शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 831–840

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

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अ ० २० ] रुद्रसंहिता ( कुमारखण्ड ) ८२१

वारणे च कृते त्वद्य गम्यते च कथं त्वया ।

इत्येवं च निषिद्धोऽपि प्रोच्य नेति जगाम सः ॥ २४

न स्थातव्यं मया तातौ क्षणमप्यत्र किंचन ।

यद्येवं कपटं प्रीतिमपहाय कृतं मयि ॥ २५

एवमुक्त्वा गतस्तत्र मुने सोऽद्यापि वर्तते ।

दर्शनेनैव सर्वेषां लोकानां पापहारकः ॥ २६

तद्दिनं हि समारभ्य कार्तिकेयस्य तस्य वै ।

शिवपुत्रस्य देवर्षे कुमारत्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २७

तन्नाम शुभदं लोके प्रसिद्धं भुवनत्रये ।

सर्वपापहरं पुण्यं ब्रह्मचर्यप्रदं परम् ॥ २८ ।

कार्तिक्यां च सदा देवा ऋषयश्च सतीर्थकाः ।

दर्शनार्थं कुमारस्य गच्छंति च मुनीश्वराः ॥ २ ९

कार्तिक्यां कृत्तिकासंगे कुर्याद्यः स्वामिदर्शनम् ।

तस्य पापं दहेत्सर्वं चित्तेप्सितफलं लभेत् ॥ ३०

उमाऽपि दुःखमापन्ना स्कन्दस्य विरहे सति ।

उवाच स्वामिनं दीना तत्र गच्छ मया प्रभो ॥ ३१

तत्सुखार्थं स्वयं शंभुर्गतः स्वांशेन पर्वते ।

मल्लिकार्जुननामासीज्ज्योतिर्लिङ्गं सुखावहम् ॥ ३२

अद्यापि दृश्यते तत्र शिवया सहितश्शिवः ।

सर्वेषां निजभक्तानां कामपूरः सतां गतिः ॥३३

तमागतं स विज्ञाय कुमारः सशिवां शिवम् ।

स विरज्य ततोऽन्यत्र गंतुमासीत्समुत्सुकः ॥ ३४

देवैश्च मुनिभिश्चैव प्रार्थितः सोऽपि दूरतः ।

योजनत्रयमुत्सृज्य स्थितः स्थाने च कार्तिकः ॥ ३५

पुत्रस्नेहातुरौ तौ वै शिवौ पर्वणि पर्वणि ।

दर्शनार्थं कुमारस्य तस्य नारद गच्छतः ॥ ३६

[ माता - पिताने कहा- ] हे कार्तिकेय! मना करनेपर भी इस समय तुम क्यों जा रहे हो? किंतु इस प्रकार रोके जानेपर ' नहीं ' - – ऐसा कहकर वे कुमार चलने लगे और बोले— ॥२४ ॥

हे तात! मैं अब यहाँ क्षणमात्र भी नहीं रह सकता; क्योंकि आपने मुझपर प्रीति न कर ऐसा कपट किया है - इस प्रकार कहकर हे मुने! दर्शनमात्रसे ही सबका पाप हरनेवाले कुमार कार्तिकेय वहाँ चले गये और तभीसे वे आज भी वहींपर हैं ॥ २५-२६ ॥ हे देवर्षे! उसी दिनसे लेकर वे शिवपुत्र कार्तिकेय कुमार ही रह गये । उनका यह नाम तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है, यह शुभदायक, सब पापोंको नष्ट करनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा ब्रह्मचर्य प्रदान करनेवाला है ॥ २७-२८ ॥ कार्तिक पूर्णिमाके दिन सभी देवता, ऋषि, मुनि तथा सभी तीर्थ कुमारके दर्शनके निमित्त जाते हैं ॥ २ ९ ॥ कृत्तिकानक्षत्रयुक्त कार्तिक पूर्णिमा तिथिमें जो कुमारका दर्शन करता है, उसके पाप भस्म हो जाते हैं और उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है ॥ ३० ॥

स्कन्दका वियोग होनेपर पार्वतीजी भी दुःखित हुईं और उन्होंने दीन होकर शिवजीसे कहा — हे प्रभो! आप मेरे साथ वहाँ चलिये ॥ ३१ ॥

तब उनको सुखी करनेके लिये शंकरजी स्वयं अपने अंशसे [ क्रौंच ] पर्वतपर गये, वहाँ मल्लिकार्जुन नामक सुखदायक ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है ॥ ३२ ॥

अपने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले तथा सज्जनोंको शरण देनेवाले शिवजी पार्वतीके साथ आज भी वहाँ दिखायी पड़ते हैं ॥३३ ॥

तब पार्वतीसहित उन शिवको आया हुआ जानकर वे कुमार विरक्त होकर वहाँसे अन्यत्र जानेको उद्यत हो गये ॥३४ ॥

तब देवताओं तथा मुनियोंके बहुत प्रार्थना करनेपर भी वे कार्तिकेय उस स्थानसे तीन योजन दूर हटकर निवास करने लगे ॥ ३५ ॥

हे नारद! पुत्रके स्नेहसे आतुर वे दोनों शिवा-शिव कुमारके दर्शनके लिये पर्व - पर्वपर वहाँ जाते रहते हैं ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 832

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८२२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २०

अमावास्यादिने शंभुः स्वयं गच्छति तत्र ह ।

पूर्णमासीदिने तत्र पार्वती गच्छति ध्रुवम् ॥ ३७

यद्यत्तस्य च वृत्तान्तं भवत्पृष्टं मुनीश्वर ।

कार्तिकस्य गणेशस्य परमं कथितं मया ॥ ३८

एतच्छ्रुत्वा नरो धीमान् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

शोभनां लभते कामानीप्सितान्सकलान्सदा ॥ ३ ९

यः पठेत्पाठयेद्वापि शृणुयाच्छ्रावयेत्तथा ।

सर्वान्कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ४०

ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी क्षत्रियो विजयी भवेत् ।

वैश्यो धनसमृद्धस्स्याच्छूद्रस्सत्तमतामियात् ॥ ४१

रोगी रोगात्प्रमुच्येत भयान्मुच्येत भीतियुक् ।

भूतप्रेतादिबाधाभ्यः पीडितो न भवेन्नरः ॥ ४२

एतदाख्यानमनघं यशस्यं सुखवर्द्धनम् ।

आयुष्यं स्वर्ग्यमतुलं पुत्रपौत्रादिकारकम् ॥ ४३

अपवर्गप्रदं चापि शिवज्ञानप्रदं परम् ।

शिवाशिवप्रीतिकरं शिवभक्तिविवर्द्धनम् ॥ ४४ ।

श्रवणीयं सदा भक्तैर्निष्कामैश्च मुमुक्षुभिः 1 शिवाद्वैतप्रदं चैतत्सदाशिवमयं शिवम् ॥ ४५ । इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां अमावास्याके दिन वहाँ शिवजी स्वयं जाते हैं एवं पूर्णमासीके दिन पार्वती निश्चित रूपसे उनके स्थानपर जाती हैं ॥ ३७ ॥

हे मुनीश्वर! आपने कार्तिकेय तथा गणेश्वरका जो - जो वृत्तान्त पूछा, मैंने वह श्रेष्ठ वृत्तान्त आपसे वर्णित किया ॥ ३८ ॥

इस कथाको सुनकर बुद्धिमान् मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है और अपनी सम्पूर्ण अभिलषित शुभ कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥३ ९ ॥ जो इस कथाको पढ़ता है अथवा पढ़ाता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सभी मनोरथ प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥

ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी तथा क्षत्रिय विजयी हो जाता है । वैश्य धनसे सम्पन्न हो जाता है और शूद्र श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है ॥४१ ॥

रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और भयभीत व्यक्ति भयसे मुक्त हो जाता है । वह मनुष्य भूत - प्रेत आदि बाधाओंसे पीड़ित नहीं होता है ॥ ४२ ॥

यह आख्यान पापरहित, यश तथा सुखको बढ़ानेवाला, आयुमें वृद्धि करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, अतुलनीय तथा पुत्र - पौत्रादि प्रदान करनेवाला, मोक्षदायक - शिवविषयक ज्ञानको देनेवाला, शिवाशिवका प्रीतिकारक तथा शिवकी भक्तिको बढ़ानेवाला है॥४३-४४ ॥ भक्तोंको तथा निष्काम मुमुक्षुओंको शिवजीके अद्वैतज्ञान देनेवाले, कल्याणकारक तथा सदा शिवमय इस आख्यानका सर्वदा श्रवण करना चाहिये ॥ ४५ ॥

रुद्रसंहितायां चतुर्थे कुमारखण्डे गणेशविवाहवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

॥इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके चतुर्थ कुमारखण्डमें गणेशविवाहवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥

॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां चतुर्थः कुमारखण्डः समाप्तः ॥

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॥ ॐ श्रीसाम्बशिवाय नमः ॥ ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमो युद्धखण्डः अथ प्रथमोऽध्यायः तारकासुरके पुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली एवं कमलाक्षकी तपस्यासे प्रसन्न ब्रह्माद्वारा उन्हें वरकी प्राप्ति, नारद उवाच

श्रुतमस्माभिरानंदप्रद चरितमुत्तमम् ।

गृहस्थस्यैव शंभोश्च गणस्कंदादिसत्कथम् ॥ १

इदानीं ब्रूहि सुप्रीत्या चरितं वरमुत्तमम् ।

शंकरो हि यथा रुद्रो जघान विहरन् खलान् ॥ २

कथं ददाह भगवान्नगराणि सुरद्विषाम् ।

त्रीण्येकेन च बाणेन युगपत्केन वीर्यवान् ॥ ३

एतत्सर्वं समाचक्ष्व चरितं शशिमौलिनः ।

देवर्षिसुखदं शश्वन्मायाविहरतः प्रभोः ॥ ४

ब्रह्मोवाच

एवमेतत्पुरा पृष्टो व्यासेन ऋषिसत्तम ।

सनत्कुमारं प्रोवाच तदेव कथयाम्यहम् ॥ ५

सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास महाप्राज्ञ चरितं शशिमौलिनः ।

यथा ददाह त्रिपुरं बाणेनैकेन विश्वहृत् ॥ ६

शिवात्मजेन स्कन्देन निहते तारकासुरे ।

तत्पुत्रास्तु त्रयो दैत्याः पर्यतप्यन्मुनीश्वर ॥ ७

तारकाक्षस्तु तज्ज्येष्ठो विद्युन्माली च मध्यमः ।

कमलाक्षः कनीयांश्च सर्वे तुल्यबलाः सदा ॥ ८

जितेन्द्रियाः सुसन्नद्धाः संयताः सत्यवादिनः ।

दृढचित्ता महावीरा देवद्रोहिण एव च ॥ ९

ते तु मेरुगुहां गत्वा तपश्चक्रुर्महाद्भुतम् ।

त्रयः सर्वान्सुभोगांश्च विहाय सुमनोहरान् ॥ १०

तीनों पुरोंकी शोभाका वर्णन नारदजी बोले - [ हे ब्रह्मन्! ] हमने गणेश तथा स्कन्दकी सत्कथासे समन्वित गृहस्थ शिवजीके आनन्दप्रद उत्तम चरित्रका श्रवण किया । विहार करते हुए शिवजीने जिस प्रकार दुष्टोंका वध किया, अब आप उस श्रेष्ठ एवं उत्तम चरित्रका अत्यन्त प्रेमपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥ पराक्रमशाली भगवान् शंकरने एक ही बाणसे एक साथ दैत्योंके तीनों पुरोंको किस प्रकार जलाया? ॥ ३ ॥

आप मायासे निरन्तर विहार करनेवाले भगवान् शंकरके इस सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन कीजिये, जो देवताओं तथा ऋषियोंको सुख देनेवाला है ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले – हे ऋषिश्रेष्ठ! पूर्वकालमें व्यासजीने महर्षि सनत्कुमारसे यही बात पूछी थी, तब सनत्कुमारजीने उनसे जैसा कहा था, वही बात मैं आपसे कह रहा हूँ ॥५ ॥

सनत्कुमार बोले — हे महाविद्वान् व्यासजी! आप शंकरके उस चरित्रको सुनिये, जिस प्रकार विश्वका संहार करनेवाले उन शिवने एक ही बाणसे त्रिपुरको भस्म किया था । हे मुनीश्वर! शिवजीके पुत्र कार्तिकेयके द्वारा तारकासुरका वध कर दिये जानेपर उसके तीनों पुत्र दैत्य घोर तप करने लगे॥६-७ ॥ उनमें तारकाक्ष ज्येष्ठ, विद्युन्माली मध्यम तथा कमलाक्ष कनिष्ठ था । वे सभी समान पराक्रमवाले, जितेन्द्रिय, महाबलवान्, कार्यमें तत्पर, संयमी, सत्यवादी, दृढ़चित्त महावीर एवं देवताओंके द्रोही थे ॥ ८ - ९ ॥ तीनों , दैत्य सम्पूर्ण मनोहर भोगोंको त्यागकर मेरुकी गुफामें जाकर अत्यन्त अद्भुत तप करने लगे ॥ १० ॥

पृष्ठ 834

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८२४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १

वसन्ते सर्वकामांश्च गीतवादित्रनिस्स्वनम् ।

विहाय सोत्सवं तेपुस्त्रयस्ते तारकात्मजाः ॥

ग्रीष्मे सूर्यप्रभां जित्वा दिक्षु प्रज्वाल्य पावकम् ।

तन्मध्यसंस्थाः सिद्ध्यर्थं जुहुवुर्हव्यमादरात् ॥

महाप्रतापपतिताः सर्वेऽप्यासन् सुमूर्च्छिताः ।

वर्षासु गतसंत्रासा वृष्टिं मूर्द्धन्यधारयन् ॥

शरत्काले प्रभूतं तु भोजनं तु बुभुक्षिताः ।

रम्यं स्निग्धं स्थिरं हृद्यं फलं मूलमनुत्तमम् ॥

संयमात्क्षुत्तृषो जित्वा पानान्युच्चावचान्यपि ।

बुभुक्षितेभ्यो दत्त्वा तु बभूवुरुपला इव ॥

संस्थितास्ते महात्मानो निराधाराश्चतुर्दिशम् ।

हेमंते गिरिमाश्रित्य धैर्येण परमेण तु ॥

तुषारदेहसंछन्ना जलक्लिन्नेन वाससा ।

आसाद्य देहं क्षौमेण शिशिरे तोयमध्यगाः ॥

अनिर्विण्णास्ततः सर्वे क्रमशोऽवर्द्धयंस्तपः ।

तेपुस्त्रयस्ते तत्पुत्रा विधिमुद्दिश्य सत्तमाः ॥

तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः ।

तपसा कर्षयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्तमाः ॥

वर्षाणां शतकं चैव पदमेकं निधाय च ।

भूमौ स्थित्वा परं तत्र तेपुस्ते बलवत्तराः ॥

ते सहस्रं तु वर्षाणां वातभक्षाः सुदारुणाः ।

तपस्तेपुर्दुरात्मानः परं तापमुपागताः ॥

वर्षाणां तु सहस्त्रं वै मस्तकेनास्थितास्तथा ।

वर्षाणां तु शतेनैव ऊर्ध्वबाहव आस्थिताः ॥

एवं दुःखं परं प्राप्ता दुराग्रहपरा इमे । ईदृक् ते संस्थिता दैत्या दिवारात्रमतंद्रिताः ॥

एवं तेषां गतः कालो महान् सुतपतां भुने ।

ब्रह्मात्मनां तारकाणां धर्मेणेति मतिर्मम ॥

तारकासुरके वे तीनों पुत्र वसन्त - ऋतुमें उत्सवसहित ११ गीत - वाद्यकी ध्वनि तथा समस्त कामनाएँ त्यागका तप करने लगे ॥ ११ ॥

ग्रीष्म ऋतु सूर्यके तेजको जीतकर अपने १२ चारों ओर अग्नि जलाकर तथा उसके मध्यमें स्थित होकर वे सिद्धिके लिये आदरपूर्वक हव्यकी आहुति देने लगे ॥१२ ॥

उस समय वे महान् गर्मीसे सन्तप्त होकर मूर्च्छित १३ हो जाते थे और वर्षाकालमें निर्भीक होकर सिरपर वृष्टिको सह लेते थे । शरत्कालमें उत्पन्न हुए मनोहर, स्निग्ध, स्थिर, उत्तम फल- मूलादि पदार्थोंका तथा १४ उत्तम प्रकारके पेय - पदार्थोंका भूखोंके लिये दानकर स्वयं भूखे रह जाते थे, वे संयमपूर्वक भूख - प्यासको १५ जीतकर पत्थरके समान हो गये थे॥१३–१५ ॥ वे महात्मा हेमन्त - ऋतुमें पहाड़ोंका आश्रय १६ लेकर बड़ी धीरताके साथ स्थित हो, निराधार हो चारों दिशाओंमें निवास करने लगे । तुषारसे आच्छादित शरीरवाले वे सब निरन्तर जलसे भीगे हुए रेशमी वस्त्र १७ धारणकर शिशिर ऋतुमें जलके बीचमें खड़े होकर विषादरहित होकर क्रमशः अपने तपको बढ़ाने लगे । १८ इस प्रकार ब्रह्माजीको उद्देश्य करके उस [ तारकासुर ] -के वे तीनों श्रेष्ठ पुत्र तप कर रहे थे॥१६–१८ ॥ वे श्रेष्ठ दानव परम नियममें स्थित रहकर १ ९ कठोर तप करके तपस्याके द्वारा अपने शरीरको सुखाने लगे ॥१ ९ ॥ सौ वर्षतक एक पैरके सहारे पृथ्वीपर खड़े २० होकर उन अति बलवान् दैत्योंने तप किया । वे दारूर | तथा दुरात्मा दैत्य हजार वर्षपर्यन्त वायुका भक्षणकर २१ महान् कष्टसे युक्त हो तप करते रहे ॥ २०-२१ ॥ वे एक हजार वर्षतक पृथ्वीपर सिरके बल खड़े २२ रहे और सौ वर्षतक दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर खड़े रहे । इस प्रकार दुराग्रहमें तत्पर होकर उन्होंने | बहुत क्लेश प्राप्त किया, वे दैत्य आलस्यको छोड़कर २३ दिन - रात तप करने लगे ॥ २२-२३ हे महामुने! इस प्रकार धर्मपूर्वक ॥ तप करते हुए | तथा ब्रह्माजीमें मन लगाये हुए उन तारकपुत्रोंका बहुत २४ । समय बीत गया ऐसा मेरा विचार है । उसके बाद ,

पृष्ठ 835

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अ ० १ ] रुद्रसंहिता (

प्रादुरासीत्ततो ब्रह्मा सुरासुरगुरुर्महान् ।

संतुष्टस्तपसा तेषां वरं दातुं महायशाः ॥ २५

मुनिदेवासुरैः सार्द्धं सांत्वपूर्वमिदं वचः ।

ततस्तानब्रवीत्सर्वान् सर्वभूतपितामहः ॥ २६

ब्रह्मोवाच

प्रसन्नोऽस्मि महादैत्या युष्माकं तपसा मुने ।

सर्वं दास्यामि युष्मभ्यं वरं ब्रूत यदीप्सितम् ॥ २७

किमर्थं सुतपस्तप्तं कथयध्वं सुरद्विषः ।

सर्वेषां तपसो दाता सर्वकर्तास्मि सर्वदा ॥ २८

सनत्कुमार उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शनैस्ते स्वात्मनो गतम् ।

ऊचुः प्रांजलयः सर्वे प्रणिपत्य पितामहम् ॥ २ ९

दैत्या ऊचुः

यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया ।

अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु देहिनः ॥ ३०

स्थिरान् कुरु जगन्नाथ पान्तु नः परिपंथिनः ।

जरारोगादयः सर्वे नास्मान्मृत्युरगात् क्वचित् ॥ ३१

अजराश्चामराः सर्वे भवाम इति नो मतम् ।

समृत्यवः करिष्यामः सर्वानन्यस्त्रिलोकके ॥ ३२

लक्ष्म्या किं तद्विपुलया किं कार्यं हि पुरोत्तमैः ।

अन्यैश्च विपुलैर्भोगैः स्थानैश्वर्येण वा पुनः ॥ ३३

यत्रैव मृत्युना ग्रस्तो नियतं पंचभिर्दिनैः ।

व्यर्थं तस्याखिलं ब्रह्मन् निश्चितं न इतीव हि ॥ ३४

सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तेषां दैत्यानां च तपस्विनाम् ।

प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा स्वप्रभुं गिरिशं विधिः ॥ ३५

ब्रह्मोवाच

नास्ति सर्वामरत्वं च निवर्तध्वमतोऽसुराः ।

अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशो वो हि रोचते ॥ ३६

युद्धखण्ड ) ८२५ सुरासुरके महान् गुरु तथा महायशस्वी ब्रह्माजी उनके तपसे सन्तुष्ट हो गये और उन्हें वर देनेके लिये प्रकट हुए ॥ २४-२५ ॥ उस समय सभी प्राणियोंके पितामह ब्रह्माजी मुनियों, देवगणों तथा असुरोंके साथ वहाँ जाकर सान्त्वना देते हुए उन सभीसे यह वचन कहने लगे- ॥ २६ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे महादैत्यो! मैं तुमलोगोंके तपसे प्रसन्न हो गया हूँ । मैं तुमलोगोंको सब कुछ दूँगा, जो तुमलोगोंका अभीष्ट वर हो, उसे कहो ॥ २७ ॥

हे देवशत्रुओ! मैं सबकी तपस्याका फलदाता और सर्वदा सबका रचयिता हूँ, अतः बताओ कि तुमलोगोंने अत्यन्त कठिन तप किस उद्देश्यसे किया है?॥ २८ ॥

सनत्कुमार बोले— उनकी यह बात सुनकर उन सबने हाथ जोड़कर पितामहको प्रणाम करके फिर धीरे - धीरे अपने मनकी बात कही ॥ २ ९ ॥ दैत्य बोले — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और हमें वर देना चाहते हैं, तो हमें सब प्राणियोंमें सभीसे अवध्यत्व प्रदान कीजिये ॥३० ॥

हे जगन्नाथ! आप हमें स्थिर कर दें और हमें जरा, रोग एवं मृत्यु आदि कभी भी प्राप्त न हों । हम सभी अजर - अमर हो जायँ - ऐसा हमारा विचार है । हमलोग तीनों लोकोंमें अन्य सभी प्राणियोंको मार सकें । पर्याप्त लक्ष्मीसे, उत्तम पुरोंसे, अन्य विपुल भोगोंसे, स्थानोंसे अथवा ऐश्वर्यसे हमें क्या प्रयोजन! हे ब्रह्मन्! यदि पाँच ही दिनोंमें प्राणी मृत्युके द्वारा ग्रसित हो जाता है- यह निश्चित ही है, तब तो उसका सब कुछ व्यर्थ हो जाता है, इसमें संशय नहीं | है॥३१–३४ ॥ सनत्कुमार बोले- - उन तपस्वी दैत्योंकी यह बात सुनकर ब्रह्माने गिरिपर शयन करनेवाले अपने स्वामी भगवान् शंकरका स्मरण करके कहा- ॥३५ ॥

ब्रह्माजी बोले - हे असुरो! पूर्ण अमरत्व किसीको नहीं मिल सकता, इसलिये इस वरका आग्रह मत करो और अन्य वर माँग लो, जो । तुमलोगोंको अच्छा लगे ॥ ३६ ॥

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८२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १

जातो हनिष्यते नूनं जंतुः कोऽप्यसुराः क्वचित् ।

अजरश्चामरो लोके न भविष्यति भूतले ॥

ऋते तु खंडपरशोः कालकालाद्धरेस्तथा ।

तौ धर्माधर्मपरमावव्यक्तौ व्यक्तरूपिणौ ॥

संपीडनाय जगतो यदि स क्रियते तपः ।

सफलं तद्गतं वेद्यं तस्मात्सुविहितं तपः ॥

तद्विचार्य स्वयं बुद्ध्या न शक्यं यत्सुरासुरैः ।

दुर्लभं वा सुदुस्साध्यं मृत्युं वंचयतानघाः ॥

तत्किंचिन्मरणे हेतुं वृणीध्वं सत्त्वमाश्रिताः ।

येन मृत्युर्नैव वृतो रक्षतस्तत्पृथक् पृथक् ॥

सनत्कुमार उवाच

एतद्विधिवचः श्रुत्वा मुहूर्त्तं ध्यानमास्थिताः ।

प्रोचुस्ते चिंतयित्वाथ सर्वलोकपितामहम् ॥

दैत्या ऊचुः

भगवन्नास्ति नो वेश्म पराक्रमवतामपि ।

अधृष्याः शात्रवानां तु यत्र वत्स्यामहे सुखम् ॥

पुराणि त्रीणि नो देहि निर्मायात्यद्भुतानि हि ।

सर्वसंपत्समृद्धान्यप्रधृष्याणि दिवौकसाम् ॥

वयं पुराणि त्रीण्येवं समास्थाय महीमिमाम् ।

चरिष्यामो हि लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो ॥

तारकाक्षस्ततः प्राह यदभेद्यं सुरैरपि ।

करोति विश्वकर्मा तन्मम हेममयं पुरम् ॥

ययाचे कमलाक्षस्तु राजतं सुमहत्पुरम् ।

विद्युन्माली च संहृष्टो वज्रायसमयं महत् ॥

पुरेष्वेतेषु भो ब्रह्मन्नेकस्थानस्थितेषु च ।

मध्याह्नाभिजिते काले शीतांशी पुष्य संस्थिते ॥

उपर्युपर्यदृष्टेषु व्योम्नि लीलाभ्रसंस्थिते । हे असुरो! इस भूतलपर जहाँ भी जो कोई भी ३७ प्राणी जनमा है, वह अवश्य मरेगा, कालके भी काम | भगवान् शंकर तथा श्रीहरिके अतिरिक्त इस जगत्में | कोई भी प्राणी अजर - अमर नहीं हो सकता; क्योंकि ३८ वे दोनों धर्म, अधर्मसे परे हैं तथा व्यक्त और अव्यक्त हैं ॥ ३७-३८ ॥ यदि जगत्को पीड़ा पहुँचानेके लिये तप किया ३ ९ जाय, तो उसका फल नष्ट समझना चाहिये । अतः उत्तम उद्देश्यके लिये किया गया तप सफल होता है ॥ ३ ९ ॥ हे अनघ! तुमलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार ४० करके जिस मृत्युका अतिक्रमण दुर्लभ एवं दुःसाध्य है और देवता तथा असुर भी ऐसा नहीं कर सके, ऐसी मृत्युके अतिरिक्त अन्य वर माँगो । तुमलोग सत्त्वगुणका ४ ९ आश्रय लेकर अपने मरणका हेतुभूत कोई वर माँगो तथा उस हेतुसे अपनी - अपनी रक्षाका उपाय अलग - अलग रूपसे करो, जिससे तुम्हारी मृत्यु न हो ॥ ४०-४१ ॥ सनत्कुमार बोले- ब्रह्माका वचन सुनकर वे एक मुहूर्ततक ध्यानमें स्थित रहे, इसके बाद विचारकर ४२ लोकपितामह ब्रह्मासे कहने लगे – ॥४२ ॥

दैत्य बोले – हे भगवन्! हमलोग यद्यपि पराक्रमशील हैं, किंतु हमारे पास कोई ऐसा स्थान ४३ नहीं है, जिसमें शत्रु प्रवेश न कर सके और वहाँ हम सुखसे निवास कर सकें । अतः आप ऐसे तीन नगरोंका निर्माण कराकर हमें प्रदान कीजिये, जो परम ४४ अद्भुत, सभी सम्पत्तियोंसे परिपूर्ण और देवताओंके लिये सर्वथा अनतिक्रमणीय हों ॥ ४३-४४ ॥ हे लोकेश! हे जगद्गुरो! इस प्रकार हमलोग ४५ आपकी कृपासे इन तीनों पुरोंमें स्थित होकर इस | पृथ्वीपर विचरण करेंगे । तत्पश्चात् तारकाक्ष बोला-४६ | जो देवगणोंसे भी अभेद्य हो, इस प्रकारका । सुवर्णमय पुर विश्वकर्मा बनायें । कमलाक्षने चाँदीके अति विशाल पुरकी तथा विद्युन्मालीने प्रसन्न होकर ४७ अनके समान मुरहके तुश्की याचना की । मनु - मह मुहूर्त हे ब्रह्मन्! जब मध्याह्नकालमें अभिजित् नीले ४८ हो, चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रपर हो और आकाशमें | बादलोंपर स्थित होकर ये तीनों पुर क्रमश: एकके रहें । | ऊपर एक रहते हुए लोगोंकी दृष्टिसे ओझल

पृष्ठ 837

शिव महापुराण - १, पृष्ठ 837 का मूल पृष्ठ
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अ ० १ ] रुद्रसंहिता ( वर्षत्सु कालमेघेषु पुष्करावर्तनामसु ॥ ४ ९ ।

तथा वर्षसहस्त्रान्ते समेष्यामः परस्परम् ।

एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि नान्यथा ॥ ५०

सर्वदेवमयो देवः सर्वेषां नः कुहेलया ।

असंभवे रथे तिष्ठन् सर्वोपस्करणान्विते ॥ ५१

असंभाव्यैककांडेन भिनत्तु नगराणि नः ।

निर्वैरः कृत्तिवासास्तु योऽस्माकमिति नित्यशः ॥ ५२

वंद्यः पूज्योऽभिवाद्यश्च सोस्माकं निर्दहेत्कथम् ।

इति चेतसि संधाय तादृशो भुवि दुर्लभः ॥ ५३

सनत्कुमार उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।

एवमस्त्विति तान् प्राह सृष्टिकर्त्ता स्मरन् शिवम् ॥ ५४

आज्ञां ददौ मयस्यापि कुरु त्वं नगरत्रयम् ।

कांचनं राजतं चैव आयसं चेति भो मय ॥ ५५

इत्यादिश्य मयं ब्रह्मा प्रत्यक्षं प्राविशद्दिवम् ।

तेषां तारकपुत्राणां पश्यतां निजधाम हि ॥ ५६

ततो मयश्च तपसा चक्रे धीरः पुराण्यथ ।

कांचनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम् ॥ ५७

विद्युन्माल्यायसं चैव त्रिविधं दुर्गमुत्तमम् ।

स्वर्गे व्योग्नि च भूमौ च क्रमाज्ज्ञेयानि तानि वे ॥ ५८

दत्त्वा तेभ्योऽसुरेभ्यश्च पुराणि त्रीणि वै मयः ।

प्रविवेश स्वयं तत्र हितकामपरायणः ॥ ५ ९

एवं पुरत्रयं प्राप्य प्रविष्टास्तारकात्मजाः ।

बुभुजुः सकलान्भोगान्महाबलपराक्रमाः ॥६०

कल्पद्रुमैश्च संकीर्णं गजवाजिसमाकुलम् ।

नानाप्रासादसंकीर्णं मणिजालसमावृतम् ॥ ६१

सूर्यमण्डलसंकाशैर्विमानैः सर्वतोमुखैः ।

पद्मरागमयैश्चैव शोभितं चन्द्रसन्निभैः ॥ ६२

युद्धखण्ड ) ८२७ फिर जब पुष्कर और आवर्त नामक कालमेघ वर्षा कर | रहे हों, उस समय एक हजार वर्षके उपरान्त हमलोग परस्पर मिलेंगे और ये तीनों पुर भी उसी समय एक स्थानपर स्थित हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है । हमलोगोंद्वारा धर्मका अतिक्रमण हो जानेपर कोई देवता, जिसमें सभी देवोंका निवास हो, वह सम्पूर्ण युद्धसामग्रीसे युक्त होकर असम्भव रथपर बैठकर एक ही असम्भाव्य बाणसे हमारे नगरोंका भेदन करे । शिवजी तो किसीसे द्वेष नहीं करते । वे सदा हमलोगोंके वन्द्य, पूज्य तथा अभिवादनके योग्य हैं, तो फिर वे हमलोगोंके पुरोंको कैसे जला सकते हैं, वैसा कोई दूसरा पृथ्वीपर दुर्लभ है — उन दैत्योंने अपने मनमें यही विचारकर ऐसा वर माँगा॥४८–५३ ॥ सनत्कुमार बोले— [ हे व्यासजी! ] उनका यह वचन सुनकर सृष्टि करनेवाले लोकपितामह ब्रह्माने शिवजीका स्मरण करते हुए उनसे कहा— ऐसा ही होगा ॥ ५४ ॥

उसके बाद उन्होंने मयको आज्ञा दी कि हे मय! तुम सोने, चाँदी और लोहेके तीन नगरोंका निर्माण कर दो । उनके समक्ष मयको यह आज्ञा प्रदानकर ब्रह्माजी उन तारकपुत्रोंके देखते - देखते अपने धाम स्वर्गलोकको चले गये॥५५-५६ ॥ तदनन्तर धैर्यशाली मयने बड़े प्रयत्नके साथ तारकाक्षके लिये सोनेका, कमलाक्षके लिये चाँदीका तथा विद्युन्मालीके लिये लोहेका पुर बनाया और तीन प्रकारका दुर्ग भी बनाया, उन्हें क्रमसे स्वर्गमें, आकाशमें तथा भूलोकमें जानना चाहिये । उन असुरोंको तीनों पुर देकर मयने स्वयं भी उनके हितकी इच्छासे उस पुरीमें प्रवेश किया ॥ ५७–५९ ॥ इस प्रकार तीनों पुरोंको प्राप्तकर महाबली तथा पराक्रमशाली वे तारकासुरके पुत्र उनमें प्रविष्ट हुए और सभी प्रकारके सुखोंका भोग करने लगे ॥ ६० ॥

कल्पवृक्षोंसे व्याप्त, हाथी - घोड़ोंसे युक्त, प्रकारकी अट्टालिकाओं तथा मणियोंसे परिपूर्ण नाना समान देदीप्यमान, चारों ओर वे नगर सूर्यमण्डलके मुखवाले, चन्द्रमाके समान तथा पद्मराग मणियोंसे जटित विमानोंसे शोभित थे ॥ ६१-६२ ॥

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८२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १

प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः ।

दिव्यस्त्रीजनसंकीर्णैर्गंधर्वैस्सिद्धचारणैः ॥ ६३

रुद्रालयैः प्रतिगृहमग्निहोत्रैः प्रतिष्ठितैः ।

द्विजोत्तमैः शास्त्रविज्ञैः शिवभक्तिरतैः सदा ॥ ६४

वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिः सुशोभितम् ।

उद्यानवनवृक्षैश्च स्वर्गच्युतगुणोत्तमैः ॥ ६५

नदीनदसरिन्मुख्यपुष्करैः शोभितं सदा ।

सर्वकामफलाद्यैश्चानेकैर्वृक्षैर्मनोहरम् ॥ ६६

मत्तमातंगयूथैश्च तुरंगैश्च सुशोभनैः ।

रथैश्च विविधाकारैः शिबिकाभिरलंकृतम् ॥ ६७

समयादिशिकैश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक्पृथक् ।

वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः पृथक्पृथक् ॥ ६८

अदृष्टं मनसा वाचा पापान्वितनरैस्सदा ।

महात्मभिश्शुभाचारैः पुण्यवद्भिः प्रवीक्ष्यते ॥ ६ ९

पतिव्रताभिः सर्वत्र पावितं स्थलमुत्तमम् ।

पतिसेवनशीलाभिर्विमुखाभिः कुधर्मतः ॥ ७०

दैत्यशूरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजैः ।

श्रौतस्मार्तार्थतत्त्वज्ञैः स्वधर्मनिरतैर्युतम् ॥ ७१

व्यूढोरस्कैर्वृषस्कंधैः सामयुद्धधरैः सदा ।

प्रशांतैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा ॥ ७२

नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुंचितमूर्द्धजैः 1 मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः ॥ ७३ वरसमररतैर्युतं समंता-दजशिवपूजनया विशुद्धवीर्यैः । रविमरुतमहेन्द्रसंनिकाशैः सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं यत् ॥७४ । उन पुरोंमें कैलास पर्वतके शिखरके समान | ऊँचे - ऊँचे मनोहर महल तथा गोपुर बने हुए थे । | दिव्य देवांगनाओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे । पुर पूर्ण रूपसे भरा हुआ था । उनमें प्रत्येक घरमें वह शिवालय तथा अग्निहोत्रकुण्ड बने हुए थे । शास्त्रवेत्ता एवं शिवभक्त ब्राह्मण उन पुरोंमें सदा निवास करते थे ॥ ६३-६४ ॥ बावली, कुएँ, तालाब, छोटे सरोवर और स्वर्गीय गुणोंवाले उद्यान एवं वन्य वृक्षों, कमलयुक्त नदियों और बड़ी - बड़ी सरिताओंसे वे पुर शोभित हो रहे थे । सभी ऋतुओंमें फल - फूल देनेवाले अनेक प्रकारके वृक्षोंसे वे पुर मनोहर प्रतीत हो रहे थे ॥ ६५-६६ ॥ वे झुण्ड - के - झुण्ड मदमत्त हाथियों, सुन्दर - सुन्दर घोड़ों, विविध आकारवाले रथों एवं शिविकाओंसे अलंकृत थे । उनमें समयानुसार अलग - अलग क्रीडास्थल बने हुए थे और वेदाध्ययनकी विविध पाठशालाएँ भी पृथक् - पृथक् बनी हुई थीं ॥ ६७-६८ ॥ पापीजन तो मन एवं वाणीके द्वारा उन नगरोंकी ओर देख भी नहीं सकते थे; शुभ आचरण करनेवाले पुण्यशाली महात्मा ही उन्हें देख सकते थे ॥ ६ ९ ॥ वहाँका उत्तम स्थल सर्वत्र अधर्मसे रहित तथा पतिसेवापरायण पतिव्रताओंके द्वारा पवित्र कर दिया गया था । उनमें महाभाग्यवान् बलवान् दैत्य अपनी | स्त्रियों, पुत्रों और श्रुति - स्मृतिके रहस्यको जाननेवाले तथा अपने धर्ममें निरत ब्राह्मणोंके साथ निवास करते थे ॥ ७०-७१ ॥ वे पुर चौड़ी छातीवाले, ऊँचे कंधोंवाले, साम एवं विग्रहके ज्ञाता, समय - समयपर शान्ति तथा कोप | करनेवाले, कुबड़े तथा बौने, नीले कमलके समान | काले - काले घुँघराले बालवाले, मयके द्वारा तथा शिक्षित किये गये और युद्धकी अभिलाषा । रखनेवाले योद्धाओंसे परिपूर्ण थे । बड़े - बड़े युद्धों में | निरत रहनेवाले, ब्रह्मा तथा सदाशिवके पूजनके | प्रभावसे विशुद्ध पराक्रमवाले, सूर्य - वायु - इन्द्रके सदृश | देवगणोंका मर्दन करनेवाले तथा अत्यन्त शक्तिशाली वीर उन पुरोंमें निवास करते थे॥७२-७४ ॥

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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( ये ये धर्माः प्रकीर्तिताः । शास्त्रवेदपुराणेषु शिवप्रियाः सदा देवास्ते धर्मास्तत्र सर्वतः ॥ ७५

एवं लब्धवरास्ते तु दैतेयास्तारकात्मजाः ।

शैवं मयमुपाश्रित्य निवसंति स्म तत्र ह ॥ ७६

सर्वं त्रैलोक्यमुत्सार्य प्रविश्य नगराणि ते ।

कुर्वंति स्म महद्राज्यं शिवमार्गरताः सदा ॥ ७७

ततो महान् गतः कालो वसतां पुण्यकर्मणाम् ।

यथासुखं यथाजोषं सद्राज्यं कुर्वतां मुने ॥ ७८

युद्धखण्ड ) ८२ ९ वेदों, शास्त्रों और पुराणोंमें जिन - जिन धर्मोंका वर्णन किया गया है, वे सभी धर्म तथा शिवजीके प्रिय देवता वहाँ चारों ओर व्याप्त थे । इस प्रकार वर प्राप्त किये हुए वे तारकपुत्र दैत्य शिवभक्त मयदानवका आश्रय लेकर वहाँ निवास करने लगे । उन नगरोंमें प्रवेश करके वे सदा शिवभक्तिनिरत होकर सम्पूर्ण त्रिलोकीको बाधित करके विशाल राज्यका उपभोग करने लगे ॥७५–७७ ॥ हे मुने! इस प्रकार अपने इच्छानुसार सुखपूर्वक उत्तम राज्य करते हुए उन पुण्यकर्मा राक्षसोंका वहाँ निवास करते हुए बहुत लम्बा काल । व्यतीत हो गया ॥७८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे त्रिपुरवधोपाख्याने त्रिपुरवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें त्रिपुरवधोपाख्यानमें त्रिपुरवर्णन नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः तारकपुत्रोंसे पीड़ित देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और उनके परामर्शके अनुसार असुर- वधके लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना व्यास उवाच

ब्रह्मपुत्र महाप्राज्ञ वद मे वदतां वर ।

ततः किमभवद्देवाः कथं च सुखिनोऽभवन् ॥ १

ब्रह्मोवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य व्यासस्यामितधीमतः ।

सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ २

सनत्कुमार उवाच

अथ तत्प्रभया दग्धा देवा हीन्द्रादयस्तथा ।

संमन्त्र्य दुःखिताः सर्वे ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ३

नत्वा पितामहं प्रीत्या परिक्षित्याखिलाः सुराः ।

दुःखं विज्ञापयामासुर्विलोक्यावसरं ततः ॥ ४

देवा ऊचुः

धातस्त्रिपुरनाथेन सतारकसुतेन हि ।

सर्वे प्रतापिता ननं मयेन त्रिदिवौकसः ॥ ५

अतस्ते शरणं याता दुःखिता हि विधे वयम् ।

कुरु त्वं तद्वधोपायं सुखिनः स्याम तद्यथा ॥ ६

व्यासजी बोले- हे ब्रह्मपुत्र! हे महाप्राज्ञ! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! अब मुझे बताइये कि उसके बाद क्या हुआ और देवगण किस प्रकार सुखी हुए?॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले- महाबुद्धिमान् व्यासजीका यह वचन सुनकर शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके सनत्कुमारजीने कहा —॥२ ॥

सनत्कुमार बोले — तब उनके तेजसे दग्ध हुए इन्द्रादि देवता दुखी हो परस्पर मन्त्रणाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥३ ॥

वे सभी निस्तेज देवता प्रीतिपूर्वक पितामहको प्रणाम करके अवसर देखकर उनसे अपना दुःख कहने लगे ॥४ ॥

देवता बोले — हे विधाता! तारकपुत्रोंसहित त्रिपुरनाथ मयके द्वारा सभी देवता अत्यधिक पीड़ित किये जा रहे हैं । इसलिये हे ब्रह्मन्! हमलोग दुखी । होकर आपकी शरणमें आये हैं; आप उनके वधका कोई उपाय कीजिये, जिससे हमलोग सुखी हो जायँ॥५-६ ॥

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८३० सनत्कुमार उवाच इति विज्ञापितो देवैर्विहस्य भवकृद्विधिः प्रत्युवाचाथ तान्सर्वान्मयतो भीतमानसान् ब्रह्मोवाच न भेतव्यं सुरास्तेभ्यो दानवेभ्यो विशेषतः आचक्षे तद्वधोपायं शिवं शर्वः करिष्यति मत्तो विवर्धितो दैत्यो वधं मत्तो न चार्हति तथापि पुण्यं वर्द्धेत नगरे त्रिपुरे पुनः शिवं च प्रार्थयध्वं वै सर्वे देवाः सवासवाः सर्वाधीशः प्रसन्नश्चेत्स वः कार्यं करिष्यति सनत्कुमार उवाच इत्याकर्ण्य विधेर्वाणीं सर्वे देवाः सवासवाः दुःखितास्ते ययुस्तत्र यत्रास्ते वृषभध्वजः प्रणम्य भक्त्या देवेशं सर्वे प्रांजलयस्तदा तुष्टुवुर्विनतस्कंधाः शंकरं लोकशंकरम् ॥ देवा ऊचुः नमो हिरण्यगर्भाय सर्वसृष्टिविधायिने नमः स्थितिकृते तुभ्यं विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ नमो हरस्वरूपाय भूतसंहारकारिणे । निर्गुणाय नमस्तुभ्यं शिवायामिततेजसे अवस्थारहितायाथ निर्विकाराय वर्चसे महाभूतात्मभूताय निर्लिप्ताय महात्मने ॥ नमस्ते भूतपतये महाभारसहिष्णवे तृष्णाहराय निर्वैराकृतये भूरितेजसे महादैत्यमहारण्यनाशिने दाववह्नये दैत्यद्रुमकुठाराय नमस्ते शूलपाणये महादनुजनाशाय नमस्ते परमेश्वर अम्बिकापतये तुभ्यं नमः सर्वास्त्रधारक नमस्ते पार्वतीनाथ परमात्मन्महेश्वर नीलकंठाय रुद्राय नमस्ते रुद्ररूपिणे श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ सनत्कुमार बोले- देवगणोंके इस प्रकार कहनेपर । । सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी मयसे डरे हुए उन समस्त देवताओंसे ॥ ७ हँसकर कहने लगे -॥७ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे देवताओ! आपलोग दैत्योंसे बिलकुल मत डरिये, मैं उनके वधका उपाय उन । बता रहा हूँ; शिवजी कल्याण करेंगे । मैंने ही इस ॥ ८ दैत्यको बढ़ाया है, अतः मेरे हाथों इसका वध होना । उचित नहीं है और इस समय त्रिपुरके नगरमें निरन्तर ॥ ९ पुण्य बढ़ ही रहा है ॥ ८ - ९ ॥ । अतः इन्द्रसहित सभी देवता शिवजीसे प्रार्थना ॥ १० करें । यदि वे सर्वाधीश प्रसन्न हो जायँ, तो आपलोगोंके कार्यको पूर्ण करेंगे ॥१० ॥

सनत्कुमार बोले- तब ब्रह्माजीकी बात सुनकर । इन्द्रसहित सभी देवता दुखी होकर वहाँ गये, जहाँ ॥ ११ शिवजी थे । हाथ जोड़कर बड़ी भक्तिसे देवेशको । प्रणाम करके सिर झुकाकर वे सब लोककल्याणकारी १२ शंकरकी स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥ देवगण बोले — सम्पूर्ण सृष्टिका विधान करनेवाले

। हिरण्यगर्भ ब्रह्मास्वरूप आप शिवको नमस्कार है ।

१३ पालन करनेवाले विष्णुस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १३ ॥

सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करनेवाले हरस्वरूप ॥ १४ आपको नमस्कार है । निर्गुण तथा अमिततेजस्वी आप शिवको नमस्कार है । अवस्थाओंसे रहित, निर्विकार, । तेजस्वरूप, महाभूतोंमें आत्मस्वरूपसे वर्तमान, निर्लिप्त १५ एवं महान् आत्मावाले आप महात्माको नमस्कार है ॥ १४-१५ ॥ । सम्पूर्ण प्राणियोंके अधिपति, शेषरूपसे ॥ १६ । पृथ्वीका भार उठानेवाले, तृष्णाको नष्ट करनेवाले, शान्त प्रकृतिवाले तथा अमिततेजस्वी आप शिवको नमस्कार है ॥ १६ ॥

महादैत्यरूपी महावनको विनष्ट करने ॥ १७ लिये दावाग्निके स्वरूप एवं दैत्यरूपी वृक्षोंके लिये । कुठारस्वरूप आप शूलपाणिको नमस्कार है ॥ १७ ॥

महादैत्योंका नाश करनेवाले हे परमेश्वर! आपको ॥ १८ नमस्कार है । हे सभी अस्त्रोंके धारणकर्ता! आप । अम्बिकापतिको नमस्कार है । हे पार्वतीनाथ! हे परमात्मन्! । । हे महेश्वर! आपको नीलकण्ठ, ॥ १ ९ । रुद्र तथा नमस्कार है । आप रुद्रस्वरूपको नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥