श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 821–830

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा स गणेशानो नानावस्तुभिरादरात् ।

शिवेन पूजितः पूर्वं विष्णुनाऽनु प्रपूजितः ॥ २५

ब्रह्मणा च मया तत्र पार्वत्या च प्रपूजितः ।

सर्वैर्देवगणैश्चैव पूजितः परया मुदा ॥ २६

सर्वैर्मिलित्वा तत्रैव ब्रह्मविष्णुहरादिभिः ।

सगणेशश्शिवातुष्ट्यै सर्वाध्यक्षो निवेदितः ॥ २७

पुनश्चैव शिवेनास्मै सुप्रसन्नेन चेतसा ।

सर्वदा सुखदा लोके वरा दत्ता ह्यनेकशः ॥ २८

शिव उवाच

हे गिरीन्द्रसुतापुत्र संतुष्टोऽहं न संशयः ।

मयि तुष्टे जगत्तुष्टं विरुद्धः कोऽपि नो भवेत् ॥ २ ९

बालरूपोऽपि यस्मात्त्वं महाविक्रमकारकः ।

शक्तिपुत्रः सुतेजस्वी तस्माद्भव सदा सुखी ॥ ३०

त्वन्नाम विघ्नहन्तृत्वे श्रेष्ठं चैव भवत्विति ।

मम सर्वगणाध्यक्षः संपूज्यस्त्वं भवाधुना ॥ ३१

एवमुक्त्वा शंकरेण पूजाविधिरनेकशः ।

आशिषश्चाप्यनेका हि कृतास्तस्मिंस्तु तत्क्षणात् ॥ ३२

ततो देवगणाश्चैव गीतं वाद्यं च नृत्यकम् ।

मुदा ते कारयामासुस्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ३३

पुनश्चैव वरो दत्तः सुप्रसन्नेन शंभुना ।

तस्मै च गणनाथाय शिवेनैव महात्मना ॥ ३४

चतुर्थ्यां त्वं समुत्पन्नो भाद्रे मासि गणेश्वर ।

असिते च तथा पक्षे चंद्रस्योदयने शुभे ॥ ३५

प्रथमे च तथा यामे गिरिजायाः सुचेतसः ।

आविर्बभूव ते रूपं यस्मात्ते व्रतमुत्तमम् ॥ ३६

तस्मात्तद्दिनमारभ्य तस्यामेव तिथौ मुदा ।

व्रतं कार्यं विशेषेण सर्वसिद्ध्यै सुशोभनम् ॥ ३७

यावत्पुनः समायाति वर्षान्ते च चतुर्थिका ॥

तावद्व्रतं च कर्तव्यं तव चैव ममाज्ञया ॥ ३८

संसारे

सुखमिच्छन्ति येऽतुलं चाप्यनेकशः ।

त्वां पूजयन्तु ते भक्त्या चतुध्यां विधिपूर्वकम् ॥ ३ ९

कुमारखण्ड ) ८११ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर शिवजीने अनेक प्रकारकी वस्तुओंसे गणेशकी पूजा की, उसके बाद विष्णुके द्वारा भी वे पूजित हुए । तदनन्तर मैंने एवं पार्वतीने उनकी पूजा की और देवगणोंने भी बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया । उसी स्थानपर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवने एक साथ मिलकर पार्वतीकी प्रसन्नताहेतु उन गणेशको सर्वाध्यक्ष शब्दसे सम्बोधित किया ॥ २५–२७ ॥ इसके बाद शिवने प्रसन्न मनसे उन गणेशको लोकमें सदा सुख देनेवाले अनेक वर दिये ॥२८ ॥

शिवजी बोले- हे पार्वतीपुत्र! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह नहीं है, मेरे सन्तुष्ट रहनेपर जगत् सन्तुष्ट हो जाता है, कोई भी विरुद्ध नहीं हो सकता ॥ २ ९ ॥ तुम बालकरूपसे हो और शक्तिके महापराक्रमी

एवं परम तेजस्वी पुत्र हो । इसलिये सर्वदा सुखी रहो ॥ ३० ॥

हे बालक! विघ्नोंके नष्ट करनेमें तुम्हारा नाम सर्वश्रेष्ठ होगा । आजसे तुम मेरे सम्पूर्ण गणोंके अध्यक्ष एवं सबके पूजनीय होओगे । इस प्रकार कहकर शंकरने गणेशको उनकी अनेक पूजाविधि बतलाकर उसी क्षण उन्हें अनेक आशीर्वाद प्रदान किये ॥ ३१-३२ ॥ उसके बाद देवताओं एवं अप्सराओंने प्रसन्न होकर [ अनेक प्रकारके ] गीत, वाद्य तथा नृत्य किये ॥ ३३ ॥

इसके बाद कल्याणकारी महात्मा शंकरने प्रसन्न होकर उन गणेशको पुनः वर प्रदान किया ॥ ३४ ॥

हे गणेश्वर! तुम भाद्रपदमासमें कृष्णपक्षकी चतुर्थीको शुभ चन्द्रोदयकालमें उत्पन्न हुए हो और रात्रिके प्रथम प्रहरमें गिरिजाके चित्तसे तुम्हारा रूप आविर्भूत हुआ है, इसलिये उसी दिन तुम्हारा उत्तम व्रत होगा ॥ ३५-३६ ॥ उसी दिनसे आरम्भकर उसी तिथिको सभी सिद्धियोंके लिये मनुष्यको प्रसन्नतापूर्वक इस सुन्दर व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये । एक वर्षमें जब भाद्रमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथि पुनः आये, तबतक वर्षपर्यन्त तुम्हारे व्रतको मेरी आज्ञासे करना चाहिये । जो लोग इस संसार में अनेक प्रकारके अतुल सुख चाहते हैं, वे प्रत्येक चतुर्थीके दिन विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा करें ॥ ३७-३९ ॥

पृष्ठ 822

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८१२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०

मार्गशीर्षे तथा मासे रमा या वै चतुर्थिका ।

प्रातः स्नानं तदा कृत्वा व्रतं विप्रान्निवेदयेत् ॥ ४०

दूर्वाभिः पूजनं कार्यमुपवासस्तथाविधः ।

रात्रेश्च प्रहरे जाते स्नात्वा संपूजयेन्नरः ॥ ४१

मूर्तिं धातुमयीं कृत्वा प्रवालसंभवां तथा ।

श्वेतार्कसंभवां चापि मार्द्दिकां निर्मितां तथा ॥ ४२

प्रतिष्ठाप्य तदा तत्र पूजयेत्प्रयतः पुमान् ।

गंधैर्नानाविधैर्दिव्यैश्चन्दनैः पुष्पकैरिह ॥४३

वितस्तिमात्रा दूर्वा च त्र्यंगा वै मूलवर्जिता ।

ईदृशानां शाद्वलानां शतेनैकोत्तरेण ह ॥ ४४

एकविंशतिकेनैव पूजयेत्प्रतिमां स्थिताम् ।

धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्विविधैर्गणनायकम् ॥ ४५

ताम्बूलाद्यर्घसद्द्रव्यैः प्रणिपत्य स्तवैस्तथा ।

त्वां तत्र पूजयित्वेत्थं बालचंद्रं च पूजयेत् ॥ ४६

पश्चाद्विप्रांश्च संपूज्य भोजयेन्मधुरैर्मुदा ।

स्वयं चैव ततो भुंज्यान्मधुरं लवणं विना ॥ ४७

विसर्जयेत्ततः पश्चान्नियमं सर्वमात्मनः ।

गणेशस्मरणं कुर्यात्संपूर्णं स्याद् व्रतं शुभम् ॥ ४८

एवं व्रतेन संपूर्णे वर्षे जाते नरस्तदा ।

उद्यापन विधिं कुर्याद्व्रतसम्पूर्त्तिहेतवे ॥ ४ ९

द्वादश ब्राह्मणास्तत्र भोजनीया मदाज्ञया ।

कुंभमेकं च संस्थाप्य पूज्या मूर्तिस्त्वदीयका ॥ ५०

स्थण्डिलेऽष्टदलं कृत्वा तदा वेदविधानतः । होमश्चैवात्र कर्तव्यो वित्तशाठ्यविवर्जितैः ॥ ५१ स्त्रीद्वयं च तथा चात्र बटुकद्वयमादरात् । भोजयेत्पूजयित्वा वै मूर्त्यग्रे विधिपूर्वकम् ॥ ५२ निशि जागरणं कार्यं पुनः प्रातः प्रपूजयेत् । । विसर्जनं ततश्चैव पुनरागमनाय च ॥५३ १८ मार्गशीर्षके महीनेमें रमा नामक जो चतुर्थी होती है, उस दिन प्रातःकाल स्नानकर व्रतके वियो । ब्राह्मणोंसे निवेदन करे । दूर्वास पूजन करे | उपवास करे, रात्रिका प्रथम प्रहर उपस्थित होनेपर तथा स्नान करके मनुष्यको [ गणेशका ] पूजन करमा चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ धातुसे, मूँगेसे, श्वेत अर्कसे अथवा मिट्टी गणेशकी मूर्तिका निर्माण करके उसकी प्रतिष्ठाकर मनुष्य सावधान होकर नाना प्रकारके दिव्य गन्ध, चन्दन तथा पुष्पोंसे उनकी पूजा करे ॥ ४२-४३ ॥ गणेशजीकी पूजाके लिये जो दूर्वा हो, वह एक वित्ते ( बारह अंगुल लम्बी ) की हो और तीन गाँठसे युक्त तथा मूलरहित होनी चाहिये । इस प्रकारकी एक सौ एक दूर्वाओं अथवा इक्कीस दूर्वाओंके द्वारा स्थापित प्रतिमाका पूजन करे । धूप, दीप तथा नाना प्रकारके नैवेद्य, ताम्बूल, अर्घ्य आदि उत्तम द्रव्योंसे और प्रणाम तथा स्तुतिके द्वारा गणेशजीकी पूजा करे । इस प्रकार तुम्हारा पूजनकर बालचन्द्रमाकी पूजा करे ॥ ४४–४६ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंकी पूजा करके प्रसन्नतापूर्वक मधुर पदार्थोंका भोजन कराना चाहिये, इसके बाद स्वयं भी लवणरहित मधुर भोजन करना चाहिये ॥ ४७ ॥

तत्पश्चात् अपना सारा नियम विसर्जित करे और गणेशजीका स्मरण करे । इस प्रकारका अनुष्ठान करनेसे यह शुभ व्रत सम्पूर्ण होता है ॥ ४८ ॥

इस प्रकार व्रत करते हुए एक वर्ष बीत जाय, तब उस व्रतकी सम्पूर्णताके लिये उद्यापन करना । चाहिये । मेरी आज्ञासे उसमें बारह ब्राह्मणोंको भोजन | कराये तथा एक कलशकी स्थापना करके तुम्हारी मूर्तिकी पूजा करे ॥ ४ ९ -५० ॥ वेदीपर अष्टदल कमल बनाकर मनुष्योंको धनकी कृपणतासे रहित होकर वेदविधिसे होम करना चाहिये ॥५१ ॥

इसके बाद मूर्तिके आगे दो स्त्रियों एवं दो वटुकोंकी विधिपूर्वक आदरसे उन्हें भोजन कराये । रात्रिमें जागरण पूजाकर करे प्रातःकाल पुन: पूजन करे । इसके बाद गणेशजीसे , पुनः आनेके लिये प्रार्थनाकर उनका विसर्जन करे ॥ ५२-५३ ॥

पृष्ठ 823

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अ ० १८ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८१३

बालकाच्चाशिषो ग्राह्याः स्वस्तिवाचनमेव च ।

पुष्पांजलिं प्रदद्याच्च व्रतसंपूर्णहेतवे ॥ ५४

नमस्कारांस्ततः कृत्वा नानाकार्यं प्रकल्पयेत् ।

एवं व्रतं कृतं येन तस्येप्सितफलं भवेत् ॥ ५५

यो नित्यं श्रद्धया सार्द्धं पूजां चैव स्वशक्तितः ।

कुर्य्यात्तव गणेशान सर्वकामफलाप्तये ॥ ५६

सिन्दूरैश्चन्दनैश्चैव तंडुलैः केतकैस्तथा ।

उपचारैरनेकैश्च पूजयेत्त्वां गणेश्वरम् ॥ ५७

एवं त्वां पूजयेयुर्ये भक्त्या नानोपचारतः ।

तेषां सिद्धिर्भवेन्नित्यं विघ्ननाशो भवेदिह ॥ ५८

सर्वैर्वणै: प्रकर्त्तव्या स्त्रीभिश्चैव विशेषतः ।

उदयाभिमुखैश्चैव राजभिश्च विशेषतः ॥ ५ ९

यं यं कामयते यो वै तं तमाप्नोति निश्चितम् ।

अतः कामयमानेन तेन सेव्यः सदा भवान् ॥ ६०

ब्रह्मोवाच

शिवेनैवं तदा प्रोक्तं गणेशाय महात्मने ।

तदानीं दैवतैश्चैव सर्वैश्च ऋषिसत्तमैः ॥ ६१

तथेत्युक्त्वा तु तैः सर्वैर्गणैः शंभुप्रियैर्मुने ।

पूजितो हि गणाधीशो विधिना परमेण सः ॥ ६२

ततश्चैव गणाः सर्वे प्रणेमुस्ते गणेश्वरम् ।

समानर्चुर्विशेषेण नानावस्तुभिरादरात् ॥६३

गिरिजायास्समुत्पन्नो यश्च हर्षो मुनीश्वर ।

चतुर्भिर्वदनैर्वै तमवर्ण्य च कथं ब्रुवे ॥ ६४

देवदुंदुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।

जगुर्गंधर्वमुख्याश्च पुष्पवर्ष पपात ह ॥ ६५

जगत्स्वास्थ्यं तदा प्राप गणाधीशे प्रतिष्ठिते ।

महोत्सवो महानासीत्सर्वं दुःखं क्षयं गतम् ॥ ६६

शिवाशिवौ च मोदेतां विशेषेणाति नारद ।

आसीत्सुमंगलं भूरि सर्वत्र सुखदायकम् ॥ ६७

तत्पश्चात् बालक वटुओंसे आशीर्वाद ग्रहण करे तथा स्वस्तिवाचन भी कराये और व्रतकी सम्पूर्णताके लिये पुष्पांजलि समर्पित करे । उसके बाद नमस्कारकर अन्य कार्य सम्पन्न करे । जो इस प्रकार व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है । ५४-५५ ॥ हे गणेश्वर! जो श्रद्धाके साथ नित्य अपनी शक्तिके अनुसार सभी कामनाओंका फल प्राप्त करनेके लिये सिन्दूर, चन्दन, तण्डुल, केतकीके फूल तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे तुझ गणेशकी पूजा करेगा और इस प्रकार जो भी लोग भक्तिपूर्वक अनेक उपचारोंसे तुम्हारी पूजा करेंगे, उनको सदा सिद्धि प्राप्त होगी तथा उनके विघ्नोंका नाश हो जायगा॥५६–५८ ॥ सभी वर्णों, विशेषकर स्त्रीजनोंको गणेशजीका पूजन अवश्य करना चाहिये । अपने अभ्युदयकी कामना करनेवाले राजाओंको विशेष रूपसे पूजन करना चाहिये ॥ ५ ९ ॥ [ हे गणेश! ] मनुष्य जो - जो कामनाएँ करता है, तुम्हारी पूजासे उसे निश्चित रूपसे प्राप्त करता है, इसलिये कामना करनेवाले उस मनुष्यको सदैव तुम्हारा पूजन करना चाहिये ॥६० ॥

ब्रह्माजी बोले- हे मुने! जब महात्मा शिवजीने गणेशजीसे इस प्रकार कहा, तभी सभी देवगणों, ऋषिवरों तथा समस्त शिवप्रिय गणोंने ‘ तथास्तु ' कहकर विधिपूर्वक गणपतिका पूजन किया॥६१-६२ ॥ उसके बाद सभी गणोंने भी गणेशको प्रणाम किया और आदरपूर्वक अनेक प्रकारकी वस्तुओंसे विशेषरूपसे उनकी पूजा की । हे मुनीश्वर! उस समय भगवती गिरिजाको जो हर्ष उत्पन्न हुआ, उस अवर्णनीय हर्षको । मैं अपने चारों मुखोंसे भी कैसे कहूँ ॥ ६३-६४ ॥ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं, अप्सराएँ नाचने लगीं, बड़े - बड़े गन्धर्व गान करने लगे और [ आकाश-मण्डलसे ] पुष्पवृष्टि होने लगी । इस प्रकार गणपतिकी प्रतिष्ठा होनेपर सारा जगत् सुखी हो गया, महोत्सव होने लगा एवं सारा दुःख नष्ट हो गया ॥ ६५-६६ ॥ हे नारद! उस समय विशेष रूपसे पार्वती तथा शिव प्रसन्न हुए । सर्वत्र सुखदायक महामंगल होने लगा ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 824

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८१४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १८

ततो देवगणाः सर्वे ऋषीणां च गणास्तथा ।

समागताश्च ये तत्र जग्मुस्ते तु शिवाज्ञया ॥ ६८

प्रशंसन्तः शिवां तत्र गणेशं च पुनः पुनः ।

शिवं चैव तथा स्तुत्वा कीदृशं युद्धमेव च ॥ ६ ९

यदा सा गिरिजा देवी कोपहीना बभूव ह ।

शिवोऽपि गिरिजां तत्र पूर्ववत्संप्रपद्य ताम् ॥ ७०

चकार विविधं सौख्यं लोकानां हितकाम्यया ।

स्वात्मारामोऽपि परमो भक्तकार्योद्यतः सदा ॥ ७१

विष्णुश्च शिवमापृच्छ्य ब्रह्माहं तं तथैव हि ।

आगच्छाव स्वधामं च शिवौ संसेव्य भक्तितः ॥ ७२

नारद त्वं च भगवन्संगीय शिवयोर्यशः ।

आगमो भवनं स्वं च शिवौ पृष्ट्वा मुनीश्वर ॥ ७३

एतत्ते सर्वमाख्यातं मया वै शिवयोर्यशः ।

भवत्पृष्टेन विघ्नेशयशःसंमिश्रमादरात् ॥ ७४

इदं सुमंगलाख्यानं यः शृणोति सुसंयतः ।

सर्वमंगलसंयुक्तः स भवेन्मंगलालयः ॥ ७५

अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम् ।

भार्यार्थी लभते भार्यां प्रजार्थी लभते प्रजाम् ॥ ७६

आरोग्यं लभते रोगी सौभाग्यं दुर्भगो लभेत् ।

नष्टपुत्रं नष्टधनं प्रोषिता च पतिं लभेत् ।

शोकाविष्टः शोकहीनः स भवेन्नात्र संशयः ॥ ७७

इदं गाणेशमाख्यानं यस्य गेहे च तिष्ठति ।

सदा मंगलसंयुक्तः स भवेन्नात्र संशयः ॥ ७८

यात्राकाले च पुण्याहे यः शृणोति समाहितः । ।

सर्वाभीष्टं स लभते श्रीगणेशप्रसादतः ॥ ७ ९ ।

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां उस समय समस्त देवता एवं ऋषिगण जो वहाँ आये हुए थे, वे शिवजीकी आज्ञासे सभी भगवती | पार्वती तथा गणेशकी बारंबार प्रशंसा करते | शिवकी स्तुति करते हुए तथा वह युद्ध कैसा हुए, उसका वर्णन करते हुए चले गये॥६८-६९ ॥ था, जब भगवती पार्वतीका क्रोध शान्त हो गया, तब शिवजी भी पूर्ववत् पार्वतीके समीप आकर लोकहितकी कामनासे नाना प्रकारके सुखद कार्य करने लगे । यद्यपि वे स्वात्माराम हैं, फिर भी भक्तोंके कार्यके लिये सदैव उद्यत रहते हैं । विष्णु तथा मैं ब्रह्मा उन पार्वती एवं शंकरकी भक्तिपूर्वक सेवाकर तथा शिवसे आज्ञा लेकर अपने स्थानको आ गये । हे नारद! हे भगवन्! हे मुनीश्वर! आप भी शिवा-शिवके यशका गान करके उनसे पूछकर अपने भवनको चले आये । हे नारद! आपके द्वारा पूछे जानेपर मैंने आपसे विघ्नेश्वर गणेशजीके यशसे मिश्रित भगवान् शिव तथा भगवती शिवाके यशका आदरपूर्वक पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया॥७०–७४ ॥ जो संयत होकर इस मंगलदायक आख्यानको सुनता है, वह सभी मंगलोंसे युक्त होकर मंगलोंका आलय हो जाता है, पुत्रहीनको पुत्र, निर्धनको धन, स्त्रीकी इच्छावालेको स्त्री एवं प्रजा चाहनेवालेको प्रजाकी प्राप्ति होती है, रोगीको आरोग्य, भाग्यहीनको सौभाग्य, नष्ट पुत्रवालेको पुत्र, नष्ट धनवालोंको धन | एवं जिस स्त्रीका पति विदेश गया हो, उसको पतिकी | प्राप्ति होती है और शोकयुक्त पुरुष शोकसे रहित हो । जाता है, इसमें संशय नहीं है । गणेशसे सम्बन्धित यह | आख्यान जिसके घरमें नित्य रहता है, वह सर्वदा मंगलसे युक्त होता है; इसमें संशय नहीं है । यात्राकालमें तथा पवित्र पर्वपर जो कोई सावधान होकर इसे सुनता है, वह गणेशकी कृपासे सम्पूर्ण मनोरथ प्राप्त कर लेता है॥७५–७९ ॥ रुद्रसंहितायां गणेशगणाधिपपदवीप्राप्तिवर्णनं चतुर्थे कुमारखण्डे ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

पदवीप्राप्तिका वर्णन रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशको गणाधिपकी नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

पृष्ठ 825

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८१५ अथैकोनविंशोऽध्यायः स्वामिकार्तिकेय और गणेशकी बाल लीला, विवाहके विषयमें दोनोंका परस्पर विवाद, शिवजीद्वारा पृथ्वी परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रस्थान, बुद्धिमान् गणेशजीका पृथ्वीरूप माता - पिताकी परिक्रमा और प्रसन्न शिवा - शिवद्वारा गणेशके प्रथम विवाहकी स्वीकृति नारद उवाच

गणेशस्य श्रुता तात सम्यग्जनिरनुत्तमा ।

चरित्रमपि दिव्यं वै सुपराक्रमभूषितम् ॥

ततः किमभवत्तात तत्त्वं वद सुरेश्वर ।

शिवाशिवयशस्स्फीतं महानन्दप्रदायकम् ॥

ब्रह्मोवाच

साधु पृष्टं मुनिश्रेष्ठ भवता करुणात्मना ।

श्रूयतां दत्तकर्णं हि वक्ष्येऽहं ऋषिसत्तम ॥

शिवा शिवश्च विप्रेन्द्र द्वयोश्च सुतयोः परम् ।

दर्श दर्श च तल्लीलां महत्प्रेम समावहत् ॥

पित्रोर्लालयतोस्तत्र सुखं चाति व्यवर्द्धत ।

सदा प्रीत्या मुदा चातिखेलनं चक्रतुः सुतौ ॥

तावेव तनयौ तत्र मातापित्रोर्मुनीश्वर ।

महाभक्त्या यदा युक्तौ परिचर्यां प्रचक्रतुः ॥

षण्मुखे च गणेशे च पित्रोस्तदधिकं सदा ।

स्नेहो व्यवर्द्धत महान् शुक्लपक्षे यथा शशी ॥

कदाचित्तौ स्थितौ तत्र रहसि प्रेमसंयुतौ ।

शिवा शिवश्च देवर्षे सुविचारपरायणौ ॥

शिवाशिवावूचतुः

विवाहयोग्य संजातौ सुताविति च तावुभौ ।

विवाहश्च कथं कार्यः पुत्रयोरुभयोः शुभम् ॥

षण्मुखश्च प्रियतमो गणेशश्च तथैव च ।

इति चिंतासमुद्विग्नौ लीलानन्दौ बभूवतुः ॥

स्वपित्रोर्मतमाज्ञाय तौ सुतावपि संस्पृहौ ।

तदिच्छया विवाहार्थं बभूवतुरथो मुने ॥

अहं च परिणेष्यामि ह्यहं चैव पुनः पुनः ।

परस्परं च नित्यं वै विवादे तत्परावुभौ ॥

नारदजी बोले - हे तात! मैंने गणेशजीके श्रेष्ठ जन्मके आख्यानको सुन लिया तथा अत्यन्त १ पराक्रमसे युक्त उनका दिव्य चरित्र भी सुना । हे तात! हे सुरेश्वर! उसके बाद क्या हुआ? उसे भलीभाँति कहिये । यह आख्यान शिवा और शिवके यशसे २ परिपूर्ण तथा महान् आनन्द देनेवाला है ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! करुणार्द्र चित्तवाले आपने ठीक ही पूछा । हे ऋषिसत्तम! अब मैं ३ [ आगेकी कथा ] कह रहा हूँ, उसे ध्यानसे सुनिये ॥ ३ ॥

हे विप्रेन्द्र! शिवा एवं शिव अपने उन दोनों पुत्रोंकी ४ उत्तम लीला बारंबार देखकर अत्यन्त प्रसन्न होने लगे ॥ ४ ॥

माता - पिताके दुलारसे उनका सुख दिन - रात बढ़ने ५ लगा और वे दोनों बड़ी प्रसन्नतासे आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते थे । हे मुनीश्वर! वे दोनों पुत्र महान् भक्तिसे युक्त ६ होकर माता - पिताकी सेवा करते थे । षण्मुख कार्तिकेय तथा गणेशके प्रति माता - पिताका अधिक स्नेह शुक्ल-७ पक्षके चन्द्रमाके समान सदा बढ़ने लगा॥५–७ ॥ हे देवर्षे! एक समय शिवा एवं शिव - वे दोनों प्रेमयुक्त होकर एकान्तमें बैठे हुए कुछ विचार ८ कर रहे थे ॥८ ॥

शिवा - शिव बोले- अब हमारे ये पुत्र विवाहके योग्य हो गये हैं । अतः इन दोनोंका शुभ विवाह कैसे ९ किया जाय? जिस प्रकार षण्मुख प्रिय हैं, उसी प्रकार गणेश भी प्रिय हैं । इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए १० ॥ वे दोनों लीलाका आनन्द लेने लगे॥९ -१० ॥ हे मुने! अपने माता - पिताका यह विचार जानकर वे दोनों पुत्र उनकी इच्छासे विवाहके लिये ११ / लालायित हो उठे । ‘ मैं [ पहले ] विवाह करूँगा'– इस प्रकार बारंबार कहते हुए दोनों आपसमें विवाद १२ करने लगे ॥ ११-१२ ॥

पृष्ठ 826

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८१६

श्रुत्वा तद्वचनं तौ च दंपती जगतां प्रभू ।

लौकिकाचारमाश्रित्य विस्मयं परमं गतौ ॥

किं कर्तव्यं कथं कार्यो विवाहविधिरेतयोः ।

इति निश्चित्य ताभ्यां वै युक्तिश्च रचिताद्भुता ॥

कदाचित्समये स्थित्वा समाहूय स्वपुत्रकौ । कथयामासतुस्तत्र पुत्रयोः पितरौ तदा

अस्माकं नियमः पूर्वं कृतश्च सुखदो हि वाम् ।

श्रूयतां सुसुतौ प्रीत्या कथयावो यथार्थकम् ॥

समौ द्वावपि सत्पुत्रौ विशेषो नात्र लभ्यते ।

तस्मात्पणः कृतः शंदः पुत्रयोरुभयोरपि ॥

यश्चैव पृथिवीं सर्वां क्रान्त्वा पूर्वमुपाव्रजेत् ।

तस्यैव प्रथमं कार्यो विवाहः शुभलक्षणः ॥

ब्रह्मोवाच

तयोरेवं वचः श्रुत्वा शरजन्मा महाबलः ।

जगाम मन्दिरात्तूर्णं पृथिवीक्रमणाय वै ॥

गणनाथश्च तत्रैव संस्थितो बुद्धिसत्तमः ।

सुबुद्ध्या संविचार्येति चित्त एव पुनः पुनः ॥

किं कर्तव्यं क्व गंतव्यं लंघितुं नैव शक्यते । क्रोशमात्रं गतः स्याद्वै गम्यते न श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १ ९ जगत्के अधिपति वे दोनों शिवा और शिव १३ वचनको सुनकर लोकाचारकी रीतिका आश्रय लेकर उनके महान् आश्चर्यमें पड़ गये । अब क्या करना चाहिये | और किस प्रकार इनके विवाहकी विधि सम्पन्न १४ जाय- - ऐसा निश्चय करके उन दोनोंने एक की । युक्ति रची । किसी समय बैठकर माता - पिताने अद्भुत अपने ॥ १५ दोनों पुत्रोंको बुलाकर कहा- ॥ १३–१५ शिवा - शिव बोले- - हमने तुम दोनोंके लिये १६ एक सुखदायी नियम बनाया है । हे उत्तम पुत्रो! उसे प्रीतिसे सुनो, हमलोग यथार्थ रूपसे कह रहे हैं ॥ १६ ॥

तुम दोनों ही पुत्र समानभावसे हमें प्रिय हो, १७ इसमें कोई विशेष नहीं है । अतः हमलोगोंने तुमदोनों पुत्रोंके लिये एक कल्याणप्रद शर्त रखी है । तुम दोनोंमें जो कोई भी सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमाकर पहले चला आयेगा, उसीका शुभ लक्षणसम्पन्न १८ विवाह पहले किया जायगा ॥ १७-१८ ॥ ब्रह्माजी बोले- उन दोनोंका वचन सुनकर महाबली कार्तिकेय पृथ्वीकी परिक्रमा करनेके लिये १ ९ बड़ी शीघ्रतासे घरसे चल पड़े । किंतु बुद्धिमान् गणेशजी अपनी सद्बुद्धिसे चित्तमें बारंबार विचार करके वहीं २० स्थित रहे कि मुझे क्या करना चाहिये और हाँ जाना चाहिये, मैं तो लाँघ भी नहीं सकता हूँ, कोसभर मया पुनः ॥ २१ चलनेके बाद मैं पुनः चल नहीं सकता, फिर इस

किं पुनः पृथिवीमेतां क्रान्त्वा चोपार्जितं सुखम् ।

विचार्येति गणेशस्तु यच्चकार शृणुष्व तत् ॥

स्नानं कृत्वा यथान्यायं समागत्य स्वयं गृहम् ।

उवाच पितरं तत्र मातरं पुनरेव सः ॥

गणेश उवाच

आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवतोरिह ।

भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्य्यतां मे मनोरथः ॥

ब्रह्मोवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य पार्वतीपरमेश्वरौ ।

अस्थातामासने तत्र तत्पूजाग्रहणाय वै ॥

तेनाथ पूजितौ तौ च प्रक्रान्तौ च पुनः पुनः ।

एवं च कृतवान् सप्त प्रणामांस्तु तथैव सः ॥

बद्धांजलिरथोवाच गणेशो बुद्धिसागरः ।

स्तुत्वा बहुतिथस्तात पितरौ प्रेमविह्वलौ ॥

पृथ्वीकी परिक्रमा करके मैं कौन - सा सुख प्राप्त कर २२ सकूँगा? ऐसा विचारकर गणेशजीने जो किया, उसे आप सुनिये । विधिपूर्वक स्नान करके स्वयं घर आकर २३ वे माता - पिता से कहने लगे- ॥ १ ९ -२३ ॥ गणेशजी बोले- हे तात! आप दोनोंकी पूजा | लिये मेरे द्वारा स्थापित इस आसनपर आप लोग बैठ २४ जाइये और मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये ॥ २४ ॥

ब्रह्माजी बोले- उनकी बात सुनकर पार्वती और परमेश्वर पूजा ग्रहण करनेके लिये आसनपर बैठ गये ॥ २५ ॥

२५ गणेशजीने उन दोनोंका पूजन किया और | बारंबार उनकी परिक्रमा की, इस प्रकार सात परिक्रमा २६ की तथा सात बार प्रणाम किया ॥ २६ ॥

हे तात! बुद्धिसागर गणेशजीने बारंबार उनकी | स्तुतिकर हाथ जोड़कर प्रेमविह्वल अपने माता - पितासे २७ | कहा- ॥ २७ ॥

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अ ० १ ९ ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८१७ गणेश उवाच

भो मातर्भो पितस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ।

शीघ्रं चैवात्र कर्तव्यो विवाहः शोभनो मम ॥

ब्रह्मोवाच

इत्येवं वचनं श्रुत्वा गणेशस्य महात्मनः ।

महाबुद्धिनिधिं तं तौ पितरावूचतुस्तदा ॥

शिवाशिवावूचतुः

प्रक्रामेत भवान्सम्यक् पृथिवीं च सकाननाम् ।

कुमारो गतवांस्तत्र त्वं गच्छ पुर आव्रज ॥

ब्रह्मोवाच

इत्येवं वचनं श्रुत्वा पित्रोर्गणपतिद्द्रुतम् ।

उवाच नियतस्तत्र वचनं क्रोधसंयुतः ॥

गणेश उवाच

भो मातर्भो पितर्धर्मरूपौ प्राज्ञौ युवां मतौ ।

धर्मतः श्रूयतां सम्यक् वचनं मम सत्तमौ ॥

मया तु पृथिवी क्रांता सप्तवारं पुनः पुनः ।

एवं कथं ब्रुवाते वै पुनश्च पितराविह ॥

ब्रह्मोवाच

तद्वचस्तु तदा श्रुत्वा लौकिकीं गतिमाश्रितौ ।

महालीलाकरौ तत्र पितरावूचतुश्च तम् ॥

पितरावूचतुः

कदा क्रांता त्वया पुत्र पृथिवी सुमहत्तरा ।

सप्तद्वीपा समुद्रांता महद्भिर्गहनैर्युता ॥

ब्रह्मोवाच

तयोरेवं वचः श्रुत्वा शिवाशंकरयोर्मुने ।

महाबुद्धिनिधिः पुत्रौ गणेशो वाक्यमब्रवीत् ॥

गणेश उवाच

भवतो: पूजनं कृत्वा शिवाशंकरयोरहम् ।

स्वबुद्ध्या हि समुद्रान्तपृथ्वीकृतपरिक्रमः ॥

इत्येवं वचनं वेदे शास्त्रे वा धर्मसञ्चये ।

वर्त्तते किं च तत्तथ्यं नहि किं तथ्यमेव वा ॥

पित्रोश्च पूजन कृत्वा प्रक्रांतिं च करोति यः ।

तस्य वै पृथिवीजन्यं फलं भवति निश्चितम् ॥

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत् ।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा ॥

गणेशजी बोले- हे माता एवं हे पिता! आप मेरी श्रेष्ठ बात सुनिये, अब शीघ्र ही मेरा सुन्दर २८ विवाह कर दीजिये ॥ २८ ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार महात्मा गणेशजीका यह वचन सुनकर माता - पिताने महा-२ ९ बुद्धिनिधि गणेशजीसे कहा- ॥ २ ९ ॥ शिवा - शिव बोले- तुम भी वनसहित पृथ्वीकी ठीक - ठीक परिक्रमा करो, कुमार गया हुआ है, वहाँ ३० तुम भी जाओ और पहले चले आओ ॥३० ॥

ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार माता - पिताके इस वचनको सुनकर गणेशजी संयत तथा कुपित होकर ३१ – कहने लगे —॥३१ ॥

गणेशजी बोले- हे माता एवं हे पिता! आप दोनों धर्मरूप और अत्यन्त विद्वान् माने गये हैं, अतः हे श्रेष्ठ ३२ । [ माता - पिता ]! मेरी धर्मसम्मत बातको ठीक - ठीक सुनिये । मैंने तो सात बार पृथ्वीकी परिक्रमा की है, तब हे माता-३३ पिता! आप दोनों ऐसा क्यों कह रहे हैं? ॥ ३२-३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- उसके बाद गणेशजीका वचन सुनकर महालीला करनेवाले उन दोनों शिवा - शिवने ३४ लौकिक रीतिका आश्रय लेते हुए कहा —॥३४ ॥

माता - पिता बोले- हे पुत्र! तुमने अति विशाल, सात द्वीपवाली, समुद्रपर्यन्त फैली हुई तथा घोर जंगलोंसे परिव्याप्त पृथ्वीकी परिक्रमा कब की? ॥ ३५ ॥

३५ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! शिवा - शिवके इस वचनको सुनकर महाबुद्धिके निधान पुत्र गणेशजी यह ३६ वचन कहने लगे - ॥ ३६ ॥

गणेशजी बोले- मैंने आप दोनों माता - पिता शिवा और शिवका पूजन करके अपनी बुद्धिसे समुद्रपर्यन्त ३७ पृथ्वीकी परिक्रमा कर ली । इस प्रकारका वचन वेदों, शास्त्रों तथा धर्मशास्त्रोंमें विद्यमान है, क्या यह वचन सत्य है अथवा सत्य नहीं है? ॥ ३७-३८ ॥ ३८ | माता - पिताका पूजनकर जो उनकी परिक्रमा कर ३ ९ लेता है, उसे पृथ्वीकी परिक्रमा करनेसे होनेवाला फल निश्चित रूपसे प्राप्त हो जाता है ॥३ ९ ॥ जो माता - पिताको घरमें छोड़कर तीर्थस्थानमें जाता है, उसके लिये वह वैसा ही पाप कहा गया ४० | है, जो उन दोनोंके वध करनेसे लगता 1180 11

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८१८ पुत्रस्य च महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम् । अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम् पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम् ॥

इति शास्त्राणि वेदाश्च भाषन्ते यन्निरन्तरम् ।

भवद्भ्यां तत्प्रकर्त्तव्यमसत्यं पुनरेव च ॥

भवदीयं त्विदं रूपमसत्यं च भवेदिह । तदा वेदोऽप्यसत्यो वै भवेदिति न संशयः

शीघ्रं च भवितव्यो मे विवाहः क्रियतां शुभः ।

अथवा वेदशास्त्रं च व्यलीकं कथ्यतामिति ॥

द्वयोः श्रेष्ठतमं मध्ये यत्स्यात्सम्यग्विचार्य तत् ।

कर्तव्यं च प्रयत्नेन पितरौ धर्मरूपिणौ ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा पार्वतीपुत्रः स गणेशः प्रकृष्टधीः ।

विरराम महाज्ञानी तदा बुद्धिमतां वरः ॥

तौ दंपती च विश्वेशौ पार्वतीशंकरौ तदा ।

इति श्रुत्वा वचस्तस्य विस्मयं परमं गतौ ॥

ततः शिवा शिवश्चैव पुत्रं बुद्धिविचक्षणम् ।

संप्रशस्योचतुः प्रीत्या तौ यथार्थप्रभाषिणम् ॥

शिवाशिवावूचतुः

पुत्र ते विमला बुद्धिः समुत्पन्ना महात्मनः ।

त्वयोक्तं यद्वचश्चैव ततश्चैव च नान्यथा ॥

समुत्पन्ने च दुःखे च यस्य बुद्धिर्विशिष्यते ।

तस्य दुःखं विनश्येत सूर्ये दृष्टे यथा तमः ॥

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।

कूपे सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥

वेदशास्त्रपुराणेषु बालकस्य यथोदितम् ।

त्वया कृतं तु तत्सर्वं धर्मस्य परिपालनम् ॥

सम्यक्कृतं त्वया यच्च तत्केनापि भवेदिह ।

आवाभ्यां मानितं तच्च नान्यथा क्रियतेऽधुना ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ माता -पिताका -1 चरणकमल ही पुत्रके लिये महान् ॥ ४१ तीर्थ है, अन्य तीर्थ तो दूर जानेपर प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥

। यह तीर्थ सन्निकट रहनेवाला, [ सभी प्रकारसे ४२ सुलभ और धर्मोका साधन है । पुत्रके लिये मातः सि ] । तथा स्त्रीके लिये पति ही घरमें सर्वोत्तम तीर्थ है ॥ ४२ वेद और धर्मशास्त्र निरन्तर ऐसा कहते हैं, ॥ ४३ आपलोगोंको भी यही करना चाहिये, अन्यथा ये असत्य हो जायँगे । ऐसी स्थितिमें आपका स्वरूप ही ॥ ४४ असत्य हो जायगा और तब वेद भी असत्य हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है । अतः अब मेरा शुभ ४५ विवाह शीघ्रतासे कीजिये, अथवा वेदों और शास्त्रोंको मिथ्या कहिये ॥४३–४५ ॥ हे धर्मस्वरूप माता - पिता! इन दोनोंमें जो ४६ श्रेष्ठतम हो, उसीको ठीक - ठीक विचारकर प्रयत्नपूर्वक कीजिये ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजी बोले- तब ऐसा कहकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ उत्कृष्ट बुद्धिवाले पार्वतीपुत्र गणेशजी मौन हो ४७ | गये ॥४७ ॥

इसके बाद विश्वके स्वामी दम्पती पार्वतीपरमेश्वर ४८ उनका यह वचन सुनकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो । गये । तदनन्तर उन शिवा - शिवने बुद्धिविचक्षण तथा यथार्थ बात कहनेवाले पुत्रकी प्रशंसा करते हुए यथार्थ ४ ९ बोलनेवाले उनसे प्रेमपूर्वक कहा— ॥ ४८-४९ ॥ शिवा - शिव बोले- हे पुत्र! तुझ महात्मामें निर्मल बुद्धि उत्पन्न हुई है, तुमने जो बात कही है, ५० । वह सत्य ही है, इसमें सन्देह नहीं है । संकट उपस्थित होनेपर भी जिसकी बुद्धिमें विशेषता बनी रहती हैं क उसका दुःख उसी प्रकार दूर हो जाता है, जैसे सूर्यके ५१ उदय होनेपर अन्धकार दूर हो जाता है । जिसके पाल बुद्धि है, उसीके पास बल है । बुद्धिहीनको बल कहाँसे प्राप्त होगा, [ बुद्धिके बलसे ] किसी खरगोशने ५२ मदोन्मत्त सिंहको कुएँ में गिरा दिया था । वेद - शास्त्रों | तथा पुराणोंमें बालकके लिये जो धर्मपालन बताया ५३ गया है, तुमने वह सब धर्मपालन किया है । तुमने जो । सम्यक् कार्य किया, उसे कोई नहीं कर सकता । हम दोनोंने तुम्हारी बात मान ली, अब उसे अन्यथा नहीं ५४ | किया जा सकता है ॥ ५०–५४ ॥

पृष्ठ 829

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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८१ ९ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे दोनों बुद्धिसागर इत्युक्त्वा तौ समाश्वास्य गणेशं बुद्धिसागरम् । गणेशको आश्वस्तकर उनका विवाह करनेके लिये

विवाहकरणे चास्य मतिं चक्रतुरुत्तमाम् ॥ ५५ । उत्तम विचार करने लगे ॥ ५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशविवाहोपक्रमो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशविवाहोपक्रम नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः प्रजापति विश्वरूपकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंके साथ गणेशजीका विवाह तथा उनसे ' क्षेम ' तथा ' लाभ ' नामक दो पुत्रोंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका पृथ्वीकी परिक्रमाकर लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंचपर्वतपर चले जाना, कुमारखण्डके श्रवणकी महिमा ब्रह्मोवाच

एतस्मिन्नन्तरे तत्र विश्वरूपः प्रजापतिः ।

तदुद्योगं संविचार्य सुखमाप प्रसन्नधीः ॥

विश्वरूपप्रजेशस्य दिव्यरूपे सुते उभे ।

सिद्धिबुद्धिरिति ख्याते शुभे सर्वांगशोभने ॥

ताभ्यां चैव गणेशस्य गिरिजा शंकरः प्रभू ।

महोत्सवं विवाहं च कारयामासतुर्मुदा ॥

संतुष्टा देवताः सर्वास्तद्विवाहे समागमन् ।

यथा चैव शिवस्यैव गिरिजाया मनोरथः ॥

तथा च विश्वकर्माऽसौ विवाहं कृतवांस्तथा ।

तथा च ऋषयो देवा लेभिरे परमां मुदम् ॥

गणेशोऽपि तदा ताभ्यां सुखं परमदुर्लभम् ।

प्राप्तवांश्च मुने तत्तु वर्णितुं नैव शक्यते ॥

कियता चैव कालेन गणेशस्य महात्मनः ।

द्वयोः पत्न्योश्च द्वौ दिव्यौ तस्य पुत्रौ बभूवतुः ॥

सिद्धेर्गणेशपल्यास्तु क्षेमनामा सुतोऽभवत् ।

बुद्धेर्लाभाभिधः पुत्रो ह्यासीत्परमशोभनः ॥

एवं सुखमचिन्त्यं वै भुञ्जाने हि गणेश्वरे ।

आजगाम द्वितीयश्च क्रान्त्वा पृथ्वीं सुतस्तदा ॥

तावच्च नारदेनैव प्राप्तो गेहे महात्मना ।

यथार्थं वच्मि नोऽसत्यं न छलेन न मत्सरात् ॥

ब्रह्माजी बोले- इसी बीच विश्वरूप नामक प्रजापति शिवा - शिवके इस निश्चयको जानकर १ प्रसन्नचित्त हुए ॥१ ॥

उन विश्वरूप प्रजापतिकी सिद्धि - बुद्धि नामक दो २ कन्याएँ थीं, जो सर्वांगसुन्दरी एवं दिव्य रूपवाली थीं ॥२ ॥

गिरिजा एवं महेश्वरने आनन्दपूर्वक उन दोनोंके ३ साथ गणेशजीका महोत्सवपूर्वक विवाह सम्पन्न कराया । सभी देवता प्रसन्न होकर उस विवाहमें आये । जैसा ४ पार्वती एवं शंकरका मनोरथ था, वैसे ही विश्वकर्माने

[ बड़ी प्रसन्नताके साथ ] गणेशका विवाह किया ।

५ देवता तथा ऋषिगण अत्यन्त प्रसन्न हुए॥३–५ ॥

हे मुने! उस समय गणेशको भी उन दोनोंसे ६ अति दुर्लभ सुख प्राप्त हुआ, उस सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता है । कुछ समय बीतनेके बाद महात्मा गणेशजीको उन दोनों भार्याओंसे दो दिव्य ७ पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ६-७ ॥ गणेशजीकी सिद्धि नामक पत्नीसे ‘ क्षेम ' नामक पुत्र ८ हुआ तथा बुद्धिसे ' लाभ ' नामक परम सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ । इस प्रकार गणेशजी अचिन्त्य सुखका उपभोग करने लगे, इसके बाद शिवजीके दूसरे पुत्र [ कार्तिकेय ] ९ पृथ्वीकी परिक्रमाकर वहाँ आ गये ॥ ८ - ९ ॥ उसी समय महात्मा नारद उनके घर पहुँच गये और उन्होंने कहा— [ हे कार्तिकेय! ] मैं यथार्थ कह रहा हूँ, १० असत्य नहीं, न छलसे अथवा न मत्सरसे कह रहा हूँ ॥ १० ॥

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८२० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २०

पितृभ्यां तु कृतं यच्च शिवया शंकरेण ते ।

तन्न कुर्यात्परो लोके सत्यं सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥

निष्कास्य त्वां कुक्रमणं मिषमुत्पाद्य यत्नतः ।

गणेशस्य वरोऽकारि विवाहः परशोभनः ॥

गणेशस्य कृतोद्वाहो लब्धवांस्त्रीद्वयं मुदा ।

विश्वरूपप्रजेशस्य कन्यारत्नं महोत्तमम् ॥

पुत्रद्वयं ललाभासौ द्वयोः पल्योः शुभांगयोः ।

सिद्धेः क्षेमं तथा बुद्धेर्लाभं सर्वसुखप्रदम् ॥

पल्योर्द्वयोर्गणेशोऽसौ लब्ध्वापुत्रद्वयं शुभम् ।

मातापित्रोर्मतेनैव सुखं भुंक्ते निरंतरम् ॥

भवता पृथिवी क्रान्ता ससमुद्रा सकानना ।

तच्छलाज्ञावशात्तात तस्य जातं फलं त्विदम् ॥

पितृभ्यां हि कृतं यत्तु छलं तात विचार्यताम् ।

स्वस्वामिभ्यां विशेषेण ह्यन्यः किन्न करोति वै ॥

असम्यक्च कृतं ताभ्यां त्वत्पितृभ्यां हि कर्म ह ।

विचार्यतां त्वयाऽपीह मच्चित्ते न शुभं मतम् ॥

दद्याद्यदि गरं माता विक्रीणीयात्पिता यदि ।

राजा हरति सर्वस्वं कस्मै किं च ब्रवीतु वै ॥

येनैवेदं कृतं स्याद्वै कर्मानर्थकरं परम् ।

शांतिकामस्सुधीस्तात तन्मुखं न विलोकयेत् ॥

इति नीतिः श्रुतौ प्रोक्ता स्मृतौ शास्त्रेषु सर्वतः ।

निवेदिता च सा तेऽद्य यथेच्छसि तथा कुरु ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्त्वा नारद त्वं तु महेश्वरमनोगतिः ।

तस्मै तथा कुमाराय वाक्यं मौनमुपागतः ॥

स्कन्दोऽपि पितरं नत्वा कोपाग्निज्वलितस्तदा ।

जगाम पर्वतं क्रौंचं पितृभ्यां वारितोऽपिसन् ॥

तुम्हारे माता - पिता शिवा - शिवने जो कार्य किया ११ है, उसे इस लोकमें कोई नहीं कर सकता । यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ । उन लोगोंने पृथ्वीकी परिक्रमाका बहाना बनाकर तुम्हें घरके बाहर निकालकर गणेशजीका उत्तम १२ तथा अत्यन्त शोभन विवाह कर दिया ॥ ११-१२ ॥ इस समय गणेशजीका विवाह हो गया है, उन्हें १३ विश्वरूप प्रजापतिकी अत्यन्त मनोहर रत्नरूपा दो कन्याएँ स्त्रीके रूपमें प्राप्त हुई हैं । शुभ अंगोंवाली उन दोनों पत्नियोंसे उन्होंने दो पुत्र भी उत्पन्न किये १४ हैं, सिद्धिसे क्षेम तथा बुद्धिसे लाभ नामक सर्वसुखप्रद पुत्र प्राप्त किये हैं ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार वे गणेश अपनी दोनों पत्नियोंसे दो पुत्र १५ प्राप्तकर माता- पिताके मतमें रहकर निरन्तर सुखोपभोग कर रहे हैं । छलपूर्वक दी गयी माता - पिताकी आज्ञासे

तुमने समुद्र - वनसहित पृथ्वीकी परिक्रमा कर डाली ।

१६ हे तात! उसका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ ॥ १५-१६ ॥

हे तात! तुम्हारे माता - पिताने जो छल किया है, १७ उसपर तुम विचार करो । जब अपने स्वामी ऐसा कर सकते हैं, तो दूसरा क्या नहीं कर सकता ॥ १७ ॥

तुम्हारे उन पिता - माताने यह अनुचित कार्य १८ किया है, तुम इसपर विचार करो, मेरे विचारसे तो यह मत ठीक नहीं है ॥ १८ ॥

यदि माता ही विष दे दे, पिता बेच दे और १ ९ राजा सर्वस्व हर ले तो फिर किससे क्या कहा जा सकता है ॥१ ९ ॥ हे तात! जिस किसीने भी इस प्रकारका अनर्थकारी २० कार्य किया हो, उसका मुख शान्तिकी इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान् पुरुषको नहीं देखना चाहिये ॥ २० ॥

यह नीति श्रुतियों, स्मृतियों तथा शास्त्रोंमें सर्वत्र २१ कही गयी है । मैंने उसे तुमसे कह दिया, अब तुम जैसा चाहो, वैसा करो ॥ २१ ॥

मनकी ब्रह्माजी बोले- हे नारद! महेश्वरके गति जाननेवाले आपने उन कुमारसे इस प्रकारका २२ वचन कहकर मौन धारण कर लिया । तब कुमा जलते | स्कन्द भी माता - पिताको प्रणामकर क्रोधाग्निसे | हुए शिवा - शिवके मना करनेपर भी क्रौंच पर्वतपर २३ | चले गये ॥ २२-२३ ॥