श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 771–780

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780

पृष्ठ 771

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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( दीनानाथ महेश शंकरसुत त्रैलोक्यनाथ प्रभो मायाधीश समागतोऽस्मि शरणं मां पाहि विप्रप्रिय । त्वं सर्वप्रभुरानताऽखिलविदब्रह्मादिदेवैः स्तुतः त्वं मायाकृतिरात्मभक्तसुखदो रक्षापरो मायिकः ॥ ११ भक्तप्राणगुणाकरस्त्रिगुणतो भिन्नोऽसि शंभुप्रियः शंभुः शंभुसुतः प्रसन्नसुखदः सच्चित्स्वरूपो महान् । सर्वज्ञस्त्रिपुरघ्नशंकरसुतः सत्प्रेमवश्यः सदा षड्वक्त्रः प्रियसाधुरानतप्रियः सर्वेश्वरः शंकरः । साधुद्रोहकरघ्न शंकरगुरो ब्रह्मांडनाथो प्रभुः सर्वेषाममरादिसेवितपदो मां पाहि सेवाप्रिय ॥ १२ वैरिभयंकर शंकर जनशरणस्य वन्दे तव पदपद्मं सुखकरणस्य । विज्ञप्तिं मम कर्णे स्कन्द निधेहि निजभक्तिं जनचेतसि सदा विधेहि ॥ १३ करोति किं तस्य बली विपक्षो दक्षोऽपि पक्षोभयपार्श्वगुप्तः । किं तक्षकोऽप्यामिषभक्षको वा त्वं रक्षको यस्य सदक्षमानः ॥ १४ विबुधगुरुरपि त्वां स्तोतुमीशो न हि स्यात् कथय कथमहं स्यां मंदबुद्धिर्वरार्च्यः । शुचिरशुचिरनार्यो यादृशस्तादृशो वा पदकमलपरागं स्कन्द ते प्रार्थयामि ॥ १५ कुमारखण्ड ) ७६१ हे दीनानाथ! हे महेश! हे शंकरसुत! हे त्रैलोक्यनाथ! हे प्रभो! हे मायाधीश! हे ब्राह्मणप्रिय! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये । आप सबके स्वामी हैं । ब्रह्मादि सभी देवता आपको प्रणामकर आपकी स्तुति करते हैं । आप मायासे शरीर धारण करनेवाले, अपने भक्तोंको सुख देनेवाले, सबकी रक्षा करनेवाले तथा मायाको वशमें रखनेवाले हैं ॥११ ॥

आप भक्तोंके प्राण, गुणोंके आगार, तीनों गुणोंसे भिन्न, शिवप्रिय, शिवस्वरूप, शिवके पुत्र, प्रसन्न, सुखदायक, सच्चित्स्वरूप, महान्, सर्वज्ञ, त्रिपुरका विनाश करनेवाले, श्रीशिवजीके पुत्र, सदा सत्प्रेमके वशमें रहनेवाले, छः मुखवाले, साधुओंके प्रिय, प्रणतजनपालक, सर्वेश्वर तथा सबके कल्याणकारी हैं । आप साधुओंसे द्रोह करनेवालोंके विनाशक, शिवको गुरु माननेवाले, ब्रह्माण्डके अधिपति, सर्वसमर्थ और सभी देवताओंसे सेवित चरणवाले हैं । हे सेवाप्रिय! मेरी रक्षा कीजिये । हे वैरियोंके लिये भयंकर तथा भक्तोंका कल्याण करनेवाले! लोगोंके शरणस्वरूप तथा सुखकारी आपके चरणकमलमें मैं प्रणाम करता हूँ । हे स्कन्द! मेरी प्रार्थनाको सुनिये और मेरे चित्तमें अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ॥ १२-१३ ॥ जिसके पक्षमें होकर आप उभय पार्श्वमें रक्षा करते हैं, उसका अत्यन्त बलवान् तथा दक्ष शत्रु भी क्या कर सकता है! दक्षलोगोंसे माननीय आप जिसके रक्षक हैं, उसका तक्षक अथवा आमिषभक्षक क्या कर सकता है! ॥ १४ ॥

देवगुरु बृहस्पति भी आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, फिर आप ही बतलाइये कि अत्यन्त मन्दबुद्धि मैं आप परम पूज्यकी किस प्रकार स्तुति-प्रशंसा एवं पूजा करूँ । हे स्कन्द! मैं पवित्र, अपवित्र, अनार्य चाहे कुछ भी हूँ, आपके चरणकमलोंके परागके लिये प्रार्थना करता हॅू ॥ १५ ॥

पृष्ठ 772

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७६२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ६ हे सर्वेश्वर भक्तवत्सल कृपा-सिन्धो त्वदीयोऽस्म्यहं भृत्यः स्वस्य न सेवकस्य गणप-स्यागःशतं सत्प्रभो । भक्तिं क्वापि कृतां मनागपि विभो भृत्यार्तिहा त्वत्तो नास्त्यपरोऽविता न भगवन् मत्तो नरः पामरः ॥ कल्याणकर्त्ता कलिकल्मषघ्नः कुबेरबन्धुः करुणार्द्रचित्तः । त्रिषट्कनेत्रो रसवक्त्रशोभी यज्ञं प्रपूर्णं कुरु मे गुह त्वम् ॥

रक्षकस्त्वं त्रिलोकस्य शरणागतवत्सलः ।

यज्ञकर्त्ता यज्ञभर्त्ता हरसे विघ्नकारिणाम् ॥

विघ्नवारण साधूनां सर्गकारण सर्वतः ।

पूर्णं कुरु ममेशानसुत यज्ञ नमोऽस्तु ते ॥

सर्वत्राता स्कन्द हि त्वं सर्वज्ञाता त्वमेव हि ।

सर्वेश्वरस्त्वमीशानो निवेशसकलाऽवनः ॥

संगीतज्ञस्त्वमेवासि वेदविज्ञः परः प्रभुः ।

सर्वस्थाता विधाता त्वं देवदेवः सतां गतिः ॥

भवानीनन्दनः शंभुतनयो वयुनः स्वराट् ।

ध्याता ध्येयः पितॄणां हि पिता योनिः सदात्मनाम् ॥

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य देवसम्राट् शिवात्मजः ।

स्वगणं वीरबाह्वाख्यं प्रेषयामास तत्कृते ॥

तदाज्ञया वीरबाहुस्तदन्वेषणहेतवे ।

प्रणम्य स्वामिनं भक्त्या महावीरो द्रुतं ययौ ॥

अन्वेषणं चकारासौ सर्वब्रह्माण्डगोलके ।

न प्राप तमजं कुत्र शुश्राव तदुपद्रवम् ॥

जगामाऽथ स वैकुण्ठं तत्राऽजं प्रददर्श तम् । उपद्रवं प्रकुर्वन्तं गलयूपं महाबलम् ॥ हे सर्वेश्वर! हे भक्तवत्सल! हे कृपासिन्धो आपका सेवक हूँ, हे सत्प्रभो! आप गणोंके! मैं अतः अपने सेवकके अपराधपर ध्यान न दें । हे पति विभो हैं, | मैंने कभी भी आपकी थोड़ी भी भक्ति नहीं! । यह आप जानते हैं । हे भगवन्! आपसे की है, बढ़कर कोई अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाला नहीं है और मुझसे १६ । बढ़कर कोई पामर जन नहीं है ॥ १६ ॥

आप कल्याण करनेवाले, कलिके पापको नष्ट करने - वाले, कुबेरके बन्धु, करुणार्द्र चित्तवाले, अठारह नेत्र तथा छः मुखवाले हैं । हे गुह! आप मेरे यज्ञको १७ पूर्ण कीजिये ॥ १७ ॥

आप त्रिलोकीके रक्षक, शरणागतोंसे प्रेम १८ करनेवाले, यज्ञके कर्ता, यज्ञके पालक और विघ्नकारियोंका वध करनेवाले हैं । साधुजनोंके विघ्नको दूर करनेवाले और सब प्रकारसे सृष्टि १ ९ करनेवाले हे महेश्वरपुत्र! मेरे यज्ञको पूर्ण कीजिये; आपको नमस्कार है ॥१८-१९ ॥ हे स्कन्द! आप सबके रक्षक तथा सब कुछ २० जाननेवाले हैं । आप सर्वेश्वर, सबके शासक, सबके एकमात्र स्थान और सबका पालन करनेवाले हैं ॥ २० ॥

आप संगीतज्ञ, वेदवेत्ता, परमेश्वर, सबको स्थिति २१ प्रदान करनेवाले, विधाता, देवदेव तथा सज्जनोंकी एकमात्र गति हैं । आप भवानीनन्दन, शम्भुपुत्र, ज्ञानके स्वरूप, स्वराट्, ध्याता, ध्येय, पितरोंके पिता तथा २२ महात्माओंके मूल कारण हैं ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले — शिवजीके पुत्र देवसम्राट् | कार्तिकेयने उस ब्राह्मणका वचन सुनकर वीरबाहु / नामक अपने गणको उसे ( यज्ञके बकरेको ) खोजने के । २३ लिये भेजा ॥२३ ॥

उनकी आज्ञासे महावीर वीरबाहु भक्तिपूर्वक । २४ अपने स्वामीको प्रणामकर उसे खोजनेके लिये शीघ्र ही चल पड़ा । उसने सारे ब्रह्माण्डमें उस ' बकरेकी । । खोज की, परंतु उसे कहीं नहीं पाया, केवल लोगोंसे । २५ उसके उपद्रवका समाचार सुना । तब वह वैकुण्ठमें देखा, | गया और वहाँ उस महाबलवान् अजको उसने जो अपने गलेमें यज्ञके यूपको बाँधे हुए उपद्रव कर २६ | रहा था ॥ २४–२६ ॥

पृष्ठ 773

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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७६३ तं श्रृंगयोर्वीरो धर्षयित्वातिवेगतः । धृत्वा आनिनाय स्वामिपुरो विकुर्वन्तं रवं बहु दृष्ट्वा तं कार्तिकस्सोऽरमारुरोह स तं प्रभुः धृतब्रह्माण्डगरिमा महासूतिकरो गुहः मुहूर्तमात्रतस्सोऽजो ब्रह्मांडं सकलं मुने बभ्राम श्रम एवाशु पुनस्तत्स्थानमागतः तत उत्तीर्य स स्वामी समुवास स्वमासनम् सोऽजः स्थितस्तु तत्रैव स नारद उवाच तम् नारद उवाच नमस्ते देवदेवेश देहि मेऽजं कृपानिधे कुर्यामध्वरमानन्दात्सखायं कुरु मामहो कार्त्तिक उवाच वधयोग्यो न विप्राऽजः स्वगृहं गच्छ नारद पूर्णोऽस्तु तेऽध्वरः सर्वः प्रसादादेव मे कृतः ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य द्विजस्स्वामी वचनं प्रीतमानसः जगाम स्वालयं दत्त्वा तस्मा आशिषमुत्तमाम् वीरबाहु बड़े वेगके साथ उसकी दोनों सींगें ॥ २७ पकड़कर एवं पटककर ऊँचे स्वरसे चिल्लाते हुए उस अजको अपने स्वामीके पास ले लाया ॥ २७ ॥

। उसको देखते ही सृष्टिकर्ता प्रभु कार्तिकेय ॥ २८ समस्त ब्रह्माण्डका भार धारणकर उसके ऊपर आरूढ़ हो गये ॥२८ ॥

। हे मुने! वह अज बिना विश्राम किये ही क्षणमात्रमें ॥ २ ९ सारा ब्रह्माण्ड घूमकर फिर वहीं आ गया ॥ २ ९ ॥ । तब कार्तिकेय उससे उतरकर अपने आसनपर ॥ ३० बैठ गये और वह अज वहीं खड़ा रहा । तब वह नारद [ ब्राह्मण ] कार्तिकेयसे कहने लगा- ॥३० ॥

नारद बोला- हे देवदेवेश! आपको प्रणाम । है । हे कृपानिधे! अब आप मेरे इस अजको मुझे ॥ ३१ प्रदान कीजिये, जिससे मैं आनन्दपूर्वक यज्ञ करूँ; आप मुझसे मित्रभाव रखिये ॥३१ ॥

कार्तिकेय बोले- हे ब्राह्मण! यह अज वधके । योग्य नहीं है । हे नारद! अब आप अपने घर जाइये, ॥ ३२ आपका सम्पूर्ण यज्ञ मेरी कृपासे पूर्ण हो गया ॥३२ ॥

ब्रह्माजी बोले – कार्तिकेयके इस वचनको । सुनकर प्रसन्नचित्त वह ब्राह्मण कार्तिकेयको उत्तम ॥ ३३ आशीर्वाद देकर अपने घर चला गया ॥३३ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे कुमाराद्भुतचरितवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें कुमारके अद्भुतचरितका वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः तारकासुरसे सम्बद्ध देवासुर - संग्राम ब्रह्मोवाच हर्य्यादयस्सुरास्ते ` च दृष्ट्वा तच्चरितं विभोः सुप्रसन्ना बभूवुर्हि विश्वासासक्तमानसाः वान्तः कुर्वतो नादं भाविताश्शिवतेजसा कुमारं पुरस्कृत्य तारकं हन्तुमाययुः देवानामुद्यमं श्रुत्वा तारकोऽपि महाबलः ब्रह्माजी बोले- विभु कार्तिकेयके इस । चरित्रको देखकर विष्णु आदि देवताओंके मनमें ॥ १ विश्वास हो गया और वे परम प्रसन्न हो गये । शिवजीके तेजसे प्रभावित होकर वे उछलते तथा । सिंहनाद करते हुए कुमारको आगेकर तारकासुरका ॥ २ वध करनेहेतु चल पड़े ॥ १-२ ॥ महाबली तारकासुरने भी देवताओंके उद्योगको सुनकर बड़ी सेनाके साथ देवताओंसे युद्ध करनेके । सैन्येन योद्धुं सुरान् प्रति ॥ ३ लिये शीघ्र प्रस्थान किया । देवगणोंने तारकासुरकी महता सद्यो ययौ

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७६४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७

देवा दृष्ट्वा समायान्तं तारकस्य महाबलम् ।

बलेन बहु कुर्वन्तः सिंहनादं विसिस्मियुः ॥ ४

तदा नभोऽङ्गना वाणीं जगादोपरि सत्वरम् ।

शङ्करप्रेरिता सद्यो हर्यादीनखिलान् सुरान् ॥ ५

व्योमवाण्युवाच

कुमारं च पुरस्कृत्य सुरा यूयं समुद्यताः ।

दैत्यान् विजित्य संग्रामे जयिनोऽथ भविष्यथ ॥ ६

ब्रह्मोवाच

वाचं तु खेचरीं श्रुत्वा देवाः सर्वे समुत्सुकाः ।

वीरशब्दान् प्रकुर्वन्तो निर्भया ह्यभवंस्तदा ॥ ७

कुमारं च पुरस्कृत्य सर्वे ते गतसाध्वसाः ।

योद्धुकामाः सुरा जग्मुर्महीसागरसंगमम् ॥ ८

आजगाम द्रुतं तत्र यत्र देवाः स तारकः ।

सैन्येन महता सार्द्धं असुरैर्बहुभिर्वृतः ॥ ९

रणदुंदुभयो नेदुः प्रलयांबुदनिःस्वनाः ।

कर्कशानि च वाद्यानि पराणि च तदागमे ॥ १०

गर्जमानास्तदा दैत्यास्तारकेणासुरेण ह ।

कंपयन्तो भुवं पादक्रमैर्वल्गु न कारकाः ॥ ११

तच्छ्रुत्वा रवमत्युग्रं सर्वे देवा विनिर्भयाः ।

ऐकपद्येन चोत्तस्थुर्योद्धुकामाश्च तारकम् ॥ १२

गजमारोप्य देवेन्द्रः कुमारं ह्यग्रतोऽभवत् ।

सुरसैन्येन महता लोकपालैः समावृतः ॥१३

तदा दुंदुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः ।

वीणावेणुमृदंगानि तथा गंधर्वनिस्स्वनाः ॥ १४

गजं दत्त्वा महेन्द्राय कुमारो यानमारुहत् ।

अनेकाश्चर्यसंभूतं नानारत्नसमन्वितम् ॥ १५

विमानमारुह्य तदा महायशाः स शांकरिस्सर्वगुणैरुपेतः । श्रिया समेतः परया बभौ महान् संवीज्यमानश्चमरैर्महाप्रभैः ॥ १६ | | बहुत बड़ी सेना देखकर अत्यन्त बलपूर्वक सिंहनाद करते हुए उसे आश्चर्यचकित कर दिया । उसी | ऊपरसे बड़ी शीघ्रताके साथ शिवजीद्वारा समय प्रेरित | आकाशवाणीने समस्त विष्णु आदि देवताओंसे शीघ्र कहा- ॥ ३–५ ॥ आकाशवाणी बोली- हे देवगण! आपलोग जो कुमारको आगे करके युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं, इससे आपलोग संग्राममें दैत्योंको जीतकर विजयी होंगे ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी बोले- आकाशवाणीको सुनकर सभी देवताओंमें अत्यन्त उत्साह भर गया और वे वीरोंकी भाँति गर्जना करते हुए उस समय निर्भय हो गये ॥७ ॥

इस प्रकार भयसे रहित एवं युद्धकी इच्छावाले वे सभी देवता कुमारको आगे करके महीसागर-संगमपर गये । बहुत - से असुरोंसे घिरा वह तारक भी जहाँ देवता थे, वहाँपर अपनी बहुत बड़ी सेनाके साथ शीघ्र ही आ गया ॥८ - ९ ॥ उसके आनेपर प्रलयकालीन बादलके समान शब्द करनेवाली रणदुन्दुभियाँ तथा अन्य कर्कश बाजे बजने लगे । उस समय तारकासुरके साथ रहनेवाले समस्त असुर कूदते - फाँदते हुए पादप्रहारोंसे पृथ्वीको कँपाने लगे और गर्जना करने लगे । उस उग्र ध्वनिको सुनकर सभी देवगण अत्यन्त निर्भय हो एक साथ ही तारकासुरसे युद्ध करनेकी इच्छासे उठ खड़े हुए । | स्वयं इन्द्रदेव कुमारको हाथीपर चढ़ाकर देवताओंकी बहुत बड़ी सेनाके साथ लोकपालोंसे युक्त हो आगे-आगे चलने लगे॥१०—१३ ॥ उस समय अनेक प्रकारकी दुन्दुभि, भेरी,

तुरही, वीणा, वेणु और मृदंग बजने लगे तथा गन्धर्व ।

गान करने लगे ॥ १४ ॥

कुमार इन्द्रको हाथी देकर अनेक आश्चर्योंसे युक्त सवार हो गये ॥ १५ ॥

उस समय सर्वगुणसम्पन्न महायशस्वी | शंकरपुत्र कुमार कार्तिकेय विमानके ऊपर चढ़कर महाकान्तिमान् चामरोंसे वीज्यमान होते हुए अत्यन्त शोभित हो रहे थे ॥ १६ ॥

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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( प्राचेतसं छत्रमतीवसुप्रभं रत्नैरुपेतं विविधैर्विराजितम् । धृतं तदा तच्च कुमारमूर्धिन वै ह्यनन्तचान्द्रैः किरणैर्महाप्रभैः ॥ १७

मिलितास्ते तदा सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ।

स्वैः स्वैर्बलैः परिवृता युद्धकामा महाबलाः ॥ १८

एवं देवाश्च दैत्याश्च योद्धुकामाः स्थिता भुवि ।

सैन्येन महता तेन व्यूहं कृत्वा पृथक् पृथक् ॥ १ ९

ते सेने सुरदैत्यानां शुशुभाते परस्परम् ।

हन्तुकामे तदान्योऽन्यं स्तूयमाने च बन्दिभिः ॥ २०

उभे सेने तदा तेषामगर्जेतां वनोपमे ।

भयंकरेऽत्यवीराणामितरेषां सुखावहे ॥ २१

एतस्मिन्नन्तरे तत्र बलोन्मत्ताः परस्परम् ।

दैत्या देवा महावीरा युयुधुः क्रोधविह्वलाः ॥ २२

आसीत्सुतुमुलं युद्धं देवदैत्यसमाकुलम् ।

रुण्डमुंडांकितं सर्वं क्षणेन समपद्यत ॥ २३

भूमौ निपतितास्तत्र शतशोऽथ सहस्त्रशः ।

निकृत्तांगा महाशस्त्रैर्निहता वीरसंमताः ॥ २४

केषांचिद्बाहवश्छिन्नाः खड्गपातैः सुदारुणैः ।

केषांचिदूरवश्छिन्ना वीराणां मानिनां मृधे ॥ २५

केचिन्मथितसर्वांगा गदाभिर्मुद्गरैस्तथा ।

केचिन्निर्भिन्नहृदयाः पाशैर्भल्लैश्च पातिताः ॥ २६

केचिद्विदारिताः पृष्ठे कुंतैर्ऋष्टिभिरंकुशैः ।

छिन्नान्यपि शिरांस्येव पतितानि च भूतले ॥ २७

बहूनि च कबंधानि नृत्यमानानि तत्र वै ।

वल्गमानानि शतशो उद्यतास्त्रकराणि च ॥ २८

नद्यः प्रवर्तितास्तत्र शतशोऽसृङ्कहास्तदा ।

भूतप्रेतादयस्तत्र शतशश्च समागताः ॥ २ ९

कुमारखण्ड ) ७६५ उस समय प्रचेताके द्वारा दिया गया छत्र, जो अनेक रत्नोंसे जटित होनेके कारण महाकान्तिमान् था तथा जिससे चन्द्रकिरणोंके समान आभा निकल रही थी, वह कुमारके द्वारा मस्तकपर धारण किया गया था ॥ १७ ॥

उस समय युद्धकी इच्छावाले महाबलवान् इन्द्रादि समस्त देवता अपनी - अपनी सेनाके साथ सम्मिलित हुए ॥ १८ ॥

इस प्रकार देवता एवं दानव व्यूहकी रचनाकर बहुत बड़ी सेनाके साथ युद्धकी इच्छासे रणभूमिमें आ डटे ॥१ ९ ॥ उस समय एक - दूसरेको मारनेकी इच्छावाली देवताओं तथा दैत्योंकी वे दोनों सेनाएँ चारणोंके द्वारा स्तुति की जाती हुई अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं ॥ २० ॥

कायरोंके लिये भयंकर तथा वीरोंके लिये सुखद समुद्रतुल्य उनकी दोनों सेनाएँ गरजने लगीं ॥२१ ॥

इसी बीच बलसे उन्मत्त महावीर दैत्य एवं देवता क्रोधसे अधीर हो परस्पर युद्ध करने लगे ॥२२ ॥

उस समय देवों एवं दानवोंमें महाभयंकर युद्ध आरम्भ हो गया और क्षणमात्रमें पृथ्वी रुण्ड - मुण्डोंसे व्याप्त हो गयी ॥ २३ ॥

सैकड़ों तथा हजारों वीरसम्मत योद्धा महाशस्त्रोंके प्रहारसे छिन्न - भिन्न होकर पृथ्वीपर गिरने लगे । युद्धमें अत्यन्त कठोर खड्गके प्रहारसे किसीकी भुजा छिन्न - भिन्न हो गयी और किन्हीं मानी वीरोंकी जाँघें कट गयीं । गदाओं तथा मुद्गरोंसे कुछ वीरोंके सभी अंग विदीर्ण हो गये । भालोंसे कुछ वीरोंकी छाती छिद गयी और कुछ पाशोंसे बाँध दिये गये । कुछ वीर पीठपर भाला, ऋष्टि एवं अंकुशके प्रहारसे घायल हो गये । किन्हींके सिर कटकर । पृथ्वीपर गिर गये ॥ २४–२७ ॥ वहाँ बहुत- - से कबन्ध ( सिर कटे हुए धड़ ) नाच रहे थे तथा कुछ लोग अपने हाथोंमें शस्त्र लिये हुए एक दूसरेको ललकार रहे थे ॥२८ ॥

वहाँ रक्तकी सैकड़ों नदियाँ बह चलीं और । सैकड़ोंकी संख्यामें भूत - प्रेत वहाँ आ गये ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 776

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७६६ गोमायवश्शिवाः तत्र भक्षयन्तः पलं बहु तथा गृध्रवटा श्येना वायसा मांसभक्षकाः बुभुजुः पतितानां च पलानि सुबहूनि वै

एतस्मिन्नन्तरे तत्र तारकाख्यो महाबलः ।

सैन्येन महता सद्यो ययौ योद्धुं सुरान् प्रति ॥

देवा दृष्ट्वा समायान्तं तारकं युद्धदुर्मदम् । योद्धुकामं तदा सद्यो ययुः शक्रादयस्तदा बभूवाथ महोन्नादः सेनयोरुभयोरपि ॥ अथाभूद् द्वन्द्वयुद्धं हि सुरासुरविमर्दनम् । यं दृष्ट्वा हर्षिता वीराः क्लीबाश्च भयमागताः तारको युयुधे युद्धे शक्रेण दितिजो बली अग्निना सह संह्रादो जंभेनैव यमः स्वयम् महाप्रभुर्नैर्ऋतेन पाशी सह बलेन च सुवीरो वायुना सार्धं पवमानेन गुह्यराट् ॥ ईशानेन समं शंभुर्युयुधे रणवित्तमः शुंभः शेषेण युयुधे कुंभश्चन्द्रेण दानवः कुंजरो मिहिरेणाजौ महाबलपराक्रमः युयुधे परमास्त्रैश्च नानायुद्धविशारदः एवं द्वन्द्वेन युद्धेन महता च सुरासुराः संगरे युयुधुः सर्वे बलेन कृतनिश्चयाः ॥ अन्योऽन्यं स्पर्द्धमानास्तेऽमरा दैत्या महाबलाः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ । वहाँपर सियार - सियारिनें मांस खाने लगीं ॥ | श्येन तथा कौवे एवं अनेक मांसभक्षी जानवर गृध्रवट, ॥ ३० गिरे हुए योद्धाओंके मांसका भक्षण करने लगे ॥३० युद्ध में इसी बीच महाबली तारकासुर बहुत बड़ी ॥ | सेनाके साथ देवताओंसे युद्ध करनेके लिये वहाँ शीघ्र ३१ आ पहुँचा ॥३१ ॥

युद्धमें दुर्मद तारकासुरको युद्ध करनेके लिये । आता हुआ देखकर इन्द्र आदि देवता भी शीघ्र ही ३२ वहाँ पहुँच गये । उस समय दोनों सेनाओंमें घोर गर्जना होने लगी ॥३२ ॥

उस समय देवता तथा दैत्योंका विनाशकारी ॥ ३३ द्वन्द्व - युद्ध होने लगा, जिसे देखकर वीर हर्षित होते थे तथा कायर भयभीत हो जाते थे ॥ ३३ ॥

। रणमें दितिपुत्र बलवान् तारक इन्द्रके साथ, ॥ ३४ संहाद अग्निके साथ, यमराज जम्भके साथ, महाप्रभु । निर्ऋतिके साथ, वरुण बलके साथ, सुवीर वायुके ३५ साथ तथा गुह्यराट् पवमानके साथ युद्ध करने लगा ॥ रणकुशल शम्भु ईशानके साथ युद्ध करने लगा । ॥ ३६ शुम्भका शेषके साथ और दानव कुम्भका चन्द्रमाके । साथ युद्ध होने लगा । उस युद्धमें महाबली, पराक्रमी तथा अनेक युद्धोंमें प्रवीण कुंजर मिहिरके साथ परम ॥ ३७ अस्त्रोंसे युद्ध करने लगा ॥ ३४–३७ ॥ । इस प्रकार देवता तथा राक्षस अपनी - अपनी सेना ३८ लेकर महान् द्वन्द्वयुद्धके द्वारा रणभूमिमें विजयको । । आशासे परस्पर युद्ध करने लगे । हे मुने! महाबली वे तस्मिन्देवासुरे युद्धे दुर्जया अभवन्मुने ॥ ३ ९ दैत्य तथा देवता उस देवासुरसंग्राममें परस्पर स्पर्धा तदा च तेषां सुरदानवानां बभूव युद्धं तुमुलं जयैषिणाम् सुखावहं वीरमनस्विनां वै भयावहं चैव तथेतरेषाम् ॥ मही महारौद्रतरा विनष्टकैः सुरासुरैर्वै पतितैरनेकशः । तस्मिन्नगम्यातिभयानका तदा जाता महासौख्यवहा । करते हुए एक - दूसरेके लिये दुर्जेय हो गये ॥ ३८-३९ ॥ । विजयकी इच्छा रखनेवाले उन देवगणों तथा | दानवोंका घनघोर युद्ध छिड़ गया, जो मनस्वी वीरोंके लिये ४० सुखदायक तथा कायरोंके लिये भयदायक था ॥ ४० ॥

दानवों के युद्धमें घायल हुए अनेक देवता तथा गिरनेसे वह रणभूमि अत्यन्त भयानक हो उठी । उससे हो गयी | समय वह कायरोंके लिये अगम्य एवं भयंकर मनस्विनाम् ॥ ४१ । और मनस्वियोंको प्रसन्न करनेवाली हुई ॥ ४१ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे ॥ ७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत युद्धप्रारंभवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः युद्धप्रारम्भवर्णन नामक द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्ड सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

पृष्ठ 777

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 777 का मूल पृष्ठ
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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७६७ अथाष्टमोऽध्यायः देवराज इन्द्र, विष्णु तथा वीरक ब्रह्मोवाच

इति ते वर्णितस्तात देवदानवसेनयोः ।

संग्रामस्तुमुलोऽतीव तत्प्रभ्वोः शृणु नारद ॥ १

एवं युद्धेऽतितुमुले देवदानवसंक्षये ।

तारकेणैव देवेन्द्रः शक्त्या परमया सह ॥ २

सद्यः पपात नागाश्च धरण्यां मूर्च्छितोऽभवत् ।

परं कश्मलमापेदे वज्रधारी सुरेश्वरः ॥ ३

तथैव लोकपाः सर्वेऽसुरैश्च बलवत्तरैः ।

पराजिता रणे तात महारणविशारदैः ॥ ४

अन्येऽपि निर्जरा दैत्यैर्युद्ध्यमानाः पराजिताः ।

असहन्तो हि तत्तेजः पलायनपरायणाः ॥ ५

जगर्जुरसुरास्तत्र जयिनः सुकृतोद्यमाः ।

सिंहनादं प्रकुर्वन्तः कोलाहलपरायणाः ॥ ६

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वीरभद्रो रुषान्वितः ।

आससाद गणैर्वीरैस्तारकं वीरमानिनम् ॥ ७

निर्जरान् पृष्ठतः कृत्वा शिवकोपोद्भवो बली ।

तत्सम्मुखो बभूवाथ योद्धुकामो गणाग्रणीः ॥ ८

तदा ते प्रमथाः सर्वे दैत्याश्च परमोत्सवाः ।

युयुधुः संयुगेऽन्योऽन्यं प्रसक्ताश्च महारणे ॥ ९

त्रिशूलैर्ऋष्टिभिः पाशैः खड्गैः परशुपट्टिशैः ।

निजघ्नुः समरेऽन्योऽन्यं रणे रणविशारदाः ॥ १०

तारको वीरभद्रेण स त्रिशूलाहतो भृशम् ।

पपात सहसा भूमौ क्षणं मूर्छापरिप्लुतः ॥ ११

उत्थाय स द्रुतं वीरस्तारको दैत्यसत्तमः ।

लब्धसंज्ञो बलाच्छक्त्या वीरभद्रं जघान ह ॥ १२

वीरभद्रस्तथा वीरो महातेजा हि तारकम् ।

जघान त्रिशिखेनाशु घोरेण निशितेन तम् ॥ १३

आदिके साथ तारकासुरका युद्ध ब्रह्माजी बोले- हे तात! हे नारद! इस प्रकार मैंने देव - दानव - सेनाओंके भयंकर युद्धका वर्णन किया, अब दोनों सेनाओंके सेनापतियों — कार्तिकेय और तारकासुरके युद्धका वर्णन सुनिये । इस प्रकार देव-दानवके लिये विनाशकारी घोर संग्राममें तारकासुरने परम शक्ति अस्त्रद्वारा इन्द्रपर प्रहार किया, जिससे घायल होकर वे उसी क्षण हाथीसे गिर पड़े तथा मूर्च्छित हो गये । वज्र धारण करनेवाले इन्द्रको उस समय बहुत कष्ट हुआ । हे तात! उसी प्रकार अति बलवान् तथा महारणमें प्रवीण असुरोंने सभी लोकपालोंको भी पराजित कर दिया ॥१–४ ॥ युद्ध करते हुए दूसरे देवगण भी दैत्योंसे पराजित हो गये और उनके तेजको न सह सकनेके कारण इधर - उधर भागने लगे ॥५ ॥

इस प्रकार सफल उद्योगवाले विजयी असुर गर्जना करने लगे तथा सिंहनाद करते हुए कोलाहल करने लगे । इसी समय क्रोधित हो उठे वीरभद्र अपनेको वीर माननेवाले तारकासुरकी ओर पराक्रमी गणोंके साथ आये । शिवजीके कोपसे उत्पन्न बलवान् वीरभद्र देवगणोंको अपने पीछे करके स्वयं सभी गणोंके आगे होकर युद्धकी इच्छासे तारकासुरके सामने आ गये । उस समय वे सभी प्रमथगण एवं दैत्य उत्साहित होकर उस रणस्थलमें एक - दूसरेपर प्रहारकर युद्ध करने लगे ॥६ – ९ ॥ रणमें कुशल वे एक - दूसरेपर त्रिशूल, ऋष्टि, पाश, खड्ग, परशु एवं पट्टिशसे प्रहार करने लगे ॥ १० ॥

वीरभद्रने उस तारकको त्रिशूलसे अत्यधिक आहत कर दिया और वह क्षणभरमें मूच्छित होकर भूमिपर सहसा गिर पड़ा । इसके बाद उस दैत्य श्रेष्ठ तारकने मूर्च्छा त्यागकर बड़ी शीघ्रतासे उठकर वीरभद्रपर शक्तिसे बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥ पराक्रमी तथा महातेजस्वी वीरभद्रने भी अपने घोर त्रिशूलसे शीघ्र ही उस तारकासुरपर प्रहार | किया ॥ १३ ॥

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७६८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

सोऽपि शक्त्या वीरभद्रं जघान समरे ततः ।

तारको दितिजाधीशः प्रबलो वीरसंमतः ॥

एवं संयुद्ध्यमानौ तौ जघ्नतुश्चेतरेतरम् ।

नानास्त्रशस्त्रैः समरे रणविद्याविशारदौ ॥

तयोर्महात्मनोस्तत्र द्वन्द्वयुद्धमभूत्तदा ।

सर्वेषां पश्यतामेव तुमुलं रोमहर्षणम् ॥

ततो भेरीमृदंगाश्च पटहानकगोमुखाः ।

विनेदुर्विहता वीरैः शृण्वतां सुभयानकाः ॥

युयुधातेतिसन्नद्धौ प्रहारैर्जर्जरीकृतौ ।

अन्योऽन्यमतिसंरब्धौ तौ बुधांगारकाविव ॥

एवं दृष्ट्वा तदा युद्धं वीरभद्रस्य तेन च ।

तत्र गत्वा वीरभद्रमवोचस्त्वं शिवप्रियः ॥

नारद उवाच

वीरभद्र महावीर गणानामग्रणीर्भवान् ।

निवर्तस्व रणादस्माद्रोचते न वधस्त्वया ॥

एवं निशम्य त्वद्वाक्यं वीरभद्रो गणाग्रणीः ।

अवदत्स रुषाविष्टस्त्वां तदा तु कृतांजलिः ॥

वीरभद्र उवाच

मुनिवर्य महाप्राज्ञ शृणु मे परमं वचः ।

तारकं च वधिष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥

आनयन्ति च ये वीराः स्वामिनं रणसंसदि ।

ते पापिनो महाक्लीबा विनश्यन्ति रणं गताः ॥

असद्गतिं प्राप्नुवन्ति तेषां च निरयो ध्रुवम् ।

वीरभद्रो हि विज्ञेयो न वाच्यस्ते कदाचन ॥

शस्त्रास्त्रैर्भिन्नगात्रा ये रणं कुर्वन्ति निर्भयाः ।

इहामुत्र प्रशंस्यास्ते लभन्ते सुखमद्भुतम् ॥

शृण्वन्तु मम वाक्यानि देवा हरिपुरोगमाः ।

अतारकां महीमद्य करिष्ये स्वामिवर्जितः ॥

८ तत्पश्चात् दैत्योंके अधीश्वर तथा वीरोंमें‍ १४ महाबली तारकने भी रणभूमिमें वीरभद्रपर मान्य प्रहार किया । इस प्रकार युद्धविद्यामें कुशल युद्ध शक्तिसे करते हुए वे दोनों ही अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे १५ दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ १४-१५ ॥ एक-उस समय उन दोनों वीरोंमें सबके देखते-१६ देखते ही अत्यन्त रोमांचकारी भयंकर द्वन्द्व - युद्ध होने लगा ॥१६ ॥

तब भेरी, मृदंग, पटह, आनक तथा गोमुख बाजे १७ बजने लगे, जिसे सुनकर वीर प्रसन्न तथा कायर व्याकुल हो गये । एक - दूसरेके प्रहारोंसे जर्जर कर दिये गये वे दोनों बड़ी सावधानीके साथ बुध तथा १८ मंगलके समान बड़े वेगसे परस्पर युद्ध कर रहे थे । तब तारकासुरके साथ वीरभद्रका ऐसा युद्ध देखकर वहाँ वीरभद्रके पास जाकर शिवजीके प्रिय आप १ ९ कहने लगे- ॥ १७–१९ ॥। नारदजी बोले - हे वीरभद्र! हे महावीर! आप गणोंमें श्रेष्ठ हैं, आप इस युद्धसे हट जाइये; क्योंकि २० आपके द्वारा इसका वध उचित नहीं है ॥२० ॥

आपके इस वचनको सुनकर गणोंमें अग्रणी २१ कुपित वीरभद्र हाथ जोड़कर आपसे कहने लगे— ॥२१ ॥

वीरभद्र बोले — हे महाप्राज्ञ! हे मुनिवर्य! आप । मेरे श्रेष्ठ वचनको सुनिये । मैं तारकका वध [ अवश्य ] २२ करूँगा; आज मेरा पराक्रम आप देखें ॥ २२ ॥

जो वीर अपने स्वामीको युद्धभूमिमें ले आ २३ हैं, वे पापी तथा महानपुंसक होते हैं और रणक्षेत्रमें । । नष्ट हो जाते हैं । वे अशुभ गति प्राप्त करते हैं तथा | उनको नरक अवश्य प्राप्त होता है २४ | मुझे वीरभद्र जानिये, आप पुनः कहियेगा ॥ २३-२४ ॥ अस्त्र - शस्त्रोंसे छिन्न - भिन्न २५ निर्भय होकर युद्ध करते हैं, वे | परलोकमें प्रशंसाके पात्र होते हैं प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥

। [ हे मुने! ] आप कभी मत । ऐसा जो अंगोंवाले तथा । इस लोकमें तथा अद्भुत सुख । आज विष्णु आदि सभी देवगण मेरे वचन सुन लें २६ । मैं इस पृथ्वीको तारकासुरसे रहित दूँगा ॥ । २६ ॥ कर

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अ ०८ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७६ ९ प्रमथैस्सार्द्धं वीरभद्रो हि शूलधृक् । इत्युक्त्वा विचिन्त्य मनसा शंभुं युयुधे तारकेण हि ॥

वृषारूढैरनेकैश्च त्रिशूलवरधारिभिः ।

महावीरैः त्रिनेत्रैश्च स रेजे रणसंगतः ॥

कोलाहलं प्रकुर्वन्तो निर्भयाः शतशो गणाः ।

वीरभद्रं पुरस्कृत्य युयुधुर्दानवैः सह ॥

असुरास्तेऽपि युयुधुः तारकासुरजीविनः ।

बलोत्कटा महावीरा मर्दयन्तो गणान् रुषा ॥

पुनः पुनश्चैव बभूव संग महोत्कटो दैत्यवरैर्गणानाम् । प्रहर्षमाणाः परमास्त्रकोविदाः तदा गणास्ते जयिनो बभूवुः ॥

गणैर्जितास्ते प्रबलैरसुरा विमुखा रणे ।

पलायनपरा जाता व्यथिता व्यग्रमानसाः ॥

एवं भ्रष्टं स्वसैन्यं तद् दृष्ट्वा तत्पालकोऽसुरः ।

तारको हि रुषाविष्टो हन्तुं देवगणान् ययौ ॥

भुजानामयुतं कृत्वा सिंहमारुह्य वेगतः । पातयामास तान्देवान् गणांश्च रणमूर्द्धनि स दृष्ट्वा तस्य तत्कर्म वीरभद्रो गणाग्रणीः चकार सुमहत्कोपं तद्बधाय महाबली स्मृत्वा शिवपदांभोजं जग्राह त्रिशिखं परम् जज्वलुस्तेजसा तस्य दिशः सर्वा नभस्तथा एतस्मिन्नन्तरे स्वामी वारयामास तं रणात् वीरबाहुमुखान्सद्यो महाकौतुकदर्शकः तदाज्ञया वीरभद्रो निवृत्तोऽभूद्रणात्तदा कोपं चक्रे महावीरस्तारकोऽसुरनायकः ऐसा कहकर त्रिशूल धारण किये हुए वीरभद्र २७ प्रमथगणोंको साथ लेकर मनमें शिवजीका स्मरणकर तारकासुरके साथ युद्ध करने लगे ॥२७ ॥

वृषभपर बैठे हुए, उत्तम त्रिशूल धारण २८ किये हुए तथा तीन नेत्रोंवाले अनेक महावीरोंके साथ रणमें विद्यमान वे [ वीरभद्र ] सुशोभित हो रहे थे ॥२८ ॥

सैकड़ों गण कोलाहल करते हुए वीरभद्रको २ ९ आगे करके निर्भय हो दानवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ९ ॥ इसी प्रकार तारकासुरके अधीन रहनेवाले ३० बलोन्मत्त महावीर राक्षस भी क्रोधमें भरकर गणोंका मर्दन करते हुए युद्ध करने लगे । इस प्रकार उन दैत्योंके साथ गणोंका बहुत बड़ा विकट संग्राम बारंबार होने लगा, उस समय अस्त्र चलानेमें कुशल ३१ गण एक - दूसरेको प्रहर्षित करते हुए विजयी हो गये ॥ ३०-३१ ॥ तब प्रबल गणोंसे पराजित हुए दैत्य रणभूमिसे ३२ विमुख हो दुखी एवं व्याकुलचित्त होकर भागने लगे ॥ ३२ ॥

इस प्रकार अपनी सेनाको व्यथित तथा ३३ पराङ्मुख देखकर तारकासुर क्रोधित होकर देवताओंको मारनेके लिये चला ॥ ३३ ॥

वह दस हजार भुजा धारणकर सिंहपर ॥ ३४ आरूढ़ हो बड़े वेगसे देवताओं तथा गणोंको युद्धमें गिराने लगा ॥ ३४ ॥

। तब गणोंके मुखिया महाबली वीरभद्रने ॥ ३५ उसके इस कर्मको देखकर उसके वधके लिये अत्यधिक क्रोध किया । उन्होंने शिवजीके चरण-। कमलोंका स्मरण करके श्रेष्ठ त्रिशूल ग्रहण किया, ॥ ३६ उसके तेजसे सभी दिशाएँ तथा आकाश जलने लगे । इसी अवसरपर महान् कौतुक दिखानेवाले स्वामी । कार्तिकेयने उन्हें तथा वीरबाहु आदि गणोंको युद्धभूमिसे ॥ ३७ हटा दिया ॥ ३५-३७ ॥ उनकी आज्ञासे वीरभद्र रणभूमिसे विरत हो गये । तब असुरनायक तारकासुरने महाक्रोध

।

॥ ३८ | किया ॥ ३८ ॥

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७७० चकार बाणवृष्टिं च सुरोपरि तदाऽसुरः ततोऽऽह्वासीत्सुरान्सद्यो नानास्त्ररणकोविदः एवं कृत्वा महत्कर्म तारकोऽसुरपालकः सर्वेषामपि देवानामशक्यो बलिनां वरः एवं निहन्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवान् भयाकुलान् कोपं कृत्वा रणायाशु संनद्धोऽभवदच्युतः चक्रं सुदर्शनं शार्ङ्ग धनुरादाय सायुधः अभ्युद्ययौ महादैत्यं रणाय भगवान् हरिः ततः समभवद्युद्धं हरितारकयोर्महत् । लोमहर्षणमत्युग्रं सर्वेषां पश्यतां मुने

गदामुद्यम्य स हरिर्जघानासुरमोजसा ।

द्विधा चकार तां दैत्यस्त्रिशिखेन महाबली ॥

ततः स क्रुद्धो भगवान्देवानामभयंकरः ।

शार्ङ्गच्युतैः शरव्यूहैर्जघानासुरनायकम् ॥

सोऽपि दैत्यो महावीरस्तारकः परवीरहा ।

चिच्छेद सकलान्बाणान्स्वशरैर्निशितैर्द्रुतम् ॥

अथ शक्त्या जघानाशु मुरारिं तारकासुरः ।

भूमौ पपात स हरिस्तत्प्रहारेण मूच्छितः ॥

जग्राह स रुषा चक्रमुत्थितः क्षणतोऽच्युतः ।

सिंहनादं महत्कृत्वा ज्वलज्ज्वालासमाकुलम् ॥

तेन तं च जघानासौ दैत्यानामधिपं हरिः ।

तत्प्रहारेण महता व्यथितो न्यपतद्भुवि ॥

पुनश्चोत्थाय दैत्येन्द्रस्तारकोऽसुरनायकः ।

चिच्छेद त्वरितं चक्रं स्वशक्त्यातिबलान्वितः ॥

पुनस्तया महाशक्त्या जघानामरवल्लभम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । अनेक अस्त्रोंको चलाने तथा युद्धमें ॥ ३ ९ तारकासुर शीघ्र ही देवताओंको पीड़ित करके कुशल वह ऊपर बाणवृष्टि करने लगा ॥ ३ ९ ॥ उनके । इस प्रकार असुरोंका पालन करनेवाला एवं ॥ ४० बलवानोंमें श्रेष्ठ वह तारक ऐसा [ युद्धरूप ] कर्म करके देवताओंसे अजेय हो गया । इस महान् प्रकार । [ असुरोंके द्वारा ] मारे जाते हुए तथा भयभीत उन ॥ ४१ देवताओंको देखकर विष्णु क्रोध करके युद्धके लिये शीघ्र उद्यत हो गये ॥ ४०-४१ ॥ । भगवान् विष्णु सुदर्शनचक्र, शार्ङ्गधनुष तथा ॥ ४२ अन्य अस्त्र धारणकर रणहेतु महादैत्य तारकके सम्मुख पहुँच गये ॥ ४२ ॥

तदनन्तर हे मुने! सबके देखते - देखते तारकासुर ॥ ४३ तथा विष्णुका रोमांचकारी, अति भयंकर तथा घोर युद्ध होने लगा । विष्णुने बड़े वेगके साथ गदा उठाकर असुर तारकपर प्रहार किया । महाबली तारकने भी ४४ त्रिशिखसे उस गदाके दो टुकड़े कर दिये ॥ ४३-४४ ॥ तब देवताओंको अभय देनेवाले भगवान् विष्णु ४५ अत्यन्त क्रोधित हो गये और उन्होंने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े गये बाणोंसे उस असुरनायकपर प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया । शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले उस ४६ महावीर तारकासुरने भी अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उनके समस्त बाणोंको शीघ्रतासे काट दिया । इसके बाद तारकासुरने अपनी शक्तिसे विष्णुपर शीघ्रतापूर्वक ४७ प्रहार किया । उसके प्रहारसे मूर्च्छित होकर वे विष्णु पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४५–४७ ॥ तब क्षणभरके बाद चेतना प्राप्तकर वे उठ गये ४८ और उन्होंने महान् सिंहनाद करके क्रोधके साथ | जलती हुई अग्निके समान तेजस्वी चक्रको धारण किया ॥ ४८ ॥

विष्णुने उस चक्रसे दैत्यराजपर प्रहार किया ४ ९ और उस तीव्र प्रहारसे आहत होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४ ९ ॥ बलशाली उस असुरनायक दैत्यराज तारकने ५० पुनः उठकर बड़ी तेजीके साथ अपनी शक्तिसे | सुदर्शनचक्रको काट दिया और उसी महाशक्तिसे । देवताओंके प्रिय अच्युतपर प्रहार किया । तब महावीर