शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 791–800
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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अ ० ११ ] रुद्रसंहिता (
सबलं भस्मसात्कृत्वासुरं तं क्षणमात्रतः ।
गृहोपकंठं शक्तिः सा जगाम परमा मुने ॥ १०
ततः कुमारः प्रोवाच क्रौंचं गिरिवरं प्रभुः ।
निर्भयः स्वगृहं गच्छ नष्टः स सबलोऽसुरः ॥ ११
तच्छ्रुत्वा स्वामिवचनं मुदितो गिरिराट् तदा ।
स्तुत्वा गुहं तदारातिं स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ १२
ततः स्कन्दो महेशस्य मुदा स्थापितवान्मुने ।
त्रीणि लिंगानि तत्रैव पापघ्नानि विधानतः ॥ १३
प्रतिज्ञेश्वरनामादौ कपालेश्वरमादरात् । कुमारेश्वरमेवाथ सर्वसिद्धिप्रदं सर्वसिद्धिप्रदं त्रयम् ॥१४
पुनः सर्वेश्वरस्तत्र जयस्तंभसमीपतः ।
स्तंभेश्वराभिधं लिंगं गुहः स्थापितवान्मुदा ॥ १५
ततः सर्वे सुरास्तत्र विष्णुप्रभृतयो मुदा ।
लिंगं स्थापितवन्तस्ते देवदेवस्य शूलिनः ॥ १६
सर्वेषां शिवलिङ्गानां महिमाभूत्तदाद्भुतः ।
सर्वकामप्रदश्चापि मुक्तिदो भक्तिकारिणाम् ॥ १७
ततः सर्वे सुरा विष्णुप्रमुखाः प्रीतमानसाः ।
ऐच्छन्गिरिवरं गन्तुं पुरस्कृत्य गुहं मुदा ॥ १८
तस्मिन्नवसरे शेषपुत्रः कुमुदनामकः ।
आजगाम कुमारस्य शरणं दैत्यपीडितः ॥ १ ९
प्रलंबाख्योऽसुरो यो हि रणादस्मात्पलायितः ।
स तत्रोपद्रवं चक्रे प्रबलस्तारकानुगः ॥ २०
सोऽथ शेषस्य तनयः कुमुदोऽहिपतेर्महान् ।
कुमारशरणं प्राप्तस्तुष्टाव गिरिजात्मजम् ॥ २१
देवदेव कुमुद उवाच महादेव वरतात महाप्रभो । पीडितोऽहं प्रलंबेन त्वाऽहं शरणमागतः ॥ २२ कुमारखण्ड ) ७८१ हे मुने! क्षणमात्रमें ही सेनासहित उस असुरको जलाकर वह परम शक्ति पुनः कुमारके पास लौट आयी । उसके बाद प्रभु कार्तिकेयने उस क्रौंच नामक पर्वतश्रेष्ठसे कहा - अब तुम निडर होकर अपने घर जाओ, सेनासहित उस असुरका अब नाश हो गया ॥ १०-११ ॥ तब स्वामी कार्तिकेयका वह वचन सुनकर पर्वतराज प्रसन्न हो गया और कुमारकी स्तुतिकर अपने स्थानको चला गया । हे मुने! उसके बाद कार्तिकेयने प्रसन्न होकर उस स्थानपर महेश्वरके पापनाशक तीन लिंग विधिपूर्वक आदरके साथ स्थापित किये, उन तीनों लिंगोंमें प्रथमका नाम प्रतिज्ञेश्वर, दूसरेका नाम कपालेश्वर और तीसरेका नाम कुमारेश्वर है – ये तीनों सभी सिद्धियाँ देनेवाले हैं । इसके बाद उन सर्वेश्वरने वहींपर जय - स्तम्भके सन्निकट स्तम्भेश्वर नामक लिंगको प्रसन्नतापूर्वक स्थापित किया॥१२–१५ ॥ इसके बाद वहींपर विष्णु आदि सभी देवगणोंने भी प्रसन्नतापूर्वक देवाधिदेव शिवके लिंगकी स्थापना की ॥१६ ॥
[ वहाँपर स्थापित ] उन सभी लिंगोंकी बड़ी विचित्र महिमा है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली तथा भक्ति करनेवालोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है ॥ १७ ॥
तब प्रसन्नचित्तवाले विष्णु आदि समस्त देवगण कार्तिकेयको आगेकर कैलास पर्वतपर जानेका विचार करने लगे । उसी समय शेषका कुमुद नामक पुत्र दैत्योंसे पीड़ित होकर कुमारकी शरणमें आया ॥ १८-१९ ॥ प्रलम्ब नामक प्रबल असुर, जो इसी युद्धसे भाग गया था, वह तारकासुरका अनुगामी वहाँ उपद्रव करने लगा । नागराज शेषका वह कुमुद नामक पुत्र अत्यन्त महान् था, जो कुमारकी शरणमें प्राप्त होकर उन गिरिजापतिपुत्रकी स्तुति करने लगा॥२०-२१ ॥ कुमुद बोला- हे देवदेव! हे महादेवके श्रेष्ठ पुत्र! हे तात! हे महाप्रभो! मैं प्रलम्बासुरसे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आया हूँ । हे कुमार!
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७८२ पाहि मां शरणापन्नं प्रलंबासुरपीडितम् कुमार स्कन्द देवेश तारकारे महाप्रभो
त्वं दीनबंधुः करुणासिन्धुरानतवत्सलः ।
खलनिग्रहकर्ता हि शरण्यश्च सतां गतिः ॥
कुमुदेन स्तुतश्चेत्थं विज्ञप्तस्तद्वधाय हि ।
स्वाञ्च शक्तिं स जग्राह स्मृत्वा शिवपदांबुजौ ॥
चिक्षेप तां समुद्दिश्य प्रलंबं गिरिजासुतः ।
महाशब्दो बभूवाथ जज्वलुश्च दिशो नभः ॥
तं सायुतबलं शक्तिर्द्रुतं कृत्वा च भस्मसात् ।
गुहोपकंठं सहसाजगामाक्लिष्टकारिणी ॥
ततः कुमारः प्रोवाच कुमुदं नागबालकम् ।
निर्भयः स्वगृहं गच्छ नष्टः स सबलोऽसुरः ॥
तच्छ्रुत्वा गुहवाक्यं स कुमुदोऽहिपतेः सुतः ।
स्तुत्वा कुमारं नत्वा च पातालं मुदितो ययौ ॥
एवं कुमारविजयं वर्णितं ते मुनीश्वर ।
चरितं तारकवधं परमाश्चर्यकारकम् ॥
सर्वपापहरं दिव्यं सर्वकामप्रदं नृणाम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम् ॥
ये कीर्तयन्ति सुयशोऽमितभाग्ययुता नराः ।
कुमारचरितं दिव्यं शिवलोकं प्रयांति ते ॥
श्रोष्यंति ये च तत्कीर्तिं भक्त्या श्रद्धान्विता जनाः ।
मुक्तिं प्राप्स्यन्ति ते दिव्यामिह भुक्त्वा परं सुखम् ॥
इति श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ । । हे स्कन्द! हे देवेश! हे तारकशत्रो! हे महाप्रभो ॥ २३ । आप प्रलम्बासुरसे पीड़ित हुए मुझ शरणागतकी! । कीजिये । आप दीनबन्धु, करुणासागर, भक्तवत्सल रक्षा दुष्टोंको दण्डित करनेवाले, शरणदाता तथा सज्जनोंकी, २४ गति हैं ॥ २२ – २४ ॥ जब कुमुदने इस प्रकार स्तुति की तथा २५ दैत्यके वधके लिये निवेदन किया, तब उन्होंने शंकरके चरणकमलोंका ध्यानकर अपनी शक्ति हाथमें ली ॥ २५ ॥
गिरिजापुत्रने प्रलम्बको लक्ष्य करके शक्ति छोड़ी । २६ उस समय महान् शब्द हुआ और सभी दिशाएँ तथा आकाश जलने लगे । अद्भुत कर्म करनेवाली वह शक्ति दस हजार सेनाओं सहित उस प्रलम्बको शीघ्र २७ जलाकर कार्तिकेयके पास सहसा आ गयी । तदनन्तर कुमारने शेषपुत्र कुमुदसे कहा- वह असुर अपने अनुचरोंके सहित मार डाला गया, अब तुम निडर २८ होकर अपने घर जाओ ॥ २६–२८ ॥ तब नागराजका पुत्र कुमुद कुमारका वह वचन २ ९ सुनकर उनकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करके प्रसन्न होकर पाताललोकको चला गया ॥ २ ९ ॥ हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने आपसे कुमारकी ३० विजय, उनके चरित्र तथा परमाश्चर्यकारक तारकवधका वर्णन कर दिया । यह [ आख्यान ] सम्पूर्ण पापोंको दूर करनेवाला दिव्य तथा मनुष्योंकी समस्त कामनाको ३१ पूर्ण करनेवाला, धन्य, यशस्वी बनानेवाला, आयुको बढ़ानेवाला और सज्जनोंको भोग तथा मुक्ति प्रदान । करनेवाला है । जो मनुष्य कुमारके इस दिव्य चरित्रका | कीर्तन करते हैं, वे महान् यशवाले तथा महाभाग्यसे ३२ युक्त होते हैं और [ अन्तमें ] शिवलोकको जाते हैं । | जो मनुष्य श्रद्धा और भक्तिके साथ उनकी इस कीर्तिको सुनेंगे, वे इस लोकमें परम सुख भोगकर ३३ अन्तमें दिव्य मुक्ति प्राप्त करेंगे ॥ ३०-३३ ॥ श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे विजयवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः बाणप्रलंबवधकुमार-॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके ॥ ११ ॥
कुमारविजयवर्णन नामक चतुर्थ कुमारखण्डमें बाणप्रलम्बवध तथा ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७८३ अथ द्वादशोऽध्यायः विष्णु आदि देवताओं तथा पर्वतोंद्वारा कार्तिकेयकी स्तुति और वरप्राप्ति, देवताओंके साथ कुमारका कैलासगमन, कुमारको देखकर शिव - पार्वतीका आनन्दित होना, देवोंद्वारा शिवस्तुति ब्रह्मोवाच
निहतं तारकं दृष्ट्वा देवा विष्णुपुरोगमाः ।
तुष्टुवुः शांकरिं भक्त्या सर्वेऽन्ये मुदिताननाः ॥
देवा ऊचुः
नमः कल्याणरूपाय नमस्ते विश्वमंगल ।
विश्वबंधो नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन ॥
नमोऽस्तु दानववर्यहन्त्रे बाणासुरप्राणहराय देव । प्रलंबनाशाय पवित्ररूपिणे नमो नमः शंकरतात तुभ्यम् ॥ त्वमेव कर्त्ता जगतां च भर्त्ता त्वमेव हर्त्ता शुचिज प्रसीद । प्रपञ्चभूतस्तव लोकबिंब: प्रसीद शम्भ्वात्मज दीनबंधो ॥
देवरक्षाकर स्वामिन् रक्ष नः सर्वदा प्रभो ।
देवप्राणावनकर प्रसीद करुणाकर ॥
हत्वा त्वं तारकं दैत्यं परिवारयुतं विभो ।
मोचिताः सकला देवा विपद्भ्यः परमेश्वर ॥
ब्रह्मोवाच
एवं स्तुतः कुमारोऽसौ देवैर्विष्णुमुखैः प्रभुः ।
वरान्ददावभिनवान्सर्वेभ्यः क्रमशो मुने ॥
शैलान्निरीक्ष्य स्तुवतः ततः स गिरिशात्मजः ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा प्रोवाच प्रददद् वरान् ॥
स्कन्द उवाच
यूयं सर्वे पर्वता हि पूजनीयास्तपस्विभिः ।
कर्मभिर्ज्ञानिभिश्चैव सेव्यमाना भविष्यथ ॥
शंभोर्विशिष्टरूपाणि लिंगरूपाणि चैव हि ।
भविष्यथ न संदेहः पर्वता वचनान्मम ॥
योऽयं मातामहो मेऽद्य हिमवान्पर्वतोत्तमः ।
तपस्विनां महाभागः फलदो हि भविष्यति ॥
ब्रह्माजी बोले- तारकको मृत देखकर विष्णु आदि देवता तथा अन्य सभी लोग प्रसन्नमुख होकर १ भक्तिपूर्वक कुमारकी स्तुति करने लगे ॥१ ॥
देवता बोले- कल्याणरूप आपको नमस्कार है । हे विश्वमंगल! आपको नमस्कार है । हे विश्वबन्धो! २ हे विश्वभावन! आपको नमस्कार है ॥२ 11 बड़े - बड़े दैत्योंका वध करनेवाले, बाणासुरके प्राणका हरण करनेवाले तथा प्रलम्बासुरका वध करनेवाले हे देव! आपको नमस्कार है । हे शंकरपुत्र! ३ आप पवित्ररूपको बार - बार नमस्कार है । हे अग्निदेवके पुत्र! आप ही इस जगत्के कर्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं । आप [ हमलोगोंपर ] प्रसन्न हों । यह लोकबिम्ब आपका ही प्रपंच है, हे शम्भुपुत्र! हे दीनबन्धो! आप ४ प्रसन्न होइये॥३-४ ॥ हे देवरक्षक! हे स्वामिन्! हे प्रभो! हमलोगोंकी ५ सर्वदा रक्षा कीजिये । हे देवताओंके प्राणकी रक्षा करनेवाले! हे करुणाकर! प्रसन्न होइये ॥ ५ ॥
हे विभो! हे परमेश्वर! आपने परिवारयुक्त ६ तारकासुरका वधकर सभी देवताओंको विपदाओंसे मुक्त कर दिया ॥६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार विष्णु आदि देवताओंने उन कुमारकी स्तुति की, तब उन्होंने सभी ७ देवताओंको क्रमशः नवीन - नवीन वर दिये । इसके बाद उन शिवपुत्रने स्तुति करते हुए पर्वतोंको देखकर अत्यन्त ८ प्रसन्न होकर उन्हें वर देते हुए कहा- ॥ ७-८ ॥ स्कन्द बोले- तुम सभी पर्वत तपस्वियों, कर्मकाण्ड करनेवालों तथा ज्ञानियोंसे सदा पूजित ९ तथा सेवित रहोगे । हे पर्वतो! मेरे वचनसे तुमलोग शिवके विशिष्टरूप तथा उनके लिंगरूपसे प्रतिष्ठित रहोगे इसमें सन्देह नहीं है । ये पर्वतोत्तम महाभाग, १० जो मेरे , नाना हिमालय हैं, वे तपस्वियोंको फल ११ । देनेवाले होंगे ॥ ९ -११ ॥
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७८४ देवा ऊचुः एवं दत्त्वा वरान् हत्वा तारकं चासुराधिपम् त्वया कृताश्च सुखिनो वयं सर्वे चराचराः इदानीं खलु सुप्रीत्या कैलासं गिरिशालयम् । जननीजनको द्रष्टुं शिवाशंभू त्वमर्हसि ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा निखिला देवा विष्ण्वाद्याः प्राप्तशासनाः ।
कृत्वा महोत्सवं भूरि सकुमारा ययुर्गिरिम् ॥
कुमारे गच्छति विभो कैलासं शंकरालयम् महामंगलमुत्तस्थौ जयशब्दो बभूव ह
आरुरोह कुमारोऽसौ विमानं परमर्द्धिमत् ।
सर्वतोलंकृतं रम्यं सर्वोपरि विराजितम् ॥
अहं विष्णुश्च समुदौ तदा चामरधारिणौ ।
गुहमूर्ध्नि महाप्रीत्या मुनेऽभूवं ह्यतन्द्रितौ ॥
इन्द्राद्या अमराः सर्वे कुर्वन्तो गुहसेवनम् ।
यथोचितं चतुर्दिक्षु जग्मुश्च प्रमुदास्तदा ॥
शंभोर्जयं प्रभाषन्तः प्रापुस्ते शंभुपर्वतम् । सानंदा विविशुस्तत्रोच्चरितो मंगलध्वनिः
दृष्ट्वा शिवं शिवां चैव सर्वे विष्ण्वादयो द्रुतम् ।
प्रणम्य शंकरं भक्त्या करौ बद्ध्वा विनम्रकाः ॥
कुमारोऽपि विनीतात्मा विमानादवतीर्य च ।
प्रणनाम मुदा शंभुं शिवां सिंहासनस्थिताम् ॥
अथ दृष्ट्वा कुमारं तं तनयं प्राणवल्लभम् ।
तौ दंपती शिवौ देवौ मुमुदातेऽति नारद ॥
महाप्रभुः समुत्थाप्य तमुत्संगे न्यवेशयत् ।
मूर्ध्नि जघ्रौ मुदा स्नेहात्तं पस्पर्श करेण ह ॥
महानंदभरः शंभुश्चकार मुखचुंबनम् ।
कुमारस्य महास्नेहात् तारकारेर्महाप्रभोः ॥
शिवापि तं समुत्थाप्य स्वोत्संगे संन्यवेशयत् ।
कृित्वा मूर्ध्नि महास्नेहात् तन्मुखाब्जं चुचुम्ब ह ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ देवता बोले- इस प्रकार आपने असुराधिपति । तारकका वधकर तथा वर देकर चराचरसहित हम सभीको ॥ १२ सुखी किया है । अब आप अपने माता - पिता पार्वती | तथा शिवका दर्शन करनेके लिये प्रेमपूर्वक शिवजी ॥ १३ घर कैलासके लिये प्रस्थान कीजिये ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर विष्णु आदि सभी देवता कार्तिकेयकी आज्ञासे बहुत बड़ा महोत्सवकर १४ कुमारको लेकर कैलासकी ओर चले ॥१४ ॥
। सर्वव्यापक कार्तिकेयके कैलासकी ओर प्रस्थान ॥ १५ करनेपर महामंगल दिखायी पड़ने लगा और जय-जयकारका शब्द होने लगा ॥ १५ ॥
वे कुमार सम्पूर्ण ऋद्धियोंसे युक्त, सभी ओरसे १६ अलंकृत, मनोहर तथा सर्वोपरि विराजमान विमानपर चढ़े ॥ १६ ॥
हे मुने! अति प्रसन्न मैं और विष्णु बड़ी १७ सावधानीसे प्रेमपूर्वक उनके ऊपर चामर डुलाने लगे और इन्द्रादि सभी देवता चारों ओरसे प्रीतिपूर्वक कुमारकी १८ यथायोग्य सेवा करते हुए चलने लगे ॥ १७-१८ ॥ इस प्रकार वे सभी शिवजीके लिये जय - जयकार ॥ १ ९ शब्दका उच्चारण करते हुए मंगलध्वनिपूर्वक बड़े आनन्दके साथ कैलासपर्वतपर पहुँचे ॥१ ९ ॥ विष्णु आदि सभी लोग वहाँ शिवा - शिवका २० दर्शनकर शीघ्रतासे उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर हाथ जोड़कर उनके सम्मुख सिर झुकाये हुए खड़े हो | गये ॥२० ॥
विनीतात्मा कुमारने भी विमानसे उतरकर २१ सिंहासनपर विराजमान पार्वतीजीको तथा शिवजीको प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया । हे नारद! तब अपने | प्राणप्रिय उस पुत्र कुमारको देखकर वे दोनों दम्पती २२ शिव - पार्वती बहुत ही प्रसन्न हुए ॥ २१-२२ ॥ महाप्रभुने उन्हें उठाकर गोदमें बैठाया, उनका २३ प्रसन्नता पूर्वक सिर सूँघा और स्नेहपूर्वक हाथ । उनका स्पर्श किया । शिवजीने अत्यधिक आनन्दविभोर २४ | हो तारकासुरके शत्रु उन महाप्रभु कुमारका मुख चूमा ॥ २३-२४ ॥ इसी प्रकार पार्वतीने भी उनको उठाकर गोदमें ले २५ लिया और उनका माथा सूचकर मुखमण्डल चूमा ॥ २५ ॥
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अ ० १२ ] रुद्रसंहिता (
तयोस्तदा महामोदो ववृधेऽतीव नारद ।
दंपत्योः शिवयोस्तात भवाचारं प्रकुर्वतोः ॥ २६
तदोत्सवो महानासीन्नानाश्चर्य: शिवालये ।
जयशब्दो नमश्शब्दो बभूवातीव सर्वतः ॥ २७
ततः सुरगणाः सर्वे विष्ण्वाद्या मुनयस्तथा ।
सुप्रणम्य मुदा शंभुं तुष्टुवुः सशिवं मुने ॥ २८
देवा ऊचुः
देवदेव महादेव भक्तानामभयप्रद ।
नमो नमस्ते बहुशः कृपाकर महेश्वर ॥ २ ९
अद्भुता ते महादेव महालीला सुखप्रदा ।
सर्वेषां शंकर सतां दीनबंधो महाप्रभो ॥ ३०
वयं मूढधियश्चाज्ञाः पूजायां ते सनातनम् ।
आवाहनं न जानीमो गतिं नैव प्रभोद्भुताम् ॥ ३१
गंगासलिलधाराय ह्याधाराय गुणात्मने ।
नमस्ते त्रिदशेशाय शंकराय नमो नमः ॥३२
वृषांकाय महेशाय गणानां पतये नमः ।
सर्वेश्वराय देवाय त्रिलोकपतये नमः ॥३३
संहर्त्रे जगतां नाथ सर्वेषां ते नमो नमः ।
भर्त्रे कर्त्रे च देवेश त्रिगुणेशाय शाश्वते ॥ ३४
विसंगाय परेशाय शिवाय परमात्मने ।
निष्प्रपंचाय शुद्धाय परमायाव्ययाय च ॥ ३५
दण्डहस्ताय कालाय पाशहस्ताय ते नमः ।
वेदमंत्रप्रधानाय शतजिह्वाय ते नमः ॥ ३६
भूतं भव्यं भविष्यं च स्थावरं जंगमं च यत् ।
तव देहात्समुत्पन्नं सर्वथा परमेश्वर ॥ ३७
पाहि नः सर्वदा स्वामिन्प्रसीद भगवन्प्रभो ।
वयं ते शरणापन्नाः सर्वथा परमेश्वर ॥ ३८
कुमारखण्ड ) ७८५ हे तात नारद! इस समय लौकिक आचार करते हुए उन पति - पत्नी शिव - पार्वतीको महान् आनन्द हुआ ॥ २६ ॥
उस समय शिवजीके घरमें अनेक प्रकारके महान् उत्सव होने लगे और चारों ओर जय - जयकार एवं नमः शब्द होने लगा । उसके बाद हे मुने! वे विष्णु आदि सभी देवता एवं मुनिगण प्रसन्नता-पूर्वक शिवजीको प्रणामकर उनकी स्तुति करने लगे ॥ २७-२८ ॥ देवता बोले- हे देवदेव! हे महादेव! हे भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है, हे महेश्वर! आप हमलोगोंपर कृपा कीजिये । हे महादेव! हे शंकर! हे दीनबन्धो! हे महाप्रभो! आपकी लीला अद्भुत है तथा सभी सज्जनोंको सुख देनेवाली है ॥२ ९ -३० ॥ हे प्रभो! हम मूर्खबुद्धि तथा अज्ञानी लोग पूजनमें आपके सनातन आवाहनको तथा आपकी अद्भुत गतिको नहीं जानते हैं । गंगाजलको धारण करनेवाले, सबके आधार, गुणस्वरूप, आप देवेश्वरको नमस्कार है । आप शंकरको बारंबार नमस्कार है । आप वृषभध्वज, महेश्वर, गणाधिपतिको नमस्कार है । आप सर्वेश्वर एवं त्रिलोकपति देवको नमस्कार है । हे नाथ! हे देवेश! सभी लोकोंका संहार करनेवाले, सृष्टिकर्ता, पोषण करनेवाले, त्रिगुणेश तथा शाश्वत आपको नमस्कार है ॥ ३१-३४ ॥ निःसंग, परमेश्वर, शिव, परमात्मा, निष्प्रपंच, शुद्ध, परम, अव्यय, हाथमें दण्ड धारण करनेवाले, कालस्वरूप, हाथमें पाश धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । वेदमन्त्रोंमें प्रधान तथा सैकड़ों जीभवाले आपको नमस्कार है ॥ ३५-३६ ॥ हे परमेश्वर! भूत, भविष्य, वर्तमान- तीनों काल तथा स्थावर - जंगमात्मक जो भी है, वह सर्वथा आपके विग्रहसे उत्पन्न हुआ है । हे स्वामिन्! हे भगवन्! हे प्रभो! हमलोगोंपर प्रसन्न होइये और सर्वदा हमलोगोंकी रक्षा कीजिये । हे परमेश्वर! हमलोग सभी प्रकारसे आपके शरणागत हैं ॥ ३७-३८ ॥
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७८६ शितिकण्ठाय रुद्राय स्वाहाकाराय ते नमः अरूपाय सरूपाय विश्वरूपाय ते नमः शिवाय नीलकंठाय चिताभस्मांगधारिणे नित्यं नीलशिखंडाय श्रीकण्ठाय नमो नमः सर्वप्रणतदेहाय संयमप्रणताय च महादेवाय शर्वाय सर्वार्चितपदाय च त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः आत्मा च सर्वभूतानां सांख्यैः पुरुष उच्यसे पर्वतानां सुमेरुस्त्वं नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा ॐकारस्सर्ववेदानां त्राता भव महेश्वर त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि महेश्वर महाभाग शुभाशुभनिरीक्षक । आप्यायास्मान्हि देवेश कर्तृन्वै वचनं तव रूपकोटिसहस्त्रेषु रूपकोटिशतेषु ते अन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते ॥ ब्रह्मोवाच इति स्तुत्वाऽखिला देवा विष्ण्वाद्याः प्रमुखस्थिताः मुहुर्मुहुस्सुप्रणम्य स्कन्दं कृत्वा पुरस्सरम् ॥ देवस्तुतिं समाकर्ण्य शिवः सर्वेश्वरः स्वराट् । सुप्रसन्नो बभूवाथ विजहास दयापरः
उवाच सुप्रसन्नात्मा विष्ण्वादीन्सुरसत्तमान् ।
शंकरः परमेशानो दीनबंधुः सतां गतिः ॥
शिव उवाच
हे हरे हे विधे देवा वाक्यं मे शृणुतादरात् ।
सर्वथाऽहं सतां त्राता देवानां वः कृपानिधिः ॥
दुष्टहन्ता त्रिलोकेशः शंकरो भक्तवत्सलः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १२ । शितिकण्ठ, रुद्र एवं स्वाहाकाररूपवाले आपको ॥ ३ ९ । नमस्कार है । निराकार, साकार एवं विश्वरूपवाले । आपको नमस्कार है । शिव, नीलकण्ठ, अंगमें । । चिताकी भस्म धारण करनेवाले, नीलशिखण्ड सदा एवं ॥ ४० श्रीकण्ठ आपको बार - बार नमस्कार है ॥ ३ ९ -४० ॥ । सबके द्वारा प्रणम्य देहवाले, संयम धारण करनेवालों-॥ ४१ | पर कृपा करनेवाले, महादेव, सबके संहारकारक तथा सभीके द्वारा पूजित चरणवाले आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥
। आप सभी देवगणोंमें ब्रह्मा हैं, रुद्रोंमें ॥ ४२ नीललोहित हैं तथा सभी जीवधारियोंमें आत्मा हैं । सांख्यमतावलम्बी आपको पुरुष कहते हैं । आप । पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, ऋषियोंमें वसिष्ठ ॥ ४३ तथा देवोंमें इन्द्र हैं ॥ ४२-४३ ॥ । आप सभी वेदोंमें ॐकारस्वरूप हैं । हे महेश्वर! ॥ ४४ हमलोगोंकी रक्षा कीजिये । आप लोकहितके लिये प्राणियोंका पालन करते हैं । हे महेश्वर! हे महाभाग! हे शुभाशुभको देखनेवाले! हे देवेश! आपकी आज्ञा पालन ॥ ४५ करनेवाले हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ४४-४५ ॥ । हमलोग आपके सहस्रकोटि तथा शतकोटि-४६ | स्वरूपका अन्त पानेमें समर्थ नहीं हैं । हे देवदेव! आपको नमस्कार है ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार विष्णु आदि समस्त । देवता स्तुति करके बारंबार शिवजीको प्रणामकर ४७ उनके सम्मुख खड़े हो गये ॥ ४७ ॥
देवगणोंकी स्तुति सुनकर सर्वेश्वर स्वराट् दयालु ॥ ४८ शिव प्रसन्न हो गये और हँसने लगे ॥४८ ॥
इसके बाद प्रसन्न होकर वे दीनबन्धु, परमेश्वर, ४ ९ सत्पुरुषोंको गति देनेवाले भगवान् शंकर विष्णु आदि देवताओंसे कहने लगे— ॥ ४ ९ ॥ शिवजी बोले- हे हरे! हे विधे! हे देवगणो! आपलोग आदरपूर्वक मेरा वचन सुनें, मैं सब प्रकारसे ५० सज्जनोंका रक्षक, आप देवगणोंके लिये दयानिधि, | दुष्टोंका संहार करनेवाला त्रिलोकेश, सबका कल्याण कर्ता भर्ता च हर्ता च सर्वेषां निर्विकारवान् ॥ ५१ | करनेवाला, भक्तवत्सल, सबका कर्ता - भर्ता - हर्ता एवं यदा यदा भवेदुःखं युष्माकं देवसत्तमाः । विकाररहित हूँ । देवसत्तमो ,! जब - जब आपलोगोंपर तदा तदा मां यूयं वै भजन्तु सुखहेतवे | विपत्ति आये, तब - तब सुखप्राप्तिके लिये आपलोग ॥ ५२ | मेरा भजन किया करें ॥ ५०–५२ ॥
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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७८७ ब्रह्मोवाच देवा विष्ण्वाद्याः समुनीश्वराः । इत्याज्ञप्तास्तदा शिवां प्रणम्य सशिवं कुमारं च मुदान्विताः ॥ ५३
कथयंतो यशो रम्यं शिवयोः शांकरेश्च तत् ।
आनन्दं परमं प्राप्य स्वधामानि ययुर्मुने ॥ ५४
शिवोऽपि शिवया सार्द्धं सगणः परमेश्वरः ।
कुमारेण युतः प्रीत्योवास तस्मिन् गिरौ मुदा ॥ ५५
इत्येवं कथितं सर्वं कौमारं चरितं मुने ।
शैवं च सुखदं दिव्यं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ५६
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां ब्रह्माजी बोले- हे मुने! उसके बाद मुनीश्वरोंसहित विष्णु आदि देवता शिवजीकी आज्ञा लेकर पार्वती, परमेश्वर एवं कुमारको प्रणामकर प्रसन्न होकर पार्वती - शिव एवं कुमारके रम्य यशका वर्णन करते हुए परम आनन्द प्राप्तकर अपने - अपने स्थानको चले गये॥५३-५४ ॥ हे मुने! शिवजी भी अपने गणों, कुमार कार्तिकेय एवं पार्वतीके साथ प्रीतिपूर्वक आनन्दित होकर उस पर्वतपर निवास करने लगे । हे मुने! इस प्रकार मैंने कुमार कार्तिकेयका तथा शिवजीका सम्पूर्ण चरित, जो सुख प्रदान करनेवाला तथा दिव्य है, आपलोगोंसे कह दिया, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५५-५६ ॥ रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे स्वामिकार्तिकचरितगर्भितशिवाशिवचरितवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें स्वामिकार्तिकचरित-गर्भितशिवाशिवचरितवर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः गणेशोत्पत्तिका आख्यान, पार्वतीका अपने पुत्र गणेशको अपने द्वारपर नियुक्त करना, शिव सूत उवाच
तारकारेरिति श्रुत्वा वृत्तमद्भुतमुत्तमम् ।
नारदः सुप्रसन्नोऽथ पप्रच्छ प्रीतितो विधिम् ॥
नारद उवाच
देवदेव प्रजानाथ शिवज्ञाननिधे मया ।
श्रुतं कार्तिकसद्वृत्तममृतादपि चोत्तमम् ॥
अधुना श्रोतुमिच्छामि गाणेशं वृत्तमुत्तमम् ।
तज्जन्मचरितं दिव्यं सर्वमंगलमंगलम् ॥
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नारदस्य महामुनेः ।
प्रसन्नमानसो ब्रह्मा प्रत्युवाच शिवं स्मरन् ॥
ब्रह्मोवाच
कल्पभेदाद्गणेशस्य जनिः प्रोक्ता विधेः परात् ।
शनिदृष्टं शिरश्छिन्नं संचितं गाजमाननम् ॥
और गणेशका वार्तालाप सूतजी बोले - तारकके शत्रु कुमारके अद्भुत तथा उत्तम चरित्रको सुनकर प्रसन्न हुए नारदजीने १ ब्रह्माजीसे प्रीतिपूर्वक पूछा ॥१ ॥
नारदजी बोले – हे देवदेव! हे प्रजानाथ! हे शिवज्ञाननिधे! मैंने आपसे कार्तिकेयका अमृतसे भी उत्तम चरित्र सुना । अब मैं गणेशजीका उत्तम चरित्र २ सुनना चाहता हूँ । उनका जन्म एवं चरित्र [ अत्यन्त ] दिव्य तथा सभी मंगलोंका भी मंगल करनेवाला ३ है ॥ २-३ ॥ सूतजी बोले- उन महामुनि नारदका यह वचन सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्नचित्त हो गये और ४ शिवजीका स्मरण करते हुए कहने लगे- ॥४ ॥
ब्रह्माजी बोले- कल्पके भेदसे गणेशजीका जन्म ब्रह्माजीसे भी पहले कहा गया है । एक समय शनिकी दृष्टि पड़नेसे उनका सिर कट गया और ५ उसपर हाथीका सिर जोड़ दिया गया । अब मैं
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७८८ इदानीं श्वेतकल्पोक्ता गणेशोत्पत्तिरुच्यते यत्र च्छिन्नं शिरस्तस्य शिवेन च कृपालुना संदेहो नात्र कर्तव्यः शंकरस्सूतिकृन्मुने स हि सर्वाधिपः शंभुर्निर्गुणः सगुणोऽपि हि तल्लीलयाखिलं विश्वं सृज्यते पाल्यते तथा विनाश्यते मुनिश्रेष्ठ प्रस्तुतं शृणु चादरात् ॥ उद्वाहिते शिवे चात्र कैलासं च गते सति । कियता चैव कालेन जातो गणपतेर्भवः एकस्मिन्नेव काले च जया च विजया सखी पार्वत्या च मिलित्वा वै विचारे तत्पराभवत् रुद्रस्य च गणाः सर्वे शिवस्याज्ञापरायणाः ते सर्वेऽप्यस्मदीयाश्च नन्दिभृंगिपुरस्सराः
प्रमथास्ते ह्यसंख्याता अस्मदीयो न कश्चन ।
द्वारि तिष्ठन्ति ते सर्वे शंकराज्ञापरायणाः ॥
ते सर्वेऽप्यस्मदीयाश्च तथापि न मिलेन्मनः ।
एकश्चैवास्मदीयो हि रचनीयस्त्वयानघे ॥
ब्रह्मोवाच इत्युक्ता पार्वती देवी सखीभ्यां सुन्दरं वचः । हितं मेने तदा तच्च कर्तुं स्माप्यध्यवस्यति
ततः कदाचिन्मज्जत्यां पार्वत्यां वै सदाशिवः ।
नंदिनं परिभर्स्याथ ह्याजगाम गृहांतरम् ॥
आयान्तं शंकरं दृष्ट्वाऽसमये जगदंबिका ।
उत्तस्थौ मज्जती सा वै लज्जिता सुन्दरी तदा ॥
तस्मिन्नवसरे देवी कौतुकेनातिसंयुता ।
तदीयं तद्वचश्चैव हितं मेने सुखावहम् ॥
एवं जाते तदा काले कदाचित्पार्वती शिवा ।
विचिन्त्य मनसा चेति परमा या परेश्वरी ॥
मदीयः सेवकः कश्चिद्भवेच्छुभतरः कृती ।
मदाज्ञया परं नान्यद्रेखामात्रं चलेदिह ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । । श्वेतकल्पमें जिस प्रकार गणेशजीका जन्म हुआ ॥ ६ उसे कह रहा हूँ, जिसमें कृपालु शंकरजीके था, उनका शिरश्छेदन किया गया था ॥ ५-६ ॥ द्वारा । मुने! शंकरजी सृष्टिकर्ता हैं, इस विषयमें सन्देह ॥ ७ नहीं करना चाहिये । वे सबके स्वामी हैं, वे शिव सगुण । होते हुए भी निर्गुण हैं । हे मुनिश्रेष्ठ! उनकी लीलासे ही ८ इस विश्वका सृजन, पालन तथा संहार होता है । अब आदरपूर्वक प्रस्तुत चरित्र सुनिये ॥ ७-८ ॥ शिवजीके विवाहके उपरान्त कैलास चले जानेपर ॥ ९ कुछ समयके बाद गणेशजीका जन्म हुआ ॥ ९ ॥
। किसी समय पार्वतीकी सखियाँ जया तथा विजया ॥ १० पार्वतीके साथ मिलकर विचार करने लगीं ॥ १० ॥
। शिवजीकी आज्ञामें रहनेवाले नन्दी, भृंगी आदि ॥ ११ अनेक और असंख्य प्रमथगण हैं । यद्यपि वे हमारे भी गण हैं, फिर भी शंकरकी आज्ञाका पालन करनेवाले वे सभी द्वारपर स्थित रहते हैं, स्वतन्त्ररूपसे हमारा कोई १२ भी गण नहीं है । यद्यपि वे सब हमारे भी हैं, किंतु हमारा मन उनसे नहीं मिलता है, इसलिये हे अनघे! हमारा भी कोई स्वतन्त्र गण होना चाहिये, अतः आप १३ ऐसे एक गणकी रचना कीजिये ॥ ११–१३ ॥ ब्रह्माजी बोले – जब सखियोंने यह उत्तम वचन पार्वतीसे कहा, तब उन्होंने उसमें अपना हित ॥ १४ मान लिया और वे वैसा करनेका प्रयत्न करने लगीं ॥ १४ ॥
इसके बाद किसी समय जब पार्वतीजी स्नान १५ कर रही थीं, उसी समय [ द्वारपर बैठे ] नन्दीको डाँटकर शंकरजी भीतर चले आये ॥ १५ ॥
शिवजीको असमयमें आता हुआ देखकर स्नान १६ करती हुई वे सुन्दरी जगदम्बा लज्जित होकर उठ गयीं ॥ १६ ॥
उस समय अत्यन्त कौतुकसे युक्त पार्वतीको १७ सखियोंके द्वारा कहा गया वह वचन अत्यन्त । हितकारी तथा सुखदायक प्रतीत हुआ । इसके बाद | कुछ समय बीतनेपर परमाया परमेश्वरी पार्वतीने १८ मनमें विचार किया कि मेरा भी कोई ऐसा सेवक | होना चाहिये, जो श्रेष्ठ हो तथा योग्य हो और मेरी | आज्ञाके बिना रेखामात्र भी इधर से उधर विचलित १ ९ न हो ॥ १७–१९ ॥
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अ ० १३ ] रुद्रसंहिता (
विचार्येति च सा देवी वपुषो मलसंभवम् ।
पुरुषं निर्ममौ सा तु सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ २०
सर्वावयवनिर्दोषं सर्वावयवसुन्दरम् ।
विशालं सर्वशोभाढ्यं महाबलपराक्रमम् ॥ २१
वस्त्राणि च तदा तस्मै दत्त्वा सा विविधानि हि ।
नानालंकरणं चैव बह्वाशिषमनुत्तमाम् ॥ २२
मत्पुत्रस्त्वं मदीयोऽसि नान्य: कश्चिदिहास्ति मे ।
एवमुक्तः स पुरुषो नमस्कृत्य शिवां जगौ ॥ २३
गणेश उवाच
किं कार्यं विद्यते तेऽद्य करवाणि तवोदितम् ।
इत्युक्ता सा तदा तेन प्रत्युवाच सुतं शिवा ॥ २४
शिवोवाच
शृणु द्वाक्यं द्वारपालो भवाद्य मे ।
मत्पुत्रस्त्वं मदीयोऽसि नान्यथा कश्चिदस्ति मे ॥ २५
विना मदाज्ञां सत्पुत्र नैवायान्मद्गृहान्तरम् ।
कोऽपि क्वापि हठात्तात सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ २६
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा च ददौ तस्मै यष्टिं चातिदृढां मुने ।
तदीयं रूपमालोक्य सुन्दरं हर्षमागता ॥ २७
मुखमाचुंब्य सुप्रीत्यालिंग्य तं कृपया सुतम् ।
स्वद्वारि स्थापयामास यष्टिपाणिं गणाधिपम् ॥ २८
अथ देवीसुतस्तात गृहद्वारि स्थितो गणः ।
यष्टिपाणिर्महावीरः पार्वतीहितकाम्यया ॥ २ ९
स्वद्वारि स्थापयित्वा तं गणेशं स्वसुतं शिवा ।
स्वयं च मज्जती सा वै संस्थितासीत्सखीयुता ॥ ३०
एतस्मिन्नेव काले तु शिवो द्वारि समागतः । ३१ कौतुकी कुमारखण्ड ) ७८ ९ इस प्रकार विचारकर उन देवीने अपने शरीरके मैलसे सर्वलक्षणसम्पन्न, शरीरके सभी अवयवोंसे सर्वथा निर्दोष, समस्त सुन्दर अंगोंवाले, विशाल, | सर्वशोभा - सम्पन्न एवं महाबली तथा पराक्रमी पुरुषका निर्माण किया ॥ २०-२१ ॥ पार्वतीने उसे नाना प्रकारके वस्त्र, अनेक प्रकारके अलंकार तथा अनेक उत्तम आशीर्वाद देकर कहा- तुम मेरे पुत्र हो, तुम्हीं मेरे हो और यहाँ कोई दूसरा मेरा नहीं है । इस प्रकार कहे जानेपर उस पुरुषने पार्वतीको नमस्कारकर कहा— ॥ २२-२३ ॥ गणेशजी बोले- आपका क्या कार्य है? मैं आपके द्वारा आदिष्ट कार्यको पूरा करूँगा । तब उनके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पार्वतीने पुत्रसे कहा- ॥ २४ ॥
शिवा बोलीं- हे तात! मेरे वचनको सुनो । तुम आज मेरे द्वारपाल बनो, तुम मेरे पुत्र हो, केवल तुम्हीं मेरे हो, तुम्हारे अतिरिक्त यहाँ मेरा कोई नहीं है ॥ २५ ॥
हे सत्पुत्र! मेरी आज्ञाके बिना कोई भी मेरे घरके भीतर किसी प्रकार हठसे भी न जाने पाये । हे तात! यह मैंने तुमसे सत्य कह दिया ॥ २६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! पार्वतीने इस प्रकार कहकर एक अत्यन्त दृढ़ लाठी उसे दी और उस बालकके सुन्दर रूपको देखकर वे हर्षित हो गयीं ॥ २७ ॥
उन्होंने प्रेमसे उस पुत्रका मुख चूमकर उसका आलिंगन करके हाथमें लाठी लिये हुए उन गणेशको अपने द्वारपर नियुक्त कर दिया । हे तात! इस प्रकार वह महावीर देवीपुत्र गण पार्वती माताकी रक्षाके लिये हाथमें लाठी लिये हुए द्वारपर पहरा देने लगा ॥ २८-२९ ॥ एक समय अपने पुत्र उन गणेश्वरको द्वारपर नियुक्तकर वे पार्वती सखियोंके साथ स्नान करने लगीं । हे मुनिश्रेष्ठ! इसी समय परम कौतुकी तथा अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेमें प्रवीण वे शिवजी भी द्वारपर आ पहुँचे ॥ ३०-३१ ॥
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७ ९ ० उवाच च शिवेशं तमविज्ञाय गणाधिपः मातुराज्ञां विना देव गम्यतां न त्वयाधुना मज्जनार्थं स्थिता माता क्व यासीतो व्रजाधुना इत्युक्त्वा यष्टिकां तस्य रोधनाय तदाग्रहीत्
तं दृष्ट्वा तु शिवः प्राह कं निषेधसि मूढधीः ।
मां न जानास्यसद्बुद्धे शिवोऽहमिति नान्यथा ॥
ताडितस्तेन यष्ट्या हि गणेशेन महेश्वरः । प्रत्युवाच स तं पुत्रं बहुलीलश्च कोपितः शिव उवाच
मूर्खोऽसि त्वं न जानासि शिवोऽहं गिरिजापतिः ।
स्वगृहं यामि रे बाल निषेधसि कथं हि माम् ॥
ब्रह्मोवाच
इत्युक्त्वा प्रविशन्तं तं महेशं गणनायकः ।
क्रोधं कृत्वा ततो विप्र दंडेनाताडयत्पुनः ॥
ततश्शिवश्च संक्रुद्धो गणानाज्ञापयन्निजान् ।
को वाऽयं वर्तते किं च क्रियते पश्यतां गणाः ॥
इत्युक्त्वा तु शिवस्तत्र स्थितः क्रुद्धो गृहाद्बहिः ।
भवाचाररतः स्वामी बह्वद्भुतसुलीलकः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ । तब गणेशने उन शिवजीको बिना पहचाने ॥ ३२ । कहा — हे देव! इस समय माताकी आज्ञाके बिना आप भीतर नहीं जा सकते । माताजी स्नान कर । हैं, कहाँ चले जा रहे हैं? इस समय यहाँसे चले रही ॥ ३३ जाइये - इस प्रकार कहकर गणेशने उन्हें रोकनेक लिये अपनी लाठी उठा ली ॥ ३२-३३ ॥ उसे देखकर शिवजी बोले- हे मूर्ख! तुम किसे ३४ मना कर रहे हो, हे दुर्बुद्धे! तुम मुझे नहीं जानते, मैं शिव हूँ, कोई दूसरा नहीं । इसपर गणेशने लाठीसे शिवजीपर प्रहार किया, तब बहुत लीला करनेवाले ॥ ३५ शिवजीने कुपित होकर पुत्रसे कहा— ॥ ३४-३५ ॥ शिवजी बोले- हे बालक! तुम मूर्ख हो, तुम मुझे नहीं जानते हो । मैं पार्वतीका पति शिव हूँ, हे बालक! मैं तो अपने ही घर जा रहा हूँ, तुम मुझे मना ३६ क्यों करते हो? ॥३६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे विप्र! ऐसा कह घरमें प्रवेश करते हुए उन शंकरजीपर गणनायक गणेशने ३७ क्रोध करते हुए पुनः डण्डेसे प्रहार किया । तब अत्यन्त कुपित हुए शिवजीने अपने गणोंको आज्ञा ३८ दी – हे गणो! देखो, यह कौन है और यहाँ क्या कर रहा है? ॥३७-३८ ॥ ऐसा कहकर लोकाचारमें तत्पर रहनेवाले तथा अनेक अद्भुत लीलाएँ करनेवाले शिवजी महाक्रोधमें ३ ९ । भरकर घरके बाहर ही स्थित रहे ॥ ३ ९ । इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशोत्पत्तिवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशोत्पत्तिवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः द्वाररक्षक गणेश तथा शिवगणोंका परस्पर विवाद ब्रह्मोवाच
गणास्ते क्रोधसंपन्नास्तत्र गत्वा शिवाज्ञया ।
पप्रच्छुर्गिरिजापुत्रं तं तदा द्वारपालकम् ॥
शिवगणा ऊचुः
कोऽसि त्वं कुत आयातः किं वा त्वं च चिकीर्षसि ।
इतोऽद्य गच्छ दूरं वै यदि जीवितुमिच्छसि ॥
ब्रह्माजी बोले- तब उन गणोंने क्रुद्ध | हो शिवजीकी आज्ञासे वहाँ जाकर उन द्वारपाल १ गिरिजापुत्रसे पूछा ॥१ ॥
शिवगण बोले- तुम कौन हो, कहाँसे आये हो और यहाँ क्या करना चाहते हो? यदि जीना २ चाहते हो तो यहाँसे शीघ्र ही चले जाओ ॥२ ॥
दूर