शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 731–740

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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अ ० ५४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७२१ ब्रह्मोवाच मेनका तस्मै समर्प्य स्वसुतां तदा । इत्युक्त्वा अत्युच्चै रोदनं कृत्वा मूर्च्छामाप तयोः पुरः ॥

अथ मेनां बोधयित्वा तामामन्त्र्य गिरिं तथा ।

चकार यात्रां देवैश्च महोत्सवपुरस्सरम् ॥

अथ ते निर्जराः सर्वे प्रभुणा स्वगणैः सह । यात्रां प्रचक्रिरे तूष्णीं गिरिं प्रति शिवं दधुः हिमाचलपुरीबाह्योपवने हर्षिताः सुराः । सेश्वराः सोत्सवास्तस्थुः पयैषन्त शिवागमम्

इत्युक्ता शिवसद्यात्रा देवैस्सह मुनीश्वर ।

आकर्णय शिवायात्रां विरहोत्सवसंयुताम् ॥

ब्रह्माजी बोले- तब ऐसा कहकर मेना उन्हें अपनी पुत्रीको समर्पितकर जोर - जोरसे रुदन करके ३३ उन दोनोंके सामने मूर्च्छित हो गयीं । तदनन्तर शंकरने मेनाको समझा करके और उनसे तथा हिमालयसे आज्ञा लेकर देवगणोंके साथ महोत्सवपूर्वक यात्रा ३४ की ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर सभी देवताओंने हिमालयके कल्याणकी || ३५ कामना करते हुए प्रभु तथा अपने गणोंके साथ मौन हो प्रस्थान किया ॥ ३५ ॥

[ कुछ दूर जाकर ] हर्षित देवता हिमालयकी ॥ ३६ पुरीके बाहर बगीचेमें शिवजीसहित आनन्दपूर्वक ठहर गये और शिवाके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ ३६ ॥

हे मुनीश्वर! इस प्रकार देवगणोंके सहित शिवकी उत्तम यात्राका वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया । अब उत्सव तथा [ विदाईके अनन्तर होनेवाले ] ३७ । विरहसे युक्त शिवाकी यात्रा सुनिये ॥३७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवयात्रावर्णनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवयात्रावर्णन नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मणपत्नीका पार्वतीको पातिव्रतधर्मका उपदेश देना ब्रह्मोवाच

अथ सप्तर्षयस्ते च प्रोचुर्हिमगिरीश्वरम् ।

कारय स्वात्मजादेव्या यात्रामद्योचितां गिरे ॥

इति श्रुत्वा गिरीशो हि बुद्ध्वा तद्विरहं परम् ।

विषण्णोऽभून्महाप्रेम्णा कियत्कालं मुनीश्वर ॥

कियत्कालेन सम्प्राप्य चेतनां शैलराट् ततः ।

तथास्त्विति गिरामुक्त्वा मेनां सन्देशमब्रवीत् ॥

शैलसन्देशमाकर्ण्य हर्षशोकवशा मुने ।

मेना संयापयामास ॥

कर्तुमासीत्समुद्यता ब्रह्माजी बोले- उसके बाद सप्तर्षियोंने हिमालयसे कहा — आज गिरिजाकी विदाईके लिये १ उत्तम मुहूर्त है, अतः आप अपनी पुत्री पार्वतीकी विदाई कर दीजिये ॥१ ॥

हे मुनीश्वर! यह बात सुनकर वे हिमालय २ पार्वतीवियोगजन्य दुःखका स्मरणकर कुछ देर लिये व्याकुल हो गये ॥२ ॥

फिर कुछ कालके अनन्तर चेतना प्राप्त होनेपर ३ ' ऐसा ही होगा ' - यह कहकर उन्होंने मेनाको सन्देश भेजा ॥ ३ ॥

हे मुने! शैलका सन्देश सुनकर मेना हर्ष तथा शोकसे युक्त हो गयीं और गिरिजाको विदा करानेके ४ लिये उद्यत हो गयीं ॥४ ॥

पृष्ठ 732

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७२२

श्रुतिस्वकुलजाचारं चचार विधिवन्मुने ।

उत्सवं विविधं तत्र सा मेना क्षितिभृत्प्रिया ॥

गिरिजां भूषयामास नानारत्नांशुकैर्वरैः ।

द्वादशाभरणैश्चैव शृङ्गारैर्नृपसम्मितैः ॥

मेनामनोगतिं बुद्ध्वा साध्व्येका द्विजकामिनी ।

गिरिजां शिक्षयामास पातिव्रत्यव्रतं परम् ॥

द्विजपत्न्युवाच

गिरिजे शृणु सुप्रीत्या मद्वचो धर्मवर्धनम् ।

इहामुत्रानन्दकरं शृण्वतां च सुखप्रदम् ॥

धन्या पतिव्रता नारी नान्या पूज्या विशेषतः ।

पावनी सर्वलोकानां सर्वपापौघनाशिनी ॥

सेवते या पतिं प्रेम्णा परमेश्वरवच्छिवे ।

इह भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते पत्या शिवां गतिम् ॥

पतिव्रता च सावित्री लोपामुद्रा ह्यरुन्धती ।

शाण्डिल्या शतरूपानसूया लक्ष्मीः स्वधा सती ॥

संज्ञा च सुमतिः श्रद्धा मेना स्वाहा तथैव च ।

अन्या बह्व्योऽपि साध्व्यो हि नोक्ता विस्तारजाद्भयात् ॥

पातिव्रत्यवृषेणैव ता गताः सर्वपूज्यताम् ।

ब्रह्मविष्णुहरैश्चापि मान्या जाता मुनीश्वरैः ॥

सेव्यस्त्वया पतिस्तस्मात्सर्वदा शङ्करः प्रभुः ।

दीनानुग्रहकर्ता च सर्वसेव्यः सतां गतिः ॥

महान्पतिव्रताधर्मः श्रुतिस्मृतिषु नोदितः । यथैव वर्ण्यते श्रेष्ठो न तथान्योऽस्ति निश्चितम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५४ हे मुने! हिमाचलप्रिया उन मेनाने प्रथम ५ | तथा अपने कुलकी रीति सम्पन्न की, फिर पार्वतीकी वेद | यात्राके निमित्त वे नाना प्रकारके मंगलविधान करने लगीं ॥५ ॥

उन्होंने पार्वतीको अनेक रत्नों तथा श्रेष्ठ वस्त्रोंसे ६ और राजकुलोचित शृंगारों तथा उत्तमोत्तम द्वादश आभरणोंसे अलंकृत किया । तदनन्तर मेनाके मनकी बात जानकर एक पतिव्रता ब्राह्मणपत्नी गिरिजाको ७ श्रेष्ठ पातिव्रत धर्मका उपदेश देने लगी - ॥६-७ ॥ ब्राह्मणपत्नी बोली- हे गिरिजे! तुम प्रेमपूर्वक मेरा यह वचन सुनो । मेरे ये वचन स्त्रियोंको इस लोक तथा परलोकमें सुख देनेवाले हैं तथा इनके सुननेसे भी ८ स्त्रियोंका कल्याण हो जाता है ॥ ८ ॥

इस जगत्में पतिव्रता नारी ही धन्य है, इसके ९ अतिरिक्त और कोई नारी पूजाके योग्य नहीं है । वह सब लोगोंको पवित्र करनेवाली तथा समस्त पापोंको दूर करनेवाली है ॥ ९ ॥

हे शिवे! जो स्त्री अपने स्वामीकी १० परमेश्वरके समान सेवा करती है, वह यहाँ अनेक भोगोंको भोगकर अन्तमें पतिके साथ उत्तम गतिको प्राप्त होती है ॥ १० ॥

सावित्री, लोपामुद्रा, अरुन्धती, शाण्डिल्या, ११ शतरूपा, अनसूया, लक्ष्मी, स्वधा, सती, संज्ञा, सुमति, श्रद्धा, मेना और स्वाहा आदि बहुत - सी पतिव्रताएँ हैं, जिन्हें विस्तारके भयसे यहाँ नहीं कह रही १२ हूँ ॥ ११-१२ ॥ ये सभी पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे ही जगत्में १३ मान्य तथा पूज्य हुईं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर एवं अन्य मुनीश्वरोंने भी इनका सम्मान किया है ॥ १३ ॥

इसलिये तुम्हें अपने पति शंकरकी विशेष रूप से १४ सेवा करनी चाहिये; क्योंकि ये दीनोंपर अनुग्रह | करनेवाले एवं पूज्य होनेके कारण सबके सेव्य हैं और सज्जनोंके गतिदाता हैं ॥ १४ ॥

पतिव्रताओंका धर्म महान् है, जिसका वर्णन श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें भरा हुआ है । निश्चय ही | पातिव्रत्यधर्म जितना श्रेष्ठ है उतना अन्य धर्म श्रेष्ठ १५ | नहीं है ॥१५ ॥,

पृष्ठ 733

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अ ० ५४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७२३ प्रिये पत्यौ पातिव्रत्यपरायणा । भुंज्या तिष्ठेत्तस्मिंञ्छिवे नारी सर्वथा सति तिष्ठति ॥

स्वप्यात्स्वपिति सा नित्यं बुध्येत्तु प्रथमं सुधीः ।

सर्वदा तद्धितं कुर्यादकैतवगतिः प्रिया ॥

अनलंकृतमात्मानं दर्शयेन्न क्वचिच्छिवे ।

कार्यार्थं प्रोषिते तस्मिन् भवेन्मण्डनवर्जिता ॥

पत्युर्नाम न गृह्णीयात् कदाचन पतिव्रता ।

आक्रुष्टापि न चाक्रोशेत्प्रसीदेत्ताडितापि च ।

हन्यतामिति च ब्रूयात्स्वामिन्निति कृपां कुरु ॥

आहूता गृहकार्याणि त्यक्त्वा गच्छेत्तदन्तिकम् ।

सत्वरं साञ्जलिः प्रीत्या सुप्रणम्य वदेदिति ॥

किमर्थं व्याहृता नाथ स प्रसादो विधीयताम् ।

तदादिष्टा चरेत्कर्म सुप्रसन्नेन चेतसा ॥

चिरं तिष्ठेन्न च द्वारे गच्छेन्नैव परालये ।

आदाय तत्त्वं यत्किंचित्कस्मैचिन्नार्पयेत्क्वचित् ॥

पूजोपकरणं सर्वमनुक्ता साधयेत्स्वयम् ।

प्रतीक्षमाणावसरं यथाकालोचितं हितम् ॥

न गच्छेत्तीर्थयात्रां वै पत्याज्ञां न विना क्वचित् ।

दूरतो वर्जयेत्सा हि समाजोत्सवदर्शनम् ॥

तीर्थार्थिनी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत् ।

तस्मिन्सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्राणि च न संशयः ॥

भुंज्यात्सा भर्तुरुच्छिष्टमिष्टमन्नादिकं च यत् ।

महाप्रसाद इत्युक्त्वा पतिदत्तं पतिव्रता ॥

अविभज्य न चाश्नीयाद्देवपित्रतिथिष्वपि ।

परिचारकवर्गेषु गोषु भिक्षुकुलेषु च ॥

स्त्रीको चाहिये कि जब अपना प्रिय पति भोजन १६ कर ले, तब स्वयं पतिभक्तिमें परायण होकर भोजन करे । हे शिव! जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्रीको भी खड़ा ही रहना चाहिये ॥ १६ ॥

पतिके सो जानेपर स्वयं शयन करे और उसके १७ उठनेसे पहले स्वयं जाग जाय, पतिका सर्वदा छलरहित हो हित करे । हे शिवे! कभी अलंकारसे रहित हो अपने स्वामीके सम्मुख न जाय । जब स्वामी १८ कार्यवश परदेश चला जाय, तो कभी शरीरका संस्कार एवं शृंगार न करे ॥ १७-१८ ॥ पतिव्रता स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका नाम कभी न ले, पतिके द्वारा क्रुद्ध होकर कठोर वचन कहनेपर भी १ ९ उसे बुरा वचन न कहे और पतिके शासित करनेपर भी प्रसन्न रहे । उस समय भी यही कहे कि स्वामिन्! और अधिक दण्ड देकर मेरे ऊपर कृपा कीजिये ॥ १ ९ ॥ पतिके बुलानेपर घरका सारा कामकाज २० छोड़कर उनके समीप जाय और शीघ्रतासे प्रणामकर हाथ जोड़कर उनसे प्रेमपूर्वक कहे । हे स्वामिन्! आपने किसलिये बुलाया है, कृपाकर आज्ञा दीजिये, २१ | इसके बाद उस आज्ञाको प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ दरवाजेपर खड़ी होकर बहुत कालतक इधर - उधर २२ न देखे और न तो दूसरेके घर जाय । किसीका भेद लेकर किसी अन्यके सामने उसको प्रकाशित न करे ॥ २२ ॥

बिना कहे ही पतिके लिये पूजनकी सामग्री प्रस्तुत २३ करे और पतिके हितके लिये निरन्तर अवसरकी प्रतीक्षा करती रहे । पतिकी आज्ञाके बिना कभी भी तीर्थयात्राके लिये न जाय और किसी समाज तथा उत्सवको देखनेके २४ लिये भी न जाय । जिस स्त्रीको तीर्थयात्राकी इच्छा हो, वह अपने स्वामीका चरणामृत लेकर सन्तुष्ट हो जाय; क्योंकि पतिके चरणोदकमें सभी तीर्थ एवं क्षेत्र निवास २५ करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २३–२५ ॥ पतिके भोजन करनेके पश्चात् उसका उच्छिष्ट जो भी इष्ट अन्नादि हो, उसे पतिप्रदत्त महाप्रसाद २६ समझकर पतिव्रता स्त्री भोजन करे । देवता, पितर, अतिथि, सेवक, गौ एवं भिक्षुकको बिना दिये अन्नका २७ भोजन न करे ॥ २६-२७ ॥

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७२४ संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्ययपराङ्मुखी भवेत्सा सर्वदा देवी पतिव्रतपरायणा

कुर्यात्पत्यननुज्ञाता नोपवासव्रतादिकम् ।

अन्यथा तत्फलं नास्ति परत्र नरकं व्रजेत् ॥

सुखपूर्वं सुखासीनं रममाणं यदृच्छया ।

आन्तरेष्वपि कार्येषु पतिं नोत्थापयेत्क्वचित् ॥

क्लीबं वा दुरवस्थं वा व्याधितं वृद्धमेव च ।

सुखितं दुःखितं वापि पतिमेकं न लंघयेत् ॥

स्त्रीधर्मिणी त्रिरात्रं च स्वमुखं नैव दर्शयेत् ।

स्ववाक्यं श्रावयेन्नापि यावत् स्नानान्न शुध्यति ॥

सुस्नाता भर्तृवदनमीक्षेतान्यस्य न क्वचित् ।

अथवा मनसि ध्यात्वा पतिं भानुं विलोकयेत् ॥

हरिद्राकुङ्कुमं चैव सिन्दूरं कज्जलादिकम् ।

कूर्पासकं च ताम्बूलं माङ्गल्याभरणादिकम् ॥

केशसंस्कारकबरीकरकर्णादिभूषणम् भर्तुरायुष्यमिच्छन्ती दूरयेन्न पतिव्रता ॥

न रजक्या न बन्धक्या तथा श्रमणया न च ।

न च दुर्भगया क्वापि सखित्वं कारयेत् क्वचित् ॥

पतिविद्वेषिणीं नारीं न सा संभाषयेत् क्वचित् ।

नैकाकिनी क्वचित्तिष्ठेन्नग्ना स्नायान्न च क्वचित् ॥

नोलूखले न मुसले न वर्द्धन्यां दृषद्यपि ।

न यंत्रके न देहल्यां सती न प्रवसेत् क्वचित् ॥

विना व्यवायसमयं प्रागल्भ्यं नाचरेत् क्वचित् ।

यत्र यत्र रुचिर्भर्तुस्तत्र प्रेमवती भवेत् ॥

हृष्टाहृष्टे विषण्णा स्याद्विषण्णास्ये प्रिये प्रिया ।

पतिव्रता भवेद्देवी सदा पतिहितैषिणी ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५४ । घरकी समग्र सामग्री ठीक तरहसे रखे ॥ २८ उत्साहयुक्त तथा सावधान रहे और अधिक व्यय, न नित्य । इस प्रकार सर्वदा पातिव्रत्यधर्मका पालन करे ॥ २८ करे, पतिकी आज्ञा बिना कोई उपवास तथा ॥ व्रत न २ ९ करे, अन्यथा उसका फल नहीं होता और तने नरककी प्राप्ति होती है । सुखपूर्वक आनन्दसे बैठे: | तथा अपनी इच्छासे रमण करते हुए पतिको आवश्यक हुए ३० कार्य आ पड़नेपर भी न उठाये । पति क्लीब, दुर्गतिमें पड़ा हुआ, वृद्ध, रोगी, सुखी अथवा दुखी चाहे जैसा ३१ ही क्यों न हो, उसका अपमान न करे ॥ २ ९ -३१ ॥ मासिक धर्म प्राप्त हो जानेपर आरम्भसे तीन ३२ रात्रिपर्यन्त अपना मुख पतिको न दिखाये और जबतक चौथे दिन स्नानसे शुद्ध न हो, अपना शब्द भी न सुनाये ॥३२ ॥

ऋतुस्नान करनेके पश्चात् पतिका ही मुख ३३ देखे, कभी अन्यका मुख न देखे अथवा पतिके न होनेपर पतिका ध्यानकर सूर्यका दर्शन करे ॥ ३३ ॥

पतिके आयुष्यकी इच्छा करनेवाली पतिव्रता ३४ स्त्रीको हरिद्रा, कुंकुम, सिन्दूर, काजल, कूर्पासक, ताम्बूल, मांगलिक आभूषण, केशोंका संस्कार, केशपाश बनाना, हाथमें कंगन एवं कानोंमें कर्णफूल नित्य ३५ धारण करना चाहिये, इसका परित्याग कभी किसी भी अवस्थामें न करे ॥ ३४-३५ ॥ धोबिन, वन्ध्या, व्यभिचारिणी, संन्यासिनी ३६ अथवा दुर्भाग्ययुक्त स्त्रीसे कभी मित्रता न करे । जो | स्त्री अपने पतिसे द्वेष करती हो, उससे बातचीत न ३७ | करे, कभी अकेली न रहे और न नग्न होकर कभी स्नान करे ॥ ३६-३७ ॥ ओखली, मूसल, बुहारी ( झाड़ ), सिल, लोढ़ा ३८ तथा देहलीपर सती स्त्री कभी न बैठे ॥ ३८ ॥

सहवासके अतिरिक्त और किसी समय ३ ९ पतिसे धृष्टता न करे । अपना पति जिससे प्रेम करे, उसीसे प्रेम करे ॥ ३ ९ ॥ पतिके प्रसन्न होनेपर प्रसन्न रहे, पतिके दुखी | होनेपर दुखी रहे तथा पतिके प्रियमें ही अपना प्रिय । समझे । इस प्रकार पतिव्रता स्त्री सदैव पतिके हितकी ४० इच्छा करे ॥४० ॥

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अ ० ५४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७२५

एकरूपा भवेत्पुण्या संपत्सु च विपत्सु च ।

विकृतिं स्वात्मनः क्वापि न कुर्याद्वैर्यधारिणी ॥ ४१

सर्पिर्लवणतैलादिक्षयेऽपि च पतिव्रता ।

पतिं नास्तीति न ब्रूयादायासेषु न योजयेत् ॥ ४२

विधेर्विष्णोर्हराद्वापि पतिरेकोऽधिको मतः ।

पतिव्रताया देवेशि स्वपतिश्शिव एव च ॥ ४३

व्रतोपवासनियमं पतिमुल्लंघ्य याचरेत् ।

आयुष्यं हर भर्तुर्मृता निरयमृच्छति ॥ ४४

उक्ता प्रत्युत्तरं दद्याद्या नारी क्रोधतत्परा ।

सरमा जायते ग्रामे शृगाली निर्जने वने ॥ ४५

उच्चासनं न सेवेत न व्रजेद्दुष्टसन्निधौ ।

न च कातरवाक्यानि वदेन्नारी पतिं क्वचित् ॥ ४६

अपवादं न च ब्रूयात्कलहं दूरतस्त्यजेत् ।

गुरूणां सन्निधौ क्वापि नोच्चैर्ब्रूयान्न वै हसेत् ॥ ४७

बाह्यादायान्तमालोक्य त्वरितान्नजलाशनैः ।

ताम्बूलैर्वसनैश्चापि पादसंवाहनादिभिः ॥ ४८

तथैव चाटुवचनैः खेदसन्नोदनैः परैः ।

या प्रियं प्रीणयेत्प्रीता त्रिलोकी प्रीणिता तया ॥ ४ ९

मितं ददाति जनको मितं भ्राता मितं सुतः ।

अमितस्य हि दातारं भर्तारं पूजयेत्सदा ॥ ५०

भर्ता देवो गुरुर्भर्ता धर्मतीर्थव्रतानि च ।

तस्मात्सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत् ॥ ५१

या भर्तारं परित्यज्य रहश्चरति दुर्मतिः ।

उलूकी जायते क्रूरा वृक्षकोटरशायिनी ॥ ५२

ताडिता ताडितुं चेच्छेत्सा व्याघ्री वृषदंशिका ।

कटाक्षयति यान्यं वै केकराक्षी तु सा भवेत् ॥ ५३

या भर्तारं परित्यज्य मिष्टमश्नाति केवलम् ।

ग्रामे वा सूकरी भूयाद्वल्गुवपि स्वविड्भुजा ॥ ५४

पतिव्रता स्त्री सदैव सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों अवस्थाओं में एकरूप रहे । विकार उपस्थित होनेपर कभी विकृत न हो और सदैव धैर्य धारण करे ॥ ४१ ॥

घी, नमक, तेल आदिके न होनेपर भी पतिव्रता स्त्री पतिसे ' नहीं है ' –ऐसा न कहे और पतिको किसी असाध्य कार्यमें नियुक्त न करे । ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवसे भी अधिक पतिका महत्त्व है । अत: हे देवेशि! पतिव्रता अपने पतिको साक्षात् शिवस्वरूप ही समझे ॥ ४२-४३ ॥ पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके जो स्त्री व्रत, उपवास तथा नियमादिका आचरण करती है, वह अपने | पतिकी आयुका हरण करती है और मरनेपर नरक प्राप्त करती है । जो स्त्री क्रुद्ध होकर पतिके कुछ कहनेपर उसका प्रत्युत्तर करती है, वह ग्रामकी कुतिया अथवा निर्जन वनमें शृगाली होती है ॥ ४४-४५ ॥ स्त्रीको चाहिये कि वह पतिसे ऊँचे स्थानपर न बैठे, दुष्टोंके समीप न जाय और कभी भी पतिसे कातर वाक्य न कहे । किसीकी निन्दा या आक्षेपयुक्त बात न कहे, दूरसे ही कलहका परित्याग करे, गुरुजनोंके समीप कभी जोरसे न बोले और न जोरसे हँसे ॥ ४६-४७ ॥ पतिको बाहरसे आया हुआ देखकर शीघ्रतासे अन्न, जल, भोजन, ताम्बूल, वस्त्र, पादसंवाहन, खेद दूर करनेवाले मीठे वचनके द्वारा जो स्त्री अपने स्वामीको प्रसन्न रखती है, मानो उसने त्रैलोक्यको प्रसन्न कर लिया ॥ ४८-४९ ॥ माता, पिता, पुत्र, भाई तो स्त्रीको बहुत थोड़ा ही सुख देते हैं, परंतु पति तो अपरिमित सुख देता है । इसलिये स्त्रीको चाहिये कि वह पतिका सदैव पूजन करे ॥ ५० ॥

पति ही देवता, गुरु, भर्ता, धर्म, तीर्थ एवं व्रतादि सब कुछ है । इसलिये सब कुछ छोड़कर एकमात्र पतिका ही पूजन करे । जो दुष्ट स्त्री अपने पतिको छोड़कर एकान्तमें दूसरेके पास जाती है, वह वृक्षके कोटरमें रहनेवाली उलूकी होती है ॥ ५१-५२ ॥ जो स्वामीके द्वारा ताड़न करनेपर स्वयं भी ताड़न / करना चाहती है, वह वृषभभक्षिणी व्याघ्री होती है । जो अपने पतिको छोड़कर अन्यसे कटाक्ष करती है, वह केकराक्षी होती है । जो अपने पतिको बिना दिये मिष्टान्न खा लेती है, वह ग्रामसूकरी अथवा अपनी विष्ठा खानेवाली वल्गु ( बकरी ) होती है ॥ ५३-५४ ॥

पृष्ठ 736

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७२६ या तुं कृत्य प्रियं ब्रूयान् मूका सा जायते खलु या सपत्नीं सदेर्थ्येत दुर्भगा सा पुनः पुनः दृष्टिं विलुप्य भर्त्तुर्या कञ्चिदन्यं समीक्षते काणा च विमुखी चापि कुरूपापि च जायते जीवहीनो यथा देहः क्षणादशुचितां व्रजेत् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५४ । जो अपने पतिको ' तू ' कहकर बोलती ॥ ५५ वह जन्मान्तरमें गूँगी होती है और जो अपनी है, | सपत्नी ( सौत ) - से डाह करती है, वह बारंबार विधवा होती है ॥ ५५ ॥

। जो अपने स्वामीकी दृष्टि बचाकर किसी अन्य ॥ ५६ पुरुषको देखती है, वह काणी, कुमुखी तथा कुरूपा होती है ॥५६ ॥

। जैसे जीवके बिना देह क्षणमात्रमें अशुचि हो भर्तृहीना तथा योषित्सुस्नाताप्यशुचिः सदा ॥ ५७ जाता है, उसी प्रकार अपने स्वामीके बिना स्त्री अच्छी सा धन्या जननी लोके स धन्यो जनकः पिता धन्यः स च पतिर्यस्य गृहे देवी पतिव्रता पितृवंश्याः मातृवंश्याः पतिवंश्यास्त्रयस्त्रयः पतिव्रतायाः पुण्येन स्वर्गे सौख्यानि भुंजते शीलभङ्गेन दुर्वृत्ताः पातयन्ति कुलत्रयम् पितुर्मातुस्तथा पत्युरिहामुत्रापि दुःखिता पतिव्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद्भुवम् तत्र तत्र भवेत्सा हि पापहन्त्री सुपावनी विभुः पतिव्रतास्पर्शं कुरुते भानुमानपि सोमो गन्धवहश्चापि स्वपावित्र्याय नान्यथा आपः पतिव्रतास्पर्शमभिलष्यन्ति सर्वदा । अद्य जाड्यविनाशो नो जातस्त्वद्यान्यपावनाः

भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च ।

भार्या धर्मफलावाप्त्यै भार्या सन्तानवृद्धये ॥

गृहे गृहे न किं नार्यो रूपलावण्यगर्विताः ।

परं विश्वेशभक्त्यैव लभ्यते स्त्री पतिव्रता ॥

तरह स्नान करनेपर भी अपवित्र ही रहती है ॥ ५७ ॥

। इस लोकमें उसकी माता धन्य है और उसके ॥ ५८ पिता भी धन्य हैं तथा उसका वह पति भी धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्रीका निवास होता है ॥ ५८ ॥

। पतिव्रता स्त्रीके पुण्यसे उसके पितृवंश, ॥ ५ ९ मातृवंश तथा पतिवंशके तीन - तीन पूर्वज स्वर्गमें सुख भोगते हैं ॥५ ९ ॥ । दुराचारिणी स्त्रियाँ अपने दुराचरणके द्वारा ॥ ६० माता - पिता तथा पति- इन तीनों कुलोंको नरकमें गिराती हैं और वे इस लोक तथा परलोकमें सदैव दुखी रहती हैं ॥ ६० ॥

। पतिव्रताके चरण जहाँ - जहाँ पड़ते हैं, वहाँ-॥ ६१ वहाँकी पृथिवी सदा पापका हरण करनेवाली तथा । अत्यन्त पवित्र हो जाती है । सर्वव्यापक सूर्य, चन्द्रमा ॥ ६२ तथा वायु भी अपनी पवित्रताके लिये ही पतिव्रताका स्पर्श करते हैं, अन्य किसी कारणसे नहीं ॥ ६१-६२ ॥ जल तो सदैव पतिव्रताका स्पर्श चाहते हैं, वे ॥ ६३ कहते हैं कि आज इस पतिव्रताके स्पर्शसे हमारी | जड़ता नष्ट हो गयी और हमें दूसरेको पवित्र करनेकी । योग्यता प्राप्त हुई । भार्या गृहस्थका मूल है, भार्या ही ६४ | सुखका मूल है, धर्मफलकी प्राप्ति एवं सन्तानवृद्धि । लिये भार्याकी अत्यन्त आवश्यकता है । क्या अपने घरों में | रूप, लावण्यका गर्व करनेवाली स्त्रियाँ प्रत्येक नहीं हैं, किंतु विश्वेश्वरमें भक्ति करनेसे ही पतिव्रता ६५ स्त्री प्राप्त होती है॥६३–६५ ॥

पृष्ठ 737

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अ ० ५४ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७२७

परलोकस्त्वयं लोको जीयते भार्यया द्वयम् ।

देवपित्रतिथीज्यादि नाभार्यः कर्म चार्हति ॥

स हि विज्ञेयो यस्य गेहे पतिव्रता । गृहस्थः ग्रस्यतेऽन्यान्प्रतिदिनं राक्षस्या जरया यथा ॥

यथा गङ्गावगाहेन शरीरं पावनं भवेत् ।

तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सकलं पावनं भवेत् ॥

न गङ्गया तया भेदो या नारी पतिदेवता ।

उमाशिवसमौ साक्षात्तस्मात्तौ पूजयेद् बुधः ॥

तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तपः ।

फलं पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तौ दम्पती शिवे ॥

एवं पतिव्रताधर्मो वर्णितस्ते गिरीन्द्रजे ।

तद्भेदान् शृणु सुप्रीत्या सावधानतयाद्य मे ॥

चतुर्विधास्ताः कथिता नार्यो देवि पतिव्रताः ।

उत्तमादिविभेदेन स्मरतां पापहारिकाः ॥

उत्तमा मध्यमा चैव निकृष्टातिनिकृष्टिका ।

ब्रुवे तासां लक्षणानि सावधानतया शृणु ॥

स्वप्नेऽपि यन्मनो नित्यं स्वपतिं पश्यति ध्रुवम् ।

नान्यं परपतिं भद्रे उत्तमा सा प्रकीर्तिता ॥

या पितृभ्रातृसुतवत् परं पश्यति सद्धिया ।

मध्यमा सा हि कथिता शैलजे वै पतिव्रता ॥

बुद्ध्वा स्वधर्मं मनसा व्यभिचारं करोति न ।

निकृष्टा कथिता सा हि सुचरित्रा च पार्वति ॥

भार्याके द्वारा ही इस लोक तथा परलोक - दोनों ६६ लोकोंपर विजय प्राप्त की जा सकती है । देवकर्म, पितृकर्म, अतिथिकर्म तथा यज्ञकर्म बिना भार्याके फलवान् नहीं होता । गृहस्थ उसीको कहते हैं, जिसके ६७ घरमें पतिव्रता स्त्रीका निवास है, अन्य स्त्रियाँ तो प्रतिदिन जरा राक्षसीके समान पुरुषको ग्रसती रहती हैं ॥ ६६-६७ ॥ जिस प्रकार गंगास्नानसे शरीर पवित्र हो ६८ जाता है, उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रीके दर्शनमात्रसे सब कुछ पवित्र हो जाता है ॥ ६८ ॥

गंगा तथा पतिव्रता स्त्रीमें कोई भेद नहीं है । वे ६ ९ दोनों स्त्री - पुरुष शिव तथा पार्वतीके तुल्य हैं, अतः बुद्धिमान् पुरुषको उनका पूजन करना चाहिये ॥ ६ ९ ॥ पति ॐकार है, तो स्त्री श्रुति वेद है, पति ७० तप है, तो स्त्री क्षमा है, स्त्री सत्क्रिया है, तो पति उसका फल है । हे शिवे! इस प्रकारके दम्पती धन्य हैं ॥ ७० ॥

हे पार्वति! इस प्रकारसे मैंने तुमसे पातिव्रत्य-७१ धर्मका निरूपण किया । अब उन पतिव्रताओंके भेद सावधानीके साथ प्रेमपूर्वक सुनो ॥७१ ॥

उत्तम आदिके भेदसे पतिव्रता स्त्रियाँ चार ७२ प्रकारकी कही गयी हैं । जिनके स्मरणसे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ७२ ॥

उत्तम, मध्यम, निकृष्ट तथा अतिनिकृष्ट– [ ये ७३ चार भेद पतिव्रताओंके होते हैं । ] अब मैं उनका लक्षण कह रहा हूँ, सावधान होकर उसका श्रवण करो ॥ ७३ ॥

जिसका मन स्वप्नमें भी अपने पतिको ही ७४ देखता है और कभी परपतिमें नहीं जाता; हे भद्रे! वह उत्तम पतिव्रता कही गयी है । जो दूसरोंके पतियोंको पिता, भ्राता तथा पुत्रके समान सद्बुद्धिसे ७५ देखती है, हे पार्वति! वह मध्यम पतिव्रता कही गयी है ॥ ७४-७५ ॥ हे पार्वति! जो स्त्री मनमें अपना धर्म समझकर व्यभिचार नहीं करती, वह सुन्दर चरित्रवाली स्त्री । निकृष्ट पतिव्रता ( अधमा ) कही गयी है ॥७६ ॥

७६

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७२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५५

पत्युः कुलस्य च भयाद्व्यभिचारं करोति न ।

पतिव्रताऽधमा सा हि कथिता पूर्वसूरिभिः ॥ ७७

चतुर्विधा अपि शिवे पापहन्त्र्यः पतिव्रताः ।

पावनाः सर्वलोकानामिहामुत्रापि हर्षिताः ॥ ७८

|

पातिव्रत्यप्रभावेणात्रिस्त्रिया त्रिसुरार्थनात् ।

जीवितो विप्र एको हि मृतो वाराहशापतः ॥ ७ ९

एवं ज्ञात्वा शिवे नित्यं कर्तव्यं पतिसेवनम् ।

त्वया शैलात्मजे प्रीत्या सर्वकामप्रदं सदा ॥ ८०

जगदम्बा महेशी त्वं शिवः साक्षात्पतिस्तव ।

तव स्मरणतो नार्यो भवन्ति हि पतिव्रताः ॥ ८१

त्वदग्रे कथनेनानेन किं देवि प्रयोजनम् ।

तथापि कथितं मेऽद्य जगदाचारतः शिवे ॥ ८२

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा विररामासौ द्विजस्त्री सुप्रणम्य ताम् ।

शिवां मुदमतिप्राप पार्वती शङ्करप्रिया ॥ ८३ ।

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां जो मनमें इच्छा रहते हुए भी पति एवं कुलके | भयसे व्यभिचार नहीं करती, उसको पुरातन लोगोंने अति - निकृष्ट पतिव्रता कहा है ॥७७ ॥

हे शिवे! ये चारों प्रकारकी पतिव्रताएँ पापहरण करनेवाली हैं, सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं और इस लोक एवं परलोकमें आनन्द प्रदान करनेवाली हैं ॥ ७८ ॥

पातिव्रत्यके प्रभावसे ही अत्रिप्रिया अनसूयाने तीनों देवताओंकी प्रार्थनापर वाराहके शापसे मरे हुए ब्राह्मणको जीवनदान दिया था ॥७ ९ ॥ हे शिवे! ऐसा जानकर तुमको नित्य प्रेमपूर्वक अपने पतिकी सेवा करनी चाहिये; क्योंकि हे शैलपुत्रि! ऐसा करनेसे तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे ॥ ८० ॥

तुम तो साक्षात् जगत्की भाता तथा महेश्वरी हो और जगत्पिता महेश्वर तुम्हारे साक्षात् पति हैं । तुम्हारे नामके स्मरणमात्रसे स्त्रियाँ पतिव्रता होंगी ॥ ८१ ॥

हे देवि! तुम्हारे आगे इस कथनसे क्या प्रयोजन! फिर भी हे शिवे! संसारके आचरणके अनुसार मैंने तुम्हें यह सब कहा है ॥८२ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर वह द्विजपत्नी भगवतीको प्रणामकर मौन हो गयी और उस उपदेशके श्रवणसे शंकरप्रिया शिवा अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गयीं ॥ ८३ ॥

रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे पतिव्रताधर्मवर्णनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें पतिव्रताधर्मवर्णन नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥

अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः शिव - पार्वती तथा बरातकी विदाई भगवान् शिवका करके कैलासपर रहना, समस्त देवताओंको विदा और शिव - विवाहोपाख्यानके श्रवणकी महिमा ब्रह्मोवाच प्रकार ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] इस अथ सा ब्राह्मणी देव्यै शिक्षयित्वा व्रतं च तत् । | ब्राह्मणीने देवी पार्वतीको पातिव्रत्यधर्मका उपदेश प्रोवाच मेनामामन्त्र्य | देकर मेनाको बुलाकर कहा - अब इनकी यात्राकी यात्रामस्याश्च कारय ॥ १ तैयारी कीजिये ॥१ ॥

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अ ० ५५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७२ ९

तथास्त्विति च सम्प्रोच्य प्रेमवश्या बभूव सा ।

धृतिं धृत्वाहूय कालीं विश्लेषविरहाकुला ॥

अत्युच्चै रोदनं चक्रे संश्लिष्य च पुनः पुनः ।

पार्वत्यपि रुरोदोच्चैरुच्चरन्ती कृपावचः ॥

शैलप्रिया शिवा चापि मूर्च्छामाप शुचार्दिता ।

मूर्च्छाम्प्रापुर्देवपल्यः पार्वत्या रोदनेन च ॥

सर्वाश्च रुरुदुर्नार्यः सर्वमासीदचेतनम् ।

स्वयं रुरोद योगीशो गच्छन्कोऽन्यः परः प्रभुः ॥

एतस्मिन्नन्तरे शीघ्रमाजगाम हिमालयः ।

स सर्वतनयैस्तत्र सचिवैश्च द्विजैः परैः ॥

स्वयं रुरोद मोहेन वत्सां कृत्वा स्ववक्षसि ।

क्व यासीत्येवमुच्चार्य शून्यं कृत्वा मुहुर्मुहुः ॥

ततः पुरोहितो विप्रैरध्यात्मविद्यया सुखम् ।

सर्वान्प्रबोधयामास कृपया ज्ञानवत्तरः ॥

ननाम पार्वती भक्त्या मातरं पितरं गुरुम् ।

महामाया भवाचारानुरोदोच्चैर्मुहुर्मुहुः ॥

पार्वत्या रोदनेनैव रुरुदुः सर्वयोषितः ।

नितरां जननी मेना यामयो भ्रातरस्तथा ॥

पुन: पुन: शिवामाता यामयोऽन्याश्च योषितः ।

भ्रातरो जनकः प्रेम्णा रुरुदुर्बद्धसौहृदाः ॥

तदा विप्राः समागत्य बोधयामासुरादरात् ।

लग्नं निवेदयामासुर्यात्रायाः सुखदं परम् ॥

ततो हिमालयो मेनां धैर्यं विवेकतः । शिबिकामानयामास धृत्वा शिवारोहणहेतवे ॥ शिवामारोहयामासुस्तत्र विप्राङ्गनाश्च ताम् । आशिषं प्रददुः सर्वाः पिता माता द्विजास्तथा ॥ मेनाने भी ‘ तथास्तु ' कहा और वे प्रेमसे विभोर २ हो गयीं । तदनन्तर धैर्य धारणकर कालीको बुलाकर | उसके विरहसे व्याकुल हो उठीं, उस समय वे मेना पार्वतीको बारंबार गले लगाकर ऊँचे स्वरमें रोने लगीं ३ और पार्वती भी दीनवचन कहती हुई ऊँचे स्वरसे रोने

लगीं ॥। २-३ ॥

शोकव्यथित होकर शैलप्रिया मेना और ४ पार्वती मूच्छित हो गयीं । पार्वतीके रोनेके शब्दसे सभी देवपलियाँ भी अपनी सुध - बुध खो बैठीं । उस समय सभी देवस्त्रियाँ रोने लगीं तथा अचेत हो ५ गयीं । विदा होते हुए स्वयं योगीश्वर भी रो पड़े, तब दूसरोंकी क्या बात! ॥ ४-५ ॥ इसी समय बड़ी शीघ्रताके साथ हिमालय भी ६ अपने सभी पुत्रों, मन्त्रियों तथा अन्य ब्राह्मणोंके साथ वहाँ आ पहुँचे । उस समय हिमालय भी पार्वतीको गोदमें लेकर मोहवश रोने लगे । हे वत्से! इस घरको ७ शून्यकर तुम कहाँ जा रही हो? इस प्रकार कह करके वे बारंबार रोने लगे ॥ ६-७ ॥ तब ब्राह्मणोंके साथ उनके ज्ञानी तथा श्रेष्ठ ८ पुरोहितने उनपर कृपाकर अध्यात्मविद्याका उपदेश देकर उन्हें समझाया । महामाया पार्वतीने [ विदाईके समय ] माता - पिता तथा गुरुजनोंको भक्तिपूर्वक ९ प्रणाम किया और वे लोकाचारवश जोर - जोरसे रोने लगीं ॥ ८ - ९ ॥ पार्वतीके रोनेसे वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ, १० माता मेना, सगे - सम्बन्धी तथा अन्य भी रोने लगे ॥ १० ॥

इस प्रकार पार्वतीकी माता, सगे - सम्बन्धी ११ तथा अन्य स्त्रियाँ, भाई, पिता तथा सखियाँ अत्यन्त प्रेमवश बार - बार रोते रहे । उस समय ब्राह्मणोंने आकर सबको आदरपूर्वक समझाया और कहा कि यात्राके १२ लिये सुखदायी लग्नवेला आ गयी है । तब हिमालयने मेनाको धीरज बँधाया और स्वयं विवेकयुक्त होकर पार्वतीके चढ़नेके लिये शिविका मँगवायी । १३ तदनन्तर ब्राह्मणस्त्रियोंने पार्वतीको पालकीमें चढ़ाया और माता - पिता, ब्राह्मण आदि सबने आशीर्वाद प्रदान १४ किया॥११-१४ ॥

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७३० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

महाराज्ञ्युपचाराँश्च ददौ मेना गिरिस्तथा ।

नानाद्रव्यसमूहं च परेषां दुर्लभं शुभम् ॥

शिवा नत्वा गुरून्सर्वान् जनकं जननीं तथा ।

द्विजान्पुरोहितं यामीस्त्रीस्तथान्या ययौ मुने ॥

हिमाचलोऽपि ससुतोऽगच्छत्स्नेहवशो बुधः ।

प्राप्तस्तत्र प्रभुर्यत्र सामरः प्रीतिमावहन् ॥

प्रीत्याभिरेभिरे सर्वे महोत्सवपुरस्सरम् ।

प्रभुं प्रणेमुस्ते भक्त्या प्रशंसन्तोऽविशन्पुरीम् ॥

जातिस्मरां स्मारयामि नित्यं स्मरसि चेद्वद ।

लीलया त्वां च देवेशि सदा प्राणप्रिया मम ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य महेशस्य स्वनाथस्याथ पार्वती ।

शङ्करस्य प्रिया नित्यं सस्मितोवाच सा सती ॥

पार्वत्युवाच

सर्वं स्मरामि प्राणेश मौनीभूतो भवेति च ।

प्रस्तावोचितमद्याशु कार्यं कुरु नमोऽस्तु ते ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य प्रियावाक्यं सुधाधाराशतोपमम् ।

मुमुदेऽतीव विश्वेशो लौकिकाचारतत्परः ॥

शिवः सम्भृतसम्भारो नानावस्तुमनोहरम् ।

भोजयामास देवांश्च नारायणपुरोगमान् ॥

तथान्यान्निखिलान्प्रीत्या स्वविवाहसमागतान् ।

भोजयामास प्रभुः ॥

ततो भुक्त्वा च ते देवा नानारत्नविभूषिताः ।

सस्त्रीकाः सगणाः सर्वे प्रणेमुश्चंद्रशेखरम्॥

५५ मेना और हिमालयने महारानियोंके योग्य १५ पार्वतीको प्रदान किये और । दुर्लभ द्रव्यसमूह दिये । हे मुने! | पिता, गुरुजन, ब्राह्मण, पुरोहित, १६ प्रणाम करके प्रस्थान किया ॥ परम बुद्धिमान् हिमालय १७ प्रेमसे विभोर होकर पालकीके पहुँचे, जहाँ सभी देवता ठहरे तत्पश्चात् सभी लोगोंने उपचार अन्योंके लिये सर्वथा पार्वतीने अपने माता-सम्बन्धी एवं स्त्रियोंको १५-१६ ॥ भी अपने पुत्रोंके साथ साथ चले और वहाँ हुए थे ॥१७ ॥

भक्तिसे सदाशिवको प्रणाम किया और प्रशंसा करते हुए अपने नगरको १८ चले आये । तब पार्वतीके कैलास पहुँचते ही सभी लोगोंने बहुत बड़ा उत्सव किया । [ शिवजीने पार्वतीके साथ अपने स्थानपर पहुँचकर कहा- ] हे देवेशि! मैं तुम्हें पूर्वजन्मका स्मरण करा रहा हूँ और यदि तुम अपनी लीलासे उसे स्मरण करती हो, तो बताओ तुम १ ९ तो आजसे नहीं, जन्म - जन्मान्तरसे मेरी प्राणप्रिया हो ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार अपने स्वामी महेशका वचन सुनकर हँसती हुई शिवप्रिया पार्वती कहने २० लगीं— ॥ २० ॥

पार्वती बोलीं — हे प्राणेश्वर! मुझे सभी बातोंका स्मरण है, किंतु हे भव! इस समय आप चुप रहिये २१ और आज जो कार्य उपस्थित है, उसीको शीघ्र कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार प्रिया पार्वती सैकड़ों सुधाधाराओंके समान वचनको सुनकर २२ विश्वेश्वर प्रसन्न हो गये और लौकिकाचारमें संलग्न हो गये ॥२२ ॥

शिवजीने अनेक प्रकारकी भोजन - सामग्री २३ एकत्रितकर नारायण आदि सभी देवगणोंको नानाविध । मनोहर भोज्य - वस्तुओंका भोजन कराया । उन्होंने | अपने विवाहमें आये सभी लोगोंको यथायोग्य २४ विधिवत् उत्तम रससे हुए सम्पन्न भोजन कराया । अने | भोजन करके नाना रत्नोंसे विभूषित सभी देवताओंने | अपनी स्त्रियों तथा गणोंके साथ चन्द्रशेखरको प्रणाम २५ किया ॥ २३–२५ ॥