शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 761–770

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७५१ वायुरुवाच

शरेषु पतितं वीर्यं सद्यो बालो बभूव ह ।

अतीव सुन्दरः शम्भो स्वर्नद्याः पावने तटे ॥

सूर्य उवाच

रुदन्तं बालकं दृष्ट्वागममस्ताचलं प्रभो ।

प्रेरितः कालचक्रेण निशायां स्थातुमक्षमः ॥

चन्द्र उवाच

रुदन्तं बालकं प्राप्य गृहीत्वा कृत्तिकागणः ।

जगाम स्वालयं शंभो गच्छन्बदरिकाश्रमम् ॥

जलमुवाच

अमुं रुदन्तमानीय स्तन्यपानेन ताः प्रभो ।

वर्द्धयामासुरीशस्य सुतं तव रविप्रभम् ॥

संध्योवाच

अधुना कृत्तिकानां च वने तं पोष्य पुत्रकम् ।

तन्नाम चक्रुस्ताः प्रेम्णा कार्त्तिकश्चेति कौतुकात् ॥

रात्रिरुवाच

न चक्रुर्बालकं ताश्च लोचनानामगोचरम् ।

प्राणेभ्योऽपि प्रीतिपात्रं यः पोष्टा तस्य पुत्रक ॥

दिनमुवाच

यानि यानि च वस्त्राणि भूषणानि वराणि च ।

प्रशंसितानि स्वादूनि भोजयामासुरेव तम् ॥

ब्रह्मोवाच

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा संतुष्टः पुरसूदनः ।

मुदं प्राप्य ददौ प्रीत्या विप्रेभ्यो बहुदक्षिणाम् ॥

पुत्रस्य वार्तां संप्राप्य पार्वती हृष्टमानसा ।

कोटिरत्नानि विप्रेभ्यो ददौ बहुधनानि च ॥

लक्ष्मी सरस्वती मेना सावित्री सर्वयोषितः ।

विष्णुः सर्वे च देवाश्च ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धनम् ॥

प्रेरितः स प्रभुर्देवैर्मुनिभिः पर्वतैरथ ।

दूतान् प्रस्थापयामास स्वपुत्रो यत्र तान् गणान् ॥

वायु बोले - हे शम्भो! गंगाके पावन तटपर सरपतके वनमें गिरा हुआ वह तेज तत्काल अत्यन्त २६ सुन्दर बालक हो गया ॥२६ ॥

सूर्य बोले - हे प्रभो! रोते हुए उस बालकको देखकर कालचक्रसे प्रेरित हुआ मैं वहाँ ठहरनेमें असमर्थ होनेके कारण अस्ताचलको २७ चला गया ॥२७ ॥

चन्द्रमा बोले - हे शंकर! रोते हुए बालकको देखकर बदरिकाश्रमकी ओर जाती हुई कृत्तिकाएँ उसे २८ अपने घर ले गयीं ॥ २८ ॥

जल बोला- हे प्रभो! सूर्यके समान प्रभावाले अत्यन्त तेजस्वी आपके रोते हुए बालकको कृत्तिकाओंने २ ९ अपना स्तनपान कराकर बड़ा किया है ॥ २ ९ ॥ सन्ध्या बोली – उन कृत्तिकाओंने आपके पुत्रका पालन - पोषण करके कौतुकके साथ बड़े प्रेमसे उसका ३० नाम कार्तिक रखा ॥३० ॥

रात्रि बोली- वे कृत्तिकाएँ प्राणोंसे भी अधिक प्रिय उस बालकको अपने नेत्रोंसे कभी ओझल नहीं ३१ करती हैं, जो पोषण करनेवाला होता है, उसीका वह ( पोष्य ) पुत्र होता है ॥ ३१ ॥

दिन बोला- पृथ्वीपर प्रशंसाके योग्य जितने श्रेष्ठ वस्त्र एवं आभूषण हैं, उन्हें वे पहनाती हैं और ३२ स्वादिष्ट भोजन कराती हैं ॥३२ ॥

ब्रह्माजी बोले- उन सबोंकी बातोंको सुनकर त्रिपुरसूदन शिवजी परम प्रसन्न हो गये और उन्होंने आनन्दित होकर प्रेमपूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत - सी दक्षिणा ३३ दी ॥ ३३ ॥

पुत्रका समाचार सुनकर पार्वती अत्यधिक ३४ प्रसन्न हुई और उन्होंने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न तथा बहुत - सा धन दक्षिणाके रूपमें दिया । लक्ष्मी, सरस्वती, मेना, सावित्री आदि सभी स्त्रियोंने तथा विष्णु आदि सभी देवताओंने ब्राह्मणोंको बहुत धन ३५ | प्रदान किया ॥ ३४-३५ ॥ देवताओं, मुनियों एवं पर्वतोंसे प्रेरित होकर उन भगवान् शिवने अपने गणों तथा दूतोंको वहाँ भेजा, ३६ । जहाँ उनका पुत्र था ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 762

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७५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४

वीरभद्रं विशालाक्षं शंकुकर्णं कराक्रमम् ।

नन्दीश्वरं महाकालं वज्रदंष्ट्रं महोन्मदम् ॥ ३७

गोकर्णास्यं दधिमुखं ज्वलदग्निशिखोपमम् ।

लक्षं च क्षेत्रपालानां भूतानां च त्रिलक्षकम् ॥ ३८

रुद्रांश्च भैरवांश्चैव शिवतुल्यपराक्रमान् ।

अन्यांश्च विकृताकारानसंख्यानपि नारद ॥ ३ ९

ते सर्वे शिवदूताश्च नानाशस्त्रास्त्रपाणयः ।

कृत्तिकानां च भवनं वेष्टयामासुरुद्धताः ॥ ४०

दृष्ट्वा तान् कृत्तिकाः सर्वा भयविह्वलमानसाः ।

कार्त्तिकं कथयामासुर्ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ॥ ४१

कृत्तिका ऊचु:

वत्स सैन्यान्यसंख्यानि वेष्टयामासुरालयम् ।

किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं महाभयमुपस्थितम् ॥ ४२

कार्तिकेय उवाच

भयं त्यजत कल्याण्यो भयं किं वा मयि स्थिते ।

दुर्निवार्योऽस्मि बालश्च मातरः केन वार्यते ॥ ४३

ब्रह्मोवाच

एतस्मिन्नन्तरे तत्र सैन्येन्द्रो नन्दिकेश्वरः ।

पुरतः कार्तिकेयस्योपविष्टः समुवाच ह ॥ ४४

नन्दीश्वर उवाच

भ्रातः प्रवृत्तिं शृणु मे मातरश्च शुभावहाम् ।

प्रेरितोऽहं महेशेन संहर्त्रा शंकरेण च ॥ ४५

कैलासे सर्वदेवाश्च ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।

सभायां संस्थितास्तात महत्युत्सवमंगले ॥ ४६

तदा शिवा सभायां वै शंकरं सर्वशंकरम् ।

सम्बोध्य कथयामास तवान्वेषणहेतुकम् ।

॥ ४७

पप्रच्छ तान् शिवो देवान् क्रमात्त्वत्प्राप्तिहेतवे ।

प्रत्युत्तरं ददुस्ते तु प्रत्येकं च यथोचितम् ॥ ४८

त्वामत्र कृत्तिकास्थाने कथयामासुरीश्वरम् । सर्वे धर्मादयो धर्माधर्मस्य कर्मसाक्षिणः ॥ ४ ९ | हे नारद! उन्होंने वीरभद्र, विशालाक्ष शंकुकर्ण , कराक्रम, नन्दीश्वर, महाकाल, वज्रदंष्ट्र महोम्मद, | गोकर्णास्य, अग्निके समान प्रज्वलित मुखवाले,, दधिमुख लक्षसंख्यक क्षेत्रपाल तथा तीन लाख भूतों शिवजी, , | समान पराक्रमवाले रुद्रों और भैरवों तथा अन्य असंख्य विकृत आकारवाले गणोंको वहाँ भेजा ॥ ३७-३१४ नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित उद्धत उन सभी शिवगणोंने कृत्तिकाओंके भवनको घेर लिया ॥ ४० ॥

उन गणोंको देखकर कृत्तिकाएँ भयके मारे व्याकुल हो उठीं । तब उन्होंने ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान कार्तिकसे कहा- ॥४१ ॥

कृत्तिकाएँ बोलीं- हे वत्स! असंख्य सेनाओंने हमारे घरको घेर लिया है! क्या करना चाहिये? कहाँ जाना चाहिये? महाभय उपस्थित हो गया है ॥ ४२ ॥

कार्तिकेय बोले- हे कल्याणकारिणी माताओ! आपलोग भयभीत न हों । मेरे रहते भय करनेका कोई कारण नहीं है । हे माताओ! मैं यद्यपि अभी बालक हूँ, पर अजेय हूँ । इस जगत्में मुझे जीतनेवाला कौन है? ॥ ४३ ॥

ब्रह्माजी बोले – - उसी समय सेनापति नन्दिकेश्वर कार्तिकेयजीके सामने जाकर बैठ गये और बोले— ॥ ४४ ॥

नन्दीश्वर बोले — हे भाई! हे माताओ! जिस कारणसे हम यहाँ आये हैं, वह मंगलमय वृत्तान्त मुझसे सुनें, जगत्के संहार करनेवाले महेश्वरसे प्रेरित होकर मैं । आपके पास आया हूँ । हे तात! कैलास पर्वतमें महान् | मंगलदायी उत्सवमें सभामें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सभी । देवता विद्यमान थे । उस समय सभामें भगवती पार्वतीने लोककल्याणकारी भगवान् शंकरको सम्बोधित करते हुए उनसे तुम्हारा पता लगानेके लिये कहा ॥ ४५-४० शंकरने उन सभी देवताओंसे क्रमश: तुम्हारी प्राप्तिका उपाय पूछा । उनमेंसे प्रत्येकने यथोचित उत्तर दिया ॥ ४८ ॥

उसके बाद धर्म एवं अधर्मके तथा कर्मके साक्षीभूत के सभी धर्मादि देवताओंने भगवान् शंकरको कृत्तिकाओं घरमें तुम्हारा विराजमान होना बताया ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 763

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७५३

प्रबभूव रहः क्रीडा पार्वतीशिवयोः पुरा ।

दृष्टस्य च सुरैः शंभोर्वीर्यं भूमौ पपात ह ॥

भूमिस्तदक्षिपद्वह्नौ वह्निश्चाद्रौ स भूधरः ।

गंगायां सोऽक्षिपद्वेगात् तरंगैः शरकानने ॥

तत्र बालोऽभवस्त्वं हि देवकार्यकृतिः प्रभुः ।

तत्र लब्धः कृत्तिकाभिस्त्वं भूमिं गच्छ सांप्रतम् ॥

तवाभिषेकं शंभुस्तु करिष्यति सुरैः सह ।

लप्स्यसे सर्वशस्त्राणि तारकाख्यं हनिष्यसि ॥

पुत्रस्त्वं विश्वसंहर्त्तुस्त्वां प्राप्तुं चाऽक्षमा इमाः ।

नाग्निं गोप्तुं यथा शक्तः शुष्कवृक्षः स्वकोटरे ॥

दीप्तवांस्त्वं च विश्वेषु नासां गेहेषु शोभसे ।

यथा पतन्महाकूपे द्विजराजो न राजते ॥

करोषि च यथाऽऽलोकं नाऽऽच्छन्नोऽस्मासु तेजसा ।

यथा सूर्यः कलाच्छन्नो न भवेन्मानवस्य च ॥

विष्णुस्त्वं जगतां व्यापी नान्यो जातोऽसि शांभव ।

यथा न केषां व्याप्यं च तत्सर्वं व्यापकं नभः ॥

योगीन्द्रो नाऽनुलिप्तश्च भागी चेत्परिपोषणे ।

नैव लिप्तो यथात्मा च कर्मयोगेषु जीविनाम् ॥

विश्वारंभस्त्वमीशश्च नासु ते संभवेत् स्थितिः ।

गुणानां तेजसां राशिर्यथात्मानं च योगिनः ॥

भ्रातर्ये त्वां न जानन्ति ते नरा हतबुद्धयः ।

नाद्रियन्ते यथा भेकास्त्वेकवासाश्च पंकजान् ॥

पूर्वकालमें शिव एवं पार्वतीका एकान्त स्थानमें ५० विहार होता रहा । फिर देवताओंके द्वारा अवलोकन करनेपर उन शिवजीका तेज पृथ्वीपर गिर गया ॥ ५० ॥

भूमिने उसे अग्निमें, अग्निने गिरिराज हिमालयमें ५१ और हिमालयने उसे गंगामें फेंक दिया । उसके बाद गंगाने अपनी तरंगोंसे उसे शीघ्रतापूर्वक सरपतके वनमें फेंक दिया । उस तेजसे देवताओंका कार्य करनेके लिये समर्थ तुम उत्पन्न हुए हो । कृत्तिकाओंने तुम्हें वहाँ प्राप्त ५२ किया । अतः इस समय तुम पृथ्वीपर चलो ॥ ५१-५२ ॥ भगवान् शंकर देवगणोंके सहित तुम्हारा अभिषेक ५३ करेंगे, तुम सम्पूर्ण शस्त्रास्त्र प्राप्त करोगे और तारक । नामक असुरका वध करोगे ॥५३ ॥

तुम विश्वके संहर्ता शिवजीके पुत्र हो । ये ५४ कृत्तिकाएँ आपको ( पुत्रके रूपमें ) प्राप्त करनेमें उसी प्रकार असमर्थ हैं, जैसे सूखा हुआ वृक्ष अपने कोटरमें अग्निको छिपानेमें समर्थ नहीं होता ॥ ५४ ॥

तुम सारे संसारमें प्रकाशित हो, इन कृत्तिकाओंके ५५ घरमें रहनेसे तुम्हारी शोभा उसी प्रकार नहीं है, जैसे द्विजराज चन्द्रमा कूपके अन्दर रहकर प्रकाशित नहीं होता ॥ ५५ ॥

जैसे मनुष्यके तेजसे सूर्यके तेजको छिपाया नहीं ५६ जा सकता है, उसी प्रकार जैसे तुम प्रकाश कर रहे हो, उसे हमलोगोंका तेज छिपा नहीं सकता ॥ ५६ ॥

हे शम्भुपुत्र! तुम अन्य कोई उत्पन्न नहीं हुए ५७ हो, सारे संसारको व्याप्तकर स्थित रखनेवाले विष्णु ही हो । जैसे आकाश व्यापक है, किसीका व्याप्य नहीं है, इसी प्रकार तुम भी किसीके व्याप्य नहीं हो, अपितु व्यापक हो ॥५७ ॥

जैसे कर्मयोगियोंका आत्मा उन कर्मोंसे निर्लिप्त ५८ रहता है, इसी प्रकार तुम भी परिपोषणके भागी होनेपर भी योगीन्द्र होनेके कारण निर्लिप्त हो ॥ ५८ ॥

तुम इस विश्वसृष्टिके कर्ता तथा ईश्वर हो, ५ ९ परंतु इनमें तुम्हारी स्थिति उसी प्रकार नहीं रहती, जिस प्रकार योगीकी आत्मामें गुण और तेजकी राशि स्थित नहीं रहती ॥ ५ ९ ॥ हे भाई! कमलोंका आदर न करनेवाले सहवासी मेढकोंकी भाँति वे मनुष्य हतबुद्धि हैं, जो आपको ६० । तत्त्वतः नहीं जानते ॥ ६० ॥

पृष्ठ 764

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७५४ कार्त्तिकेय उवाच भ्रातः सर्वं विजानासि ज्ञानं त्रैकालिकं च यत् ज्ञानी त्वं का प्रशंसा ते यतो मृत्युञ्जयाश्रितः कर्मणां जन्म येषां वा यासु यासु च योनिषु श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ कार्तिकेय बोले- हे भाई! जो त्रैकालिक । । ज्ञान है, वह सब कुछ आप जानते हैं; आप मृत्युंजय ॥ ६१ भगवान् सदाशिवके सेवक हैं, इसलिये आपकी । प्रशंसा जितनी भी की जाय, थोड़ी है । हे भ्रातः । । कर्मवश जिन लोगोंका जिन - जिन योनियोंमें! जन्म तासु ते निर्वृतिं भ्रातः प्राप्नुवंतीह सांप्रतम् ॥ ६२ होता है, उन - उन योनियोंके भोगोंमें उनको सुख प्राप्त कृत्तिकाज्ञानवत्यश्च योगिन्यः प्रकृतेः कलाः स्तन्येनासां वर्द्धितोऽहमुपकारेण संततम् आसामहं पोष्यपुत्रो मदंशा योषितस्त्विमाः तस्याश्च प्रकृतेरंशास्ततस्तत्स्वामिवीर्यजः न मद्भवो ह शैलेन्द्रकन्यया नन्दिकेश्वर सा च मे धर्मतो माता यथेमाः सर्वसंमताः शम्भुना प्रेषितस्त्वं च शंभोः पुत्रसमो महान् आगच्छामि त्वया सार्द्धं द्रक्ष्यामि देवताकुलम् इत्येवमुक्त्वा तं शीघ्रं संबोध्य कृत्तिकागणम् । कार्त्तिकेयः प्रतस्थे हि सार्द्धं शंकरपार्षदैः होता है । ये सभी कृत्तिकाएँ ज्ञानवती हैं, योगिनी हैं । और प्रकृतिकी कलाएँ हैं । इन्होंने अपना दूध पिलाकर ॥ ६३ मुझे बड़ा बनाया है । इसलिये मेरे ऊपर निरन्तर इनका महान् उपकार है॥६१–६३ ॥ । मैं इनका पोष्य पुत्र हूँ, ये स्त्रियाँ मुझसे सम्बद्ध ॥ ६४ हैं, मैं जिस प्रकृतिके स्वामीके तेजसे उत्पन्न हुआ हूँ, ये उसी प्रकृतिकी कलाएँ हैं ॥६४ ॥

। हे नन्दिकेश्वर! शैलेन्द्रकन्या पार्वतीसे मेरा जन्म ॥ ६५ नहीं हुआ है, वे उसी प्रकार मेरी धर्ममाता हैं, जिस प्रकार कृत्तिकाएँ सर्वसम्मति से मेरी माता हैं ॥ ६५ ॥

। आप महान् हैं, शिवजीके पुत्रके समान हैं और ॥ ६६ मुझे लानेके लिये उन्होंने आपको भेजा है । इसलिये मैं भी आपके साथ चलूँगा और देवताओंका दर्शन करूँगा ॥ ६६ ॥

इस प्रकार कहकर कृत्तिकाओंसे आज्ञा लेकर वे ॥ ६७ । कार्तिकेय शंकरके उन गणोंके साथ शीघ्र चल पड़े ॥ ६७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे कार्त्तिकेयान्वेषणनन्दिसंवादवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें कार्तिकेयका अन्वेषण तथा नन्दिसंवादवर्णन नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः पार्वतीके द्वारा प्रेषित रथपर आरूढ़ हो कार्तिकेयका कैलासगमन कैलासपर उत्सव होना, कार्तिकेयका महाभिषेक तथा देवताओंद्वारा विविध, महान् प्रदान करना, कार्तिकेयका अस्त्र - शस्त्र तथा रत्नाभूषण ब्रह्मोवाच एतस्मिन्नन्तरे तत्र ददर्श रथमुत्तमम् । अद्भुतं शोभितं शश्वद्विश्वकर्मविनिर्मितम् ॥ शतचक्रं सुविस्तीर्णं मनोयायि मनोहरम् । प्रस्थापितं च पार्वत्या वेष्टितं पार्षदैर्वरैः ॥ ब्रह्माण्डका अधिपतित्व प्राप्त करना ब्रह्माजी बोले- उसी समय विश्वकर्माद्वारा | विरचित अत्यन्त अद्भुत तथा शाश्वत शोभासे समन्वित १ एक रथ दिखायी पड़ा । उस रथमें सौ पहिये थे, वह | बड़ा विस्तीर्ण और सुन्दर था, उसकी गति | समान वेगवाली थी, वह श्रेष्ठ रथ शिवजीके पार्षदोंसे २ घिरा हुआ था । पार्वतीजीने उसे भेजा था ॥ १-२ ॥

पृष्ठ 765

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अ ०५ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७५५

समारोहत्ततोऽनंतो हृदयेन विदूयता ।

कार्त्तिकः परमज्ञानी परमेशानवीर्यजः ॥

तदैव कृत्तिकाः प्राप्य मुक्तकेश्यः शुचाऽऽतुराः ।

उन्मत्ता इव तत्रैव वक्तुमारेभिरे वचः ॥

कृत्तिका ऊचुः

विहायाऽस्मान् कृपासिन्धो गच्छसि त्वं हि निर्दयः ।

नायं धर्मो मातृवर्गान् पालितो यत् सुतस्त्यजेत् ॥

स्नेहेन वर्द्धितोऽस्माभिः पुत्रोऽस्माकं च धर्मतः ।

किं कुर्मः क्व च यास्यामो वयं किं करवाम ह ॥

इत्युक्त्वा कृत्तिकाः सर्वाः कृत्वा वक्षसि कार्त्तिकम् ।

द्रुतं मूर्च्छामवापुस्ताः सुतविच्छेदकारणात् ॥

ताः कुमारो बोधयित्वा अध्यात्मवचनेन वै ।

ताभिश्च पार्षदैः सार्द्धमारुरोह रथं मुने ॥

दृष्ट्वा श्रुत्वा मंगलानि बहूनि सुखदानि वै ।

कुमारः पार्षदैः सार्द्धं जगाम पितृमन्दिरम् ॥

दक्षेण नंदियुक्तश्च मनोयायिरथेन च ।

कुमारः प्राप कैलासं न्यग्रोधाऽक्षयमूलके ॥

तत्र तस्थौ कृत्तिकाभिः पार्षदप्रवरैः सह ।

कुमारः शांकरिः प्रीतो नानालीलाविशारदः ॥

तदा सर्वे सुरगणा ऋषयः सिद्धचारणाः ।

विष्णुना ब्रह्मणा सार्द्धं समाचख्युस्तदागमम् ॥

तदा दृष्ट्वा च गांगेयं ययौ प्रमुदितश्शिवः ।

अन्यैः समेतो हरिणा ब्रह्मणा च सुरर्षिभिः ॥

शंखाश्च बहवो नेदर्भेरी तूर्याण्यनेकशः ।

उत्सवः सुमहानासीद्देवानां तुष्टचेतसाम् ॥

तदानीमेव तं सर्वे वीरभद्रादयो गणाः ।

कुर्वन्तः स्वन्वयुः केलिं नानातालधरस्वराः ॥

स्तावकाः स्तूयमानाश्च चक्रुस्ते गुणकीर्त्तनम् ।

जयशब्दं नमश्शब्दं कुर्वाणाः प्रीतमानसाः ॥

द्रष्टुं ययुस्तं शरजं शिवात्मजमनुत्तमम् ॥

परम ज्ञानी, अनन्त तथा शिवजीके तेजसे उत्पन्न ३ कार्तिकेय दुखी मनसे उस रथपर सवार हो गये ॥ ३ ॥

उसी समय बिखरे केशोंवाली कृत्तिकाओंने शोकसे ४ व्याकुल हो कार्तिकेयके पास जाकर शोकोन्मादसे कहना प्रारम्भ किया— ॥४ ॥

कृत्तिकाएँ बोलीं- हे कृपासिन्धो! आप हम सबको छोड़कर इस प्रकार निर्दयी होकर जा रहे हैं । पुत्रका धर्म यह नहीं है कि जिन माताओंने पालन-५ पोषण किया, उनका परित्यागकर वह चला जाय ॥ ५ ॥

हमलोगोंने बड़े स्नेहसे तुम्हें बड़ा बनाया, तुम ६ हमारे धर्मपुत्र हो, अब तुम्हीं बताओ कि हम क्या करें, कैसे रहें और कहाँ जायँ? इस प्रकार कहकर वे सभी कृत्तिकाएँ कार्तिकेयको अपने वक्षसे लगाकर पुत्रकी वियोगजन्य ७ व्यथासे मूर्च्छित हो गयीं । तब कुमारने आध्यात्मिक वचनोंसे उन्हें समझाया । हे मुने! फिर वे उनके तथा ८ पार्षदोंके साथ रथपर आरूढ़ हो गये॥६–८ ॥ अत्यधिक सुखदायी मंगलोंको देख तथा ९ सुनकर कुमार कार्तिकेय पार्षदोंके साथ अपने पिताके घर गये ॥ ९ ॥

अपने दाहिनी ओर नन्दिकेश्वरसे युक्त कुमार १० कार्तिकेय मनके समान वेगवाले रथसे कैलासपर्वतपर अक्षयवटवृक्षके समीप पहुँचे । विविध लीलाविशारद शंकरपुत्र कुमार कार्तिकेय उन कृत्तिकाओं तथा ११ पार्षदोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहीं रुके । उसके बाद सभी देवता, ऋषिगण, सिद्ध, चारणोंने ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ [ शिवजीसे ] कार्तिकेयके आनेका १२ समाचार कहा॥१०–१२ ॥ उस समय शिवजी गंगापुत्र ( कार्तिकेय ) -को १३ आया हुआ देखकर विष्णु, ब्रह्मा, अन्य देवताओं तथा सुरर्षियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक उनके पास गये ॥ १३ ॥

उस समय शंख, भेरी आदि अनेक बाजे बजने १४ लगे और आनन्दित हुए देवताओंके यहाँ महान् उत्सव होने लगा । उस समय वीरभद्र आदि सभी शिवगण अनेक तालपर गाना गाते तथा क्रीड़ा करते हुए शिवजीके १५ पीछे - पीछे चले । स्तुतिपाठक स्तुतिपूर्वक गुणकीर्तन करने लगे और प्रसन्नमन होकर जय - जयकार तथा नमस्कार १६ करने लगे और सरपतवनमें उत्पन्न हुए उस शिवजीके १७ । पुत्रको देखनेके लिये चले ॥ १४-१७ ॥

पृष्ठ 766

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७५६ पार्वती मंगलं चक्रे राजमार्गं मनोहरम् पद्मरागादिमणिभिः संस्कृतं परितः पुरम् ॥ पतिपुत्रवतीभिश्च साध्वीभिः स्त्रीभिरन्विताः । लक्ष्म्यादित्रिंशद्देवीश्च पुरः कृत्वा समाययौ रम्भाद्यप्सरसो दिव्याः सस्मिता वेषसंयुताः संगीतनर्तनपरा बभूवुश्च शिवाज्ञया ये तं समीक्षयामासुर्गांगेयं शंकरोपमम् । ददृशुस्ते महत्तेजो व्याप्तमासीज्जगत्त्रये

तत्तेजसा वृतं बालं तप्तचामीकरप्रभम् ।

ववंदिरे द्रुतं सर्वे कुमारं सूर्यवर्चसम् ॥

जहृषुर्विनतस्कंधा नमश्शब्दरतास्तदा । परिवार्योपतस्थुस्ते वामदक्षिणमागताः

अहं विष्णुश्च शक्रश्च तथा देवादयोऽखिलाः ।

दण्डवत्पतिता भूमौ परिवार्य कुमारकम् ॥

एतस्मिन्नन्तरे शंभुर्गिरिजा च मुदान्विता ।

महोत्सवं समागम्य ददर्श तनयं मुदा ॥

पुत्रं निरीक्ष्य च तदा जगदेकबंधुः प्रीत्यान्वितः परमया परया भवान्या । स्नेहान्वितो भुजगभोगयुतो हि साक्षात् श्रीशिवमहापुराण [ अ ०५ । पार्वतीने राजमार्गको अनेक मांगलिक १८ | अत्यन्त मनोहर बना दिया और पद्मराग आदि मणियोंसे द्रव्योंसे । पुरको चारों ओरसे अलंकृत किया । वे पति - पुत्रवाली | सुहागिन स्त्रियोंके साथ तथा लक्ष्मी आदि तीस देवियोंको, ॥ १ ९ आगेकर कार्तिकेयको लेने चल पड़ीं ॥ १८-१९ ॥ । शिवजीकी आज्ञासे रम्भा आदि दिव्य अप्सराएँ ॥ २० सुन्दर वेशभूषासे सुसज्जित होकर मन्द मन्द हासपूर्वक । नृत्य एवं गान करने लगीं । जिन लोगोंने भगवान् | शंकरके साथ गंगापुत्र कार्तिकेयको देखा, उन लोगोंको लगा कि सारे जगत्में एक बहुत बड़ा तेज व्याप्त ॥ २१ हो रहा है ॥ २०-२१ ॥ उस तेजसे आवृत, प्रतप्त सुवर्णके समान देदीप्यमान २२ तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस बालक कार्तिकेयकी सबने वन्दना की । उस बालकके सामने सभी लोग ' नमः ' शब्दका उच्चारण करते हुए अपना सिर ॥ २३ झुकाकर हर्षोल्लाससे भर गये और बायीं तथा दाहिनी ओर उन्हें घेरकर स्थित हो गये ॥ २२-२३ ॥ [ हे नारद! ] मैंने, विष्णु एवं इन्द्रादि सभी २४ देवताओंने कुमारको चारों ओरसे घेरकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥२४ ॥

हे मुने! उसी समय भगवान् शंकर तथा आनन्दसे २५ परिपूर्ण देवी पार्वतीने प्रसन्नतापूर्वक उस महोत्सवमें आकर अपने पुत्रको देखा ॥ २५ ॥

जगत्के एकमात्र रक्षक, सर्पराजका भूषण धारण किये हुए तथा अपने प्रमथगणोंसे युक्त हो साक्षात् सर्वेश्वर सदाशिव पराम्बा भवानीके साथ बड़े स्नेहसे उस पुत्रको सर्वेश्वरः परिवृतः प्रमथैः परेशः ॥ २६ देखकर गद्गद हो प्रसन्नताको प्राप्त हुए ॥ २६ ॥

अथ शक्तिधरः स्कन्दो दृष्ट्वा तौ पार्वतीशिवौ ।

अवरुह्य रथात्तूर्णं शिरसा प्रणनाम ह ॥

उपगुह्य शिवः प्रीत्या कुमारं मूर्ध्नि शंकरः ।

जौ प्रेम्णा परेशानः प्रसन्नः स्नेहकर्तृकः ॥

उपगुह्य गुहं तत्र पार्वती जातसंभ्रमा ।

प्रस्नुतं पाययामास स्तनं स्नेहपरिप्लुता ॥

तदा नीराजितो देवैः सकलत्रैर्मुदान्वितैः । जयशब्देन महता व्याप्तमासीन्नभस्तलम् ॥ उस समय शक्तिको धारण किये हुए कुमार २७ | स्कन्दने पार्वती एवं शिवको देखकर शीघ्रतापूर्वक । रथसे उतरकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ॥२७ ॥

परमेश्वर भगवान् शिवने प्रसन्नतापूर्वक कुमारका २८ आलिंगन करके प्रेमपूर्वक उनके सिरको सूँघा ॥ २८ ॥

पार्वतीजीने भी आश्चर्यमें पड़कर उस पुत्रको २ ९ | गले लगाया तथा स्नेहाधिक्यके कारण बहते हुए । स्तनका दूध उसे पिलाने लगीं । प्रसन्न हो देवताओंने | अपनी स्त्रियोंके साथ कुमारकी आरती उतारी, उस । समय जय - जयकारकी महान् ध्वनिसे सारा आकाश-३० मण्डल गूँज उठा ॥ २ ९ -३० ॥

पृष्ठ 767

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७५७

ऋषयो ब्रह्मघोषेण गीतेनैव च गायकाः ।

वाद्यैश्च बहवस्तत्रोपतस्थुश्च कुमारकम् ॥

स्वमंकमारोप्य तदा महेशः

कुमारकं तं प्रभया समुज्ज्वलम् ।

भवानीपतिरेव साक्षा-च्छ्रियाऽन्वितः पुत्रवतां वरिष्ठः ॥

कुमारः स्वगणैः सार्द्धमाजगाम शिवालयम् ।

शिवाज्ञया महोत्साहैस्सह देवैर्महासुखी ॥

दंपती तौ तदा तत्रैकपद्येन विरेजतुः ।

विवंद्यमानावृषिभिरावृतौ सुरसत्तमैः ॥

कुमारः क्रीडयामास शिवोत्संगे मुदान्वितः ।

वासुकिं शिवकंठस्थं पाणिभ्यां समपीडयत् ॥

प्रहस्य भगवान् शंभुः शशंस गिरिजां तदा ।

निरीक्ष्य कृपया दृष्ट्या कृपालुर्लीलयाकृतिम् ॥

मंदस्मितेन च तदा भगवान्महेशः

प्राप्तो मुदं च परमां गिरिजासमेतः ।

प्रेम्णा स गद्रदगिरो जगदेकबंधु-नवाच किंचन विभुर्भुवनैकभर्त्ता ॥

अथ शंभुर्जगन्नाथ हृष्टो लौकिकवृत्तवान् ।

रत्नसिंहासने रम्ये वासयामास कार्त्तिकम् ॥

वेदमंत्राभिपूतैश्च सर्वतीर्थोदपूर्णकैः ।

सद्रत्नकुंभशतकैः स्नापयामास तं मुदा ॥

सद्रत्नसाररचितकिरीटमुकुटांगदम् वैजयन्तीं स्वमालां च तस्मै चक्रं ददौ हरिः ॥

शूलं पिनाकं परशुं शक्तिं पाशुपतं शरम् ।

संहारास्त्रं च परमां विद्यां तस्मै ददौ शिवः ॥

अदामहं यज्ञसूत्रं वेदांश्च वेदमातरम् ।

कमण्डलुं च ब्रह्मास्त्रं विद्यां चैवाऽरिमर्दिनीम् ॥

गजेन्द्रं चैव वज्रं च ददौ तस्मै सुरेश्वरः ।

श्वेतच्छत्रं रत्नमालां ददौ पाशं जलेश्वरः ॥

अनेक ऋषियोंने वेदोंके उद्घोषसे, गायकोंने ३१ गीतसे तथा वाद्ययन्त्रोंके बजानेवालोंने वाद्योंसे कुमारका स्वागत किया । कान्तिसे देदीप्यमान अपने उस पुत्रको गोदमें धारणकर पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ भवानीपति शंकर ३२ साक्षात् शोभासे सम्पन्न हुए ॥ ३१-३२ ॥ इस प्रकार महान् उत्साहसम्पन्न देवताओं तथा अपने ३३ गणोंके साथ परम आनन्दित कुमार कार्तिकेय भगवान् शिवकी आज्ञासे शिवजीके भवनमें पधारे ॥ ३३ ॥

उस समय श्रेष्ठ देवताओं एवं ऋषियोंसे वन्दित ३४ तथा उनसे घिरे हुए वे दोनों शिवा - शिव एक साथमें परम शोभित हुए ॥ ३४ ॥

इधर कुमार भी प्रेमसे शिवजीकी गोदमें बैठकर ३५ खेलने लगे और उन्होंने उनके कण्ठमें लिपटे हुए वासुकि नागको अपने दोनों हाथोंसे दबाकर पकड़ लिया ॥ ३५ ॥

लीलासे युक्त कुमार कार्तिकेयको कृपादृष्टिसे ३६ देखकर कृपालु भगवान् शंकरने हँसते हुए पार्वतीसे । उनकी प्रशंसा की । सर्वव्यापक, जगत्के एकमात्र पालनकर्ता तथा जगत्के एकमात्र स्वामी भगवान् महेश गिरिजाके सहित हर्षित होकर मन्द - मन्द हँसते हुए आनन्दसे विभोर हो गये, प्रेमवश गला रुँध गया ३७ और वे कुछ भी कह न सके ॥ ३६-३७ ॥ उसके बाद लोकवृत्तान्तको जाननेवाले जगत्पति ३८ भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर रत्नोंसे जड़े हुए रमणीय सिंहासनपर कुमार कार्तिकेयको बैठाया ॥३८ ॥

फिर वेदमन्त्रोंके द्वारा पवित्र किये गये समस्त ३ ९ तीर्थोंके जलसे पूर्ण रत्नजटित सौ कलशोंसे उनको प्रसन्नतापूर्वक स्नान कराया । भगवान् विष्णुने उत्तम प्रकारके रत्नोंसे निर्मित किरीट, मुकुट, बाजूबन्द, अपनी ४० वैजयन्ती माला एवं सुदर्शन चक्र उन्हें प्रदान किया । सदाशिवने अपना त्रिशूल, पिनाक धनुष, परशु, शक्ति, ४१ पाशुपतास्त्र, बाण, संहारास्त्र एवं परम विद्या कुमारको प्रदान की ॥ ३ ९ –४१ ॥ मुझ ब्रह्माने यज्ञोपवीत, वेद, वेदमाता गायत्री, ४२ कमण्डलु, ब्रह्मास्त्र तथा शत्रुनाशिनी विद्या उन्हें प्रदान की ॥४२ ॥

देवराज इन्द्रने अपना ऐरावत नामक गजेन्द्र तथा वज्र प्रदान किया । जलके स्वामी वरुणदेव ४३ । श्वेतच्छत्र, पाश तथा रत्नमाला उन्हें दी ॥ ४३ ॥

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७५८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५

मनोयायिरथं सूर्यः सन्नाहं च महाचयम् ।

यमदंडं यमश्चैव सुधाकुंभं सुधानिधिः ॥

हुताशनो ददौ प्रीत्या महाशक्तिं स्वसूनवे ।

ददौ स्वशस्त्रं निरृतिर्वायव्यास्त्रं समीरणः ॥

गदां ददौ कुबेरश्च शूलमीशो ददौ मुदा ।

नानाशस्त्राण्युपायांश्च सर्वे देवा ददुर्मुदा ॥

कामास्त्रं कामदेवोऽथ ददौ तस्मै मुदान्वितः ।

गदां ददौ स्वविद्याश्च तस्मै च परया मुदा ॥

क्षीरोदोऽमूल्यरत्नानि विशिष्टं रत्ननूपुरम् ।

हिमालयो हि दिव्यानि भूषणान्यंशुकानि च ॥

चित्रबर्हणनामानं स्वपुत्रं गरुडो ददौ ।

अरुणस्ताम्रचूडाख्यं बलिनं चरणायुधम् ॥

पार्वती सस्मिता हृष्टा परमैश्वर्यमुत्तमम् ।

ददौ तस्मै महाप्रीत्या चिरंजीवित्वमेव च ॥

लक्ष्मीश्च संपदं दिव्यां महाहारं मनोहरम् ।

सावित्री सिद्धविद्यां च समस्तां प्रददौ मुदा ॥

अन्याश्चापि मुने देव्यो या यास्तत्र समागताः ।

स्वात्मवत्सु ददुस्तस्मै तथैव शिशुपालिकाः ॥

महामहोत्सवस्तत्र बभूव मुनिसत्तम ।

सर्वे प्रसन्नतां याता विशेषाच्च शिवाशिवो ॥

एतस्मिन्नन्तरे काले प्रोवाच प्रहसन् मुदा ।

मुने ब्रह्मादिकान् देवान् रुद्रो भर्गः प्रतापवान् ॥

शिव उवाच

हे हरे हे विधे देवाः सर्वे शृणुत मद्वचः ।

सर्वथाहं प्रसन्नोऽस्मि वरान्वृणुत ऐच्छिकान् ॥

ब्रह्मोवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं शंभोर्मुने विष्ण्वादयः सुराः ।

सर्वे प्रोचुः प्रसन्नास्या देवं पशुपति प्रभुम् ॥

सूर्यने मनकी गति से चलनेवाला उत्तम रथ और ४४ महातेजस्वी कवच दिया । यमराजने यमदण्ड और चन्द्रमाने अमृतपूर्ण घट प्रदान किया । अग्निने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको महाशक्ति प्रदान की । निर्ऋतिने अपना ४५ शस्त्र तथा वायुने वायव्यास्त्र प्रदान किया ॥ ४४-४५ ॥ कुबेरने गदा तथा ईश्वरने प्रसन्नतासे अपना ४६ त्रिशूल दिया । इसी प्रकार सभी देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक अनेक शस्त्र तथा अनेक प्रकारके उपहार अर्पित किये ॥ ४६ ॥

कामदेवने प्रसन्न होकर अपना कामास्त्र, गदा ४७ तथा अपनी आकर्षण एवं वशीकरण विद्याएँ परम प्रसन्नतासे उन्हें प्रदान कीं । क्षीरसागरने अमूल्य रत्न तथा विशिष्ट प्रकारका रत्नजटित नूपुर और हिमालयने ४८ दिव्य भूषण एवं वस्त्र प्रदान किये । गरुड़ने चित्रबर्हण ( मयूर ) नामका अपना पुत्र तथा ज्येष्ठ भ्राता अरुणने चरणोंसे युद्ध करनेवाला महाबलवान् ताम्रचूड ( मुर्गा ) ४ ९ दिया॥४७–४९ ॥ मन्द मुसकानवाली पार्वतीने अत्यन्त प्रसन्नताके ५० साथ अपने पुत्रको परमैश्वर्य एवं चिरंजीवी होनेका वर प्रदान किया । लक्ष्मीने दिव्य सम्पत्ति तथा मनोहर श्रेष्ठ हार प्रदान किया और सावित्रीने बड़े प्रेमसे ५१ समस्त सिद्धविद्याएँ प्रदान कीं । हे मुने! इसी प्रकार अन्य जो भी देवियाँ वहाँ आयी थीं, उन्होंने अपनी-५२ अपनी प्रिय वस्तुएँ तथा बच्चेका पालना प्रदान | किया ॥ ५०–५२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय वहाँ बहुत बड़ा महोत्सव ५३ हुआ और सब प्रसन्न हो गये । विशेषकर शिव - पार्वती । तो अत्यन्त प्रसन्न हुए । हे मुने! उसी समय महाप्रतापी | ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् रुद्रने हँसते हुए प्रसन्नतापूर्वक ५४ ब्रह्मादि देवताओंसे कहा- ॥ ५३-५४ ॥! शिवजी बोले- हे हरे! हे ब्रह्मन्! हे देवगणो । आप सब मेरी बात सुनें । मैं आपलोगोंपर अत्यधिक ५५ प्रसन्न हूँ । आपलोग अपने अभीष्ट वर मुझसे माँगिये ॥ ५५ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! शिवजीके इस वचनको होकर

सुनकर विष्णु आदि सभी देवताओंने प्रसन्नमुख ।

५६ । महादेव भगवान् पशुपतिसे कहा— ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 769

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अ ० ५ ] रुद्रसंहिता (

कुमारेण हतो ह्येष तारको भविता प्रभो ।

तदर्थमेव संजातमिदं चरितमुत्तमम् ॥ ५७

तस्मादद्यैव यास्यामस्तारकं हन्तुमुद्यताः ।

आज्ञां देहि कुमाराय स तं हन्यात् सुखाय नः ॥ ५८

तथेति मत्वा स विभुर्दत्तवांस्तनयं तदा ।

देवेभ्यस्तारकं हन्तुं कृपया परिभावितः ॥ ५ ९

शिवाज्ञया सुराः सर्वे ब्रह्मविष्णुमुखास्तदा ।

पुरस्कृत्य गुहं सद्यो निर्जग्मुर्मिलिता गिरेः ॥ ६०

बहिर्निस्सृत्य कैलासात्त्वष्टा शासनतो हरेः ।

विरेचे नगरं रम्यमद्भुतं निकटे गिरेः ॥ ६१

तत्र रम्यं गृहं दिव्यमद्भुतं परमोज्ज्वलम् ।

गुहार्थं निर्ममे त्वष्टा तत्र सिंहासनं वरम् ॥ ६२

तदा हरिः सुधीर्भक्त्या कारयामास मंगलम् ।

कार्त्तिकस्याभिषेकं हि सर्वतीर्थजलैः सुरैः ॥ ६३

सर्वथा समलंकृत्य वासयामास संग्रहम् ।

कार्त्तिकस्य विधिं प्रीत्या कारयामास चोत्सवम् ॥ ६४

ब्रह्मांडाधिपतित्वं हि ददौ तस्मै मुदा हरिः ।

चकार तिलकं तस्य समानर्च सुरैस्सह ॥ ६५

प्रणम्य कार्त्तिकं प्रीत्या सर्वदेवर्षिभिः सह ।

तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैः शिवरूपं सनातनम् ॥ ६६

वरसिंहासनस्थो हि शुशुभेऽतीव कार्त्तिकः ।

स्वामिभावं समापन्नो ब्रह्मांडस्यापि पालकः ॥ ६७

कुमारखण्ड ) ७५ ९ हे प्रभो! यह तारकासुर कुमारके द्वारा मारा जाय, । इसके लिये ही यह सारा उत्तम चरित्र हुआ है ॥ ५७ ॥

इसलिये हमलोग उसे मारनेके लिये आज ही प्रस्थान करेंगे । आप हमलोगोंके सुखके लिये इन कुमारको तारकासुरके वधकी आज्ञा प्रदान कीजिये ॥ ५८ ॥

देवगणोंके वचनको सुनकर सर्वव्यापी शंकरजीने कृपासे अभिभूत होकर देवगणोंके कल्याणके लिये ' तथास्तु ' कहकर अपना पुत्र समर्पित कर दिया ॥ ५ ९ ॥ शिवजीकी आज्ञासे ब्रह्मा, विष्णु जिनमें प्रमुख हैं, ऐसे देवगण मिलकर कार्तिकेयको आगेकर तारकासुरका वध करनेके लिये उसी समय पर्वतसे चल पड़े ॥ ६० ॥

कैलाससे बाहर निकलकर विष्णुजीकी आज्ञासे विश्वकर्माने पर्वतके निकट ही अत्यन्त सुन्दर नगरकी रचना की ॥६१ ॥

उस नगरमें विश्वकर्माने अत्यन्त मनोहर, परम अद्भुत तथा अत्यन्त निर्मल गृह कुमारके लिये निर्मित किया तथा उस गृहमें उत्तम सिंहासनका भी निर्माण किया ॥ ६२ ॥

तब परम बुद्धिमान् विष्णुने उस गृहमें नाना प्रकारके मांगलिक कृत्य करवाये और देवताओंके साथ सभी तीर्थोंके जलसे उस सिंहासनपर कार्तिकेयका अभिषेक किया ॥ ६३ ॥

फिर कार्तिकेयको सुसज्जितकर [ उनको प्रसन्न रखनेकी ] समस्त सामग्री वहाँ एकत्रित कर दी तथा उस उपलक्ष्यमें अनेक विधि - विधान तथा उत्सव किये ॥६४ ॥

हरिने प्रेमसे उनको ब्रह्माण्डका अधिपतित्व प्रदान किया, फिर स्वयं तिलक लगाकर देवगणोंके साथ उनकी पूजा - अर्चना की । उन्होंने सभी देवताओं तथा ऋषियोंके साथ प्रीतिसे कार्तिकेयको प्रणाम किया और सनातन शिवस्वरूप उन कुमारकी विविध स्तोत्रोंसे स्तुति की ॥ ६५-६६ ॥ ब्रह्माण्डके पालक कार्तिकेय इस प्रकार उत्तम सिंहासनपर बैठकर स्वामित्वको प्राप्तकर अत्यन्त | शोभित हुए ॥ ६७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे कुमाराभिषेकवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

द्वितीयायां ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें कुमारका अभिषेकवर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 770

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७६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ अथ षष्ठोऽध्यायः कुमार कार्तिकेयकी ऐश्वर्यमयी बाललीला ब्रह्मोवाच

अथ तत्र स गांगेयो दर्शयामास सूतिकाम् ।

तामेव शृणु सुप्रीत्या नारद त्वं स्वभक्तिदाम् ॥

द्विज एको नारदाख्य आजगाम तदैव हि । तत्राध्वरकरः श्रीमान् शरणार्थं गुहस्य वै स विप्रः प्राप्य निकटं कार्त्तिकस्य प्रसन्नधीः । स्वाभिप्रायं समाचख्यौ सुप्रणम्य शुभैः स्तवैः विप्र उवाच शृणु स्वामिन्वचो मेऽद्य कष्टं मे विनिवारय । सर्वब्रह्मांडनाथस्त्वमतस्ते शरणं गतः अजमेधाध्वरं कर्तुमारंभं कृतवानहम् । ब्रह्माजी बोले- हे नारद! वहॉपर रहकर कार्तिकेयने अपनी भक्ति देनेवाली जो बाललीला की १ उस लीलाको आप प्रेमपूर्वक सुनिये । उस समय नारद नामक एक ब्राह्मण, जो यज्ञ कर रहा था, कार्तिकेयकी ॥ २ शरणमें आया ॥ १-२ ॥ वह प्रसन्नमन ब्राह्मण कार्तिकेयके पास आकर ॥ ३ उन्हें प्रणाम करके और सुन्दर स्तोत्रोंसे स्तुतिकर अपना अभिप्राय निवेदन करने लगा ॥ ३ ॥

ब्राह्मण बोला - हे स्वामिन्! आप समस्त ब्रह्माण्डके अधिपति हैं, अतः मैं आपकी शरणमें ॥ ४ आया हूँ; आप मेरा वचन सुनिये और आज मेरा कष्ट दूर कीजिये ॥४ ॥

मैंने अजमेधयज्ञ करना प्रारम्भ किया था, किंतु सोऽजो गतो गृहान्मे हि त्रोटयित्वा स्वबंधनम् ॥ ५ वह अज अपना बन्धन तोड़कर मेरे घरसे भाग न जाने स गतः कुत्राऽन्वेषणं तत्कृतं बहु न प्राप्तोऽतस्स बलवान् भंगो भवति मे क्रतोः त्वयि नाथे सति विभो यज्ञभंगः कथं भवेत् विचाय्यैवाऽखिलेशान कामं पूर्ण कुरुष्व मे त्वां विहाय शरण्यं कं यायां शिवसुत प्रभो सर्वब्रह्मांडनाथं हि सर्वामरसुसेवितम् ॥ दीनबंधुर्दयासिन्धुः सुसेव्यो भक्तवत्सलः । हरिब्रह्मादिदेवैश्च सुस्तुतः परमेश्वरः

पार्वतीनन्दनस्स्कन्दः परमेकः परंतपः ।

परमात्मात्मदः स्वामी सतां च शरणार्थिनाम् ॥

गया ॥ ५ ॥

।, वह न जाने कहाँ चला गया, मैंने उसे बहुत ॥ ६ खोजा, किंतु वह प्राप्त न हो सका । वह बड़ा बलवान् है । अतः अब तो मेरा यज्ञ भंग हो जायगा ॥६ ॥

। हे विभो! आप - जैसे स्वामीके रहते मेरे ॥ ७ यज्ञका विनाश किस प्रकार हो सकता है, इसलिये | हे अखिलेश्वर! इस प्रकारसे विचारकर मेरी कामना | पूर्ण कीजिये ॥७ ॥

। हे प्रभो! हे शिवपुत्र! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके स्वामी ८ और समस्त देवताओंसे सेवित होनेवाले आपको छोड़कर अब मैं किसकी शरणमें जाऊँ ॥८ ॥

तथा सब आप दीनबन्धु, दयासागर, भक्तवत्सल ॥ ९ प्रकारसे सेवाके योग्य हैं । ब्रह्मा, विष्णु तथा समस्त । देवगण आप परमेश्वरकी स्तुति करते हैं॥९॥

आप पार्वतीको आनन्दित करनेवाले, स्कन्द | नामवाले, परम, अद्वितीय, परंतप, परमात्मा, आत्मज्ञान | देनेवाले तथा शरणकी इच्छा रखनेवाले सज्जनोंके १० स्वामी हैं ॥ १० ॥