श्रीगणेशाय नमः।

शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 841–850

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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अ ० २ ] रुद्रसंहिता (

नमो वेदान्तवेद्याय मार्गातीताय ते नमः ।

नमो गुणस्वरूपाय गुणिने गुणवर्जिते ॥ २०

महादेव नमस्तुभ्यं त्रिलोकीनन्दनाय च ।

प्रद्युम्नायानिरुद्धाय वासुदेवाय ते नमः ॥ २१

संकर्षणाय देवाय नमस्ते कंसनाशिने ।

चाणूरमर्दिने तुभ्यं दामोदर विषादिने ॥ २२

हृषीकेशाच्युत विभो मृड शंकर ते नमः ।

अधोक्षज गजाराते कामारे विषभक्षण ॥ २३

नारायणाय देवाय नारायणपराय च ।

नारायणस्वरूपाय नारायणतनूद्भव ॥२४

नमस्ते सर्वरूपाय महानरकहारिणे ।

पापापहारिणे तुभ्यं नमो वृषभवाहन ॥ २५

क्षणादिकालरूपाय स्वभक्तबलदायिने ।

नानारूपाय रूपाय दैत्यचक्रविमर्दिने ॥ २६

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ।

सहस्त्रमूर्त्तये तुभ्यं सहस्रावयवाय च ॥ २७

धर्मरूपाय सत्त्वाय नमः सत्त्वात्मने हर ।

वेदवेद्यस्वरूपाय नमो वेदप्रियाय च ॥ २८

नमो वेदस्वरूपाय वेदवक्त्रे नमो नमः ।

सदाचाराध्वगम्याय सदाचाराध्वगामिने ॥ २ ९

विष्टरश्रवसे तुभ्यं नमः सत्यमयाय च ।

सत्यप्रियाय सत्याय सत्यगम्याय ते नमः ॥ ३०

नमस्ते मायिने तुभ्यं मायाधीशाय वै नमः ।

नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मजाय च ॥ ३१

ब्रह्मगाय

तपसे ते नमस्त्वीश तपसां फलदायिने ।

स्तुत्याय स्तुतये नित्यं स्तुतिसंप्रीतचेतसे ॥ ३२

श्रुत्याचारप्रसन्नाय स्तुत्याचारप्रियाय च ।

चतुर्विधस्वरूपाय जलस्थलजरूपिणे ॥३३

युद्धखण्ड ) ८३१ वेदान्तसे जाननेयोग्य आपको नमस्कार है । सभी मार्गोंसे अगम्य आपको नमस्कार है । गुणस्वरूप, गुणोंको धारण करनेवाले एवं गुणोंसे सर्वथा रहित आपको नमस्कार है । त्रिलोकीको आनन्द देनेवाले हे महादेव! आपको नमस्कार है । प्रद्युम्न, अनिरुद्ध एवं वासुदेवस्वरूप आपको नमस्कार है । संकर्षणदेव एवं कंसनाशक आपको नमस्कार है । चाणूरका मर्दन करनेवाले एवं विरक्त रहनेवाले हे दामोदर! आपको नमस्कार है ॥ २०-२२ ॥ हे हृषीकेश! हे अच्युत! हे विभो! हे मृड! हे शंकर! हे अधोक्षज! हे गजासुरके शत्रु! हे कामशत्रु! हे विषभक्षक! आपको नमस्कार है ॥२३ ॥

नारायणदेव, नारायणपरायण, नारायणस्वरूप तथा सर्वरूप हे नारायणतनूद्भव! आपको नमस्कार है । महानरकसे बचानेवाले तथा पापोंको दूर करनेवाले हे वृषभवाहन! आपको नमस्कार है॥२४-२५ ॥ क्षण आदि कालरूपवाले, अपने भक्तोंको बल प्रदान करनेवाले, अनेक रूपोंवाले तथा दैत्योंके समूहका नाश करनेवाले, ब्रह्मण्यदेवस्वरूप, गौ तथा ब्राह्मणोंका हित करनेवाले, सहस्रमूर्ति तथा सहस्र अवयवोंवाले आपको नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ धर्मरूप, सत्त्वस्वरूप तथा सत्त्वात्मरूप हे हर! आपको नमस्कार है । वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य स्वरूपवाले तथा वेदप्रिय आपको नमस्कार है । वेदस्वरूप एवं वेदके वक्ता आपको नमस्कार है । सदाचारके मार्गसे जाननेयोग्य एवं सदाचारके मार्गपर चलनेवाले आपको बार - बार नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥ विष्टरश्रवा ( विष्णु ) तथा सत्यमय आपको नमस्कार है । सत्यप्रिय, सत्यस्वरूप तथा सत्यसे प्राप्त होनेवाले आपको नमस्कार है । मायाको अपने अधीन रखनेवाले आपको नमस्कार है । मायाके अधिपति आपको नमस्कार है । सामवेदस्वरूप, ब्रह्मस्वरूप तथा ब्रह्मासे उत्पन्न होनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३०-३१ ॥ हे ईश! आप तपः स्वरूप, तपस्याका फल देनेवाले, स्तुतिके योग्य, स्तुतिरूप, स्तुतिसे प्रसन्नचित्त, श्रुतिके आचारसे प्रसन्न रहनेवाले, स्तुतिप्रिय, जरायुज-अण्डज आदि चार स्वरूपोंवाले एवं जल - थलमें प्रकट स्वरूपवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३२-३३ ॥

पृष्ठ 842

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८३२ सर्वे देवादयो नाथ श्रेष्ठत्वेन विभूतयः देवानामिन्द्ररूपोऽसि ग्रहाणां त्वं रविर्मतः सत्यलोकोऽसि लोकानां सरितां घुसरिद्भवान् श्वेतवर्णोऽसि वर्णानां सरसां मानसं सरः शैलानां गिरिजातात: कामधुक्त्वं च गोषु ह क्षीरोदधिस्तु सिन्धूनां धातूनां हाटको भवान् वर्णानां ब्राह्मणोऽसि त्वं नृणां राजासि शंकर मुक्तिक्षेत्रेषु काशी त्वं तीर्थानां तीर्थराड् भवान् ॥ उपलेषु समस्तेषु स्फटिकस्त्वं महेश्वर । कमलस्त्वं प्रसूनेषु शैलेषु हिमवांस्तथा भवान्वाग्व्यवहारेषु भार्गवस्त्वं कविष्वपि । पक्षिष्वेवासि शरभः सिंहो हिंस्रेषु संमतः

शालग्रामशिला च त्वं शिलासु वृषभध्वज ।

पूज्यरूपेषु सर्वेषु नर्मदालिंगमेव हि ॥

नन्दीश्वरोऽसि पशुषु वृषभः परमेश्वर ।

वेदेषूपनिषद्रूपो यज्वनां शीतभानुमान् ॥

प्रतापितां पावकस्त्वं शैवानामच्युतो भवान् । भारतं त्वं पुराणानां मकारोऽस्यक्षरेषु च

प्रणवो बीजमंत्राणां दारुणानां विषं भवान् ।

व्योमव्याप्तिमतां त्वं वै परमात्मासि चात्मनाम् ॥

इन्द्रियाणां मनश्च त्वं दानानामभयं भवान् ।

पावनानां जलं चासि जीवनानां तथामृतम् ॥

लाभानां पुत्रलाभोऽसि वायुर्वेगवतामसि । नित्यकर्मसु सर्वेषु संध्योपास्तिर्भवान्मतः

क्रतूनामश्वमेधोऽसि युगानां प्रथमो युगः ।

पुष्यस्त्वं सर्वधिष्ण्यानाममावास्या तिथिष्वसि ॥

सर्वर्तुषु वसंतस्त्वं सर्वपर्वसु संक्रमः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २ । हे नाथ! सभी देवता आदि श्रेष्ठ होनेसे आपकी ॥ ३४ विभूति हैं । आप सभी देवताओंमें इन्द्रस्वरूप हैं और ग्रहोंमें आप सूर्य माने गये हैं ॥३४ ॥

। आप लोकोंमें सत्यलोक, सरिताओंमें गंगा, ॥ ३५ वर्णोंमें श्वेत वर्ण और सरोवरोंमें मानसरोवर हैं ॥ ३५ ॥

। आप पर्वतोंमें हिमालय, गायोंमें कामधेनु, समुद्रोंमें ॥ ३६ क्षीरसागर एवं धातुओंमें सुवर्ण हैं ॥ ३६ ॥

। हे शंकर! आप वर्णोंमें ब्राह्मण, मनुष्योंमें राजा, ३७ मुक्तिक्षेत्रोंमें काशी तथा तीर्थोंमें प्रयाग हैं । हे महेश्वर! आप समस्त पाषाणोंमें स्फटिक मणि, पुष्पोंमें कमल ॥ ३८ तथा पर्वतोंमें हिमालय हैं ॥ ३७-३८ ॥ आप व्यवहारोंमें वाणी हैं, कवियोंमें भार्गव, ॥ ३ ९ पक्षियोंमें शरभ और हिंसक प्राणियोंमें सिंह कहे गये हैं ॥३ ९ ॥ हे वृषभध्वज! आप शिलाओंमें शालग्रामशिला ४० और सभी पूज्योंमें नर्मदा लिंग हैं । हे परमेश्वर! आप पशुओंमें नन्दीश्वर नामक वृषभ ( बैल ), वेदोंमें उपनिषद्रूप और यज्ञ करनेवालोंमें चन्द्रमा ४१ हैं ॥ ४०-४१ ॥ आप तेजस्वियोंमें अग्नि, शैवोंमें विष्णु, पुराणोंमें ॥ ४२ महाभारत तथा अक्षरोंमें मकार हैं । बीजमन्त्रोंमें प्रणव ( ओंकार ), दारुण पदार्थोंमें विष, व्यापक वस्तुओंमें ४३ आकाश तथा आत्माओंमें परमात्मा हैं॥४२-४३ ॥ आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें मन, सभी प्रकार ४४ दानोंमें अभयदान, पवित्र करनेवालोंमें जल तथा जीवित करनेवाले पदार्थोंमें अमृत हैं ॥४४ ॥

आप लाभोंमें पुत्रलाभ तथा वेगवानोंमें वायु । ४५ हैं । आप सभी प्रकार के नित्यकर्मों में सन्ध्योपासन कहे गये हैं ॥ ४५ ॥

आप सम्पूर्ण यज्ञोंमें अश्वमेधयज्ञ, युगोंमें सत्ययुग, ४६ नक्षत्रोंमें पुष्य तथा तिथियोंमें अमावास्या हैं ॥ ४६ ॥

कुशॊऽसि तृणजातीनां स्थूलवृक्षेषु वै वटः ॥ ४७ आप सभी ऋतुओंमें वसन्त, पर्वोंमें संक्रान्ति, योगेषु च व्यतीपातः सोमवल्ली लतासु च । तृणोंमें कुश और स्थूल वृक्षोंमें वटवृक्ष हैं ॥ मलत वृद्धीनां धर्मबुद्धिस्त्वं कलत्रं सुहृदां भवान् ॥ ४८ बुद्धियोंमें आप योगोंमें व्यतीपात, लताओंमें सोमलता, धर्मबुद्धि तथा सुदामे कलत्र हैं । हे महेश्वथा साधकानां शुचीनां त्वं प्राणायामो महेश्वर । आप सम्पूर्ण पवित्र साधनोंमें प्राणायाम हैं तथा ज्योतिर्लिंगेषु सर्वेषु भवान् विश्वेश्वरो मतः ॥ ४ ९ | सभी ज्योतिर्लिंगोंमें हैं । ४८-४९ ॥ विश्वेश्वर कहे गये

पृष्ठ 843

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अ ० २ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८३३

धर्मस्त्वं सर्वबंधूनामाश्रमाणां परो भवान् ।

मोक्षस्त्वं सर्ववर्गेषु रुद्राणां नीललोहितः ॥

आदित्यानां वासुदेवो हनूमान्वानरेषु च ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽसि रामः शस्त्रभृतां भवान् ॥

गंधर्वाणां चित्ररथो वसूनां पावको ध्रुवम् ।

मासानामधिमासस्त्वं व्रतानां त्वं चतुर्दशी ॥

ऐरावतो गजेन्द्राणां सिद्धानां कपिलो मतः ।

अनंतस्त्वं हि नागानां पितॄणामर्यमा भवान् ॥

कालः कलयतां च त्वं दैत्यानां बलिरेव च ।

किं बहूक्तेन देवेश सर्वं विष्टभ्य वै जगत् ॥

एकांशेन स्थितस्त्वं हि बहिःस्थोऽन्वित एव च ॥

सनत्कुमार उवाच

इति स्तुत्वा सुराः सर्वे महादेवं वृषध्वजम् ।

स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैः शूलिनं परमेश्वरम् ॥

प्रत्यूचुः प्रस्तुतं दीनाः स्वार्थं स्वार्थविचक्षणाः ।

वासवाद्या नतस्कंधाः कृताञ्जलिपुटा मुने ॥

देवा ऊचुः

पराजिता महादेव भ्रातृभ्यां सहितेन तु ।

भगवंस्तारकोत्पन्नैः सर्वे देवाः सवासवाः ॥

त्रैलोक्यं स्ववशं नीतं तथा च मुनिसत्तमाः ।

विध्वस्ताः सर्वसंसिद्धाः सर्वमुत्सादितं जगत् ॥

यज्ञभागान्समग्राँस्तु स्वयं गृह्णाति दारुणः ।

प्रवर्तितो ह्यधर्मस्तैर्ऋषीणां च निवारितः ॥

अवध्याः सर्वभूतानां नियतं तारकात्मजाः ।

तदिच्छया प्रकुर्वन्ति सर्वे कर्माणि शंकर ॥

यावन्न क्षीयते दैत्यैर्घोरैस्त्रिपुरवासिभिः ।

तावद्विधीयतां नीतिर्यया संरक्ष्यते जगत् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तेषामिन्द्रादीनां दिवौकसाम् ।

शिवः संभाषमाणानां प्रतिवाक्यमुवाच सः ॥

इति आप सभी बन्धुओंमें धर्म, आश्रमोंमें संन्यासाश्रम, ५० सभी वर्गोंमें मोक्ष तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं ॥ ५० ॥

आप आदित्योंमें वासुदेव, वानरोंमें हनुमान्, ५१ यज्ञोंमें जपयज्ञ तथा शस्त्रधारियोंमें राम हैं ॥५१ ॥

आप गन्धर्वोंमें चित्ररथ, वसुओंमें पावक, ५२ मासोंमें अधिमास और व्रतोंमें चतुर्दशीव्रत हैं ॥५२ ॥

आप गजेन्द्रोंमें ऐरावत, सिद्धोंमें कपिल, ५३ नागोंमें अनन्त और पितरोंमें अर्यमा माने गये हैं । आप कलना करनेवालोंमें काल तथा दैत्योंमें बलि हैं । हे देवेश! अधिक कहनेसे क्या लाभ, आप सारे ५४ जगत्को आक्रान्तकर बाहर तथा भीतर सर्वत्र ५५ एकांशरूपसे स्थित हैं॥५३–५५ ॥ सनत्कुमार बोले - हे मुने! इस प्रकार सिर झुकाकर हाथ जोड़कर अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंसे ५६ त्रिशूलधारी परमेश्वर, वृषभध्वज महादेवकी स्तुतिकर स्वार्थसाधनमें कुशल इन्द्र आदि सभी देवता अत्यन्त ५७ दीन हो प्रस्तुत स्वार्थकी बात कहने लगे— ॥ ५६-५७ ॥ देवता बोले- हे महादेव! हे भगवन्! इन्द्रसहित सभी देवताओंको तारकासुरके तीनों पुत्रोंने पराजित कर दिया । उन्होंने समस्त त्रैलोक्यको अपने वशमें ५८ कर लिया है । उन लोगोंने सभी मुनिवरों तथा सिद्धोंका विध्वंस कर दिया है और सारे जगत्‌को तहस - नहस ५ ९ कर दिया है । वह भयंकर दैत्य समस्त यज्ञभागोंको स्वयं ग्रहण करता है । उन तारकपुत्रोंने वेदविरुद्ध ६० अधर्मको बढ़ावा दे रखा है ॥५८–६० ॥ हे शंकर! वे तारकपुत्र सभी प्राणियोंसे निश्चित ६१ रूपसे अवध्य हैं, सभी लोग उन्हींकी इच्छासे कार्य करते हैं ॥ ६१ ॥

जबतक त्रिपुरवासी दैत्योंके द्वारा जगत्का विध्वंस ६२ नहीं हो जाता है, तबतक आप ऐसी नीतिका निर्धारण करें, जिससे जगत्‌की रक्षा हो सके ॥६२ ॥

सनत्कुमार बोले — वार्तालाप करते हुए उन इन्द्रादि देवताओंका यह वचन सुनकर शिवजीने ६३ | कहा- ॥ ६३ ॥

पञ्चमे युद्धखण्डे देवस्तुतिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पंचम युद्धखण्डमें ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पूर्ण हुआ ॥ २ ॥

देवस्तुतिवर्णन नामक दूसरा अध्याय

पृष्ठ 844

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८३४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३ अथ तृतीयोऽध्यायः त्रिपुरके विनाशके लिये देवताओंका विष्णुसे निवेदन करना, विष्णुद्वारा त्रिपुरविनाशके लिये यज्ञकुण्डसे भूतसमुदायको प्रकट करना, त्रिपुरके भयसे भूतोंका पलायित होना, पुनः विष्णुद्वारा देवकार्यकी सिद्धिके लिये उपाय सोचना शिव उवाच अयं वै त्रिपुराध्यक्षः पुण्यवान्वर्ततेऽधुना यत्र पुण्यं प्रवर्तेत न हंतव्यो बुधैः क्वचित् जानामि देवकष्टं च विबुधाः सकलं महत् दैत्यास्ते प्रबला हंतुमशक्यास्तु सुरासुरैः पुण्यवंतस्तु ते सर्वे समयास्तारकात्मजाः दुस्साध्यस्तु वधस्तेषां सर्वेषां पुरवासिनाम् मित्रद्रोहं कथं जानन्करोमि रणकर्कशः सुहृद्रोहे महत्पापं पूर्वमुक्तं स्वयंभुवा ब्रह्मघ्ने च सुरापे च स्तेये भग्नव्रते तथा । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः मम भक्तास्तु ते दैत्या मया वध्याः कथं सुराः । विचार्यतां भवद्भिश्च धर्मज्ञैरेव धर्मतः

तावत्ते नैव हंतव्या यावद्भक्तिकृतश्च मे ।

तथापि विष्णवे देवा निवेद्यं कारणं त्विदम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।

न्यवेदयन् द्रुतं सर्वे ब्रह्मणे प्रथमं मुने ॥

ततो विधिं पुरस्कृत्य सर्वे देवाः सवासवाः । शिवजी बोले- हे देवताओ! इस समय यह । त्रिपुराध्यक्ष पुण्यवान् है, जिसमें पुण्य हो, उसे ॥ १ विद्वानोंको कभी नहीं मारना चाहिये । हे देवताओ! में देवताओंके समस्त बड़े कष्टोंको जानता हूँ । वे दैत्य । प्रबल हैं, देवता तथा असुर कोई भी उन्हें मारनेमें ॥ २ समर्थ नहीं है ॥ १-२ ॥ । दानव मयसहित वे सभी तारकपुत्र पुण्यवान् हैं, ॥ ३ त्रिपुरमें रहनेवाले उन सभीका वध दुःसाध्य है ॥३ ॥

। युद्धमें अजेय होते हुए भी मैं जान - बूझकर किस ॥ ४ प्रकार मित्रद्रोहका आचरण करूँ; क्योंकि स्वयम्भूने पहले कहा है कि मित्रद्रोह करनेमें महान् पाप होता है ॥४ ॥

ब्रह्महत्यारा, सुरापान करनेवाला, स्वर्णकी चोरी ॥ ५ करने वाला तथा व्रतभंग करनेवाला - इन सभीके लिये शास्त्रकारोंने प्रायश्चित्त बताया है, किंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त - विधान नहीं है । हे देवताओ! ॥ ६ धर्मके ज्ञाता आपलोग ही धर्मपूर्वक विचार करें कि वे दैत्य मेरे भक्त हैं, तब मैं उनका वध किस प्रकार कर सकता हूँ? हे देवताओ! जबतक वे मुझमें भक्ति ७ रखते हैं, तबतक मैं उन्हें नहीं मार सकता तथापि आपलोग विष्णुसे इस कारणको बताइये॥५–७ ॥ सनत्कुमार बोले — हे मुने! उनका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि सभी देवताओंने सर्वप्रथम इस ८ बातको ब्रह्माजीसे कहा । तदनन्तर ब्रह्माजीको आगेकर | इन्द्रसहित सभी देवता शोभासम्पन्न वैकुण्ठधाम वैकुंठं प्रययुः शीघ्रं सर्वे शोभासमन्वितम् ॥ ९ शीघ्र गये ॥८ - ९ ॥

तत्र गत्वा हरिं दृष्ट्वा प्रणेमुर्जातसंभ्रमाः ।

तुष्टुवुश्च महाभक्त्या कृतांजलिपुटाः सुराः ॥

स्वदुःखकारणं सर्वं पूर्ववत्तदनंतरम् ।

न्यवेदयन्द्रुतं तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥

देवदुःखं ततः श्रुत्वा दत्तं च त्रिपुरालयैः ।

ज्ञात्वा व्रतं च तेषां तद्विष्णुर्वचनमब्रवीत् ॥

वहाँ जाकर आश्चर्यचकित उन देवताओंने १० विष्णुको देखकर उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ | जोड़कर परम भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की, उसके अनन्तर ११ | सर्वसमर्थ उन विष्णुसे पूर्वकी भाँति अपने दुःखका समस् कारण शीघ्र निवेदित किया । तब त्रिपुरवासियोंके द्वारा | दिये गये देवगणोंके दुःखको तथा उनके व्रतको १२ | जानकर विष्णुने यह वचन कहा- सुनकर ॥ १०-१२ ॥

पृष्ठ 845

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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( विष्णुरुवाच

इदं सत्यं वचश्चैव यत्र धर्मः सनातनः ।

तत्र दुःखं न जायेत सूर्ये दृष्टे यथा तमः ॥ १३

सनत्कुमार उवाच

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा देवा दुःखमुपागताः ।

पुनरूचुस्तथा विष्णुं परिम्लानमुखाम्बुजाः ॥ १४

देवा ऊचुः

कथं चैव प्रकर्त्तव्यं कथं दुःखं निरस्यते ।

कथं भवेम सुखिनः कथं स्थास्यामहे वयम् ॥ १५

कथं धर्मा भविष्यंति त्रिपुरे जीविते सति ।

देवदुःखप्रदा नूनं सर्वे त्रिपुरवासिनः ॥ १६

किं वा ते त्रिपुरस्येह वधश्चैव विधीयताम् ।

नो चेदकालिकी देवसंहतिः क्रियतां ध्रुवम् ॥ १७

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा ते तदा देवा दुःखं कृत्वा पुनः पुनः ।

स्थितिं नैव गतिं ते वै चक्रुर्देववरादिह ॥ १८

तान्वै तथाविधान्दृष्ट्वा हीनान्विनयसंयुतान् ।

सोऽपि नारायणः श्रीमांश्चिन्तयंश्चेतसा तथा ॥ १ ९

किं कार्यं देवकार्येषु मया देवसहायिना ।

शिवभक्तास्तु ते दैत्यास्तारकस्य सुता इति ॥ २०

इति संचिन्त्य तत्काले विष्णुना प्रभविष्णुना ।

ततो यज्ञाः स्मृतास्तेन देवकार्यार्थमक्षयाः ॥ २१

तद्विष्णुस्मृतिमात्रेण यज्ञास्ते तत्क्षणं द्रुतम् ।

आगतास्तत्र यत्रास्ते श्रीपतिः पुरुषोत्तमः ॥ २२

। ततो विष्णुं यज्ञपतिं पुराणं पुरुषं हरिम् ।

प्रणम्य तुष्टुवुस्ते वै कृतांजलिपुटास्तदा ॥ २३

। भगवानपि तान्दृष्ट्वा यज्ञान्प्राह सनातनान् ।

। सनातनस्तदा सेंद्रान्देवानालोक्य चाच्युतः ॥ २४

| अनेनैव विष्णुरुवाच

सदा देवा यजध्वं परमेश्वरम् ।

पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥ २५

युद्धखण्ड ) ८३५ विष्णु बोले- यह बात सत्य है कि जहाँ सनातनधर्म विद्यमान होता है, वहाँ दुःख उसी प्रकार नहीं होता, जिस प्रकार सूर्यके दिखायी देनेपर अन्धकार नहीं रहता है ॥ १३ ॥

सनत्कुमार बोले- इस बातको सुनकर दुःखित तथा मुरझाये हुए मुखकमलवाले देवता विष्णुसे पुनः कहने लगे —॥१४ ॥

देवगण बोले- अब क्या करना चाहिये, यह दु: ख किस प्रकारसे दूर हो, हमलोग कैसे सुखी रहें तथा किस प्रकारसे निवास करें । इस त्रिपुरके जीवित रहते धर्माचरण किस प्रकार हो सकेंगे, ये त्रिपुरवासी तो निश्चय ही देवताओंको दुःख देनेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥ [ हे विष्णो! ] आप या तो त्रिपुरका वध कीजिये, अन्यथा देवताओंको ही अकालमें मार डालिये ॥ १७ ॥

सनत्कुमार बोले — तब इस प्रकार कहकर वे देवता बारंबार बड़े दुखी हुए और न तो विष्णुके पाससे उन्हें जाते बना और न तो रुकते ही बना । तब विष्णुने उन देवताओंको इस प्रकारसे हीन तथा विनययुक्त देखकर अपने मनमें विचार किया कि देवताओंकी सहायता करनेवाला मैं इन देवताओंके कार्यके लिये कौन - सा उपाय करूँ, तारका-- -सुरके वे पुत्र भी तो शिवजीके भक्त ही हैं ॥ १८-२० ॥ ऐसा सोचकर उसी समय सर्वसमर्थ उन विष्णु देवताओंके कार्यके लिये अक्षय यज्ञोंका स्मरण किया ॥ २१ ॥

उन विष्णुके स्मरणमात्रसे वे यज्ञ उसी क्षण शीघ्रता - पूर्वक वहाँ आ गये, जहाँ लक्ष्मीपति पुरुषोत्तम विद्यमान थे । उसके बाद उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम करके यज्ञपति पुराणपुरुष श्रीहरिकी स्तुति की । तब सनातन भगवान् विष्णुने भी उन सनातन यज्ञोंको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर उनसे कहा- ॥ २२ - २४ ॥ विष्णु बोले — हे देवगण! आपलोग त्रिपुरोंके विनाश एवं तीनों लोकोंके कल्याणके निमित्त इन । यज्ञोंद्वारा सदा परमेश्वरका यजन कीजिये ॥ २५ ॥

पृष्ठ 846

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८३६ सनत्कुमार उवाच अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः । प्रेम्णा ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तुवन्सुराः

एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम् ।

यज्ञोक्तेन विधानेन संपूर्णविधयो मुने ॥

ततस्तस्माद्यज्ञकुंडात्समुत्पेतुः सहस्रशः । भूतसंघा महाकायाः शूलशक्तिगदायुधाः

ददृशुस्ते सुरास्तान् वै भूतसंघान् सहस्रशः ।

शूलशक्तिगदाहस्तान्दण्डचापशिलायुधान् ॥

नानाप्रहरणोपेतान् नानावेषधराँस्तथा । कालाग्निरुद्रसदृशान्कालसूर्योपमाँस्तदा

दृष्ट्वा तानब्रवीद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरःस्थितान् ।

भूतान्यज्ञपतिः श्रीमान् रुद्राज्ञाप्रतिपालकः ॥

विष्णुरुवाच भूताः शृणुत मद्वाक्यं देवकार्यार्थमुद्यताः । गच्छन्तु त्रिपुरं सद्यः सर्वे हि बलवत्तराः

गत्वा दग्ध्वा च भित्त्वा च भङ्क्त्वा दैत्यपुरत्रयम् ।

पुनर्यथागता भूतागंतुमर्हथ भूतये ॥

सनत्कुमार उवाच

तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं ततो भूतगणाश्च ते ।

प्रणम्य देवदेवं तं ययुर्दैत्यपुरत्रयम् ॥

गत्वा तत्प्रविशतश्च त्रिपुराधिपतेजसि ।

भस्मसादभवन्सद्यः शलभा इव पावके ॥

अवशिष्टाश्च ये केचित्पलायनपरायणाः । निस्सृत्यारं समायाता हरेर्निकटमाकुलाः

तान्दृष्ट्वा स हरिः श्रुत्वा तच्च वृत्तमशेषतः ।

चिंतयामास भगवान्मनसा पुरुषोत्तमः ॥

किं कृत्यमधुना कार्यमिति संतप्तमानसः ।

संतप्तानमरान्सर्वानाज्ञाय च सवासवान् ॥

कथं तेषां च दैत्यानां बलाद्धत्वा पुरत्रयम् ।

देवकार्यं करिष्यामीत्यासीच्चिन्तासमाकुलः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३ सनत्कुमार बोले- देवाधिदेव बुद्धिमान् वचन सुनकर वे देवता प्रेमपूर्वक यज्ञेशको प्रणाम विष्णुका करके ॥ २६ उनकी स्तुति करने लगे । हे मुने! इस प्रकार स्तुति करने | पश्चात् सम्पूर्ण विधियोंके ज्ञाता वे देवता यज्ञोक्त २७ विधानसे यज्ञपुरुषका यजन करने लगे ॥ २६-२७ ॥ तब उस यज्ञकुण्डसे शूल, शक्ति और गदा ॥ २८ हाथमें धारण किये महाकाय हजारों भूतसमुदाय उत्पन्न हुए ॥२८ ॥

उन देवताओंने हाथमें शूल - शक्ति - गदा - दण्ड-२ ९ धनुष तथा शिलाका आयुध धारण किये हुए, इसके अतिरिक्त और भी अनेक प्रकारके अस्त्र धारण किये हुए, नाना प्रकारके वेष धारण किये हुए, कालाग्नि ॥ ३० रुद्रके समान तथा कालसूर्यके समान प्रतीत होनेवाले उन हजारों भूत - समुदायोंको देखा । अपने आगे खड़े उन भूतोंको देखकर और उन्हें प्रणामकर रुद्रकी ३१ आज्ञाका पालन करनेवाले यज्ञपति श्रीमान् विष्णु उनसे कहने लगे -॥२ ९ –३१ ॥ विष्णुजी बोले - हे भूतगणो! तुम मेरी बात सुनो । तुमलोग महाबलवान् हो, अतः देवकार्यके लिये ॥ ३२ तत्पर हो शीघ्र त्रिपुरको जाओ । हे भूतगणो! वहाँ जाकर दैत्योंके तीनों पुरोंको तोड़ - फोड़कर तथा जलाकर ३३ पुनः लौट आना, इसके बाद अपने कल्याणके लिये जहाँ इच्छा हो, वहाँ चले जाना॥३२-३३ ॥ सनत्कुमार बोले — तब भगवान् विष्णुकी वह बात सुनकर वे भूतगण उन देवाधिदेवको प्रणामकर ३४ दैत्योंके त्रिपुरकी ओर चल दिये । वहाँ जाकर त्रिपुरमें | प्रवेश करते ही वे त्रिपुरके अधिपतिके तेजमें उसी ३५ प्रकार शीघ्र भस्म हो गये, जैसे अग्निमें पतिंगे भस्म । हो जाते हैं । उनमें जो कोई शेष बचे, वे भाग गये. ॥ ३६ । और वहाँसे निकलकर व्याकुल हो शीघ्र विष्णुके समीप चले आये ॥ ३४–३६ ॥ ३७ वह तब पुरुषोत्तम भगवान् हरि उनको देखकर तथा | देवताओंको दुखी जानकर सन्तप्तचित्त हो गये और ३८ | सोचने लगे कि इस समय कौन - सा कार्य करना । चाहिये । उन दैत्योंके तीनों पुरोंको बलपूर्वक नष्ट | करके मैं देवताओंका कार्य किस प्रकार करूँ - वे इसी ३ ९ । चिन्तासे व्याकुल हो उठे ॥ ३७-३९ ॥

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अ ० ३ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८३७

नाशोऽभिचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः ।

इति प्राह स्वयं चेशः श्रुत्याचारप्रमाणकृत् ॥

दैत्याश्च ते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः ।

तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथासुरपुंगवाः ॥

कृत्वा तु सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयंति ते ।

मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥

रुद्राभ्यर्चनतो देवाः सर्वे कामा भवन्ति हि ।

नानोपभोगसंपत्तिर्वश्यतां याति वै भुवि ॥

तस्मात्तद्भोगिनो दैत्या लिंगार्चनपरायणाः ।

अनेकविधसंपत्तेर्मोक्षस्यापि परत्र च ॥

ततः कृत्वा धर्मविघ्नं तेषामेवात्ममायया ।

दैत्यानां देवकार्यार्थं हरिष्ये त्रिपुरं क्षणात् ॥

विचार्येत्थं ततस्तेषां भगवान्पुरुषोत्तमः ।

कर्तुं व्यवस्थितः पश्चाद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम् ॥

यावच्च वेदधर्मास्तु यावद्वै शंकरार्चनम् ।

यावच्च शुचिकृत्यानि तावन्नाशो भवेन्न हि ॥

तस्मादेवं प्रकर्तव्यं वेदधर्मस्ततो व्रजेत् ।

त्यक्तलिंगार्चना दैत्या भविष्यन्ति न संशयः ॥

इति निश्चित्य वै विष्णुर्विघ्नार्थमकरोत्तदा ।

तेषां धर्मस्य दैत्यानामुपायं श्रुतिखण्डनम् ॥

तदैवोवाच देवान्स विष्णुर्देवसहायकृत् ।

शिवाज्ञया शिवेनैवाज्ञप्तस्त्रैलोक्यरक्षणे ॥

विष्णुरुवाच हे देवाः सकला यूयं गच्छत स्वगृहान्ध्रुवम् । देवकार्यं करिष्यामि यथामति न संशयः

तारुद्राद्विमुखान्नूनं करिष्यामि सुयत्नतः ।

स्वभक्तिरहितान् ज्ञात्वा तान्करिष्यामि भस्मसात् ॥

सनत्कुमार उवाच । तदाज्ञां शिरसाधायाश्वासितास्तेऽमरा मुने । स्वस्वधामानि विश्वस्ता ययुः परममोदिताः धर्मात्माओंका अभिचारसे भी नाश नहीं होता, ४० इसमें संशय नहीं है — ऐसा श्रुतिके आचारको प्रमाणित करनेवाले शंकरजीने स्वयं कहा है । हे श्रेष्ठ देवताओ! ४१ त्रिपुरमें रहनेवाले वे सभी दैत्य बड़े धर्मनिष्ठ हैं, इसलिये सर्वथा अवध्य हैं, यह बात असत्य नहीं है वे महान् पाप करके भी रुद्रकी अर्चना करते हैं, ४२ इसलिये सभी प्रकारके पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाते हैं, जैसे पद्मपत्र जलसे पृथक् रहता है । हे देवताओ! ४३ रुद्रकी अर्चनासे सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और पृथ्वीके अनेक प्रकारके भोग एवं सम्पत्तियाँ वशीभूत हो जाती हैं । अतः लिंगार्चनपरायण ये दैत्य इस ४४ लोकमें अनेक प्रकारकी सम्पत्तिका भोग कर रहे हैं और परलोकमें भी उन्हें मोक्ष प्राप्त होगा । फिर भी ४५ मैं अपनी मायासे उन दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालकर देवताओंकी कार्यसिद्धिके निमित्त क्षणभरमें त्रिपुरका ४६ संहार करूँगा – इस प्रकार विचार करनेके पश्चात् वे भगवान् पुरुषोत्तम उन दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये तत्पर हो गये॥४०–४६ ॥ जबतक उनमें वेदके धर्म हैं, जबतक वे ४७ शंकरकी अर्चना करते हैं और जबतक वे पवित्र कृत्य करते हैं, तबतक उनका नाश नहीं हो सकता । इसलिये अब ऐसा उपाय करना चाहिये कि वहाँसे ४८ वेदधर्म चला जाय, तब वे दैत्य लिंगार्चन त्याग देंगे, इसमें सन्देह नहीं — ऐसा निश्चय करके विष्णुजीने उन दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये श्रुतिखण्डनरूप ४ ९ उपाय किया । इसके बाद त्रैलोक्यरक्षणके लिये शिवके द्वारा आदिष्ट देवसहायक उन विष्णुने शिवकी ५० आज्ञासे देवताओंसे कहा — ॥४७–५० ॥ विष्णुजी बोले — हे देवो! [ इस समय ] आप सभी लोग निश्चित रूपसे अपने घरको चले जायँ, मैं अपनी बुद्धिके अनुसार देवताओंका कार्य अवश्य ॥ ५१ करूँगा, इसमें सन्देह नहीं है । मैं बड़े यत्नसे उन्हें रुद्रसे अवश्य विमुख करूँगा और तब शिवजी अपनी शक्तिसे ५२ रहित जानकर उन्हें भस्म कर देंगे ॥ ५१-५२ ॥ सनत्कुमार बोले- हे मुने! तब वे देवगण विष्णुकी आज्ञाको सिरपर धारणकर कुछ निश्चिन्त और फिर ब्रह्माके द्वारा आश्वासित होनेपर प्रसन्न ॥ ५३ | हुए

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८३८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ ततश्चैवाकरोद्विष्णुर्देवार्थं हितमुत्तमम् । | हो अपने - अपने स्थानोंको चले गये । इसके | विष्णुने देवताओंके लिये जो उत्तम उपाय किया बाद आप भलीभाँति सुनिये, वह सभी पापोंका, उसे तदेव श्रूयतां सम्यक्सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ५४ करनेवाला है ॥ ५३-५४ ॥ नाश इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे त्रिपुरवधोपाख्याने भूतत्रिपुरधर्मवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें त्रिपुरवधोपाख्यानान्तर्गत भूतत्रिपुरधर्मवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः त्रिपुरवासी दैत्योंको मोहित करनेके लिये भगवान् विष्णुद्वारा एक मुनिरूप पुरुषकी उत्पत्ति, उसकी सहायताके लिये नारदजीका सनत्कुमार उवाच

असृजच्च महातेजाः पुरुषं स्वात्मसंभवम् ।

एकं मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः ॥

मुंडिनं म्लानवस्त्रं च गुंफिपात्रसमन्वितम् ।

दधानं पुंजिकां हस्ते चालयन्तं पदे पदे ॥

वस्त्रयुक्तं तथा हस्तं क्षीयमाणं मुखे सदा ।

धर्मेति व्याहरन्तं हि वाचा विक्लवया मुनिम् ॥

स नमस्कृत्य विष्णुं तं तत्पुरः संस्थितोऽथ वै ।

उवाच वचनं तत्र हरिं स प्रांजलिस्तदा ॥

अरिहन्नच्युतं पूज्यं किं करोमि तदादिश ।

कानि नामानि मे देव स्थानं वापि वद प्रभो ॥

इत्येवं भगवान्विष्णुः श्रुत्वा तस्य शुभं वचः ।

प्रसन्नमानसो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥

विष्णुरुवाच

यदर्थं निर्मितोऽसि त्वं निबोध कथयामि ते ।

मदंगज महाप्राज्ञ मद्रूपस्त्वं न संशयः ॥

ममांगाच्च समुत्पन्नो मत्कार्यं कर्तुमर्हसि ।

मदीयस्त्वं सदा पूज्यो भविष्यसि न संशयः ॥

त्रिपुरमें गमन, त्रिपुराधिपका दीक्षा ग्रहण करना सनत्कुमार बोले — उन महातेजस्वी विष्णुने उनके धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये अपने ही १ शरीरद्वारा एक मायामय मुनिरूप पुरुषको उत्पन्न किया ॥१ ॥

वह अपना सिर मुड़ाये हुए, मलिन वस्त्र धारण २ किये हुए, हाथमें एक गुम्फि ( काष्ठ ) -का पात्र लिये हुए, दूसरे हाथमें झाडू लिये तथा उससे पग - पगपर बुहारी करता हुआ, " हस्तपरिमाणका वस्त्र अपने ३ मुखपर लपेटे हुए विकल वाणीसे धर्म - धर्म इस प्रकार कह रहा था ॥ २-३ ॥ वह उन विष्णुको प्रणामकर उनके आगे स्थित ४ हो गया, इसके बाद उसने हाथ जोड़कर पूज्य, अच्युत विष्णुसे यह वचन कहा — हे अरिहन्! [ शत्रुनाशक ] मैं क्या करूँ? इसके लिये आज्ञा ५ दीजिये । हे देव! मेरे क्या - क्या नाम होंगे? हे प्रभो! । मेरे स्थानका भी निर्देश कीजिये । इस प्रकार उसका | यह शुभ वचन सुनकर भगवान् विष्णु प्रसन्नचित्त ६ होकर यह वचन कहने लगे- ॥४–६ ॥ विष्णुजी बोले- - -मेरे शरीरसे उत्पन्न हे महाप्राज्ञ! मैंने जिसके लिये निर्माण किया है, उसे ७ सुनो, मैं कह रहा हूँ तुम्हारा । तुम मेरे ही रूप हो, इसमें सन्देह नहीं है ॥७ ॥

मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए तुम मेरा कार्य करनेमें ] समर्थ हो । तुम मुझसे अभिन्न हो, इसलिये [ लोकमें ८ । सदा पूज्य होओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

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अ ० ४ ] रुद्रसंहिता (

अरिहन्नाम तं स्यात्तु ह्यन्यानि च शुभानि च ।

स्थानं वक्ष्यामि ते पश्चाच्छृणु प्रस्तुतमादरात् ॥ ९

मायिन्मायामयं शास्त्रं तत्षोडशसहस्रकम् ।

श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम् ॥ १०

अपभ्रंशमयं शास्त्रं कर्मवादमयं तथा ।

रचयेति प्रयत्नेन तद्विस्तारो भविष्यति ॥ ११

ददामि तव निर्माणे सामर्थ्यं तद्भविष्यति ।

माया च विविधा शीघ्रं त्वदधीना भविष्यति ॥ १२

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरेश्च परमात्मनः ।

नमस्कृत्य प्रत्युवाच स मायी तं जनार्दनम् ॥ १३

मुण्ड्युवाच

यत्कर्तव्यं मया देव द्रुतमादिश तत्प्रभो ।

त्वदाज्ञयाखिलं कर्म सफलं च भविष्यति ॥ १४

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्त्वा पाठयामास शास्त्रं मायामयं तथा ।

इहैव स्वर्गनरकप्रत्ययो नान्यथा पुनः ॥ १५

तमुवाच पुनर्विष्णुः स्मृत्वा शिवपदांबुजम् ।

मोहनीया इमे दैत्याः सर्वे त्रिपुरवासिनः ॥ १६

कार्यास्ते दीक्षिता नूनं पाठनीयाः प्रयत्नतः ।

मदाज्ञया न दोषस्ते भविष्यति महामते ॥ १७

धर्मास्तत्र प्रकाशन्ते श्रौतस्मार्त्ता न संशयः ।

अनया विद्यया सर्वे स्फोटनीया ध्रुवं यते ॥ १८

गंतुमर्हसि नाशार्थं मुण्डिंस्त्रिपुरवासिनाम् ।

तमोधर्मं संप्रकाश्य नाशयस्व पुरत्रयम् ॥ १ ९

ततश्चैव पुनर्गत्वा मरुस्थल्यां त्वया विभो ।

स्थातव्यं च स्वधर्मेण कलिर्यावत्समाव्रजेत् ॥ २०

। प्रवृत्ते तु युगे तस्मिन्स्वीयो धर्मः प्रकाश्यताम् ।

• शिष्यैश्च प्रतिशिष्यैश्च वर्तनीयस्त्वया पुनः ॥ २१

युद्धखण्ड ) ८३ ९ तुम्हारा नाम अरिहन् होगा, तुम्हारे अन्य भी शुभ नाम होंगे । मैं तुम्हारे स्थानको बादमें बताऊँगा, इस समय मेरा प्रस्तुत कार्य आदरसे सुनो॥९॥

हे मायावी! तुम सोलह हजार श्लोकोंवाला एक शास्त्र प्रयत्नपूर्वक बनाओ, जो मायामय, श्रुति-स्मृतिसे विरुद्ध, वर्णाश्रमधर्मसे रहित, अपभ्रंश शब्दोंसे युक्त और कर्मवादपर आधारित हो, आगे चलकर उसका विस्तार होगा । मैं तुम्हें उस शास्त्रके निर्माणका सामर्थ्य देता हूँ । अनेक प्रकारकी माया भी तुम्हारे

अधीन हो जायगी॥१०- । - -१२ ॥

उन परमात्मा श्रीविष्णुका वचन सुनकर वह मायावी प्रणामकर जनार्दनसे कहने लगा —॥१३ ॥

मुण्डी बोला – हे देव! मुझे जो करना हो, उसे शीघ्र बताइये । हे प्रभो! आपकी आज्ञासे सारा कार्य सिद्ध होगा ॥ १४ ॥

सनत्कुमार बोले- मुण्डीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भगवान्ने उसे मायामय शास्त्र पढ़ाया और बताया कि स्वर्ग - नरककी प्रतीति यहींपर है; इसमें सन्देह नहीं है ॥१५ ॥

उसके बाद विष्णुने शिवजीके चरणकमलका स्मरण करके उससे पुनः कहा कि तुम त्रिपुरमें रहनेवाले इन समस्त दैत्योंको मोहित करो । तुम उन्हें दीक्षित करो और प्रयत्नपूर्वक इस शास्त्रको पढ़ाओ । हे महामते! मेरी आज्ञाके कारण तुम्हें [ ऐसा करनेसे ] दोष नहीं लगेगा । हे यते! इसमें सन्देह नहीं कि वहाँ श्रौतस्मार्त धर्म प्रकाश कर रहे हैं, किंतु तुम इस विद्याके द्वारा उन सभीको धर्मसे च्युत करो ॥ १६–१८ ॥ हे मुण्डिन्! अब तुम उन त्रिपुरवासियोंके विनाशके लिये जाओ और तमोगुणी धर्मको प्रकाशितकर तीनों पुरोंका नाश करो । हे विभो! उसके बाद वहाँसे मरुस्थलमें जाकर कलियुगके आनेतक वहीं अपने धर्मके साथ निवास करना और उस युगके आ जानेपर तुम शिष्य - प्रशिष्योंके साथ अपने धर्मका प्रचार करना और उसीका व्यवहार करना ॥ १ ९ –२१ ॥

पृष्ठ 850

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८४० मदाज्ञया भवद्धर्मो विस्तारं यास्यति ध्रुवम् । मदनुज्ञापरो नित्यं गतिं प्राप्स्यसि मामकीम् एवमाज्ञा तदा दत्ता विष्णुना प्रभविष्णुना । शासनाद्देवदेवस्य हृदा त्वन्तर्दधे हरिः ततस्समुंडी परिपालयन्हरे-राज्ञां तथा निर्मितवांश्च शिष्यान् । यथास्वरूपं चतुरस्तदानीं श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ मेरी आज्ञासे तुम्हारे इस धर्मका निश्चित ॥ २२ / विस्तार होगा तथा मेरी आज्ञामें तत्पर होकर रूपसे गति प्राप्त करोगे । इस प्रकार देवाधिदेव तुम मेरी शंकरकी ॥ २३ । आज्ञासे सर्वसमर्थ विष्णुने उसे हृदयसे आदेश दिया । इसके बाद विष्णुजी अन्तर्धान हो गये ॥ २२-२३, उसके बाद उस मुण्डीने विष्णुकी आज्ञाका पालन ॥ करते हुए उस समय अपने रूपके अनुसार चार शिष्योंका मायामयं शास्त्रमपाठयत्स्वयम् ॥ २४ | निर्माण किया और उन्हें स्वयं मायामय शास्त्र पढ़ाया ॥ २४ ॥

यथा स्वयं तथा ते च चत्वारो मुंडिनः शुभाः ।

नमस्कृत्य स्थितास्तत्र हरये परमात्मने ॥

हरिश्चापि मुनेस्तत्र चतुरस्तांस्तदा स्वयम् ।

उवाच परमप्रीतः शिवाज्ञापरिपालकः ॥

यथा गुरुस्तथा यूयं भविष्यथ मदाज्ञया ।

धन्याः स्थ सद्गतिमिह संप्राप्स्यथ न संशयः ॥

चत्वारो मुंडिनस्तेऽथ धर्मं पाषंडमाश्रिताः ।

हस्ते पात्रं दधानाश्च तुंडवस्त्रस्य धारकाः ॥

मलिनान्येव वासांसि धारयंतो ह्यभाषिणः ।

धर्मो लाभः परं तत्त्वं वदन्तस्त्वतिहर्षतः ॥

मार्जनीं ध्रियमाणाश्च वस्त्रखंडविनिर्मिताम् ।

शनैः शनैश्चलन्तो हि जीवहिंसाभयाद्ध्रुवम् ॥

ते सर्वे च तदा देवं भगवंतं मुदान्विताः ।

नमस्कृत्य पुनस्तत्र मुने तस्थुस्तदग्रतः ॥

हरिणा च तदा हस्ते धृत्वा च गुरवेऽर्पिताः ।

अभ्यधायि च सुप्रीत्या तन्नामानि विशेषतः ॥

यथा त्वं च तथैवैते मदीया वै न संशयः ।

आदिरूपं च तन्नाम पूज्यत्वात्पूज्य उच्यते ॥

ऋषिर्यतिस्तथाकीर्य उपाध्याय इति स्वयम् ।

इमान्यपि तु नामानि प्रसिद्धानि भवंतु वः ॥

ममापि च भवद्भिश्च नाम ग्राह्यं शुभं पुनः ।

अरिहन्निति तन्नाम ध्येयं पापप्रणाशनम् ॥

भवद्भिश्चैव कर्तव्यं कार्यं लोकसुखावहम् ।

लोकानुकूलं चरतां भविष्यत्युक्तमा गतिः ॥

जैसा वह स्वयं था, उसी प्रकारके वे चारों शुभ २५ मुण्डी भी थे, वे परमात्मा श्रीविष्णुको नमस्कारकर वहींपर स्थित हो गये । हे मुने! तब शिवकी आज्ञाका पालन करनेवाले श्रीविष्णुने भी परम प्रसन्न होकर उन २६ चारों शिष्योंसे स्वयं कहा- जैसे तुमलोगोंके गुरु हैं, वैसे ही मेरी आज्ञासे तुमलोग भी बनो । तुमलोग धन्य २७ हो और इस लोकमें सद्गति प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं है॥२५–२७ ॥ इसके बाद वे चारों मुण्डी हाथमें पात्र लिये, २८ नासिकापर वस्त्र बाँधे, मलिन वस्त्र धारण किये हुए, अत्यधिक न बोलते हुए ' धर्म ही लाभ तथा परम २ ९ तत्त्व है ' - ऐसा अति हर्षपूर्वक कहते हुए, वस्त्रके छोटे - छोटे टुकड़ोंसे बनी हुई मार्जनी धारण किये हुए ३० और जीवहिंसाके भयसे धीरे - धीरे चलते हुए विचरण करने लगे । हे मुने! तब वे सभी प्रसन्न होकर ३१ देवाधिदेव श्रीविष्णुको नमस्कारकर उनके आगे स्थित हो गये ॥ २८-३१ ॥ उसके अनन्तर भगवान् विष्णुने उनका हाथ पकड़कर ३२ उन्हें गुरुको अर्पित कर दिया और अत्यन्त प्रेमके साथ विशेषरूपसे उनके नामोंको बताया और कहा - जैसे तुम । मेरे हो, उसी प्रकार ये भी मेरे हैं, इसमें संशय नहीं है । ३३ तुम्हारा आदिरूप है, इसलिये आदिरूप यह नाम होगा और । पूज्य होनेसे तुम पूज्य भी कहे जाओगे ॥ ३२-३३ ॥ ऋषि, यति, कीर्य एवं उपाध्याय - ये नाम भ ३४ तुमलोगोंके प्रसिद्ध होंगे । तुमलोगोंको मेरे भी शुभ नामको न ग्रहण करना चाहिये । अरिहन् — यह मेरा नाम · ध्यानयोग्य ३५ तथा पापनाशक है । अब आपलोगोंको लोककल्याणकारी ३६ । कार्य करते रहना चाहिये । लोकके अनुकूल आचरण ३४-३६ /