शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 801–810
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( ब्रह्मोवाच
तदीयं तद्वचः श्रुत्वा गिरिजातनयः स वै ।
निर्भयो दण्डपाणिश्च द्वारपानब्रवीदिदम् ॥ ३
गणेश उवाच
यूयं के कुत आयाता भवंतः सुन्दरा इमे ।
यात दूरं किमर्थं वै स्थिता अत्र विरोधिनः ॥ ४
ब्रह्मोवाच
एवं श्रुत्वा वचस्तस्य हास्यं कृत्वा परस्परम् ।
ऊचुः सर्वे शिवगणा महावीरा गतस्मयाः ॥ ५
परस्परमिति प्रोच्य सर्वे ते शिवपार्षदाः ।
द्वारपालं गणेशं तं प्रत्यूचुः क्रुद्धमानसाः ॥ ६
शिवगणा ऊचुः
श्रूयतां द्वारपाला हि वयं शिवगणा वराः ।
त्वां निवारयितुं प्राप्ताः शंकरस्याज्ञया विभोः ॥ ७
त्वामपीह गणं मत्वा न हन्यामोऽन्यथा हतः ।
तिष्ठ दूरे स्वतः त्वं च किमर्थं मृत्युमीहसे ॥ ८
ब्रह्मोवाच
इत्युक्तोऽपि गणेशश्च गिरिजातनयोऽभयः ।
निर्भर्त्स्य शंकरगणान्न द्वारं मुक्तवांस्तदा ॥ ९
ते सर्वेऽपि गणाः शैवाः तत्रत्या वचनं तदा ।
श्रुत्वा तत्र शिवं गत्वा तद्वृत्तांतमथाब्रुवन् ॥ १०
ततश्च तद्वचः श्रुत्वाद्भुतलीलो महेश्वरः ।
विनिर्भर्त्स्य गणानूचे निजाँल्लोकगतिर्मुने ॥ ११
महेश्वर उवाच कश्चायं वर्तते किं च ब्रवीत्यरिवदुच्छ्रितः ॥ किं करिष्यत्यसद्बुद्धिः स्वमृत्युं वाञ्छति ध्रुवम् ॥ १२ । दूरतः क्रियतां ह्येष द्वारपालो नवीनकः । क्लीबा इव स्थितास्तस्य वृत्तं वदथ में कथम् ॥ १३ | स्वामिनोक्ता
गणास्ते चाद्भुतलीलेन शंभुना ।
पुनरागत्य तत्रैव तमूचुर्द्वारपालकम् ॥ १४
कुमारखण्ड ) ७ ९ १ ब्रह्माजी बोले- उनका वह वचन सुनकर हाथमें लाठी लिये हुए गिरिजापुत्रने निडर होकर उन द्वाररक्षक गणोंसे कहा —॥३ ॥
गणेशजी बोले- आपलोग कौन हैं और कहाँसे आये हैं? आपलोग तो बहुत ही सुन्दर हैं, शीघ्र ही यहाँसे दूर हो जाइये, विरोध करनेके लिये यहाँ क्यों स्थित हैं? ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार उनके वचनको सुनकर शिवजी के सभी महावीर गणोंने आश्चर्यचकित होकर परस्पर हास्य करके कहा ॥ ५ ॥
शिवजीके उन पार्षदोंने आपसमें बातें करके कुपितमन होकर उन द्वारपाल गणेशजीसे कहा- — ॥६ ॥
शिवगण बोले- सुनिये, हम सब शिवजीके श्रेष्ठ गण ही यहाँके द्वारपाल हैं । हम उन विभु शंकरकी आज्ञासे तुम्हें यहाँसे हटानेके लिये आये हैं ॥७ ॥
तुमको भी एक गण समझकर हम तुम्हारा वध नहीं करते । अन्यथा तुम मार दिये गये होते । तुम स्वयं यहाँसे हट जाओ, क्यों मरना चाहते हो? ॥ ८ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहे जानेके बाद भी गिरिजापुत्र निर्भय गणेश शंकरगणोंको बहुत फटकारकर द्वारसे नहीं हटे । तब वहाँके उन सम्पूर्ण शिवगणोंने भी गणेशजीका वचन सुनकर शिवजीके पास जाकर उस वृत्तान्तको निवेदित किया । हे मुने! तब अद्भुत लीला करनेवाले महेश्वर उस वचनको सुनकर अपने गणोंको डाँटकर लौकिक गतिका आश्रय लेकर कहने लगे — ॥९ –११ ॥ महेश्वर बोले - हे गणो! यह कौन है? जो शत्रुके समान इतना उच्छृंखल होकर बातें करता है, यह असद्बुद्धि क्या करेगा, निश्चय ही यह अपनी ॥ मृत्यु चाहता है ॥१२ ॥
इस नवीन द्वारपालको शीघ्र ही यहाँसे दूर करो, तुमलोग कायरोंकी भाँति खड़े होकर उसका समाचार मुझसे क्यों कह रहे हो? अद्भुत लीला करनेवाले शंकरके ऐसा कहनेपर उन गणोंने पुनः वहींपर आकर । उन द्वारपाल गणेशसे कहा— ॥ १३-१४ ॥
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७ ९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ शिवगणा ऊचुः
रे रे द्वारप कस्त्वं हि स्थितश्च स्थापितः कुतः ।
नैवास्मान्गणयस्येवं कथं जीवितुमिच्छसि ॥
द्वारपाला वयं सर्वे स्थिताः किं परिभाषसे ।
सिंहासनगृहीतश्च शृगालः शिवमीहते ॥
तावद्गर्जसि मूर्ख त्वं यावद्गुणपराक्रमः ।
नानुभूतस्त्वयात्रैव ह्यनुभूतः पतिष्यसि ॥
इत्युक्तस्तैस्सुसंक्रुद्धो हस्ताभ्यां यष्टिकां तदा ।
गृहीत्वा ताडयामास गणांस्तान्परिभाषिणः ॥
उवाचाथ शिवापुत्रः परिभर्त्स्य गणेश्वरान् ।
शंकरस्य महावीरान्निर्भयस्तान्नगणेश्वरः ॥
शिवापुत्र उवाच
यात यात इतो दूरे नो चेद्वो दर्शयामि ह ।
स्वपराक्रममत्युग्रं यास्यथात्युपहास्यताम् ॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य गिरिजातनयस्य हि ।
परस्परमथोचुस्ते शंकरस्य गणास्तदा ॥
शिवगणा ऊचुः
किं कर्तव्यं क्व गंतव्यं क्रियते स न किं पुनः ।
मर्यादा रक्ष्यतेऽस्माभिरन्यथा किं ब्रवीति च ॥
ब्रह्मोवाच
ततः शंभुगणाः सर्वे शिवं दूरे व्यवस्थितम् ।
क्रोशमात्रं तु कैलासाद्गत्वा ते च तथाऽब्रुवन् ॥
शिवो विहस्य तान्सर्वास्त्रिशूलकर उग्रधीः ।
उवाच परमेशो हि स्वगणान् वीरसंमतान् ॥
शिव उवाच
रे रे गणाः क्लीबमता न वीरा वीरमानिनः ।
मदग्रे नोदितुं योग्या भसितः किं पुनर्वदेत्॥
शिवगण बोले- हे द्वारपाल! तुम कौनहो और किसके द्वारा नियुक्त होकर यहाँ स्थित हो १५ तुमको हमलोगोंकी कोई परवाह नहीं है, यहाँ रहकर, कैसे जीना चाहते हो? ॥१५ ॥
द्वारपाल तो हमलोग हैं, तुम किस प्रकार १६ अपनेको द्वारपाल कहते हो, शेरके आसनपर बैठकर सियार किस प्रकार अपने कल्याणकी इच्छा कर सकता है? ॥१६ ॥
हे मूर्ख! तुम तभीतक गर्जना कर रहे हो, १७ जबतक तुम शिवगणोंके पराक्रमका अनुभव नहीं कर लेते हो । अभी जब तुम अनुभव कर लोगे, तब धराशायी हो जाओगे ॥ १७ ॥
तब उनके द्वारा कहे गये इस वचनको सुनकर १८ गणेशजी दोनों हाथमें लाठी लेकर ऐसा बोलनेवाले उन गणोंको मारने लगे । तदनन्तर शिवापुत्र गणेशने निडर होकर शंकरके महावीर गणोंको घुड़ककर १ ९ कहा- I— ॥ १८-१९ ॥ पार्वतीपुत्र बोले- जाओ, जाओ, यहाँसे दूर चले जाओ, अन्यथा मैं तुमलोगोंको प्रचण्ड पराक्रम दिखाऊँगा, जिससे तुमलोग उपहासास्पद हो २० जाओगे ॥२० ॥
तब उन गिरिजापुत्रकी यह बात सुनकर शंकर २१ वे गण आपसमें कहने लगे ॥२१ ॥
शिवगण बोले — अब हमें क्या करना चाहिये, । कहाँ जाना चाहिये । कहनेपर भी यह हमारी बात नहीं २२ मानता । हमलोग तो मर्यादाकी रक्षा करते हैं, इसने ऐसी बात किस प्रकार कही ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब शिवके सभी गणोंने | कैलाससे एक कोसकी दूरीपर स्थित शंकरजीसे २३ जाकर वह सब कहा - तब हाथमें त्रिशूल धाकर किये हुए उग्रबुद्धि परमेश्वर शिवजीने हँसकर २४ वीरमानी अपने उन गणोंसे कहा- ॥ २३-२४ ॥ शिवजी बोले- हे गणो! तुमलोग कायर हो, वीरमानी वीर नहीं, मेरे सामने तुमलोग ऐसा | कहनेके योग्य नहीं हो डाँटे जानेपर वह पुनः क्या २५ | कह सकता है ॥२५ ॥,
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड )
गम्यतां ताड्यतां चैष यः कश्चित्प्रभवेदिह ।
बहुनोक्तेन किं चात्र दूरीकर्तव्य एव सः ॥
ब्रह्मोवाच
इति सर्वे महेशेन जग्मुस्तत्र मुनीश्वर ।
भत्सितास्तेन देवेन प्रोचुश्च गणसत्तमाः ॥
शिवगणा ऊचुः
रे रे त्वं शृणु वै बाल बलात्किं परिभाषसे ।
इतस्त्वं दूरतो याहि नो चेन्मृत्युर्भविष्यति ॥
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तेषां शिवाज्ञाकारिणां ध्रुवम् ।
शिवासुतस्तदाभूत्स किं करोमीति दुःखितः ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी तेषां तस्य च वै पुनः ।
श्रुत्वा तु कलहं द्वारि सखीं पश्येति साब्रवीत् ॥
समागत्य सखी तत्र वृत्तान्तं समबुध्यत ।
क्षणमात्रं तदा दृष्ट्वा गता हृष्टा शिवान्तिकम् ॥
तत्र गत्वा तु तत्सर्वं वृत्तं तद्यदभून्मुने ।
अशेषेण तया सख्या कथितं गिरिजाग्रतः ॥
सख्युवाच
अस्मदीयो गणो यो हि स्थितो द्वारि महेश्वरि ।
निर्भर्त्सयन्ति तं वीराः शंकरस्य गणा ध्रुवम् ॥
शिवश्चैव गणाः सर्वे विना तेऽवसरं कथम् ।
प्रविशंति हठाद्गेहे नैतच्छुभतरं तव ॥
सम्यक् कृतं ह्यनेनैव न हि कोऽपि प्रवेशितः ।
दुःखं चैवानुभूयात्र तिरस्कारादिकं तथा ॥
अतः परन्तु वाग्वादः क्रियते च परस्परम् ।
वाग्वादे च कृते नैव तर्ह्ययान्तु सुखेन वै ॥
कृतश्चैवात्र वाग्वादस्तं जित्वा विजयेन च ।
प्रविशतु तथा सर्वे नान्यथा कर्हिचित्प्रिये ॥
अस्मिन्नेवास्मदीये वै सर्वे संभत्सिता वयम् ।
तस्माद्देवि त्वया भद्रे न त्याज्यो मान उत्तमः ॥
शिवो मर्कटवत्तेऽद्य वर्तते सर्वदा सति ।
किं करिष्यत्यहंकारमानुकूल्यं भविष्यति ॥
७ ९ ३ तुमलोग जाओ, उसपर प्रहार करो, चाहे वह २६ कोई क्यों न हो, मैं तुमलोगोंसे अधिक क्या कहूँ, चाहे जैसे भी हो, उसे वहाँसे हटाओ ॥ २६ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! जब महेश्वरने २७ अपने श्रेष्ठ गणोंको इस प्रकार फटकारा, तब वे गण पुनः वहाँ गये और बोले— ॥ २७ ॥
शिवगण बोले- अरे बालक! सुनो । तुम हठपूर्वक क्यों व्यर्थ बकवास करते हो, अब तुम यहाँसे दूर चले २८ जाओ, अन्यथा तुम्हारी मृत्यु हो जायगी ॥ २८ ॥
ब्रह्माजी बोले- शिवके आज्ञाकारी उन गणोंका निश्चयपूर्वक वचन सुनकर ' मैं क्या करूँ ' – यह २ ९ सोचकर पार्वतीपुत्र गणेशजी बहुत दुखी हुए ॥२ ९ ॥ इसी बीच द्वारपर गणोंका तथा गणेशका कलह ३० सुनकर देवी पार्वतीने अपनी सखीसे कहा — देखो, द्वारपर किस प्रकारका कलह हो रहा है? सखीने वहाँ आकर ३१ सारा वृत्तान्त जान लिया और क्षणमात्रमें सब कुछ देखकर प्रसन्न होकर वह पार्वतीके पास गयी । हे मुने! जो कुछ भी घटित हुआ था, वहाँ जाकर उस सखीने वह सब ३२ यथार्थ रूपसे पार्वतीके आगे वर्णन किया ॥ ३०–३२ ॥ सखी बोली- हे महेश्वरि! हमारा गण जो द्वारपर स्थित है, उसको शिवजीके वीर गण निश्चित ३३ रूपसे धमका रहे हैं । शिव तथा उनके वे सभी गण बिना अवसरके घरमें जबरदस्ती कैसे प्रवेश कर सकते ३४ हैं, यह तो आपके लिये शुभतर नहीं है॥३३-३४ ॥ इस बालकने बहुत अच्छा किया, जो इस कार्यके लिये दुःख तथा तिरस्कार आदिका अनुभव ३५ करके भी इसने किसीको घरमें आने नहीं दिया । इसके बाद इन लोगोंमें परस्पर विवाद चल रहा है, वाद - विवाद किये जानेपर वे सुखपूर्वक घरमें प्रवेश ३६ नहीं कर पायेंगे ॥ ३५-३६ ॥ हे प्रिये! यदि वाद - विवाद किया गया, तो मेरे गणको जीतकर विजय प्राप्त करनेके बाद ही वे घरमें ३७ / प्रवेश कर सकते हैं, अन्यथा नहीं । हमारे गणको धमकी देनेसे इन गणोंने हमलोगोंको ही धमकी दी है, इसलिये ३८ हे देवि! हे भद्रे! आपको अपने श्रेष्ठ मानका त्याग नहीं करना चाहिये । सति! शिवजी तो बन्दरके समान सदा आपके अधीन हैं, वे अहंकार क्या करेंगे; अवश्य ३ ९ ही वे आपके अनुकूल हो जायँगे ॥ ३७–३९ ॥
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७ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ब्रह्मोवाच अहो क्षणं स्थिता तत्र शिवेच्छा वशतः सती ॥ मनस्युवाच सा भूत्वा मानिनी पार्वती तदा ॥ शिवोवाच अहो क्षणं स्थितो नैव हठात्कारः कथं कृतः कथं चैवात्र कर्त्तव्यं विनयेनाथ वा पुनः ॥
भविष्यति भवत्येव कृतं नैवान्यथा पुनः ।
इत्युक्त्वा तु सखी तत्र प्रेषिता प्रियया तदा ॥
समागत्याऽब्रवीत्सा च प्रियया कथितं हि यत् ।
समाचष्ट गणेशं तं गिरिजातनयं तदा ॥
सख्युवाच
सम्यक्कृतं त्वया भद्र बलात्ते प्रविशंतु न ।
भवदग्रे गणा ह्येते किं जयंतु भवादृशम् ॥
कृतं चेद्वाकृतं चैव कर्त्तव्यं क्रियतां त्वया ।
जितो यस्तु पुनर्वापि न वैरमथ वा ध्रुवम् ॥
ब्रह्मोवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्या मातुश्चैव गणेश्वरः ।
आनन्दं परमं प्राप बलं भूरि महोन्नतिम् ॥
बद्धकक्षस्तथोष्णीषं बद्ध्वा जंघोरु संस्पृशन् ।
उवाच तान् गणान् सर्वान् निर्भयं वचनं मुदा ॥
गणेश उवाच
अहं च गिरिजासूनुर्यूयं शिवगणास्तथा ।
उभये समतां प्राप्ताः कर्तव्यं क्रियतां पुनः ॥
भवन्तो द्वारपालाश्च द्वारपोऽहं कथं न हि ।
भवन्तश्च स्थितास्तत्राऽहं स्थितोऽत्रेति निश्चितम् ॥
भवद्भिश्च स्थितं ह्यत्र यदा भवति निश्चितम् । तदा भवद्भिः कर्त्तव्यं शिवाज्ञापरिपालनम् ॥ इदानीं तु मया चात्र शिवाज्ञापरिपालनम् । सत्यं च क्रियते वीरा निर्णीतं मे यथोचितम् ॥ ब्रह्माजी बोले- आश्चर्य है कि वे ४० पार्वती शिवेच्छासे क्षणभर वहाँ रुक गयीं और सती ४१ मानिनी होकर अपने मनमें कहने लगीं ॥ ४०-४१ वे शिवा बोलीं- अहो, यह बड़े आश्चर्यकी ॥ बात है कि शिवके गण क्षणमात्र भी रुक नहीं सके ४२ इस प्रकार प्रवेशका हठ उन लोगोंने कैसे ठान लिया ॥ अब इस निमित्त उनसे विनय अथवा अन्य उपाय करना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है । जो होना होगा, वही होगा, मैंने जो कर दिया है, उसे अन्यथा कैसे ४३ कर सकती हूँ । ऐसा कहकर प्रिया पार्वतीने अपनी सखीको वहाँ भेजा ॥ ४२-४३ ॥ वह सखी आकर पार्वतीपुत्र गणेशसे प्रिया ४४ पार्वतीद्वारा कही गयी बात कहने लगी- ॥४४ ॥
सखी बोली- हे भद्र! तुमने बहुत अच्छा किया, ये लोग अब हठपूर्वक घरमें प्रवेश न करें । ४५ तुम्हारे सामने ये गण क्या हैं? जो कि तुम्हारे - जैसे गणको जीत लें ॥ ४५ ॥
करनेयोग्य अथवा न करनेयोग्य ४६ हो, तुम उसे अवश्य करना । जो एक जायगा, वह फिर वैर नहीं करेगा ॥ ब्रह्माजी बोले- उस सखीके माताके वचनको सुनकर गणेश्वरको ४७ बल तथा महान् उत्साह प्राप्त हुआ उन्होंने अच्छी तरहसे कमर जो भी कर्तव्य बार जीत लिया ४६ ॥ द्वारा कहे गये परम आनन्द, ॥ ४७ ॥।
कस ली और ४८ पगड़ी बाँधकर ऊरु तथा जंघापर ताल ठोकते हुए | निडर होकर उन सभी गणोंसे प्रसन्नतापूर्वक यह वचन कहा— ॥ ४८ ॥
गणेशजी बोले- मैं पार्वतीका पुत्र हूँ, तुमलोग शिवके गण हो, दोनों ही समान हैं, [ हम सभी ] ४ ९ अपने - अपने कर्तव्यका पालन करें ॥ ४ ९ ॥ सकते हैं, मैं क्या आप लोग ही द्वारपाल रह ५० द्वारपाल नहीं रह सकता? यदि आपलोग शिवके द्वारपर स्थित हैं, तो मैं भी यहाँ निश्चित रूपसे स्थित हूँ ॥ ५० ॥
जब आपलोग यहाँ स्थित रहियेगा, तब आपलोग यहाँ ५१ शिवकी आज्ञाका पालन कीजियेगा । इस समय तो मैं पार्वतीकी हूँ । हे वीरो! यह आज्ञाका पालन कर रहा ५२ । सत्य है; मैंने उचित निर्णय लिया है ॥ ५१-५२ ॥
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अ ० १४ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड )
तस्माच्छिवगणाः सर्वे वचनं शृणुतादरात् ।
हठाद्वा विनयाद्वा न गंतव्यं मन्दिरे पुनः ॥
ब्रह्मोवाच इत्युक्तास्ते गणेनैव सर्वे ते लज्जिता गणाः । ययुः शिवांतिकं तं वै नमस्कृत्य पुरः स्थिताः स्थित्वा न्यवेदयन्सर्वे वृत्तान्तं च तदद्भुतम् । करौ बद्ध्वा नतस्कंधाः शिवं स्तुत्वा पुरः स्थिताः
तत्सर्वं तु तदा श्रुत्वा वृत्तं तत्स्वगणोदितम् ।
लौकिकीं वृत्तिमाश्रित्य शंकरो वाक्यमब्रवीत् ॥
शंकर उवाच श्रूयतां च गणाः सर्वे युद्धं योग्यं भवेन्न हि । यूयं चात्रास्मदीया वै स च गौरीगणस्तथा
विनयः क्रियते चेद्वै वश्यः शंभुः स्त्रिया सदा ।
इति ख्यातिर्भवेल्लोके गर्हिता मे गणा ध्रुवम् ॥
कृते चैवात्र कर्तव्यमिति नीतिर्गरीयसी ।
एकाकी स गणो बालः किं करिष्यति विक्रमम् ॥
भवन्तश्च गणा लोके युद्धे चातिविशारदाः ।
मदीयाश्च कथं युद्धं हित्वा यास्यथ लाघवम् ॥
स्त्रियाऽऽग्रहः कथं कार्यो पत्युरग्रे विशेषतः ।
कृत्वा सा गिरिजा तस्य नूनं फलमवाप्स्यति ॥
तस्मात्सर्वे च मद्वीराः शृणुतादरतो वचः ।
कर्त्तव्यं सर्वथा युद्धं भावि यत्तद्भवत्विति ॥
ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा शंकरो ब्रह्मन् नानालीलाविशारदः । | विरराम मुनिश्रेष्ठ दर्शयँल्लौकिकीं गतिम् ॥ ७ ९ ५ इसलिये हे शिवगणो! आपलोग मेरा वचन ५३ आदरपूर्वक सुन लें, हठसे अथवा विनयसे आपलोगोंको घरके भीतर नहीं जाना चाहिये ॥५३ ॥
ब्रह्माजी बोले- गणेश्वरके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे सभी शिवगण लज्जित होकर शिवके पास ॥ ५४ गये और उन्हें प्रणामकर उनके आगे खड़े हो गये ॥ ५४ ॥
खड़े होकर उनलोगोंने वह सारा अद्भुत वृत्तान्त ॥ ५५ शिवजीसे निवेदन किया । इसके बाद फिर हाथ जोड़कर सिर झुकाये हुए वे शिवजीकी स्तुतिकर उनके आगे खड़े हो गये । तब अपने गणोंके द्वारा कहे गये उस ५६ समाचारको सुनकर शिवजी लौकिक व्यवहारका आश्रय लेकर यह वचन कहने लगे - ॥ ५५-५६ ॥ शंकर बोले — हे समस्त गणो! सुनो, युद्ध करना भी उचित नहीं है, क्योंकि तुमलोग हमारे गण ॥ ५७ हो और वह बालक पार्वतीका गण है । हे गणो! यदि नम्रता प्रदर्शित की जाय, तो संसारमें मेरी यह ५८ निन्दनीय प्रसिद्धि होगी कि शिवजी सदा स्त्रीके वशमें रहते हैं और शिवके गण निर्बल हैं । जो जैसा करे, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये - यही नीति ५ ९ सर्वश्रेष्ठ है । वह अकेला बालक गण क्या पराक्रम करेगा? ॥ ५७ – ५ ९ ॥ तुम सब मेरे गण हो और युद्धमें अत्यन्त कुशल ६० हो, अतः युद्ध छोड़कर तुमलोग लघुताको कैसे प्राप्त होओगे, विशेषरूपसे पतिके आगे स्त्रीको हठ कैसे करना चाहिये । हठ करके वह पार्वती उसका फल ६१ अवश्य प्राप्त करेगी । इसलिये हे वीरो! तुम सब मेरी बात आदरपूर्वक सुनो, तुम लोग अवश्य युद्ध करो, ६२ जो होनहार है, वह तो होकर ही रहेगा ॥ ६०-६२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन्! हे मुनिश्रेष्ठ! अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेमें प्रवीण शंकरजी ऐसा कहकर लौकिक गति प्रदर्शित करते हुए चुप ६३ | हो गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणविवादवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणविवादवर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
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७ ९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ अथ पञ्चदशोऽध्यायः गणेश तथा शिवगणोंका भयंकर युद्ध, पार्वतीद्वारा दो शक्तियोंका प्राकट्य, शक्तियोंका अद्भुत पराक्रम ब्रह्मोवाच
इत्युक्ता विभुना तेन निश्चयं परमं गताः ।
सन्नद्धास्तु तदा तत्र जग्मुश्च शिवमन्दिरम् ॥ १
गणेशोऽपि तथा दृष्ट्वा ह्यायातान्गणसत्तमान् ।
युद्धाऽऽटोपं विधायैव स्थितां श्चैवाब्रवीदिदम् ॥ २
गणेश उवाच
आयान्तु गणपाः सर्वे शिवाज्ञापरिपालकाः ।
अहमेकश्च बालश्च शिवाज्ञापरिपालकः ॥ ३
तथापि पश्यतां देवी पार्वती सूनुजं बलम् ।
शिवश्च स्वगणानां तु बलं पश्यतु वै पुनः ॥ ४
बलवद्वालयुद्धं च भवानीशिवपक्षयोः ।
भवद्भिश्च कृतं युद्धं पूर्वं युद्धविशारदैः ॥
मया पूर्वं कृतं नैव बालोऽस्मि क्रियतेऽधुना ।
तथापि भवतां लज्जा गिरिजाशिवयोरिह ॥ ६
ममैवं तु भवेन्नैव वैपरीत्यं भविष्यति ।
ममैव भवतां लज्जा गिरिजाशिवयोरिह ॥ ७
एवं ज्ञात्वा च कर्त्तव्यः समरश्च गणेश्वराः ।
भवद्भिः स्वामिनं दृष्ट्वा मया च मातरं तदा ॥ ८
क्रियते कीदृशं युद्धं भवितव्यं भवत्विति ।
तस्य वै वारणे कोऽपि न समर्थस्त्रिलोकके ॥ ९
| ब्रह्मोवाच
इत्येवं भसितास्ते तु दंडभूषितबाहवः ।
विविधान्यायुधान्येवं धृत्वा ते च समाययुः ॥ १० ।
घर्षयन्तस्तथा दंतान् हुंकृत्य च पुनः पुनः ।
पश्य पश्य ब्रुवन्तश्च गणास्ते समुपागताः ।
॥ ११
और शिवका कुपित होना ब्रह्माजी बोले – जब सर्वव्यापक शिवजी अपने गणोंसे इस प्रकार कहा, तब उन्होंने युद्धका निश्चय कर लिया और कवच आदि धारणकर वै शिवजीके भवनके समीप गये । आये हुए उन श्रेष्ठ गणोंको देखकर युद्धकी तैयारी करके गणेशजी भी वहाँ स्थित गणोंसे यह कहने लगे - ॥१-२ ॥ गणेशजी बोले- शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले आप सब गण आयें, मैं अकेला बालक होते हुए भी [ अपनी माता ] पार्वतीकी आज्ञाका पालन करूँगा । तथापि आज देवी पार्वती अपने पुत्रका बल देखें और शंकर अपने गणोंका बल देखें ॥ ३-४ ॥ भवानीके पक्षसे इस बालकका तथा शिवके पक्षसे बलवान् गणोंके बीच आज युद्ध होगा । युद्धमें विशारद आप सभी गण पूर्वकालमें अनेक युद्ध कर चुके हैं, मैं तो अभी बालक हूँ, मैंने कभी युद्ध नहीं किया है, किंतु आज युद्ध करूँगा । फिर भी शिव-पार्वतीके इस युद्धमें हार जानेपर आप सभीको ही लज्जित होना पड़ेगा, बालक होनेके कारण मुझे हार या जीतकी लाज नहीं है, इस युद्धका फल भी मेरे विपरीत ही होगा । मेरी तथा आपलोगोंकी लाज भवानी तथा शंकरकी लाज है ॥ ५–७ ॥ हे गणेश्वरो! ऐसा समझकर ही युद्ध कीजिये । आपलोग अपने स्वामीकी ओर देखकर तथा मैं अपनी माताकी ओर देखकर यह युद्ध करूँगा ॥८ ॥
नहीं यह युद्ध कैसा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती, इसे रोकनेमें इस त्रिलोकीमें कोई भी समर्थ नहीं होगा । जो होनहार है, वह भी होकर ही रहेगा ॥ ९ ॥
ब्रह्माजी बोले- - जब गणेशने शिवजीके गणोंको इस प्रकार फटकारा, तब वे शिवगण भी हाथोंमें दण्ड तथा अन्य आयुध लेकर आ गये । दाँत कटकटाते हुए हुंकार करते हुए और ' देखो - देखो ' ऐसा बारंबार बोलते हुए वे गण आ गये ॥ १०-११ ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता (
नंदी प्रथममागत्य धृत्वा पादं व्यकर्षयत् ।
धावन्भृंगी द्वितीयं च पादं धृत्वा गणस्य च ॥ १२
यावत्पाद विकर्षन्तौ तावद्धस्तेन वै गणः ।
आहत्य हस्तयोस्ताभ्यामुत्क्षिप्तौ पादकौ स्वयम् ॥ १३
अथ देवीसुतो वीरस्संगृह्य परिघं बृहत् ।
द्वारस्थितो गणपति: सर्वानापोथयत्तदा ॥ १४
केषांचित्पाणयो भिन्नाः केषांचित्पृष्ठकानि च ।
केषांचिच्च शिरांस्येव केषांचिन्मस्तकानि च ॥ १५
केषांचिज्जानुनी तत्र केषांचित्स्कंधकास्तथा ।
केषाञ्चिज्जानुनी तत्र केषाञ्चित्स्कन्धास्तथा ।
सम्मुखे चागता ये वै ते सर्वे हृदये हताः ॥ १६
केचिच्च पतिता भूमौ केचिच्च विदिशो गताः ।
केषांचिच्चरणौ छिन्नौ केचिच्छर्वान्तिकं गताः ॥ १७
तेषां मध्ये तु कश्चिद्वै संग्रामे सम्मुखो न हि ।
सिंहं दृष्ट्वा यथा यांति मृगाश्चैव दिशो दश ॥ १८
तथा ते च गणाः सर्वे गताश्चैव सहस्त्रशः ।
परावृत्य तथा सोऽपि सुद्वारि समुपस्थितः ॥ १ ९
कल्पांतकरणे कालो दृश्यते च भयंकरः ।
यथा तथैव दृष्टः स सर्वेषां प्रलयंकरः ॥ २०
एतस्मिन्समये चैव सरमेशसुरेश्वराः ।
प्रेरिता नारदेनेह देवाः सर्वे समागमन् ॥ २१
समब्रुवंस्तदा सर्वे शिवस्य हितकाम्यया ।
पुरः स्थित्वा शिवं नत्वा ह्याज्ञां देहि प्रभो इति ॥ २२
त्वं परब्रह्म सर्वेशः सर्वे च तव सेवकाः ।
सृष्टेः कर्ता सदा भर्ता संहर्ता परमेश्वरः ॥ २३
रजस्सत्त्वतमोरूपो लीलया निर्गुणः स्वतः ।
का लीला रचिता चाद्य तामिदानीं वद प्रभो ॥ २४
ब्रह्मोवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां मुनिश्रेष्ठ महेश्वरः ।
गणान् भिन्नस्तदा दृष्ट्वा तेभ्यस्सर्वं न्यवेदयत् ॥ २५
अथ सर्वेश्वरस्तत्र शंकरो मुनिसत्तम । विहस्य गिरिजानाथो ब्रह्माणं मामुवाच ह ॥ २६ कुमारखण्ड ) ७ ९ ७ सर्वप्रथम नन्दीने आकर गणेशका एक पैर खींचा, उसके बाद दौड़ते हुए भृंगी आकर उसका दूसरा पैर पकड़कर खींचने लगा । जबतक वे दोनों उसके पैर घसीट रहे थे, तबतक उस गणेशने अपने हाथोंसे प्रहारकर अपने पैर छुड़ा लिये ॥ १२-१३ ॥ इसके बाद देवीपुत्र गणेश्वरने एक बड़ा परिघ लेकर द्वारपर स्थित हो सभी गणोंको मारना आरम्भ किया । इससे किन्हींके हाथ टूट गये, किन्हींकी पीठ फट गयी, किन्हींके सिर फूट गये और किन्हींके मस्तक कट गये । कुछ गणोंके जानु तथा कुछके कन्धे टूटकर अलग हो गये । जो लोग सामने आये, उन लोगोंके हृदयपर प्रहार किया गया । कुछ पृथ्वीपर गिरे, कुछ ऊर्ध्व दिशाओंमें जा गिरे, कुछके पैर टूट गये और कुछ शिवजीके समीप जा गिरे ॥ १४ – १७ ॥ उनमें कोई भी ऐसा गण नहीं था, जो संग्राममें गणेशके सामने दिखायी पड़े । जैसे सिंहको देखकर मृग दसों दिशाओंमें भाग जाते हैं, उसी प्रकार वे हजारों गण भाग गये और वे गणेश पुनः लौटकर द्वारपर स्थित हो गये । जिस प्रकार कल्पान्तके समय काल भयंकर दिखायी पड़ता है, उसी प्रकार उन सभीने गणेशको [ कालके समान ] प्रलयंकारी देखा॥१८–२० ॥ इसी बीच नारदजीसे प्रेरित होकर विष्णु, इन्द्रसहित सभी देवता वहाँ पहुँच गये ॥२१ ॥
तब शिवजीकी हितकामनासे उन लोगोंने शिवको नमस्कारकर उनके आगे खड़े होकर कहा— हे प्रभो! हमें आज्ञा दीजिये । आप परब्रह्म सर्वेश हैं और हम सब आपके सेवक हैं, आप सृष्टिके कर्ता, भर्ता और संहर्ता परमेश्वर हैं । आप स्वयं निर्गुण होते हुए भी अपनी लीलासे सत्त्व, रज तथा तमरूप हैं । हे प्रभो! आपने इस समय कौन - सी लीला प्रारम्भ की है, उसे हमें बताइये ॥ २२–२४ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! उनका यह वचन सुनकर महेश्वरने [ अपने ] घायल गणोंकी ओर देखकर उनसे सब कुछ कहा । इसके बाद हे मुनिसत्तम! पार्वतीपति सर्वेश्वर शंकर हँसकर । मुझ ब्रह्मासे कहने लगे- ॥ २५-२६ ॥
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७ ९ ८ शिव उवाच ब्रह्मञ्छृणु मम द्वारि बाल एकः समास्थितः महाबल यष्टिपाणिर्गेहावेशनिवारकः महाप्रहारकर्ताऽसौ मत्पार्षदविघातकः पराजयः कृतस्तेन मद्गणानां बलादिह ब्रह्मन् त्वयैव गंतव्यं प्रसाद्योऽयं महाबलः यथा ब्रह्मन्नयः स्याद्वै तथा कार्य त्वया विधे ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य प्रभोर्वाक्यमज्ञात्वाऽज्ञानमोहितः तदीयनिकटं तात सर्वैर्ऋषिवरैरयाम् समायान्तं च मां दृष्ट्वा स गणेशो महाबली क्रोधं कृत्वा समभ्येत्य मम श्मश्रूण्यवाकिरत् ॥ क्षम्यतां क्षम्यतां देव न युद्धार्थं समागतः ब्राह्मणोऽहमनुग्राह्यः शांतिकर्तानुपद्रवः इत्येवं ब्रुवति ब्रह्मंस्तावत्परिघमाददे स गणेशो महावीरो बालोऽबालपराक्रमः गृहीतपरिघं दृष्ट्वा तं गणेशं महाबलम् । पलायनपरो यातस्त्वहं द्रुततरं तदा यात यात ब्रुवन्तस्ते परिघेन हतास्तदा स्वयं च पतिताः केचित्केचित्तेन निपातिताः केचिच्च शिवसामीप्यं गत्वा तत्क्षणमात्रतः शिवं विज्ञापयाञ्चक्रुस्तद्वृत्तान्तमशेषतः तथाविधांश्च तान् दृष्ट्वा तद्वृत्तान्तं निशम्य सः अपारमादधे कोपं हरो लीलाविशारदः ॥ इंद्रादिकान्देवगणान् षण्मुखप्रवरान् गणान् । भूतप्रेतपिशाचांश्च सर्वानादेशयत्तदा
ते सर्वे च यथायोग्यं गतास्ते सर्वतो दिशम् ।
तंगणं हंतुकामा हि शिवाज्ञप्ता उदायुधाः ॥
यस्य यस्यायुधं यच्च तत्तत्सर्वं विशेषतः ।
तद् गणेशोपरि बलात्समागत्यविमोचितम् ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! सुनिये मेरे , द्वारपर । । एक महाबली बालक हाथमें लाठी लिये हुए खड़ा ॥ २७ वह सबको घरमें जानेसे रोकता है । वह भयंकर है, प्रहार । । करनेवाला है, उसने मेरे पार्षदोंको मार गिराया है और ॥ २८ मेरे गणोंको बलपूर्वक पराजित कर दिया है ॥। २७-२८ ॥ । हे ब्रह्मन्! आप ही वहाँ जायँ और इस ॥ २ ९ महाबलीको प्रसन्न करें । हे ब्रह्मन्! हे विधे! जैसी नीति हो, वैसा व्यवहार करें ॥ २ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे तात! शिवजीके इस वचनको । सुनकर विशेष बातको न जानकर अज्ञानसे मोहित ॥ ३० हुआ मैं सभी ऋषियोंके साथ उसके पास गया ॥ ३० ॥
। वह महाबली गणेश मुझे आते हुए देखकर ३१ क्रोध करके मेरे सन्निकट आकर मेरी दाढ़ी उखाड़ने लगा ॥ ३१ ॥
। हे देव! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये, मैं ॥ ३२ यहाँ युद्धके लिये नहीं आया हूँ । मैं तो ब्राह्मण हूँ, मुझपर कृपा कीजिये, मैं उपद्रवरहित हूँ तथा शान्ति करनेवाला हूँ ॥३२ ॥
। अभी मैं ऐसा कह ही रहा था, तभी हे नारद! ॥ ३३ युवाके समान पराक्रमी महावीर उस बालक गणेशने हाथमें परिघ ले लिया ॥३३ ॥
तब उस महाबली गणेशको परिघ धारण किये ॥ ३४ हुए देखकर मैं शीघ्रतासे भाग गया । मेरे साथके लोग । कहने लगे — यहाँसे भागो, भागो, इतनेमें ही उसने ॥ ३५ उन्हें परिघसे मारना प्रारम्भ कर दिया, जिससे कुछ । तो स्वयं गिर गये और कुछको उसने मार गिराया । ॥ ३६ कुछ लोग उसी क्षण शिवजीके समीप जाकर पूर्णरूपसे उस वृत्तान्तको शिवजीसे कहने लगे ॥३४-३६ ॥ । उन्हें वैसा देखकर और उस घटनाको सुनकर लीला-३७ विशारद शिवजीको अपार क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ ३७ ॥
तब उन्होंने इन्द्रादि देवगणों, कार्तिकेय आदि प्रमुख ॥ ३८ गणों, भूतों, प्रेतों एवं पिशाचोंको आज्ञा दी ॥ ३८ ॥
शिवजीके द्वारा आदिष्ट वे लोग यथायोग्य ३ ९ हाथोंमें आयुध लिये हुए उस गणको मारनेकी इच्छासे | सभी दिशाओंमें गये और जिस - जिसका जो विशेष | अस्त्र था, उन - उन अस्त्रोंसे बलपूर्वक बालक गणेशपर ४० प्रहार करने लगे ॥ ३ ९ -४० ॥
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अ ० १५ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड )
हाहाकारो महानासीत् त्रैलोक्ये सचराचरे ।
त्रिलोकस्था जनाः सर्वे संशयं परमं गताः ॥
न यातं ब्रह्मणोऽप्यायुर्ब्रह्मांडं क्षयमेति हि ।
अकाले च तथा नूनं शिवेच्छावशतः स्वयम् ॥
ते सर्वे चागतास्तत्र षण्मुखाद्याश्च ये पुनः ।
देवा व्यर्थायुधा जाता आश्चर्यं परमं गताः ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी जगदम्बा विबोधना ।
ज्ञात्वा तच्चरितं सर्वमपारं क्रोधमादधे ॥
शक्तिद्वयं तदा तत्र तया देव्या मुनीश्वर ।
निर्मितं स्वगणस्यैव सर्वसाहाय्यहेतवे ॥
एका प्रचंडरूपं च धृत्वातिष्ठन्महामुने ।
श्यामपर्वतसंकाशं विस्तीर्य मुखगह्वरम् ॥
एका विद्युत्स्वरूपा च बहुहस्तसमन्विता ।
भयंकरा महादेवी दुष्टदंडविधायिनी ॥
आयुधानि च सर्वाणि मोचितानि सुरैर्गणैः ।
गृहीत्वा स्वमुखे तानि ताभ्यां शीघ्रं च चिक्षिपे ॥
देवायुधं न दृश्येत परिघः परितः पुनः ।
एवं ताभ्यां कृतं तत्र चरितं परमाद्भुतम् ॥
एको बालोऽखिलं सैन्यं लोडयामास दुस्तरम् ।
यथा गिरिवरेणैव लोडितः सागरः पुरा ॥
एकेन निहताः सर्वे शक्राद्या निर्जरास्तथा ।
शंकरस्य गणाश्चैव व्याकुला अभवंस्तदा ॥
अथ सर्वे मिलित्वा ते निःश्वस्य च मुहुर्मुहुः । परस्परं समूचुस्ते तत्प्रहारसमाकुलाः ॥ किं देवगणा ऊचुः कर्तव्यं क्व गंतव्यं न ज्ञायन्ते दिशो दश । परिघं भ्रामयत्येष सव्यापसव्यमेव च ॥ ७ ९९ उस समय चराचरसहित त्रिलोकीमें हाहाकार ४१ मच गया और तीनों लोकोंमें रहनेवाले सभी लोग अत्यन्त संशयमें पड़ गये ॥४१ ॥
[ वे आश्चर्यचकित हो कहने लगे कि ] अभी ४२ ब्रह्माकी आयु समाप्त नहीं हुई है, तब इस ब्रह्माण्डका नाश कैसे हो रहा है? निश्चय ही यह शिवकी इच्छा है, जो अकालमें ही ऐसा हो रहा है । उस समय कार्तिकेय आदि जितने भी देवता थे, वे सभी वहाँ ४३ आये और उन सभीके शस्त्र व्यर्थ हो गये, जिसके कारण वे आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ४२-४३ ॥ इसी बीच ज्ञानदायिनी देवी जगदम्बा उस ४४ सम्पूर्ण घटनाको जानकर अपार क्रोधमें भर गयीं ॥ ४४ ॥
हे मुनीश्वर! उस समय वहाँपर उन देवीने अपने ४५ गणकी सब प्रकारकी सहायताके लिये दो शक्तियोंका निर्माण किया । हे महामुने! जिसमें एक प्रचण्ड रूप धारणकर काले पहाड़की गुफाके समान मुख फैलाकर ४६ खड़ी हो गयी और दूसरी बिजलीके समान रूप धारण करनेवाली, बहुत हाथोंवाली तथा दुष्टोंको दण्ड ४७ देनेवाली भयंकर महादेवी थी॥४५–४७ ॥ उन दोनों शक्तियोंने देवताओंके द्वारा छोड़े गये ४८ समस्त आयुध पकड़कर बड़ी शीघ्रतासे अपने मुखमें डाल लिये । उस समय किसी देवताका एक भी शस्त्र वहाँ नहीं दिखायी दे रहा था, केवल चारों ओर ४ ९ गणेशका परिघ ही दिखायी पड़ा । इस प्रकार उन दोनोंने वहाँ अत्यन्त अद्भुत चरित्र किया ॥ ४८-४९ ॥ पूर्व समयमें जिस प्रकार गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलने ५० क्षीरसागरका मन्थन किया था, उसी प्रकार अकेले उस बालकने समस्त दुस्तर देवसेनाको मथ डाला ॥ ५० ॥
तब अकेले गणेशके द्वारा मारे - पीटे गये इन्द्रादि देवगण तथा शिवगण व्याकुल हो गये । इसके ५१ बाद गणेशके प्रहारसे व्याकुल हुए वे सभी एकत्रित होकर बारंबार श्वास छोड़ते हुए आपसमें कहने ५२ ॥ लगे - ॥ ५१-५२ ॥ देवगण बोले- अब क्या करना चाहिये और कहाँ जाना चाहिये? दसों दिशाओंका ज्ञान ही नहीं हो रहा है । यह बालक तो दायें - बायें परिघ ५३ | घुमा रहा है ॥५३ ॥
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८०० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ ब्रह्मोवाच
एतत्कालेऽप्सरः श्रेष्ठाः पुष्पचन्दनपाणयः ।
ऋषयश्च त्वदाद्या हि येऽतियुद्धेऽतिलालसाः ॥ ५४
ते सर्वे च समाजग्मुर्युद्धसंदर्शनाय वै ।
पूरितो व्योम सन्मार्गस्तैस्तदा मुनिसत्तम ॥ ५५
तास्ते दृष्ट्वा रणं तं वै महाविस्मयमागताः ।
ईदृशं परमं युद्धं न दृष्टं चैकदापि हि ॥ ५६
पृथिवी कंपिता तत्र समुद्रसहिता तदा ।
पर्वताः पतिताश्चैव चक्रुः संग्रामसंभवम् ॥५७
द्यौर्ग्रहर्क्षगणैघूर्णा सर्वे व्याकुलतां गताः ।
देवाः पलायिताः सर्वे गणाश्च सकलास्तदा ॥ ५८
केवलं षण्मुखस्तत्र नापलायत विक्रमी ।
महावीरस्तदा सर्वानावार्य पुरतः स्थितः ॥ ५ ९
शक्तिद्वयेन तद्युद्धे सर्वे च निष्फलीकृताः ।
सर्वास्त्राणि निकृत्तानि संक्षिप्तान्यमरैर्गणैः ॥ ६०
asa स्थिताश्च ते सर्वे शिवस्यान्तिकमागताः ।
देवाः पलायिताः सर्वे गणाश्च सकलास्तदा ॥ ६१
ते सर्वे मिलिताश्चैव मुहुर्नत्वा शिवं तदा ।
अब्रुवन्वचनं क्षिप्रं कोऽयं गणवरः प्रभो ॥६२
पुरा चैव श्रुतं युद्धमिदानीं बहुधा पुनः ।
दृश्यते न श्रुतं दृष्टमीदृशं तु कदाचन ॥ ६३
किंचिद्विचार्यतां देव त्वन्यथा न जयो भवेत् ।
त्वमेव रक्षकः स्वामिन्ब्रह्मांडस्य न संशयः ॥ ६४
ब्रह्मोवाच
इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा रुद्रः परमकोपनः ।
कोपं कृत्वा च तत्रैव जगाम स्वगणैः सह ॥ ६५
देवसैन्यं च तत्सर्वं विष्णुना चक्रिणा सह ।
समुत्सवं महत्कृत्वा शिवस्यानुजगाम ह ॥ ६६ ।
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! उसी समय | चन्दन हाथमें लिये हुए अप्सराएँ तथा नारदादि ऋषि पुष्प, जो इस महान् युद्धको देखनेकी लालसावाले थे, वे । सभी युद्ध देखनेके लिये वहाँ आये । हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय उनके द्वारा आकाशमार्ग भर गया । ५४-५५ ॥ वे अप्सराएँ तथा ऋषिगण उस युद्धको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे - इस प्रकारका युद्ध तो कभी भी देखनेमें नहीं आया ॥५६ ॥
उस समय समुद्रसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी तथा पर्वत गिरने लगे, वे संग्रामकी सूचना दे रहे थे ॥५७ ॥
आकाश, ग्रह एवं नक्षत्रमण्डल घूमने लगे, जिससे सभी व्याकुल हो उठे । सभी देवता तथा गण भाग गये । केवल पराक्रमी तथा महावीर कार्तिकेय ही नहीं भागे और सबको रोककर गणेशके सामने डटे रहे॥५८-५९ ॥ उन दोनों शक्तियोंने उस युद्धमें सभीको असफल कर दिया और देवताओंके द्वारा चलाये गये सभी शस्त्रोंको काट दिया । जो लोग शेष बच गये थे, वे सब शिवजीके समीप आ गये, सभी देवता तथा शिवगण तो भाग ही चुके थे ॥ ६०-६१ ॥ उन सभीने मिलकर शिवको बारंबार नमस्कारकर बड़ी शीघ्रतासे पूछा- हे प्रभो! यह श्रेष्ठ | गण कौन है? ॥ ६२ ॥
हमलोगोंने पहले भी युद्धका वर्णन सुना था, इस समय भी बहुत - से युद्ध देख रहे हैं, किंतु इस | प्रकारका युद्ध न तो कभी देखा गया और न सुना ही गया! ॥ ६३ ॥
हे देव! अब कुछ विचार कीजिये, अन्यथा जय नहीं हो सकती है । हे स्वामिन्! आप ही इस । ब्रह्माण्डके रक्षक हैं इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६४ ॥
, सुनकर ब्रह्माजी बोले- उनका यह वचन वहाँ | परम - क्रोधी रुद्र कोप करके अपने गणोंसहित गये ॥६५ ॥ के
विष्णु तब देवगणोंकी सेना भी चक्रधारी - पीछे | साथ महान् उत्सव करके शिवजीके पीछे गयी ॥ ६६ ॥