको प्रणाम किया ॥ १५ ॥
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७१२ कृतार्थाभूच्छिवं देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः प्राणनाथप्रदं पत्या जीवितेन पुनः पुनः कामस्य स्तुतिमाकर्ण्य सनारीकस्य शङ्करः प्रसन्नोऽभवदत्यंतमुवाच करुणार्द्रधीः शङ्कर उवाच प्रसन्नोऽहं तव स्तुत्या सनारीकस्य चित्तज स्वयंभव वरं ब्रूहि वाञ्छितं तद् ददामि ते ब्रह्मोवाच इति शम्भुवचः श्रुत्वा महानंदः स्मरस्ततः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५१ । वह कृतार्थ हो गयी और हाथ जोड़कर [ अपने ] ॥ १६ जीवित पतिके साथ प्राणनाथ [ कामदेव ] -को | करनेवाले देव शंकरकी स्तुति करने लगी प्रदान पत्नीसहित कामकी ॥ १६ ॥
। स्तुति सुनकर भगवान् शंकर ॥ १७ अत्यन्त प्रसन्न हो गये और करुणासे आर्द्र होकर कहने लगे— ॥ १७ ॥
शंकरजी बोले- हे काम! स्त्रीसहित तुम्हारी । स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ । हे स्वयम्भव! अब तुम अभीष्ट ॥ १८ वर माँगो, मैं उसे तुम्हें देता हूँ ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले- शिवजीका ऐसा वचन सुनकर । कामदेव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और विनम्र होकर उवाच साञ्जलिर्नम्रो गद्गदाक्षरया गिरा ॥ १ ९ हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोले -॥१ ९ ॥ काम उवाच देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो यदि प्रसन्नः सर्वेश ममानन्दकरो भव क्षमस्व मेऽपराधं हि यत्कृतश्च पुरा प्रभो स्वजनेषु परां प्रीतिं भक्तिं देहि स्वपादयोः ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य स्मरवचः प्रसन्नः परमेश्वरः । ओमित्युक्त्वाब्रवीत्तं वै विहसन्करुणानिधिः ईश्वर उवाच हे कामाहं प्रसन्नोऽस्मि भयं त्यज महामते । गच्छ विष्णुसमीपं च बहिःस्थाने स्थितो भव ब्रह्मोवाच
तच्छ्रुत्वा शिरसा नत्वा परिक्रम्य स्तुवन्विभुम् ।
बहिर्गत्वा हरिं देवान् प्रणम्य समुपास्त सः ॥
कामं सम्भाष्य देवाश्च ददुस्तस्मै शुभाशिषम् ।
विष्ण्वादयः प्रसन्नास्ते प्रोचुः स्मृत्वा शिवं हृदि ॥
देवा ऊचुः धन्यस्त्वं स्मर सन्दग्धः शिवेनानुग्रहीकृतः । जीवयामास सत्त्वांशकृपादृष्ट्याखिलेश्वरः ॥ कामदेव बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे । करुणासागर! हे प्रभो! हे सर्वेश! यदि आप प्रसन्न ॥ २० हैं, तो मुझे आनन्द प्रदान कीजिये ॥२० ॥
। हे प्रभो! मैंने पूर्व समयमें जो अपराध किया है, ॥ २१ उसे क्षमा कीजिये । स्वजनोंमें परम प्रीति और अपने चरणोंमें भक्ति दीजिये ॥ २१ ॥
ब्रह्माजी बोले- कामदेवकी यह बात सुनकर करुणासागर परमेश्वर प्रसन्न हो ' तथास्तु ' – ऐसा ॥ २२ कहकर हँसते हुए उनसे पुनः कहने लगे - ॥ २२ ॥
ईश्वर बोले— हे काम! हे महामते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम भयका त्याग करो और विष्णुके समीप ॥ २३ जाओ तथा बाहर स्थित हो जाओ ॥ २३ ॥
ब्रह्माजी बोले — यह सुनकर वह कामदेव सिर झुकाकर प्रभुको प्रणाम करके परिक्रमाकर उनकी स्तुति २४ करते हुए बाहर जाकर विष्णु एवं अन्य देवताओंको । प्रणामकर उनकी उपासना करने लगा ॥२४ ॥
देवताओंने कामदेवसे सम्भाषणकर कल्याणकारी २५ आशीष प्रदान किया, इसके बाद प्रसन्नतापूर्वक | शिवजीका हृदयमें स्मरण करके वे विष्णु आदि उनसे कहने लगे- ॥ २५ ॥
देवता बोले- हे काम! तुम धन्य हो, जो | शिवजीके द्वारा दग्ध हो जानेके बाद भी उनके अनुग्रह - पात्र बने और अखिलेश्वरने सात्त्विक २६ । कृपादृष्टिसे तुम्हें जीवित कर दिया ॥ २६ ॥
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अ ० ५१ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७१३ न चान्योऽस्ति यतः स्वकृतभुक् पुमान् । काले सुखदुःखदो रक्षा विवाहश्च निषेकः केन वार्यते ॥ २७ ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा ते च सम्मान्य तं सुखेनामरास्तदा ।
सन्तस्थुस्तत्र विष्ण्वाद्याः सर्वे लब्धमनोरथाः ॥ २८
सोऽपि प्रमुदितस्तत्र समुवास शिवाज्ञया ।
जयशब्दो नमः शब्दः साधुशब्दो बभूव ह ॥ २ ९
ततः शम्भुर्वासगेहे वामे संस्थाप्य पार्वतीम् ।
मिष्टान्नं भोजयामास तं च सा च मुदान्विता ॥ ३०
अथ शम्भुर्भवाचारी तत्र कृत्यं विधाय तत् ।
मेनामामन्त्र्य शैलं च जनवासं जगाम सः ॥ ३१
महोत्सवस्तदा चासीद् वेदध्वनिरभून्मुने ।
वाद्यानि वादयामासुर्जनाश्चतुर्विधानि च ॥ ३२
शम्भुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च मुनींस्तदा ।
हरिं च मां भवाचाराद्वन्दितोऽभूत्सुरादिभिः ॥ ३३
जयशब्दो बभूवाथ नमश्शब्दस्तथैव च ।
वेदध्वनिश्च शुभदः सर्वविघ्नविदारणः ॥ ३४
अथ विष्णुरहं शक्रः सर्वे देवाश्च सर्षयः ।
सिद्धा उपसुरा नागास्तुष्टुवुस्ते पृथक्पृथक् ॥ ३५
देवा ऊचुः
जय शम्भोऽखिलाधार जय नाम महेश्वर ।
जय रुद्र महादेव जय विश्वम्भर प्रभो ॥ ३६
* प्रकारके बाजे बताये गये हैं, कोई भी किसीको सुख - दुःख देनेवाला नहीं है, पुरुष स्वयं अपने किये हुए कर्मका फल भोगता है । समयके आनेपर रक्षा, विवाह तथा जन्म होता है, उसे कौन रोक सकता है? ॥ २७ ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर उनका सत्कार करके सफल मनोरथवाले वे सभी विष्णु आदि देवगण सुखपूर्वक वहीं स्थित हो गये ॥ २८ ॥
कामदेवने भी प्रमुदित होकर शिवजीकी आज्ञासे वहीं निवास किया । उस समय जय शब्द, नमःशब्द और साधु शब्द होने लगा ॥२ ९ ॥ उसके बाद शिवजीने अपने निवासगृहमें पार्वतीको बायीं ओर बैठाकर उन्हें मिष्टान्नका भोजन कराया और उन्होंने भी परम प्रसन्न होकर उन शिवजीको भोजन कराया ॥३० ॥
इस प्रकार लोकाचारमें लगे हुए वे शम्भु वहाँका कृत्य करके मेना तथा हिमालयसे आज्ञा लेकर जनवासमें चले गये ॥३१ ॥
हे मुने! उस समय महोत्सव होने लगा, वेदध्वनि होने लगी तथा लोग चारों प्रकारके बाजे * * बजाने लगे ॥३२ ॥
शिवजीने अपने स्थानपर आकर मुनियोंको, मुझे तथा विष्णुको प्रणाम किया । देवता आदिने लोकाचारके कारण उनको भी प्रणाम किया ॥३३ ॥
उस समय जय शब्द और नमः शब्दका उच्चारण होने लगा और सभी प्रकारके विघ्नोंको दूर करनेवाली मंगलदायिनी वेदध्वनि होने लगी ॥ ३४ ॥
विष्णु, मैं, इन्द्र, सभी देवगण, ऋषि, सिद्ध, उपदेव एवं नाग अलग - अलग शिवजीकी स्तुति करने लगे - ॥ ३५ ॥
देवता बोले- हे शंकर! हे सर्वाधार! आपकी जय हो । हे महेश्वर! आपकी जय हो । हे रुद्र! हे महादेव! हे विश्वम्भर! हे प्रभो! आपकी जय हो । संसारके सभी प्राचीन अथवा अर्वाचीन वाद्य उन्हींके अन्तर्गत हैं । उनके अमरकोशमें जो चार और घन । ' तत ' वह बाजा है, जिसमें तारका विस्तार हो - जैसे वीणा, सितार नाम इस प्रकार हैं - तत, आनद्ध, सुषिर ' ' कहलाता है - जैसे ढोल, मृदंग, नगारा आदि । जिसमें छेद आदि । जिसे चमड़ेसे मढ़ाकर कसा गया हो, वह आनद्ध ' ' कहते हैं- जैसे वंशी, शंख, विगुल, हारमोनियम हो और उसमें हवा भरकर स्वर निकाला जाता हो, उसे सुषिर आदि । काँसेके झाँझ आदिको ' घन ' कहते हैं ।
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७१४ जय कालीपते स्वामिन् जयानन्दप्रवर्धक जय त्र्यम्बक सर्वेश जय मायापते विभो जय निर्गुण निष्काम कारणातीत सर्वग जय लीलाखिलाधार धृतरूप नमोऽस्तु ते जय स्वभक्तसत्कामप्रदेश करुणाकर श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५२ । । हे कालीपते! हे स्वामिन्! हे आनन्दप्रवर्धक! आपकी ॥ ३७ / जय हो । हे त्र्यम्बक! हे सर्वेश! आपकी जय हे मायापते! हे विभो! आपकी जय हो ॥ हो ॥ हे निर्गुण! हे निष्काम! हे कारणातीत ३६-३७ ॥ ! हे ॥ ३८ सर्वग! आपकी जय हो । हे सम्पूर्ण लीलाओंके । आधार! आपकी जय हो । हे अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥!
। अपने भक्तोंकी कामनाको पूर्ण करनेवाले हे जय सानन्दसद्रूप जय मायागुणाकृते ॥ ३ ९ ईश! हे करुणासागर! आपकी जय हो । हे आनन्दमय! जयोग्र मृड सर्वात्मन् दीनबन्धो दयानिधे जयाविकार मायेश वाङ्मनोऽतीतविग्रह ब्रह्मोवाच इति स्तुत्वा महेशानं गिरिजानायकं प्रभुम् । सिषेविरे परप्रीत्या विष्ण्वाद्यास्ते यथोचितम् अथ शम्भुर्महेशानो लीलात्ततनुरीश्वरः । ददौ मानवरं तेषां सर्वेषां तत्र नारद
विष्ण्वाद्यास्तेऽखिलास्तात प्राप्याज्ञां परमेशितुः ।
अतिहृष्टाः प्रसन्नास्याः स्वस्थानं जग्मुरादृताः ॥
हे सुन्दररूपवाले! आपकी जय हो । हे मायासे सगुण रूप धारण करनेवाले! आपकी जय हो ॥ ३ ९ ॥ । हे उग्र! हे मृड! हे सर्वात्मन्! हे दीनबन्धो! हे ॥ ४० दयानिधे! आपकी जय हो । हे अविकार! हे मायेश! हे वाणी तथा मनसे अतीत स्वरूपवाले! आपकी जय हो ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] इस प्रकार गिरिजापति महेश्वर प्रभुकी स्तुतिकर वे विष्णु आदि ॥ ४१ देवगण परम प्रीतिसे शिवजीकी यथोचित सेवा करने लगे ॥ ४१ ॥
हे नारद! तब लीलासे शरीर धारण करनेवाले ॥ ४२ महेश्वर भगवान् शम्भुने उन सबको श्रेष्ठ सम्मान प्रदान किया ॥ ४२ ॥
हे तात! इसके बाद वे विष्णु आदि सभी लोग महेश्वरकी आज्ञा प्राप्त करके अत्यन्त हर्षित, प्रसन्नमुख तथा सम्मानित होकर अपने - अपने स्थानको चले ४३ | गये ॥ ४३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे ब्रह्मनारदसंवादे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे कामसंजीवनवर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत ॥ ५१ ॥
कामसंजीवनवर्णन द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥
अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः हिमालयद्वारा सभी बरातियोंको भोजन कराना निर्मित वासगृहमें, शिवका विश्वकर्माद्वारा शयन करके प्रातःकाल जनवासेमें ब्रह्मोवाच आगमन अथ शैलवरस्तात हिमवान्भाग्यसत्तमः ब्रह्माजी बोले- हे तात! इसके बाद भाग्यवान् प्राङ्गणं रचयामास भोजनार्थं । । एवं बुद्धिमान् पर्वतश्रेष्ठ हिमालयने सबको भोजन विचक्षणः ॥ १ करानेके लिये आँगनकोसजाया ॥१ ॥
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अ ० ५२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७१५
मार्जनं लेपनं सम्यक्कारयामास तस्य सः ।
स सुगन्धैरलञ्चक्रे नानावस्तुभिरादरात् ॥
अथ शैलः सुरान् सर्वानन्यानपि च सेश्वरान् ।
भोजनायाह्वयामास पुत्रैः शैलैः परैरपि ॥
शैलाह्वानमथाकर्ण्य स प्रभुः साच्युतो मुने ।
सवैः सुरादिभिस्तत्र भोजनाय ययौ मुदा ॥
गिरिः प्रभुं च सर्वांस्तान् सुसत्कृत्य यथाविधि ।
मुदोपवेशयामास सत्पीठेषु गृहान्तरे ॥
नानासुभोज्यवस्तूनि परिवेष्य च तत्पुनः ।
साञ्जलिर्भोजनायाज्ञां चक्रे विज्ञप्तिमानतः ॥
अथ सम्मानितास्तत्र देवा विष्णुपुरोगमाः ।
सदाशिवं पुरस्कृत्य बुभुजुः सकलाश्च ते ॥
तदा सर्वे हि मिलिता ऐकपद्येन सर्वशः ।
पंक्तिभूताश्च बुभुजुर्विहसन्तः पृथक्पृथक् ॥
नन्दिभृंगिवीरभद्रवीरभद्रगणाः पृथक् ।
बुभुजुस्ते महाभागाः कुतूहलसमन्विताः ॥
देवाः सेन्द्रा लोकपाला नानाशोभासमन्विताः ।
बुभुजुस्ते महाभागा नानाहास्यरसैस्सह ॥
सर्वे च मुनयो विप्रा भृग्वाद्या ऋषयस्तथा ।
बुभुजुः प्रीतितः सर्वे पृथक् पंक्तिगतास्तदा ॥
तथा चण्डीगणाः सर्वे बुभुजुः कृतभोजनाः ।
कुतूहलं प्रकुर्वन्तो नानाहास्यकरा मुदा ॥
एवं ते भुक्तवन्तश्चाचम्य सर्वे मुदान्विताः । विश्रामार्थं गताः प्रीत्या विष्ण्वाद्याः स्वं स्वमाश्रमम् ॥ उन्होंने अच्छी प्रकारसे उसका मार्जन तथा २ लेपन कराया और अनेक प्रकारकी सुगन्धित वस्तुओंसे आदरपूर्वक उसे अलंकृत कराया ॥२ ॥
तदनन्तर अपने पुत्रों तथा अन्य पर्वतोंद्वारा ३ शंकरजी- सहित सभी देवगणों तथा अन्य लोगोंको भोजनके लिये बुलवाया ॥३ ॥
हे मुने! हिमालयके आमन्त्रणको सुनकर विष्णु ४ तथा सभी देवता आदिके साथ वे प्रभु प्रसन्नताके साथ भोजनके लिये वहाँ गये ॥४ ॥
हिमालयने प्रभु तथा उन सभी देवगणोंका ५ यथोचित सत्कार करके घरके भीतर उत्तम आसनोंपर प्रसन्नताके साथ बैठाया और उन्हें अनेक प्रकारकी सुभोज्य वस्तुओंको परोसकर नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर ६ भोजनके लिये प्रार्थना की ॥ ५-६ ॥ उसके बाद विष्णु आदि सभी देवता [ हिमालयसे ] ७ इस प्रकार सम्मानित होकर सदाशिवको आगेकर भोजन करने लगे ॥७ ॥
उस समय सभी देवगण मिलकर एक साथ ८ पंक्तिबद्ध होकर [ परस्पर ] हास्य करते हुए अलग-अलग भोजन करने लगे ॥ ८ ॥
महाभाग नन्दी, भृंगी, वीरभद्र तथा वीरभद्रके ९ गण पृथक् होकर कौतूहलमें भरकर भोजन करने लगे॥९॥
अनेक प्रकारकी शोभासे सम्पन्न महाभाग इन्द्र १० आदि लोकपाल तथा देवगण अनेक प्रकारके हास-परिहासके साथ भोजन करने लगे ॥१० ॥
सभी मुनि, ब्राह्मण तथा भृगु आदि ११ ऋषिगण आनन्दके साथ पृथक् पंक्तिमें बैठकर भोजन करने लगे ॥११ ॥
इसी प्रकार चण्डीके सभी गणोंने भी भोजन १२ किया । वे भोजन करनेके बाद प्रसन्नतापूर्वक कौतूहल करते हुए अनेक प्रकारके हास - परिहास कर रहे थे ॥१२ ॥
इस तरह विष्णु आदि उन सभी देवताओंने आनन्दके साथ भोजन किया, फिर आचमन करके विश्रामके लिये वे प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने निवासस्थानको चले गये ॥ १३ ॥
१३
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७१६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
मेनाज्ञया स्त्रियः साध्व्यः शिवं सम्प्रार्थ्य भक्तितः ।
गेहे निवासयामासुर्वासाख्ये परमोत्सवे ॥
रत्नसिंहासने शम्भुः मेनादत्ते मनोहरे ।
सन्निधाय मुदा युक्तो ददृशे वासमन्दिरम् ॥
रत्नप्रदीपशतकैर्ज्वलद्भिर्ज्वलितं श्रिया ।
रत्नपात्रघटाकीर्णं मुक्तामणिविराजितम् ॥
रत्नदर्पणशोभाढ्यं मण्डितं श्वेतचामरैः ।
मुक्तामणिसुमालाभिर्वेष्टितं परमर्द्धिमत् ॥
अनौपम्यं महादिव्यं विचित्रं सुमनोहरम् ।
चित्ताह्लादकरं नानारचनारचितस्थलम् ॥
शिवदत्तवरस्यैव प्रभावमतुलं परम् ।
दर्शयन्तं समुल्लासि शिवलोकाभिधानकम् ॥
नानासुगन्धसद्द्रव्यैर्वासितं सुप्रकाशकम् ।
चन्दनागरुसंयुक्तं पुष्पशय्यासमन्वितम् ॥
नानाचित्रविचित्राढ्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ।
रत्नेन्द्रसाररचितैराचितं हारकैर्वरै:: ॥
कुत्रचित्सुरनिर्माणं वैकुण्ठं सुमनोहरम् ।
कुत्रचिच्च ब्रह्मलोकं लोकपालपुरं क्वचित् ॥
कैलासं कुत्रचिद्रम्यं कुत्रचिच्छक्रमन्दिरम् ।
कुत्रचिच्छिवलोकं च सर्वोपरि विराजितम् ॥
एतादृशं गृहं सर्वं दृष्ट्वाश्चर्यं महेश्वरः ।
प्रशंसन् हिमशैलेशं परितुष्टो बभूव ह ॥
तत्रातिरमणीये च रत्नपर्यङ्क उत्तमे ।
अशयिष्ट मुदा युक्तो लीलया परमेश्वरः ॥
५२ इधर, मेनाकी आज्ञासे सभी पतिव्रता १४ स्त्रियाँ भक्तिपूर्वक शिवसे प्रार्थनाकर वास नामक परमानन्ददायक निवासगृहमें ले गयीं ॥ १४ ॥
वहाँपर मेनाके द्वारा दिये गये मनोहर रत्नके १५ सिंहासनपर बैठकर प्रसन्नतापूर्वक शिवजी वासगृहको देखने लगे ॥१५ ॥
वह गृह सैकड़ों जलते हुए रत्नदीपकोंसे प्रकाशित १६ | तथा शोभासम्पन्न था, वहाँ अनेक प्रकारके रत्नोंक पात्र विराज रहे थे, उसमें स्थान - स्थानपर मोती तथा मणियाँ लगी हुई थीं । वह रत्नोंके दर्पणकी शोभासे १७ युक्त था, वह श्वेत वर्णके चँवरोंसे मण्डित था, उसमें मोतियों और मणियोंकी मालाएँ लगी हुई थीं । वह परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनुपम, महादिव्य, विचित्र, अत्यन्त मनोहर तथा चित्तको प्रसन्न करनेवाला था १८ और उसके प्रत्येक स्थलमें नाना प्रकारकी कारीगरी की गयी थी॥१६–१८ ॥ वह गृह शिवके द्वारा दिये गये वरका अतुलनीय १ ९ प्रभाव प्रकट कर रहा था और शोभासे सम्पन्न होनेके कारण उस गृहका शिवलोक नामकरण किया गया था ॥१ ९ ॥ वह अनेक प्रकारके सुगन्धित उत्तम द्रव्योंसे २० सुवासित, उत्तम प्रकाशसे युक्त, चन्दन - अगरुयुक्त तथा पुष्पकी शय्यासे समन्वित था ॥२० ॥
वह गृह विश्वकर्माके द्वारा रचित नाना प्रकारके २१ चित्रोंकी विचित्रतासे युक्त था, उसमें सभी उत्तम रत्नोंके सारोंसे रचित श्रेष्ठ हारोंके ढेर लगे हुए थे ॥ २१ ॥
कहीं देवताओंके लिये अत्यन्त मनोहर वैकुण्ठ २२ बना हुआ था, कहीं ब्रह्मलोक बना हुआ था, कहा | लोकपालोंका पुर बना हुआ था, कहीं मनोहर कैलास | बना हुआ था, कहीं इन्द्रका मन्दिर बना हुआ था और २३ कहीं सबके ऊपर शिवलोक सुशोभित हो रहा था ॥ २२-२३ ॥ आश्चर्यचकित करनेवाले ऐसे घरको देखकर २४ शिवजी गिरिराज हिमालयकी प्रशंसा करते हुए परम प्रसन्न हो गये ॥२४ ॥
उसके बाद शिवजीने परम रमणीय तथा उत्तम २५ रत्न - पर्यंकपर प्रसन्न हो लीलापूर्वक किया ॥ २५ ॥
शयन
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अ ० ५२ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७१७
हिमाचलश्च स्वभ्रातॄन्भोजयामास कृत्स्नशः ।
सर्वानन्यांश्च सुप्रीत्या शेषकृत्यं चकार ह ॥ २६
एवं कुर्वति शैलेशे स्वपिति प्रेष्ठ ईश्वरे ।
व्यतीता रजनी सर्वा प्रातःकालो बभूव ह ॥ २७
अथ प्रभातकाले च धृत्युत्साहपरायणाः ।
नानाप्रकारवाद्यानि वादयाञ्चक्रिरे जनाः ॥ २८
सर्वे सुराः समुत्तस्थुर्विष्ण्वाद्याः सुमुदान्विताः ।
स्वेष्टं संस्मृत्य देवेशं सज्जीभूताः ससंभ्रमाः ॥ २ ९
स्ववाहनानि सज्जानि कैलासं गन्तुमुत्सुकाः ।
कृत्वा सम्प्रेषयामासुर्धर्मं शिवसमीपतः ॥ ३०
वासगेहमथागत्य धर्मो नारायणाज्ञया ।
उवाच शंकरं योगी योगीशं समयोचितम् ॥ ३१
धर्म उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते भव नः प्रमथाधिप ।
जनावासं समागच्छ कृतार्थं कुरु तत्र तान् ॥ ३२ ।
ब्रह्मोवाच
इति धर्मवचः श्रुत्वा विजहास महेश्वरः ।
ददर्श कृपया दृष्ट्या तल्पमुज्झाञ्चकार ह ॥ ३३
उवाच विहसन् धर्मं त्वमग्रे गच्छ तत्र ह ।
अहमप्यागमिष्यामि द्रुतमेव न संशयः ॥ ३४
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तः शंकरेणाथ जनावासं जगाम सः ।
स्वयं गन्तुमना आसीत्तत्र शम्भुरपि प्रभुः ॥ ३५
तज्ज्ञात्वा स्त्रीगणः सोऽसौ तत्रागच्छन्महोत्सवः ।
चक्रे मङ्गलगानं हि पश्यन् शम्भुपदद्वयम् ॥ ३६
अथ शम्भुर्भवाचारी प्रातःकृत्यं विधाय च ।
मेनामामन्त्र्य कध्रं च जनावासं जगाम सः ॥ ३७
महोत्सवस्तदा चासीद्वेदध्वनिरभून्मुने ।
वाद्यानि वादयामासुर्जनाश्चतुर्विधानि च ॥ ३८
शम्भुरागत्य स्वस्थानं ववन्दे च मुनींस्तदा ।
हरिं च मां भवाचाराद वन्दितोऽभूत्सुरादिभिः ॥ ३ ९
हिमालयने अपने सभी भाइयोंको तथा अन्य लोगोंको बड़े प्रेमसे भोजन कराया तथा शेष कृत्य पूर्ण किया ॥ २६ ॥
इस प्रकार हिमालयको सब कार्य पूर्ण करते हुए एवं ईश्वर शिवजीके शयन करते हुए सारी रात बीत गयी और प्रभातकाल उपस्थित हो गया ॥ २७ ॥
तब प्रात: काल होनेपर धैर्य एवं उत्साहसे भरे हुए लोग अनेक प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥२८ ॥
विष्णु आदि सभी देवगण उठ गये और अपने इष्टदेव शंकरका स्मरणकर प्रसन्नताके साथ शीघ्रतासे सज्जित होकर तैयार हो गये । अपने - अपने वाहनोंको सजाकर कैलास जानेके लिये उत्सुक उन लोगोंने शिवजीके समीप धर्मको भेजा । तत्पश्चात् नारायणकी आज्ञासे निवासगृहमें आकर योगी धर्म योगीश्वर शंकरसे समयोचित वचन कहने लगे- ॥ २ ९ -३१ ॥ धर्म बोले - हे भव! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो । हे प्रमथाधिप! जनवासेमें चलिये और वहाँ उन सभीको कृतार्थ कीजिये ॥३२ ॥
ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] धर्मराजके इस वचनको सुनकर शिवजी हँसे । उन्होंने कृपादृष्टिसे धर्मकी ओर देखा और शय्याका परित्याग किया । वे हँसते हुए धर्मसे कहने लगे - तुम आगे चलो, मैं भी वहाँ शीघ्र ही आऊँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ ब्रह्माजी बोले- शंकरजीके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर धर्मराज जनवासेमें गये और बादमें स्वयं प्रभु शंकरजी भी वहाँ जानेका विचार करने लगे ॥ ३५ ॥
इसे जानकर स्त्रियाँ आनन्दमें भरकर वहाँ पहुँच गयीं और शिवके दोनों चरणोंको देखती हुई मंगलगान करने लगीं । इसके बाद वे शिवजी लोकाचार प्रदर्शित करते हुए प्रातःकृत्य करके मेना एवं पर्वतराजसे आज्ञा लेकर जनवासेमें गये ॥ ३६-३७ ॥ हे मुने! उस समय महोत्सव होने लगा, वेदध्वनि होने लगी और लोग चारों प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥ ३८ ॥
शिवजीने अपने स्थानपर आकर मुनियोंको, मुझे तथा विष्णुको प्रणाम किया तथा देवता आदिने भी लौकिक आचारवश उनकी वन्दना की ॥ ३ ९ ॥
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७१८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५३ जयशब्दो बभूवाथ नमः शब्दस्तथैव च । [ उस समय चारों ओर ] जय शब्द, नमः | और मंगलदायक वेदध्वनि होने लगी, इस प्रकार शब्द वेदध्वनिश्च शुभदो महाकोलाहलोऽभवत् ॥ ४० । महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥४० ॥ वहाँ
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे वरवर्गभोजन-शिवशयनवर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें वरवर्गका भोजन और शिवशयन - वर्णन नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥
अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः चतुर्थीकर्म, बरातका कई दिनोंतक ठहरना, सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका बरातको विदा करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी कन्या सौंपना तथा बरातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना ब्रह्मोवाच
अथ विष्ण्वादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः ।
कृत्वावश्यककर्माणि यात्रां सन्तेनिरे गिरेः ॥
ततो गिरिवरः स्नात्वा स्वेष्टं सम्पूज्य यत्नतः ।
पौरबन्धून्समाहूय जनवासं ययौ मुदा ॥
तत्र प्रभुं प्रपूज्याथ चक्रे सम्प्रार्थनां मुदा ।
कियद्दिनानि सन्तिष्ठ मद्गेहे सकलैः सह ॥
विलोकनेन ते शम्भो कृतार्थोऽहं न संशयः ।
धन्यश्च यस्य मद्गेहे आयातोऽसि सुरैः सह ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा बहु शैलेशः करौ बद्ध्वा प्रणम्य च ।
प्रभुं निमन्त्रयामास सह विष्णुसुरादिभिः ॥
अथ ते मनसा गत्वा शिवं संयुतमादरात् ।
प्रत्यूचुर्मुनयो देवा हृष्टा विष्णुसुरादिभिः॥
देवा ऊचुः
धन्यस्त्वं गिरिशार्दूल तव कीर्तिर्महीयसी ।
त्वत्समो न त्रिलोकेषु कोऽपि पुण्यतमो जनः ॥
यस्य द्वारि महेशानः परब्रह्म सतां गतिः ।
समागतः सदासैश्च कृपया भक्तवत्सलः ॥
ब्रह्माजी बोले - [ हे नारद! ] तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवगण एवं तपोधन मुनिगण आवश्यक १ कर्म करके हिमालयसे प्रस्थान करनेका उपक्रम करने लगे ॥१ ॥
हिमालय भी स्नानकर अपने इष्टदेवकी यत्नपूर्वक २ पूजा करके नगरवासियों एवं बन्धुवर्गोंको बुलाकर प्रसन्नतापूर्वक जनवासेमें गये । उन्होंने शंकरजीका विधिवत् पूजन करके आनन्दपूर्वक प्रार्थना की - आप ३ इन सभीके साथ कुछ दिनतक मेरे घरपर निवास कीजिये ॥ २-३ ॥ हे शम्भो! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ तथा धन्य ४ हो गया हूँ, इसमें संशय नहीं है, जो कि आप देवताओंके साथ मेरे घर आये हैं ॥४ ॥
ब्रह्माजी बोले- शैलराजने इस प्रकार बहुत | कहकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करके विष्णु आदि ५ । देवगणोंके साथ प्रभुको आमन्त्रित किया । तत्पश्चात् | आदरके साथ मनमें शिवजीका ध्यानकर विष्णु के | सहित देवता तथा मुनिगण प्रसन्नतापूर्वक हिमालय से ६ कहने लगे - ॥५-६ ॥ देवता बोले- हे गिरिराज! आप धन्य हैं और | आपकी कीर्ति महान् है, तीनों लोकोंमें आपके समान ७ पुण्यात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके द्वारपर सज्जनोंको गति देनेवाले, भक्तवत्सल एवं परब्रह्म महेश्वर अपने ८ सेवकोंके साथ कृपा करके पधारे ॥ ७-८ ॥
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अ ० ५३ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७१ ९
नावासोऽतिरम्यश्च सम्मानो विविधः कृतः ।
भोजनानि त्वपूर्वाणि न वर्ण्यानि गिरीश्वर ॥
चित्रं न खलु तत्रास्ति यत्र देवी शिवाम्बिका ।
परिपूर्णमशेषं च वयं धन्या यदागताः ॥ १०
ब्रह्मोवाच
इत्थं परस्परं तत्र प्रशंसाभवदुत्तमा ।
उत्सवो विविधो जातो वेदसाधुजयध्वनिः ॥११
अभून्मङ्गलगानं च ननर्ताप्सरसाङ्गणः ।
नुतिं चक्रुर्मागधाद्या द्रव्यदानमभूद् बहु ॥ १२
तत आमन्त्र्य देवेशं स्वगेहमगमगिरिः ।
भोजनोत्सवमा नानाविधिविधानतः ॥ १३
भोजनार्थं प्रभुं प्रीत्यानयामास यथोचितम् ।
परिवारसमेतं च सकुतूहलमीश्वरम् ॥ १४
प्रक्षाल्य चरणौ शम्भोर्विष्णोर्मम वरादरात् ।
सर्वेषाममराणां च मुनीनां च यथार्थतः ॥ १५
परेषां च गतानां च गिरीशो मण्डपान्तरे ।
आसयामास सुप्रीत्या तांस्तान्बन्धुभिरन्वितः ॥ १६
सुरसैर्विविधान्नैश्च तर्पयामास तान् गिरिः ।
बुभुजुर्निखिलास्ते वै शम्भुना विष्णुना मया ॥ १७
तदानीं पुरनार्यश्च गालीदानं व्यधुर्मुदा ।
मृदुवाण्या हसन्त्यश्च पश्यन्त्यो यत्नतश्च तान् ॥ १८
ते भुक्त्वाचम्य विधिवद्गिरिमामन्त्र्य नारद ।
स्वस्थानं प्रययुः सर्वे मुदितास्तृप्तिमागताः ॥ १ ९
इत्थं तृतीये घस्त्रेऽपि मानितास्तेऽभवन्मुने ।
गिरीश्वरेण विधिवद्दानमानादरादिभिः ॥ २०
चतुर्थे दिवसे प्राप्ते चतुर्थीकर्म शुद्धितः । आपने [ हमें ठहरनेके लिये ] मनोहर जनवासा दिया एवं विविध सम्मान किया । हे गिरीश्वर! आपने ऐसे उत्तम भोजन दिये, जो अवर्णनीय हैं ॥ ९ ॥
वहाँ कोई आश्चर्य नहीं, जहाँ [ साक्षात् ] अम्बिका शिवादेवी हैं । सब कुछ सर्वथा परिपूर्ण है, कुछ भी शेष नहीं रहा, हमलोग धन्य हैं, जो यहाँपर आ गये ॥१० ॥
ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] इस प्रकार वहाँ परस्पर एक - दूसरेकी उत्तम प्रशंसा हुई । उस समय वैदिक मन्त्रों, साधु तथा जय शब्दकी ध्वनि होने लगी और नाना प्रकारके उत्सव होने लगे ॥ ११ ॥
मंगलगान होने लगा, अप्सराएँ नाचने लगीं, मागध स्तुति करने लगे और द्रव्योंका पर्याप्त दान हुआ ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् देवेशका आमन्त्रणकर हिमालय अपने घर गये और अनेक विधि - विधानोंसे भोजनोत्सवकी तैयारी करने लगे ॥ १३ ॥
वे कुतूहलपूर्वक परिवारसहित प्रभु शंकरको भोजन करानेके लिये प्रेमके साथ ले आये ॥१४ ॥
परम आदरसे शिवजीके, विष्णुके, मेरे, सभी देवताओंके, मुनियोंके तथा अन्य गये हुए लोगोंके चरणोंको धोकर बन्धु - बान्धवोंसहित गिरिराजने बड़े प्रेमसे उन सबको मण्डपके भीतर [ आसन देकर ] बैठाया ॥ १५-१६ ॥ विष्णु, सदाशिव एवं मुझ ब्रह्मासहित समस्त लोग भोजन करने लगे । [ इस प्रकार ] गिरिराजने रसीले विविध अन्नोंसे उन सबको तृप्त किया । उस समय नगरकी नारियाँ हँसती हुई एवं उन सभीकी ओर यत्नसे देखती हुई मधुर वाणीमें गालियाँ देने लगीं ॥ १७-१८ ॥ हे नारद! इस प्रकार सब लोग विधिवत् भोजन करके आचमनकर गिरिराजसे आज्ञा लेकर प्रसन्नता एवं तृप्तिसे युक्त हो अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ १ ९ ॥ हे मुने! इसी प्रकार तीसरे दिन भी गिरिराजने विधिवत् दान, सम्मान एवं आदर आदिके द्वारा उनका सत्कार किया । चौथा दिन प्राप्त होनेपर बड़ी शुद्धताके
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७२० बभूव विधिवद्येन विना खण्डित एव सः
उत्सवो विविधश्चासीत्साधुवादजयध्वनिः ।
बहुदानं सुगानं च नर्तनं विविधं तथा ॥
पञ्चमे दिवसे प्राप्ते सर्वे देवा मुदान्विताः विज्ञप्तिं चक्रिरे शैलं यात्रार्थमतिप्रेमतः ॥ तदाकर्ण्य गिरीशश्चोवाच देवान् कृताञ्जलिः । कियद्दिनानि तिष्ठन्तु कृपां कुर्वन्तु मां सुराः
इत्युक्त्वा स्नेहतस्ताँश्च प्रभुं विष्णुं च मां परान् ।
वासयामास दिवसान् बहून्नित्यं समादरात् ॥
इत्थं व्यतीयुर्दिवसा बहवो वसतां च तत् ।
सप्तर्षीन्प्रेषयामासुर्गिरीशान्ते ततः सुराः ॥
ते तं सम्बोधयामासुर्मेनां च समयोचितम् ।
शिवतत्त्वं परं प्रोचुः प्रशंसन्विधिवन्मुदा ॥
अङ्गीकृतं गिरीशेन तत्तद्बोधनतो मुने । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५३ ॥ २१ साथ चतुर्थी कर्म विधिवत् सम्पन्न हुआ, जिसके बिना । वह उत्सव अधूरा ही रह जाता । उस समय अनेक | प्रकारका उत्सव, जय जयकार तथा साधु शब्दोंका २२ उच्चारण, नाना प्रकारका दान, गान एवं नृत्य होने लगा ॥ २०–२२ ॥ । पाँचवाँ दिन प्राप्त होनेपर प्रसन्न हुए सभी २३ देवताओंने बड़े प्रेमके साथ गिरिराजसे विदाईके लिये निवेदन किया । यह सुनकर हिमालयने हाथ जोड़कर देवताओंसे कहा — हे देवताओ! अभी आपलोग कुछ ॥ २४ दिन और रहें तथा मेरे ऊपर कृपा करें ॥ २३-२४ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने बड़े स्नेहसे शंकर, विष्णु, २५ मुझ ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंको बहुत दिनोंतक बड़े आदरके साथ ठहराया ॥ २५ ॥
इस प्रकार निवास करते हुए जब बहुत दिन २६ बीत गये, तब देवताओंने हिमालयके पास सप्तर्षियोंको भेजा ॥ २६ ॥
उन्होंने गिरिराज तथा मेनाको समयोचित बातें २७ कहकर समझाया और प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक श्रेष्ठ शिवतत्त्वको विधिवत् प्रतिपादित किया ॥ २७ ॥
हे मुने! उनके समझानेसे हिमालयने उसे यात्रार्थमगमच्छम्भुः शैलेशं सामरादिकः ॥ २८ स्वीकार कर लिया । तब शिवजी विदा होनेके लिये
यात्रां कुर्वति देवेशे स्वशैलं सामरे शिवे ।
उच्चैः रुदोद सा मेना तमुवाच कृपानिधिम् ॥
मेनोवाच
कृपानिधे कृपां कृत्वा शिवां सम्पालयिष्यसि ।
सहस्त्रदोषं पार्वत्या आशुतोषः क्षमिष्यसि ॥
त्वत्पादाम्बुजभक्ता च मद्वत्सा जन्मजन्मनि ।
स्वप्ने ज्ञाने स्मृतिर्नास्ति महादेवं प्रभुं विना ॥
त्वद्भक्ति श्रुतिमात्रेण हर्षाश्रुपुलकान्विता ।
त्वन्निन्दया भवेन्मौना मृत्युंजय मृता इव ॥
देवताओंसहित हिमालयके घर गये ॥२८ ॥
जब देवेश शिव देवताओंसहित अपने २ ९ कैलासपर्वतके लिये यात्रा करने लगे, तब मेना ऊँचे स्वरसे रोने लगीं और कृपासागर शंकरजीसे कहने लगीं— ॥ २ ९ ॥ मेना बोलीं- कृपानिधे! आप कृपा करके भलीभाँति शिवाका पालन कीजियेगा, आप ३० | आशुतोष हैं, अतः पार्वतीके हजारों दोषोंको क्षमा ॥३० ॥
हे प्रभो! यह मेरी कन्या जन्म - जन्मान्तरसे ३१ आपके चरणकमलकी भक्त है, आप महादेव प्रभुको | छोड़कर इसे सोते अथवा जागते समय भी किसीका । स्मरण नहीं रहता । हे मृत्युंजय! आपकी भक्ति | सुननेमात्रसे ही यह हर्षके आँसू गिराती हुई पुलकित | हो जाती है और आपकी निन्दासे यह मौन हो ३२ । मृतकके समान हो जाती है ॥ ३१-३२ ॥