शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 811–820

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८०१

एतस्मिन्नंतरे भक्त्या नमस्कृत्य महेश्वरम् ।

अब्रवीन्नारद त्वं वै देवदेवं कृताञ्जलिः ॥

नारद उवाच

देवदेव महादेव शृणु मद्वचनं विभो ।

त्वमेव सर्वगस्स्वामी नानालीलाविशारदः ॥

त्वया कृत्वा महालीलां गणगर्वोऽपहारितः ।

अस्मै दत्त्वा बलं भूरि देवगर्वश्च शंकर ॥

दर्शितं भुवने नाथ स्वमेव बलमद्भुतम् ।

स्वतंत्रेण त्वया शंभो सर्वगर्वप्रहारिणा ॥

इदानीं न कुरुष्वेश तां लीलां भक्तवत्सलः ।

स्वगणानमरांश्चापि सुसन्मान्याभिवर्द्धय ॥

इमं न खेलयेदानीं जहि ब्रह्मपदप्रद ।

इत्युक्त्वा नारद त्वं वै ह्यन्तर्द्धानं गतस्तदा ॥

हे नारद! इसी बीच आपने देवदेव महेश्वरको ६७ भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर नमस्कार करके कहा – ॥ ६७ ॥

नारदजी बोले - – हे देवदेव! हे महादेव! हे विभो! मेरा वचन सुनिये, आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सबके स्वामी ६८ हैं तथा नानाविध लीलाओंको करनेमें प्रवीण हैं ॥ ६८ ॥

आपने महालीला करके गणोंके गर्वको दूर कर ६ ९ दिया । हे शंकर! आपने इनको बल देकर देवताओंके गर्वको भी नष्ट कर दिया । हे नाथ! हे शम्भो! स्वतन्त्र तथा सभीके गर्वको चूर करनेवाले आपने इस भुवनमें ७० अपना अद्भुत बल दिखाया । हे भक्तवत्सल! अब आप उस लीलाको मत कीजिये और अपने इन गणोंका ७१ तथा देवताओंका सम्मान करके इनकी रक्षा कीजिये । हे ब्रह्मपददायक! अब इन्हें अधिक मत खेलाइये और इन गणेशका वध कीजिये । हे नारद! इस प्रकार ७२ कहकर आप वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥६ ९ –७२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशयुद्धवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशयुद्धवर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः विष्णु तथा गणेशका युद्ध, शिवद्वारा त्रिशूलसे गणेशका सिर काटा जाना ब्रह्मोवाच इति श्रुत्वा महेशानो भक्तानुग्रहकारकः त्वद्वाचा युद्धकामोऽभूत्तेन बालेन नारद विष्णुमाहूय संमन्त्र्य बलेन महता युतः सामरः सम्मुखस्तस्याप्यभूद्देवस्त्रिलोचनः | देवाश्च युयुधुस्तेन शिवपदाम्बुजम् स्मृत्वा | महाबला महोत्साहाश्शिवसदृष्टिलोकिताः युयुधेऽथ हरिस्तेन महाबलपराक्रमः महादेव्यायुधो वीरः प्रवणः शिवरूपकः | यष्ट्या गणाधिपः सोऽथ जघानामरपुङ्गवान् हरिं चसहसा वीरः शक्तिदत्तमहाबलः ब्रह्माजी बोले- हे नारद! यह सुनकर भक्तोंके ऊपर कृपा करनेवाले महेश्वरने आपके कहनेसे उस । बालकके साथ युद्ध करनेकी इच्छा की ॥१ ॥

॥ १ भगवान् त्रिलोचन विष्णुको बुलाकर उनसे । मन्त्रणाकर एक बहुत बड़ी सेनासे युक्त होकर देवताओंके ॥ २ सहित उस गणेशके सम्मुख उपस्थित हुए ॥ २ ॥

। उस समय सर्वप्रथम शिवकी शुभ दृष्टिसे ॥ ३ देखे गये महाबलवान् देवता महान् उत्साहवाले शिवजीके चरण - कमलोंका ध्यान करके उसके साथ युद्धमें प्रवृत्त हुए ॥३ ॥

महाबलवान् एवं अत्यन्त पराक्रमशील भगवान् । ॥ ४ विष्णु उस बालकसे युद्ध करने लगे । तब महादेवीके द्वारा दिये गये आयुधसे युक्त वह शिवस्वरूप वीर बालक गणेश भी श्रेष्ठ देवताओंको लाठीसे मारने । लगा, शक्तिके द्वारा प्रदत्त महान् बलवाला वह सहसा ॥ ५ । विष्णुपर भी प्रहार करने लगा ॥ ४-५ ॥

पृष्ठ 812

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८०२ सर्वेऽमरगणास्तत्र विकुंठितबला मुने अभूवन् विष्णुना तेन हता यष्ट्या पराङ्मुखाः शिवोऽपि सह सैन्येन युद्धं कृत्वा चिरं मुने विकरालं च त दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः छलेनैव च हंतव्यो नान्यथा हन्यते पुनः इति बुद्धिं समास्थाय सैन्यमध्ये व्यवस्थितः शिवे दृष्टे तदा देवे निर्गुणे गुणरूपिणि विष्णौ चैवाथ संग्रामे आयाते सर्वदेवताः

गणाश्चैव महेशस्य महाहर्षं तदा ययुः ।

सर्वे परस्परं प्रीत्या मिलित्वा चक्रुरुत्सवम् ॥

अथ शक्तिसुतो वीरो वीरगत्या स्वयष्टितः ।

प्रथमं पूजयामास विष्णुं सर्वसुखावहम् ॥

अहं च मोहयिष्यामि हन्यतां च त्वया विभो । छलं विना न वध्योऽयं तामसोऽयं दुरासदः इति कृत्वा मतिं तत्र सुसंमन्त्र्य च शंभुना । आज्ञां प्राप्याऽभवच्छैवीं विष्णुर्मोहपरायणः

शक्तिद्वयं तथा लीनं हरिं दृष्ट्वा तथाविधम् ।

दत्त्वा शक्तिबलं तस्मै गणेशायाभवन्मुने ॥

शक्तिद्वयेऽथ संलीने यत्र विष्णुः स्थितः स्वयम् । परिघं क्षिप्तवांस्तत्र गणेशो बलवत्तरः

कृत्वा यत्नं किमप्यत्र वंचयामास तद्गतिम् ।

शिवं स्मृत्वा महेशानं स्वप्रभु भक्तवत्सलम् ॥

एकतस्तन्मुखं दृष्ट्वा शंकरोऽप्याजगाम ह ।

स्वत्रिशूलं समादाय सुक्रुद्धो युद्धकाम्यया ॥

स ददर्शागतं शंभुं शूलहस्तं महेश्वरम् । हन्तुकामं निजं वीरः शिवापुत्रो श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १६ । हे मुने! उसकी लाठीके प्रहारसे विष्णुसह ॥ ६ समस्त देवताओंके बल कुण्ठित हो गये और त युद्धसे पराङ्मुख हो गये ॥६ ॥

। हेमुने! शिवजी भी अपनी सेनाके सहित ॥ ७ कालतक युद्धकर उस बालकको महाभयंकर देखकर बहुत आश्चर्यचकित हो गये ॥७ ॥

। ‘ इसे छलसे ही मारा जा सकता है, अन्यथा ॥ ८ नहीं मारा जा सकता है ' – ऐसा विचारकर शिवजी सेनाओंके बीचमें स्थित हो गये ॥ ८ ॥

। उस समय निर्गुण एवं सगुण रूपवाले भगवान् ॥ ९ शंकरको तथा विष्णुको युद्धभूमिमें उपस्थित देखकर सभी देवता तथा शिवगण अत्यधिक हर्षित हुए और वे सब १० आपसमें मिलकर प्रेमपूर्वक उत्सव मनाने लगे ॥ ९ -१० ॥ तब महाशक्तिके पुत्र वीर गणेशने बड़ी बहादुरी के ११ साथ सर्वप्रथम अपनी लाठीसे सबको सुख देनेवाले विष्णुकी पूजा की अर्थात् उनपर प्रहार किया ॥११ ॥

विष्णुने शिवजीसे कहा — ‘ यह बालक बड़ा ॥ १२ तामसी है और युद्धमें दुराधर्ष है, बिना छलके इसे नहीं मारा जा सकता, अतः हे विभो! करता हूँ और आप इसका वध कीजिये ' बुद्धि करके तथा शिवसे मन्त्रणा करके ॥ १३ आज्ञा प्राप्तकर विष्णुजी [ गणेशको ] करनेमें संलग्न हो गये॥१२-१३ ॥ हे मुने! विष्णुको वैसा देखकर वे १४ गणेशको अपनी - अपनी शक्ति समर्पितकर मैं इसे मोहित इस प्रकारकी और शिवकी मोहपरायण दोनों शक्तियाँ वहीं अन्तर्धान । हो गयीं । तब उन दोनों शक्तियोंके लीन हो जानेपर | महाबलवान् गणेशने, जहाँ विष्णु स्वयं स्थित थे, ॥ १५ वहींपर अपना परिघ फेंका॥१४-१५ ॥ विष्णुने अपने प्रभु भक्तवत्सल महेश्वरका १६ स्मरणकर यत्न करके उस परिघकी गतिको विफल कर दिया ॥ १६ ॥

तब एक ओरसे उसके मखको देखकर अत्यन्त १७ कुपित हुए शिवजी भी अपना त्रिशूल लेकर युद्धकी इच्छासे वहाँ आ गये ॥ १७ ॥

तब वीर तथा महाबली शिवापुत्रने हाथमें त्रिशूल लेकर मारनेकी इच्छासे आये हुए महेश्वर महाबलः ॥ १८ शिवको देखा ॥ १८ ॥

पृष्ठ 813

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अ ० १६ ] रुद्रसंहिता (

शक्त्या जघान तं हस्ते स्मृत्वा मातृपदांबुजम् ।

स गणेशो महावीरः शिवाशक्तिप्रवर्द्धितः ॥ १ ९

त्रिशूलं पतितं हस्ताच्छिवस्य परमात्मनः ।

दृष्ट्वा सदूतिकस्तं वै पिनाकं धनुराददे ॥ २०

तमप्यपातयद्भूमौ परिघेण

परिघेण गणेश्वरः ।

हृता: पंच तथा हस्ताः पञ्चभिश्शूलमाददे ॥ २१

अहो दुःखतरं नूनं संजातमधुना मम ।

भवेत्पुनर्गणानां किं भवाचारो जगाविति ॥ २२

एतस्मिन्नन्तरे वीरः परिघेण गणेश्वरः ।

जघान सगणान् देवान् शक्तिदत्तबलान्वितः ॥ २३

गता दशदिशो देवाः सगणाः परिघार्दिताः ।

न तस्थुः समरे केऽपि तेनाद्भुतप्रहारिणा ॥२४

विष्णुस्तं च गणं दृष्ट्वा धन्योऽयमिति चाब्रवीत् ।

महाबलो महावीरो महाशूरो रणप्रियः ॥ २५

बहवो देवताश्चैव मया दृष्टास्तथा पुनः ।

दानवा बहवो दैत्या यक्षगंधर्वराक्षसाः ॥ २६

नैतेन गणनाथेन समतां यान्ति केऽपि च ।

त्रैलोक्येऽप्यखिले तेजो रूपशौर्यगुणादिभिः ॥ २७

एवं संब्रुवतेऽमुष्मै परिघं भ्रामयन् स च ।

चिक्षेप विष्णवे तत्र शक्तिपुत्रो गणेश्वरः ॥ २८

चक्रं गृहीत्वा हरिणा स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ।

तेन चक्रेण परिघो द्रुत खंडीकृतस्तदा ॥ २ ९

खंडतु परिघस्यापि हरये प्राक्षिपद्गणः ।

गृहीत्वा गरुडेनापि पक्षिणा विफलीकृतः ॥ ३०

। एवं विचरितं कालं महावीरावुभावपि ।

। विष्णुश्चापि गणश्चैव युयुधाते परस्परम् ॥ ३१

। पुनर्वीरवरः बली । कुमारखण्ड ) ८०३ तब अपनी माताके चरणकमलोंका स्मरण करके शिवाकी शक्तिसे प्रवर्धित होकर उस महावीर गणेशने शक्तिसे उनके हाथपर प्रहार किया ॥ १ ९ ॥ तब परमात्मा शिवके हाथसे त्रिशूल गिर पड़ा, यह देखकर उत्तम लीला करनेवाले शिवने अपना पिनाक नामक धनुष उठा लिया ॥२० ॥

गणेश्वरने अपने परिघसे उस धनुषको भूमिपर गिरा दिया और परिघके पाँच प्रहारोंसे उनके पाँच हाथोंको घायल कर दिया । तब शंकरने त्रिशूल ग्रहण किया और लौकिक गति प्रदर्शित करते हुए वे अपने मनमें कहने लगे — अहो! इस समय जब मुझे महान् क्लेश प्राप्त हुआ, तब गणोंकी क्या दशा हुई होगी?॥ २१-२२ ॥ इसी बीच शक्तिके द्वारा दिये गये बलसे युक्त वीर गणेशने गणोंसहित देवताओंको परिघसे मारा । तब परिघके प्रहारसे आहत गणसहित सभी देवता दसों दिशाओंमें भाग गये और अद्भुत प्रहार करनेवाले उस बालकके सामने कोई भी ठहर न सका ॥ २३-२४ ॥ विष्णु भी उस गणको देखकर बोले — यह धन्य, महाबलवान्, महावीर, महाशूर तथा रणप्रिय योद्धा है । मैंने बहुत - से देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षसोंको देखा है, किंतु सम्पूर्ण त्रिलोकीमें तेज, रूप, गुण एवं शौर्यादिमें इसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता ॥ २५–२७ ॥ विष्णु इस प्रकार कह ही रहे थे कि शिवापुत्र गणेशने अपना परिघ घुमाते हुए विष्णुपर फेंका ॥ २८ ॥

तब विष्णुने भी चक्र लेकर शिवजीके चरण-कमलका ध्यान करके उस चक्रसे परिघके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २ ९ ॥ गणेश्वरने उस परिघके टुकड़ेको लेकर विष्णुपर प्रहार किया । तब गरुड़ पक्षीने उसे पकड़कर विफल बना दिया ॥ ३० ॥

इस प्रकार बहुत समयतक विष्णु एवं गणेश्वर दोनों ही वीर परस्पर युद्ध करते रहे ॥३१ ॥

पुनः वीरोंमें श्रेष्ठ बलवान् शक्तिपुत्रने शिवका स्मरणकर अनुपम लाठी लेकर उससे विष्णुपर यष्टिमतुला शक्तिसुतः तया स्मृतशिवो विष्णुं जघान ह ॥ ३२ प्रहार किया ॥ ३२ ॥

गृहीत्वा

पृष्ठ 814

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८०४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १७

अविषह्य प्रहारं तं स भूमौ निपपात ह ।

द्रुतमुत्थाय युयुधे शिवापुत्रेण तेन वै ॥

एतदंतरमासाद्य शूलपाणिस्तथोत्तरे ।

आगत्य च त्रिशूलेन तच्छिरो निरकृंतत ॥

छिन्ने शिरसि तस्यैव गणनाथस्य नारद ।

गणसैन्यं देवसैन्यमभवच्च सुनिश्चलम् ॥

नारदेन त्वयाऽऽगत्य देव्यै सर्वं निवेदितम् ।

मानिनि श्रूयतां मानस्त्याज्यो नैव त्वयाधुना ॥

इत्युक्त्वाऽन्तर्हितस्तत्र नारद त्वं कलिप्रियः ।

अविकारी सदा शंभुर्मनोगतिकरो मुनिः ॥

विष्णु उस प्रहारको सहन करनेमें असमर्थ ३३ | होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और पुनः शीघ्रतासे उठकर उस शिवा - पुत्रसे संग्राम करने लगे ॥३३ ॥

इसी बीच अवसर पाकर पीछेसे आकर शूलपाणि ३४ शंकरने त्रिशूलसे उसका सिर काट लिया ॥ ३४ ॥

हे नारद! तब उस गणेशका सिर कट जानेपर गणोंकी ३५ सेना तथा देवगणोंकी सेना निश्चिन्त हो गयी ॥ ३५ ॥

उसके बाद आप नारदने जाकर देवीसे सब कुछ निवेदन किया और यह भी कहा — हे मानिनि! सुनिये, ३६ आप इस समय अपना मान मत छोड़ना ॥ ३६ ॥

हे नारद! इस प्रकार कहकर कलहप्रिय आप अन्तर्धान हो गये; आप विकाररहित हैं तथा शिवजीकी ३७ । इच्छाके अनुसार चलनेवाले मुनि हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशयुद्धगणेशशिरश्छेदनवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्ड में गणेशयुद्धगणेश-शिरश्छेदनवर्णन नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः पुत्रके वधसे कुपित जगदम्बाका अनेक शक्तियोंको उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको प्रसन्न करना, शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड़से जोड़कर उन्हें जीवित करना नारद उवाच

ब्रह्मन् वद महाप्राज्ञ तद् वृत्तान्तेऽखिले श्रुते ।

किमकार्षीन्महादेवी श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

ब्रह्मोवाच

श्रूयतां मुनिशार्दूल कथयाम्यद्य तद्ध्रुवम् ।

चरितं जगदंबाया यज्जातं तदनन्तरम् ॥

मृदंगान्पटहांश्चैव गणाश्चावादयंस्तथा । महोत्सवं तदा चक्रुर्हते तस्मिन्गणाधिपे ॥

शिवोऽपि तच्छिरश्छित्वा यावद्दुःखमुपाददे ।

तावच्च गिरिजा देवी चुक्रोधाति मुनीश्वर ॥

किं करोमि क्व गच्छामि हाहा दुःखमुपागतम्

कथं दुःखं विनश्येतास्याऽतिदुःखं ।

ममाधुना ॥

नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! हे महाप्राज्ञ! अब आप | मुझे बताइये कि सम्पूर्ण समाचार सुन लेनेपर महादेवीने १ क्या किया? उसे ठीक - ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ! उसके बाद | जगदम्बाका जो चरित्र हुआ, उसे अब मैं सम्पूर्ण २ रूपसे कह रहा हूँ, सुनिये ॥ २ ॥

गणाधिप उस गणेशके मार दिये जानेपर | शिवजीके गणोंने मृदंग एवं पटह बजाये तथा महान् ३ उत्सव किया ॥ ३ ॥

हे मुनीश्वर! शिवजी भी गणेशजीका ४ | शिरश्छेदनकर ज्यों ही दुखी हुए, उसी समय । गिरिजादेवी अत्यन्त क्रोधित हो गयीं ॥ ४ ॥?

उन्होंने कहा- हाय, मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ इसके । मुझे बहुत बड़ा दुःख उत्पन्न हो गया है । किस

। मरनेसे तो मुझे बड़ा क्लेश हुआ, वह दुःख ।

५ प्रकारसे दूर हो सकता है! ॥५ ॥

पृष्ठ 815

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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८०५ नाशितश्चाद्य देवैः सर्वैर्गणैस्तथा । मत्सुतो सर्वांस्तान्नाशयिष्यामि प्रलयं वा करोम्यहम् ॥

इत्येवं दुःखिता सा च शक्ती: शतसहस्रशः ।

निर्ममे तत्क्षणं क्रुद्धा सर्वलोकमहेश्वरी ॥

निर्मितास्ता नमस्कृत्य जगदंबां शिवां तदा ।

जाज्वल्यमाना ह्यवदन्मातरादिश्यतामिति ॥

तच्छ्रुत्वा शंभुशक्तिः सा प्रकृतिः क्रोधतत्परा ।

प्रत्युवाच तु ताः सर्वा महामाया मुनीश्वर ॥

देव्युवाच

हे शक्तयोऽधुना देव्यो युष्माभिर्मन्निदेशतः ।

प्रलयश्चात्र कर्त्तव्यो नात्र कार्या विचारणा ॥

देवांश्चैव ऋषींश्चैव यक्षराक्षसकांस्तथा ।

अस्मदीयान्परांश्चैव सख्यो भक्षत वै हठात् ॥

ब्रह्मोवाच

तदाज्ञप्ताश्च ताः सर्वाः शक्तयः क्रोधतत्पराः ।

देवादीनां च सर्वेषां संहारं कर्तुमुद्यताः ॥

यथा च तृणसंहारमनलः कुरुते तथा ।

एवं ताः शक्तयः सर्वाः संहारं कर्तुमुद्यताः ॥

गणपो वाथ विष्णुर्वा ब्रह्मा वा शंकरस्तथा ।

इन्द्रो वा यक्षराजो वा स्कंदो वा सूर्य एव वा ॥

सर्वेषां चैव संहारं कुर्वंति स्म निरंतरम् ।

यत्र यत्र तु दृश्येत तत्र तत्रापि शक्तयः ॥

कराली कुब्जका खंजा लंबशीर्षा ह्यनेकशः ।

हस्ते धृत्वा तु देवांश्च मुखे चैवाक्षिपंस्तदा ॥

तं संहारं तदा दृष्ट्वा हरो ब्रह्मा तथा हरिः ।

इन्द्रादयोऽखिला देवा गणाश्च ऋषयस्तथा ॥

किं करिष्यति सा देवी संहारं वाप्यकालतः ।

इति संशयमापन्ना जीवनाशा हताऽभवत् ॥

सर्वे च मिलिताश्चेमे किं कर्त्तव्यं विचिन्त्यताम् ।

एवं विचारयन्तस्ते तूर्णमूचुः परस्परम् ॥

सभी देवताओं तथा गणोंने मेरे पुत्रको मार ६ डाला है । अतः मैं उनका नाश कर दूँगी अथवा प्रलय कर दूँगी ॥ ६ ॥

इस प्रकार दुखी हुई उन सर्वलोकमहेश्वरीने ७ उसी क्षण कुपित होकर करोड़ों शक्तियोंको उत्पन्न किया ॥७ ॥

तेजसे जाज्वल्यमान उन उत्पन्न हुई शक्तियोंने ८ जगदम्बा पार्वतीको नमस्कारकर कहा — हे मातः! आज्ञा दीजिये ॥ ८ ॥

हे मुनीश्वर! यह सुनकर शम्भुकी शक्ति ९ महामाया प्रकृतिने क्रोधमें भरकर उन सभी शक्तियोंसे कहा- ॥ ९ ॥

देवी बोलीं- हे शक्तियो! हे देवियो! तुम सब मेरी आज्ञासे प्रलय कर डालो; इसमें १० विचार नहीं करना चाहिये ॥१० ॥

हे सखियो! तुमलोग देवता, ११ राक्षस और अपने तथा दूसरे सबको डालो ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले- तब पार्वतीकी वे सभी शक्तियाँ क्रोधमें भरकर देवता आप सभीको ऋषि, यक्ष, हठपूर्वक खा आज्ञा पाते ही आदि सभीका १२ संहार करनेके लिये उद्यत हो गयीं ॥१२ ॥

जिस प्रकार अग्नि तृणोंका संहार कर देती है, १३ उसी प्रकार वे समस्त शक्तियाँ भी संहार करने लगीं ॥ १३ ॥

[ शिवके ] गणाधिप, विष्णु, ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, १४ यक्षराज, स्कन्द अथवा सूर्य आदिका वे निरन्तर संहार करने लगीं । जहाँ - जहाँ दृष्टि जाती, वहाँ - वहाँ केवल १५ शक्तियाँ ही दिखायी पड़ती थीं ॥ १४-१५ ॥ उस समय कराली, कुब्जका, खंजा, लम्बशीर्षा १६ आदि अनेक शक्तियाँ देवताओंको हाथसे पकड़कर मुखमें डालने लगीं ॥१६ ॥

उस संहारको देखकर हर, ब्रह्मा, हरि तथा इन्द्रादि १७ सभी देवतागण एवं ऋषि इस सन्देहमें पड़ गये कि क्या देवी अकालमें ही प्रलय कर देंगी? इस प्रकार उनमें १८ जीवनकी आशा समाप्त - सी हो गयी ॥ १७-१८ ॥ सभी लोगोंने मिलकर कहा कि अब हमें क्या करना चाहिये - सब लोग इसपर विचार करें । इस प्रकार विचार करते हुए वे कहने लगे- ॥ १ ९ ॥ १ ९ | परस्पर

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८०६ यदा च गिरिजा देवी प्रसन्ना हि भवेदिह । तदा चैव भवेत्स्वास्थ्यं नान्यथा कोटि यत्नतः शिवोऽपि दुःखमापन्नो लौकिकीं गतिमाश्रितः । मोहयन्सकलांस्तत्र नानालीलाविशारदः

सर्वेषां चैव देवानां कटिर्भग्ना यदा तदा ।

शिवा क्रोधमयी साक्षाद् गन्तुं न पुर उत्सहेत् ॥

स्वीयो वा परकीयो वा देवो वा दानवोऽपि वा ।

गणो वापि च दिक्पालो यक्षो वा किन्नरो मुनिः ॥

विष्णुर्वापि तथा ब्रह्मा शंकरश्च तथा प्रभुः ।

न कश्चिद्गिरिजाग्रे च स्थातुं शक्तोऽभवन्मुने ॥

जाज्वल्यमानं तत्तेजः सर्वतो दाहि तेऽखिलाः ।

दृष्ट्वा भीततरा आसन् सर्वे दूरतरं स्थिताः ॥

एतस्मिन्समये तत्र नारदो दिव्यदर्शनः ।

आगतस्त्वं मुने देवगणानां सुखहेतवे ॥

ब्रह्माणं मां भवं विष्णुं शंकरं च प्रणम्य सः ।

समागत्य मिलित्वोचे विचार्य कार्यमेव वा ॥

सर्वे संमन्त्रयांचक्रुस्त्वया देवा महात्मना ।

दुःखशांतिः कथं स्याद्वै समूचुस्तत एव ते ॥

यावच्च गिरिजा देवी कृपां नैव करिष्यति ।

तावन्नैव सुखं स्याद्वै नात्र कार्या विचारणा ॥

ऋषयो हि त्वदाद्याश्च गतास्ते वै शिवान्तिकम् ।

सर्वे प्रसादयामासुः क्रोधशान्त्यै तदा शिवाम् ॥

पुनः पुनः प्रणेमुश्च स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकशः ।

सर्वे प्रसादयन्प्रीत्या प्रोचुर्देवगणाज्ञया ॥

सुरर्षय ऊचुः

जगदम्ब नमस्तुभ्यं शिवायै च नमोऽस्तु ते ।

चंडिकायै नमस्तुभ्यं कल्याण्यै च नमोऽस्तु ते ॥

आदिशक्तिस्त्वमेवाम्ब सर्वसृष्टिकरी सदा ।

त्वमेव पालिनी शक्तिस्त्वमेवप्रलयंकरी ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १७ यदि गिरिजादेवी प्रसन्न हो जायँ तो शान्ति ॥ २० हो सकती है अन्यथा करोड़ों उपायोंसे भी शान्ति सम्भव नहीं है ॥ २० ॥

अनेक प्रकारकी लीलाओंको करनेमें प्रवीण | शिवजी भी सबको मोहित करते हुए लौकिक गतिका ॥ २१ आश्रय लेकर दुःखमें पड़ गये ॥२१ ॥

किंतु सभी देवताओंकी कमर उस समय टूट गयी, जब पार्वतीके पास जानेका प्रश्न उठा । उन्होंने २२ सोचा कि पार्वती साक्षात् क्रोधकी मूर्ति हैं, कोई भी उनके सामने जानेका साहस नहीं कर सकता है ॥ २२ ॥

हे मुने! उस समय देवता, दानवगण, दिक्पाल, २३ यक्ष, किन्नर, मुनि, विष्णु, ब्रह्मा एवं महाप्रभु शंकर आदि तथा अपना - पराया कोई भी गिरिजाके सामने २४ खड़ा होनेमें समर्थ नहीं हुआ ॥ २३-२४ ॥ सभी ओरसे पार्वतीके जलते हुए उस दाहक २५ तेजको देखकर सभी लोग दूर खड़े हो गये ॥ २५ ॥

हे मुने! उसी समय दिव्य दर्शनवाले आप नारद २६ देवगणोंको सुखी करने वहाँ पहुँच गये । पास आकर मुझ ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरको प्रणामकर सबके साथ मिलकर आप कहने लगे कि सोच - विचारकर ही कोई २७ काम करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥ उसके बाद सभी देवताओंने आप महात्माके २८ साथ मन्त्रणा की कि इस दुःखकी शान्ति किस प्रकार होगी; इसके बाद उन्होंने कहा — जबतक गिरिजादेवी कृपा नहीं करेंगी, तबतक दुःखकी शान्ति सम्भव नहीं २ ९ है, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ उसके बाद सभी ऋषि आपको साथ लेकर ३० पार्वतीके पास गये और क्रोध शान्त करनेके लिये शिवाको प्रसन्न करने लगे ॥ ३० ॥

सभीने बारम्बार प्रणाम किया और अनेक ३१ स्तोत्रोंसे स्तुति करके उन्हें प्रसन्न करते हुए देवगणोंकी आज्ञासे प्रेमपूर्वक कहा- ॥३१ ॥

देवर्षि बोले- हे जगदम्ब! आपको नमस्कार है, आप शिवाको नमस्कार है, आप चण्डिकाको ॥ ३२ नमस्कार है, आप कल्याणीको नमस्कार है ॥ ३२ हे अम्ब! आप ही आदिशक्ति हैं, आप ह | सर्वदा सृष्टि करनेवाली पालन करनेवाली तथा प्रलय ३३ करनेवाली शक्ति हैं ॥ ३३ , ॥

पृष्ठ 817

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 817 का मूल पृष्ठ
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अ ० १७ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८०७

प्रसन्ना भव देवेशि शांतिं कुरु नमोऽस्तु ते ।

सर्वं हि विकलं देवि त्रिजगत्तव कोपतः ॥

ब्रह्मोवाच

एवं स्तुता परा देवी ऋषिभिश्च त्वदादिभिः ।

क्रुद्धदृष्ट्या तदा तांश्च किंचिन्नोवाच सा शिवा ॥

तदा च ऋषयः सर्वे नत्वा तच्चरणाम्बुजम् ।

पुनरूचुश्शिवां ' भक्त्या कृतांजलिपुटाः शनैः ॥

ऋषय ऊचुः क्षम्यतां क्षम्यतां देवि संहारो जायतेऽधुना । तव स्वामी स्थितश्चात्र पश्य पश्य तमम्बिके ।

वयं के च इमे देवा विष्णुब्रह्मादयस्तथा ।

प्रजाश्च भवदीयाश्च कृतांजलिपुटाः स्थिताः ॥

क्षंतव्यश्चापराधो वै सर्वेषां परमेश्वरि ।

सर्वे हि विकलाश्चाद्य शांतिं तेषां शिवे कुरु ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा ऋषयः सर्वे सुदीनतरमाकुलाः ।

संतस्थिरे चंडिकाग्रे कृतांजलिपुटास्तदा ॥

एवं श्रुत्वा वचस्तेषां प्रसन्ना चंडिकाऽभवत् ।

प्रत्युवाच ऋषींस्तान्वै करुणाविष्टमानसा ॥

देव्युवाच

मत्पुत्रो यदि जीवेत तदा संहरणं न हि ।

यथा हि भवतां मध्ये पूज्योऽयं च भविष्यति ॥

सर्वाध्यक्षो भवेदद्य यूयं कुरुत तद्यदि ।

तदा शांतिर्भवेल्लोके नान्यथा सुखमाप्स्यथ ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्तास्ते तदा सर्वे ऋषयो युष्मदादयः ।

तेभ्यो देवेभ्य आगत्य सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥

ते च सर्वे तथा शंकराय न्यवेदयन् । श्रुत्वा त्वा प्रांजलयो दीनाः शक्रप्रभृतयः सुराः हे देवेशि! आप प्रसन्न हों, शान्ति कीजिये । ३४ आपको नमस्कार है, हे देवि! आपके क्रोधसे सारा त्रैलोक्य विकल हो रहा है ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार आप सभी ऋषियोंने मिलकर पराम्बाकी स्तुति की, तब भी क्रोधपूर्ण ३५ दृष्टिसे उनकी ओर देखती हुई उन शिवाने कुछ भी नहीं कहा ॥३५ ॥

पुनः सभी ऋषियोंने उनके चरणकमलको ३६ नमस्कारकर परम भक्तिसे हाथ जोड़कर धीरेसे शिवासे कहा- ॥ ३६ ॥

ऋषिगण बोले – हे देवि! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये । इस समय प्रलय होना चाहता है । है अम्बिके! ३७ आपके स्वामी यहींपर स्थित हैं, देखिये, देखिये ॥ ३७ ॥

हम कौन हैं? ये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता कौन ३८ हैं? वस्तुतः हम सब आपकी प्रजाएँ हैं और हाथ जोड़कर खड़े हैं ॥३८ ॥

हे परमेश्वरि! हम सभीका अपराध क्षमा ३ ९ कीजिये । हे शिवे! सभी लोग व्याकुल हैं, अतः । इनकी शान्ति कीजिये ॥ ३ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर सभी ऋषिगण अत्यन्त दीनतासे व्याकुल हो अम्बिकाके सामने हाथ ४० जोड़े हुए खड़े रहे ॥ ४० ॥

इस प्रकार उनका वचन सुनकर चण्डिका ४१ प्रसन्न हो गयीं और करुणार्द्रचित्त हो ऋषियोंसे कहने लगीं - ॥ ४१ ॥

देवी बोलीं- यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाय और तुमलोगोंके बीच प्रथम पूज्य हो, तो यह संहार नहीं होगा । ४२ यह आजसे सबका अध्यक्ष हो जाय और यदि तुमलोग उसे ऐसा कर दो तो लोकमें शान्ति हो सकती है अन्यथा ४३ तुमलोगोंको सुखकी प्राप्ति नहीं होगी ॥ ४२-४३ ॥ ब्रह्माजी बोले- [ भगवतीके द्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर आप सभी ऋषियोंने आ करके देवगणोंके समीप जाकर उन देवताओंसे सारा वृत्तान्त निवेदन ४४ किया ॥ ४४ ॥

तब यह सुनकर दुःखित इन्द्रादि सभी देवगणोंने हाथ जोड़कर प्रणाम करके [ इस वृत्तान्तको ] शंकरसे ॥ ४५ । निवेदित किया ॥ ४५ ॥

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८०८ प्रोवाचेति सुराञ्छ्रुत्वा शिवश्चापि तथा पुनः कर्त्तव्यं च तथा सर्वलोकस्वास्थ्यं भवेदिह ॥

उत्तरस्यां पुनर्यात प्रथमं यो मिलेदिह ।

तच्छिरश्च समाहृत्य योजनीयं कलेवरे ॥

ब्रह्मोवाच

ततस्तैस्तत्कृतं सर्वं शिवाज्ञाप्रतिपालकैः ।

कलेवरं समानीय प्रक्षाल्य विधिवच्च तत् ॥

पूजयित्वा पुनस्ते वै गताश्चोदङ्मुखास्तदा । प्रथमं मिलितस्तत्र हस्ती चाप्येकदन्तकः

तच्छिरश्च तदा नीत्वा तत्र तेऽयोजयन् ध्रुवम् ।

संयोज्य देवताः सर्वाः शिवं विष्णुं विधिं तदा ॥

प्रणम्य वचनं प्रोचुर्भवयुक्तं कृतं च नः ।

अनंतरं च तत्कार्यं भवताद्भवशेषितम् ॥

ततस्ते तु विरेजुश्च पार्षदाश्च सुराः सुखम् ।

अथ तद्वचनं श्रुत्वा शिवोक्तं पर्यपालयन् ॥

ऊचुस्ते च तदा तत्र ब्रह्मविष्णुसुरास्तथा ।

प्रणम्येशं शिवं देवं स्वप्रभुं गुणवर्जितम् ॥

यस्मात्त्वत्तेजसः सर्वे वयं जाता महात्मनः ।

त्वत्तेजस्तत्समायातु वेदमंत्राभियोगतः ॥

इत्येवमभिमंत्रेण मंत्रितं जलमुत्तमम् ।

स्मृत्वा शिवं समेतास्ते चिक्षिपुस्तत्कलेवरे ॥

तज्जलस्पर्शमात्रेण चिद्युतो जीवितो द्रुतम् ।

तदोत्तस्थौ सुप्त इव स बालश्च शिवेच्छया ॥

सुभगः सुन्दरतरो गजवक्त्रः सुरक्तकः ।

प्रसन्नवदनश्चाति सुप्रभो ललिताकृतिः ॥

तं दृष्ट्वा जीवितं बालं शिवापुत्रं मुनीश्वर ।

सर्वे मुमुदिरे तत्र सर्वं दुःखं क्षयंगतम् ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १७ । यह सुनकर शिवजीने भी देवताओंसे कहा-४६ हमलोगोंको भी वही करना चाहिये, जिससे सारे संसारका कल्याण हो ॥ ४६ ॥

अतः आपलोग उत्तर दिशाकी ओर जाइये और ४७ सर्वप्रथम जो मिले, उसका सिर लाकर इसके धड़ों जोड़ दीजिये ॥४७ ॥

ब्रह्माजी बोले- - - तदनन्तर शिवकी आज्ञा पालन करनेवाले देवताओंने ऐसा ही किया । गणेशजीका शरीर ४८ लाकर विधिपूर्वक उसका प्रक्षालन करके उसकी पूजाकर वे उत्तर दिशाकी ओर चल दिये, वहींपर ॥ ४ ९ उन्हें सर्वप्रथम एक दाँतवाला हाथी मिला ॥ ४८-४९ ॥ तब उसीका सिर लेकर उन्होंने गणेशके ५० शरीरमें जोड़ दिया । सिर जोड़कर सभी देवताओंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरको प्रणाम करके यह वचन कहा — आपने जैसा कहा था, वैसा हमने किया, अब इसके बाद जो कार्य शेष हो, उसे आपको करना ५१ चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ इसके बाद शिवके गण तथा देवता सुखपूर्वक ५२ सुशोभित हुए । पुनः शिवजीने जैसा कहा, वैसा ही उन लोगोंने पालन किया ॥५२ ॥

तब ब्रह्मा, विष्णु आदि देवगण अपने प्रभु निर्गुण ५३ ब्रह्म ईश्वर शिवको प्रणाम करके उनसे बोले - जिस प्रकार हम महात्मालोग आपके तेजसे उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार आपका तेज वेदमन्त्रोंके प्रभावसे इस ५४ शरीरमें भी प्रकट हो जाय॥५३-५४ ॥ इस प्रकार उन लोगोंने शिवजीका स्मरण करके ५५ मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित उत्तम जलको गणेश शरीरपर छिड़का ॥५५ ॥

उस जलके स्पर्शमात्रसे ही वह बालक ५६ शिवजीकी इच्छासे चेतनायुक्त हो जीवित हो गया और सोये हुएकी भाँति उठ बैठा ॥५६ ॥

वह सुभग, अत्यन्त सुन्दर, हाथीके मुखवाला, ५७ लाल वर्णवाला, प्रसन्न मुखमण्डलवाला, अत्यन्त । तेजस्वी तथा मनोहर आकृतिवाला था ॥ ५७ ॥

हे मुनीश्वर! उस बालक पार्वतीपुत्रको जीवित | देखकर सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हो गये और सबका ५८ । दुःख नष्ट हो गया ॥५८ ॥

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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८० ९ देव्यै संदर्शयामासुः सर्वे हर्षसमन्विताः । इसके बाद हर्षसे युक्त सभी लोगोंने देवीको उसे दिखाया और अपने पुत्रको जीवित देखकर देवी जीवितं तनयं दृष्ट्वा देवी हृष्टतराभवत् ॥ ५ ९ अत्यन्त प्रसन्न हुईं ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशजीवनवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशजीवनवर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥

अथाष्टादशोऽध्यायः पार्वतीद्वारा गणेशको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्षपद प्रदान करना, गणेशचतुर्थीव्रतविधान तथा उसका माहात्म्य, देवताओंका स्वलोक गमन नारद उवाच

जीविते गिरिजापुत्रे देव्या दृष्टे प्रजेश्वर ।

ततः किमभवत्तत्र कृपया तद्वदाधुना ॥

ब्रह्मोवाच

जीविते गिरिजापुत्रे देव्या दृष्टे मुनीश्वर ।

यज्जातं तच्छृणुष्वाद्य वच्मि तं महदुत्सवम् ॥

जीवितः स शिवापुत्रो निर्व्यग्रो विकृतो मुने । नारदजी बोले - – हे प्रजेश्वर! जब गिरिजाने अपने पुत्रको जीवित देख लिया, तब क्या हुआ? १ कृपापूर्वक उसको आप कहिये ॥१ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुनीश्वर! जब देवीने देख लिया कि मेरा पुत्र जीवित हो गया, उसके बाद जो हुआ, उसे आप सुनिये, मैं उस महान् उत्सवको २ कह रहा हूँ ॥२ ॥

हे मुने! जब व्याकुलतासे रहित तथा विशेष अभिषिक्तस्तदा देवैर्गणाध्यक्षैर्गजाननः ॥ ३ आकृतिवाले शिवापुत्र गजानन जीवित हो गये, तब

दृष्ट्वा स्वतनयं देवी शिवा हर्षसमन्विता ।

गृहीत्वा बालकं दोर्भ्यां प्रमुदा परिषस्वजे ॥

वस्त्राणि विविधानीह नानालंकरणानि च ददौ प्रीत्या गणेशाय स्वपुत्राय मुदांबिका पूजयित्वा तया देव्या सिद्धिभिश्चाप्यनेकशः करेण स्पर्शितः सोऽथ सर्वदुःखहरेण वै पूजयित्वा सुतं देवी मुखमाचुम्ब्य शांकरी वरान्ददौ तदा प्रीत्या जातस्त्वं दुःखितोऽधुना धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पूर्वपूज्यो भवाधुना सर्वेषाममराणांवै सर्वदा दुःखवर्जितः देवताओंने उन्हें गणाध्यक्षके पदपर अभिषिक्त किया ॥३ ॥

भगवती पार्वती अपने पुत्रको [ अभिषिक्त ] ४ देखकर अत्यन्त हर्षित हो गयीं और अपनी दोनों भुजाओंसे बालकको गोदमें लेकर प्रेमपूर्वक उसका आलिंगन करने लगीं ॥ ४ ॥

। जगदम्बाने उस अपने पुत्रको बड़े प्रेमसे नाना ॥ ५ प्रकारके वस्त्र तथा अलंकार प्रदान किये ॥५ ॥

उन देवीने अनेक प्रकारकी सिद्धियोंसे उस । ॥ ६ बालकका पूजन करके सभी दुःखोंको दूर करनेवाले अपने कल्याणकारी हाथसे उसका स्पर्श किया । पूजन करनेके उपरान्त देवीने उसका मुख चूमा और प्रेमसे । उसे अनेक वरदान दिये और कहा - पुत्र! तुमने इस ॥ ७ समय बड़ा कष्ट उठाया ॥ ६-७ ॥ हे पुत्र! तुम धन्य हो और कृतकृत्य हो, तुम सभी देवताओंके पहले पूजे जाओगे और सदा । ॥ ८ दुःखरहित रहोगे । चूँकि इस समय तुम्हारे मुखमण्डलपर

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८१० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

आनने तव सिन्दूरं दृश्यते सांप्रतं यदि ।

तस्मात्त्वं पूजनीयोऽसि सिन्दूरेण सदा नरैः ॥ ९

पुष्पैर्वा चन्दनैर्वापि गन्धेनैव शुभेन च ।

नैवेद्येन सुरम्येण नीराजेन विधानतः ॥ १०

ताम्बूलैरथ दानैश्च तथा प्रक्रमणैरपि ।

नमस्कारविधानेन पूजां यस्ते विधास्यति ॥ ११

तस्य वै सकला सिद्धिर्भविष्यति न संशयः ।

विघ्नान्यनेकरूपाणि क्षयं यास्यन्त्यसंशयम् ॥ १२

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा च तदा देवी स्वपुत्रं तं महेश्वरी ।

नानावस्तुभिरुत्कृष्टैः पुनरप्यर्चयत्तथा ॥ १३

ततः स्वास्थ्यं च देवानां गणानां च विशेषतः ।

गिरिजाकृपया विप्र जातं तत्क्षणमात्रतः ॥ १४

एतस्मिंश्च क्षणे देवा वासवाद्याः शिवं मुदा ।

स्तुत्वा प्रसाद्य तं देवं भक्ता निन्युः शिवांतिकम् ॥ १५

संसाद्य गिरिशं पश्चादुत्संगे सन्यवेशयन् ।

बालकं तं महेशान्यास्त्रिजगत्सुखहेतवे ॥ १६

शिवोऽपि तस्य शिरसि दत्त्वा स्वकरपंकजम् ।

उवाच वचनं देवान् पुत्रोऽयमिति मेऽपरः ॥ १७

गणेशोऽपि तदोत्थाय नमस्कृत्य शिवाय वै ।

पार्वत्यै च नमस्कृत्य मह्यं वै विष्णवे तथा ॥ १८

नारदाद्यानृषीन्सर्वान्स त्वास्थाय पुरोऽब्रवीत् ।

क्षंतव्यश्चापराधो मे मानश्चैवेदृशो नृणाम् ॥ १ ९

अहं च शंकरश्चैव विष्णुश्चैते त्रयः सुराः ।

प्रत्यूचुर्युगपत्प्रीत्या ददतो वरमुत्तमम् ॥ २० ।

त्रयो वयं सुरवरा यथा पूज्या जगत्त्रये ।

तथायं गणनाथश्च सकलैः प्रतिपूज्यताम् ॥ २१

वयं च प्राकृताश्चायं प्राकृतः पूज्य एव च ।

गणेशो विघ्नहर्त्ता हि सर्वकामफलप्रदः ॥ २२

एतत्पूजां पुरा कृत्वा पश्चात्पूज्या वयं नरैः ।

वयं च पूजिताः सर्वे नायं चापूजितो यदा ॥

२३ अस्मिन्नपूजिते देवाः परपूजाकृता यदि । । तदा तत्फलहानिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा । ॥ २४ | १८ | सिन्दूर दिखायी देता है, इसलिये लोगोंके सदा सिन्दूरसे पूजित होओगे । जो मनुष्य पुष्प द्वारा तुम | सुगन्धित द्रव्य, उत्तम नैवेद्य, विधिपूर्वक, चन्दन, आरती ताम्बूल, दान, परिक्रमा तथा नमस्कारविधानसे तुम्हारी, | पूजा करेगा, उसे सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी इसमें सन्देह नहीं । इतना ही नहीं तुम्हारे पूजनसे, समस्त विघ्न भी नि: सन्देह विनष्ट हो जायँगे ॥ ८- १२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर उन महेश्वरी देवीने नाना प्रकारके उत्कृष्ट पदार्थोंसे पुनः अपने उस पुत्रका पूजन किया । हे विप्र! तब गिरिजाकी कृपासे क्षणमात्रमें देवताओंको तथा विशेषकर शिवगणोंको शान्ति प्राप्त हुई ॥ १३-१४ ॥ उसी समय इन्द्रादि देवता प्रसन्नतासे शिवकी स्तुति करके उन्हें प्रसन्नकर भक्तियुक्त होकर पार्वतीके पास ले गये । शिवको ले जानेके अनन्तर उन देवताओंने तीनों लोकके सुखके लिये महेश्वरीके उस पुत्रको शिवकी गोदमें बैठा दिया । शिवजीने भी उस बालकके सिरपर अपना करकमल रखकर देवगणोंसे यह वचन कहा — यह मेरा दूसरा पुत्र है ॥ १५–१७ ॥ तब गणेशने भी उठकर शिवको, पार्वतीको, मुझे, विष्णुको प्रणाम करके सबके सामने खड़े होकर नारदादि सभी ऋषियोंसे कहा — आपलोग मेरे अपराधको क्षमा करें, मनुष्योंमें मान ऐसा ही होता है ॥ १८-१९ ॥ तब मैं [ ब्रह्मा ], विष्णु तथा शंकर - इन तीनों देवताओंने एक साथ ही उस बालकको प्रेमपूर्वक | उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा- जिस प्रकार हम | तीनों श्रेष्ठ देवता तीनों लोकोंमें पूज्य हैं, उसी प्रकार ये गणेश भी सभीके द्वारा पूजे जायँ । हमलोग प्राकृत ( मौलिक ) देवता हैं, उसी प्रकार ये भी प्राकृत हैं । | गणेश विघ्नोंका हरण करनेवाले तथा सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले हैं । पहले इनकी पूजा करके | बादमें मनुष्य हमलोगोंकी पूजा करें, यदि हमलोगोंकी पूजा की गयी और इनकी नहीं की गयी और हे देवताओ! यदि कोई इनकी पूजा किये बिना अन्य देवताओंकी पूजा प्राप्त पूजा करेगा तो उसे पूजाका फल नहीं होगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २० - २४ ॥