श्रीगणेशाय नमः।
शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 781–790
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७७१ अच्युतोऽपि महावीरो नन्दकेन जघान तम् ॥ ५१ | विष्णुने भी नन्दक नामक खड्गसे उसपर प्रहार । किया । हे मुने! इस प्रकार अक्षीण बलवाले बलवान् एवमन्योऽन्यमसुरो विष्णुश्च बलवानुभौ विष्णु तथा तारकासुर दोनों ही रणमें एक - दूसरेसे घोर ५२ संग्राम करते रहे ॥ ५०-५२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे देवदैत्यसामान्ययुद्धवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
|| इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें देवों और दैत्योंका सामान्ययुद्धवर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः ब्रह्माजीका कार्तिकेयको तारकके वधके लिये प्रेरित करना, तारकासुरद्वारा विष्णु तथा इन्द्रकी भर्त्सना, ब्रह्मोवाच
देवदेव गुह स्वामिन् शांकरे पार्वतीसुत ।
न शोभते रणो विष्णुतारकासुरयोर्वृथा ॥
विष्णुना न हि वध्योऽसौ तारको बलवानति ।
मया दत्तवरस्तस्मात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
नान्यो हन्तास्य पापस्य त्वां विना पार्वतीसुत ।
तस्मात्त्वया हि कर्तव्यं वचनं मे महाप्रभो ॥
सन्नद्धो भव दैत्यस्य वधायाशु परंतप ।
तद्वधार्थं समुत्पन्नः शंकरात्त्वं शिवासुत ॥
रक्ष रक्ष महावीर त्रिदशान् व्यथितान् रणे न बालस्त्वं युवा नैव किं तु सर्वेश्वरः प्रभुः शक्रं पश्य तथा विष्णुं व्याकुलं च सुरान् गणान् पुनः इन्द्रादिके साथ तारकासुरका युद्ध ब्रह्माजी बोले- हे देवदेव! हे गुह! हे स्वामिन्! हे शंकरपुत्र! हे पार्वतीसुत! विष्णु तथा तारकासुरका १ यह व्यर्थ संग्राम शोभा नहीं देता । यह अति बलवान् तारक विष्णुसे नहीं मरेगा; क्योंकि मैंने उसको वरदान दिया है । यह मैं सत्य - सत्य कह रहा हूँ । हे २ पार्वतीसुत! आपके बिना इस पापीको मारनेवाला अन्य कोई नहीं है, इसलिये हे महाप्रभो! आप मेरा ३ यह वचन स्वीकार कीजिये॥१–३ ॥ हे परन्तप! अब आप शीघ्र ही इस दैत्यके ४ वधके लिये तत्पर हो जाइये । हे शिवापुत्र! इसको मारनेके लिये ही आप शंकरजीसे उत्पन्न हुए हैं । हे महावीर! आप रणभूमिमें इन पीड़ित देवगणोंकी । रक्षा कीजिये, आप न तो बालक हैं, न युवा हैं, किंतु ॥ ५ सर्वेश्वर प्रभु हैं ॥४-५ ॥ आप इस समय व्याकुल इन्द्र, विष्णु, अन्य । और इस महादैत्यका एनं जहि महादैत्यं त्रैलोक्यं सुखितं कुरु ॥ ६ देवताओं एवं गणोंको देखिये अनेन विजितश्चेन्द्रो लोकपालैः पुरा सह विष्णुश्चापिमहावीरो तर्जितस्तपसो बलात् त्रैलोक्यं निर्जितं । इदानीं सर्वमसुरेण दुरात्मना तव सान्निध्यात्पुनर्युद्धं कृतं च तैः तस्मात्त्वया अन्यवध्यो निहन्तव्यस्तारकः पापपूरुषः न चैवायं मद्वराच्छंकरात्मज वध कीजिये तथा त्रैलोक्यको सुख प्रदान कीजिये ॥ ६ ॥
इसने पूर्वकालमें लोकपालोंसहित इन्द्रपर विजय । की है और अपनी तपस्याके बलसे महावीर विष्णुको ॥ ७ प्राप्त भी अपमानित किया है । इस दुरात्मा दैत्यने सम्पूर्ण त्रैलोक्यको जीत लिया और इस समय आपके सान्निध्यके ॥ ८ । कारण उन देवताओंसे पुनः युद्ध किया॥७-८ ॥ इस कारण आप इस दुरात्मा पापी तारकासुरका वध कीजिये । हे शंकरात्मज! यह मेरे वरदानके कारण । आपके सिवा किसी अन्यसे नहीं मारा जा सकता ॥९ ॥
॥ ९
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७७२ इति श्रुत्वा मम वचः कुमारः शंकरात्मजः विजहास प्रसन्नात्मा तथास्त्विति वचोऽब्रवीत्
विनिश्चित्यासुरवधं शांकरिः स महाप्रभुः ।
विमानादवतीर्याथ पदातिरभवत्तदा ॥
पद्भ्यां तदासौ परिधावमानो रेजेऽतिवीरः शिवजः कुमारः । करे समादाय महाप्रभां तां शक्तिं महोल्कामिव दीप्तिदीप्ताम् ॥ दृष्ट्वा तमायान्तमतिप्रचंड-मव्याकुलं षण्मुखमप्रमेयम् । दैत्यो बभाषे सुरसत्तमान्स कुमार एष द्विषतां प्रहन्ता ॥ अनेन साकं ह्यहमेकवीरो योत्स्ये च सर्वानहमेव वीरान् । गणांश्च सर्वानपि घातयामि सलोकपालान् हरिनायकांश्च ॥ इत्येवमुक्त्वा स तदा महाबलः कुमारमुद्दिश्य ययौ च योद्धुम् । जग्राह शक्तिं परमाद्भुतां च स तारको देववरान् बभाषे ॥ तारक उवाच
कुमारो मेऽग्रतश्चाद्य भवद्भिश्च कथं कृतः ।
यूयं गतत्रपा देवा विशेषाच्छक्रकेशवौ ॥
पुरैताभ्यां कृतं कर्म विरुद्धं वेदमार्गतः ।
तच्छृणुध्वं मया प्रोक्तं वर्णयामि विशेषतः ॥
तत्र विष्णुश्छली दोषी ह्यविवेकी विशेषतः ।
बलिर्येन पुरा बद्धश्छलमाश्रित्य पापतः ॥
तेनैव यत्नतः पूर्वमसुरौ मधुकैटभौ ।
शिरोहीनौ कृतौ धौर्त्याद्वेदमार्गो विवर्जितः ॥
मोहिनीरूपतोऽनेन पंक्तिभेदः कृतो हि वै ।
देवासुरसुधापाने वेदमार्गो विगर्हितः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ । [ ब्रह्माजीने कहा- ] मेरी यह बात ॥ १० शंकरपुत्र कार्तिकेय प्रसन्नचित्त होकर हँसने लगे सुनकर ' ऐसा ही होगा'– यह वचन बोले ॥१० ॥ और
तब वे महाप्रभु शंकरपुत्र असुरके वधका ११ निश्चयकर विमानसे उतरकर पैदल हो गये ॥११ उस युद्धभूमिमें अपने हाथमें महोल्काके ॥ समान महाप्रभायुक्त देदीप्यमान शक्ति नामक अस्त्रको धारण किये हुए वे शिवपुत्र कार्तिकेय पैदल १२ दौड़ते हुए अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे । अत्यन्त प्रचण्ड, महाधैर्यशाली और अप्रमेय कार्तिकेयको अपने सम्मुख आता देखकर उस तारकासुरने देवगणोंसे कहा- क्या शत्रुओंका वध करनेवाले कुमार ये ही १३ हैं? ॥ १२-१३ ॥ मैं अकेले ही इस कुमार एवं अन्य वीरोंके साथ युद्ध करूँगा और लोकपालोंसहित समस्त गणों एवं १४ विष्णु आदि देवताओंका वध करूँगा ॥१४ ॥
ऐसा कहकर वह महाबली तारक कुमारको उद्देश्य करके युद्ध करनेके लिये चला । उसने हाथमें अत्यन्त अद्भुत शक्ति ले ली और वह श्रेष्ठ देवताओंसे १५ कहने लगा – ॥ १५ ॥
तारक बोला — हे देवगणो! तुमलोगोंने इस बालक कुमारको मेरे आगे कैसे कर दिया? तुम सब १६ बड़े निर्लज्ज हो, इन्द्र और विष्णु तो विशेष रूपसे लज्जाहीन हैं ॥ १६ ॥
पूर्व समयमें भी इन दोनोंने वेदविरुद्ध कर्म १७ किये हैं । मैं विशेषरूपसे उनका वर्णन कर रहा हूँ, तुमलोग सुनो ॥ १७ ॥
इन दोनोंमें विशेषरूपसे विष्णु तो छली, दोषी १८ तथा अविवेकी है, जिसने पूर्वकालमें पापपूर्वक छल करके बलिको बाँधा था ॥१८ ॥
उसीने यत्नपूर्वक वेदमार्गका त्यागकर धूर्तता १ ९ मधु तथा कैटभ नामक राक्षसोंका सिर काट लिया था ॥ १ ९ ॥ उसके बाद देवता एवं दैत्योंके अमृत- - पानके | समय उसीने मोहिनीरूप धारणकर पंक्ति - भेद किया २० और वेदमार्गको दूषित किया ॥ २० ॥
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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७७३
रामो भूत्वा हता नारी वाली विध्वंसितो हि सः ।
पुनर्वैश्रवणो विप्रो हतो नीतिर्हता श्रुतेः ॥
पापं विना स्वकीया स्त्री त्यक्ता पापरतेन यत् ।
तत्रापि श्रुतिमार्गश्च ध्वंसितः स्वार्थहेतवे ॥
स्वजनन्याः शिरश्छिन्नमवतारे रसाख्यके ।
गुरुपुत्रापमानश्च कृतोऽनेन दुरात्मना ॥
कृष्णो भूत्वान्यनार्यश्च दूषिताः कुलधर्मतः । श्रुतिमार्गं परित्यज्य स्वविवाहाः कृतास्तथा
पुनश्च वेदमार्गों हि निंदितो नवमे भवे ।
स्थापितं नास्तिकमतं वेदमार्गविरोधकृत् ॥
एवं येन कृतं पापं वेदमार्गं विसृज्य वै स कथं विजयेद्युद्धे भवेद्धर्मवतां वरः ॥ भ्राता ज्येष्ठश्च यस्तस्य शक्रः पापी महान्मतः तेन पापान्यनेकानि कृतानि निजहेतुतः निकृत्तो हि दितेर्गर्भः स्वार्थहेतोर्विशेषतः धर्षिता गौतमस्त्री वै हतो वृत्रश्च विप्रजः विश्वरूपद्विजातेर्वै भागिनेयस्य यद्गुरोः निकृत्तानि च शीर्षाणि तदध्वाध्वंसितः श्रुतेः कृत्वा बहूनि पापानि हरिः शक्रः पुनः पुनः तेजोभिर्विहतावेव नष्टवीर्यौ विशेषतः तयोर्बलेननो यूयं संग्रामे जयमाप्स्यथ किमर्थं मूढतां प्राप्य प्राणांस्त्यक्तुमिहागताः उसने रामावतार लेकर ताड़का स्त्रीका वध २१ किया, बालिको [ छिपकर ] मारा तथा विश्रवाके पुत्र विप्र रावणका वध किया, इस प्रकार उसने वेदनीतिका विनाश किया ॥ २१ ॥
पापपरायण इसने बिना अपराधके ही अपनी २२ स्त्रीका परित्याग कर दिया । इस प्रकार अपने स्वार्थके लिये इसने वेदमार्गको ध्वस्त किया ॥ २२ ॥
छठे परशुरामावतारमें इस दुष्टने अपनी माताका २३ सिर काट दिया और [ गणेशको युद्धमें हराकर ] गुरुपुत्रका अपमान किया ॥ २३ ॥
कृष्णावतारमें इसने कुलधर्मके विरुद्ध ॥ २४ वेदमार्गको छोड़कर बहुत - से विवाह किये और अनेक नारियोंको दूषित किया ॥२४ ॥
इसके बाद नौवें बुद्धावतारमें इसने वेदमार्गकी २५ निन्दा की और वेदमार्गका विरोध करनेवाले नास्तिक मतका स्थापन किया ॥ २५ ॥
। इस प्रकार जिसने वेदमार्गको छोड़कर पाप २६ किया है, वह युद्धमें कैसे विजयी हो सकता है और कैसे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हो सकता है? ॥ २६ ॥
। इसी प्रकार इसका ज्येष्ठ भ्राता इन्द्र भी महापापी ॥ २७ कहा गया है; उसने भी अपने स्वार्थके लिये नाना प्रकारके पाप किये हैं ॥ २७ ॥
। उसने अपने स्वार्थके लिये दितिके गर्भमें ॥ २८ प्रवेशकर गर्भस्थ बालकके टुकड़े - टुकड़े कर दिये, गौतमकी स्त्रीसे व्यभिचार किया और ब्राह्मणकुमार वृत्रका वध किया ॥ २८ ॥
। विश्वरूप ब्राह्मणका, जो असुरोंका भागिनेय ॥ २ ९ तथा इन्द्रका गुरु भी था, उसका सिर काटकर इसने वेदमार्गको विनष्ट किया ॥२ ९ ॥ इस प्रकार विष्णु एवं इन्द्र वे दोनों बार-। बार अनेक पाप करके तेजसे रहित तथा विनष्ट ॥ ३० पराक्रमवाले हो गये हैं ॥ ३० ॥
[ हे देवगण! ] इन दोनोंके बलसे तुमलोग संग्राममें विजय नहीं प्राप्त कर सकोगे । फिर मूर्खता । करके तुमलोग अपना प्राण त्याग करनेके लिये यहाँ ॥ ३१ । क्यों आये हो? ॥ ३१ ॥
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७७४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०९ जानन्तौ धर्ममेतौ न स्वार्थलंपटमानसौ । ये दोनों बड़े लम्पट एवं स्वार्थी हैं, इन्हें धर्मं विनाऽमराः कृत्यं निष्फलं सकलं भवेत् ॥ ३२ ज्ञान नहीं है । हे देवताओ! धर्मके बिना किया धर्मका महाधृष्टाविमौ मेऽद्य कृतवंतौ पुरश्शिशुम् अहं बालं वधिष्यामि तयोः सोऽपि भविष्यति किं तु बाल इतो यायाद् दूरं प्राणपरीप्सया इत्युक्त्वोद्दिश्य च हरी वीरभद्रमुवाच सः पुरा हतास्त्वया विप्रा दक्षयज्ञे ह्यनेकशः । तत्कर्मणः फलं चाद्य दर्शयिष्यामि तेऽनघ ब्रह्मोवाच इत्येवमुक्त्वा तु विधूय पुण्यं निजं स तन्निन्दनकर्मणा वै । जग्राह शक्तिं परमाद्भुतां च स तारको युद्धवतां वरिष्ठः ॥
तं बालान्तिकमायान्तं तारकासुरमोजसा ।
आजघान च वज्रेण शक्रो गुहपुरस्सरः ॥
तेन वज्रप्रहारेण तारको जर्जरीकृतः ।
भूमौ पपात सहसा निंदाहतबलः क्षणम् ॥
पतितोऽपि समुत्थाय शक्त्या तं प्राहरद्रुषा ।
पुरंदरं गजस्थं हि पातयामास भूतले ॥
हाहाकारो महानासीत्पतिते च पुरंदरे ।
सेनायां निर्जराणां हि तद् दृष्ट्वा क्लेश आविशत् ॥
तारकेणाऽपि तत्रैव यत्कृतं कर्म दुःखदम् ।
स्वनाशकारणं धर्मविरुद्धं तन्निबोध मे ॥
पतितं च पदाक्रम्य हस्ताद्वज्रं प्रगृह्य वै ।
पुनरुद्वज्रघातेन शक्रमाताडयद्भृशम् ॥
एवं तिरस्कृतं दृष्ट्वा शक्रं विष्णुः प्रतापवान् ।
चक्रमुद्यम्य भगवांस्तारकं स जघान ह ॥
सारा कृत्य व्यर्थ होता है ॥ ३२ ॥ गया
। ये दोनों बड़े धृष्ट हैं । इन दोनोंने इस बालकको ॥ ३३ । मेरे सामने खड़ा कर दिया है I । यदि मैं बालकका करूँगा, तो यह पाप भी इन्हीं दोनोंको लगेगा ॥ वध । किंतु यह बालक अपने प्राणकी रक्षाके ३३ लिये ॥ ॥ ३४ यहाँसे दूर चला जाय । विष्णु तथा इन्द्रके विषयमें इस प्रकार कहकर उसने वीरभद्रसे कहा- ॥ ३४ ॥
तुमने भी पहले दक्षप्रजापतिके यज्ञमें अनेक ॥ ३५ ब्राह्मणोंका वध किया था । हे अनघ! मैं आज तुम्हें उस कर्मका फल चखाऊँगा ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार युद्ध करनेवालोंमें श्रेष्ठ तारकासुरने विष्णु तथा इन्द्रके निन्दाकर्मसे अपना समस्त पुण्य नष्ट करके अत्यन्त अद्भुत शक्ति ३६ ग्रहण की ॥ ३६ ॥
तब बड़े वेगसे बालकके समीप आते हुए उस ३७ तारकासुरको देखकर इन्द्रने कुमारके आगे होकर अपने वज्रसे उसपर प्रहार किया ॥ ३७ ॥
उस वज्रके प्रहारसे देवताओंकी निन्दासे नष्ट ३८ बलवाला तारकासुर जर्जर हो गया और क्षणमात्रमें पृथ्वीपर सहसा गिर पड़ा ॥३८ ॥
तब गिरनेपर भी उठकर उसने बड़े वेगसे इन्द्रपर ३ ९ अपनी शक्तिसे प्रहार किया और हाथीपर चढ़े इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥३ ९ ॥ इस प्रकार इन्द्रके गिरनेपर महान् हाहाकार ४० होने लगा, यह देखकर देवताओंकी सेनामें शोक छा गया ॥ ४० ॥
[ हे नारद! ] उस समय तारकने भी धर्मविरुद्ध ४१ एवं दुःखदायक जो कर्म अपने नाशके लिये किया, उसे आप मुझसे सुनें ॥ ४१ ॥
उसने गिरे हुए इन्द्रको अपने पैरोंसे रौंदकर ४२ उनके हाथसे वज्र छीनकर उसी वज्रसे उनपर प्रहार किया ॥ ४२ ॥
इस प्रकार इन्द्रको तिरस्कृत होता हुआ देखकर | प्रतापशाली भगवान् विष्णुने चक्र उठाकर तारकासुरपर ४३ प्रहार किया ॥४३ ॥
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अ ० ९ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७७५
चक्रप्रहाराभिहतो निपपात क्षितौ हि सः ।
पुनरुत्थाय दैत्येन्द्रः शक्त्या विष्णुं जघान तम् ॥
तेन शक्तिप्रहारेण पतितो भुवि चाच्युतः ।
हाहाकारो महानासीच्चुक्रुशुश्चाऽतिनिर्जराः ॥
निमेषेण पुनर्विष्णुर्यावदुत्तिष्ठते स्वयम् ।
तावत्स वीरभद्रो हि तत्क्षणादागतोऽसुरम् ॥
त्रिशूलं च समुद्यम्य वीरभद्रः प्रतापवान् ।
तारकं दितिजाधीशं जघान प्रसभं बली ॥
तत्रिशूलप्रहारेण स पपात क्षितौ तदा ।
पतितोऽपि महातेजास्तारकः पुनरुत्थितः ॥
कृत्वा क्रोधं महावीरः सकलासुरनायकः ।
जघान परया शक्त्या वीरभद्रं तदोरसि ॥
वीरभद्रोऽपि पतितो भूतले मूर्च्छितः क्षणम् ।
तच्छक्त्या परया क्रोधान्निहतो वक्षसि ध्रुवम् ॥
सगणाश्चैव देवास्ते गंधर्वोरगराक्षसाः हाहाकारेण महता चुक्रुशुश्च मुहुर्मुहुः निमेषमात्रात्सहसा महौजा-सवीरभद्रो द्विषतां निहन्ता त्रिशूलमुद्यम्य तडित्प्रकाशं जाज्वल्यमानं प्रभया विरेजे स्वरोचिषा भासितदिग्वितानं सूर्येन्दुबिम्बाग्निसमानमंडलम् महाप्रभं वीरभयावहं परं कालाख्यमत्यंतकरं महोज्ज्वलम् यावत्रिशूलेन तदा हंतुकामो महाबलः वीरभद्रोऽसुरं तावत्कुमारेण निवारितः इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां उस चक्रके प्रहारसे आहत होकर वह तारकासुर ४४ पृथ्वीपर गिर पड़ा । पुनः उठकर उस दैत्यराजने शक्ति नामक अस्त्रसे विष्णुपर प्रहार किया ॥ ४४ ॥
उस शक्तिके प्रहारसे विष्णु पृथ्वीपर गिर पड़े ।
४५ इससे बड़ा हाहाकार मच गया और देवता लोग जोर-। जोरसे चिल्लाने लगे ॥ ४५ ॥
एक निमेषमात्रमें पुनः अभी विष्णु उठ ही रहे ४६ थे, तभी उसी समय वीरभद्र उस असुरके समीप आ गये ॥ ४६ ॥
प्रतापी एवं बलवान् वीरभद्रने अपना त्रिशूल ४७ लेकर बड़े वेगसे उस दैत्यपति तारकासुरपर बलपूर्वक प्रहार किया । तब उस त्रिशूलके लगते ही वह ४८ महातेजस्वी तारक पृथ्वीपर गिर पड़ा और गिरनेपर भी क्षणमात्रमें उठ गया । तब समस्त असुरोंके सेनापति उस महावीरने क्रोध करके अपनी परम शक्तिद्वारा ४ ९ वीरभद्रकी छातीपर प्रहार किया ॥ ४७–४९ ॥ क्रोधसे चलाये गये उस प्रचण्ड शक्ति नामक ५० अस्त्रके छातीपर लगते ही वीरभद्र भी क्षणमात्रमें मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥५० ॥
। तब गणोंसहित देवता, गन्धर्व, उरग तथा राक्षस ॥ ५१ बड़ा हाहाकार करते हुए बार - बार चिल्लाने लगे ॥५१ ॥
क्षणभरके पश्चात् शत्रुनाशक महातेजस्वी वीरभद्र । जलती हुई अग्निके समान प्रभावाले एवं विद्युत्के समान देदीप्यमान त्रिशूल लेकर [ युद्धस्थलमें ] शोभित ॥ ५२ होने लगे । वह त्रिशूल अपनी कान्तिसे दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था । वह सूर्य एवं चन्द्रके बिम्ब तथा अग्निके समान मण्डलवाला, महाप्रभासे युक्त, वीरोंको भय उत्पन्न करनेवाला, कालके समान सबका ॥ ५३ अन्त करनेवाला तथा महोज्ज्वल था ॥ ५२-५३ ॥ महाबली वीरभद्र जैसे ही उस त्रिशूलसे । असुरको मारनेके लिये उद्यत हुए, तभी कुमारने ॥५४ । उन्हें रोक दिया ॥ ५४ ॥
रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे तारकवाक्यशक्र नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
विष्णुवीरभद्रयुद्धवर्णनं अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें तारकवाक्यशक्र-॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
विष्णुवीरभद्रयुद्धवर्णन
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७७६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १० अथ दशमोऽध्यायः कुमार कार्तिकेय और तारकासुरका भीषण संग्राम, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध देवताओंद्वारा दैत्यसेनापर विजय प्राप्त करना, सर्वत्र विजयोल्लास,, देवताओं द्वारा शिवा- शिव तथा कुमारकी स्तुति ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले – शत्रुपक्षके वीरोंका निवार्य वीरभद्रं तं कुमारः परवीरहा । | करनेवाले कुमार कार्तिकेयने इस प्रकार वीरभद्रको नाश समैच्छत्तारकवधं स्मृत्वा शिवपदाम्बुजौ ॥ १ [ तारकासुरके वधसे ] रोककर शिवजीके चरणकमलोंका
जगर्जाथ महातेजाः कार्तिकेयो महाबलः ।
सन्नद्धः सोऽभवत्क्रुद्धः सैन्येन महता वृतः ॥
तदा जय जयेत्युक्तं सर्वैर्देवगणैस्तथा ।
संस्तुतो वाग्भिरिष्टाभिस्तदैव च सुरर्षिभिः ॥
तारकस्य कुमारस्य संग्रामोऽतीव दुस्सहः ।
जातस्तदा महाघोरः सर्वभूतभयंकरः ॥
शक्तिहस्तौ च तौ वीरौ युयुधाते परस्परम् ।
सर्वेषां पश्यतां तत्र महाश्चर्यवतां मुने ॥
शक्तिनिर्भिन्नदेहौ तौ महासाधनसंयुतौ ।
परस्परं वञ्चयन्तौ सिंहाविव महाबलौ ॥
वैतालिकं समाश्रित्य तथा खेचरकं मतम् ।
प्रापतं च समाश्रित्य शक्त्या शक्तिं विजघ्नतुः ॥
एभिर्मन्त्रैर्महावीरौ चक्रतुर्युद्धमद्भुतम् ।
अन्योऽन्यं साधकौ भूत्वा महाबलपराक्रमौ ॥
महाबलं प्रकुर्वन्तौ परस्परवधैषिणौ ।
जघ्नतुः शक्तिधाराभी रणे रणविशारदौ ॥
मूर्ध्नि कंठे तथाचोर्वोर्जान्वोश्चैव कटीतटे । ध्यानकर स्वयं तारकासुरके वधकी इच्छा की । विशाल सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी एवं महाबली कार्तिकेय २ गरजने लगे और क्रुद्ध होकर तारकासुरके वधके लिये उद्यत हो गये॥१-२ ॥ उस समय देवताओं, गणों एवं ऋषियोंने ३ कार्तिकेयका जय - जयकार किया और उत्तम वाणीसे उनकी स्तुति की । उसके बाद तारकासुर तथा कुमारका अत्यन्त दुःसह, समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला एवं ४ महाघोर संग्राम होने लगा । हे मुने! दोनों वीर हाथमें शक्ति नामक अस्त्र लेकर परस्पर युद्ध करने लगे, उस समय सभी देखनेवालोंको महान् आश्चर्य हो रहा ५ था॥३–५ ॥ शक्ति - अस्त्रसे छिन्न - भिन्न अंगोंवाले तथा महान् ६ साधनोंसे युक्त वे दोनों महाबली एक - दूसरेकी वंचना करते हुए दो सिंहोंके समान आपसमें प्रहार कर रहे थे । दोनों वैतालिक, खेचर तथा प्रापत नामक युद्ध ७ | विधियोंका आश्रय लेकर शक्तिसे शक्तिपर प्रहार करने लगे ॥ ६-७ ॥ महावीर, महाबली एवं पराक्रमी वे दोनों ही ८ एक - दूसरेको जीतनेकी इच्छासे इन युद्धकलाओंसे अद्भुत युद्ध कर रहे थे । रणविद्यामें प्रवीण, वे एक-९ | दूसरेके वधकी इच्छासे अपना पराक्रम प्रदर्शित करते । हुए शक्तिकी धाराओंसे युद्ध करने लगे । वे दोनों परस्पर एक - दूसरेके सिर, कण्ठ, ऊरु, जानु, कटिप्रदेश, वक्षस्युरसि पृष्ठे च चिच्छिदुश्च परस्परम् ॥१० । वक्षःस्थल हृदयदेश तथा कर रहे , पृष्ठपर आघात थे ॥ ८-१० ॥ तदा तौ युध्यमानौ च हन्तुकामौ महाबलौ । उस समय अनेक युद्धोंमें कुशल एवं वल्गन्तौ वीरशब्देश्च नानायुद्धविशारदौ | महाबली वे दोनों एक - दूसरेको मारनेकी इच्छासे ॥ ११ वीरध्वनिसे ललकारते रहे थे । उस हुए युद्ध कर
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अ ० १० ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७७७ सर्वे देवा गंधर्वकिन्नराः । अभवन्प्रेक्षकाः ऊचुः परस्परं तत्र कोऽस्मिन् युद्धे विजेष्यते ॥ नभोगता वाणी जगौ देवांश्च सांत्वयन् । तदा असुरं तारकं चात्र कुमारोऽयं हनिष्यति ॥
मा शोच्यतां सुरैः सर्वैः सुखेन स्थीयतामिति ।
युष्मदर्थं शंकरो हि पुत्ररूपेण संस्थितः ॥
श्रुत्वा तदा तां गगने समीरितां वाचं शुभां स प्रमथैः समावृतः । निहंतुकामः सुखितः कुमारको दैत्याधिपं तारकमाश्वभूत्तदा ॥
शक्त्या तया महाबाहुराजघान स्तनांतरे ।
कुमारः स्म रुषाविष्टस्तारकासुरमोजसा ॥
तं प्रहारमनादृत्य तारको दैत्यपुंगवः ।
कुमारं चापि संक्रुद्धः स्वशक्त्या संजघान सः ॥
तेन शक्तिप्रहारेण शांकरिर्मूच्छितोऽभवत् ।
मुहूर्ताच्चेतनां प्राप स्तूयमानो महर्षिभिः ॥
यथा सिंहो मदोन्मत्तो हन्तुकामस्तथासुरम् ।
कुमारस्तारकं शक्त्या स जघान प्रतापवान् ॥
एवं परस्परं तौ हि कुमारश्चापि तारकः ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ शक्तियुद्धविशारदौ ॥
अभ्यासपरमावास्तामन्योन्यं विजिगीषया ।
पदातिनौ युध्यमानौ चित्ररूपौ तरस्विनौ ॥
विविधैर्घातपुंजैस्तावन्योन्यं विनिजघ्नतुः ।
नानामार्गान्प्रकुर्वन्ती गर्जन्तौ सुपराक्रमौ ॥
अवलोकपराः सर्वे देवगंधर्वकिन्नराः ।
विस्मयं परमं जग्मुर्नोचुः किंचन तत्र ते ॥
न ववौ पवमानश्च निष्प्रभोऽभूद्दिवाकरः । चचाल वसुधा सर्वा सशैलवनकानना समय सभी देवता, गन्धर्व, किन्नर उस युद्धको १२ देखने लगे और परस्पर कहने लगे — इस युद्धमें कौन जीतेगा? ॥ ११-१२ ॥ तब देवताओंको सान्त्वना देते हुए आकाशवाणी १३ हुई कि इस युद्धमें यह कुमार तारकासुरका वध करेगा । हे देवगणो! आपलोग चिन्ता न करें, सुखपूर्वक रहें, आपलोगोंके लिये शिवजी पुत्ररूपसे स्थित हुए १४ हैं ॥ १३-१४ ॥ उस समय आकाशमार्गसे आयी हुई उस शुभ वाणीको सुनकर प्रमथगणोंसे घिरे हुए कुमार अत्यन्त प्रसन्न हुए और दैत्यराज तारकासुरको मारनेहेतु १५ | तत्पर हुए ॥ १५ ॥
उसके बाद उन महाबाहुने क्रोधित होकर १६ तारकासुरकी छातीमें उस शक्ति नामक अस्त्रसे बलपूर्वक आघात किया । तब दैत्यश्रेष्ठ उस तारकासुरने भी उस शक्तिका तिरस्कारकर अत्यन्त कुपित होकर कुमारपर १७ अपनी शक्तिसे प्रहार किया ॥ १६-१७ ॥ उस शक्तिके प्रहारसे कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये, १८ पुनः थोड़ी देरके पश्चात् चेतनायुक्त हो गये और महर्षिगण उनकी स्तुति करने लगे ॥१८ ॥
मदोन्मत्त सिंहकी भाँति उन प्रतापी कुमारने १ ९ तारकासुरका वध प्रहार किया ॥ १ ९ इस प्रकार २० तारकासुर क्रोधमें परम अभ्यस्त वे करनेकी इच्छासे २१ युद्ध कर रहे थे करनेकी इच्छासे शक्तिसे उसपर ॥ शक्तियुद्धमें निपुण कुमार तथा भरकर युद्ध करने लगे । [ युद्धमें ] दोनों ही एक - दूसरेपर विजय प्राप्त पैदल ही पैंतरा देकर बड़ी तेजीसे ॥ २०-२१ ॥ दोनों ही अनेक प्रकारके घातोंसे एक - दूसरेपर २२ प्रहार कर रहे थे, एक - दूसरेका छिद्र देख रहे थे, वे दोनों ही पराक्रमी गर्जना कर रहे थे । सभी देवता, गन्धर्व तथा किन्नर युद्ध देख रहे थे, सभी आश्चर्यसे २३ चकित थे और कोई भी किसीसे कुछ भी नहीं कह रहा था ॥ २२-२३ ॥ उस समय पवनका चलना भी बन्द हो गया, सूर्यकी कान्ति फीकी पड़ गयी और पर्वत एवं वन-काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ २४ ॥
॥ २४ |
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७७८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १०
एतस्मिन्नन्तरे तत्र हिमालयमुखा धराः ।
स्नेहार्दितास्तदा जग्मुः कुमारं च परीप्सवः ॥ २५
ततः स दृष्ट्वा तान्सर्वान्भयभीतांश्च शांकरिः ।
पर्वतान्गिरिजापुत्रो बभाषे परिबोधयन् ॥ २६
कुमार उवाच
मा खिद्यतां महाभागा मा चिंतां कुर्वतां नगाः ।
घातयाम्यद्य पापिष्ठं सर्वेषां वः प्रपश्यताम् ॥ २७
एवं समाश्वास्य तदा पर्वतान् निर्जरान् गणान् ।
प्रणम्य गिरिजां शंभुमाददे शक्तिमुत्प्रभाम् ॥ २८
तं तारकं हन्तुमनाः करशक्तिर्महाप्रभुः ।
विरराज महावीरः कुमारः शंभुबालकः ॥ २ ९
शक्त्या तया जघानाथ कुमारस्तारकासुरम् ।
तेजसाढ्यः शंकरस्य लोकक्लेशकरं च तम् ॥ ३०
पपात सद्यः सहसा विशीर्णाङ्गोऽसुरः क्षितौ ।
तारकाख्यो महावीरः सर्वासुरगणाधिपः ॥ ३१
कुमारेण हतः सोऽतिवीरः स खलु तारकः ।
लयं ययौ च तत्रैव सर्वेषां पश्यतां मुने ॥ ३२
तथा तं पतितं दृष्ट्वा तारकं बलवत्तरम् ।
न जघान पुनर्वीरः स गत्वा व्यसुमाहवे ॥ ३३
हते तस्मिन्महादैत्ये तारकाख्ये महाबले ।
क्षयं प्रणीता बहवोऽसुरा देवगणैस्तदा ।
॥ ३४
केचिद्भीताः प्रांजलयो बभूवुस्तत्र चाहवे ।
छिन्नभिन्नांगकाः केचिन्मृता दैत्याः सहस्रशः ॥ ३५
केचिज्जाताः कुमारस्य शरणं शरणार्थिनः ।
वदन्तः पाहि पाहीति दैत्याः सांजलयस्तदा ॥ ३६ ।
कियन्तश्च हतास्तत्र कियन्तश्च पलायिताः ।
पलायमाना व्यथितास्ताडिता निर्जरैर्गणैः ॥
३७ सहस्रशः प्रविष्टास्ते पाताले च जिजीषवः । पलायमानास्ते सर्वे भग्नाशा दैन्यमागताः । ॥ ३८ | इसी बीच हिमालय आदि सभी प्रमुख पर्वत स्नेहाभिभूत होकर कुमारकी रक्षाके लिये वह पहुँचे ॥ २५ ॥
तब शंकर एवं पार्वतीके पुत्र कार्तिकेयने उन सभी पर्वतोंको भयभीत देखकर समझाते हुए कहा- ॥ २६ ॥
कुमार बोले - हे महाभाग पर्वतो! आपलोग । खेद मत करें और चिन्ता मत करें । मैं आप सभीके देखते - देखते इस पापीका वध करूँगा ॥२७ ॥
इस प्रकार उन्होंने पर्वतों, गणों तथा देवताओंको ढाँढस देकर गिरिजा एवं शम्भुको प्रणाम करके अत्यन्त देदीप्यमान शक्तिको हाथमें लिया । उस तारकको मारनेकी इच्छावाले शम्भुपुत्र महावीर महाप्रभु कुमार हाथमें शक्ति लिये हुए उस समय अद्भुत शोभा पा रहे थे॥२८-२९ ॥ इस प्रकार शंकरजीके तेजसे सम्पन्न कुमार कार्तिकेयने लोकको क्लेश देनेवाले उस तारकासुरपर उस शक्तिसे प्रहार किया । तब सभी असुरगणोंका अधिपति महावीर तारक नामक असुर सहसा छिन्न-भिन्न अंगोंवाला होकर उसी क्षण पृथ्वीपर गिर पड़ा । हे मुने! कार्तिकेयने इस प्रकार उस असुरका वध किया और वह भी सबके देखते - देखते वहीं पर लयको प्राप्त हो गया ॥ ३०–३२ ॥ महाबलवान् तारकको रणभूमिमें गिरा हुआ देखकर वीर कार्तिकेयने पुनः उस प्राणविहीनपर प्रहार । नहीं किया । तब उस तारक नामक महाबली महादैत्यकी मृत्यु हो जानेपर देवगणोंने असुरोंको विनष्ट कर दिया ॥ ३३-३४ ॥। कुछ युद्धमें भयभीत होकर हाथ जोड़ने लगे, कुछ छिन्न - भिन्न अंगोंवाले हुए और हजारों दैत्य मृत्युको प्राप्त हो गये । शरणकी इच्छावाले कुछ दैत्य हाथ जोड़कर ' रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये – ऐसा कहते हुए कुमारकी शरणमें चले गये ॥ ३५-३६ ॥ कुछ मारे गये, कुछ भाग खड़े हुए और कुछ भाग समय देवताओंके द्वारा मारे जानेसे पीड़ित हो गये ॥ ३७ ॥
जीनेकी इच्छावाले हजारों दैत्य पाताललोक प्रविष्ट हो गये और कुछ दीनतापूर्वक निराश होकर भाग गये ॥ ३८ ॥
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अ ० १० ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ७७ ९
एवं सर्वं दैत्यसैन्यं भ्रष्टं जातं मुनीश्वर ।
न केचित्तत्र संतस्थुर्गणदेवभयात्तदा ॥ ३ ९
आसीन्निष्कंटकं सर्वं हते तस्मिन्दुरात्मनि ।
ते देवाः सुखमापन्नाः सर्वे शक्रादयस्तदा ॥ ४०
एवं विजयमापन्नं कुमारं निखिलाः सुराः ।
बभूवुर्युगपद् हृष्टास्त्रिलोकाश्च महासुखाः ॥ ४१
तदा शिवोऽपि तं ज्ञात्वा विजयं कार्तिकस्य च ।
तत्राजगाम स मुदा सगणः प्रियया सह ॥ ४२
स्वात्मजं स्वाङ्कमारोप्य कुमारं सूर्यवर्चसम् ।
लालयामास सुप्रीत्या शिवा च स्नेहसंकुला ॥ ४३
हिमालयस्तदागत्य स्वपुत्रैः परिवारितः ।
सबन्धुस्सानुगः शंभुं तुष्टाव च शिवां गुहम् ॥ ४४
ततो देवगणाः सर्वे मुनयः सिद्धचारणाः ।
तुष्टुवुः शांकरिं शंभुं गिरिजां तुषितां भृशम् ॥ ४५
पुष्पवृष्टिं सुमहतीं चक्रुश्चोपसुरास्तदा ।
जगुर्गंधर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४६
वादित्राणि तथा नेदुस्तदानीं च विशेषतः ।
जयशब्दो नमः शब्दो बभूवोच्चैर्मुहुर्मुहुः ॥ ४७
ततो मयाच्युतश्चापि संतुष्टोऽभूद्विशेषतः ।
शिवं शिवां कुमारं च संतुष्टाव समादरात् ॥ ४८
कुमारमग्रतः कृत्वा हरिकेन्द्रमुखाः सुराः ।
चक्रुर्नीराजनं प्रीत्या मुनयश्चापरे तथा ॥ ४ ९
गीतवादित्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा ।
तदोत्सवो महानासीत्कीर्तनं च विशेषतः ॥ ५०
गीतवाद्यैः सुप्रसन्नैस्तथा साञ्जलिभिर्मुने ।
स्तूयमानो जगन्नाथः सर्वैर्देवगणैरभूत् ॥ ५१
हे मुनीश्वर! इस प्रकार सम्पूर्ण दैत्यसेना विनष्ट हो गयी । उस समय देवताओं तथा गणोंके भयसे कोई भी असुर वहाँ रुक न सका ॥३ ९ ॥ उस दुरात्माके मारे जानेपर सभी लोग निष्कण्टक हो गये और इन्द्रादि वे सभी देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ४० ॥
इस प्रकार विजयको प्राप्त करनेवाले कुमार कार्तिकेयको देखकर सभी देवता एक साथ प्रसन्न हो उठे एवं सारा त्रैलोक्य महासुखी हो गया ॥ ४१ ॥
उस समय [ भगवान् ] शंकर भी कार्तिकेयकी विजयका समाचार सुनकर अपने गणों तथा पार्वतीके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे ॥४२ ॥
स्नेहसे भरी हुई पार्वतीजी सूर्यके समान तेजस्वी अपने पुत्र कुमारको अपनी गोदीमें लेकर अत्यन्त प्रीतिपूर्वक लाड़ - प्यार करने लगीं ॥४३ ॥
उसी समय अपने बन्धुओं, अनुचरों और पुत्रोंसहित हिमालय भी वहाँ आकर शंकर, पार्वती तथा कुमारकी स्तुति करने लगे ॥४४ ॥
तदनन्तर सभी देवता, मुनि, सिद्ध एवं चारण शिव, शिवा एवं कुमारकी स्तुति करने लगे ॥ ४५ ॥
देवादिकोंने [ आकाशमण्डलसे ] पुष्पोंकी वर्षा की, गन्धर्वपति गान करने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४६ ॥
उस समय विशेष रूपसे बाजे बजने लगे और ऊँचे स्वरसे जयशब्द तथा नमःशब्दका उच्चारण बारंबार होने लगा । तब मेरे साथ भगवान् विष्णु विशेष रूपसे प्रसन्न हुए और उन्होंने आदरपूर्वक शिव, शिवा एवं कुमारकी स्तुति की । इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवता, मुनि तथा अन्यलोग कुमारको आगेकर प्रेमपूर्वक उनकी आरती उतारने लगे ॥ ४७–४९ ॥ उस समय गीत - बाजेके शब्दसे तथा वेदध्वनिके उद्घोषसे महान् उत्सव होने लगा और विशेष रूपसे स्थान - स्थानपर कीर्तन होने लगा ॥ ५० ॥
हे मुने! उस समय प्रसन्न समस्त देवगणोंने हाथ जोड़कर गीत - वाद्योंसे भगवान् शंकरकी स्तुति | की ॥ ५१ ॥
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७८० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ११ ततः स भगवान् रुद्रो भवान्या जगदंबया । उसके बाद सबके द्वारा स्तुत तथा अपने गणोंसे | घिरे हुए भगवान् रुद्र जगज्जननी भवानीके साथ अपने सर्वैः स्तुतो जगामाथ स्वगिरिं स्वगणैर्वृतः ॥ ५२ [ निवासस्थान ] कैलासपर्वतपर चले गये ॥५२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे तारकासुरवधदेवोत्सववर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ । इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें तारकासुरवध तथा देवताओंका उत्सववर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः कार्तिकेयद्वारा बाण तथा प्रलम्ब आदि ब्रह्मोवाच एतस्मिन्नन्तरे तत्र क्रौञ्चनामाचलो मुने आजगाम कुमारस्य शरणं बाणपीडितः पलायमानो यो युद्धादसोढा तेज ऐश्वरम् तुतोदातीव स क्रौञ्चं कोट्यायुतबलान्वितः प्रणिपत्य कुमारस्य स भक्त्या चरणाम्बुजम् असुरोंका वध, कार्तिकेयचरितके श्रवणका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इसी बीच बाण । नामके राक्षससे पीड़ित होकर क्रौंच नामका एक ॥ १ पर्वत कुमार कार्तिकेयकी शरणमें वहाँपर आया । वह । बाण नामक राक्षस तारक - संग्रामके समय कुमारका ॥ २ ऐश्वर्यशाली तेज सहन न कर पानेके फलस्वरूप दस हजार सैनिकोंके साथ भाग गया था, वही क्रौंचको अतिशय दुःख देने लगा ॥ १-२ ॥ । वह क्रौंच पर्वत भक्तिपूर्वक कुमारके चरण-प्रेमनिर्भरया वाचा तुष्टाव गुहमादरात् ॥ ३ कमलोंमें प्रणाम करके प्रेममयी वाणीसे आदरपूर्वक क्रौंच उवाच कुमार स्कंद देवेश तारकासुरनाशक । पाहि मां शरणापन्नं बाणासुरनिपीडितम्
संगरात्ते महासेन समुच्छिन्नः पलायितः ।
न्यपीडयच्च माऽऽगत्य हा नाथ करुणाकर ॥
तत्पीडितस्ते शरणमागतोऽहं सुदुःखितः ।
पलायमानो देवेश शरजन्मन् दयां कुरु ॥
दैत्यं तं नाशय विभो बाणाह्वं मां सुखीकुरु ।
दैत्यघ्नस्त्वं विशेषेण देवावनकरः स्वराट् ॥
ब्रह्मोवाच
इति क्रौंचस्तुतः स्कन्दः प्रसन्नो भक्तपालकः ।
गृहीत्वा शक्तिमतुलां स्वां सस्मार शिवो धिया ॥
चिक्षेप तां समुद्दिश्य स बाणं शंकरात्मजः ।
महाशब्दो बभूवाथ जज्वलुश्च दिशो नभः ॥
कार्तिकेयकी स्तुति करने लगा ॥३ ॥
क्रौंच बोला— हे कुमार! हे स्कन्द! हे देवेश! हे तारकासुरका नाश करनेवाले! बाण नामक दैत्यसे ॥ ४ पीड़ित मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥४ ॥
हे महासेन! वह बाण [ तारकासुरके संग्राममें ] ५ आपसे भयभीत होकर भाग गया था । हे नाथ! हे करुणाकर! वह आकर अब मुझे पीड़ित कर रहा है ॥५ ॥
हे देवेश! उसी बाणसे पीड़ित होकर अत्यन्त ६ दुःखित में भागता हुआ आपकी शरण में आया हूँ । । हे शरजन्मन्! दया कीजिये । हे विभो! उस बाण | नामक राक्षसका नाश कीजिये और मुझे सुखी ७ कीजिये; आप विशेष रूपसे दैत्योंको मारनेवाले, देवरक्षक तथा स्वराट् हैं ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब क्रौंचने इस प्रकार र कुमारकी 9 स्तुति की, तब भक्तपालक वे कार्तिकेय प्रसन्न हुए और ८ उन्होंने हाथमें अपनी अनुपम शक्ति लेकर मनमें शिवजीका । स्मरण किया । इसके बाद उन शिवपुत्रने बाणको लक्ष्य । करके उसे छोड़ दिया । उससे शब्द हुआ और ९ आकाश एवं दसों दिशाएँ प्रज्वलित महान् हो उठीं ॥ ८ - ९ ॥