शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 741–750
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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अ ० ५५ ] रुद्रसंहिता ( पार्वतीखण्ड ) ७३१ वाग्भिरिष्टाभिः परिक्रम्य मुदान्विताः । प्रशंसन्तो संस्तुत्य विवाहं च स्वधामानि ययुस्ततः ॥
नारायणं मुने मां च प्रणनाम शिवः स्वयम् ।
लौकिकाचारमाश्रित्य यथा विष्णुश्च कश्यपम् ॥
मयाश्लिष्याशिषं दत्त्वा शिवस्य पुनरग्रतः ।
मत्वा वै तं परं ब्रह्म चक्रे च स्तुतिरुत्तमा ॥
तमामन्त्र्य मया विष्णुः साञ्जलिः शिवयोर्मुदा ।
प्रशंसंस्तद्विवाहं च जगाम स्वालयं परम् ॥
शिवोऽपि स्वगिरौ तस्थौ पार्वत्या विहरन् मुदा ।
सर्वे गणाः सुखं प्रापुरतीव स्वभजन् शिवौ ॥
इत्येवं कथितस्तात शिवोद्वाहः सुमङ्गलः ।
शोकघ्नो हर्षजनक आयुष्यो धनवर्द्धनः ॥
य इमं शृणुयान्नित्यं शुचिस्तद्गतमानसः ।
श्रावयेद्वाथ नियमाच्छिवलोकमवाप्नुयात् ॥
इदमाख्यानमाख्यातमद्भुतं मङ्गलायनम् ।
सर्वविघ्रप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥
यशस्यं स्वर्ग्यमायुष्यं पुत्रपौत्रकरं परम् ।
सर्वकामप्रदं चेह भुक्तिदं मुक्तिदं सदा ॥
अपमृत्युप्रशमनं महाशान्तिकरं शुभम् ।
सर्वदुःस्वप्नशमनं ॥
बुद्धिप्रज्ञादिसाधनम् तदनन्तर उन्होंने प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक २६ शिवजीकी स्तुति करते हुए उनकी परिक्रमा की तथा विवाहकी प्रशंसा करते हुए वे सभी अपने-अपने स्थानोंको चले गये । हे मुने! शिवजीने मुझे तथा विष्णुजीको उसी प्रकार प्रणाम किया, २७ जैसे लोकाचारसे विष्णुजी कश्यपको प्रणाम करते हैं ॥ २६-२७ ॥ मैंने उन्हें गले लगाकर उनको आशीर्वाद दिया, २८ फिर शंकरको परब्रह्म जानकर उनके आगे खड़े होकर मैंने उनकी स्तुति की । इसके पश्चात् मैं तथा विष्णु शिवा एवं शिवजीको हाथ जोड़कर प्रणामकर २ ९ विवाहकी प्रशंसा करते हुए अपने - अपने स्थानोंको चले गये॥२८-२९ ॥ इधर, शिवजी भी पार्वतीके साथ आनन्द-३० विहार करते हुए अपने निवासभूत कैलासमें रहने लगे और उनके सभी गण आनन्दपूर्वक प्रेमसे शिवा - शिवकी आराधना करने लगे । हे तात! इस प्रकार मैंने शिवा एवं शिवके विवाहका आपसे वर्णन किया, यह विवाह परम मंगलदायक, शोक-३१ नाशक, आनन्ददायक तथा धन एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३०-३१ ॥ जो पवित्र होकर शिवजीमें मन लगाकर ३२ नित्य इस विवाहचरित्रको नियमपूर्वक सुनता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह अवश्य ही शिवलोकको प्राप्त कर लेता है । मेरा कहा हुआ यह आख्यान अद्भुत, मंगलका धाम, सभी ३३ विघ्नोंका नाश करनेवाला, समस्त व्याधियोंको दूर करनेवाला, यश देनेवाला, स्वर्ग देनेवाला, आयु प्रदान करनेवाला, पुत्र - पौत्रोंको बढ़ानेवाला, सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला, भोग और मोक्ष ३४ देनेवाला, अपमृत्युको दूर करनेवाला, महाशान्ति प्रदान करनेवाला, कल्याणकारक, समस्त दुःस्वप्नोंको शान्त करनेवाला और बुद्धि - ज्ञान आदिकी वृद्धि ३५ | करनेवाला है ॥ ३२-३५ ॥
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७३२ शिवोत्सवेषु सर्वेषु पठितव्यं प्रयत्नतः शुभेप्सुभिर्जनैः प्रीत्या शिवसन्तोषकारणम् पठेत्प्रतिष्ठाकाले तु देवादीनां विशेषतः शिवस्य सर्वकार्यस्य प्रारम्भे च सुप्रीतितः शृणुयाद्वा शुचिर्भूत्वा चरितं शिवयोश्शिवम् सिध्यन्ति सर्वकार्याणि सत्यं सत्यं न संशयः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५५ । अपने शुभकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको सभी ॥ ३६ कल्याण - कारक उत्सवोंमें प्रयत्नपूर्वक प्रेमके साथ | शिवको सन्तुष्ट करनेवाले इस आख्यानका पाठ करना चाहिये ॥३६ ॥
। विशेष रूपसे देवता आदिकी प्रतिष्ठाके समय ॥ ३७ और शिवके सभी कार्योंके प्रारम्भमें प्रेमसे इस आख्यानका पाठ करना चाहिये । जो पवित्र होकर शिवा - शिवके इस चरित्रको सुनता है, उसके सभी । कार्य सिद्ध हो जाते हैं, यह सत्य है, सत्य है, इसमें ॥ ३८ | संशय नहीं है ॥ ३७-३८ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे ब्रह्मनारदसंवादे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां तृतीये पार्वतीखण्डे शिवकैलासगमनवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके ब्रह्मा- नारद - संवादके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके तृतीय पार्वतीखण्डमें शिवकैलासगमनवर्णन नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥
॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां तृतीयः पार्वतीखण्डः समाप्तः ॥ ॥ द्वितीय रुद्रसंहिताका तृतीय पार्वतीखण्ड पूर्ण हुआ ॥
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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थः कुमारखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः कैलासपर भगवान् वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वर्यैकवासं शिवम् । सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयोपात्ताकृतिं शंकरम् ॥ नारद उवाच
विवाहयित्वा गिरिजां शंकरो लोकशंकरः ।
गत्वा स्वपर्वतं ब्रह्मन् किमकार्षीद्धि तद्वद ॥
कथं हि तनयो जज्ञे शिवस्य परमात्मनः ।
यदर्थमात्मारामोऽपि समुवाह शिवां प्रभुः ॥
तारकस्य कथं ब्रह्मन् वधोऽभूद्देवशंकर ।
एतत्सर्वमशेषेण वद कृत्वा दयां मयि ॥
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदस्य प्रजापतिः ।
सुप्रसन्नमनाः स्मृत्वा शंकरं प्रत्युवाच ह ॥
ब्रह्मोवाच
चरितं शृणु वक्ष्यामि शशिमौलेस्तु नारद ।
गुहजन्मकथां दिव्यां तारकासुरसद्बधम् ॥
श्रूयतां कथयाम्यद्य कथां पापप्रणाशिनीम् ।
यां श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो ध्रुवम् ॥
शिव एवं पार्वतीका विहार वन्दना करनेसे जिनका मन प्रसन्न हो जाता है, जिन्हें प्रेम अत्यन्त प्रिय है, जो सबको प्रेम प्रदान करनेवाले हैं, स्वयं पूर्ण हैं, दूसरोंकी अभिलाषाको भी पूर्ण करते हैं, सम्पूर्ण संसिद्ध ऐश्वर्यके एकमात्र स्थान हैं, स्वयं सत्यस्वरूप हैं, सत्यमय हैं, जिनका सत्तात्मक ऐश्वर्य त्रिकालाबाधित है, जो सत्यप्रिय एवं सबको सत्य प्रदान करनेवाले हैं, ब्रह्मा - विष्णु जिनकी वन्दना १ करते हैं और जो अपनी कृपासे ही विग्रह धारण करते हैं - ऐसे नित्य शिवकी हम वन्दना करते हैं ॥१ ॥
नारदजी बोले - हे ब्रह्मन्! लोककल्याणकारी शंकरने पार्वतीसे विवाह करनेके पश्चात् कैलास २ जाकर क्या किया, उस वृत्तान्तको हमें सुनाइये ॥ २ ॥
जिस पुत्रके निमित्त आत्माराम होते हुए भी ३ उन्होंने पार्वतीसे विवाह किया, उन परमात्मा शिवको किस प्रकार पुत्र उत्पन्न हुआ? देवताओंका कल्याण करनेवाले हे ब्रह्मन्! तारकासुरका वध किस प्रकार ४ हुआ? मेरे ऊपर कृपाकर यह सारी बात विस्तारसे कहिये ॥ ३-४ ॥ सूतजी बोले - नारदके इस प्रकारके वचनको सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने शिवजीका स्मरणकर प्रसन्न
५ मनसे कहा- । ॥५ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! चन्द्रशेखर भगवान् शिवजीके चरित्रको बताता हूँ, आप सुनें, मैं कार्तिकेयक उत्पत्तिकी दिव्य कथा तथा उनके द्वारा किये गये ६ तारकासुरके वधका वृत्तान्त भी कहता हूँ ॥ ६ ॥
मैं जिस कथाको कह रहा हूँ, उसे सुनिये, वह कथा समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाली है, जिसे सुनकर निश्चय ही मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त ७ हो जाता है ॥७ ॥
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७३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
इदमाख्यानमनघं रहस्यं परमाद्भुतम् ।
पापसंतापहरणं सर्वविघ्नविनाशनम् ॥
सर्वमंगलदं सारं सर्वश्रुतिमनोहरम् ।
सुखदं मोक्षबीजं च कर्ममूलनिकृन्तनम् ॥
कैलासमागत्य शिवां विवाह्य शोभां प्रपेदे नितरां शिवोऽपि । विचारयामास च देवकृत्यं पीडां जनस्यापि च देवकृत्ये ॥
शिवः स भगवान् साक्षात्कैलासमगमद्यदा ।
सौख्यं च विविधं चक्रुर्गणाः सर्वे सुहर्षिताः ॥
महोत्सवो महानासीच्छिवे कैलासमागते ।
देवाः स्वविषयं प्राप्ता हर्षनिर्भरमानसाः ॥
अथ शंभुर्महादेवो गृहीत्वा गिरिजां शिवाम् ।
जगाम निर्जनं स्थानं महादिव्यं मनोहरम् ॥
शय्यां रतिकरीं कृत्वा पुष्पचन्दनचर्चिताम् ।
अद्भुतां तत्र परमां भोगवस्त्वन्वितां शुभाम् ॥
स रेमे तत्र भगवान् शंभुर्गिरिजया सह ।
सहस्रवर्षपर्यन्तं देवमानेन मानदः ॥
दुर्गाङ्गस्पर्शमात्रेण लीलया मूर्च्छितः शिवः ।
मूर्च्छिता सा शिवस्पर्शाद्बुबुधे न दिवानिशम् ॥
हरे भोगप्रवृत्ते तु लोकधर्मप्रवर्तिनि ।
महान् कालो व्यतीयाय तयोः क्षण इवानघ ॥
अथ सर्वे सुरास्तात एकत्रीभूय चैकदा ।
मंत्रयाञ्चक्रुरागत्य मेरौ शक्रपुरोगमाः ॥
सुरा ऊचुः विवाहं योगीश्वरो निर्विकारो स्वात्मारामो निरंजनः ॥ १ यह आख्यान पापरहित, गोपनीय, परमअद्भुत, ८ पाप - सन्तापको दूर करनेवाला तथा सभी प्रकारके विघ्नोंको । विनष्ट करनेवाला है । यह सभी प्रकारके मंगलोंका | पुराणोंका सारभूत अंश तथा सबके कानोंको दाता, सुख प्रदान ९ करनेवाला, आनन्दको बढ़ानेवाला, मोक्षका बीज और कर्ममूलका विनाश करनेवाला है ॥८ - ९ ॥ शिवजी शिवासे विवाहकर कैलासपर आकर अत्यन्त शोभित हुए. और देवगणोंके कार्यसाधनका विचार करने लगे । उन्होंने तारकासुरके द्वारा दी गयी अपने १० भक्तजनोंकी पीड़ाके विषयमें भी विचार किया ॥ १० ॥
इधर शिवजी जब कैलासपर पहुँचे, तब उनके ११ गण प्रसन्न होकर उनको नानाविध सुख प्रदान करने लगे ॥ ११ ॥
शिवजीके कैलास पहुँचते ही महान् उत्सव होने १२ लगा । सब देवगण प्रसन्नमन होकर अपने - अपने स्थानको चले गये । इसके बाद महादेव सदाशिव गिरिकन्या शिवाको साथ लेकर महादिव्य, मनोहर १३ एवं निर्जन स्थानमें चले गये । वहाँ उन्होंने रतिको | बढ़ानेवाली शय्याका निर्माणकर उसे पुष्प तथा चन्दनसे सुशोभित किया । उस अद्भुत मनोहर शय्याके १४ समीप नाना प्रकारकी भोगसामग्री भी स्थापित कर | दी॥१२–१४ ॥ उसी शय्यापर मान देनेवाले भगवान् शम्भु १५ | पार्वतीके साथ देवताओंके वर्षपरिमाणके अनुसार एक । हजार वर्षतक विहार करते रहे । भगवती पार्वतीके | अंगके स्पर्शमात्रसे भगवान् सदाशिव लीलापूर्व १६ मूच्छित हो गये I । भगवती पार्वती भी भगवान् शिव स्पर्शसे मूर्च्छित हो गयीं । इस प्रकार उन्हें दिन - रातका ज्ञान नहीं रहा ॥ १५-१६ ॥ हे अनघ! लोकधर्मका प्रवर्तन करनेवाले १७ शिवजीके भोग में प्रवृत्त होनेपर उन दोनोंका लम्बा । समय भी क्षणमात्रके समान बीत गया ॥१७ ॥
हे तात! तब एक समय इन्द्रादि सब देवता मेरु १८ पर्वतपर एकत्र होकर विचार करने लगे ॥१८ ॥
देवता बोले- यद्यपि शिव योगीश्वर निर्विकार के । आत्माराम तथा मायारहित हैं, फिर भी हमलोगों ॥ १ ९ कल्याणके लिये शंकरने विवाह किया है ॥ १ ९ भगवान्
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अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७३५
नोत्पन्नस्तनयस्तस्य न जानीमोऽत्र कारणम् ।
विलंबः क्रियते तेन कथं देवेश्वरेण ह ॥
ब्रह्मोवाच
एतस्मिन्नन्तरे देवा नारदाद्देवदर्शनात् ।
बुबुधुस्तन्मितं भोगं तयोश्च रममाणयोः ॥
चिरं ज्ञात्वा तयोर्भोगं चिंतामापुः सुराश्च ते ।
ब्रह्माणं मां पुरस्कृत्य ययुर्नारायणान्तिकम् ॥
तं नत्वा कथितं सर्वं मया वृत्तांतमीप्सितम् ।
सन्तस्थिरे सर्वदेवाः चित्रे पुत्तलिका यथा ॥
सहस्रवर्षपर्यन्तं देवमानेन शंकरः ।
रतौ रतश्च निश्चेष्टो योगी विरमते न हि ॥
श्रीभगवानुवाच
चिन्ता नास्ति जगद्धातः सर्वं भद्रं भविष्यति ।
शरणं व्रज देवेश शंकरस्य महाप्रभोः ॥
महेशशरणापन्ना ये जना मनसा मुदा ।
तेषां प्रजेश भक्तानां न कुतश्चिद्भयं क्वचित् ॥
शृंगारभंगः समये भविता नाधुना विधे ।
कालप्रयुक्तं कार्यं च सिद्धिं प्राप्नोति नान्यथा ॥
शम्भोः सम्भोगमिष्टं को भद्रां कर्तुमिहेश्वरः ।
पूर्णे वर्षसहस्त्रे च स्वेच्छया हि विरंस्यति ॥
स्त्रीपुंसो रतिविच्छेदमुपायेन करोति यः ।
तस्य स्त्रीपुत्रयोर्भेदो भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
भ्रष्टज्ञानो नष्टकीर्त्तिरलक्ष्मीको भवेदिह ।
प्रयात्यन्ते कालसूत्रं वर्षलक्षं स पातकी ॥
रंभायुक्तं शक्रमिमं चकार विरतं रतौ ।
महामुनीन्द्रो दुर्वासास्तत्स्त्रीभेदो बभूव ह ॥
पुनरन्यां स संप्राप्य विषेव्य शुभपाणिकाम् ।
दिव्यं वर्षसहस्त्रं च विजहौ विरहज्वरम् ॥
किंतु अबतक इनको कोई पुत्र नहीं हुआ, २० इसका कारण ज्ञात नहीं हो रहा है । वे भगवान् । देवेश्वर विलम्ब क्यों कर रहे हैं? ॥ २० ॥
ब्रह्माजी बोले- इसी बीच देवदर्शन नारदसे देवताओंने शिवा और शिवके परिमित भोगकालको २१ जाना ॥ २१ ॥
तब उनके भोगकालको दीर्घकालीन जानकर २२ देवता बड़े चिन्तित हुए, फिर मुझ ब्रह्माको आगे करके वे विष्णुके समीप गये ॥२२ ॥
मैंने नारायणको प्रणामकर सारा अभीष्ट वृत्तान्त २३ उनसे निवेदित किया । देवतालोग तो चित्रलिखित पुत्तलिकाके समान खड़े रहे ॥ २३ ॥
[ हे नारायण! ] योगीश्वर शंकरजी देवताओंके २४ वर्षके परिमाणके अनुसार एक हजार वर्षपर्यन्त । विहारपरायण हैं ॥ २४ ॥
भगवान् विष्णु बोले – हे जगत्के विधाता! चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है । सब २५ कुछ कल्याणकारी ही होगा । हे देवेश! आप महाप्रभु शंकरकी शरणमें जाइये ॥ २५ ॥
जो मनुष्य प्रसन्न मनसे शंकरकी शरणमें २६ जाते हैं; हे प्रजापते! कहींसे कोई भय नहीं रसभंग समयसे होगा २७ समयमें किया जाता है नहीं ॥ २६-२७ ॥ भगवान् शंकरके २८ समर्थ है? हजार वर्ष जायँगे ॥२८ ॥
जो रतिको भंग शंकरके उन अनन्य भक्तोंको होता । हे विधे! उनके शृंगारका , अभी नहीं । जो कार्य ठीक , वही सफल होता है, अन्यथा अभीष्टको भग्न करनेमें कौन पूर्ण होनेपर वे स्वयं निवृत्त हो करता है, उसे जन्म - जन्मान्तरमें २ ९ स्त्री तथा पुत्रसे वियोग प्राप्त होता है । उस भेदकर्ता पुरुषका ज्ञान नष्ट हो जाता है, कीर्ति नष्ट हो जाती है और वह दरिद्र हो जाता है । अन्तमें वह एक लाख ३० वर्षतक कालसूत्र नामक नरकमें रहता है ॥ २ ९ -३० ॥ इसी कारण महामुनीन्द्र दुर्वासाको स्त्रीसे ३१ वियोग हुआ । फिर उन्होंने दूसरी मंगलमय कर-कमलोंवाली स्त्रीको प्राप्त करके वियोगजन्य ३२ । दुःखको दूर किया । घृताचीपर आसक्त कामदेवको
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७३६ ( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ घृताच्या सह संश्लिष्टं कामं वारितवान् गुरुः । बृहस्पतिके द्वारा मना करने पर बृहस्पतिको षण्मासाभ्यंतरे चन्द्रस्तस्य पत्नीं जहार ह ॥ ३३ पत्नी - हरणका दुःख मिला । फिर उन्होंने शिवजीकी पुनश्शिवं समाराध्य कृत्वा तारामयं रणम् तारां सगर्भां संप्राप्य विजहौ विरहज्वरम् ॥
मोहिनीसहितं चन्द्रं चकार विरतं रतौ ।
महर्षिगौतमस्तस्य स्त्रीविच्छेदो बभूव ह ॥
हरिश्चन्द्रो हालिकं च वृषल्या सह संयुतम् । वारयामास निश्चेष्टं निर्जने तत्फलं शृणु भ्रष्टः स्त्रीपुत्रराज्येभ्यो विश्वामित्रेण ताडितः ततः शिवं समाराध्य मुक्तो भूतो हि कश्मलात् अजामिलं द्विजश्रेष्ठं वृषल्या सह संयुतम् । न भिया वारयामासुः सुरास्तां चापि केचन
सर्वं निषेकसाध्यं च निषेको बलवान् विधे ।
निषेकफलदो वै स निषेकः केन वार्यते ॥
दिव्यं वर्षसहस्त्रं च शंभो: संभोगकर्म तत् । पूर्णे वर्षसहस्त्रे च गत्वा तत्र सुरेश्वराः
येन वीर्यं पतेद्भूमौ तत् करिष्यथ निश्चितम् ।
तत्र वीर्ये च भविता स्कन्दनामा प्रभोः सुतः ॥
अधुना स्वगृहं गच्छ विधे सुरगणैः सह ।
करोतु शंभुः संभोगं पार्वत्या सह निर्जने ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा कमलाकान्तः शीघ्रं स्वान्तःपुरं ययौ ।
स्वालयं प्रययुर्देवा मया सह मुनीश्वर ॥
शक्तिशक्तिमतोश्चाथ विहारेणाति च क्षितिः ।
भाराक्रांता चकंपे सा सशेषापि सकच्छपा ॥
कच्छपस्य हि भारेण सर्वाधारः समीरणः । स्तंभितोऽथ त्रिलोकाश्च बभुवुर्भयविह्वलाः ॥
अथ सर्वे मया देवा हरेश्च शरणं ययुः ।
सर्वं निवेदयाञ्चक्रुस्तद्वृत्तं दीनमानसा ॥
। । आराधनाकर ताराको प्राप्त किया, जिससे उनकी ३४ विरहव्यथा दूर हुई || ३१–३४ ॥ महर्षि गौतमने मोहिनीमें आसक्त चन्द्रमाको ३५ | वियुक्त किया, इस कारण उनका स्त्रीसे वियोग हुआ । हालिकको वृषलीमें कामासक्त देखकर हरिश्चन्द्रद्वारा । निषेध किये जानेपर उन्हें विश्वामित्रका कोपभाजन ॥ ३६ बनना पड़ा और वे स्त्री - पुत्र तथा राज्यसे भी च्युत । हो गये । फिर उन्होंने शिवाराधनकर इस कष्टसे ॥ ३७ छुटकारा प्राप्त किया ॥ ३५–३७ ॥ वृषलीमें आसक्त हुए द्विजश्रेष्ठ अजामिलको ॥ ३८ तथा उस वृषलीको भयके कारण किसी देवताने भी मना नहीं किया । निषेक ( वीर्यसिंचन ) - से सब कुछ साध्य है । हे विधे! निषेक बलवान् है, निषेक ही फल ३ ९ देनेवाला है, उस निषेकका कौन निवारण कर सकता है? ॥ ३८-३९ ॥ शंकरजीके भोगका वह काल देवताओंके वर्षसे ॥ ४० हजार वर्षपर्यन्तका था । हे देवगणो! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण हो जानेपर आपलोग वहाँ जाकर इस प्रकारका उपाय करें, जिससे उनका तेज पृथ्वीपर ४१ गिरे । उसी तेजसे प्रभु शंकरका स्कन्द नामक पुत्र उत्पन्न होगा॥४०-४१ ॥ अतः हे ब्रह्मन्! इस समय आप इन देवताओंको ४२ साथ लेकर अपने स्थानको लौट जायँ और शिवजी एकान्तमें पार्वतीके साथ आनन्दविहार करें ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले — हे मुनीश्वर! इस प्रकार कहकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु शीघ्र ही अपने अन्तःपुरमें ४३ चले गये और मेरे साथ सभी देवता अपने - अपने स्थानपर । चले गये । इस प्रकार बहुत दिनोंतक शक्ति एवं शक्तिमान्के विहारसे भाराक्रान्त यह पृथ्वी शेष एवं ४४ ॥ । कच्छपके धारण करनेपर भी काँप उठी ॥ ४३-४४ तब कच्छपके भारसे आक्रान्त सबका आधारभूत भयसे ४५ पवन स्तम्भित हो गया, जिससे सम्पूर्ण त्रैलोक्य । व्याकुल हो उठा । फिर सभी देवता मेरे साथ भगवान् उस । विष्णुकी शरणमें गये और दुखी मनवाले उन्होंने ॥ ४६ । वृत्तान्तको भगवान् विष्णुसे निवेदित किया ॥ ४५-४६
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अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७३७ देवा ऊचुः
देवदेव रमानाथ सर्वावनकर प्रभो ।
रक्ष नः शरणापन्नान् भयव्याकुलमानसान् ॥ ४७
स्तंभितस्त्रिजगत्प्राणो न जाने केन हेतुना ।
व्याकुलं मुनिभिर्लेखैस्त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥४८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा सकला देवा मया सह मुनीश्वर ।
दीनास्तस्थुः पुरो विष्णोमौनीभूताः सुदुःखिताः ॥ ४ ९
तदाकर्ण्य समादाय सुरान्नः सकलान् हरिः ।
जगाम पर्वतं शीघ्रं कैलासं शिववल्लभम् ॥ ५०
तत्र गत्वा हरिर्देवैर्मया च सुरवल्लभः ।
ययौ शिववरस्थानं शंकरं द्रष्टुकाम्यया ॥ ५१
तत्र दृष्ट्वा शिवं विष्णुर्न सुरैर्विस्मितोऽभवत् ।
तत्र स्थितान् शिवगणान् पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ ५२
विष्णुरुवाच
हे शांकराः शिवः कुत्र गतः सर्वप्रभुर्गणाः ।
निवेदयत नः प्रीत्या दुःखितान्वै कृपालवः ॥ ५३
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सामरस्य हरेर्गणाः ।
प्रोचुः प्रीत्या गणास्ते हि शंकरस्य रमापतिम् ॥ ५४
शिवगणा ऊचुः
हरे शृणु शिवप्रीत्या यथार्थं ब्रूमहे वयम् ।
ब्रह्मणा निर्जरैः सार्द्धं वृत्तान्तमखिलं च यत् ॥ ५५
सर्वेश्वरो महादेवो जगाम गिरिजालयम् ।
संस्थाप्य नोऽत्र सुप्रीत्या नानालीलाविशारदः ॥ ५६
तद्गुहाभ्यन्तरे शंभुः किं करोति महेश्वरः ।
न जानीमो रमानाथ व्यतीयुर्बहवः समाः ॥ ५७
ब्रह्मोवाच
श्रुत्वेति वचनं तेषां स विष्णुः सामरो मया ।
विस्मितोऽति मुनिश्रेष्ठ शिवद्वारं जगाम ह ॥ ५८
देवता बोले- हे देवदेव! हे रमानाथ! हे सर्वरक्षक प्रभो! हमलोग भयसे व्याकुलचित्त हो आपकी शरणमें आये हुए हैं । आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ ४७ ॥
पता नहीं, किस कारणसे तीनों लोकोंके प्राणभूत वायुदेव स्तम्भित हो गये हैं तथा मुनि एवं देव-गणोंके सहित सारा चराचर त्रैलोक्य व्याकुल हो गया है! ॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! मेरे साथ गये हुए समस्त देवगण ऐसा कहकर मौन, दुखी तथा दीन । होकर भगवान् विष्णुजीके आगे खड़े हो गये ॥ ४ ९ ॥ इस बातको सुनकर हमें तथा सभी देवताओंको अपने साथ लेकर भगवान् विष्णु बड़ी शीघ्रतासे शिवके प्रिय कैलास पर्वतपर गये ॥ ५० ॥
सुरवल्लभ भगवान् विष्णु मुझ ब्रह्मा तथा उन देवताओंके साथ कैलास पहुँचकर भगवान् शिवके दर्शन करनेकी इच्छासे शिवजीके श्रेष्ठ स्थानपर गये ॥५१ ॥
किंतु वहाँ शिवजीको न देखकर देवताओंसहित भगवान् विष्णु आश्चर्यमें पड़ गये । फिर उन्होंने वहाँपर स्थित महेश्वरके गणोंसे विनयपूर्वक पूछा ॥ ५२ ॥
विष्णु बोले — हे शंकरके गणो! आप सब बड़े दयालु हैं । आपलोग हम दुखीजनोंको कृपापूर्वक बताइये कि सर्वप्रभु शंकर इस समय कहाँपर हैं? ॥ ५३ ॥
ब्रह्माजी बोले – देवताओंके सहित भगवान् विष्णुकी बात सुनकर शंकरजीके उन गणोंने प्रीतिपूर्वक लक्ष्मीपति विष्णुसे कहा- ॥५४ ॥
शिवगण बोले- हे हरे! जो सम्पूर्ण वृत्तान्त है, ब्रह्मा और देवताओंके साथ उसे आप सुनिये, भगवान् शिवमें प्रेमके कारण हम यथार्थ रूपमें कहते हैं ॥ ५५ ॥
विविध प्रकारकी लीलाओंमें पारंगत देवाधिदेव महादेव शिव हमलोगोंको यहाँ स्थापित करके अत्यन्त स्नेहपूर्वक भगवती पार्वतीके आवास - स्थानपर गये ॥ ५६ ॥
हे लक्ष्मीपति! उस गुहाके भीतर उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये हैं, वहाँ महेश्वर शम्भु क्या कर रहे हैं, इस बातको हम नहीं जानते हैं ॥५७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! उनकी बातोंको सुनकर मेरे तथा देवगणोंके साथ विष्णु आश्चर्यचकित । हो गये और शिवजीके द्वारपर गये ॥५८ ॥
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७३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ तत्र गत्वा मया देवैः स हरिर्देववल्लभः । हे मुनिश्रेष्ठ! वहाँ देवताओं एवं मुझ आर्तवाण्या मने प्रोचे तारस्वरतया तदा ॥ ५ ९ साथ जाकर देवताओंके प्रिय भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माके शंभुमस्तौन्महाप्रीत्या सामरो हि मया हरिः । | स्वरमें आर्तवाणीसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक वहाँ स्थित ऊँचे तत्र स्थितो मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकप्रभुं हरम् ॥ ६० सर्वलोकेश्वर • भगवान् शिवकी स्तुति की ॥ ५ ९ -६० विष्णुरुवाच किं करोषि महादेवाभ्यन्तरे परमेश्वर तारकार्तान्सुरान्सर्वान् पाहि नः शरणागतान् इत्यादि संस्तुवन् शंभुं बहुधा सोऽमरैर्मया रुरोदाति हरिस्तत्र तारकार्तैर्मुनीश्वर दुःखकोलाहलस्तत्र बभूव त्रिदिवौकसाम् मिश्रितश्शिव संस्तुत्यासुरार्त्तानां मुनीश्वर ॥ विष्णु बोले - हे महादेव! हे परमेश्वर ॥ ! आप । गुहाके भीतर क्या कर रहे हैं? तारकासुरसे पीड़ित, आपकी शरणमें आये हुए हम सभी देवताओंकी रक्षा ॥ ६१ | कीजिये ॥ ६१ ॥
। हे मुनीश्वर! इस प्रकार मुझ ब्रह्मा तथा ॥ ६२ देवताओंके सहित विष्णुने शिवकी अनेक प्रकारसे स्तुति की । उस समय तारकासुरसे पीड़ित देवताओंसहित श्रीहरि अत्यन्त विलाप करके रोने लगे ॥ ६२ ॥
हे मुनीश्वर! तारकासुरसे पीड़ित हुए देवताओंके । आर्तनाद और शिवजीकी स्तुतिके मिश्रित होनेसे उस ६३ । समय दुःखभरा महान् कोलाहल हुआ ॥६३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे शिवविहारवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें शिवविहारवर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवान् शिवके तेजसे स्कन्दका प्रादुर्भाव और सर्वत्र महान् आनन्दोत्सवका होना ब्रह्मोवाच
तदाकर्ण्य महादेवो योगज्ञानविशारदः ।
त्यक्तकामो न तत्याज संभोगं पार्वतीभयात् ॥
आजगाम गृहद्वारि सुराणां निकटं शिवः ।
दैत्येन पीडितानां च शंकरो भक्तवत्सलः ॥
देवाः सर्वे प्रभुं दृष्ट्वा हरिणा च मया शिवम् ।
बभूवुः सुखिनश्चाति तदा वै भक्तवत्सलम् ॥
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सुराणां भगवान्भवः ।
प्रत्युवाच विषण्णात्मा दूयमानेन चेतसा ॥
प्रणम्य सुमहाप्रीत्या नतस्कंधाश्च निर्जराः ।
तुष्टुवुः शंकरं सर्वे मया च हरिणा मुने ॥
ब्रह्माजी बोले — देवताओं एवं विष्णुकी स्तुति सुनकर योगज्ञानविशारद भगवान् शंकर यद्यपि १ निष्काम हैं तथापि उन्होंने भोगका परित्याग नहीं किया । फिर वे भक्तवत्सल शंकर दैत्यसे पीड़ित हुए २ देवताओंके समीप घरके दरवाजेपर आये ॥ १-२ ॥ उस समय मुझ ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ देवगण ३ भक्तवत्सल प्रभु शिवका दर्शनकर अत्यन्त सुखी हुए ॥३ ॥
उन देवताओंका पूर्वोक्त वचन सुनकर दुखी ४ आत्मा - वाले भगवान् शंकरने उद्विग्नमन होकर उत्तर दिया ॥ ४ ॥
देवताओंने सिर झुकाकर परम स्नेहपूर्वक | शंकरको प्रणाम किया और हे मुने! मुझ ब्रह्मा | तथा विष्णुके साथ सभी देवताओंने शंकरकी स्तुति ५ की ॥ ५ ॥
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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७३ ९ देवा ऊचुः
देवदेव महादेव करुणासागर प्रभो ।
अन्तर्यामी हि सर्वेषां सर्वं जानासि शंकर ॥
देवकार्यं कुरु विभो रक्ष देवान् महेश्वर ।
जहि दैत्यान् कृपां कृत्वा तारकादीन् महाप्रभो ॥
शिव उवाच
हे विष्णो हे विधे देवाः सर्वेषां वो मनोगतिः ।
यद्भावि तद्भवत्येव कोऽपि नो तन्निवारकः ॥
यजातं तज्जातमेव प्रस्तुतं शृणुतामराः ।
शिवरेतस्खलितं वीर्यं को ग्रहीष्यति मेऽधुना ॥
स गृह्णीयादिति प्रोच्य पातयामास तद्भुवि ।
अग्निर्भूत्वा कपोतो हि प्रेरितः सर्वनिर्जरैः ॥
अभक्षच्छांभवं वीर्यं चंच्वा तु निखिलं तदा ।
एतस्मिन्नन्तरे तत्राजगाम गिरिजा मुने ॥
शिवागमविलंबे च ददर्श सुरपुंगवान् ।
ज्ञात्वा तद्वृत्तमखिलं महाक्रोधयुता शिवा ॥
उवाच त्रिदशान् सर्वान् हरिप्रभृतिकाँस्तदा ॥
देव्युवाच
रे रे सुरगणाः सर्वे यूयं दुष्टा विशेषतः ।
स्वार्थसंसाधका नित्यं तदर्थं परदुःखदाः ॥
स्वार्थहेतोर्महेशानमाराध्य परमं प्रभुम् ।
नष्टं चक्रुर्मद्विहारं वंध्याऽभवमहं सुराः ॥
मां विरोध्य सुखं नैव केषांचिदपि निर्जराः ।
तस्माद्दुःखं भवेद्वो हि दुष्टानां त्रिदिवौकसाम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा विष्णुप्रमुखान् सुरान् सर्वान् शशाप सा ।
प्रज्वलंती प्रकोपेन शैलराजसुता शिवा ॥
देवता बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे करुणासागर प्रभो! आप सबके अन्तर्यामी हैं, हे ६ शंकर! आप सब कुछ जानते हैं । हे विभो! हम देवताओंका कार्य कीजिये । हे महेश्वर! देवताओंकी रक्षा कीजिये तथा हे महाप्रभो! कृपा करके तारकादि ७ असुरोंका विनाश कीजिये॥६-७ ॥ शिव बोले- हे विष्णो! हे विधाता! हे देवो! मैं आप सबके मनका अभिप्राय जान रहा हूँ, किंतु जो होना है, वह होता ही है, भावीका निवारण करनेवाला ८ कोई नहीं है ॥८ ॥
हे देवो! जो होना था, वह तो हो गया, ९ अब जो उपस्थित है, उसके विषयमें सुनिये । मुझ शिवके स्खलित इस तेजको इस समय कौन धारण करेगा? ॥९ ॥
' जिसे धारण करना हो, वह धारण करे ' – इस १० प्रकार कहकर शंकरजी मौन हो गये । तब देवताओंसे प्रेरणा - प्राप्त अग्निने कपोत होकर अपनी चोंचसे शंकरके पृथ्वीपर गिरे समस्त तेजको ग्रहण कर ११ लिया । हे नारद! इसी समय शिवके आगमनमें विलम्ब देखकर वहाँपर भगवती गिरिजा आकर उपस्थित हो गयीं । उन्होंने देवताओंको देखा । वहाँका १२ वह सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर पार्वती महाक्रोधित हो गयीं । तब उन्होंने विष्णुप्रभृति सभी देवताओंसे क्रोधमें १३ भरकर कहा – ॥ १०–१३ ॥ देवी बोलीं- हे देवगणो! तुमलोग बड़े दुष्ट हो, तुम हमेशा अपने स्वार्थसाधनमें लगे रहते १४ हो और अपने स्वार्थसाधनके निमित्त दूसरोंको कष्ट देते हो ॥१४ ॥
तुमलोगोंने अपने स्वार्थके लिये परमप्रभु १५ शिवकी स्तुतिकर मेरा विहार भंग किया, हे देवो! इसी कारण मैं वन्ध्या हो गयी । हे देवताओ! मेरा विरोध करनेसे तुम देवताओंको कभी सुख प्राप्त नहीं होगा और तुम दुष्ट देवताओंको इसी प्रकार १६ महादुःख प्राप्त होगा ॥ १५-१६ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार क्रोधसे जलती हुई शैलपुत्री पार्वतीने विष्णुप्रभृति सभी देवगणोंको १७ शाप दिया ॥ १७ ॥
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७४० पार्वत्युवाच अद्यप्रभृति देवानां वंध्या भार्या भवन्त्विति देवाश्च दुःखिताः सन्तु निखिला मद्विरोधिनः ब्रह्मोवाच इति शप्त्वाखिलान्देवान् विष्ण्वाद्यान्सकलेश्वरी । उवाच पावकं क्रुद्धा भक्षकं शिवरेतसः पार्वत्युवाच
सर्वभक्षी भव शुचे पीडितात्मेति नित्यशः ।
शिवतत्त्वं न जानासि मूर्खोऽसि सुरकार्यकृत् ॥
रे रे शठ महादुष्ट दुष्टानां दुष्टबोधवान् ।
अभक्षः शिववीर्यं यन्नाकार्षीरुचितं हितम् ॥
ब्रह्मोवाच
इति शप्त्वा शिवा वह्निं सहेशेन नगात्मजा ।
जगाम स्वालयं शीघ्रमसंतुष्टा ततो मुने ॥
गत्वा शिवा शिवं सम्यक् बोधयामास यत्नतः ।
अजीजनत्परं पुत्रं गणेशाख्यं मुनीश्वर ॥
तद्वृत्तान्तमशेषं च वर्णयिष्ये मुनेऽग्रतः ।
इदानीं शृणु सुप्रीत्या गुहोत्पत्तिं वदाम्यहम् ॥
पावकार्पितमन्नादि भुंजते निर्जराः खलु ।
वेदवाण्येति सर्वे ते सगर्भा अभवन्सुराः ॥
ततोऽसहंतस्तद्वीर्यं पीडिता ह्यभवन् सुराः ।
विष्ण्वाद्या निखिलाश्चाति शिवाज्ञानष्टबुद्धयः ॥
अथ विष्णुप्रभृतिकाः सर्वे देवा विमोहिताः ।
दह्यमाना ययुः शीघ्रं शरणं पार्वतीपतेः ॥
शिवालयस्य ते द्वारि गत्वा सर्वे विनम्रकाः तुष्टुवुः सशिवां शंभुं प्रीत्या सांजलयःसुराः ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०२ पार्वती बोलीं- आजसे सब देवताओंकी । । वन्ध्या हो जायँ और मेरा विरोध करनेवाले स्त्रियाँ ॥ १८ देवगण सर्वदा दुःख प्राप्त करें ॥ १८ ॥ सभी
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सर्वेश्वरी भगवती पार्वतीने विष्णुप्रभृति देवगणोंको शाप देकर | क्रोधपूर्ण हो शिवके तेजका भक्षण करनेवाले अग्निसे ॥ १ ९ कहा— ॥ १ ९ ॥ पार्वती बोलीं- हे अग्ने! आजसे तुम सर्वभक्षी होकर सदैव दुःख प्राप्त करोगे । तुम्हें शिवतत्त्वका २० ज्ञान नहीं है । तुम देवगणोंका कार्य करनेवाले मूर्ख हो ॥२० ॥
हे शठ! हे दुष्टोंमें महादुष्ट! तुम बड़े दुर्बुद्धि २१ हो, तुमने जो शिवके तेजका भक्षण किया है, यह अच्छा नहीं किया ॥ २१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार अग्निको शाप देकर असन्तुष्ट होकर भगवती पार्वती भगवान् २२ महेश्वरके साथ शीघ्रतापूर्वक अपने आवासमें चली गयीं ॥ २२ ॥
हे मुनीश्वर! वहाँ जाकर पार्वतीने प्रयत्नपूर्वक २३ भलीभाँति शंकरजीको समझाया, फिर उनके सर्वश्रेष्ठ गणेश नामक पुत्र उत्पन्न हुए । हे मुने! इन गणेशजीका सम्पूर्ण वृत्तान्त मैं आगे कहूँगा । इस समय आप २४ प्रेमपूर्वक कार्तिकेयकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनिये, मैं कह रहा हूँ॥२३-२४ ॥ देवतालोग अग्निके मुखसे ही भोजन करते हैं-२५ ऐसा वेदका वचन है, अतः अग्निके गर्भधारण करने सभी देवता गर्भयुक्त हो गये ॥ २५ ॥
शिवके तेजको सहन न करते हुए वे देवता २६ पीड़ित हो गये । यही दशा विष्णु आदि देवताओंकी भी हो गयी; क्योंकि देवी पार्वतीकी आज्ञासे उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी ॥ २६ ॥
इसके बाद विष्णुप्रभृति सभी देवता मोहित २७ होकर [ शिवके वीर्यरूप अग्निसे ] जलते हुए शीघ्र । ही पार्वतीपति भगवान् शंकरकी शरणमें गये । वे लोग | शिवजीके गृहद्वारपर जाकर नम्रतासे हाथ जोड़ स्तुति २८ | करने लगे ॥ २७-२८ ॥