शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 861–870

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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अ ० ६ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८५१ विष्णुमुदासीनान् दृष्ट्वा च भवकृद्विधिः । देवान् कृताञ्जलिपुटः शंभुं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ ३ ९ ब्रह्मोवाच

न किंचिद्विद्यते पापं यस्मात्त्वं योगवित्तमः ।

परमेशः परब्रह्म सदा देवर्षिरक्षकः ॥ ४०

तवैव शासनात्ते वै मोहिताः प्रेरको भवान् ।

त्यक्तस्वधर्मत्वत्पूजाः परवध्यास्तथापि न ॥ ४१

अतस्त्वया महादेव सुरर्षिप्राणरक्षक ।

साधूनां रक्षणार्थाय हंतव्या म्लेच्छजातयः ॥ ४२

राज्ञस्तस्य न तत्पापं विद्यते धर्मतस्तव ।

तस्माद्रक्षेद्विजान् साधून् कंटकान् वै विशोधयेत् ॥ ४३

एवमिच्छेदिहान्यत्र राजा चेद्राज्यमात्मनः ।

प्रभुत्वं सर्वलोकानां तस्माद्रक्षस्व माचिरम् ॥ ४४

मुनीन्द्रेशास्तथा यज्ञा वेदाः शास्त्रादयोऽखिलाः ।

देवदेवेश ह्यहं विष्णुरपि ध्रुवम् ॥ ४५

प्रजास्ते देवतासार्वभौमस्त्वं सर्वेश्वरः प्रभो । सम्राट् परिवारस्तवैवैष हर्यादि सकलं जगत् ॥ ४६

युवराजो हरिस्तेऽज ब्रह्माहं ते पुरोहितः ।

राजकार्यकरः ॥ ४७

शक्रस्त्वदाज्ञापरिपालकः

देवा अन्येऽपि सर्वेश तव शासनयन्त्रिताः ।

स्वस्वकार्यकरा नित्यं सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ४८

उवाच सनत्कुमार

ब्रह्मणः परमेश्वरः ।

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य विधिम् ॥ ४ ९

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा शंकरः सुरपो अनन्तर देवताओं एवं विष्णुको उदास देखकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माने हाथ जोड़कर शिवजीसे कहा— ॥ ३ ९ ॥ ब्रह्माजी बोले - [ हे प्रभो! ] आपको कोई पाप नहीं लगेगा; क्योंकि आप परम योगवेत्ता हैं, आप परमेश्वर, परब्रह्म तथा सर्वदा देवताओं एवं ऋषियोंके रक्षक हैं ॥४० ॥

आप ही प्रेरणा देनेवाले हैं । आपके ही शासनसे मोहित होकर उन्होंने अपने धर्म तथा आपकी पूजाका त्याग कर दिया है, फिर भी वे दूसरोंके द्वारा अवध्य हैं ॥ ४१ ॥

अतः हे महादेव! हे देवर्षिप्राणरक्षक! आप सज्जनोंकी रक्षाके लिये इन म्लेच्छजातियोंका वध कीजिये ॥ ४२ ॥

राजाका कर्तव्य होता है कि धर्मकी रक्षा करे तथा पापियोंका वध करे । आप राजा हैं, इसलिये ब्राह्मण तथा साधुओंकी रक्षाके निमित्त स्वयं आपको इस कण्टकका शोधन करना चाहिये । ऐसा करनेसे आपको पाप नहीं लगेगा ॥ ४३ ॥

यदि राजा इस प्रकार अपने राज्यकी रक्षा करे, तो उसे इस लोकमें सर्वलोकाधिपत्य तथा परम कल्याण प्राप्त होता है । इस कारण आप स्वयं त्रिपुरका वधकर इन देवताओंकी रक्षा कीजिये, [ प्रभो! ] विलम्ब न करें ॥४४ ॥

हे देवदेवेश! मुनि, इन्द्र, ईश्वर, यज्ञ, वेद, समस्त शास्त्र तथा मैं और विष्णु- ये सभी आपकी प्रजाएँ हैं । हे प्रभो! आप देवगणोंके सार्वभौम सम्राट्, सर्वेश्वर हैं और विष्णुसे लेकर सारा संसार आपका परिवार है॥४५-४६ ॥ हे अज! विष्णु आपके युवराज हैं, मैं आपका पुरोहित हूँ एवं ये इन्द्र आपके राज्यकी देखभाल करनेवाले तथा आपकी आज्ञाके परिपालक हैं ॥ ४७ ॥

हे सर्वेश! इसी प्रकार अन्य देवता भी आपके शासनमें रहकर सदा अपने - अपने कार्य करते हैं, यह सत्य है, सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥

सनत्कुमार बोले- इस प्रकार उन ब्रह्माका वचन सुनकर देवरक्षक भगवान् शंकर प्रसन्नचित्त । होकर ब्रह्मासे कहने लगे- ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 862

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८५२ शिव उवाच हे ब्रह्मन् यद्यहं देवराजः सम्राट् प्रकीर्त्तितः तत्प्रकारो न मे कश्चिद् गृह्णीयां यमिह प्रभुः रथो नास्ति महादिव्यस्तादृक् सारथिना सह धनुर्बाणादिकं चापि संग्रामे जयकारकम्

यमास्थाय धनुर्बाणान् गृहीत्वा योज्य वै मनः ।

निहनिष्याम्यहं दैत्यान् प्रबलानपि संगरे ॥

सनत्कुमार उवाच

अद्य सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः प्रहर्षिताः ।

श्रुत्वा प्रभोस्तदा वाक्यं नत्वा प्रोचुर्महेश्वरम् ॥

देवा ऊचुः

वयं भवाम देवेश तत्प्रकारा महेश्वर ।

रथादिकाः तव स्वामिन्संनद्धाः संगराय हि ॥

इत्युक्त्वा संहताः सर्वे शिवेच्छामधिगम्य ह ।

पृथगूचुः प्रसन्नास्ते कृताञ्जलिपुटास्सुराः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! यदि मैं । । देवराज तथा सबका सम्राट् कहा गया हूँ फिर वस्तुतः , भी ॥ ५० मेरे पास ऐसा कोई साधन नहीं है, जिससे में पदको ग्रहण कर सकूँ ॥ ५० ॥ इस

। मेरे पास योग्य सारथीसहित महादिव्य रथ नहीं ॥ ५१ है और संग्राममें विजय दिलानेवाला धनुष - बाण आदि भी नहीं है, जिस रथपर बैठकर, धनुष - बाण लेकर तथा अपना मन लगाकर उन प्रबल दैत्योंका संग्राममें ५२ वध कर सकूँ ॥ ५१-५२ ॥ सनत्कुमार बोले- तब ब्रह्मा, इन्द्र एवं विष्णुके सहित सभी देवता प्रभुके वचनको सुनकर परम प्रसन्न हो उठे और महेश्वरको प्रणामकर उनसे कहने ५३ लगे -॥५३ ॥

देवता बोले – हे देवेश! हे महेश्वर! हे स्वामिन्! हमलोग आपके रथादि उपकरण बनकर ५४ युद्धके लिये तैयार हैं ॥५४ ॥

इस प्रकार कहकर प्रसन्न हुए वे सभी देवता एकत्रित हो शिवजीकी इच्छा जानकर हाथ जोड़कर ५५ । अलग - अलग कहने लगे ॥५५ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शिवस्तुतिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें शिवस्तुतिवर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये त्रिपुर - विनाशके लिये दिव्य रथ सनत्कुमार उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु सर्वेषां देवादीनां वचो हरः ।

अंगीचकार सुप्रीत्या शरण्यो भक्तवत्सलः ॥

एतस्मिन्नन्तरे देवी पुत्राभ्यां संयुता शिवा ।

आजगाम मुने तत्र यत्र देवान्वितो हरः ॥

अथागतां शिवां दृष्ट्वा सर्वे विष्ण्वादयो द्रुतम् ।

प्रणेमुरतिनम्रास्ते विस्मिता गतसंभ्रमाः ॥

देवताओंद्वारा मन्त्रजप, शिवका प्राकट्य तथा आदिके निर्माणके लिये विष्णुजीसे कहना सनत्कुमार बोले- समस्त देवता आदि | इस वचनको सुनकर शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले १ भक्तवत्सल सदाशिवने उनकी बात स्वीकार कर । ली । हे मुने! इसी बीच देवी पार्वती अपने दोनों | पुत्रोंको लेकर वहाँ आ गयीं जहाँ सदाशिव देवताओं २ साथ स्थित, थे ॥ १-२ ॥ तब देवीको वहाँ उपस्थित देखकर विष्णु आदि | सभी देवता आश्चर्ययुक्त हो गये और सम्भ्रमयुक्त ह होकर ३ नम्रतासे उन्हें शीघ्रतापूर्वक करने लगे ॥ ३ ॥

प्रणाम

पृष्ठ 863

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अ ० ७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८५३ सद्वाक्यं मुने सर्वे सुलक्षणम् । प्रोचुर्जयेति ॥ तूष्णीमासन्नजानन्तस्तदागमनकारणम्

अथ सर्वैः स्तुता देवैर्देव्यद्भुतकुतूहला ।

स्वामिनं प्रीत्या नानालीलाविशारदम् ॥

उवाच देव्युवाच

क्रीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसंनिभम् ।

पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठं भूषितं भूषणैर्वरैः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्येवं लोकमात्रा च वाग्भिः संबोधितश्शिवः ।

न ययौ तृप्तिमीशानः पिबन् स्कंदाननामृतम् ॥

न सस्मारागतान् देवान् दैत्यतेजोनिपीडितान् ।

स्कंदमालिंग्य चाघ्राय मुमोदाति महेश्वरः ॥

जगदम्बाथ तत्रैव संमन्त्र्य प्रभुणा च सा ।

स्थित्वा किञ्चित्समुत्तस्थौ नानालीलाविशारदा ॥

ततः स नंदी सह षण्मुखेन तया च सार्द्धं गिरिराजपुत्र्या । विवेश शम्भुर्भवनं सुलीलः सुरैः समस्तैरभिवंद्यमानः ॥

द्वारस्य पार्श्वतः तस्थुर्देवदेवस्य धीमतः ।

तेऽथ देवा महाव्यग्रा विमनस्का मुनेऽखिलाः ॥

किं कर्तव्यं क्व गंतव्यं कः स्यादस्मत्सुखप्रदः ।

किं तु किंत्विति संजातं हा हताः स्मेति वादिनः ॥

अन्योन्यं प्रेक्ष्य शक्राद्या बभूवुश्चातिविह्वलाः ।

प्रोचुर्विकलवाक्यं ते धिक्कुर्वन्तो निजं विधिम् ॥

पापा वयमिहेत्यन्ये ह्यभाग्याश्चेति चापरे । ते भाग्यवंतो दैत्येन्द्रा इति चान्येऽब्रुवन् सुराः तस्मिन्नेवांतरे तेषां श्रुत्वा शब्दाननेकशः कुंभोदरो महातेजा दंडेनाताडयत्सुरान् ॥ हे मुने! उन सभीने शुभ लक्षण प्रकट करनेवाला ४ जय - जयकार किया और उनके आनेका कारण न जानते हु वे लोग मौन हो गये । इसके बाद सभी देवताओंसे स्तुत एवं अद्भुत कुतूहल करनेवाली वे ५ देवी नानालीला - विशारद अपने स्वामीसे प्रेमपूर्वक कहने लगीं— ॥४-५ ॥ देवी बोलीं- हे विभो! हे पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ! उत्तम आभूषणोंसे भूषित तथा सूर्यके समान देदीप्यमान ६ खेलते हुए अपने षण्मुख पुत्रको देखिये ॥६ ॥

सनत्कुमार बोले- जब लोकमाताने अपनी वाणीसे इस प्रकार शिवजीको सम्बोधित करते हुए ७ कहा, तब स्कन्दके मुखामृतका पान करते हुए शिवजीको तृप्ति नहीं हुई ॥ ७ ॥

उस समय महेश्वरको दैत्योंके तेजसे पीड़ित ८ होकर आये हुए देवताओंका स्मरण नहीं रहा और वे स्कन्दका आलिंगन करके तथा उनका सिर सूँघकर बड़े प्रसन्न हुए ॥८ ॥

अनेक लीलाओंमें विशारद श्रीजगदम्बा भी ९ महेश्वरसे मन्त्रणाकर कुछ कालतक वहीं स्थित रहकर पुनः उठ खड़ी हुईं । इसके बाद सभी देवताओंसे वन्दित होते हुए उत्तम लीलावाले भगवान् सदाशिवने कार्तिकेय, नन्दी तथा उन गिरिराजपुत्रीके साथ अपने १० भवनमें प्रवेश किया ॥ ९ -१० ॥ हे मुने! [ शंकरको घरमें गया देख ] सम्पूर्ण ११ देवता महाव्याकुल एवं क्षुब्धमन होकर बुद्धिमान् देवाधिदेवके द्वारके समीप खड़े रहे । अब हम क्या करें, कहाँ जायँ, कौन हमलोगोंको सुख देनेवाला है १२ और यह क्या हो गया? हाय हमलोग मारे गये-ऐसा वे सब कहने लगे । एक - दूसरेको देखकर इन्द्र आदि अत्यन्त व्याकुल हो गये और अपने भाग्यको १३ धिक्कारते हुए विकल वचन कहने लगे । कुछ देवताओंने कहा — हाय! हमलोग बड़े पापी हैं 1 दूसरोंने कहा — हाय, हम अभागे हैं, अन्योंने कहा— ॥ १४ वे असुर तो बड़े भाग्यवान् हैं ॥ ११–१४ ॥ उसी समय उनके अनेक प्रकारके शब्दोंको सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर [ नामका गण ] देवताओंको । दण्डसे मारने लगा । तब वे देवता भयभीत होकर १५ |

पृष्ठ 864

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८५४

दुद्रुवुस्ते भयाविष्टा देवा हाहेति वादिनः ।

अपतन्मुनयश्चान्ये विह्वलत्वं बभूव ह ॥

इन्द्रस्तु विकलोऽतीव जानुभ्यामवनीं गतः ।

अन्ये देवर्षयोऽतीव विकलाः पतिता भुवि ॥

सर्वे मिलित्वा मुनयः सुराश्च सममाकुलाः ।

संगता विधिहर्योस्तु समीपं मित्रचेतसोः ॥

अहो विधिबलं चैतन्मुनयः कश्यपादयः ।

वदंति स्म तदा सर्वे हरिं लोकभयापहम् ॥

अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः ।

कस्माद्विघ्नमिदं जातमित्यन्ये ह्यतिविस्मिताः ॥

इत्येवं वचनं श्रुत्वा कश्यपाद्युदितं मुने ।

आश्वासयन्मुनीन्देवान् हरिर्वाक्यमुपाददे ॥

विष्णुरुवाच

हे देवा मुनयः सर्वे मद्वचः शृणुतादरात् ।

किमर्थं दुःखमापन्ना दुखं तु त्यजताखिलम् ॥

महदाराधनं देवा न सुसाध्यं विचार्यताम् ।

महदाराधने पूर्वं भवेदुःखमिति श्रुतम् ।

विज्ञाय दृढतां देवाः प्रसन्नो भवति ध्रुवम् ॥

शिवः सर्वगणाध्यक्षः सहसा परमेश्वरः ।

विचार्यतां हृदा सर्वैः कथं वश्यो भवेदिति ॥

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य नमः पश्चादुदाहरेत् ।

शिवायेति ततः पश्चाच्छुभद्वयमतः परम् ॥

कुरुद्वयं ततः प्रोक्तं शिवाय च ततः पुनः ।

नमश्च प्रणवश्चैव मंत्रमेवं सदा बुधाः ॥

आवर्तध्वं पुनर्यूयं यदि शंभुकृते तदा ।

कोटिमेकं तथा जप्त्वा शिवः कार्यं करिष्यति ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ७ । हाय - हाय करते हुए वहाँसे भाग गये । कितने ही १६ तथा अन्य लोग गिर पड़े, उस समय चारों ओर हाहापान मुनि होने लगा । इन्द्र अत्यन्त व्याकुल होकर घुटनोंके पृथ्वीपर गिर पड़े, इसी प्रकार अन्य देवता तथा ऋषि बल १७ भी व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १५ – १७ तब सभी देवता एवं मुनि परस्पर मिलकर ॥ १८ व्याकुल हो शिवके मित्रभूत ब्रह्मा एवं विष्णुके समीप गये ॥१८ ॥

उस समय कश्यपादि सभी मुनि संसारका भय १ ९ दूर करनेवाले विष्णुजीसे कहने लगे - अहो! यह प्रारब्धका बल है । दूसरे द्विज कहने लगे कि अभाग्यसे हमारा काम पूरा नहीं हुआ और दूसरे लोग २० अति विस्मित होकर विचार करने लगे कि यह विघ्न कैसे उपस्थित हो गया! हे मुने! तब कश्यपादिके द्वारा कहे गये इस वचनको सुनकर विष्णुजी मुनियों २१ तथा देवताओंको सान्त्वना देते हुए यह वचन कहने लगे- ॥ १ ९ –२१ ॥ विष्णु बोले- हे देवताओ! हे मुनियो! आप सभीलोग हमारा वचन आदरसे सुनिये, आपलोग इस २२ प्रकार क्यों दुखी हो रहे हैं, आपलोग अपने समस्त दुःखोंका त्याग कर दीजिये । हे देवताओ! महान् लोगोंका आराधन सरल नहीं है, आपलोग स्वयं विचार कीजिये, बड़े लोगोंकी आराधनामें पहले दु: ख । ही होता है - ऐसा हमने सुना है । हे देवताओ! २३ प्रसन्न हो जाते हैं ॥ २२-२३ ॥ सदाशिव सभी गणोंके अध्यक्ष एवं परमेश्वर हैं । २४ आप सभीलोग अपने मनमें विचार कीजिये कि वे । सहसा कैसे वशमें हो सकते हैं । सबसे पहले ॐ का । उच्चारण करके उसके बाद ' नमः ' उच्चारण करे । २५ पुनः ' शिवाय ', फिर दो बार शुभं शुभं, इसके बाद । दो बार ' कुरु ' बताया गया है । तदनन्तर ‘ शिवाय । नमः ' तदनन्तर प्रणव लगाना चाहिये । ( ॐ नमः २६ / शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ ) हे | देवताओ! यदि आपलोग शिवजीके लिये इस मन्त्रका | एक करोड़ सदा जप करें, तो शिवजी प्रसन्न होकर २७ तुम्हारा कार्य अवश्य करेंगे ॥ २४-२७ ॥

पृष्ठ 865

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० ७ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८५५ अ च तदा तेन हरिणा प्रभविष्णुना । इत्युक्ते तथा देवाः पुनश्चक्रुर्हरस्याराधनं मुने ॥ २८ हरिश्चापि सविधिश्शिवमानसः । संजजाप देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं मुनीनां च विशेषतः ॥ २ ९ शिवेति भाषंतो देवा धैर्यसमन्विताः । कोटिसंख्यं मुहुः तदा कृत्वा स्थितास्ते मुनिसत्तम ॥ ३०

एतस्मिन्नंतरे साक्षाच्छिवः प्रादुरभूत्स्वयम् ।

यथोक्तेन स्वरूपेण वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३१

श्रीशिव उवाच

हे हरे हे विधे देवा मुनयश्च शुभव्रताः ।

प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूत जपेनानेन चेप्सितम् ॥ ३२

देवा ऊचुः

यदि प्रसन्नो देवेश जगदीश्वर शंकर ।

सुरान् विज्ञाय विकलान् हन्यन्तां त्रिपुराणि च ॥ ३३

रक्षास्मान्परमेशान दीनबंधो कृपाकर ।

त्वयैव रक्षिता देवाः सदापद्भ्यो मुहुर्मुहुः ॥ ३४

सनत्कुमार उवाच

इत्युक्तं वचनं तेषां श्रुत्वा सहरिवेधसाम् ।

विहस्यांतस्तदा ब्रह्मन्महेशः पुनरब्रवीत् ॥ ३५

महेश उवाच

हे हरे हे विधे देवा मुनयश्चाखिला वचः ।

मदीयं शृणुतादृत्य नष्टं मत्वा पुरत्रयम् ॥ ३६

रथं च सारथिं दिव्यं कार्मुकं शरमुत्तमम् । हे मुने! उन सर्वसमर्थ विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवतालोग उसी तरह शिवकी आराधना करने लगे । उस समय विष्णुजी भी ब्रह्माजीके साथ शिवमें अपना मन एकाग्रकर देवताओं एवं मुनियोंका विशेष रूपसे कार्य सिद्ध करनेके निमित्त जप करने लगे । हे मुनिसत्तम! धैर्य धारणकर वे देवगण बारंबार ' शिव ' इस प्रकार उच्चारण करते हुए एक करोड़ मन्त्रका जपकर वहीं स्थित हो गये॥२८–३० ॥ इसी बीच स्वयं सदाशिव उनके सामने साक्षात् यथोक्त स्वरूपसे प्रकट हो गये और यह वचन कहने लगे— ॥३१ ॥

श्रीशिव बोले- हे हरे! हे विधे! हे देवगण! शुभव्रतवाले हे मुनियो! मैं इस जपसे प्रसन्न हूँ, आपलोग अभीष्ट वर माँगिये ॥३२ ॥

देवगण बोले- हे देवेश! हे जगदीश! हे शंकर! यदि आप प्रसन्न हैं, तो देवताओंको व्याकुल जानकर त्रिपुरोंका वध कीजिये । हे परमेशान! हे दीनबन्धो! हे कृपाकर! आप हम सबकी रक्षा करें; क्योंकि आपने ही विपत्तियोंसे देवताओंकी सदा बारंबार रक्षा की है ॥ ३३-३४ ॥ सनत्कुमार बोले — हे ब्रह्मन्! तब ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओंका कहा गया यह वचन सुनकर शिवजीने मन - ही - मन हँसकर कहा— ॥ ३५ ॥

महेश बोले- हे विष्णो! हे विधे! हे देवगणो! हे मुनियो! आप सब त्रिपुरको नष्ट हुआ समझकर आदर करके मेरे वचनको सुनें । आपलोगोंने पूर्व समयमें जो रथ, सारथी, दिव्य धनुष तथा उत्तम बाण देना स्वीकार किया था, वह सब शीघ्र उपस्थित कीजिये । हे विष्णो! हे विधे! आप त्रिलोकाधिपति पूर्वमंगीकृतं सर्वमुपपादयताचिरम् ॥ ३७ शीघ्र हमारे सम्राट् पदके योग्य सामग्री हे विष्णो हे विधे त्वं हि त्रिलोकाधिपतिर्ध्रुवम् । हैं, इसलिये । त्रिपुरको नष्ट समझकर सर्वसम्राट्प्रकारं मे कर्तुमर्हसि यत्नतः ॥ ३८ यत्नपूर्वक उपस्थित कीजिये नियुक्त किये गये आप दोनों । सृष्टि तथा पालनके लिये नष्टं पुरत्रयं मत्वा देवसाहाय्यमित्युत इन देवताओंकी सहायता करें ॥ ३६–३९ ॥ करिष्यथः प्रयत्नेनाधिकृतौ सर्गपालने ॥ ३ ९ यह मन्त्र महापुण्यप्रद, मुझे प्रसन्न करनेवाला, अयं मंत्रो महापुण्यो मत्प्रीतिजनकः शुभः ।, भोग - मोक्ष प्रदान करनेवाला, सभी प्रकारकी भुक्तिमुक्तिप्रदः शैवकावहः ॥ ४० शुभ कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, शिवभक्तोंको सुख सर्वकामदः देनेवाला, धन्य, यश देनेवाला, आयुको बढ़ानेवाला, धन्यो यशस्य स्वर्गकामार्थिनां नृणाम् । आयुष्यः

पृष्ठ 866

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८५६ अपवर्गों ह्यकामानां मुक्तानां भुक्तिमुक्तिदः

य इमं कीर्तयेन्मंत्रं शुचिर्भूत्वा सदा नरः ।

शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

सनत्कुमार उवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्य शिवस्य परमात्मनः ।

सर्वे देवा मुदं प्रापुर्हरिर्ब्रह्माधिकं तथा ॥

सर्वदेवमयं दिव्यं रथं परमशोभनम् ।

रचयामास विश्वार्थे विश्वकर्मा तदाज्ञया ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ ॥ ४१ । स्वर्गकी इच्छा करनेवालोंको स्वर्ग तथा कामनारहित | पुरुषोंको मुक्ति देनेवाला है, यह मुमुक्षुओंको भोग । तथा मोक्ष दोनों प्रदान करता है । जो मनुष्य पवित्र होकर नित्य इस मन्त्रका जप करता है अथवा | मन्त्रको सुनता अथवा सुनाता है, उसकी समस्त इस ४२ कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ४०–४२ ॥ सनत्कुमार बोले- - उन परमात्मा शिवजीके इस वचनको सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये और ४३ विष्णु एवं ब्रह्माको अधिक प्रसन्नता हुई । तदनन्तर | उनकी आज्ञासे विश्वकर्माने संसारके कल्याणके लिये सर्वदेवमय, दिव्य तथा अत्यन्त सुन्दर रथका निर्माण ४४ | किया ॥ ४३-४४ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे देवस्तुतिवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें देवस्तुतिवर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः विश्वकर्माद्वारा निर्मित व्यास उवाच

सनत्कुमार सर्वज्ञ शैवप्रवर सन्मते ।

अद्भुतेयं कथा तात श्राविता परमेशितुः ॥

इदानीं रथनिर्माणं ब्रूहि देवमयं परम् ।

शिवार्थं यत्कृतं दिव्यं धीमता विश्वकर्मणा ॥

सूत उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य व्यासस्य स मुनीश्वरः ।

सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वा शिवपदांबुजम् ॥

सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास महाप्राज्ञ रथादेर्निर्मितिं मुने ।

यथामति प्रवक्ष्येऽहं स्मृत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥

अथ देवस्य रुद्रस्य निर्मितो विश्वकर्मणा ।

सर्वलोकमयो दिव्यो रथो यत्नेन सादरम् ॥

सर्वभूतमयश्चैव सौवर्णः सर्वसंमतः ।

रथांगं दक्षिणं सूर्यस्तद्वामं सोम एव च ॥

दक्षिणं द्वादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम् ।

अरेषु तेषु विप्रेन्द्र आदित्या द्वादशैव तु ॥

सर्वदेवमय दिव्य रथका वर्णन व्यासजी बोले — हे सनत्कुमार! हे सर्वज्ञ! हे शैवप्रवर! हे सन्मते! हे तात! आपने परमेश्वरकी १ यह अद्भुत कथा सुनायी । अब आप सर्वदेवमय परम दिव्य रथके निर्माणका वर्णन कीजिये, जिसे बुद्धिमान् विश्वकर्माने शिवजीके लिये निर्मित २ किया॥१-२ ॥ सूतजी बोले- उन व्यासजीके इस वचनको | सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार शिवजीके चरणकमलोंका ३ स्मरण करके कहने लगे —॥३ ॥

सनत्कुमार बोले — हे व्यास! हे महाप्राज्ञ! | हे मुने! मैं शिवजीके चरणकमलोंका ध्यानकर ४ | अपनी बुद्धिके अनुसार रथ आदिके निर्माणका वर्णन करूँगा, आप उसका श्रवण करें । विश्वकर्माने रुद्रदेव के ५ | सर्वलोकमय तथा दिव्य रथको यत्नसे आदरपूर्व बनाया ॥ ४-५ ॥ यह सर्वसम्मत तथा भूतमय रथ सुवर्णका बना ६ हुआ था । उसके दाहिने चक्रमें सूर्य एवं बाँये चक्रमें । चन्द्रमा विराजमान थे । हे विप्रेन्द्र! दाहिने चक्रमें ७ बारह अरे लगे हुए थे, उन अरोंमें बारहों आदित्य

पृष्ठ 867

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अ ० ८ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८५७

शशिनः षोडशारास्तु कला वामस्य सुव्रत ।

तु तथा तस्य वामस्यैव विभूषणम् ॥

ऋक्षाणि

ऋतवो नेमयः षट् च तयोर्वै विप्रपुंगव ।

पुष्करं चांतरिक्षं वै रथनीडश्च मंदरः ॥

अस्ताद्रिरुदयाद्रिस्तु तावुभौ कूबरौ स्मृतौ ।

अधिष्ठानं महामेरुराश्रयाः केशराचलाः ॥

वेगः संवत्सरास्तस्य अयने चक्रसंगमौ । प्रतिष्ठित थे और बायाँ पहिया सोलह अरोंसे युक्त ८ था । हे सुव्रत! बायें पहियेके सोलह अरे चन्द्रमाक सोलह कलाएँ थीं । सभी नक्षत्र उस वामभागके पहियेकी शोभा बढ़ा रहे थे॥६–८ ॥ हे विप्रश्रेष्ठ! छहों ऋतुएँ उन दोनों पहियोंकी ९ नेमि थीं । अन्तरिक्ष उस रथका अग्रभाग हुआ और मन्दराचल रथनीड हुआ । अस्ताचल तथा उदयाचल । उसके दोनों कूबर कहे गये हैं । महामेरु उस रथका १० अधिष्ठान तथा अन्य पर्वत उसके केसर थे । संवत्सर उस रथका वेग था तथा दोनों अयन ( उत्तरायण एवं दक्षिणायन ) चक्रोंके संगम थे । मुहूर्त उसके बन्धुर मुहूर्ता बंधुरास्तस्य शम्याश्चैव कलाः स्मृताः ॥११ ( बन्धन ) तथा कलाएँ उसकी कीलियाँ कही गयी हैं ।

तस्य काष्ठाः स्मृता घोणाश्चाक्षदंडाः क्षणाश्च वै ।

निमेषाश्चानुकर्षाश्च ईषाश्चानुलवाः स्मृताः ॥

द्यौर्वरूथं रथस्यास्य स्वर्गमोक्षावुभौ ध्वजौ ।

युगान्तकोटितौ तस्य भ्रमकामदुधौ स्मृतौ ॥

ईषादंडस्तथा व्यक्तं वृद्धिस्तस्यैव नड्वलः ।

कोणास्तस्याप्यहंकारो भूतानि च बलं स्मृतम् ॥

इन्द्रियाणि च तस्यैव भूषणानि समन्ततः ।

श्रद्धा च गतिरस्यैव रथस्य मुनिसत्तम ॥

तदानीं भूषणान्येव षडंगान्युपभूषणम् ।

पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राणि सुव्रताः ॥

बलाशया वराश्चैव सर्वलक्षणसंयुताः मंत्रा घंटाः स्मृतास्तेषां वर्णपादास्तदाश्रमाः अथो बन्धो ह्यनन्तस्तु सहस्रफणभूषितः दिशः पादा रथस्यास्य तथा चोपदिशश्च ह पुष्कराद्याः पताकाश्च सौवर्णा रत्नभूषिताः समुद्रास्तस्य चत्वारो रथकंबलिनः स्मृताः काष्ठा ( कलाका तीसवाँ भाग ) उसका घोण ( जूएका १२ अग्रभाग ) और क्षण उसके अक्षदण्ड कहे गये हैं । निमेष उस रथका अनुकर्ष ( नीचेका काष्ठ ) और लव उसका ईषा कहा गया है॥९ –१२ ॥ द्युलोक इस रथका वरूथ ( लोहेका पर्दा ) तथा स्वर्ग और मोक्ष उसकी दोनों ध्वजाएँ थीं । भ्रम और १३ कामदुग्ध उसके जूएके दोनों सिर कहे गये हैं ॥ १३ ॥

व्यक्त उसका ईषादण्ड, वृद्धि नड्वल, अहंकार १४ उसके कोने तथा पंचमहाभूत उस रथके बल कहे गये हैं ॥ १४ ॥

समस्त इन्द्रियाँ ही उस रथके चारों ओरके १५ आभूषण थे । हे मुनिसत्तम! श्रद्धा गति थी ॥ १५ ॥

हे सुव्रतो! उस समय षडंग १६ निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष बने । पुराण, न्याय, मीमांसा तथा उपभूषण बने ॥ १६ ॥

सब लक्षणोंसे युक्त वर उसके ॥। १७ गये हैं । वर्णाश्रमधर्मं उसके चारों ही उस रथकी ( शिक्षा, कल्प, ) उसके आभूषण धर्मशास्त्र उसके बलके स्थान कहे चरण तथा मन्त्र घण्टा कहे गये हैं । हजारों फणोंसे विभूषित अनन्त । नामक सर्प उस रथके बन्धन हुए, दिशाएँ एवं ॥ १८ उपदिशाएँ पाद बनीं । पुष्करादि तीर्थ उस रथक रत्नजटित सुवर्णमय पताकाएँ और चारों समुद्र उस । रथको ढँकनेवाले वस्त्र कहे गये हैं ॥ १७ – १ ९ ॥ ॥ १ ९

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८५८ गंगाद्याः सरितश्रेष्ठाः सर्वाभरणभूषिताः चामरासक्तहस्ताग्राः सर्वाः स्त्रीरूपशोभिताः तत्र तत्र कृतस्थानाः शोभयांचक्रिरे रथम् आवहाद्यास्तथा सप्त सोपानं हैममुत्तमम् ॥ लोकालोकाचलस्तस्योपसोपानाः समन्ततः विषमश्च तथा बाह्यो मानसादिस्तु शोभनः पाशाः समन्ततस्तस्य सर्वे वर्षाचलाः स्मृताः । तलास्तस्य रथस्याऽथ सर्वे तलनिवासिनः

सारथिर्भगवान्ब्रह्मा देवा रश्मिधराः स्मृताः ।

प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो ब्रह्मदैवतम् ॥

अकारश्च महच्छत्रं मंदरः पार्श्वदंडभाक् ।

शैलेन्द्रः कार्मुकं तस्य ज्या भुजंगाधिपः स्वयम् ॥

घंटा सरस्वती देवी धनुषः श्रुतिरूपिणी ।

इषुर्विष्णुर्महातेजास्त्वग्निः शल्यं प्रकीर्तितम् ॥

हयास्तस्य तथा प्रोक्ताश्चत्वारो निगमा मुने । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ८ । सभी प्रकारके आभूषणोंसे भूषित गंगा ॥ २० । सभी श्रेष्ठ नदियाँ हाथोंमें चँवर लिये आदि हुए स्त्रीरूपमें । सुशोभित होकर जगह - जगह स्थान बनाकर रथकी २१ । शोभा बढ़ाने लगीं । आवह आदि सातों वायु स्वर्णमय उत्तम सोपान बने एवं लोकालोक पर्वत उस रथके । । चारों ओर उपसोपान बने । मानस आदि सरोवर ॥ २२ रथके बाहरी उत्तम विषम स्थान हुए ॥ २०–२२ उस ॥ सभी वर्षाचल उस रथके चारों ओरके पाश ॥ २३ और तललोकमें निवास करनेवाले सभी प्राणी उस रथके तलके भाग कहे गये हैं । भगवान् ब्रह्मा उसके सारथि और देवतागण घोड़ेकी रस्सी पकड़नेवाले कहे २४ गये हैं । ब्रह्मदैवत ॐकार उन ब्रह्माका चाबुक था । अकार उसका महान् छत्र, मन्दराचल उस छत्रको धारण करनेवाला पार्श्ववर्ती दण्ड, पर्वतराज सुमेरु २५ धनुष तथा स्वयं भुजंगराज शेषनाग उस धनुषकी डोरी बने ॥ २३ - २५ ॥ श्रुतिस्वरूपा भगवती सरस्वती उस धनुषका २६ घण्टा बनीं । महान् तेजस्वी विष्णुको बाण तथा अग्निको उस बाणका शल्य कहा गया है । हे मुने! चारों वेद उस रथके घोड़े कहे गये हैं । सभी प्रकारकी ज्योतींषि भूषणं तेषामवशिष्टान्यतः परम् ॥ २७ ज्योतियाँ उन अश्वोंकी परम आभूषण बनीं । समस्त

अनीकं विषसंभूतं वायवो वादकाः स्मृताः ।

ऋषयो व्यासमुख्याश्च वाहवाहास्तथाभवन् ॥

स्वल्पाक्षरैः संब्रवीमि किं बहूक्त्या मुनीश्वर ।

ब्रह्मांडे चैव यत्किंचिद्वस्तुतद्वै रथे स्मृतम् ॥

एवं सम्यक्कृतस्तेन धीमता विश्वकर्मणा ।

सरथादिप्रकारो हि ब्रह्मविष्ण्वाज्ञया शुभः ॥

। विषसम्भूत पदार्थ सेना बने । सभी वायु बाजा बजानेवाले । कहे गये हैं । व्यास आदि ऋषिगण उसे ढोनेवाले २८ | हुए ॥ २६–२८ ॥ [ सनत्कुमार बोले- ] हे २ ९ कहनेसे क्या लाभ, मैं संक्षेपमें | ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी वस्तु है, विद्यमान कही गयी है ॥ २ ९ ॥ परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने | आज्ञासे इस प्रकारके रथ आदिसे मुनीश्वर! अधिक ही बताता हूँ कि वह सब उस रथमें ब्रह्मा तथा विष्णुकी युक्त शुभ साधनका ३० भलीभाँति निर्माण किया था ॥ ३० ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत स्थादियुद्धप्रकारवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः रथादियुद्धप्रकारवर्णन द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

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० ९ ] रुद्रसंहिता ( युद्धखण्ड ) ८५ ९ अ अथ नवमोऽध्यायः ब्रह्माजीको सारथी बनाकर भगवान् शंकरका दिव्य रथमें आरूढ़ होकर अपने गणों तथा देवसेनाके साथ त्रिपुर- वधके लिये प्रस्थान, शिवका पशुपति नाम पड़नेका कारण सनत्कुमार उवाच महादिव्यं नानाश्चर्यमयं रथम् । ईदृग्विधं संनह्य निगमानश्वांस्तं ब्रह्मा प्रार्पयच्छिवम् ॥

शंभवेऽसौ निवेद्याधिरोपयामास शूलिनम् ।

बहुशः प्रार्थ्यं देवेशं विष्ण्वादिसुरसंमतम् ॥

ततस्तस्मिन् रथे दिव्ये रथप्राकारसंयुते ।

सर्वदेवमयः शंभुरारुरोह महाप्रभुः ॥

ऋषिभिः स्तूयमानश्च देवगंधर्वपन्नगैः ।

विष्णुना ब्रह्मणा चापि लोकपालैर्बभूव ह ॥

उपावृतश्चाप्सरसांगणैर्गीतविशारदैः शुशुभे वरदः शम्भुः स तं प्रेक्ष्य च सारथिम् ॥

तस्मिन्नारोहति रथं कल्पितं लोकसंभृतम् ।

शिरोभिः पतिता भूमौ तुरंगा वेदसंभवाः ॥

चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।

चकंपे सहसा शेषोऽसोढा तद्भारमातुरः ॥

अथाधः स रथस्यास्य भगवान्धरणीधरः ।

वृषेन्द्ररूपी चोत्थाय स्थापयामास वै क्षणम् ॥

क्षणांतरे वृषेन्द्रोऽपि जानुभ्यामगमद्धराम् ।

रथारूढमहेशस्य सुतेजस्सोढुमक्षमः ॥

अभीषुहस्तो भगवानुद्यम्य च हयांस्तदा ।

स्थापयामास देवस्य वचनाद्वै रथं वरम् ॥

ततोऽसौ नोदयामास मनोमारुतरंहसः ।

रथवरे स्थितः ॥

ब्रह्मा हयान्वेदमयान्नद्धान्

पुराण्युद्दिश्य वै त्रीणि तेषां खस्थानि तानि हि ।

अधिष्ठिते महेशे दानवानां तरस्विनाम् ॥

तु सनत्कुमार बोले- इस प्रकारके महादिव्य तथा अनेक आश्चर्योंसे युक्त रथमें वेदरूपी घोड़े १ जोतकर ब्रह्माजीने उसे शिवजीको समर्पित किया । इसे शिवजीको अर्पण करके उन्होंने विष्णु आदि २ देवगणोंके सम्माननीय देवेश शिवजीसे बहुत प्रार्थना करके उन्हें रथपर बैठाया । तब समस्त रथ - सामग्रियोंसे सम्पन्न उस दिव्य रथपर सर्वदेवमय महाप्रभु शम्भु ३ आरूढ़ हुए॥१-३ ॥ उस समय ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, ब्रह्मा, ४ विष्णु तथा समस्त लोकपाल उनकी स्तुति करने लगे ॥४ ॥

गानमें प्रवीण अप्सराओंसे घिरे हुए वरदायक ५ शिवजी उस सारथी ( ब्रह्मा ) की ओर देखते हुए शोभित होने लगे । सर्वलोकमय उस निर्मित रथपर सदाशिवके चढ़ते ही वेदरूपी घोड़े सिरके बल ६ पृथ्वीपर गिर पड़े, जिससे पृथ्वी तथा सभी पर्वत चलायमान हो गये और शेषनाग भी उस भारको ७ सहनेमें असमर्थ होनेके कारण कम्पित हो उठे । तब पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् शेष वृषेन्द्रका रूप ८ धारणकर क्षणमात्रके लिये उस रथको उठाकर स्थापित करने लगे, किंतु रथपर आरूढ़ शिवजीके परम तेजको सहन करनेमें असमर्थ वृषेन्द्र भी घुटनोंके बल ९ पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ – ९ ॥ तब हाथमें लगाम पकड़े हुए ब्रह्माजीने आज्ञासे घोड़ोंको उठाकर रथको १० शंकरजीकी व्यवस्थित किया ॥ १० ॥

उसके बाद ब्रह्माजी स्वयं उस श्रेष्ठ रथपर हो शिवकी आज्ञासे मन तथा पवनके समान ११ सवार रथमें जुते हुए उन वेदरूपी घोड़ोंको तेजीसे वेगवाले हाँकने लगे । शिवजीके बैठ जानेपर वह रथ उन दानवोंके आकाशस्थित तीनों पुरोंको उद्देश्य बलवान् करके चलने लगा ॥ ११-१२ ॥ १२

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८६० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ अथाह भगवान् रुद्रो देवानालोक्य शंकरः । उस समय देवगणोंकी ओर देखकर पशूनामाधिपत्यं मे दध्वं हन्मि ततोऽसुरान् ॥ १३ करनेवाले भगवान् रुद्रने कहा- हे श्रेष्ठ देवताओ कल्याण पृथक् पशुत्वं देवानां तथान्येषां सुरोत्तमाः कल्पयित्वैव वध्यास्ते नान्यथा दैत्यसत्तमाः सनत्कुमार उवाच इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवदेवस्य धीमतः विषादमगमन्सर्वे पशुत्वं प्रतिशंकिताः तेषां भावमथ ज्ञात्वा देवदेवोऽम्बिकापतिः विहस्य कृपया देवान् शंभुस्तानिदमब्रवीत् शंभुरुवाच मावोऽस्तु पशुभावेऽपि पातो विबुधसत्तमाः श्रूयतां पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः यो वै पाशुपतं दिव्यं चरिष्यति स मोक्ष्यति पशुत्वादिति सत्यं वः प्रतिज्ञातं समाहिताः ये चाप्यन्ये करिष्यन्ति व्रतं पाशुपतं मम मोक्ष्यन्ति ते न संदेहः पशुत्वात्सुरसत्तमाः नैष्ठिकं द्वादशाब्दं वा तदर्द्धं वर्षकत्रयम् शुश्रूषां कारयेद्यस्तु स पशुत्वाद्विमुच्यते तस्मात्परमिदं दिव्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः पशुत्वान्मोक्ष्यथ तदा यूयमत्र न संशयः सनत्कुमार उवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य महेशस्य परात्मनः तथेति चाब्रुवन्देवा हरिब्रह्मादयस्तथा तस्माद्वै पशवः सर्वे देवासुरवराः प्रभोः रुद्रः पशुपतिश्चैव पशुपाशविमोचकः तदा पशुपतीत्येतत्तस्य नाम महेशितुः । प्रसिद्धमभवद् ह्यद्धा सर्वलोकेषु शर्मदम्

मुदा जयेति भाषन्तः सर्वे देवर्षयस्तदा ।

अमुदंश्चाति देवेशो ब्रह्मा विष्णुः परेऽपि च ॥

तस्मिंश्च समये यच्च रूपं तस्य महात्मनः ।

जातं तद्वर्णितुं शक्यं न हि वर्षशतैरपि ॥

| यदि आपलोग मुझे पशुओंका अधिपति बना! । मैं असुरोंका वध करूँ । देवताओं तथा अन्य लोगोंके दें, तो ॥ १४ पृथक् - पृथक् पशुत्वकी कल्पना करनेपर ही वे दैत्यग्रक । वधके योग्य हो सकते हैं, अन्यथा नहीं ॥ १३-१४ ॥ सनत्कुमार बोले- उन बुद्धिमान् देवाधिदेवके । इस वचनको सुनकर सभी देवता पशुत्वके प्रति शंकित ॥ १५ होकर दुःखित हो गये । तब देवाधिदेव अम्बिकापति । शंकर देवताओंका भाव जानकर हँसते हुए उन ॥ १६ देवताओंसे कहने लगे - ॥ १५-१६ ॥ शम्भु बोले – हे देवगणो! पशुभावको प्राप्त होनेपर । भी आपलोगोंका पात नहीं होगा, मेरी बात सुनिये ॥ १७ और उस पशुभावसे अपनेको मुक्त कीजिये । जो इस । दिव्य पाशुपत व्रतका आचरण करेगा, वह पशुत्वसे ॥ १८ मुक्त हो जायगा, मैंने आपलोगोंसे सत्य प्रतिज्ञा की है ॥ १७-१८ ॥ । हे श्रेष्ठ देवताओ! जो अन्य लोग भी मेरे ॥ १ ९ पाशुपतव्रतका आचरण करेंगे, वे पशुत्वसे मुक्त हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है । जो निष्ठापूर्वक बारह । वर्ष, छः वर्ष अथवा तीन वर्षतक मेरी उपासना ॥ २० करेगा, वह पशुभावसे छूट जायगा । इसलिये हे श्रेष्ठ । देवताओ! यदि आप लोग इस श्रेष्ठ एवं दिव्य व्रतका | आचरण करेंगे, तो पशुत्वसे मुक्त हो जायँगे, इसमें ॥ २१ सन्देह नहीं है ॥१ ९ –२१ ॥ सनत्कुमार बोले — उन परमात्मा महेश्वरका यह । । वचन सुनकर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवगणोंने कहा— ॥ २२ ऐसा ही होगा । इसलिये [ हे वेदव्यास! ] देवता एवं असुर । । सभी उन प्रभुके पशु हैं और पशुओंको पाशसे मुक्त ॥ २३ करनेवाले रुद्र भगवान् शंकर पशुपति हैं ॥ २२-२३ ॥ तभीसे उन महेश्वरका यह कल्याणप्रद पशुपति ॥ २४ नाम भी सभी लोकोंमें प्रसिद्ध हुआ ॥ २४ ॥

उसके बाद सभी देवता तथा ऋषि प्रसन्नतापूर्वक २५ । जय - जयकार करने लगे । स्वयं देवेश, ब्रह्मा, विष्णु । एवं अन्य लोग भी बहत प्रसन्न हुए । उस समय उन | परमात्माका जैसा वर्णन २६ । सैकड़ों अद्भुत रूप था, उसका ॥ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ २५-२६