शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 751–760
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760
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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७४१ देवा ऊचुः
देवदेव महादेव गिरिजेश महाप्रभो ।
किं जातमधुना नाथ तव माया दुरत्यया ॥ २ ९
सगर्भाश्च वयं जाता दह्यमानाश्च रेतसा ।
तव शंभो कुरु कृपां निवारय दशामिमाम् ॥ ३०
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्याऽमरनुतिं परमेशः शिवापतिः ।
आजगाम द्रुतं द्वारि यत्र देवाः स्थिता मुने ॥ ३१
आगतं शंकरं द्वारि सर्वे देवाश्च साच्युताः ।
प्रणम्य तुष्टुवुः प्रीत्या नर्तका भक्तवत्सलम् ॥ ३२
देवा ऊचुः
शंभो शिव महेशान त्वां नताः स्म विशेषतः ।
रक्ष नः शरणापन्नान् दह्यमानांश्च रेतसा ॥ ३३
इदं दुःखं हर हर भवामो हि मृता ध्रुवम् ।
त्वां विना कः समर्थोऽद्य देवदुःखनिवारणे ॥ ३४
ब्रह्मोवाच
इति दीनतरं वाक्यमाकर्ण्य सुरराट् प्रभुः ।
प्रत्युवाच विहस्याथ स सुरान् भक्तवत्सलः ॥ ३५
शिव उवाच
हे हरे हे विधे देवाः सर्वे शृणुत मद्वचः ।
भविष्यति सुखं वोऽद्य सावधाना भवन्तु हि ॥ ३६
एतद्वमत मद्वीर्यं द्रुतमेवाखिलाः सुराः ।
सुखिनस्तद्विशेषेण शासनान्मम सुप्रभोः ॥ ३७
ब्रह्मोवाच
इत्याज्ञां शिरसाऽधाय विष्ण्वाद्याः सकलाः सुराः ।
अकार्षुर्वमनं शीघ्रं स्मरन्तः शिवमव्ययम् ॥ ३८
तच्छंभुरेतः स्वर्णाभं पर्वताकारमद्भुतम् ।
अभवत्पतितं भूमौ द्यामेव सुप्रभम् ॥ ३ ९
स्पृशद्
अभवन्सुखिनः सर्वे सुराः सर्वेऽच्युतादयः ।
अस्तुवन् परमेशानं शंकरं भक्तवत्सलम् ॥ ४०
देवता बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे गिरिजेश! हे महाप्रभो! हे नाथ! यह क्या हो गया? निश्चय ही आपकी मायाको समझना बड़ा कठिन है ॥ २ ९ ॥ हमलोग गर्भयुक्त होकर आपकी असह्य वीर्यज्वालासे जल रहे हैं, हे शम्भो! कृपा कीजिये और हमलोगोंकी दुरवस्थाका निवारण कीजिये ॥ ३० ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! देवताओंकी इस प्रकारकी स्तुति सुनकर उमापति परमेश्वर शिव गृहद्वारपर जहाँ देवता स्थित थे, वहाँ शीघ्र आये ॥३१ ॥
द्वारपर आये हुए सदाशिवको देखते ही विष्णुसमेत सभी देवगण विनम्र होकर प्रणामकर उन भक्तवत्सलकी प्रेमपूर्वक स्तुति करने लगे ॥३२ ॥
देवता बोले- हे शम्भो! हे शिव! हे महादेव! आपको विशेष रूपसे प्रणाम करते हैं । आपके तेजसे जलते हुए हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये ॥३३ ॥
हे हर! इस दुःखका हरण कीजिये, अन्यथा हमलोग निश्चित ही मर जायँगे । इस समय देवताओंके दुःखका निवारण करनेमें आपके बिना कौन समर्थ है? ॥ ३४ ॥
ब्रह्माजी बोले — भक्तवत्सल, सुरेश्वर भगवान् शिवने ऐसी दीनवाणीको सुनकर हँसते हुए देवताओंको उत्तर दिया ॥ ३५ ॥
शिव बोले- हे हरे! हे ब्रह्मन्! हे देवो! आप सभी मेरी बात सुनें । आपलोग आज ही सुखी हो जायँगे, सावधान हो जायँ । सभी देवगण मेरे तेजका शीघ्र ही वमन कर दें । मुझ सुप्रभुकी आज्ञा माननेसे आपलोगोंको विशेष सुख होगा ॥ ३६-३७ ॥ ब्रह्माजी बोले- विष्णु आदि सभी देवताओंने इस आज्ञाको शिरोधार्य करके अव्यय भगवान् शिवका स्मरण करते हुए शीघ्र ही तेजका वमन कर दिया ॥ ३८ ॥
शम्भुका स्वर्णिम आभावाला, अद्भुत तथा सुन्दर कान्तिवाला वह तेज भूमिपर गिरकर पर्वताकार हो गया और अन्तरिक्षका स्पर्श करने लगा ॥ ३ ९ ॥ श्रीहरिसहित सभी देवगण सुखी हो गये और परमेश्वर शिवकी स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥
॥ भक्तवत्सल
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७४२ पावकस्त्वभवन्नैव सुखी तत्र मुनीश्वर तस्याज्ञां परमोऽदाद्वै शंकरः परमेश्वरः
ततः स वह्निर्विकलः सांजलिर्नतको मुने ।
अस्तौच्छिवं सुखी नात्मा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
अग्निरुवाच
देवदेव महेशान मूढोऽहं तव सेवकः ।
क्षमस्व मेऽपराधं हि मम दाहं निवारय ॥
त्वं दीनवत्सलः स्वामिन् शंकरः परमेश्वरः ।
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पावको दीनवत्सलम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य शुचेर्वाणीं स शंभुः परमेश्वरः ।
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पावकं दीनवत्सलः ॥
शिव उवाच
कृतं त्वनुचितं कर्म मद्रेतो भक्षितं हि यत् ।
अतो निवृत्तस्ते दाहः पापाधिक्यान्मदाज्ञया ॥
इदानीं त्वं सुखी नाम शुचे मच्छरणागतः ।
अतः प्रसन्नो जातोऽहं सर्वं दुःखं विनश्यति ॥
कस्याश्चित्सुस्त्रियां योनौ मद्रेतस्त्यज यत्नतः ।
भविष्यसि सुखी त्वं हि निर्दाहात्मा विशेषतः ॥
ब्रह्मोवाच
शंभुवाक्यं निशम्येति प्रत्युवाच शनैः शुचिः ।
सांजलिर्नतकः प्रीत्या शंकरं भक्तशंकरम् ॥
दुरासदमिदं तेजस्तव नाथ महेश्वर ।
काचिन्नास्ति विना शक्त्या धर्तुं योनौ जगत्त्रये ॥
इत्थं यदाऽब्रवीद्वह्निस्तदा त्वं मुनिसत्तम ।
शंकरप्रेरितः प्रात्थ हृदाग्निमुपकारकः ॥
नारद उवाच शृणु मद्वचनं वह्ने तव दाहहरं शुभम् । परमानंददं रम्यं सर्वकष्टनिवारकम् ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । हे मुनीश्वर! किंतु अग्निदेव वहाँ प्रसन्न ॥ ४१ हुए । तब परमेश्वर श्रेष्ठ शंकरने उन्हें आज्ञा दी नहीं हे मुने! तदनन्तर वे अग्निदेव मनमें ॥ ४१ ॥
मानकर विकल हो हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक शिवको सुख न ४२ स्तुति करते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ॥
अग्नि बोले — देवाधिदेव महेश्वर! मैं मूर्ख हूँ तथापि आपका सेवक हूँ, मेरे अपराधको क्षमा करें ४३ और मेरे दाहका निवारण करें । हे स्वामिन्! आप दीनवत्सल परमेश्वर सदाशिव हैं । इस प्रकारसे प्रसन्नात्मा ४४ अग्निदेवने दीनवत्सल शिवसे कहा ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्माजी बोले- अग्निकी यह बात सुनकर दीनवत्सल उन परमेशान सदाशिवने प्रसन्न होकर ४५ अग्निसे इस प्रकार कहा— ॥ ४५ ॥
शिव बोले- [ हे अग्नि! ] पापकी अधिकताके कारण ही तुमने यह अनुचित कार्य किया कि मेरे ४६ तेजका भक्षण कर लिया, अब मेरी आज्ञासे तुम्हारे दाहका निवारण हो गया । हे अग्ने! अब तुम मेरी शरणमें आ गये हो, इससे मैं प्रसन्न हुआ । अब ४७ तुम्हारा सारा दुःख दूर हो जायगा और तुम सुखी हो जाओगे ॥ ४६-४७ ॥ अब तुम किसी सुलक्षणा स्त्रीमें मेरे रेतको ४८ प्रयत्नपूर्वक स्थापित करो । इससे तुम दाहमुक्त होकर विशेष रूपसे सुखी हो जाओगे ॥४८ ॥
ब्रह्माजी बोले— भगवान् शंकरकी बातको सुनकर अग्नि हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर प्रीतिपूर्वक ४ ९ भक्तोंके कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरसे धीरे - धीरे बोले— ॥ ४ ९ ॥ हे महेश्वर! हे नाथ! आपका यह तेज असह्य ५० है । शक्तिस्वरूपा भगवतीके अतिरिक्त तीनों लोकों में इसे धारण करनेमें कोई समर्थ नहीं है ॥५० ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! अग्निने जब ऐसा कहा, तब ५१ हृदयसे अग्निका उपकार चाहनेवाले आपने भगवान् शंकरकी प्रेरणासे इस प्रकार कहा- ॥ ५१ ॥
नारदजी बोले – हे अग्ने! तुम्हारे दाहका | निवारण करनेवाला कल्याणकारी परम आनन्ददायक, | रमणीय,, मेरा तथा सभी कष्टोंका निवारण करनेवाला ५२ | वचन सुनो ॥ ५२ ॥
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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७४३
कृत्वोपायमिमं वह्ने सुखी भव विदाहकः ।
शिवेच्छया मया सम्यगुक्तं तातेदमादरात् ॥
तपोमासस्नानकर्च्यः स्त्रियो याः स्युः प्रगे शुचे ।
तद्देहेषु स्थापय त्वं शिवरेतस्त्विदं महत् ॥
ब्रह्मोवाच
तस्मिन्नवसरे तत्रागताः सप्तमुनिस्त्रियः ।
तपोमासि स्नानकामाः प्रातः सन्नियमा मुने ॥
स्नानं कृत्वा स्त्रियस्ता हि महाशीतार्द्दिताश्च षट् ।
गंतुकामा मुने याता वह्निज्वालासमीपतः ॥
विमोहिताश्च ता दृष्ट्वारुन्धती गिरिशाज्ञया ।
निषिषेध विशेषेण सुचरित्रा सुबोधिनी ॥
ताः षड् मुनिस्त्रियो मोहाद्धठात्तत्र गता मुने ।
स्वशीतविनिवृत्त्यर्थं मोहिताः शिवमायया ॥
तद्रेतःकणिकाः सद्यस्तद्देहान् विविशुर्मुने ।
मद्वाराऽखिला वह्निरभूद्दाहविवर्जितः ॥
अंतर्धाय द्रुतं वह्निर्व्वालारूपो जगाम ह सुखी स्वलोकं मनसा स्मरंस्त्वां शंकरं च तम् ॥ सगर्भास्ताः स्त्रियः साधोऽभवन् दाहप्रपीडिताः जग्मुः स्वभवनं तातारुंधती दुःखिताग्निना दृष्ट्वा स्वस्त्रीगतिं तात नाथाः क्रोधाकुला द्रुतम् तत्यजुस्ताः स्त्रियस्तात सुसंमंत्र्य परस्परम् अथ ताः षट् स्त्रियः सर्वा दृष्ट्वा स्वव्यभिचारकम् महादुःखान्वितास्ताताभवन्नाकुलमानसाः हे वह्ने! मेरे द्वारा बतलाये जानेवाले इस ५३ उपायको करके दाहरहित होकर सुखी हो जाओ । हे तात! भगवान् शिवकी इच्छासे ही मैंने आदरपूर्वक भलीभाँति कहा है ॥५३ ॥
हे शुचे! माघमासमें प्रातःकाल जो स्त्रियाँ ५४ स्नान करती हों, इस महान् तेजको तुम उनके शरीरमें स्थापित कर दो ॥५४ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! उसी अवसरपर माघमासमें प्रातःकाल नियमपूर्वक स्नान करनेकी ५५ इच्छासे सप्तर्षियोंकी स्त्रियाँ वहाँ आयीं ॥५५ ॥
हे मुने! स्नान करके वे स्त्रियाँ अत्यन्त ठण्ढसे ५६ पीड़ित हो गयीं और उनमेंसे छः स्त्रियाँ अग्निज्वालाके समीप जानेकी इच्छासे वहाँसे चल पड़ीं ॥ ५६ ॥
उन्हें मोहित देखकर सुचरित्रा, ज्ञानवती देवी ५७ अरुन्धतीने शिवकी आज्ञासे उन्हें जानेसे विशेषरूपसे रोका ॥ ५७ ॥
हे मुने! भगवान् शिवकी मायासे मोहित वे ५८ छ: ऋषिपलियाँ अपने शीतका निवारण करनेके लिये हठपूर्वक वहाँ जा पहुँचीं ॥५८ ॥
हे मुने! [ अग्निके द्वारा गृहीत ] उस रेतके सभी ५ ९ कण रोमकूपोंके द्वारा शीघ्र ही उन ऋषिपत्नियोंके देहोंमें प्रविष्ट हो गये और वे अग्नि दाहसे मुक्त हो गये ॥५ ९ ॥ । अग्नि अन्तर्धान होकर ज्वालारूपसे शीघ्र ही ६० उन भगवान् शंकर और आपका मनसे स्मरण करते हुए सुखपूर्वक अपने लोकको चले गये ॥६० ॥
हे साधो! वे स्त्रियाँ अग्निके द्वारा दाहसे पीड़ित । ॥ ६१ और गर्भवती हो गयीं । हे तात! अरुन्धती दुखी होकर अपने आश्रमको चली गयीं ॥ ६१ ॥
। हे तात! अपनी स्त्रियोंकी गर्भावस्था देखकर ॥ ६२ उनके पति तुरंत क्रोधसे व्याकुल हो गये और परस्पर भलीभाँति विचार - विमर्श करके उन्होंने अपनी पत्नियोंका त्याग कर दिया ॥६२ ॥
हे तात! वे छहों ऋषिपत्नियाँ अपनी गर्भावस्थाका विचार करके अत्यन्त दुःखित और
।
चित्तवाली हो गयीं ॥ ६३ ॥
॥ ६३ | व्याकुल
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७४४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
तत्यजुश्शिवरेतस्तद्गर्भरूपं मुनिस्त्रियः ।
ता हिमाचलपृष्ठेऽथाभवन् दाहविवर्जिताः ॥ ६४
असहन् शिवरेतस्तद्धिमाद्रिः कंपमुद्वहन् ।
गंगायां प्राक्षिपत्तूर्णमसह्यं दाहपीडितः ॥ ६५
गंगयाऽपि च तद्वीर्यं दुस्सहं परमात्मनः ।
निःक्षिप्तं हि शरस्तंबे तरंगैः स्वैर्मुनीश्वर ॥ ६६
पतितं तत्र तद्रेतो द्रुतं बालो बभूव ह ।
सुन्दरः सुभगः श्रीमांस्तेजस्वी प्रीतिवर्द्धनः ॥ ६७
मार्गमासे सिते पक्षे तिथौ षष्ठ्यां मुनीश्वर ।
प्रादुर्भावोऽभवत्तस्य शिवपुत्रस्य भूतले ॥ ६८
तस्मिन्नवसरे ब्रह्मन्नकस्माद्धिमशैलजा ।
अभूतां सुखिनौ तत्र स्वगिरौ गिरिशोऽपि च ॥ ६ ९
शिवाकुचाभ्यां सुस्राव पय आनन्दसंभवम् ।
तत्र गत्वा च सर्वेषां सुखमासीन्मुनेऽधिकम् ॥ ७०
मंगलं चाऽभवत्तात त्रिलोक्यां सुखदं सताम् ।
खलानामभवद्विघ्नो दैत्यानां च विशेषतः ॥ ७१
|
अकस्मादभवद् व्योम्नि परमो दुर्दुभिध्वनिः ।
पुष्पवृष्टिः पपाताऽशु बालकोपरि नारद ॥ ७२
विष्ण्वादीनां समस्तानां देवानां मुनिसत्तम ।
अभूदकस्मात्परम आनन्दः परमोत्सवः ॥७३ ।
२ उन मुनिपत्नियोंने शिवके उस गर्भरूप तेजको हिमशिखरपर त्याग दिया और वे दाहरहित गयीं ॥ ६४ ॥ हो
_भगवान् शिवके उस असहनीय तेजको धारण करनेमें असमर्थ होनेके कारण हिमालय प्रकम्पित हो उठे और दाहसे पीड़ित होकर उन्होंने शीघ्र ही उस तेजको गंगामें विसर्जित कर दिया ॥ ६५ ॥
हे मुनीश्वर! गंगाने भी परमात्माके उस दुःसह तेजको अपनी तरंगोंके द्वारा सरकण्डोंके समूहमें स्थापित कर दिया ॥ ६६ ॥
वहाँ गिरा हुआ वह तेज शीघ्र ही एक सुन्दर, सौभाग्यशाली, शोभायुक्त, तेजस्वी और प्रीतिको बढ़ानेवाले बालकके रूपमें परिणत हो गया ॥ ६७ ॥
हे मुनीश्वर! मार्गशीर्ष ( अगहन ) मासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको उस शिवपुत्रका पृथ्वीपर प्रादुर्भाव हुआ ॥६८ ॥
हे ब्रह्मन्! इस अवसरपर अपने कैलास पर्वतपर हिमालयपुत्री पार्वती तथा भगवान् शंकर भी अकस्मात् आनन्दित हो उठे ॥ ६ ९ ॥ हे मुने! भगवती पार्वतीके स्तनोंसे आनन्दातिरेकके कारण दुग्धस्राव होने लगा । वहाँ जाकर सबको अत्यन्त प्रसन्नता हुई ॥ ७० ॥
हे तात! त्रिलोकीमें सभी सज्जनोंके यहाँ अत्यन्त सुख देनेवाला मांगलिक वातावरण हो गया । दुष्ट दैत्योंके यहाँ विशेष रूपसे विघ्न होने लगे ॥ ७१ ॥
हे नारद! अकस्मात् अन्तरिक्षमें महान् दुन्दुभिनाद होने लगा और उस बालकपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ ७२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! विष्णु आदि सभी देवताओंको भी अकस्मात् परम आनन्द हुआ और महान् उत्सव होने लगा ॥७३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे ॥ २ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत शिवपुत्रजननवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः शिवपुत्रजननवर्णन द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्ड में नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥
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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७४५ अथ तृतीयोऽध्यायः महर्षि विश्वामित्रद्वारा बालक स्कन्दका संस्कार सम्पन्न करना, बालक स्कन्दद्वारा क्रौंच-पर्वतका भेदन, इन्द्रद्वारा बालकपर वज्रप्रहार, शाख - विशाख आदिका उत्पन्न होना, कार्तिकेयका षण्मुख होकर नारद उवाच
देवदेव प्रजानाथ ब्रह्मन् सृष्टिकर प्रभो ।
ततः किमभवत्तत्र तद्वदाऽद्य कृपां कुरु ॥
ब्रह्मोवाच
तस्मिन्नवसरे तात विश्वामित्रः प्रतापवान् ।
प्रेरितो विधिना तत्रागच्छत्प्रीतो यदृच्छया ॥
स दृष्ट्वालौकिकं धाम तत्सुतस्य सुतेजसः ।
अभवत्पूर्णकामस्तु सुप्रसन्नो ननाम च ॥
अकरोत्सुनुतिं तस्य सुप्रसन्नेन चेतसा ।
विधिप्रेरितवाग्भिश्च विश्वामित्रः प्रभाववित् ॥
ततः सोऽभूत्सुतस्तत्र सुप्रसन्नो महोतिकृत् ।
सुप्रहस्याद्भुतमहो विश्वामित्रमुवाच च ॥
शिवसुत उवाच
शिवेच्छया महाज्ञानिन्नकस्मात्त्वमिहागतः ।
संस्कारं कुरु मे तात यथावद्वेदसंमितम् ॥
अद्यारभ्य पुरोधास्त्वं भव मे प्रीतिमावहन् ।
भविष्यसि सदा पूज्यः सर्वेषां नात्र संशयः ॥
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुप्रसन्नो हि गाधिजः ।
तमुवाचानुदात्तेन स्वरेण च सुविस्मितः ॥
विश्वामित्र उवाच
शृणु तात न विप्रोऽहं गाधिक्षत्रियबालकः ।
विश्वामित्रेति विख्यातः क्षत्रियो विप्रसेवकः ॥
इति स्वचरितं ख्यातं मया ते वरबालक ।
कस्त्वं स्वचरितं ब्रूहि विस्मितायाखिलं हि मे ॥
छः कृत्तिकाओंका दुग्धपान करना नारदजी बोले - हे देवदेव! हे प्रजानाथ! हे ब्रह्मन्! हे सृष्टिकर्ता प्रभो! इसके बाद वहाँ क्या १ हुआ, इसे आप कृपाकर बताइये ॥१ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे तात! इसी समय विधाताके द्वारा प्रेरित होकर महाप्रतापी विश्वामित्र २ स्वेच्छासे घूमते - घूमते वहाँ जा पहुँचे । इस तेजस्वी बालकके अलौकिक तेजको देखकर वे कृतार्थ हो गये और उन्होंने प्रसन्न होकर उस बालकको ३ नमस्कार किया॥२-३ ॥ उस बालकके प्रभावको जाननेवाले महर्षि ४ विश्वामित्रने प्रसन्नचित्त हो विधिप्रेरित वाणीसे उस बालककी स्तुति की । महान् लीला करनेवाला वह बालक अत्यन्त प्रसन्न हुआ और अद्भुत हास्य करता ५ हुआ विश्वामित्रसे बोला - ॥४-५ ॥ शिवपुत्र बोले- हे महाज्ञानिन्! आप अचानक शिवेच्छासे यहाँ आ पहुँचे हैं । अतः हे तात! वेदोक्त ६ रीतिसे मेरा यथाविधि संस्कार सम्पन्न कीजिये । आजसे आप प्रसन्नतापूर्वक मेरे पुरोहित हो जायँ, इससे आप सदा सबके पूज्य होंगे । इसमें संशय नहीं ७ है ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले- बालककी यह बात सुनकर गाधिपुत्र विश्वामित्रजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये और ८ आश्चर्यचकित होकर मन्द स्वरसे उस बालकसे उन्होंने कहा —॥८ ॥
विश्वामित्र बोले — हे तात! सुनो, मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, किंतु गाधिसुत क्षत्रियकुमार हूँ । मेरा नाम ९ विश्वामित्र है, मैं तो ब्राह्मणसेवक क्षत्रिय हूँ॥९॥
हे श्रेष्ठ बालक! मैंने तुमसे अपना सारा चरित निवेदन कर दिया, तुम कौन हो? अपना सम्पूर्ण चरित्र कहो । मैं आश्चर्यान्वित हो रहा हूँ ॥१० ॥
१० | मुझसे
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७४६ ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तत्स्ववृत्तं जगाद ह ततश्वोवाच सुप्रीत्या गाधिजं तं महोतिकृत् शिवसुत उवाच विश्वामित्र वरान्मे त्वं ब्रह्मर्षिर्नात्र संशयः वसिष्ठाद्याश्च नित्यं त्वां प्रशंसिष्यंति चादरात् अतस्त्वमाज्ञया मे हि संस्कारं कर्तुमर्हसि इदं सर्वं सुगोप्यं ते कथनीयं न कुत्रचित् ब्रह्मोवाच ततोऽकार्षीत्स संस्कारं तस्य प्रीत्याऽखिलं यथा शिवबालस्य देवर्षे वेदोक्तविधिना परम् शिवबालोऽपि सुप्रीतो दिव्यज्ञानमदात्परम् । विश्वामित्राय मुनये महोतिकारकः प्रभुः
पुरोहितं चकारासौ विश्वामित्रं शुचेस्सुतः ।
तदारभ्य द्विजवरो नानालीलाविशारदः ॥
इत्थं लीला कृता तेन कथिता सा मया मुने ।
तल्लीलामपरां तात शृणु प्रीत्या वदाम्यहम् ॥
तस्मिन्नवसरे तात श्वेतनामा च संप्रति । श्रीशिवमहापुराण ब्रह्माजी । | सुनकर महान् ॥ ११ उन गाधिपुत्र कहा ॥११ ॥
शिवसुत [ अ ० ३ बोले- विश्वामित्रजीके इस वचनको लीला करनेवाले बालकने विश्वामित्रजीसे प्रसन्न हो अपना सारा चरित्र बोले- हे विश्वामित्रजी! आप मेरे । । वरदानसे ब्रह्मर्षि हैं, इसमें संशयकी बात नहीं है । ॥ १२ वसिष्ठादि ऋषिगण भी आदरपूर्वक आपकी प्रशंसा करेंगे । इस कारण आप मेरी आज्ञासे मेरा संस्कार । करें, यह सब रहस्य आपको गुप्त ही रखना चाहिये, ॥ १३ कहीं नहीं कहना चाहिये ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे देवर्षे! तदनन्तर । विश्वामित्रजीने परम प्रेमपूर्वक वेदोक्तरीतिसे भगवान् ॥ १४ शिवके उस बालकके सम्पूर्ण संस्कार सम्पन्न किये ॥१४ ॥
महान् लीला करनेवाले प्रभु शिवपुत्रने भी ॥ १५ बड़े प्रेमसे महर्षि विश्वामित्रजीको दिव्य ज्ञान प्रदान किया ॥ १५ ॥
नाना प्रकारकी लीलामें पारंगत अग्निपुत्रने १६ विश्वामित्रजीको अपना पुरोहित बना लिया । उसी समयसे वे विश्वामित्र द्विजश्रेष्ठके रूपमें प्रतिष्ठित हो गये ॥१६ ॥
हे मुने! उस बालकने इस प्रकार जो लीला की १७ है, वह मैंने आपको बता दी । हे तात! उस बालककी दूसरी लीला मैं बता रहा हूँ, प्रेमपूर्वक सुनो ॥ १७ ॥
उसी समय श्वेतने उस दिव्य तेजसम्पन्न परम तत्राऽपश्यत्सुतं दिव्यं निजं परमपावनम् ॥ १८ पावन बालकको देखकर अपना पुत्र मान लिया ।
ततस्तं पावको गत्वा दृष्ट्वालिंग्य चुचुम्ब च ।
पुत्रेति चोक्त्वा तस्मै स शस्त्रं शक्तिं ददौ च सः ॥
गुहस्तां शक्तिमादाय तच्छृङ्गं चारुरोह ह ।
तं जघान तया शक्त्या शृंगो भुवि पपात सः ॥
दशपद्ममिता वीरा राक्षसाः पूर्वमागताः । तद्वधार्थं द्रुतं नष्टा बभूवुस्तत्प्रहारतः ॥ | तदनन्तर अग्निदेवने उस स्थानपर जाकर बालकको | गले लगाकर उसका चुम्बन किया और उन्होंने उस | बालकको ' पुत्र ' शब्दसे पुकारते हुए अपनी शक्ति १ ९ तथा अस्त्र उसे प्रदान किया ॥ १८-१९ ॥ गुह कार्तिकेय उस शक्तिको लेकर क्रौंच २० पर्वतके शिखरपर चढ गये और उस शक्तिसे शिखर पर | ऐसा प्रहार किया कि वह शिखर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥२० ॥
_उस बालकका वध करनेके लिये सबसे पहले | दस पद्म वीर राक्षस वहाँ आये, किंतु कुमारके प्रहार २१ वे सभी शीघ्र ही विनष्ट हो गये ॥ २१ ॥
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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७४७
हाहाकारो महानासीच्चकंपे साचला मही ।
त्रैलोक्यं च सुरेशानः सदेवस्तत्र चागमत् ॥
दक्षिणे तस्य पार्श्वे च वज्रेण स जघान ह ।
शाखनामा ततो जातः पुमांश्चैको महाबलः ॥
पुनश्शक्रो जघानाशु वामपार्श्वे हि तं तदा ।
वज्रेणाऽन्यः पुमाञ्जातो विशाखाख्योऽपरो बली ॥
ततस्तद्धृदयं शक्रो जघान पविना तदा ।
परोऽभून्नैगमोपाख्यः पुमांस्तद्वन्महाबलः ॥
तदा स्कंदादिचत्वारो महावीरा महाबलाः ।
इन्द्रं हन्तुं द्रुतं जग्मुः सोऽयं तच्छरणं ययौ ॥
शक्रः ससामरगणो भयं प्राप्य गृहात्ततः ।
ययौ स्वलोकं चकितो न भेदं ज्ञातवान्मुने ॥
स बालकस्तु तत्रैव तस्थाऽऽवानंदसंयुतः ।
पूर्ववन्निर्भयस्तात नानालीलाकरः प्रभुः ॥
तस्मिन्नवसरे तत्र कृत्तिकाख्याश्च षट् स्त्रियः ।
स्नातुं समागता बालं ददृशुस्तं महाप्रभुम् ॥
ग्रहीतुं तं मनश्चक्रुः सर्वास्ता कृत्तिकाः स्त्रियः ।
वादो बभूव तासां तद्ग्रहणेच्छापरो मुने ॥
तद् वादशमनार्थं स षण्मुखानि चकार ह ।
पपौ दुग्धं च सर्वासां तुष्टास्ता अभवन्मुने ॥
तन्मनोगतिमाज्ञाय सर्वास्ताः कृत्तिकास्तदा ।
तमादाय ययुर्लोकं स्वकीयं मुदिता मुने ॥
तं बालकं कुमाराख्यं स्तनं दत्त्वा स्तनार्थिने ।
वर्द्धयामासुरीशस्य सुतं सूर्याधिकप्रभम् ॥
न चक्रुर्बालकं लोचनानामगोचरम् । याश्च प्राणेभ्योऽपि प्रेमपात्रं यः पोष्टा तस्य पुत्रकः ॥ उस समय सभी जगह महान् हाहाकार मच २२ गया, पर्वतोंके सहित सारी पृथ्वी और त्रैलोक्य काँपने लगा । उसी समय देवगणोंके साथ देवराज इन्द्र वहाँ आ पहुँचे ॥२२ ॥
इन्द्रने अपने वज्रसे कार्तिकेयके दक्षिण पार्श्वमें २३ प्रहार किया । वज्रके लगते ही उससे शाख नामक एक महान् बलवान् पुरुष प्रकट हो गया । पुनः इन्द्रने उसके वाम पार्श्वमें शीघ्र ही वज्रसे प्रहार किया, उस २४ वज्रके लगते ही उससे एक और विशाख नामक बलवान् पुरुष उत्पन्न हो गया । फिर इन्द्रने वज्रसे उसके हृदयमें प्रहार किया, जिससे उसीके समान बलवान् २५ नैगम नामक एक पुरुष प्रकट हो गया ॥ २३–२५ ॥ तब स्कन्द, शाख, विशाख तथा नैगम — ये २६ चारों महाबलसम्पन्न महावीर इन्द्रको मारनेके लिये । बड़ी शीघ्रतासे दौड़ पड़े । यह देखकर वे इन्द्र उनकी शरणमें गये ॥२६ ॥
हे मुने! देवगणोंके सहित इन्द्र उनसे भयभीत २७ हो उठे और वे विस्मित हो उस स्थानसे अपने लोक चले गये, किंतु उन्हें भी पराक्रमके रहस्यका ज्ञान नहीं हुआ ॥ २७ ॥
हे तात! विविध प्रकारकी लीलाओंको करनेवाला २८ वह बालक आनन्दपूर्वक निर्भय हो वहींपर स्थित हो गया । उसी समय कृत्तिका नामवाली छः स्त्रियाँ वहाँ स्नानके लिये आयीं और उन्होंने प्रभावशाली उस बालकको २ ९ । देखा । हे मुने! उन सभी कृत्तिकाओंने उस बालकको ग्रहण करना चाहा, उसी समय ग्रहण करनेकी इच्छासे ३० उनमें परस्पर विवाद होने लगा ॥ २८–३० ॥ हे मुने! उनके विवादका शमन करनेके लिये उस बालकने छः मुख बना लिये और उन सबका स्तनपान ३१ किया, जिससे वे परम प्रसन्न हो उठीं । हे मुने! फिर उस बालकके मनकी गति जानकर वे सभी कृत्तिकाएँ प्रसन्नतासे ३२ उसे लेकर अपने लोक चली गयीं ॥ ३१-३२ ॥ उन्होंने सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी तथा स्तनपानकी इच्छा करनेवाले उस कुमार नामवाले बालक शिवपुत्रको ३३ अपना दूध पिलाकर बड़ा किया । वे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय उस बालकको कभी आँखोंकी ओट न करतीं, जो पोषण करता है, उसीका वह पुत्र होता है ॥ ३३-३४ ॥ ३४
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७४८ यानि यानि च वस्त्राणि त्रैलोक्ये दुर्लभानि च ददुस्तस्मै च ताः प्रेम्णा भूषणानि वराणि वै दिने दिने ताः पुपुषुर्बालकं तं महाप्रभम् प्रशंसितानि स्वादूनि भोजयित्वा विशेषतः अथैकस्मिन् दिने तात स बालः कृत्तिकात्मजः गत्वा देवसभां दिव्यां सुचरित्रं चकार ह स्वमहो दर्शयामास देवेभ्यो हि महाद्भुतम् सविष्णुभ्योऽखिलेभ्यश्च महोतिकरबालकः तं दृष्ट्वा सकलास्ते वै साच्युताः सर्षयः सुराः विस्मयं प्रापुरत्यन्तं पप्रच्छुस्तं च बालकम्
को भवानिति न किंचित्स जगाद ह ।
स्वालयं स जगामाशु गुप्तस्तस्थौ हि पूर्ववत् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ । जो - जो वस्त्र एवं आभूषण इस त्रैलोक्यमें दुर्लभ ॥ ३५ हैं, उन सभी वस्त्रों एवं श्रेष्ठ भूषणोंको प्रेमसे वे लम । बालकको प्रदान करतीं । इसी प्रकार वे अत्यन्त प्रशंसाके । | योग्य, दुर्लभ एवं स्वादिष्ट अन्नोंको प्रतिदिन खिला-॥ ३६ खिलाकर उस बालकको पुष्ट करने लगीं ॥ ३५-३६ ॥ । हे तात! इसके बाद एक दिन कृत्तिकाओंके उस ॥ ३७ पुत्रने दिव्य देवसभामें जाकर बड़ा सुन्दर चरित्र किया और महान् लीला करनेवाला वह बालक सम्पूर्ण । देवताओंसहित विष्णुको अपना महान् अद्भुत ऐश्वर्य ॥ ३८ दिखाने लगा ॥ ३७-३८ ॥ । उसकी इस महिमाको देखकर विष्णुसहित अन्य देवगण तथा ऋषि अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३ ९ और उस बालकसे पूछने लगे कि हे बालक! तुम कौन हो? उनकी बात सुनकर उस बालकने कुछ भी नहीं कहा और वह शीघ्र ही अपने घर चला गया ४० और पूर्ववत् गुप्तरूपसे रहने लगा ॥३ ९ -४० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे कार्तिकेयलीलावर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें कार्तिकेयकी लीलाका वर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः पार्वतीके कहनेपर शिवद्वारा देवताओं तथा कर्मसाक्षी धर्मादिकोंसे कार्तिकेयके विषयमें जिज्ञासा करना और अपने गणोंको कृत्तिकाओंके पास भेजना, नन्दिकेश्वर तथा कार्तिकेयका वार्तालाप, कार्तिकेयका कैलासके लिये प्रस्थान नारद उवाच नारदजी बोले — हे देवाधिदेव! हे प्रजानाथ! देवदेव प्रजानाथ ततः किमभवद्विधे । । हे विधे! इसके अनन्तर फिर क्या हुआ, आप इस वदेदानीं कृपातस्तु शिवलीलासमन्वितम् ॥ १ समय कृपा करके शिवजीकी लीलासे युक्त इस ब्रह्मोवाच
कृत्तिकाभिर्गृहीते वै तस्मिन् शंभुसुते मुने ।
कश्चित्कालो व्यतीयाय बुबुधे न हिमाद्रिजा ॥
तस्मिन्नवसरे दुर्गा स्मेराननसरोरुहा ।
उवाच स्वामिनं शंभुं देवदेवेश्वरं प्रभुम् ॥
पार्वत्युवाच
देवदेव महादेव शृणु मे वचनं शुभम् ।
पूर्वपुण्यातिभारेण त्वं मया प्राप्त ईश्वरः ॥
चरित्रको कहिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार शिवपुत्रको | ग्रहणकर उन्हें अपना पुत्र मानते हुए कृत्तिकाओंका २ कुछ काल व्यतीत हो गया, पर पार्वतीको यह । समाचार ज्ञात न हुआ । उस समय पार्वतीने मन्द ३ मुसकानयुक्त हँसते हुए अपने मुखकमलसे देवदेवेश्वर स्वामी श्रीसदाशिवसे कहा- ॥ २-३ ॥ पार्वतीजी बोलीं- हे देवाधिदेव! हे महादेव! आप । मेरे शुभ वचनको सुनिये । मेरे पूर्वजन्मके अत्यन्त पुण्य- ॥ ४ प्रभावसे आप ईश्वर मुझे पतिरूपसे हैं ॥ ४ प्राप्त हुए ।
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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७४ ९ योगिषु श्रेष्ठो विहारैस्तत्परोऽभवः । कृपया रतिभंगः कृतो देवैस्तत्र मे भवता भव ॥
भूमौ निपतितं वीर्यं नोदरे मम ते विभो ।
यातं च तद्देव केन देवेन निह्नुतम् ॥
कुत्र
कथं मत्स्वामिनो वीर्यममोघं ते महेश्वर ।
मोघं यातं च किं किं वा शिशुर्जातश्च कुत्रचित् ॥
ब्रह्मोवाच
पार्वतीवचनं श्रुत्वा प्रहस्य जगदीश्वरः ।
उवाच देवानाहूय मुनींश्चापि मुनीश्वर ॥
महेश्वर उवाच
देवाः शृणुत मद्वाक्यं पार्वतीवचनं श्रुतम् ।
अमोघं कुत्र मे वीर्यं यातं केन च निह्नुतम् ॥
सभयं नाप तत्क्षिप्रं स चेद्दंडं न चार्हति ।
शक्तौ राजा न शास्ता यः प्रजाबाध्यश्च भक्षकः ॥
ब्रह्मोवाच
शंभोस्तद्वचनं श्रुत्वा समालोच्य परस्परम् ।
ऊचुः सर्वे क्रमेणैव त्रस्तास्तु पुरतः प्रभोः ॥
विष्णुरुवाच
मिथ्यावादिनः सन्तु भारते गुरुदारिकाः ।
गुरुनिन्दारताः शश्वत्त्वद्वीर्यं यैश्च निह्नुतम् ॥
ब्रह्मोवाच
त्वद्वीर्यं निह्नुतं येन पुण्यक्षेत्रे च भारते ।
स नाऽन्वितो भवेत्तत्र सेवने पूजने तव ॥
लोकपाला ऊचुः
त्वद्वीर्यं निह्नुतं येन पापिना पतितभ्रमात् ।
भाजनं तस्य सोऽत्यन्तं तत्तापं कर्म संततम् ॥
देवा ऊचुः
कृत्वा प्रतिज्ञां यो मूढो नाऽऽपादयति पूर्णताम् ।
भाजनं तस्य पापस्य त्वद्वीर्यं येन निह्नुतम् ॥
हे भव! योगियोंमें श्रेष्ठ आप मेरे साथ ५ विहारमें प्रवृत्त हुए थे, उस समय देवताओंके साथ आपने मेरी रतिको भंग कर दिया था । हे विभो! आपका वह तेज मेरे उदरमें न जाकर पृथ्वीपर गिरा । ६ हे देव! फिर वह तेज कहाँ गया? उसे किस देवताने छिपा लिया? ॥ ५-६ ॥ हे महेश्वर! मेरे स्वामी! आपका वह तेज तो ७ अमोघ है, कैसे व्यर्थ हो गया अथवा उससे कोई बालक कहीं प्रकट हुआ? ॥ ७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! पार्वतीजीकी यह बात सुनकर महेश्वर हँसने लगे और पुनः उन्होंने ८ मुनियों और देवताओंको बुलाकर कहा —॥८ ॥
महेश्वर बोले— देवगणो! आपने पार्वतीके द्वारा कहे हुए वचनको सुना, अब मेरी बात सुनिये । कभी न निष्फल होनेवाला मेरा तेज कहाँ गया और किसने छिपा ९ लिया? जो शीघ्र ही बता देगा, उसे कोई भय नहीं है और वह दण्डनीय नहीं होगा । शक्ति होनेपर जो राजा अच्छी १० प्रकारसे शासन नहीं करता, वह प्रजाका बाधक है और रक्षक न होकर भक्षक ही कहलाता है ॥ ९ -१० ॥ ब्रह्माजी बोले- शिवजीकी बात सुनकर देवगण भयभीत हो गये और परस्पर विचारकर शिवजीके ११ आगे क्रमशः कहने लगे ॥११ ॥
विष्णुजी बोले - [ हे सदाशिव! ] जिन्होंने आपके तेजको छिपाया है, वे मिथ्यावादी हों और भारतमें जन्म लेकर गुरुपत्नीगमन तथा गुरुनिन्दाके १२ पापके निरन्तर भागी बनें ॥ १२ ॥
ब्रह्माजी बोले- जिसने आपके तेजको छिपाया है, वह पुण्यक्षेत्र इस भारतमें आपकी सेवा तथा १३ पूजाका अधिकारी न हो ॥१३ ॥
लोकपालोंने कहा- जिस पापीने पतित होनेके भ्रमसे आपके तेजको छिपाया है, वह चोरीके पापका १४ भाजन बने और अपने कर्मसे सदैव दुःखको प्राप्त करता रहे ॥१४ ॥
देवता बोले- जो मूर्ख प्रतिज्ञा करके अपनी प्रतिज्ञाका परिपालन नहीं करता, वह उस प्रतिज्ञाभंग पापका भाजन बनता है, वही पाप उसे लगे, जिसने १५ आपके तेजको छिपाया है ॥ १५ ॥
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७५० देवपल्य ऊचुः या निन्दति स्वभर्तारं परं गच्छति पूरुषम् मातृबन्धुविहीना च त्वद्वीर्यं निह्नुतं यया ॥ ब्रह्मोवाच देवानां वचनं श्रुत्वा देवदेवेश्वरो हरः । कर्मणां साक्षिणश्चाह धर्मादीन्सभयं वचः श्रीशिव उवाच
देवैर्न निह्नतं केन तद्वीर्यं निह्नुतं ध्रुवम् ।
तदमोघं भगवतो महेशस्य मम प्रभोः ॥
यूयं च साक्षिणो विश्वे सततं सर्वकर्मणाम् ।
युष्माकं निह्नतं किं वा किं ज्ञातुं वक्तुमर्हथ ॥
ब्रह्मोवाच
ईश्वरस्य वचः श्रुत्वा सभायां कंपिताश्च ते ।
परस्परं समालोक्य क्रमेणोचुः पुरः प्रभोः ॥
रते तु तिष्ठतो वीर्यं पपात वसुधातले ।
मया ज्ञातममोघं तच्छंकरस्य प्रकोपतः ॥
क्षितिरुवाच
वीर्यं सोढुमशक्ताहं तद्वह्नौ न्यक्षिपं पुरा ।
अतोऽत्र दुर्वहं ब्रह्मन्नबलां क्षन्तुमर्हसि ॥
वह्निरुवाच
वीर्यं सोढुमशक्तोऽहं तव शंकर पर्वते ।
कैलासे न्यक्षिपं सद्यः कपोतात्मा सुदुस्सहम् ॥
गिरिरुवाच
वीर्यं सोढुमशक्तोऽहं तव शंकर लोकप ।
गंगायां प्राक्षिपं सद्यो दुस्सहं परमेश्वर ॥
गंगोवाच वीर्यं सोढुमशक्ताहं तव शंकर लोकप । व्याकुलाऽति प्रभो नाथ न्यक्षिपं शरकानने ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ देवपत्नियाँ बोलीं- जो स्त्री अपने स्वामीकी । निन्दा करती है और परपुरुषके साथ सम्बन्ध बनाती १६ है, वह अपने माता - पिता तथा बन्धुओंसे विनती होकर उस पापको प्राप्त करे, जिसने आपके तेजको छिपाया है ॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले — देवाधिदेव महेश्वरने देवताओंके | वचन सुनकर कर्मके साक्षीभूत धर्मादि देवगणोंको ॥ १७ भयभीत करते हुए कहा— ॥ १७ ॥
श्रीशिवजी बोले – [ हे धर्मादि देवगणो! ] यदि मेरे तेजको देवगणोंने नहीं छिपाया है, तो १८ बताओ कि मेरे तेजको किसने छिपाया है? मुझ प्रभु महेश्वरका वह तेज तो अमोघ है । आपलोग तो संसारमें सभीके कर्मके सतत साक्षी हैं, आपलोगोंसे कोई बात छिपी नहीं रह सकती, आप उसे जानने १ ९ तथा कहनेमें समर्थ हैं ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- - उस देवसभामें सदाशिवकी बात सुनते ही वे धर्म आदि काँप उठे और परस्पर एक - दूसरेकी ओर देखते हुए उन लोगोंने शंकरजीसे २० कहा— ॥ २० ॥
भगवान् शंकरका रतिकालमें भी स्थित २१ रहनेवाला तेज कोपके कारण पृथ्वीपर गिरा, वह अमोघ है, यह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है ॥ २१ ॥
पृथ्वी बोली- मैंने उस असहनीय तेजको धारण करनेमें अपनेको असमर्थ पाकर अग्निको साँप २२ । दिया । अतः हे ब्रह्मन्! आप इसके लिये मुझ अबलाको क्षमा करें ॥ २२ ॥
अग्नि बोले- हे शंकर! मैं कपोतरूपसे आपका तेज धारण करनेमें असमर्थ था इसलिये मैंने उस २३ दुस्सह तेजको कैलास पर्वतपर, त्याग दिया ॥ २३ ॥
पर्वत [ हिमालय ] बोले- हे लोकरक्षक | परमेश्वर शंकर! आपके उस असह्य तेजको धारण २४ करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैंने उसे शीघ्र गंगाजी में फेंक दिया ॥ २४ ॥ मैं
गंगाजी बोलीं- हे लोकपालक शंकर! भी आपका तेज करनेमें असमर्थ हो गयी, सहन | तब हे नाथ! व्याकुल होकर मैंने उसे सरपत २५ वनमें छोड़ दिया ॥ २५ ॥